Editorial. देश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराने वाले 23 आईआईटी में जाति का जम कर बोलबाला है. यहां पढ़ रहे 1.2 लाख स्टूडैंट्स में से आधे ऊंची जातियों के हैं और वे खातेपीते घरों से हैं जिन्हें बचपन से अपने को ऊंचा होने का एहसास दिलाया गया है. आमतौर पर एक बड़ा गुट एकसाथ रहता है और इन में आपसी मतभेद कम होते हैं.

बाकी आधों से ये आधे खार खाए रहते हैं क्योंकि जहां ऊंची जाति वालों को पूरी 11 से 15 लाख की फीस, जिस में होस्टल और मैस का खाना शामिल है, देनी होती है, रिजर्वेशन पाए वालों को बहुत कम देनी होती है और वे कुछ लाख दे कर पढ़ाई में अच्छे हों तो इंजीनियर बन जाते हैं.

ऊंची जाति वाले छात्रों को यह खलता रहता है कि ये रिजर्वेशन वाले यदि प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों में जाते तो उन्हें पूरी 15 से 40 लाख की फीस देनी पड़ती. ऊंची जाति के छात्र नीची जाति वालों को आज भी तंग करते रहते हैं.

आईआईटी बौम्बे में रिजर्वेशन पाने वाले एक सैकंड ईयर के स्टूडैंट साहिल वाकोड़े ने 18 सितंबर को डीन की भेदभाव वाली नीति और उस की शिकायतों पर ध्यान न देने पर आत्महत्या कर ली. वह अपनेआप गलत था. वह दलित था न.

तमाम आरक्षण के बावजूद, तमाम जाति है ही नहीं के नारों के बावजूद असलियत यही है कि दलित स्टूडैंट्स कही भी हों, उन्हें मानसम्मान तो दूर पास बैठने तक नहीं दिया जाता. पढ़ाई की जगह पर यह भेदभाव शुरू हो जाता है, स्कूलों से, और मैरिट में अच्छे नंबर लाए जाने पर भी बंद नहीं होता.

इस देश में एकलव्य मरे नहीं हैं, द्रोणाचार्यों की भरमार है जो अर्जुनों के कहने पर नीची जाति वालों को हुनर देना नहीं सिखाते. यह देश उस की पूजा करता है जिस ने उस शंबूक का गला काट डाला जिस ने वेदों को याद करना शुरू कर दिया था और उसे ही एक ब्राह्मण लड़के की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया था.

जब हर किताब, अखबार, टीवी चैनल पर नीची जाति वालों को हर जगह बेइज्जत किया जाता है तो डीन प्रोफैसर सूर्यनारायण डूला ने नकल का आरोप लगा कर साहिल को सस्पैंड करने की बात को समर्थन क्यों नहीं देगा. नीट की परीक्षा में पेपर लीक हुए, लाखों में ऊंची जाति के छात्रों को पेरेंट्स ने अपने ऊंची जाति के लाड़लों के लिए खरीदे, कुछ नहीं हुआ. एक एकलव्य, एक शंबूक, एक अंबेडकर, एक मायावती, एक पासवान साथ बैठ जाएं यह आईआईटी के आधे छात्रों और आधी फैकल्टी को मंजूर नहीं है.

नकल करने का आरोप ऐसा ही है जैसा एकलव्य के गुरुदक्षिणा न देने का है. यह शंबूक के कारण ब्राह्मण पुत्र की हत्या है. जीवन भर लगा कर, मैरिट में जगह बना कर आईआईटी बौम्बे में पहुंचे साहिल वाकोड़े का पूरा कैरियर एक इनविजिलेटर ने सैकड़ों पौराणिक कथाओं की तरह खत्म कर दिया.

यह पहला और आखिरी मामला नहीं है. हर जगह हो रहा है, और जैसेजैसे पढ़ाई में तेज हो कर दलितपिछड़े घरों के बच्चे ऊंचे स्थानों पर पहुंच रहे हैं, गुस्सा उबल रहा है. एक रिधिका शर्मा ने इंस्टाग्राम टीम पर दलित स्टूडैंट्स की अपने हक और इज्जत मांगने पर जम कर हल्ला मचाया है. उस के 7 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं क्योंकि वह दलितों को अपनी जगह, गीता के अनुसार पैरों से बाहर धकेलने में विश्वास रखती है. ऐसे हजारों हैं जो अपनी बात कहते हैं और ऊंची जाति वाले पैसे वाले सुनते हैं.

दलितों के पास आज भी जबान नहीं. आज भी वे अपने ही लोगों को या अपनी वकालत करने वालों को पैसा देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन में मन के भीतर वही बैठा है कि वे पिछले, दलित इसलिए हैं कि उन के पूर्वजन्म के कर्म अच्छे नहीं थे. वे मन से न विरोध करना जानते हैं, न अपनी बात कहने वालों का साथ दे पाते हैं. वे तो बिक जाते हैं, भगवा खेमों में जो बैठते हैं और रोहित वेमुला जैसी मौत पर 2-4 रोज स्यापा कर के इसे अपना भाग्य मान लेते हैं.Editorial

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