Short Story. जून की चिलचिलाती गरमी में यों तो हर कोई घर के अंदर बैठ कर आराम करना पसंद करता है, मगर भुवन चंद को सेठजी से मिलने जाना था. फैक्टरी में मजदूर यूनियन का सचिव होने के नाते उसे मजदूरों की तनख्वाह बढ़ाने के बारे में सेठजी से बातचीत करनी थी.

सुबहसवेरे ही भुवन चंद अपने साथी और यूनियन के अध्यक्ष राधे लाल के घर पहुंच गया था. फिर दिन चढ़ने से पहले ही वे दोनों सेठजी के बंगले की ओर चल पड़े.

सेठजी घर में ही थे. कोठी के एक बड़े से कमरे में बैठ कर उन दोनों को गरमी से काफी राहत मिल गई. वे तरोताजा हो कर सेठजी के साथ तनख्वाह की बात पर समझौता करने में जुट गए.

‘‘अरे, आज तुम दोनों एकसाथ… सब ठीक तो है न?’’ सेठजी ने घबराहट भरी मुसकराहट के साथ पूछा.

‘‘ठीक कहां है सेठजी. महंगाई के इस जमाने में बच्चों को पालना बड़ा मुश्किल हो रहा है,’’ भुवन चंद सीधा मतलब की बात पर आ गया था.

‘‘हां सेठजी, फैक्टरी के लिए मेहनत करने वाले मजदूरों का परिवार अगर ठीक ढंग से रोटी भी न खा सके, तो आप को भी अच्छा कैसे लग सकता है?’’ राधे लाल ने भी तुरंत बात को आगे बढ़ा दिया.

‘‘तुम कहना क्या चाहते हो भाई?’’ सेठजी बात समझ तो गए थे, मगर फिर भी उन्होंने पूछ लिया.

‘‘हम किसलिए आए हैं, यह तो आप जानते ही हैं. पिछले साल भी हम आप के पास आए थे, तो आप ने मजदूरों की परेशानियों को समझ लिया था और उन की दैनिक मजदूरी को 60 रुपए से बढ़ा कर 75 रुपए कर दिया था,’’ भुवन चंद बोला.

‘‘जी हां सेठजी, मगर इस एक साल में महंगाई तो आग से निकलते धुएं की तरह ऊपर और ऊपर ही उठती चली गई है. 75 रुपए में मजदूर तो क्या धोए और क्या निचोड़े? एक दिन का कम से कम खर्च भी 150 रुपए से कम नहीं पड़ता. इस सिलसिले में एक बार फिर से आप की मेहरबानी हो जाए, तो सब ठीक हो जाएगा.’’

राधे लाल की बात पर सेठजी गंभीर हो गए और काफी देर तक कुछ सोचते रहे.

‘‘देखो भाई, फिलहाल तो मजदूरी में बढ़ोतरी करना मेरे लिए मुमकिन नहीं है. फैक्टरी अच्छी हालत में नहीं चल रही है,’’ सेठजी ने मजबूरी जताई.

‘‘फैक्टरी तो ठीक ही चल रही है सेठजी. बेलैंसशीट तो हम ने भी देखी है. फायदा भी ठीकठाक सा ही हो रहा है. मजदूरी बढ़ाना कोई मुश्किल काम नहीं है,’’ भुवन चंद ने कहा.

‘‘वैसे भी मजदूरों को तो आप को अपनी औलाद की तरह समझना चाहिए. उन का पेट खाली रहेगा, तो आप की तिजोरी कैसे भर पाएगी?’’ राधे लाल ने अपनी बात रखी.

भुवन चंद और राधे लाल दोनों ही सेठजी को समझाने की कोशिश करने लगे, मगर वे उन्हें टालते रहे.

‘‘75 रुपए भी कुछ कम नहीं होते भैया. मेरे खयाल से तो मैं पिछले साल से ही जरूरत से ज्यादा भुगतान करता आ रहा हूं. आज भी अगर नई भरती करने पर उतर आऊं, तो 50-50 रुपयों में सैकड़ों मजदूर मिल सकते हैं,’’ आखिर में सेठजी एक तरह की धमकी पर उतर आए, तो राधे लाल को भी गुस्सा आ गया.

‘‘तो फिर कर लीजिए नई भरती, मजदूरों ने तो हड़ताल पर जाने का फैसला ले लिया है,’’ राधे लाल ने भी मजदूरों वाली खास धमकी दे दी थी और सेठजी एक बार फिर सोच में पड़ गए थे.

हड़ताल की धमकी से वे कुछकुछ डरेडरे से दिखाई देने लगे थे. काफी बहस करने के बाद वह मुश्किल से 10 रुपए बढ़ाने को तैयार हो गए.

मगर राधे लाल और भुवन चंद सेठजी का काइयां स्वभाव जानते थे, इसलिए उन्हें तरहतरह से समझाते हुए अपनी 150 रुपए की मांग पर ही अड़े हुए थे.

सेठजी धीरेधीरे खिसक कर सौ रुपए पर पहुंच गए थे. दोपहर होतेहोते राधे लाल और भुवन चंद को भी 110 रुपए तक नीचे उतर जाना पड़ गया. सेठजी को भी हार कर 110 रुपए के लिए तैयार होना ही पड़ा.

तनख्वाह का समझौता होने के बाद राधे लाल और भुवन चंद कोठी से बाहर निकल आए. तब तक सूरज आसमान में ऊपर पहुंच चुका था. तेज गरमी के चलते धरती आग उगल रही थी.

कुछ ही आगे चलने पर वे दोनों पसीने से तरबतर हो गए, एक कदम भी आगे चलना मुश्किल हो रहा था.

‘‘बड़ी गरमी है. ऐसे तो घर पहुंचतेपहुंचते बिलकुल ही झुलस जाएंगे,’’ राधे लाल चेहरे का पसीना पोंछते हुए बोला.

तभी उन की नजर सड़क के किनारे पेड़ के नीचे खड़े एक रिकशे वाले पर पड़ी और उन्होंने आवाज दे कर उसे अपने पास बुला लिया.

रिकशे वाले को चलने का हुक्म दे कर वे दोनों उस पर सवार हो गए. चलने पर हलकी सी हवा उन के चेहरों से टकराई, तो कुछ राहत मिली.

भुवन चंद और राधे लाल फिर से सेठ के बारे में बातें करने लगे.

‘‘अगर सेठ न मानता, तो आज मैं उस को छोड़ने वाला नहीं था. फिर भी कमबख्त ने हमें 110 रुपए में ही टरका दिया है,’’ राधे लाल बोला.

‘‘ये सेठ लोग सब एक जैसे ही होते हैं, गरीब का पेट किसी को भी दिखाई नहीं देता. रातदिन मेहनत करवाते रहो और अपनी तिजोरी भरते रहो, यही आता है इन को.’’

बातों ही बातों में वे पूरे अमीर तबके को ही कोसने लगे. उन की बातों का सिलसिला तभी जा कर खत्म हुआ, जब एक जगह पर रिकशा रुक गया.

‘‘लीजिए साहब, आप की मंजिल आ गई है,’’ रिकशे वाले ने हांफते हुए कहा और एक ओर खड़ा हो कर बदन से टपटप गिरते पसीने को अंगोछे से पोंछने लगा. पसीने के चलते उस के सारे कपड़े पहले ही तर हो गए थे.

‘‘कितना पैसा दें भाई?’’ भुवन चंद ने पूछा. ‘‘बाबूजी, 10 रुपए तो दे ही दीजिए,’’ रिकशे वाले ने कहा.

‘‘क्या… 10 रुपए… तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है, या फिर हमें नया आदमी समझ रहे हो?’’ राधे लाल थोड़ा गुस्से से बोला.

‘‘हां भाई, हम लोग तो रोज के आनेजाने वाले हैं. पिछले 3 सालों में 4 रुपए से ज्यादा हम से किसी ने भी नहीं लिए,’’ भुवन चंद ने कहा.

‘‘क्या कहते हैं बाबूजी, 3 साल पहले की बात होती, तो हम भी 4 रुपए ही लेते, मगर इन 3 सालों में महंगाई कहां से कहां पहुंच गई है. आप तो जानते ही हैं, इतना पसीना बहाया है उस का मेहनताना 10 रुपए तो बनता ही है,’’ रिकशे वाला फिर से पुरानी बात को दोहराने लगा.

‘‘अरे, कोई लूट मची है क्या, जो तुम चाहोगे, वही मिल जाएगा? कायदे से 4 रुपए बनते हैं. गरमी के चलते 5 रुपए ले लो. इस से आगे बात करोगे, तो एक पैसा भी नहीं मिलेगा, समझे…’’

राधे लाल ने रिकशे वाले की ओर 5 रुपए का एक मुड़ातुड़ा नोट फेंक दिया और फिर दोनों आगे बढ़ गए.

रिकशे वाला ‘बाबूजी… बाबूजी’ करता रह गया. भुवन चंद और राधे लाल आगे बढ़ते हुए फिर से अपने सेठ के बारे में बातें करने लगे.

‘‘न जाने हमारे देश में वह समय कब आएगा, जब ये पैसे वाले लोग गरीब मजदूरों को भी इनसान समझना शुरू करेंगे. काइयां सेठ, 150 रुपए की जगह केवल 110 रुपए पर माना है,’’ भुवन चंद सेठ को कोसने लगा था और राधे लाल उस की ‘हां’ में ‘हां’ मिला रहा था. Short Story

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...