Story in Hindi. जलालाबाद में खतरनाक सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उस सन्नाटे की तलहटी में भयंकर लावा उबल रहा था. ज्वालामुखी का लावा भी इतना गरम नहीं होता जितना इनसानी दिमागों में भरा नफरती लावा. एक खबर ने कट्टरपंथियों को बैठेबिठाए नफरत का गरमागरम मसाला थमा दिया था. उन की भूखप्यास इसी नफरत से पैदा और शांत होती है.

बड़े मदरसे में जो कौम की बैठक बुलाई गई थी उस में लावा उगलने वाले कितने ही ज्वालामुखी पहुंच गए थे. भले आदमी तो एक किनारे आ कर बैठ गए थे. लावा उगलने वाले ज्वालामुखियों ने लावा उगलना शुरू किया.

‘‘उस काफिर ने हमारी कौम की लड़की की तरफ आंख उठा कर भी कैसे देखा…’’ सत्तार ने गरम लावा उगलते हुए कहा.

‘‘वह काफिर का बच्चा कहीं भी हो हम उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे. वह शहर के काजी की लड़की को ले कर भागा है. उस ने हम सब का मुंह काला किया है. हम उसे जिंदा दफन कर देंगे… हमारे दीन को खराब करने वाला,’’ नौजवान आदिल ने भड़ास निकालते हुए कहा.

जब कुछ और नासम?ा से नौजवान कट्टरपंथियों ने अपनी कैंची सी जबान चला ली और उन के पास और कुछ कहने के लिए नहीं रहा तब सुल?ो हुए जमाने की खैरखबर रखने वाले वकील सुलेमान साहब बोले, ‘‘दीनी भाइयो, यह मामला ऐसा नहीं है कि इस में इतना गरम हुआ जाए. मेरी सलाह है कि कानून के दायरे में रह कर बात की जाए. हमारे मुल्क में कानून और संविधान का शासन है.’’

‘‘अरे वकील साहब, अपने कानून को अपनी जेब में रखिए,’’ सत्तार ने तैश में आ कर कहा.

‘‘सत्तार भाई, हर देश में कानून का राज है और उस के हिसाब से सजाएं भी दी जाती हैं. अपने यहां हत्या करने पर दफा 302 लगती है जिस में आजीवन कारावास से ले कर फांसी के फंदे पर भी लटकाया जा सकता है,’’ वकील सुलेमान ने फिर से सम?ाया.

तभी इब्राहिम बोला, ‘‘डराओ मत वकील साहब. हमारे लड़के मरने से नहीं डरते. हमारी कौम डरने वाली कौम नहीं है.’’

‘‘लेकिन इब्राहिम भाई, यह मामला कोई दीनी मामला नहीं है. यह तो प्रेम प्रसंग का मामला है. हर चीज में दीन को बीच में नहीं लाना चाहिए. दूसरे समाजों की लड़कियां भी तो हमारे समाज में आती हैं. वे भी इसी तरह सोचने लगें तो रोज खून की नदियां बहें. हम दीन के जिस बंद कमरे में रह कर सोचते हैं, क्या उस में खिड़कियां नहीं होनी चाहिए?’’

‘‘वकील साहब, आप कहना क्या चाहते हैं? यही कि काजी साहब की बेटी एक काफिर के साथ ही रहे और हम बुजदिलों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें?’’ इब्राहिम ने पूछा.

‘‘मेरा तो केवल इतना कहना है कि हमीदा अपनी मरजी से राजन के साथ गई है. वह बालिग है और वह अपने फैसले लेने के लिए आजाद है. अगर पुलिस उसे पकड़ कर अदालत में पेश कर भी दे और वह अपना बयान राजन के पक्ष में दे दे तो आप और हम कुछ नहीं कर सकेंगे.

‘‘किसी ने कानून को हाथ में लेने की कोशिश की तो जेल की हवा और खानी पड़ेगी. वकील होने के नाते मेरा यही कहना है कि पुलिस को कानून के मुताबिक अपना काम करने देना चाहिए. बातों के हवाई फायर करने से कोई फायदा नहीं. मेरी बात किसी को सम?ा में आई हो तो ठीक, नहीं आई हो तो आप की मरजी चाहे जो करो, मैं तो चला.’’

यह कह कर वकील सुलेमान साहब तो वहां से चले गए. उन के जाने के बाद कट्टरपंथियों ने उन की बातों की खूब मजम्मत की. जो लोग वकील साहब की बातों से सहमत थे वे कुछ न बोल सके और धीरेधीरे उस सभा से उठ कर चलते बने.

कुछ देर बाद सभा बेनतीजा खत्म हो गई. लोग बड़बड़ाते हुए अपनेअपने घरों को लौट गए. यह सुल?ो हुए वकील साहब की बातों का ही असर था कि बहता हुआ गरम लावा ठंडा हो कर बह गया.

हमीदा के पिता काजी मोहम्मद इलियास भी एक सुल?ो हुए इनसान थे. काजी होने के बावजूद वे प्रगतिशील सोच के थे. मृदुभाषी और मिलनसार थे. ऐसा नहीं था कि उन्हें हमीदा और राजन के संबंधों का पता नहीं था. हमीदा को मदरसे में पढ़ाने के बजाय उन्होंने उसे आधुनिक शिक्षा की तालीम के लिए इंगलिश मीडियम के स्कूल में पढ़ाया. उन के इस फैसले पर उन के समाज के कुछ लोगों ने उंगली भी उठाई, लेकिन उन्होंने किसी की न सुनी.

हमीदा को बीएएमएस कराने के लिए उन्होंने उसे लखनऊ भेजा. राजन को भी वही कालेज मिला जो हमीदा को मिला था. अपने शहर में भी वे एक दूसरे के सहपाठी थे, लेकिन लखनऊ में यह रिश्ता उम्र के साथ सहपाठी से प्रेमसाथी में बदल गया.

इस पर हमीदा के पापा ने उसे कौम और मजहब की दुहाई दे कर सम?ाया भी लेकिन हमीदा ने अपनी यह बात कह कर मामले को खत्म कर दिया, ‘‘पापा, मैं पुरानी, रूढि़वादी और सड़ीगली सोच के साथ जिंदगी नहीं जीना चाहती. ये मजहब और संप्रदाय लोगों ने अपने हिसाब से बनाए हैं. जब भाषाएं और बोलियां भी नहीं थी तब भी इनसान इस धरती पर था. पूरी धरती पर हम सब होमो सेपियंस की ही संतानें हैं. साइंस पढ़ कर भी अगर मूढ़ बनी रहूं तो फिर मेरे पढ़ने का क्या फायदा…’’

‘‘बेटी, फिर भी एक बार सोच ले. समाज और कौम भी तो एक सच्चाई है. हमें मजहब वालों के साथ रहना है नहीं तो अलगथलग पड़ जाएंगे.’’

‘‘पापा, मु?ो मजहब की ये जंजीरें पसंद नहीं. जिन्हें इन जंजीरों में बंध कर मजहब की गुलामी करनी है, वे शौक से करें. मैं उन्हें नहीं रोक रही हूं. इस देश का कानून और संविधान मु?ो आजादी से जीने की इजाजत देता है. फिर किसी को मेरे फैसले से परेशानी क्यों?

‘‘पापा, कहीं से तो इस की शुरुआत होगी. हम कब तक मजहब के बंद और घुटन भरे कमरे में ताला लगा कर बैठे रहेंगे. इस ताले को कभी न कभी किसी न किसी को तो तोड़ना ही पड़ेगा.’’

‘‘वह तो ठीक है हमीदा, लेकिन.’’

‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं पापा. राजन मु?ो पसंद है. अब मैं किसी और के साथ रहने की सोच भी नहीं सकती. हम दोनों ने साथ रहने का फैसला कर लिया है.’’

हमीदा बेटी, मैं तो बस यह कहना चाहता था कि मैं शहर काजी हूं, कौम से बंधा आदमी हूं. इस उम्र में क्रांतिकारी फैसले नहीं ले सकता. कल तेरे फैसले के साथ मैं न खड़ा हो पाऊं तो मु?ो दोष मत देना.’’

‘‘अरे पापा, आप भी कैसी बातें करते हो… फैसला मेरा है, मैं आप को दोष क्यों दूंगी? मैं आप की मजबूरी को सम?ाती हूं.’’

इलियास सम?ा गए कि हमीदा और राजन का रिश्ता काफी आगे निकल चुका है और हमीदा की वापसी अब नामुमकिन है. वे भी नहीं चाहते थे कि उन की लाडली पर मौडर्न और सभ्य विचारों वाली उन की बेटी का यह रिश्ता खत्म हो. लेकिन वे आने वाली समस्याओं से रूबरू थे.

इस रिश्ते को एक नाम मिलते ही उन की शहर काजी की उपाधि तो जानी तय थी ही, अगर कट्टरपंथी इस के बाद उन्हें दोष देते हुए उन की दाढ़ी नोंच लें तो यह भी मुमकिन था.

लेकिन समस्या तब विकराल हो गई जब राजन के घर वालों ने एक मुसलिम लड़की को स्वीकार करने से मना कर दिया. मना ही नहीं कर दिया बल्कि राजन से सारे संबंध खत्म करने की भी धमकी दे दी. जब वे कोर्ट मैरिज कर के आए तो उन के लिए दोनों परिवारों के दरवाजे बंद हो गए.

राजन को लगता था कि उस के मम्मीपापा मान जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब वह क्या करें? जोकुछ पैसा दोनों के पास था, वह भी कोर्टकचहरी में खत्म हो गया था. कोर्ट में हमीदा के बयान भी हो गए थे. बयान वाले दिन पुलिस ने बड़ी मशक्कत से उन दोनों को कट्टरपंथियों के हाथों से बचाया था. उस दिन से वे गुमनाम जिंदगी जी रहे थे.

ऐसे में राजन का दोस्त मुकेश काम आया. वह गढ़मुक्तेश्वर में रहता था. मुकेश ने उन्हें गढ़मुक्तेश्वर बुला लिया था और एक छोटा सा, सस्ता सा रूम किराए पर दिलवा दिया. एक छोटे अस्पताल में राजन को कम सैलरी की जौब मिल गई. मजबूरी में बहुतकुछ करना पड़ता है. जैसेतैसे उन की गुजरबसर होने लगी.

नौकरी तो हमीदा को भी मिल रही थी लेकिन कुछ कारणों से राजन ने उसे अभी रूम पर ही ठहरने को कहा. सब से बड़ा कारण कट्टरपंथियों से सुरक्षा को ले कर ही था. अस्पताल सार्वजनिक जगह होती है कब, कौन आ कर उस की हमीदा को नुकसान पहुंचा दे, क्या पता.

राजन और हमीदा के परिवार वालों को नहीं पता था कि वे दोनों कहां हैं, क्या कर रहे हैं, कौन उन की मदद कर रहा है. उन दोनों को हमेशा कट्टरपंथियों का डर सताता रहता. लेकिन 1-2 महीने गुजरने पर यह डर एक हद तक कम हो गया. उन्हें लगने लगा था कि जल्दी से कोई सोच भी नहीं सकता कि वे गढ़मुक्तेश्वर में रह रहे होंगे. सच भी यही था. हर कोई यही सोचता था कि वे दोनों लखनऊ या दिल्ली जैसे बड़े शहर में रह रहे होंगे.

अगर दुनिया में उन की किसी को चिंता थी तो वे थे हमीदा के पापा इलियास. जिस दिन से उन्हें यह पता चला था कि राजन के घर वालों ने उन्हें पनाह देने से मना कर दिया है, उन की आंखों की नींद उड़ गई थी.

वे हर समय हमीदा को ले कर चिंतित रहते. रोज अखबार पढ़ते और प्रेम में लुटीपिटी लड़कियों की खबर पढ़ कर उन की रूह कांप जाती. ऐसी हर लड़की में उन्हें अपनी हमीदा नजर आती.

वे रोज शाम को अपने दोस्त वकील सुलेमान के पास जाते और उन से अपना दर्द बयान करते. सुलेमान को ही उन्होंने दोनों को गुप्त रूप से तलाशने का जिम्मा सौंप रखा था.

सुलेमान बड़ी शिद्दत से हमीदा और राजन को तलाशने में लगे थे. वे वकील थे और इस बाबत उन की जानपहचान दूरदूर तक थी. अपने तरीके से वे इस मुहिम में लगे थे. बड़े मदरसे में भी सुलेमान ने इलियास साहब के कहने पर ही बात को संभाला था. तब से शहर काजी का उन पर और ज्यादा विश्वास जम गया था.

तकरीबन 2 महीनों के बाद सुलेमान ने वह खबर शहर काजी मोहम्मद इलियास को सुनाई जिस का उन्हें बड़ी बेसब्री से इंतजार था.

अब तक उन की आंखें हमीदा के इंतजार में तकरीबन पथरा गई थीं.

सुलेमान ने खबर सुनाई, ‘‘पुख्ता खबर है काजी साहब. आप की बेटी और दामाद गढ़मुक्तेशवर में हैं.’’

फिर सुलेमान ने जितनी जानकारी मिली थी वह सब सुना दी.

काजी साहब तो खुशी के मारे पागल हो गए. उन्होंने कहा, ‘‘सुलेमान, हमें अभी चलना होगा. शाम होतेहोते पहुंच जाएंगे.’’

सुलेमान कहना चाहते थे कि सुबह चलेंगे लेकिन काजी साहब की बेचैनी देख कर उन्हें ‘हां’ कहना पड़ा.

‘‘सुलेमान, तुम अपनी कार निकालो. खर्चापानी सब मेरा. बस, मैं घर से बेटी के लिए कुछ ले आऊं,’’ यह कह कर काजी साहब घर की ओर ?ापटे.

न जाने आज उन के पैरों में कहां से इतनी ताकत आ गई थी कि चार कदम की दूरी वे एक कदम में नाप रहे थे.

घर पर उन्होंने केवल इतना बताया, ‘‘बेगम, सुलेमान के साथ जा रहा हूं. देर रात तक आऊंगा. इंतजार मत करना.’’

सुलेमान ने अभी अपनी कार ठीक से निकाली भी नहीं थी कि काजी साहब कार में ड्राइवर की बगल वाली सीट पर ‘धम्म’ से बैठ गए.

सुलेमान ने कार को तेज रफ्तार से गढ़मुक्तेशवर की और दौड़ा दिया. समय से पहले वे वाया चांदपुर, गजरौला होते हुए गढ़मुक्तेशवर पहुंच गए.

सुलेमान को रूम तलाशने में थोड़ी देरी हुई तो काजी साहब की बेचैनी उबाल खाने लगी, ‘‘सुलेमान, तुम्हें सही से पते के बारे में जानकारी भी है कि नहीं?’’

‘‘काजी साहब, आप थोड़ा सब्र रखिए.’’

‘‘सुलेमान, जिस दिन जुदा हुई बेटी से मिलने चलोगे, उस दिन पूछना यह सवाल… तब बताऊंगा.’’

तभी सुलेमान ने कार एक गली में ले जा कर रोकी और साइकिल पर सवार एक छोटी लड़की से पूछा, ‘‘बेटी, कुंदन सिंह का मकान कौन सा है?’’

‘‘हां बेटी, कुंदन सिंह का मकान, जल्दी से बताओ,’’ काजी साहब उस लड़की का जवाब आने से पहले ही उतावले हो कर बोले.

सुलेमान और वह लड़की उन्हें अचंभे से देखने लगे कि जरूर उन के साथ कोई गड़बड़ है. इस से पहले

कि वह लड़की कुछ पूछती और बोलती, तभी बराबर के घर का दरवाजा खुला और सामने से आवाज आई, ‘‘पापा.’’

फिर क्या था. कौन बाप बेटी के इस मिलन का बखान अपने शब्दों में कर सकता है. दोनों मिले, फफकफफक कर रोए, आंसुओं से सराबोर हो गए. अगर सुलेमान उन्हें अंदर न ले जाते तो गली में ही मजमा लगना तय था.

क मरा छोटा सा था. बराबर में छोटी सी रसोई थी. उस कमरे में बिना गद्दे का एक तख्त पड़ा था. उस पर एक दरी और चादर बिछी थी. कोई कुरसी नहीं थी. साफ पता चल रहा था हमीदा और राजन कैसे अपने दिन काट रहे थे.

काजी साहब और सुलेमान चाचा को उस ने तख्त पर बिठाया. नीचे एक टाट की बोरी थी जो हमीदा ने अपने लिए बिछा ली थी. वह उन की क्या आवभगत करती, उन के लिए रसोई से पानी लाई और राजन के आने का इंतजार करने लगी जिस से कि उस से दूध मंगवा कर चाय बनाई जाए.

कुछ देर बातों का सिलसिला चला. हमीदा अपने फैसले से वाकई खुश थी. उस ने बताया, ‘‘पापा, बस कुछ ही दिनों की बात है फिर तो मैं भी उसी अस्पताल में जौब करने लगूंगी.’’

‘‘हां बेटी, सब दिन एक से नहीं होते. हिम्मत वालों के सामने कुदरत भी ?ाक जाती है. तुम ने बड़ी बहादुरी से एक संकट ?ोल लिया है, आगे की राह तुम्हारी हिम्मत देख कर खुद ब खुद आसान हो जाएगी.’’

कुछ देर और बैठने के बाद काजी साहब ने कहा, ‘‘अच्छा बेटी, अब हम चलते हैं.’’

‘‘पापा, ऐसे नहीं जाने दूंगी. राजन से मिल कर जाना. पता नहीं आज कैसे देर हो गई ? इस समय तक तो, आ जाते थे.’’

‘‘आ गया. इंतजार खत्म,’’ राजन ने अपने दोनों हाथों में सामान ले रखा था.

‘‘हमीदा, तुम जल्दी से चाय बनाओ. अब अंकल और पापा से मैं बात करूंगा.’’

हमीदा सामान ले कर रसोई में गई तो नमकीन, बिसकुट, दूध, सब्जी और दूसरे सामान देख कर चौंक गई. सोचने लगी, ‘अभी तो राजन की सैलरी मिलने की तारीख भी नहीं आई, फिर इतना सामान यह कहां से लाया. खैर चलो, कोई बात नहीं. वह तो बाद में पूछूंगी, फिलहाल चाय बनाती हूं और नमकीनबिसकुट के साथ पापा और अंकल को बढि़या सी चाय बना कर पिलाती हूं,’ उसे राजन पर गर्व हो रहा था.

खुशीखुशी चाय पीने के बाद काजी साहब बोले, ‘‘अच्छा बेटी, अब रुकने के लिए मत कहना. रात हो आई है और घर भी पहुंचना है. लो, तुम दोनों के लिए एक छोटा सा उपहार है. शादी का उपहार सम?ा कर रख लो, मना मत करना.’’

फिर काजी साहब ने हमीदा को एक बार फिर से गले लगाया तो उन की आंखों से फिर से आंसू छलक पड़े.

‘‘पापा, आप फिर से रोने लगे.’’

‘‘हां बेटी, ये रुखसती के आंसू बचा रखे थे. तु?ो डोली में बैठाते समय ये आंसू निकलते, कमबख्त अभी तक बचे पड़े थे.’’

यह सुन कर हमीदा भी रोने लगी, जैसे सचमुच बाप के कंधे पर सिर रख कर उस की रुखसती अब हो रही हो. यह देख कर सुलेमान की आंखें भी नम हो गईं. उन्होंने भी हमीदा को गले लगाया. अब सब के दिल हलके हो गए थे.

चलते समय काजी साहब ने कहा, ‘‘बेटी, हम वहीं हैं जो थे. तूफान गुजर गया है. अब मैं तुम से मिलने आता रहूंगा. तुम दोनों खुश रहना.’’

जब हमीदा और राजन उन को विदा कर के कमरे में पहुंचे तो हमीदा ने पूछा, ‘‘राजन, इतना सामान लाने के पैसे तुम्हारे पास कहां से आ गए और तुम्हें कैसे पता चला कि पापा और वकील चाचा आए हैं?’’

‘‘हमीदा, जब मैं वापस आया तो बाहर कार खड़ी देखी. मैं चुपके से तुम्हारी बातें सुनने लगा. तब मैं वापस गया और यह सामान ले आया.’’

‘‘लेकिन पैसे?’’

तभी हमीदा ने देखा कि राजन अपना बायां हाथ छिपा रहा है. उस ने उस के बाएं हाथ की कलाई पकड़ी तो उस पर घड़ी नहीं थी, जो उस ने प्यार के तोहफे के रूप में कभी राजन को उस के जन्मदिन पर भेंट की थी.

हमीदा सम?ा गई कि राजन वह सामान कैसे लाया. राजन थोड़ा सा शर्मिंदा हुआ.

तब हमीदा ने कहा, ‘‘राजन, शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं. मेरा वादा है जैसे ही मैं नौकरी शुरू करूंगी, अपनी पहली सैलरी से तुम्हें वैसी ही घड़ी तोहफे में दूंगी और तुम वादा करो तुम अब मु?ो नौकरी करने से रोकोगे नहीं…’’

‘‘बिलकुल नहीं रोकूंगा मेरी प्यारी हमीदा.’’

‘‘हां, हम दोनों खूब मेहनत करेंगे और खूब पैसा कमाएंगे,’’ जैसे ही हमीदा ने यह बात जोश में कही, उस का हाथ पापा के दिए शादी के उपहार से टकराया और वह उपहार तख्त से नीचे गिर गया.

‘‘ले पगली, कंगाली में आटा गीला. पापा का उपहार भी तू ने तोड़ दिया. मु?ो तो पहले से ही यह वजनी लग रहा था.’’

हमीदा उपहार को जल्दी से खोलने लगी. राजन बड़ी जिज्ञासा से उपहार को खुलते देख रहा था. उपहार के खुलते ही दोनों की आंखें खुली की खुली रह गईं.

500-500 रुपए की 20 गड्डियां उस पैकेट में थीं. एक छोटी सी चिट्ठी में लिखा था ‘पापा की ओर से शादी के उपहार की पहली किस्त’. Story in Hindi

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...