Hindi Story. विकास ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे सबकुछ छोड़ कर भागना पड़ेगा. दुबई की चमचमाती इमारतों के बीच उस ने अपने सपनों का एक छोटा सा संसार बना लिया था. एक अच्छी नौकरी, सलीके की जिंदगी और भविष्य के सुनहरे ख्वाब… सबकुछ ठीक चल रहा था.

फिर अचानक दुनिया बदल गई. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने देखते ही देखते युद्ध का रूप ले लिया. खाड़ी देशों में डर का माहौल फैल गया. कंपनियां बंद होने लगीं, फ्लाइट्स अनिश्चित हो गईं और लोगों को अपनेअपने देश लौटने की सलाह दी जाने लगी.

विकास की कंपनी ने भी एक दिन अचानक ईमेल भेज दिया, ‘औपरेशन्स अनिश्चितकाल के लिए बंद किए जा रहे हैं.’

कुछ ही दिनों में विकास ने अपना कमरा खाली किया, जरूरी सामान समेटा और एक भीड़ भरी फ्लाइट में बैठ कर भारत लौट आया.

भारत आना आसान था, लेकिन यहां टिकना मुश्किल. शुरुआत के कुछ दिन तो अपने शहर की मिट्टी ने उसे सुकून दिया. मां के हाथ का खाना, अपने कमरे की दीवारें… सबकुछ अपनापन दे रहा था, लेकिन 2 हफ्ते बीततेबीतते हकीकत सामने आने लगी.

नौकरी पाना आसान नहीं था. 2 महीने गुजर गए. बैंक बैलेंस धीरेधीरे खत्म होने लगा. दुबई में जोकुछ जमा किया था, वह अब रोजमर्रा के खर्च में पिघल रहा था. घर में किसी से कुछ कहना उसे अच्छा नहीं लगता था. विकास अब भी सुबह तैयार हो कर ऐसे निकलता जैसे किसी बड़े औफिस में जा रहा हो. असल में वह इंटरव्यू के पीछेपीछे भटक रहा था.

ए क दिन विकास एक कंपनी से बुलावा आया. इंटरव्यू दूसरे शहर में था. जेब में पैसे बहुत कम थे, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी थी. उस ने टिकट के लिए स्लीपर क्लास चुनी, और बाकी खर्च बचाने के लिए रात का सफर किया. सुबह जब वह स्टेशन पहुंचा, तो उस के पास बस इतने पैसे बचे थे कि वापसी का टिकट लिया जा सके या दिनभर का खर्च चलाया जा सके.

विकास ने खुद से कहा, ‘‘पहले मौका पकड़ो, फिर बाकी देखेंगे.’’

स्टेशन के बाहर विकास ने आटोरिकशा नहीं लिया. मोबाइल में मैप देखा… औफिस 3 किलोमीटर दूर था. वह पैदल ही चल पड़ा.

धूप तेज होती जा रही थी, लेकिन विकास ने अपनी चाल नहीं धीमी की. हर कदम के साथ उस के अंदर एक जिद जाग रही थी, ‘मुझे  हारना नहीं है.’

औफिस पहुंच कर विकास ने वाशरूम में खुद को ठीक किया. पसीना पोंछा, शर्ट सीधी की, बाल संवारे और चेहरे पर वही आत्मविश्वास ओढ़ लिया, जो अब उस की सब से बड़ी पूंजी था. रिसैप्शन पर बैठ कर वह इंतजार करने लगा.

भूख धीरेधीरे अपना असर दिखाने लगी थी, लेकिन विकास ने पानी पी कर खुद को संभाला. आसपास बैठे लोगों को देख कर वह अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा था कि कौन सच में जरूरतमंद है और कौन सिर्फ बेहतर मौके की तलाश में. फिर उसे अहसास हुआ कि शायद सब उस की ही तरह हैं, बस कोई दिखा नहीं रहा.

इंटरव्यू के दौरान विकास ने पूरी ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ जवाब दिए. उस ने अपने अनुभव, अपनी गलतियां और अपने संघर्ष… सबकुछ खुल कर बताया.

बाहर निकलते समय विकास को नहीं पता था कि उसे नौकरी मिलेगी या नहीं, लेकिन एक अजीब सी शांति उस के अंदर थी…

वापसी का सफर अब भी बाकी था. जेब में बचे पैसों से विकास ने सिर्फ एक कप चाय ली. भूख अब तेज हो चुकी थी, लेकिन उस ने खुद को रोका.

‘घर पहुंच कर खा लूंगा,’ यह सोच कर विकास प्लेटफार्म पर बैठ गया. उस के पास समय था और सोचने के लिए बहुतकुछ.

विकास को याद आया दुबई का वह दिन, जब वह औफिस की खिड़की से बाहर देखता हुआ भविष्य की योजनाएं बना रहा था और आज… वह उसी भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा था.

ट्रेन आई. विकास स्लीपर कोच में चढ़ गया और अपनी सीट पर बैठ गया. रात गहराने लगी. हवा में हलकी ठंडक थी.

विकास ने आंखें बंद कीं और खुद से कहा, ‘‘जिंदगी ने मुझे पीछे जरूर धकेला है, लेकिन खत्म नहीं किया.’’

अगली सुबह जब विकास घर पहुंचा, तो थकान उस के शरीर में थी, लेकिन आंखों में एक नई चमक थी. मोबाइल औन किया तो एक ईमेल उस का इंतजार कर रहा था, ‘‘आप को अगले राउंड के लिए शौर्टलिस्ट किया गया है.’

विकास हलके से मुसकराया. संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था, लेकिन रास्ता बंद भी नहीं था.

विकास जानता था… जब तक इनसान कोशिश करता रहता है, तब तक जिंदगी कहीं न कहीं उस के लिए एक दरवाजा खुला रखती है. Hindi Story

–प्रज्ञा पांडेय मनु

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