Hindi Story. शिकार शेरनियां करती हैं शेर नहीं. बच्चों को पालने और परिवार को संभालने की जिम्मेदारी शेरनियों के कंधों पर होती है शेरों के नहीं. यह कुदरत का नियम है जिसे कोई ताकत नहीं बदल सकती. इस के लिए शेरनियां अपनी जान की परवाह भी नहीं करती हैं. तभी तो जंगल में उन से बढ़ कर कोई शिकारी नहीं होता.
इस में कोई शक नहीं कि इनसानों में भी शेरनियां पाई जाती हैं. भले ही शक्ल और सूरत में वे शेरनियों जैसी न हों, लेकिन हिम्मत और चपलता में वे शेरनियों को भी मात दे देती हैं. जटपुर की वीरवती भी किसी शेरनी से कम न थी.
‘‘मादर… चाहूं तो दरांती से तेरी गरदन अभी धड़ से अलग कर दूं,’’ वीरवती ने शौनाथ की छाती पर घूटना टेक कर और उस की गरदन पर तीखे दांतों वाली दरांती रखते हुए कहा.
शौनाथ को एकदम से बाजी पलटने की उम्मीद बिलकुल न थी. उस ने तो कितनी ही औरतों की इज्जत को इसी अंदाज में तारतार कर दिया था, लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में बाजी पलट गई.
वह उस से अपने प्राणों और इज्जत की भीख मांगते हुए गिड़गिड़ाया, ‘‘वीरवती, मु?ो माफ कर दे. किसी को पता चल गया तो मैं समाज में कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचूंगा.’’
‘‘वाह, कुत्ते के पिल्ले, वाह. अपनी इज्जत तो बड़ी प्यारी है और जब दूसरों की इज्जत से खेलता है तो उस का कुछ नहीं. कमीने, समाज में बड़ा सफेदपोश का अवतार बना फिरता है, तेरी काली करतूतों का चिट्ठा खुलना ही चाहिए. तू हमें सम?ाता क्या है? कान खोल कर सुन ले, मैं बेवा हूं कोई धंधे वाली नहीं.’’
‘‘माफ कर दे, वीरवती, माफ कर दे. तू देवी है देवी.’’
‘‘सूअर की औलाद, तू ने मु?ो छूने की हिम्मत ही कैसे की? मन तो करता है, कठफोड़वे, तेरा खून पी जाऊं, जहांतहां चोंच मारता फिरता है. औरतों को अपनी रखैल सम?ाता है.’’
‘‘नहीं, नहीं, वीरवती. तु?ो पहचानने में मु?ा से भूल हो गई. आज पता चला हर औरत एक सी नहीं होती. तेरे पांव पड़ता हूं, मु?ो माफ कर दे. मेरी बीवी और औलाद को मेरी करतूतों का पता चल गया तो वे मु?ो घर में भी न घुसने देंगे.’’
‘‘तेरे जैसा घटिया आदमी परिवार तो क्या समाज में भी रहने लायक नहीं. तेरे जैसे नालायक को तो जीने का हक ही नहीं होना चाहिए जो अपनी औरत को दगा दे कर इधरउधर मुंह मारता फिरता है और दूसरी औरतों पर गंदी नजर रखता है.’’
‘‘वीरवती, अब मैं इन रास्तों की ओर कदम भी नहीं रखूंगा. मां कसम.’’
‘‘मां नहीं, बाप की कसम खा. तेरे जैसे नामर्द की जबान पर ‘मां’ शब्द शोभा नहीं देता.’’
शौनाथ अभी भी गिड़गिड़ा रहा था लेकिन ऐसा लगता था वीरवती उसे माफ करने के मूड में नहीं थी. वह शेरनी सी दहाड़ कर बोली, ‘‘मु?ो महानता का तमगा गले में लटका कर घूमने का शौक नहीं. सजा तो तेरी करनी की तु?ो मिल कर रहेगी और वह भी ऐसी जिसे तू जिंदगीभर याद रखेगा. किसी गैर औरत की ओर गंदी नजर उठाने से पहले हजार बार सोचेगा,’’ यह कहते हुए वीरवती ने उस का बायां कान ‘खच्च’ से दरांती से साफ कर दिया.
खून की एक तेज धार शौनाथ की कनपटी से बह निकली. उस के मुंह से दर्दनाक चीख निकली. उस ने बहते खून को रोकने के लिए कनपटी पर अपना हाथ रख लिया और दर्द से कराहता हुआ तेजी से वहां से चल पड़ा. उस के शरीर का बायां भाग खून से लथपथ हो चुका था.
‘‘जा याद रखना शैतान कि एक औरत की इज्जत पर हाथ डालने का क्या नतीजा हो सकता है…’’
जमीन पर पड़े कटे हुए कान पर वीरवती ने जोर से पैर मारा तो वह जमीन में धंस गया. फिर उस ने चारे की गठरी उठाई और गांव की ओर चल दी. कितने ही खयाल उस के मन में उमड़घुमड़ रहे थे.
वीरवती जब ब्याह कर गांव में आई थी तो सबकुछ ठीकठाक था. उस का आदमी राकेश शराब तो पीता था लेकिन इतनी ज्यादा भी नहीं. पता नहीं किस कारण से उस के आदमी को कैंसर हो गया और उस का पता तब चला जब वह तीसरी स्टेज में पहुंच कर लाइलाज हो गया और 2 साल पहले ही उस की मौत हो गई थी.
बेटा लवकेश गलत संगत में पड़ गया था और हत्या के केस में 20 साल की उम्र में ही जेल की हवा खाने चला गया था. अपनी बेटी बाला को पढ़ने के लिए उस ने गढ़वाल के श्रीनगर भेज दिया था. अब वह अपने घर में अकेली रहती थी. वह अपनी बेटी को पढ़ालिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती थी, इसलिए भैंस पाल कर दूध बेचने का काम करने लगी थी.
उ स का आदमी 5 बीघा खेती की जमीन छोड़ गया था. कितनों ने ही उस की आर्थिक तंगी देख कर उस के सामने उस की खेती की जमीन खरीदने का प्रस्ताव रखा था लेकिन उस ने जमीन बेचने से साफ मना कर दिया था. उस जमीन में वह अनाज, गन्ना और भैंसों के लिए चारा उगाती थी. अपनी मेहनत के बलबूते उस ने अपनी आर्थिक तंगी पर जीत पा ली थी.
शौनाथ गांव का बड़ा जमींदार और रसूखदार आदमी था. वह हमेशा गांव की कमजोर और बेबस औरतों पर गंदी नजर रखता था और उन की कमजोरी का फायदा उठाता था. उस ने वीरवती को भी ऐसी ही कमजोर और लाचार औरत सम?ा लिया था.
उस दिन जब वह भैंसों के लिए अपने खेत में चारा काटने गई थी तो पीछे से चुपचाप आ कर शौनाथ ने उसे दबोच लिया था. बस यही उस से सब से बड़ी गलती हो गई थी. उसे पता नहीं था कि वीरवती बचपन में कुश्ती लड़ती थी और उसे कुश्ती के दांवपेंच अच्छे से आते थे.
वीरवती ने एक ही ?ाटके में उसे नीचे पटक दिया था और शेरनी सी उस की छाती पर घुटना टेक कर सवार हो गई थी.
शौनाथ को उस दिन ऐसा सबक मिल गया था कि उस दिन के बाद से उस ने किसी औरत की तरफ गलत नजर उठा कर देखने की हिमाकत न की थी. लोग अब उसे ‘कनकटा’ कहने लगे थे. कटे हुए कान को छिपाने के लिए वह हमेशा पगड़ी बांध कर रहने लगा था. उस का कान कैसे कटा, यह बात उस ने किसी को नहीं बताई थी.
वीरवती ने बिटिया बाला को पढ़ालिखा कर काबिल बना दिया था. वह एक इंटर कालेज में इकोनौमिक्स की लैक्चरर हो गई थी. वीरवती ने उस की शादी उसी की मरजी से उसी के कालेज में हिंदी के लैक्चरर सुमित से कर दी थी. उस की जिंदगी अब खुशियों से भरी थी. बस वीरवती को अब इंतजार था बेटे लवकेश का जेल से बाहर आने का.
एक दिन वीरवती को खबर मिली कि सरकार 15 अगस्त पर कुछ कैदियों को रिहा करने जा रही है.
उन कैदियों में लवकेश का नाम भी था. इस से बड़ी खुशी और क्या हो सकती थी.
लवकेश 10 साल बाद जेल से बाहर आया तो वीरवती उसे किराए की कार में बैठा कर घर लाई. इतने लंबे समय बाद उस का बेटा जेल से बाहर आया था इस खुशी में उस ने गांव में बड़े भारी भोज का आयोजन किया. उस में जटपुर गांव की भीड़ ही नहीं, बल्कि आसपास के गांव की भीड़ भी उमड़ पड़ी थी.
वीरवती ने लवकेश के लिए कई चीजें तैयार की थीं. उस में सुंदर डिजाइन का एक तकिया भी था। उस तकिए को लवकेश को देते हुए उस ने कहा, ‘‘ले बेटा, यह तेरा सिरहाना है. सिरहाना हमारा सम्मान होता है. तू 10 साल जेल में काट कर आया है. अब अपना सम्मान और यश बढ़ाना. दुष्ट लोगों से बच कर रहना.’’
‘‘मां, तू कैसी बातें करती है? एक अपराधी का और वह भी हत्या के आरोपी का कोई सम्मान होता है भला. मैं 10 साल जेल में अपराधियों के बीच में रह कर आया हूं. मैं भले ही जेल से बाहर आ गया हूं लेकिन मेरा दिमाग अभी भी अपराधियों की तरह ही सोचता है. मेरे मन से ये बातें अभी तो नहीं निकलतीं. अभी किसी अच्छे काम को करने को मन नहीं होता. जेल की जिंदगी का आदी हो गया हूं. किसी काम को करने का मन नहीं करता.’’ ‘‘न बेटा, ऐसा मत सोच. सब ठीक हो जाएगा.’’
‘‘मां, यह बात कैसे मान लूं? भोज में कितने लोग आए, सब गड़पगड़प भोजन तो खा गए, लेकिन किसी ने सीधे मुंह मु?ा से बात भी नहीं की. सब के सब आज भी मु?ो हत्यारा और अपराधी ही सम?ाते हैं. शौनाथ चाचा को छोड़ कर कोई मेरी छुआई लेने को तैयार भी नहीं.’’
शौनाथ का नाम सुनते ही वीरवती का खून खौल उठा. लेकिन उस ने खुद को शांत ही रखा. उस ने सोचा कि लवकेश को अगर शौनाथ की काली करतूत बता दी तो कहीं वह उस का काम तमाम ही न कर दे. एक हत्या की सजा तो वह काट कर आ ही रहा है, कहीं दूसरी हत्या वह अपने सिर न ले ले. वह उस के दोबारा जेल जाने के सोचने मात्र से सिहर उठी. उस ने बस इतना कहा, ‘‘बेटा, शौनाथ से दूर ही रहना. वह मु?ो अच्छा आदमी नहीं लगता.’’
‘‘मां, पूरे गांव में लेदे कर एक ही तो आदमी है जो इतने प्यार से मु?ो अपने पास बैठाता है. उसी से मु?ो तुम चेता रही हो, सावधान कर रही हो.’’
यह सुन कर वीरवती के मन में शौनाथ को ले कर कुछ शंका सी हुई, लेकिन अपनी शंका को अपने मन में रखते हुए उस ने कहा, ‘‘ठीक है बेटा. जैसा तेरा मन. रात घनी हो गई है, अब तू सो जा.’’
इस बात को हुए 4 दिन भी नहीं गुजरे थे कि लवकेश ने अपनी मां को दूध में नींद की गोलियां मिला कर गहरी नींद सुला दिया और फिर उसी तकिए से अपनी मां का दम घोंट दिया जिस तकिए को वीरवती ने उस के लिए बड़े जतन से तैयार किया था. अफवाह फैला दी गई थी कि वीरवती की रात में हार्ट अटैक से मौत हो गई.
जब वीरवती की अर्थी को लोग कंधा दे कर ले जा रहे थे तब शौनाथ मन ही मन खुश हो कर सोच रहा था, ‘वीरवती, बेइज्जती का बदला पूरा हुआ. तेरे अपराधी सोच के बेटे ने इस लालच में तु?ो यमलोक पहुंचा दिया कि तेरे मरने के बाद पूरी जायदाद पर उस का हक होगा. उस बेवकूफ को भी मैं कहीं का नहीं छोड़ने वाला. मेरी पहली योजना कामयाब रही तो दूसरी भी जरूर होगी.’
शौनाथ वीरवती की अर्थी के पीछे पीछे गंगा के घाट तक गया. जब उस की चिता जल रही थी तब वह गंगा की ढांग पर खड़ा गंगा की लहरों की तरफ मुंह किए कुटिल मुसकान से मुसकरा रहा था कि उस की साजिश पूरी तरह से कामयाब रही. उस की बेइज्जती का बदला आज पूरा हुआ. इस का ब्याज लवकेश को वह बरबाद कर के वसूलेगा.
तभी गंगा की एक तेज लहर उस ढांग से टकराई. ढांग नीचे गिरी और इसी के साथ शौनाथ भी मुंह के बल गिरा. कई दिन बाद उस की सड़ीगली लाश गोताखोरों को कई किलोमीटर दूर जा कर मिली. Hindi Story




