अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पद पाने के 100 दिनों में दुनियाभर की अमीर कंपनियों की नकेल कसने में सफलता पाने का पहला कदम उठा लिया. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जरमनी, कनाडा, इटली, जापान और यूरोपीय यूनियन ने तय किया है कि बड़ी कंपनियां अपना पैसा टैक्स हैवनों में ले जा कर छिपा नहीं पाएंगी. टैक्स हैवन माने जाने वाले वे देश हैं जो बहुत कम टैक्स चार्ज करते हैं. बहुत से देशों में काम करने वाली कंपनियां अपने हैडऔफिस इन देशों में खोल रही हैं ताकि दुनियाभर में कमाए पैसों पर वे नाममात्र का टैक्स दे कर सुरक्षित रख सकें.

अब फैसला हुआ है कि अगर किसी कंपनी का कारोबार तो एक देश में है पर टैक्स कम टैक्स चार्ज करने वाले देश में दिया जा रहा है तो वह देश अतिरिक्त कर लगाएगा. अब यह देखना है कि जहां मुनाफा कमाया जा रहा है वह इस बात का ऐसेस कैसे करता है. इस का मतलब है कि बड़ी कंपनियों को अपने लेखाजोखों में बड़ा परिवर्तन करना पड़ेगा.

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दूसरे शब्दों में इस का मतलब यह है कि विश्वभर में फैली और विश्वभर में कमा रही कंपनियां खतरे में हैं. इन में टैक और फार्मा कंपनियां ज्यादा हैं और इन्हीं में युवाओं को मोटी सैलरी मिलती है. दुनियाभर का टैलेंट असल में इन कंपनियों में जमा हो रहा है और ये टैलेंट जहां नएनए टैक उत्पाद बना रहे हैंवहीं सरकारों की नाक के नीचे अमीरगरीब की खाई को चौड़ा कर रहे हैं. ये युवा ही ऐसे प्रोग्राम बनाते हैं जिन के बलबूते पर कंपनियां अपने राज को राज रख पाती हैं. इन युवाओं के कारण कंपनियों के राज तो गुप्त हैं पर किसी सरकार का कोई राज छिपा नहीं है.

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ऐसी बहुत फिल्में बन चुकी हैं जिन में ये तेजतर्रार युवा ऐसे देश में बैठ कर काम कर रहे हैं जहां बड़े देशों के फौलादी हाथ नहीं पहुंच रहे पर टैक्नोलौजी के बल पर वे सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर रहे हैं. हर देश की सरकार इन युवाओं को अपने यहां बनाए रखना चाहती है पर बिना टैक्स दिए चल रही कंपनियां कई गुना अच्छा पैसा दे रही हैं. ये कंपनियां ऐसी माफिया हैं जो बिना बंदूकों के सरकारों का तख्ता पलट सकती हैं.

टैक्स हैवनों को भेदने का कदम अमीरगरीब के भेद की लड़ाई नहीं हैअभी तो यह बड़ी सरकारों की अपनी डिफैंस की लड़ाई है जो वे पैसे के बहाने से लड़ रही हैं.

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