Anjali Pawan Controversy: पवन सिंह को अंजलि से छेड़छाड़ मामले में राहत

Anjali Pawan Controversy: भोजपुरी स्टार पवन सिंह पर छेड़खानी का आरोप लगाने वाली हरियाणवी अभिनेत्री अंजली राघव हरियाणा महिला आयोग के सामने पेश हुईं. लेकिन पवन सिंह नदारत रहे. इस मामले की सुनवाई आयोग की अध्यक्ष रेनू भाटिया की अध्यक्षता में हुई. सुनवाई के दौरान अंजली राघव ने अपने पहले लगाए गए आरोपों को लेकर आयोग को बताया कि लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पवन सिंह ने उनके साथ अनुचित व्यवहार किया. जब विवाद बढ़ा तो पवन सिंह ने इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगी थी. इसके बाद उन्होंने पवन सिंह को माफ कर दिया है.

अंजली राघव ने आयोग के सामने कहा कि उनकी शिकायत पवन सिंह के खिलाफ नहीं है, बल्कि उनकी शिकायत उन 2‑3 लोगों को लेकर थी जिन्होंने उनके आपत्तिजनक वीडियो बनाए और उसे वायरल किया. वीडियो वायरल करने वाले लोगों ने उनकी निजी तस्वीरें और मोबाइल नंबर आपत्तिजनक वेबसाइट्स पर अपलोड कर उनकी छवि को जानबूझकर खराब करने की कोशिश की.

इस पूरे मामले में पवन सिंह को बड़ी राहत मिली है. हरियाणा राज्य महिला आयोग ने आधिकारिक रूप से पवन सिंह का नाम इस केस से हटा दिया है. आयोग की चेयरपर्सन रेनू भाटिया ने बताया कि पवन सिंह द्वारा माफी मांगे जाने और अंजली के स्वीकार किए जाने के बाद उनके खिलाफ चल रही कार्रवाई बंद कर दी गई है.

पवन सिंह को राहत देते हुए महिला आयोग की अध्यक्ष रेणु भाटिया ने कहा कि जो लोग सोशल मीडिया पर अंजली राघव के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रहे थे या वीडियो वायरल कर रहे थे, उनके नाम मामले में शामिल किए जाएं और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए. महिला आयोग ने इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को पंचकूला में तय की है. आयोग ने निर्देश दिए हैं कि जिन-जिन लोगों के नाम इस मामले में दर्ज किए गए हैं, उन्हें अगली सुनवाई में आयोग के सामने पेश होना होगा.

Social Story: एक क्लिक पर खत्म कमाई

Social Story: को कहता है, ‘‘बैंक खाता बंद हो जाएगा.’’
कोई कहता है, ‘‘लोन की वसूली होगी.’’
कोई कहता है, ‘‘पुलिस केस हो गया है.’’
कोई कहता है, ‘‘गिरफ्तार कर लेंगे.’’


और इस डर में अच्छेअच्छों की सम? काम नहीं करती. बदलती दुनिया में मोबाइल फोन अब केवल एक गैजेट नहीं रहा, बल्कि यह हमारी जेब में रखा एक पूरा बैंक, पहचानपत्र, दफ्तर, फोटो अलबम, पर्स और संचार का साधन बन चुका है, लेकिन इसी बदलाव ने अपराधियों के लिए भी एक नया दरवाजा खोल दिया है.


आज मोबाइल पर एक गलत क्लिक से आप अपनी पूरी जमापूंजी खो बैठते हैं. नौजवान, जो डिजिटल दुनिया को सब से ज्यादा सम?ाते हैं, वे भी अपराधियों की तकनीक देख कर भरम में पड़ जाते हैं और मिडिल क्लास लोग, जिन के लिए हर पाई की अहमियत बहुत ज्यादा होती है, उन के लिए डिजिटल ठगी सिर्फ माली नुकसान नहीं है, बल्कि यह इज्जत, आत्मविश्वास और मानसिक शांति की दुश्मन बन जाती है.
भारत में रोजाना हजारों लोग डिजिटल ठगी के शिकार होते हैं. हम अखबार में पढ़ते हैं :


महिला के खाते से 85,000 की ठगी. बुजुर्ग से केवाईसी अपडेट के नाम पर पैसा उड़ाया. फर्जी पुलिस अफसर बन कर नौजवान से 3 लाख की ठगी. ये खबरें तो हम पढ़ लेते हैं, पर इन में हमें पीडि़तों का दर्द नहीं दिखता. बिहार के सहरसा जिले की 40 साल की शशि देवी को सुबहसुबह मोबाइल फोन पर मैसेज आया कि आप का बैंक खाता केवाईसी अपडेट होने के चलते बंद किया जा रहा है. मैसेज के साथ एक लिंक भी था. शशि देवी ने उस लिंक पर क्लिक किया. मोबाइल पर एक परिचित जैसा फार्म खुलानाम, खाता संख्या, पता.


उन्हें लगा कि यह सामान्य प्रक्रिया है. उन्होंने फार्म भर दिया. इस के 2 घंटे बाद बैंक से फोन आया कि आप के खाते से 97,500 रुपए निकाले गए हैं. शशि देवी का पहला वाक्य था कि हम तो खाते में इतने पैसे होना भी नहीं जानते थे. इतना पैसा हम ने 10-10 रुपए बचा कर जमा किया था. डिजिटल दुनिया का
असली सच लोग तकनीक नहीं, डर से हारते हैं. हर डिजिटल अपराध में एक बात कौमन होती है कि अपराधी डर पैदा करता है. छपरा, बिहार के शिवनंदन प्रसाद, जो पूरी जिंदगी पोस्ट औफिस में लोगों के पैसे संभालते रहे, एक दिन खुद ठगी का शिकार हो गए. उन्हें फोन आया कि आप का पैंशन कार्ड ब्लौक हो गया है. वैरिफिकेशन कराइए, नहीं तो अगले महीने पैंशन नहीं आएगी.


शिवनंदन ने कहा कि बाबू, मैं बूढ़ा आदमी हूं, बताओ क्या करना है? उन्होंने ठग के कहने पर एक ऐप डाउनलोड किया और कुछ ही मिनट में उन के खाते से डेढ़ लाख से ज्यादा रुपए गायब हो गए.
शिवनंदन का दुखद वाक्य यह था कि मैं तो जिंदगीभर लोगों को सम?ाता रहा कि कागज सही रखो, अब मु? कौन सम?ाएगा कि डर क्या होता है? पहचान का गलत इस्तेमाल अपराधी अब सिर्फ पैसे नहीं, चेहरा और आवाज भी चुराते हैं. डिजिटल अपराध का सब से डरावना पक्ष है पहचान की चोरी. आज अपराधियों के हाथों में ऐसे उपकरण हैं, जिन से आप की फोटो एडिट की जा सकती है. आप की आवाज क्लोन की जा सकती है. आप की डीपफेक वीडियो बनाई जा सकती है. किसी भी पहचान को मिनटों में बदला जा सकता है. यह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मानसिक आतंक है.


पटना, बिहार में 22 साल की रीता को एक दिन व्हाट्सऐप पर फोन आया. लोन ऐप के गुंडे कह रहे थे कि आप ने लोन लिया है, वापस कीजिए. नहीं तो आप की अश्लील फोटो बना कर सब को भेज देंगे.
रीता सदमे में गई. उस ने कहा कि मैं ने कोई लोन नहीं लिया. लेकिन अपराधियों ने 10 मिनट में उस की फोटो को विकृत कर के आधे से ज्यादा दोस्तरिश्तेदारों को भेज दिया. रीता ने रोते हुए कहा कि पैसा तो नहीं गया, लेकिन मेरी इज्जत, मेरा आत्मविश्वास सब चला गया. औनलाइन कस्टमर केयर,
बड़ा धोखा लोग गूगल पर कस्टमर केयर नंबर खोजते हैं और सब से ऊपर दिखाई देता है फर्जी नंबर, जिसे अपराधियों ने विज्ञापन दे कर ऊपर चढ़ाया होता है. नवादा के एक टीचर राजेश कुमार एक छोटा सामान लौटाने के लिए फ्लिपकार्ट कस्टमर केयर खोजते हैं. पहले नंबर पर फोन किया. सामने से आवाज आई कि आप का रिफंड शुरू कर रहे हैं, स्क्रीन शेयरिंग औन कीजिए.


राजेश ने सोचा कि कस्टमर केयर वाला ही तो है. उन्होंने स्क्रीन शेयर किया और 2 लाख, 70,000 रुपए गायब. राजेश बोले कि गलती मेरी नहीं है. गूगल मु? सही नंबर क्यों नहीं दिखाता? ठग बन बैठे हैं नएजमींदारबक्सर के रामचरण को कोई बिजली महकमे का आदमी बन कर ठग काल करता है कि हम कनैक्शन काट देंगे, तुरंत अपडेट कराइए. फिर ठग एक ऐप डाउनलोड कराता है. रामचरण कहता है कि हम पढ़ेलिखे नहीं है. हमें क्या करना है? ठग कहता है कि बस उंगली स्क्रीन पर रखें और ऐसा करते ही 68,000 रुपए गायब.


रामचरण की पत्नी रोते हुए कहती है कि हमारे घर में तो कभी 68,000 रुपए एकसाथ नहीं रहे. जो भी था, उसी ठग ने ले लिया. फर्जी पुलिस, सब से बड़ा डर आजकल अपराधी खुद को पुलिस अफसर, साइबर सैल प्रमुख, एनआईए अफसर, सीबीआई अफसर, इनकम टैक्स अफसर, कोर्ट का क्लर्क बता कर फोन करते हैं. वे वरदी में वीडियो काल भी कर देते हैं. दिल्ली के करनदीप को वीडियो काल पर 2 आदमी वरदी में दिखे. उन्होंने कहा कि आप के नाम पर ड्रग्स वाला पार्सल पकड़ा गया है. तुरंत जुर्माना भरिए.
करनदीप डर के मारे कांपने लगा. उस ने 4 लाख रुपए भेज दिए. बाद में पता चला कि वह वीडियो डीपफेक थी.


लोग क्यों फंसते हैं अपराधी साधारण नहीं होते. उन के पास पूरी टीम होती है जैसे मनोविज्ञान सम?ाने वाले, स्क्रिप्ट लेखक, टैक्निकल एक्सपर्ट, काल सैंटर चलाने वाले, डाटा बेचने वाले. वे लोगों की कमजोरी जानते हैं. डर, लालच, शर्म, अनजान तकनीक, भरोसा जीतना, तेजी से बात करना, घबराहट पैदा करनाठग यही खेल खेलते हैं. सिस्टम है कमजोर साइबर ठगी के ज्यादातर मामलों को पुलिस वाले गंभीरता से लेते हैं, पर समस्या यह है कि अपराधी दूसरे राज्यों में होते हैं. फर्जी बैंक खाते, फर्जी सिम, वीपीएन लोकेशनऔर मिनटों में पैसा विदेश भेजना. केस करोड़ों में दर्ज, लेकिन रिकवरी 5 से 10 फीसदी.
एक साइबर अफसर ने कहा कि अपराधी हर महीने तकनीक बदल देता है. पुलिस के पास उतने संसाधन नहीं हैं.


अपराधियों का इकोनौमिक मौडल डिजिटल ठगी का खेल एक उद्योग की तरह चलता है. कमाई का तरीका. एक काल सैंटर, 15-20 मुलाजिम. रोज तकरीबन 1000 काल. 40-50 लोग फंसते हैं. रोजाना कमाई 10 लाख से 50 लाख. महीने में करोड़ों रुपए. पैसे नेपाल, बंगालदेश, दुबई, चीन तक भेजे जाते हैं.
राजस्थान की एक बुजुर्ग औरत 2 घंटे तक रोती रहीं. उन्हें किसी का बैंक मैनेजर बन कर फोन आया. ठग बोला कि आप का खाता ब्लौक हो गया, जल्दी करें. बुजुर्ग औरत ने 3 बार कहा कि बेटा, मैं बूढ़ी हूं. ठग बोलता गया और खाते से एक लाख से ज्यादा रुपए निकल गए.बुजुर्ग औरत ने रोते हुए कहा कि बेटा, हम को लगा तू ही बैंक वाला है.

हमारी आवाज सुन कर भी तू ने दया नहीं दिखाई? जनता को डिजिटल भाषा सिखानी होगी सुरक्षा सब से पहले जनता को ही सम?ानी होगी. ध्यान रखना होगा ओटीपी किसी को नहीं बताना होगा. बैंक कभी फोन नहीं करता. स्क्रीन शेयरिंग भूल कर भी करें. पुलिस वीडियो काल नहीं करती. डिजिटल अरैस्टिंग नहीं होता. केवाईसी लिंक के नाम पर 100 फीसदी धोखा. कस्टमर केयर नंबर गूगल से खोजें. अनजान ऐप डाउनलोड करें. बिजली, गैस, बैंक मैसेज नकली भी हो सकता है. कोई डरा रहा है, तो इस का मतलब साइबर अपराधी है. 1930 नंबर पर तुरंत शिकायत करें.


डिजिटल अपराध सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि एक सामाजिक समस्या भी है. डिजिटल ठगी ने भारत के हर घर को प्रभावित किया है. यह सिर्फ मोबाइल और ऐप की समस्या नहीं, यह भरोसे, सम?, डर, सिस्टम और समाज की समस्या है. हम अगर जागरूक नहीं हुए, तो आने वाले समय में डिजिटल ठगी किसी महामारी की तरह फैल जाएगी. अपराधी तकनीक से तेज हैं और हमें भी अपनी सम?ाबू? से तेज होना पड़ेगा.  Social Story

Social Problem: स्कैम का जन्म

Social Problem, लेखिका सावित्री रानी

हमारे इस मौडर्न और हाईटैक समाज की नई और जबरदस्त खोज या कहिए कि नई टैक्निकल बीमारी है डिजिटल स्कैम, जो धीरेधीरे समाज की नसों में अपनी जगह बना रही है. स्पैम काल कहो या अकाउंट हैकिंग या फिर साइबर क्राइम, सब इसी बीमारी के भाईबंधु हैं और आज के समाज का कोई भी शख्स इस नई खतरनाक समस्या से अनजान नहीं है.

स्कैमर आज के पढ़ेलिखे समाज का वह डाकू है, जो अपने अड्डे से निकलने की जहमत उठाए बगैर किसी को भी लूट सकता है और लुटने वाले के पास बचने का कोई रास्ता नहीं छोड़ता, क्योंकि वह पहला अटैक इनसान की सोचनेसमझने की ताकत पर ही करता है.

हमारे दिमागों से गोटी खेलते ये ‘स्कैम भाई साहब’ अपने का पुरजोर ऐलान करते हुए हर जगह अपनी हाजिरी दर्ज करा चुके हैं. आज हर किसी को, कभी न कभी, कहीं न कहीं, इन भाई साहब के दिमाग से उपजे कांड का नमूना पढ़ने, सुनने और देखने को मिल जाता है. यह एक ऐसी बीमारी है, जो आप के शरीर से पहले आप के बैंक अकाउंट पर अटैक करती है. खून आप के शरीर से तो नहीं बहता, लेकिन आप के पैसे पर की गई चोट किसी को भी खून के आंसू रुलाने के लिए काफी होती है.

हर बार जब हम किसी स्कैम के बारे में सुनते हैं, तो इन स्कैमर्स के दिमाग की दाद दिए बिना नहीं रह पाते. इनसानी फितरत को ये लोग कितना बखूबी सम?ाते हैं और कितनी सफाई से इस कला का इस्तेमाल अपनी जेबें भरने के लिए करते हैं, यह बात सचमुच काबिल ए तारीफ है.

फर्स्ट वर्ल्ड कहे जाने वाले बहुत ज्यादा विकसित देशों की अकेली अमीर औरतों को बड़ी सफाई से ये लोग चूना लगाते हैं. इन के इशारों पर हिप्नोटाइज सी डोलती ये अबलाएं, अपने सपनों के शहजादों को पाने की खुशी में पूरी तरह डूबी होती हैं. परफैक्ट मैन जैसी कोई चीज दुनिया में न सिर्फ उपलब्ध है, बल्कि अब उन्हें बस मिलने भी वाली है, इस निराली खुशी के सामने भला कुछ लाख डौलर क्या माने रखते हैं.

सभी इनसानी खूबियों को गूंथ कर बना, जो मानवपुत्र इन के ख्वाबों में बसाया जाता है, वह तो आंख खुलते ही गायब हो जाता है, लेकिन बैंक अकाउंट के बदले नंबर वही रहते हैं. यानी जब तक ये बेचारी नींद से जागें और हालात को समझें, तब तक तो उन के राजकुमार के साथ उन का बैंक अकाउंट भी उन से बेवफा हो चुका होता है.

हमारे अति बुद्धिमान टैक धुरंधरों के बड़े से बड़े प्रोडक्ट का तोड़ निकालने में ये लोग समय नहीं लगाते. इधर प्रोडक्ट आया, उधर उस का तोड़ निकला और इस से पहले कि हमारे टैक्निकल महापुरुष संभलें, सोचे और कुछ करें, ये महानुभाव लोगों को मोटा चूना लगा कर अपनी जेब सहला चुके होते हैं. फिर बस आप लकीर पीटते रहिए, सांप तो निकल गया.

साइबर स्कैम इस कद्र हमारे समाज का हिस्सा बनता जा रहा है कि किसी भी सिक्योरिटी के दायरे को इस से सिक्योर रख पाना दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है. आज की दुनिया को कोई और एक सूत्र में बांध सका हो या नहीं, लेकिन स्कैमर्स ने यह काम अपने तरीके से बखूबी किया है. उन की नजर में सब बराबर हैं.

विकसित देश हो या विकाशसील या फिर गरीब देश ही क्यों न हो, हमारे ये समानता के पुजारी सब को एक ही नजर से देखते हैं. इन्हें हर चलताफिरता इनसान एक बकरा और हर किसी की जेब अपनी सी ही लगती है. इस को कहते हैं दुनिया बराबर करना, जो हमारे बड़ेबड़े नेता तो बस कहते ही रह गए, लेकिन इन अकाउंट भक्तों ने कर दिखाया.

किसी ने इस समस्या का एक पक्ष देखा है तो किसी ने दूसरा. किसी के अकाउंट पर गाज गिरी है तो किसी के फोन को हैक कर के ही, उस के दोस्तों व रिश्तेदारों तक को चूना लगाया गया है. कोई अगर इस जाल में अभी नहीं फंसा तो इस का यह मतलब कतई नहीं है कि वह बहुत बुद्धिमान है. इस का सिर्फ एक ही मतलब है कि उस का नंबर अभी नहीं आया.

अब यह समस्या और भी भीषण है, यह तो सब को पता है, लेकिन समाधान के नाम पर सब चुप.

हमारे महान दार्शनिक हमेशा से कहते आए हैं कि हर समस्या अपने समाधान के साथ ही जन्म लेती है, बस उसे देखने वाली नजर और समझने वाला नजरिया चाहिए. तो ठीक है उसी नजरिए से देख लेते हैं. अब किसी भी दुश्मन को मिटाने के 2 ही तरीके हैं, या तो दुश्मन खत्म कर दो या दुश्मनी.

अब अगर दुश्मन कमजोर है, तब तो कोई समस्या ही नहीं है. कमजोर को मिटाने में तो हम वैसे भी माहिर हैं फिर चाहे वह गरीब मजदूर हो, किसान हो या फिर कोई पिछड़ा अल्पसंख्यक. रही बात ताकतवर की तो उस की ओर तो दोस्ती का हाथ ही बढ़ाया जा सकता है. इतिहास गवाह है कि पहाड़ से सिर टकराने
पर सिर ही फूटता है, पहाड़ का कुछ नहीं बिगड़ता.

अब देखिए, जब शराब और सिगरेट के पहाड़ से सिर टकरा टकरा कर समाज थक गया और बीमारी, गरीबी, पारिवारिक असुरक्षा, कोई भी डर चेन स्मोकर्स और शराबियों को उन की राह से न हिला सका, तो थकहार कर सरकार ने भी नशा और धूम्रपान निषेध के नाम पर हर सिगरेट की डब्बी और शराब
की बोतल पर लिखवा दिया कि ‘शराब और धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’ और अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ लिए.

अब इन नुकसानदायक चीजों से लाभदायक टैक्स बटोर कर, हमारे शराबी भाइयों को देश की अर्थव्यवस्था को संभालने का मजबूत खंभा ही बता दिया. हींग लगी न फिटकरी और रंग भी चोखा आ गया. देखी अपनी चतुराई, है न गजब का कमाल.

तो पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए क्या हमें स्कैम इंडस्ट्री को भी सिगरेट और शराब की तरह कानूनी कर देना चाहिए? क्या ‘यह’ दुश्मन भी पहाड़ बन चुका है, जिस से सिर ही फूटता है? क्या यह दुश्मन भी दुश्मन मिटाने वाले दायरे से निकल चुका है?

शायद हां, शायद न. अब न की हालत में तो कोई समस्या ही नहीं है, बस एक और कमजोर को कुचलना है. फिर यह तो दुश्मन भी है.

लेकिन, लेकिन… इस बड़े ‘लेकिन’ का क्या किया जाए जो मुंह बाए हमारी ओर बढ़ा चला आ रहा है? तो क्या एक बार फिर इस दुश्मन को नहीं, दुश्मनी को मिटाना होगा? क्या एक बार फिर इसे बैंक अकाउंट के स्वास्थ्य के लिए ‘हानिकारक, समाज और मानवता के लिए हानिकारक’, लिखवा कर इन स्कैमस को भी डब्बियों और बोतलों में भर कर बेचना होगा?

सोचो, सोच कर देखो कि अगर ऐसा हुआ तो किसकिस लैवल पर बदलाव किए जाएंगे और क्याक्या फायदेनुकसान, किसकिस को मिलने और झेलने होंगे. यह एक व्यंग्यकार की उड़ान है. आप भी सवारी का मजा लीजिए और मजे को साथ ले जाइए, सवारी नहीं.

इतिहास गवाह है कि जिस से जीता न जा सके उस दुश्मन से हाथ मिला लेना चाहिए. जो खिलाड़ी जितना मजबूत हो, उस का अपनी टीम में खेलना उतना ही जरूरी है.

इस ज्ञान के साए तले क्या हमें स्कैम इंडस्ट्री को भी कानूनी कर देना चाहिए, जैसे सिगरेट और शराब को किया गया था? अगर हां, तो फिर बहुत से बदलाव बेसिक ढांचे से ही शुरू करने होंगे.

स्कैम कोर्स स्कूल के सिलेबस में शामिल करने होंगे और हर सर्टिफिकेट पर लिखवाना होगा ‘स्कैम समाज के लिए हानिकारक हैं’. समाज की जिम्मेदारी से पल्लू झाड़ने का फुलप्रूफ तरीका. बाकी सवारी अपने समान की खुद जिम्मेदार है.

इस के अलावा डिगरी लैवल के कोर्स यूनिवर्सिटी में करवाए जाने होंगे. किस ने, कितने लोगों को, कितने का चूना लगाया है, यह सिलैक्शन का आधार होगा. ऐंट्रैंस ऐग्जाम किताबी कीड़ों के नहीं, असली खिलाडि़यों के अनुभवों पर आधारित होंगे. नकल की कोई गुंजाइश ही नहीं. असली शुद्ध क्रीम ही चुन कर आएगी.

यों भी हमारी डिगरियां आज नौजवानों को नौकरी दिलवाने में तो मददगार ही होती हैं, ऊपर से उन्हें हाथ से काम करने लायक भी नही छोड़तीं. फिर आजकल पोस्ट स्कूल नौलेज तो ह्वाट्सअप यूनिवर्सिटी मुफ्त में मुहैया कर ही रही है, तो उस के लिए भला स्कूलकालेज खोल कर क्यों टाइम और पैसा खोटी करने का रे बाबा. यह बाबू राव का स्टाइल है. कुछ करने का नहीं रे बाबा.

इधर बैंकों को भी चाहिए कि स्कैमर्स को महंगी मैंबरशिप औफर करें, जिस से हैकर्स को बैंक अकाउंट में बेरोकटोक ऐंट्री मिल सके और बैंकों को मोटी फीस.

वैसे भी आजकल बैंकों के महंगे कर्मचारी बैंकिंग का काम छोड़ कर, पौलिसी बेचने वाले दलाल ही तो बन कर रह गए हैं. क्या मजाल किसी टैक्निकल जाल में फंसे ग्राहक की खातिर जरा भी टस से मस हो जाएं, लेकिन एक बार इन की पौलिसी खरीद लो, दामाद की तरह आप की खातिरदारी करेंगे. तो बस स्कैमर्स की मोटी फीस इन की टपकती लार को भी दोबाला (दोगुना) कर देगी.

इस के साथ ही स्कैमर्स का इनकम टैक्स भी बाकी लोगों के मुकाबले ज्यादा होना चाहिए. इस से सरकारी खेतों को भी पानी मिलता रहेगा. इस के लिए सरकार को ज्यादा कुछ करना भी नहीं होगा, बस कभीकभार स्कैमर्स की भलाई के लिए एकाध अमैंडमैंट करना होगा. इतने से ही सरकार की कमाई का चांद रातोंरात पूर्णिमा को प्राप्त हो जाएगा.

देश के नौजवानों को रोजगार मुहैया न करवाने की जो तोहमत सरकार पर बरसों से लगती आई है, उस का समाधान भी इसी खेत के एक कोने में आसानी से उगाया जा सकता है.

इस मुहिम में लोकल यूथ को शामिल कर के, बेरोजगारी के कलंक से भी छुटकारा मिल सकता है.
लोकल यूथ को फटाफट छोटेमोटे क्रैश कोर्स करवा कर ग्रास रूट लैवल पर खड़ा किया जा सकता है. हजारों गरीबों को रातोंरात काम मिल जाएगा और सरकार को वोटों का आशीर्वाद.

यों भी साइबर क्राइम वाले, जामताड़ा और दूसरे पिछड़े इलाकों से औपरेट कर के, पहले से ही आदिवासियों और पिछड़े इलाकों में अपनी सेवाएं शुरू कर ही चुके हैं. अब किसी को तो पिछड़े इलाकों के विकास के बारे में भी सोचना होगा न. महानगरों के विकास के चूल्हे पर कब तक रोटी पकाइएगा. इधर नूह को अपना हैडक्वार्टर बनाने वाले भी अल्पसंख्यकों के ही हमदर्द लगते हैं.

यह एक व्यंग्यकार की खयाली थाली है. इसे दिल पर न लें. अगर इसे पचा न सकें, तो अगली गोली का इंतजार करें. Social Problem

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