18 सितंबर 2026 को IIT Bombay के सेकंड ईयर का दलित छात्र साहिल वाकोडे एग्जाम हॉल से निकलकर अपने हॉस्टल के कमरे में गया और कमरे से उसकी डेड बॉडी बाहर आई. इंस्टीट्यूट का कहना है कि वह मोबाइल से चीटिंग करते पकड़ा गया था लेकिन साहिल के पिता ने कहा कि 3 महीने से उसे जातिसूचक गालियां दी जा रही थीं. इससे यह साफ है कि यह सिर्फ एक छात्र की मौत का मामला नहीं है. यह यूनिवर्सिटीज के भीतर सड़ान्ध मार रहे जातिवाद का एक विभत्स उदाहरण है.
IIT बॉम्बे में 18 सितंबर 2026 को दिन में 11 बजे से 4 बजे तक 2 मिड सेम एग्जाम थे. पहला पेपर खत्म होने के बाद दूसरा पेपर 12.30 बजे शुरू हुआ. आरोप है कि दूसरे एग्जाम के दौरान एग्जाम हॉल में इनविजिलेटर प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला ने चेकिंग के दौरान साहिल को मोबाइल से चीटिंग करते पकड़ा. CCTV में 12.30 से 12.45 के बीच प्रोफेसर उसे क्लास से बाहर ले जाते दिख रहे हैं. इसके बाद साहिल हॉस्टल 4 में अपने कमरे में गया लेकिन 1.25 बजे के बाद वह कमरे से बाहर नहीं निकला. शाम को साहिल की मौत की खबर आई. कोई सुसाइड नोट नहीं मिला.
साहिल के पिता रवींद्र वाकोडे ने मुंबई पुलिस में FIR दर्ज कराई. उनका आरोप है कि पिछले 3 महीने से प्रोफेसर डूला जातिसूचक गालियां दे रहा था और कह रहा था कि तू लोअर कास्ट से है, तुझे किसी झूठे केस में फंसा देंगे. यह सब डायरेक्टर शिरीष केदारे के इशारे पर हो रहा था. पुलिस ने प्रोफेसर डूला के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और SC ST एक्ट के तहत केस दर्ज किया है. मामला अब क्राइम ब्रांच को दे दिया गया है. क्राइम ब्रांच एग्जाम हॉल, कैंपस और हॉस्टल की CCTV खंगाल रही है. यह 7 महीने में IIT बॉम्बे में तीसरी आत्महत्या है. इससे पहले फरवरी में भी एक दलित छात्र की मौत हुई थी.
साहिल के पिता की बात को सिर्फ आरोप कह कर ख़ारिज नहीं किया जा सकता. भारत की यूनिवर्सिटीज में जातिवाद की गहरी पैठ कोई नई बात नहीं है. सिर्फ यूनिवर्सिटीज हीं नहीं, भारतीय समाज की इस सांस्कृतिक सड़ान्ध से कोई भी संस्थान अछूता नहीं रह गया है. इसे समझना हो तो 22 सितंबर 2026 को लोकसभा के लिए केंद्र ने जो डेटा दिया है उसे देख लेना काफ़ी है.
2021 से 2025 तक 23 IITs में 45 छात्रों ने सुसाइड किया. 2023-24 में 16 मौतें हुईं, जो पिछले साल से दोगुनी हैं. 2024-25 में 13 मौतें हुईं. इस दौरान सबसे ज्यादा IIT हैदराबाद में 7 मौते हुईं. खड़गपुर दिल्ली में 6 और कानपुर में 6 स्टूडेंट्स ने आत्महत्याएं कीं. इनमें से 28 यानी 62 प्रतिशत SC ST OBC के थे. आंकड़ा साफ है कि IIT में मरने वाले स्टूडेंट्स ज्यादातर निचली जातियों के हैं इसलिए बॉम्बे आईआईटी के दलित स्टूडेंट साहिल की मौत को सिर्फ चीटिंग का मामला कह देना असलियत से मुंह मोड़ने जैसा ही होगा.
यह सिर्फ चीटिंग का मामला नहीं है. सीधी सी बात यह है कि जनरल छात्र पकड़ा जाता है तो उसे वार्निंग देकर छोड़ दिया जाता लेकिन जब दलित छात्र पकड़ा जाता है तो उसे अपराधी बना दिया जाता है. उसे क्लास से घसीट कर बाहर निकाला जाता है, पूरे हॉल के सामने बेइज्जत किया जाता है. जातिवाद की यही घृणित मानसिकता दलित और ओबीसी स्टूडेंट्स को आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर करती है.
दलित छात्रों के लिए IIT में 2 लड़ाइयां हैं. एक पढ़ाई की, दूसरी रोज के अपमान की. तुम्हारी जाति क्या है? तुम रिजर्वेशन से आए हो? तुमको कुछ नहीं आता? यह रोज का ताना होता है. साहिल के पिता ने इसी जातिवादी मानसिकता को कटघरे में खड़ा किया है. साहिल को 3 महीने से जातिसूचक गालियां दी जा रही थीं. यह मेंटल हैरेसमेंट का घिनौना रूप है जिसे डिप्रेशन कह कर ढंकने की कोशिश की जाती है. एक दलित छात्र इस मेंटल हेरेसमेंट को किस हद तक झेलता है इसे सिर्फ वही समझ सकता है. IIT में मेरिट धर्म बन गया है. यह धर्म कहता है कि जो रिजर्वेशन से आया है वह पापी है.
साहिल वाकोडे कोई पहला केस नहीं है. यह एक पैटर्न है. वही स्क्रिप्ट, वही डायलॉग और वही अंत. 17 जनवरी 2016, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला ने सुसाइड किया. रोहित पीएचडी स्कॉलर था, अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन का लीडर था. ABVP के छात्रों से झगड़े के बाद यूनिवर्सिटी ने उसे, उसके 4 साथियों के साथ हॉस्टल से निकाल दिया और इन सबकी फेलोशिप रोक दी. महीनों तक ये स्टूडेंट्स खुले में सोते रहे और यूनिवर्सिटी का VC अप्पा राव इन्हें राष्ट्रविरोधी कहता रहा.
रोहित की मौत के बाद बीजेपी सरकार ने वीसी पर नहीं बल्कि रोहित वेमुला की जाति पर जांच बैठा दी और इस जांच का नतीजा यह निकला कि वह दलित नहीं था, OBC था. सरकार ने वेमुला की मौत का कारण बताते हुए कहा कि वह डिप्रेशन में था इसलिए मर गया लेकिन सच्चाई यह थी कि एक पूरी यूनिवर्सिटी और दो केंद्रीय मंत्रियों ने मिलकर एक 26 साल के छात्र को मारा था. ASA ने रोहित की मौत को इंस्टीट्यूशनल मर्डर कहा था, सुसाइड नहीं.
22 मई 2019, मुंबई नायर हॉस्पिटल में पायल तड़वी की मौत हुई थी. पायल आदिवासी तड़वी भील समुदाय की डॉक्टर थी. वह मुंबई की सबसे बड़ी म्युनिसिपल हॉस्पिटल में MD सेकंड ईयर की स्टूडेंट थी. 3 सीनियर महिला डॉक्टरों ने एक साल तक उसे रोज टॉर्चर किया. तुम रिजर्वेशन से आई हो. तुमको कुछ नहीं आता. तुम जाहिल आदिवासी हो. यह टॉर्चर यहीं नहीं रुका. पायल को व्हाट्सएप ग्रुप में गालियां दी गईं. पायल ने हॉस्टल वार्डन से लेकर HOD तक सबको शिकायत की लेकिन उसकी शिकायत किसी ने नहीं सुनी. अंत में उसने हॉस्टल के कमरे में जान दे दी. पुलिस ने 3 डॉक्टरों को SC ST एक्ट में गिरफ्तार कर मामले को शांत कर दिया और यहां भी वही नैरेटिव फैलाने की कोशिश की गई. जातिवादी मीडिया ने इस मामले को जातिय उत्पीड़न का केस मानने से इंकार करते हुए इसे सीनियर्स का रैगिंग केस साबित कर दिया. डॉक्टरों के संगठन ने कहा कि पायल रिजर्वेशन की वजह से इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स का शिकार हो गई थी. जबकि सच्चाई यह थी कि 3 अपर कास्ट डॉक्टरों ने एक आदिवासी लड़की को मार दिया क्योंकि वह उनकी बराबरी में खड़ी हो गई थी.
रोहित वेमुला को जनेऊवादी प्रोफेसरों ने राष्ट्रद्रोही कहा. पायल तड़वी को जनेऊवादी डॉक्टरों ने रिजर्वेशन वाली कहा. साहिल वाकोडे को जनेऊवादी प्रोफेसर ने चीटर और लोअर कास्ट कहा. तीनों में सिस्टम का पैटर्न और रिएक्शन एक सा ही है. रोहित, पायल और साहिल जैसे स्टूडेंट्स की मौत को डिप्रेशन कहना आसान है क्योंकि अगर इंस्टीट्यूशनल मर्डर मान लिया जाएगा तो VC को, मिनिस्टर को, प्रोफेसर को जेल भेजना पड़ेगा और भारत में जनेऊवादी सिस्टम अपने लोगों को जेल नहीं भेजता, वह निचली जाति वाले को फांसी पर लटका देता है.
असल में मेरिट का मतलब पैसा है. कोटा, दिल्ली और मुंबई में कोचिंग का पूरा रैकेट धड़ल्ले से चलता है. 2 साल में 20 लाख खर्च करने वाला ही IIT पहुंचता है. बेगूसराय, मैनपुरी और यवतमाल के किसान का बेटा जब IIT पहुंचता है तो उसे मेरिट के नाम पर रोज नीचा दिखाया जाता है. वह अकेला पड़ जाता है. कोई काउंसलर नहीं, कोई मेंटर नहीं. सिर्फ एक प्रोफेसर होता है जो खुद कपड़ों में जनेऊ छुपा कर यूनिवर्सिटी में बैठा होता है. साहिल वाकोडे की मौत चीटिंग से नहीं हुई. वह जनेऊ सिस्टम, मेरिट के धर्म और इंस्टीट्यूशनल साइलेंस का शिकार हुआ है इसलिए यह सुसाइड नहीं, इंस्टीट्यूशनल मर्डर है.




