Editorial. आमतौर पर कोई जना नेता तभी बन पाता है जब वह अपने पीछे चल रहे लोगों का भला सोचता हो, कुछ ऐसा करता हो जो पीछे चलने वाले अकेले नहीं कर सकते और उन्हें एक समूह, एक भीड़ की जरूरत हो और उस भीड़ को सही रास्ता दिखाने वाले की. इतिहास में ऐसे लोगों की कमी नहीं रही है जिन्होंने भीड़ को पहले बड़ेबड़े वादों से ऊंचाइयों पर ले जाने का भरोसा दिया पर रास्ते में किसी खाई में फेंक दिया.

अछूतों, एकदम गंदा काम करने वालों, हिंदू वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोगों को, जिन्हें संविधान में एससी कहा गया है और आमतौर पर अछूत कहा जाता है, को कांशीराम ने 1970 के आसपास एक मंच पर खड़ा करने की कोशिश की थी. भीमराव अंबेडकर ने पहले इन के हितों की बात की थी पर वे पूरी कांग्रेस को उन की अगुआई करने को तैयार नहीं कर सके.

नेता बिना हजारों सालों से लूटे जाने, पैरों वालों से कुचले जाने और सताए जाने वाले वे लोग जानवरों सा जीवन जी कर भी सेवा करने में लगे रहे क्योंकि उन्हें बहका दिया था कि यह सब उन के पिछले जन्मों का फल हैं. न अंबेडकर, न गांधी, न कांशीराम उन्हें इस सोच से निकाल कर बराबरी की जगह पर खड़ा कर पाए.

उम्मीद थी कि मायावती, जो कांशीराम का दायां हाथ बन गई थीं, कुछ कर पाएंगी पर वे सत्ता सुख की चाशनी चख कर अपने पीछे चल रहे लोगों को भूल गईं. पिछड़ी भीड़ के आगे कोई और उभरा नहीं तो बेबस हो कर वह मायावती के पीछे चलती रही जबकि मायावती उन्हीं लोगों की गोद में जा बैठीं जिन्होंने वर्णव्यवस्था, पिछले जन्म की मूर्खता वाली ?ाठी कहानियां गढ़ी थीं. आज भी इन दलितों का कोई नेता नहीं जबकि इन में से सैकड़ों पढ़लिख कर ऊंची पोस्टों पर आ गए हैं. जिस ने भी कुछ खराखरा कहने की कोशिश की, उसे मायावती की तरह गाड़ीबंगला दे कर खरीद लिया गया.

देश की 25-30 करोड़ आबादी जन्म से मरने तक जानवरों की तरह जीती रहे, यह विज्ञान और तकनीक के युग में धब्बा है. मायावती भी जिम्मेदार हैं और पीछे की भीड़ भी. यह भीड़ उसी तरह की मूर्ख है जैसे 1930 से 1945 तक जरमनों की भीड़ हिटलर के पीछे चली. उसी तरह की भीड़ है जैसी चीनियों की माओ के पीछे चली. जैसी आज उत्तर कोरिया के किम जोंग उन के पीछे चल रही है.

दलित किसी भी तरह से किसी भी ब्राह्मण से कम नहीं हैं. न अक्ल में, न बल में, न मेहनत में. उलटे वे ब्राह्मणों से ज्यादा तेज हैं पर बस सही नेता और सही रास्ते से भटक रहे हैं. मायावती उन्हें एक गंदी खाई के बाद दूसरी गंदी गहरी खाई में धकेल रही हैं. कुछ अलग हो कर सीधे भगवाइयों के साथ मिल गए हैं पर वहां और बुरी हालत है. वे अपने जैसों के सही नेता नहीं हैं और इसलिए हर समय अपमान सहते हैं, भेदभाव सहते हैं.  Editorial

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