Hindi Story: बिखरी जिंदगी

Hindi Story: शादी से पहले ही सपना पेट से हो गई थी. पर उस का प्रेमी चिरंजीवी डरपोक निकला. मजबूरी में सपना ने अबौर्शन कराया. फिर उस की शादी प्रभात के साथ हुई. पर डाक्टर ने प्रभात को बता दिया कि सपना का शादी से पहले अबौर्शन हुआ था. आगे क्या हुआ?


जि का डर था वही हुआ. सपना मायके रहने गई. उस के पति ने तलाक का नोटिस भेज दिया.
मैं यानी सपना की भाभी निशा हमेशा अपने पति रंजन से कहती रही कि शादीब्याह के मामले में कुछ भी छिपाना अच्छी बात नहीं है. चाहे जैसा भी हो सपना के अतीत के बारे में बता देना उचित हेगा, उस के बाद जो होगा उन की मरजी. अगर उन्हें लगेगा कि सपना से शादी करना ठीक होगा तो करेंगे, नहीं तो कहीं और कोशिश करो.


दरअसल, नौकरी के दरमियान सपना की जानपहचान एक दक्षिण भारतीय लड़के चिरंजीवी से हुई थी. बात इतनी बढ़ी कि वह उस से पेट से हो गई. सपना ने चिरंजीवी पर शादी करने का दबाव बनाया, तो एकाएक वह नौकरी छोड़ कर अपने गांव चला गया. इस बीच सपना ने उसे कई बार फोन किया, मगर चिरंजीवी ने हर बार यही कहा कि वह शादी करने के हालात में नहीं है, लिहाजा वह बच्चा गिरा दे.
सपना एक ऐसे भंवर मे फंस गई, जहां से उसे सिवा बरबादी के कुछ नहीं दिख रहा था. उस से रोते बन रहा था, ही हंसते. कैसे अपने मांबाप को सब बताएगी? उन्हें जब पता चलेगा तब उन पर क्या बीतेगी? एक बार खुदकुशी करने का खयाल मन में आया, मगर बढ़ते कदम रुक गए. खुदकुशी करना क्या आसान होता है?


आखिरकार सपना ने फैसला लिया कि वह मम्मीपापा को बता देगी. अबौर्शन करवाना कोई गुनाह नहीं. उस का गुनाह इतना था कि उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए था. मांबाप अगर बेटियों पर भरोसा कर के उन्हें बाहर नौकरी करने की इजाजत देते हैं, तो उन्हें मर्यादा का खयाल रखना चाहिए. लड़कों का क्या जाएगा, वे तो कोई भी बहाना बना कर कन्नी काट लेंगे, ?ोलना तो लड़कियों को ही पड़ता है. मम्मीपापा ने सुना तो वे आगबबूला हो गए. सपना को खरीखोटी सुनाई. चिरंजीवी से बात करना चाहा, मगर उस का फोन स्विच औफ मिला. एक बार चेन्नई जाने को सोचा, फिर यह सेच कर चुप हो गए कि उस का पुश्तैनी घर एक गांव में था, जहां कुछ कहनेसुनने से कुछ नहीं होगा. वे हमारी बात सम?ाने वाले नहीं. उलटे सपना को ही कुसूरवार मान कर गांव से भगा देंगे. काफी सोचविचार कर सपना का अबौर्शन कराना उचित सम?.


अब सपना आजाद थी. पर उस का औफिस जाना छुड़वा दिया गया. रंजन के ऊपर सपना की शादी की जिम्मेदारी थी. ऐसा इसलिए, क्योंकि रंजन पूर्वांचल की एक छोटे सी तहसील भाटी में नौकरी करते थे, जो दिल्ली से काफी दूर थी. दिल्ली के आसपास सपना की शादी करना उचित नहीं लगा. भेद खुलने का डर था. लड़का रंजन के ही औफिस में काम करता था. रंजन से उस की अच्छी जानपहचान थी. भाटी में उस का खुद का मकान था, साथ में गांव में कुछ पुश्तैनी जमीन भी थी. सपना इस शादी के हक में नहीं
थी. कहां दिल्ली, कहां एक छोटा सा कसबावह उदास हो गई. मम्मी ने भरोसा दिया कि उस का तबादला लखनऊ हो जाएगा, तब वह आराम से महानगर में रह सकेगी.


पता नहीं मम्मी के भरोसे में कितनी हकीकत थी. एकबारगी मु? लगा कि मम्मीपापा किसी तरह से सपना का घर बसना देखना चाहते थे. लेकिन सपना की पसंदनापसंद का कोई सवाल नहीं था. आज के दौर में शारीरिक संबंध बनना एक सामान्य घटना है. भागदौड़ की जिंदगी में इसे कोई इतनी गंभीरता से नहीं लेता, मगर मम्मीपापा के भीतर  इतना डर था कि उन्होंने सपना को ऐसी जगह ब्याहना मुनासिब सम?, जहां सपना जैसी लड़की के लिए एक पल रहना मुमकिन नहीं था. लड़के का नाम प्रभात था. उसे एकमुश्त जमीन खरीदने के लिए रकम की जरूरत थी, जिसे रंजन ने स्वीकार कर लिया. थोड़े से लोगों की मौजूदगी में सपना की शादी कर दी गई, पर उस का भाटी में कभी मन नहीं लगा.


सपना अकसर रंजन से यही कहा करती थी कि वह किसी तरह प्रभात का तबादला लखनऊ करवा दे, ताकि वहां कोई फ्लैट ले कर रहा जाए. इस बीच सपना पेट से हुई. पहली बार जब प्रभात उसे महिला डाक्टर के पास ले गया, तो चैकअप करने के बाद उस ने प्रभात को अपने केबिन मे बुला कर पूछा कि क्या आप की पत्नी का पहले कभी अबौर्शन हुआ था? यह सुन कर प्रभात थोड़ा हैरान हो कर बोला, ‘‘नहीं, ऐसा तो नहीं है. यह हमारा पहला अनुभव है.’’ डाक्टर ने दोबारा कुछ पूछना मुनासिब नहीं सम?. कुछ दवाएं लिख दीं और बीचबीच में कर दिखाने की सलाह दी. रास्तेभर प्रभात के कानों में लगातार डाक्टर साहिबा की कही बात गूंजती रही. जैसे ही वह सपना के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ, सब से पहले उस का यही सवाल था, ‘‘क्या तुम्हें पहले कभी अबौर्शन हुआ था?’’


यह सुन कर सपना कांप गई, फिर खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘कैसी बचकानी बातें कर रहे हैं…’’
‘‘डाक्टर की बात ?ाठी नहीं हो सकती…’’ प्रभात बोला.
‘‘डाक्टर बीच में कहां से गई?’’
‘‘उन्होंने ही बताया कि तुम्हारा एक बार अबौर्शन हो चुका है.’’
‘‘डाक्टर कैसे पता लगा सकता है?’’
‘‘और कौन बताएगा?’’


सपना ने थोड़ा कड़ा मन करते हुए कहा, ‘‘मान लो ऐसा ही हो तो तुम कर क्या सकते हो?’’
‘‘मैं ऐसी चरित्रहीन औरत के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहूंगा,’’ प्रभात ने दो टूक कहा.
‘‘तलाक लेना क्या आसान होगा? दूसरे, मैं डाक्टर की बात को गलत साबित करती हूं. जब ऐसा कुछ हुआ ही हो तो मैं कैसे मान लूं?’’ सपना की आवाज में आत्मविश्वास की कमी थी.
उस रोज प्रभात और सपना में काफी बहस हुई. दोनों का ?ागड़ा सुन कर प्रभात की मां गईं. पूछने पर प्रभात ने कुछ नहीं छिपाया.
‘‘मु? तो पहले से ही शक था.
तुम्हीं शादी के लिए उतावले थे.
10 लाख क्या दिया खोटा सिक्का
थमा दिया,’’ मां सपना को जलीकटी सुनाने लगीं.


उस दिन के बाद प्रभात ने सपना की  तरफ देखना भी छोड़ दिया. सपना की जिंदगी खजूर पर लटके हुए इनसान की तरह हो गई. वह दिल्ली की रही, ही भाटी की. मम्मीपापा ने जो सोच कर उस की शादी का घरौंदा बनाया था, वह रेत की तरह बिखरने वाला था. एक दिन सपना ने फोन कर के रंजन को सारी बातें बता दीं. रंजन सपना की ससुराल आया. प्रभात को रंजन से इतनी नफरत हो गई थी कि जब कभी उस का औफिस में सामना होता, तो वह दुआसलाम भी नहीं करता था. रंजन को सम? में नहीं आया कि एकाएक प्रभात इतना बदल कैसे गया. उसे लगा होगी कोई औफिस की समस्या, पर अब सारा राज खुल गया था.


प्रभात की मां ने साफसाफ कह दिया कि वह सपना को अपनी बहू बना कर नहीं रखना चाहतीं. रंजन ने लाख सम?ाया, मगर प्रभात सम?ाने के लिए तैयार था, ही उस के घर वाले.
‘‘क्या यह आप लोगों का आखिरी फैसला है?’’ रंजन हताश मन से पूछा.
‘‘हां,’’ प्रभात ने जवाब दिया.
‘‘कहीं तुम ने सपना को तलाक देने का तो फैसला नहीं ले लिया है?’’ रंजन ने शक जताया.
‘‘आप ने सही सोचा है,’’ प्रभात
की इस बात पर रंजन के माथे पर बल पड़ गए.
‘‘तलाक लेना आसान नहीं है. वह तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली है.’’
‘‘मैं उसे अपना बच्चा नहीं मानता,’’ प्रभात ने हेकड़ी दिखलाई.
‘‘तुम्हारे मानने या मानने से कुछ नहीं होगा. जैसे डाक्टर ने सपना के अबौर्शन की जानकारी दी, वैसे ही तकनीक के जरीए बताया जा सकता है कि यह तुम्हारा बच्चा ही है. तुम्हें उसे वे सारे हक देने होंगे, जो एक बच्चे के होते हैं,’’ रंजन बोला.


पर प्रभात पर रंजन की बात का बिलकुल भी असर नहीं पड़ा. उस रोज रंजन बिना कोई ठोस फैसला लिए वापस अपने घर गया. घर कर उस का मन किसी काम में नहीं लगा. उस के दिमाग में बारबार सपना ही घूमती रही. क्या सोचा था, क्या हो गया. उसे भरोसा था कि इतनी दूर, साथ में अच्छाखासा दहेज दे कर वह सपना के नाजायज प्यार पर परदा डाल देगा, मगर ऐसा हुआ नहीं. रंजन को अपने फैसले पर अफसोस होने लगा. इस सब की जानकारी जब मम्मीपापा को लगेगी, तब उन पर क्या बीतेगी, यह सोच कर उस का दिल बैठने लगा. अब अकसर अबौर्शन को ले कर सपना और प्रभात में ?ागड़ा होने लगा. प्रभात का सारा परिवार उस के साथ था, जबकि सपना अकेली. कितनी खिलाफत करती. तंग कर एक
दिन अपना जरूरी सामान बांध कर रंजन के पास रहने चली आई.


औफिस में मौका मिला तो रंजन ने प्रभात को सम?ाने की काफी कोशिश की, मगर वह तो कुछ भी सुनने के लिए तैयार था. वह बहुत गुस्से में था. जल्दी ही यह खबर औफिस में फैल  गयी कि प्रभात और रंजन की बहन सपना में अनबन हो गई है. मामला तलाक पर गया है. रंजन को काफी शर्मिंदगी महसूस होने लगी. ऊपर से तो कोई कुछ नहीं कहता था, मगर अंदर ही अंदर कानाफूसी जारी थी. रंजन ने मम्मीपापा को सारी बात बताई. वे दोनों भी बेहद परेशान हो गए. पापा रंजन से बोले कि चाहे जैसे भी हो सपना को वापस ससुराल भेजो. ‘‘किस के बल पर? क्या गारंटी है कि वहां सपना महफूज होगी? कहीं वे सब सपना को मार डालें तब?’’ ‘‘इतना ही डर था तो फिर शादी क्यों की?’’ पापा चिल्लाए.


‘‘पापा, आप 2 तरह की बातें करते हैं. एक तरफ आप छिपाना चाहते थे, तो दूसरी तरफ शादी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं. इतना ही था तो कर लिए होते अपने तरीके से शादी,’’ इतना बोलने के अगले पल रंजन को पापा को कहे शब्दों पर अफसोस होने लगा. उसे पापा से ऐसे तल्ख लहजे में नहीं बात करनी चाहिए थी. उस ने पापा से माफी मांगी. इधर, सपना ने साफसाफ कह दिया कि वह उस गांव में रहने नहीं जाएगी. वहां उस का मन नहीं लगता. भले ही जिंदगी अकेले काटनी हो, काट लेगी मगर वापस उस जेलखाने में नहीं जाएगी. जेलखाना ही थी उस की ससुराल. सासससुर, ननदननदोई कहीं से भी वे लोग शहरी नहीं लगते थे. पता नहीं रंजन ने क्या देखा जो टूट पड़े इस रिश्ते के लिए.


आखिरकार रंजन ने सपना को वापस दिल्ली भेज दिया. दिल्ली कर फिर से वही सवाल खड़ा हुआ कि सपना के पेट में पल रहे बच्चे का क्या होगा? एक बार सोचा कि फिर से अबौर्शन करा कर पहले की तरह आजाद जिंदगी जिए. नौकरी तो मिल ही जाएगी. सपना के मम्मीपापा इस के खिलाफ थे. उन्हें भरोसा था कि देरसवेर प्रभात को सम? जाएगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा. काफी जद्दोजेहद के बाद सपना ने मम्मीपापा की बात मान ली. उसे भी लगा यही ठीक रहेगा. इस बीच प्रभात ने तलाक का नोटिस भेज दिया. सपना कुछ पल के लिए बेचैन हुई, मगर अगले पल खुद में हिम्मत संजोई कि चाहे जो भी हो जाए, वह प्रभात को तलाक नहीं देगी.


पूरे 9 महीने बाद सपना ने अपने बच्चे को जन्म दिया. प्रभात ने काफी कोशिश की, मगर सपना टस से मस
हुई. 2 साल गुजरने के बाद भी सपना ने तलाक के लिए कोई पहल नहीं की, तब सुनने में आया कि प्रभात ने दूसरी शादी कर ली. यह तो और भी बड़ा अपराध था. सपना ने बच्चे के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का मन बनाया. उस ने प्रभात की पुश्तैनी जायदाद पर दावा ठोंक दिया, साथ में उस की दूसरी शादी पर भी सवाल खड़े किए. तमाम कानूनी पचड़े की वजह से प्रभात काफी दबाव में गया और उस ने सपना की बात मान कर उसके मनमुताबिक हर्जाना दे कर तलाक पा लिया. सपना का बेटा 5 साल का हुआ, तो उस ने दोबारा नौकरी करने का मन बनाया. उसे नौकरी मिल भी मिल गई. ऐसे ही एक शाम सपना औफिस से घर आने के लिए मैट्रो का स्टेशन पर इंतजार कर रही थी, तभी उसे चिरंजीवी दिखा. उस ने नफरत से नजरें दूसरी तरफ मोड़ लीं. इस के बावजूद चिरंजीवी ने उसे देख लिया. वह उस के करीब आया.


‘‘सपना, मैं चिरंजीवी,’’ इतना कह कर वह मुसकराया.
सपना ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया.
‘‘सपना, मु? माफ कर दो. मैं ने तुम्हें धोखा दिया.’’
‘‘अब गड़े मुरदे उखाड़ने से क्या फायदा?’’ सपना की आवाज में
तल्खी थी.
‘‘पिताजी को कोरोना हो गया था. अचानक मु? गांव जाना पड़ा.’’
‘‘चलो, मान लेते हैं. मगर क्या तुम्हारा फर्ज नहीं बनता था कि एक बार फोन कर के मेरा हाल लेते. बड़ी आसानी से कह दिया अबौर्शन करा लो. तुम्हें
मेरी हालत का अंदाजा था?’’ कहतेकहते सपना का गला रुंध गया, ‘‘तुम ने मु? कहीं का नहीं छोड़ा.’’
‘‘मु? माफ कर दो,’’ कह कर चिरंजीवी ने चुप्पी साध ली. उस के चेहरे पर बनतेबिगड़ते भावों से लगा मानो वह सपना से और भी कुछ कहना चाहता है, मगर कह नहीं पा रहा था.
फिर चिरंजीवी ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘सपना, अगर तुम्हारे पास समय हो तो क्या थोड़ी देर के लिए मेरे साथ पास के किसी रैस्टोरैंट में जा कर चाय पीना पसंद करोगी?’’
‘‘नहीं चिरंजीवी, अब हमारे रास्ते अलगअलग  हैं.’’
‘‘सिर्फ आज, उस के बाद मैं
तुम से कभी नहीं मिलूंगा,’’ चिरंजीवी दोबारा बोला.
दोनों रैस्टोरैंट में आए. चिरंजीवी
ने चाय के साथ कुछ स्नैक्स का भी और्डर दिया.


चाय की चुसकियों के बीच चिरंजीवी ने सपना के पति और बच्चे के बारे में पूछा.
यह सुन कर सपना का मन भीग गया. बड़ी मुश्किल से उस की जबान से बोल फूटे, ‘‘मेरा तलाक हो चुका है. मु? एक 5 साल का बेटा है. वही मेरे जीने का सहारा है.’’
सपना की आंखों में आंसू देख कर चिरंजीवी का दिल पसीज गया.
चाहते हुए भी सपना ने अपने अतीत के पन्ने बारीबारी से खोल कर चिरंजीवी के सामने रख दिए.
चिरंजीवी अपराधबोध से भर गया. सपना की बिखरी जिंदगी के लिए वह खुद को कुसूरवार मानने लगा. वह भरे दिल से बोला, ‘‘सपना, बीते हुए कल को वापस तो नहीं लाया जा सकता, मगर उसे नए सिरे से संवारा जरूर जा सकता है.’’


‘‘मतलब?’’ पूछते हुए सपना हैरानी से उसे देखने लगी.
‘‘क्या हम शादी कर के नई जिंदगी की शुरुआत नहीं कर सकते?’’
‘‘यह तुम क्या कह रहे होतुम्हारे बीवीबच्चे क्या सोचेंगे…’’
‘‘मैं ने आज तक शादी नहीं की.
वैसे भी मेरी उम्र इतनी भी गई नहीं है
कि मैं शादी कर सकूं. अभी तो महज 33 साल का हूं.’’
कुछ सोच कर सपना का मन उदास हो गया, ‘‘नहीं चिरंजीवी, ऐसा नहीं हो सकता. मैं एक बेटे की मां हूं. तुम शायद ही मेरे बेटे का अपना पाओ. अगर मेरा बेटा हम दोनों की शादी की वजह से अनदेखा हुआ, तो मैं खुद का कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’
‘‘अकेले जिंदगी काटना क्या आसान होगा तुम्हारे लिए?’’ चिरंजीवी के इस सवाल ने सपना को ?ाक?ार कर रख दिया. बेशक आज मांबाप जिंदा हैं, पर कल का क्या ठिकाना. वे नहीं रहे तब किस के सहारे जिंदगी काटेगी. कोई तो होना चाहिए, जो उस के अकेलेपन का साथी हो.


देर हो रही थी. सपना ने चिरंजीवी का मोबाइल नंबर मांगा. घर कर वह बेहद बेचैन हो रही थी. कभी अपने भविष्य के बारे में सोचती, तो कभी बूढ़े हो रहे मांबाप के बारे में. बच्चे को ले कर भी वह परेशान थी. पता नहीं बड़ा हो कर वह चिरंजीवी को अपना पिता स्वीकार करेगा भी या नहीं? सम?ादार होने के बाद अपने असली पिता के पास जाने का जिद कर बैठे और उसे गुनाहगार मानने लगे तब? अगले दिन रविवार था. चिरंजीवी ने सपना के साथ घूमने का प्लान बनाया, जिसे सपना इनकार कर सकी. बेटे को मां के पास छोड़ कर वह यह कह कर गई कि औफिस के काम से जा रही है, जल्द जाएगी.


आज चिरंजीवी और सपना ने एकदूसरे को काफी वक्त दिया.
‘‘चिरंजीवी, क्या तुम मु? पर तरस खा कर शादी तो नहीं कर रहे हो?’’ सपना ने अचानक पूछा.
‘‘बिलकुल नहीं. मैं तुम से आज भी बेहद प्यार करता हूं.’’
‘‘मेरे बच्चे का क्या होगा? क्या तुम उसे बाप का नाम देगे?’’
‘‘सपना, मैं खुद अपने पिता का सौतेला बेटा हूं. क्या मेरे पिता ने मु? बेटे का  मान नहीं दिया. क्या मैं ने उन्हें पिता का दर्जा नहीं दिया. तुम ने खुद देखा होगा कि जब वे कोरोना से पीडि़त हुए थे, तो मैं उन की देखभाल के लिए अपने गांव भागाभागा चला गया था.’’
सपना को चिरंजीवी निश्छल और बेकुसूर लगा.
जब सपना को पूरी तसल्ली हो गई कि चिरंजीवी के बारे में जैसा सोचा था वह वैसा नहीं है, तब घर कर उस ने अपने मम्मीपापा से उस का जिक्र किया. वे तो पहले से ही चाहते थे कि सपना का घर बस जाए. ऐसे में चिरंजीवी की पहल को मना कर सके.


सादे समारोह में शादी हो गई. जब विदाई का समय आया, तब सपना के पापा ने उसे एक कमरे में बुला कर नम आंखों से कहा, ‘‘बेटी, मु? माफ करना. मैं ने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की. तुम पर दबाव बना कर ऐसी जगह तुम्हारी शादी कर दी, जहां करने के बारे में मु? सौ बार सोचना चाहिए था.
सिर्फ शादी कर देना ही मांबाप की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि शादी के लिए बेटी की रजामंदी भी लेनी चाहिए, जो मैं ने नहीं ली.’’  Hindi Story     

Social Story: सोनपुर मेला-दिन पशुओं का रात लड़कियों की

Social Story: रात के तकरीबन 10 बज चुके हैं. गंगा और गंडक के संगम पर बहती हवा में ठंडक है, पर इस ठंडक के भीतर एक अजीब सी बेचैनी तैर रही है. चांद आसमान में अपने पूरे शबाब के साथ मौजूद है, लेकिन लगता है कि उसे भी अंदाजा है कि उस के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसे उजाला भी छूने से डरता है.

सोनपुर मेले का मैदान दूरदूर तक फैला हुआ है. दिन में जहां यही जगह पशुओं की आवाजों से भरी रहती है, वहीं रात का रंग कुछ और ही होता है. आवाजें बदल जाती हैं, ताल बदल जाती है और लोगों की भीड़ किसी और ही चाह में इकट्ठा होने लगती है. ऐसा लगता है जैसे 2 मेलों की 2 दुनिया एक ही धरती पर उगती हैं… एक दिन में और दूसरी रात में. दिन का मेला पशुओं का है, रात का मेला लड़कियों का और इन दोनों दुनिया के बीच कहीं, एक रोशनी से भरा थिएटर खड़ा है, जिस के भीतर कलाकार हैं और बाहर दर्शक. पर जिस दुनिया में वे रहते हैं, वहां कलाकार होना ‘सुख’ नहीं, बल्कि ‘जद्दोजेहद’ का दूसरा नाम है.
सोनपुर, जहां दिन में व्यापार होता है, बूढ़े हाथी बिकते हैं, किसान अपनी जरूरतें खरीदते हैं, व्यापारी अपनी दुकानें सजाते हैं, वहीं रात होते ही एक दूसरी दुनिया उभर आती है. भीड़ के बीच से छनती तेज रोशनियां, लाउडस्पीकरों पर बजते मिक्स गीत, और हर मंच की ओर बढ़ती हजारों आंखें पर इन में से किसी को भी अंदाजा नहीं है कि इस चकाचौंध के पीछे क्या कीमत चुकानी पड़ती है.

आंखों में बसती थकान, मेकअप छिपा नहीं सकता स्टेज पर खड़ी हर लड़की के चेहरे पर मेकअप की कई परतें होती हैं, पर जिंदगी की दरारें इन परतों से नहीं छिपतीं. एक लड़की ने बात ही बात में कहा, ‘‘कपड़ा जितना छोटा, उतना नोट ज्यादा. पूरा शरीर तोड़ डालते हैं पर कहते हैं कि ‘आखिरी तक मुसकराना’. हम भी मुसकराते हैं, क्योंकि रोना किसी को पसंद नहीं आता. ‘‘कपड़े जितने छोटे होते हैं, लोग उतना पैसा लुटाते हैं. हमारी आंखों का रंग भी असली नहीं रहता. स्टेज पर जाने से पहले नीला लैंस लगाती हूं. पीरियड में भी नाचना पड़ता है. लोग कहते हैं कि हम नाचते हैं, क्योंकि हमें यही आता है पर किसी ने यह नहीं पूछा कि हम ने क्या खो कर यह सीखा?’’ मेकअप कर रही 17 साल की एक लड़की बोली, ‘‘हम तो गांव के मेले में नाचते थे. यहां आ गए तो पता चला कि यहां नाच नहीं, तन दिखाना ज्यादा जरूरी है. पहली बार बहुत रोई थी पर घर में खाने को कुछ नहीं था.’’

उस लड़की की आवाज में कोई ड्रामा नहीं, कोई शिकायत नहीं. बस, एक लंबा जमा हुआ सच है. ऐसा सच, जिसे मेले की भीड़ देखने नहीं आती, पर उस की बदौलत ताली जरूर बजाती है. जहां जानवरों का मेला लगता है, वहां लड़कियों का नाच भी दिखाया जाता है. सोनपुर मेला दुनिया का सब से बड़ा पशु मेला है. यह बात हर गाइड, हर पंपलैट, हर इतिहासकार लिखता है और यह सच भी है. दिन में तंबुओं में बंधे हाथी, रस्सी से बंधे घोड़े, चमकदार काठी वाले ऊंट और अनगिनत पालतू जानवरों को देखने हजारों लोग आते हैं. किसान उन का दांत देखते हैं, चाल देखते हैं, वजन देखते हैं, बरताव देखते हैं, लेकिन जैसे ही शाम ढलती है, वही मैदान, वही तंबू किसी और रंग में रंग जाते हैं.

दिन में जहां जानवर बिकते हैं, रात में वहां लड़कियों के नाच बिकते हैं. मजबूरी और जिंदगी की कीमत सोनपुर मेले या किसी दूसरे मेले में नाचने वाली लड़कियों की माली हालत आमतौर पर बेहद कमजोर होती है. ज्यादातर लड़कियां गरीबी, अनाथालय या टूटे परिवार से आती हैं. उन के पास औप्शन बहुत सीमित होते हैं, जैसे स्कूल छोड़ना, घर चलाना या परिवार का पालनपोषण करना. यही वजह है कि वे थिएटर में काम करने को मजबूर होती हैं. हालांकि स्टेज पर उन के नाच के बदले उन्हें पैसे मिलते हैं, लेकिन वह रकम उन की मेहनत, थकान और जोखिम के मुताबिक नहीं होती.

कभीकभी उन्हें सिर्फ खानेपीने, सफर और छोटेछोटे खर्चों के लिए ही भुगतान मिलता है. उन के लिए स्टेज एक ऐसा व्यवसाय है, जो आज जीविका दे सकता है, पर अच्छा भविष्य नहीं. थिएटर मालिकों का रवैया थिएटर मालिक आमतौर पर इन लड़कियों को एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में देखते हैं न कि इनसान के रूप में. स्टेज पर उन की चमक, थिरकन और आकर्षण ही उन की कीमत तय करती है. कुछ मालिक कलाकारों की सिक्योरिटी, भोजन और सेहत का ध्यान रखते हैं, पर ज्यादातर केवल कमाई और दर्शकों की तादाद पर फोकस करते हैं. लड़कियों के दर्द, सेहत और मानसिक हालात को नजरअंदाज किया जाता है. अगर कोई प्रदर्शन में नाकाम होती है या कमजोर पड़ती है, तो उसे धमकाया जाता है, काम से हटा दिया जाता है या अगले शो में जगह नहीं दी जाती है.

इज्जत की हिफाजत, सब से कमजोर कड़ी थिएटर की लड़कियों के लिए सब से बड़ा खतरा उन की इज्जत का होता है. स्टेज पर उन के शरीर को नजरों के सामने लाया जाता है और कई बार दर्शक की छेड़छाड़, गालीगलौज, वीडियो बनाना या स्टेज के पीछे दबाव डालना आम बात हो जाती है. सिक्योरिटी का उपाय तकरीबन नाममात्र होता है और लड़कियां अपनी हिफाजत के लिए अकेली रहती हैं. अकसर वे अपनी इज्जत के लिए चुप रहने को मजबूर होती हैं, क्योंकि विरोध करने पर नौकरी या आमदनी छिन सकती है.
समाज में नजरअंदाज होना समाज में इन लड़कियों की हालत बहुत बुरी है. लोग उन की जद्दोजेहद और मेहनत को नहीं देखते, बस उन्हें ‘नाचने वाली’ के रूप में देखते हैं.

यह पेशा उन्हें इज्जत देने के बजाय बदनाम कर देता है. उन के पास शादी, स्थायी संबंध या सामाजिक सुरक्षा के मौके भी अकसर सीमित हो जाते हैं. समाज उन की मजबूरी को नजरअंदाज करता है और

Hindi Story: नौजवान इंजीनियर और मौत का गड्ढा

Hindi Story: रविवार की सुबह थी. विजय घर पर अकेला था. उस के मातापिता किसी रिश्तेदार के घर गए हुए थे. आज विजय ने ठान लिया था कि घर के पीछे के आंगन में वह गड्ढा खोद कर ही दम लेगा. दरअसल, उसे एक पूरा का पूरा पेड़ शिफ्ट करना था. चूंकि पेड़ बड़ा था, तो उस ने अंदाजे से 8 फुट गहरा गड्ढा खोद डाला था.


आप सोच रहे होंगे कि पेड़ को कैसे शिफ्ट करते हैं? अमूमन तो पौधा ही लगाया जाता है, पर पूरा का पूरा पेड़ कैसे जड़ समेत मिट्टी में बोया जाता है? इस तकनीक में किसी पेड़ को उस की वर्तमान जगह से उठाने के लिए खास तरह के उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है या पेशेवरों को बुलाया जाता है. शाखाओं या जड़ों (रूट बौल) को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए पेड़ को सावधानी से संभालें. पेड़ को एक मजबूत गाड़ी पर रखें, यह पक्का करते हुए कि पेड़ पूरी यात्रा के दौरान हिलेडुले , उसे किसी तरह का नुकसान हो.


विजय यह एक्सपैरिमैंट कर रहा था. वह गड्ढा खोदने में इतना मशगूल था कि मिट्टी को गीला करने के लिए जो नल उस ने चलाया था, उस में लगा पाइप धीरेधीरे उस गड्ढे को भर रहा था. चूंकि विजय शारीरिक काम कर रहा था, तो उसे गरमी लग रही थी. धूप भी खिली थी. इसी बीच कब वहां अनामिका आई, उसे पता ही नहीं चला. विजय को मिट्टी में सना देख कर अनामिका को एक खुराफात सू?. उसे पता नहीं था कि गड्ढा कितना गहरा है. उसे लगा कि आज मड बाथ लिया जाए. वैसे भी घर पर कोई नहीं है.


अनामिका चुपके से विजय के पीछे गई उसे धक्का दे कर गड्ढे में धकेल दिया. अचानक हुए इस हमले से विजय हैरान रह गया. पर चूंकि अभी गड्ढा सिर्फ 5 फुट तक भरा था, तो उसे ज्यादा महसूस नहीं हुआ.
विजय ने अनामिका को देखा, तो हंस कर बोला, ‘‘इस गड्ढे में मैं अकेला क्या करूंगातुम भी जाओ.’’
अनामिका भी गड्ढे में कूद गई. वे दोनों अब वहां मस्ती करने लगे. अनामिका का मिट्टी से सराबोर बदन विजय को ललचा रहा था. उस ने अनामिका को बांहों में भर लिया और चूमने लगा.


अनामिका भी उस का साथ देने लगी. इसी बीच गड्ढे में पानी अभी भी भर रहा था. जब अनामिका की गरदन से पानी ऊपर हुआ, तो वह थोड़ा सतर्क हो गई और बोली, ‘‘चलो, अब हम बाहर निकलते हैं.’’
पर जैसे ही विजय ने उचक कर बाहर निकलने की कोशिश की, वह फिसल गया. इस के बाद उस ने कई बार कोशिश की, पर नाकाम रहा. अनामिका ने कहा, ‘‘लगता है, ऐसे बाहर नहीं निकला जाएगा. तुम मु? उठाओ. पहले मैं बाहर निकलती हूं.’’


विजय ने ऐसा ही किया. अनामिका तो बाहर चली गई, पर वह जैसे ही विजय को खींचने लगी, तो मिट्टी लगी होने की वजह से दोनों के हाथ बारबार फिसल रहे थे. इस बीच पानी और ज्यादा बढ़ गया था. अनामिका को चिंता हुई. विजय भी थोड़ा घबरा गया था. उस ने कहा, ‘‘दीवार की साइड पर एक सीढ़ी है, जल्दी लाओ.’’ अनामिका ने ऐसा ही किया. जल्दी से गड्ढे में सीढ़ी लगाई और बड़ी मुश्किल से विजय बाहर निकला. विजय की सांसें फूल रही थीं. वह बोला, ‘‘आज तो बालबाल बचे. अगर सीढ़ी होती तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाता.’’


फिर वे दोनों बाथरूम में गए और एकसाथ नहाए. विजय ने अनामिका को अपनी बहन के कपड़े दे दिए.
अनामिका अभी भी किसी गहरी सोच में थी. विजय ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’ ‘‘ग्रेटर नोएडा वाला कांड तो तुम ने सुना ही होगा?’’ अनामिका ने अपने बाल सुखाते हुए कहा. ‘‘यार, बस सरसरी तौर पर पढ़ा था. क्या हुआ था?’’ विजय ने पूछा. ‘‘27 साल के एक सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की 16 जनवरी, 2026 की आधी रात के बाद उस समय मौत हो गई थी, जब घने कोहरे में उस की कार फिसल कर एक नाले के पास बन रहे शौपिंग कौंप्लैक्स के लिए खोदे गए गड्ढे में गिर गई थी.


‘‘युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि उन का बेटामेरी मदद करोमेरी मदद करो…’ चीख रहा था. लोग वीडियो बना रहे थे, पर कोई उसे बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहा था. मैं ने उन्हें डांटा, फिर भी कोई कोशिश नहीं की गई. मेरे बेटे की मौत बेवजह हुई. ‘‘लोग राजकुमार मेहता का दर्द कभी नहीं सम? पाएंगे, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने बेटे युवराज को कार में डूबते हुए देखा. राजकुमार मेहता का कहना था कि हादसे वाली जगह पर 80 कर्मचारी मौजूद थे, पर कोई भी पानी में नहीं उतरा.’’


‘‘यह तो दर्दनाक मौत थी. प्रशासन और सरकार ने क्या किया?’’ विजय ने अफसोस जताते हुए पूछा.
‘‘पुलिस ने युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता की शिकायत पर 2 रियल एस्टेट डेवलपर्स एमजेड विजटाउन प्लानर्स और लोटस ग्रीन्स के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, जिस में उस ने लोकल अफसरों पर लापरवाही का आरोप लगाया और जवाबदेही की मांग की. विजटाउन प्लानर्स के बड़े अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया.’’


‘‘यह तो बहुत बड़ा सियासी मुद्दा भी बन गया. क्या विपक्ष ने सरकार को नहीं घेरा?’’ विजय ने पूछा.
‘‘बिलकुल घेरा. देखने पर यह एक साधारण सी मौत लगती है और सरकार इसे बिल्डरों की लापरवाही मान रही है या इसे भ्रष्टाचार के एंगल से खंगाल रही है, पर इस मामले पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं समाज में जड़ें फैलाती लालच की वह लत भी है, जो भारतीय शासन की जवाबदेही निगल गई है.


‘‘दूसरी ओर राजकुमार मेहता ने कहा कि वे मुख्यमंत्री योगी से एक बार मिलना चाहेंगे. इस से उन्हें मन की शांति मिलेगी. वैसे, सरकार की ओर से उन्हें भरोसा दिया गया है कि उन्हें सही दिशा में उचित सहयोग मिलेगा. ‘‘इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी योगी सरकार को घेरा. उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के लिए सीधेतौर पर सरकार जिम्मेदार है.


‘‘उन्होंने आगे कहा कि हादसे वाली जगह पर पहुंचने के बाद भी सरकार और उस के तमाम महकमे इंजीनियर युवराज को बचा नहीं पाए. पानी ठंडा होने की वजह से कोई उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया. अखिलेश यादव ने मीडिया को भी नसीहत दी कि मौत के बाद किसी की इमेज खराब करने वाले वीडियो चलाए जाएं. ‘‘ज्यादा दबाव पड़ने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी लोकेश एम. को उन के पद से हटा दिया. हादसे की जांच के लिए 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन किया गया. मेरठ जोन के एडीजी एसआईटी के अध्यक्ष बनाए गए.


‘‘इधर, पुलिस कमिश्नर (कानून व्यवस्था) डाक्टर राजीव नारायणी ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद है. सूचना मिलते ही दमकल टीम सभी उपकरणों के साथ मौके पर पहुंची और बचाव का काम शुरू किया गया. एसडीआरएफ की मदद से अंतिम बचाव अभियान चलाया गया. उस समय विजिबिलिटी जीरो थी, लेकिन युवराज को बचाया नहीं जा सका.’’ ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बिल्डरों के खिलाफ किन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘धारा 105 (अनजाने में हत्या), धारा 106 (1) (किसी व्यक्ति की लापरवाही या असावधानी के कारण हुई मृत्यु) और धारा 125 (मानव जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना) एफआईआर दर्ज की गई है,’’ अनामिका ने बताया. ‘‘यार, यह सुन कर तो मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. बड़ा ही दिल दहलाने वाला कांड है,’’ विजय बोला. ‘‘इस पूरे मामले को राजकुमार मेहता ने कुछ इस तरह बताया था… ‘शुक्रवार की आधी रात को 12 बज कर,


20 मिनट पर मेरे पास युवराज का फोन आया. वह घर आने ही वाला था, इसलिए सम? नहीं आया कि वह मु? क्यों फोन कर रहा है. ‘‘‘मैं ने फोन उठाया. दूसरी तरफ से एक डरी हुई आवाज सुनाई दी. उस ने कहा किपापापापामैं नाले में गिर गया हूं, मैं मरना नहीं चाहताप्लीज, मु? बचा लीजिए’.
‘‘‘यह सुन कर मैं उन्हीं कपड़ों में बाहर भागा. सोसाइटी से निकलने से पहले मैं ने एक मैसेज टाइप किया और उसे सोसाइटी के ग्रुप में पोस्ट कर दिया, ताकि मदद मिल सके.


‘‘‘मेरे बेटे ने जिस नाले का जिक्र किया था, वह हमारी सोसाइटी से 200 मीटर दूर था. मैं दौड़ कर उस नाले के पास गया. वहां, मैं घने कोहरे और अंधेरे में 30 मिनट तक अपने बेटे को ढूंढ़ता रहा, आवाज लगाने की कोशिश करता रहा, ताकि कोई जवाब मिले. फिर मु? लगा कि मैं गलत जगह ढूंढ़ रहा हूं.
‘‘‘रात के साढ़े 12 के आसपास वहां वीडियो बना रहे लोगों से मैं ने कहा कि प्लीज, मेरे बेटे को बचा लीजिए. इस के बाद मैं सड़क के किनारे पहुंचा, जहां एक इमारत का निर्माण अधूरा था.
यहां बेसमैंट के लिए एक गड्ढा खोदा गया था.


‘‘‘वहां पहुंच कर मैं चिल्लाने लगा. मेरी आवाज सुन कर मेरा बेटा भी चीख उठा… ‘बचाओबचाओमेरी मदद करो…’ की आवाज सुन कर मैं सम? गई कि मेरा बेटा यहां गिर गया है. ‘‘‘मैं थोड़ा आगे बढ़ा और कोहरे में से देखा कि कार पानी में थी और मेरा बेटा उस की छत पर लेटा हुआ था. वह सड़क से तकरीबन 50 से 60 फुट दूर था. वह धीरेधीरे डूब रहा था. किनारे पर खड़े लोगों को यह बताने के लिए कि वह जिंदा है, अपने मोबाइल फोन की लाइट बारबार जलाबु? रहा था.


‘‘‘मैं ने डायल 112 पर फोन किया. मैं उसे अपनी आंखों के सामने डूबते हुए देख रहा था. वहां और भी लोग थे, लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था. कुछ लोग वीडियो बना रहे थे, मैं ने उन से कहा कि प्लीज, वीडियो बनाना बंद करें, मेरे बेटे की मदद करें.’’’ इतना बता कर अनामिका चुप हो गई. थोड़ी देर के बाद विजय ने पूछा, ‘‘बचाव अभियान कब शुरू हुआ?’’ ‘‘खबरों के मुताबिक, रात के तकरीबन पौने 1 बजे पुलिस और फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी डायल 112 के साथ मौके पर पहुंची. तब तक घना कोहरा छा चुका था. सब से पहले, पुलिस और फायर ब्रिगेड ने रस्सी फेंक कर बचाव का काम शुरू किया.


‘‘पर वह रस्सी युवराज तक नहीं पहुंच रही थी. कुछ पुलिस अफसर कह रहे थे कि पानी बहुत ठंडा है और उस में उतरना मुश्किल है. कुछ का कहना था कि हादसे वाली जगह के नीचे लोहे की छड़ें हो सकती हैं.
‘‘इस के बाद क्रेन बुलाई गई, लेकिन क्रेन भी युवराज तक नहीं पहुंच पाई. वह सिर्फ 30-40 फुट तक ही जा पा रही थी. वहां मौजूद कोई भी आदमी पानी में उतरने की कोशिश नहीं कर रहा था. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि गड्ढा शायद 15 से 20 फुट गहरा था, इसलिए अगर गोताखोर वहां होते तो उन के बेटे की जान बच सकती थी.


‘‘एसडीआरएफ की टीम रात के तकरीबन सवा 1 बजे पहुंची. उन लोगों के पास भी पर्याप्त संसाधन नहीं थे. इसी बीच युवराज की कार पूरी तरह पानी में डूब गई. कार के ऊपर लेटे हुए युवराज भी पानी में समा गए. सब लोग बस यह सब देखते रह गए. ‘‘सर्चलाइट, क्रेन और सीढ़ी की मदद से टीम पानी में उतरी. 2 घंटे की मशक्कत के बाद युवराज की लाश तकरीबन सवा 4 बजे बरामद की गई. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने कहा कि इस घटनास्थल को ले कर पहले भी शिकायतें की गई थीं, पर सब लोग सोते रहे. उन्होंने अपने बेटे की मौत के लिए नोएडा प्रशासन को दोषी ठहराया.’’


‘‘वे बिलकुल ठीक कह रहे हैं. सरकारें घर उजाड़ने के लिए बुलडोजर तो चला रही हैं, पर इस तरह के मौत के गड्ढे भरने के लिए कुछ नहीं कर रही है. बिल्डरों पर गाज गिराने से कुछ नहीं होगा. कौन सा बिल्डर चाहेगा कि उस का प्रोजैक्ट समय पर पूरा हो. पर प्रशासन के नियमकानून इतने पेचीदा बना दिए जाते हैं कि लोग कानून के शिकंजे में फंस कर रह जाते हैं. ‘‘यह हादसा तो एक इंजीनियर के साथ हुआ है और इस कांड के वीडियो भी बन गए, तभी प्रशासन इतना जल्दी कार्रवाई करता दिख रहा है. दूरदराज के इलाकों में जाने कितने युवराज अपनी जिंदगी से खेल रहे हैं, किसे इस बात की चिंता है.’’


‘‘विजय, सवाल यह नहीं है कि कौन गुनाहगार है और उसे सजा मिलेगी या नहीं, पर मुद्दा यह भी है कि क्या एक जवान लड़के की ऐसी मौत देखने के बाद उस के पिता कभी सब्र का घूंट पी सकेंगे…’’ अनामिका बोली. ‘‘कभी नहीं. इस तरह की मौत देश की तरक्की की भी पोल खोलती है, क्योंकि तरक्की का मतलब यह नहीं है कि ऊंचीऊंची इमारतें बना देना, जबकि असली तरक्की का मतलब है लोगों के मन से असुरक्षा का भाव खत्म होना.


‘‘दिल्ली के इतना पास एक पढ़ालिखा नौजवान सिर्फ इसलिए मर गया कि वह रात के अंधेरे में पानी से लबालब ऐसे गड्ढे में जा गिरा, जो वहां होना ही नहीं चाहिए था. यह देश के रहनुमाओं पर एक तरह की लानत है कि वे अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में नाकाम हो रहे हैं,’’ विजय ने अपने दिल की भड़ास निकाली. अनामिका चुप थी. वह बाहर आंगन में खोदे गए गड्ढे को देख रही थी, जिस में अब भी गंदला पानी जमा था.  Hindi Story
   

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