Shameful-
मामला 1
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के बेगूं थाना क्षेत्र में एक सरकारी स्कूल के टीचर शंभूलाल धाकड़ पर नाबालिग छात्रछात्राओं, जो दलित और आदिवासी समुदाय के हैं, 23 बच्चों के यौन शोषण का आरोप है. पुलिस का दावा है कि पूछताछ में आरोपी ने जुर्म कुबूल कर लिया है.
बेंगू थाना इंचार्ज शिवपाल ने बताया कि इस मामले से जुड़े कुछ वीडियो भी सामने आए हैं. इन में आरोपी टीचर को बच्चों का यौन शोषण करते और उन से ही उस का वीडियो बनवाते हुए देखा जा सकता है.
मामला 2
तथाकथित बाबाओं द्वारा दुष्कर्म की वारदात करने का सिलसिला भी थमने का नाम नहीं ले रहा है. जयपुर के सांगानेर थाना इलाके में एक बाबा पर एक 24 साला टीचर से दुष्कर्म करने का मामला दर्ज किया गया है. पुलिस ने आरोपी बाबा हरिनारायण और 2 महिलाओं समेत 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है.
पुलिस को दी गई शिकायत में पीडि़ता ने बताया कि उस की जानकार एक टीचर ने उसे सांगानेर में बने एक आश्रम में एक बाबा के बारे में बताया. आरोपी टीचर ने उस से बाबा की तथाकथित शक्ति व चिकित्सा के जरीए शरीर और आत्मा को मिलने वाले फायदे के बारे में बताते हुए झांसे में लिया. उस ने पीडि़ता से कहा कि उस ने खुद बाबा से उपचार करवाया था जिस से उसे काफी फायदा मिला और उस की परेशानी ठीक हो गई.
पीडि़ता का भरोसा जीतने के बाद वह टीचर पीडि़ता को आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए आश्रम ले गई. उस ने पीडि़ता से सिर्फ फल खा कर चलने को कहा. उस का कहना था कि फलों से चिकित्सा के पहले उस के शरीर से गंदगी निकल जाएगी.
दूसरे दिन वे दोनों स्कूल खत्म होने के बाद शाम को आश्रम पहुंचीं. वहां उन्हें एक महिला मिली जिस ने खुद को बाबा की सैक्रेटरी के रूप में परिचित कराया.
बाबा के आश्रम पहुंचने पर महिला सैक्रेटरी ने पीडि़ता को कई घंटे बातों में उलझाए रखा. इस लंबे प्रोसैस और सुबह से सिर्फ फल खाने के कारण उसे भूख और थकान लगने लगी. उस ने घर जाने की इच्छा जताते हुए महिला सैक्रेटरी से किसी और दिन बाबा से मिलाने को कहा, लेकिन दोनों ने उसे उपचार पूरा कराने की बात कहते हुए रात में आश्रम में ही रोक लिया.
रात के तकरीबन साढ़े 8 बजे महिला सैक्रेटरी ने पीडि़ता पर तथाकथित क्रिया शुरू की. पीडि़ता का आरोप है कि वहां उसे नहला कर ऐसा खाना खिलाया गया जिस में कुछ नशीली चीज मिली हुई थी.
इस के बाद बाबा ने उस के साथ दुष्कर्म किया.
मामला 3
राजस्थान में ही झुंझनूं जिले की बुहाना तहसील के एक सरकारी स्कूल के हैडमास्टर पर 7वीं क्लास की नाबालिग छात्रा से स्कूल में रेप का आरोप है.
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने हैडमास्टर को उन के घर अलवर से गिरफ्तार कर लिया है. साथ ही पुलिस ने उन 2 और महिला टीचरों को भी गिरफ्तार किया है जिन पर छात्रा को धमकाने और उस के मोबाइल से हैडमास्टर की चैट को डिलीट करने का आरोप है.
पिछले दिनों राजस्थान के श्रीगंगानगर की उस 13 साल की बच्ची की चीखें किसी मंदिर, मसजिद या गुरुद्वारे की दरोदीवार तक नहीं पहुंचीं, क्योंकि हमारा पूरा समाज ही बहरा और अंधा हो चुका है.
5 दिन, 120 घंटे और 32 दरिंदे. यह संख्या केवल अपराधियों की नहीं है, यह इस मुल्क की सामूहिक चेतना की नपुंसकता का गणित है. यह उस सड़ते हुए समाज का एक्सरे है, जिसे हम बड़ी शान से ‘सभ्य’ कहते हैं.
इस तरह के कांड के पीछे सिर्फ हवस नहीं है, इस के पीछे एक गहरी, मवाद से भरी सोच है.
एक ऐसी सोच जो हर बलात्कारी के दिमाग में कीड़े की तरह कुलबुलाती है कि ‘पुलिस को मैनेज कर लेंगे, नेताओं की सरपरस्ती तो है ही, और अदालत? अदालत सजा थोड़ी देती है, वह तो तारीख देती है. मामला लंबा खिंचेगा, गवाह टूटेंगे, और एक दिन हम आजाद घूम रहे होंगे. औरतें तो होती ही भोग की चीजें हैं.’
राजनीतिक सरपरस्ती
यह देश तथाकथित शरीफ ऋषिमुनियों बाबाओं का ही नहीं, बल्कि दलालों, बलात्कारियों, नैतिक भ्रष्ट पाखंडियों, मूकदर्शकों और तमाशबीनों का अड्डा है. थानों की टेबल के नीचे से जब गांधीजी की तसवीरें सरकती हैं, तो खाकी का ईमान चंद मिनटों में नीलाम हो जाता है.
पुलिस को ‘मैनेज’ करने का यह भरोसा अपराधियों को आसमान से नहीं मिलता. यह उन्हें सत्ता के गलियारों में बैठे उन सफेदपोश आकाओं से मिलता है, जिन के लिए हर अपराधी एक संभावित ‘वोट बैंक’ या ‘फंडिंग का जरीया’ है.
जब रक्षक ही भक्षक को बचाने की कीमत लगाने लगें, तो थानों और कोठों, बाबाओं के आश्रमों व होटलों के कमरों में कोई फर्क नहीं रह जाता. दोनों जगह सिर्फ सौदेबाजी होती है. एक तरफ जिस्म की, दूसरी तरफ जमीर की.
जोर पकड़ने वाले कुछ मामलों में यह कथित बुलडोजर की कार्रवाई तो सिर्फ जनता के गुस्से को शांत करने का एक तात्कालिक राजनीतिक झुनझुना है. असली बुलडोजर तो उस गंदी सोच व राजनीतिक सरपरस्ती पर चलना चाहिए जो अपराधियों को बचाने के लिए कानून के हाथ बांध देते हैं.
ऐतिहासिक पाखंड
आज इस बदइंतजामी को देख कर लगता है कि हमारी सभ्यता भीतर से सड़ चुकी है. लोग इस तरह की दरिंदगी पर हैरान तो होते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि हमारी बुनियादी सोच ही हमेशा से महिलाओं के खिलाफ रही है.
जिस समाज ने सदियों तक ‘देवदासी प्रथा’ जैसी घिनौनी रवायत को धर्म का चोगा पहना कर पालापोसा, जहां भगवान के नाम पर मासूम बच्चियों का संस्थागत शोषण किया गया, उस समाज की सोच में आज क्या ही बदलाव आएगा?
जिस समाज ने ‘सती प्रथा’ के नाम पर जिंदा, रोतीबिलखती देवियों को धधकती चिताओं में झांक दिया और उस क्रूरता को ‘उत्सव’ की तरह मनाया, वह समाज आज मासूम बच्चियों के दर्द को क्या समझेगा?
हम एक ऐसे पाखंडी समाज का हिस्सा हैं जो पत्थरों की मूर्तियों को साड़ी पहनाता है, उस के आगे नाक रगड़ता है और जिंदा महिला को केवल मांस का एक टुकड़ा समझता है. सती और देवदासी प्रथा की कोख से पैदा हुई यह बीमार सोच ही आज नए रूप में हमारे सामने खड़ी है.
क्या माल है…
बलात्कारी दरिंदे अचानक आसमान से नहीं टपकते हैं. यह हमारी उस रोजमर्रा की ‘सड़कछाप’ संस्कृति का अंतिम और सब से बीभत्स पड़ाव है, जिसे हम ने चुप रह कर स्वीकार कर लिया है.
स्कूल के बाहर खड़े मनचले से ले कर, कालेज के गेट, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और यहां तक कि आलीशान एयरपोर्ट के लाउंज तक लड़कियों को देख कर ‘क्या माल है…’ कह कर फब्तियां कसने वाले बिना रीढ़ के मर्दों से यह समाज अटा पड़ा है.
जब कोई राह चलती लड़की को ‘माल’ कहता है, तब समाज हंस कर आगे बढ़ जाता है. यही ‘कैजुअल सैक्सिज्म’ और हमारी सामाजिक चुप्पी अपराधियों का हौसला बढ़ाती है. आज जो शब्दों से बलात्कार कर रहे हैं, कल उन्हें मौका मिलते ही वे श्रीगंगानगर जैसी दरिंदगी को अंजाम देते हैं.
तारीख का तमाशा
आज का इंसाफ क्या है? न्यायपालिका की चौखट पर इंसाफ एक ऐसा कफन बन चुका है जिसे पाने के लिए पीडि़त को अपनी पूरी जिंदगी की आहुति देनी पड़ती है. ‘तारीख पर तारीख’ का यह खूनी खेल अपराधियों के लिए ढाल और पीडि़ता के लिए दूसरा बलात्कार है.
अदालतें सुबूत मांगती हैं, गवाह मांगती हैं, मर्यादाएं मांगती हैं, लेकिन क्या कोई उस अदालत से पूछेगा कि जब उस मासूम की आत्मा को 32 बार कुचला जा रहा था, तब तुम्हारी न्याय की देवी किस नींद में सोई थी? मामला लंबा चलेगा, फाइलें धूल खाएंगी, गवाहों को डरायाधमकाया जाएगा, और आखिर में इंसाफ का नाटक किसी तकनीकी खामी की भेंट चढ़ जाएगा.
अपराधी जानते हैं कि समय हर घाव को भर देता है, और इस देश की जनता की याददाश्त तो वैसे भी पानी के बुलबुले जैसी है.
हम मानसिक बर्बर व नैतिक रूप से मुर्दा समाज हैं. इस हैवानियत को देख कर हमारी रगों का खून नहीं खौलता. हम ‘तारीख पर तारीख’ के इस खूनी सर्कस और सफेदपोश नेताओं की नौटंकी को केवल एक ‘न्यूज हैडलाइन’ की तरह पढ़ कर भूल जाने के आदी हैं. हम सब इस सामूहिक बलात्कार के सहआरोपी हैं. हमारी चुप्पी अपराधियों की सब से बड़ी राजनीतिक सरपरस्ती है.
सोए हुए समाज में चेतना नहीं, सिर्फ चीखें पैदा होती हैं. याद रखिएगा, आज और कहीं तो कल यह आदमखोर तंत्र आप के घर के दरवाजे पर भी दस्तक देगा. अगली बार जब आप अपने घर की किसी बेटी को चौखट के बाहर भेजें, तो ईश्वर से प्रार्थना मत कीजिएगा. क्योंकि पत्थरों की मूर्तियों को पूजने वाले इस ‘सड़कछाप मजनू’ समाज में, थानों की दलाली और अदालतों की तारीखों के बीच आप की दुआएं भी ‘मैनेज’ कर ली जाएंगी. Shameful




