Manoranjak Kahanhi. छमिया ने गीले कपड़े निचोड़ कर छत पर बंधे तार पर डालने के लिए नजर उठाई, तो भरेभरे बदन के सांवले श्यामू को अपनी ओर ताकते पाया.
हालांकि छमिया के देखने पर श्यामू थोड़ा असहज जरूर हुआ और उस ने अपने बालों को इस तरह झटका दिया, जैसे उस की नजर अभी छमिया पर है और वह उस से नजरें हटा भी रहा है, मगर सच बात की चुगली उस की झेंपी नजरें कर रही थीं.
छमिया की जिन झील जैसी आंखों में डूबने को मन उतावला था, उन की एक हिलोर ही श्यामू को मेमना बना गई थी. भरेपूरे बदन पर जवानी का वसंत खिलाए छमिया ने तो उस से कुछ कहा भी नहीं था, पर श्यामू चाहने पर भी उसे दोबारा देखने की हिम्मत न जुटा सका.
वह तो कहो, अकेलेपन से ऊबी छमिया ने ही बात संभाल ली और कहा, ‘‘तुम तो लड़कियों की तरह शरमाते हो. अरे, मुझे ही देख रहे थे न? कोई बात नहीं. अब मुंह क्यों छिपाते हो?’’
गांव में इतनी खुली हंसी हंस कर ऐसी बात कहने वाली औरत के बारे में श्यामू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. वह तो शहर से इम्तिहान दे कर आया था और गांव में बोरियत से बचने के लिए शाम को छत पर बैठ गया था. पास के मिले घर की छत पर आई छमिया पर उस की नजर पड़ गई और पहली नजर में ही उस के मन की हालत जाने क्याक्या होने लगी.
छमिया की बात ने श्यामू को कुछ भरोसा दिया. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘म…म… मैं ने सोचा कि तुम बुरा मान गई हो.’’
‘‘यह लो, सालभर बाद तो तुम नजर आए और मैं बुरा मान कर बैठ जाऊं. फिर बुरा किस बात का? हम लोग तो देवरभाभी ठहरे, जिन में हंसीमजाक होता ही रहता है. तुम्हारा नाम जरूर श्यामू है, पर तुम में कृष्ण वाले कोई गुण नहीं हैं. हां, राधा की तरह शरमाते जरूर हो,’’ छमिया श्यामू को निगाहों में तौलते हुए मुसकरा कर बोली.
‘‘कृष्ण बनूंगा तो किसी गोपी की भी जरूरत पड़ेगी न,’’ किसी तरह हिम्मत बांध कर श्यामू कह गया.
‘‘क्या इतने बड़े इलाहाबाद में तुम्हें कोई गोपी ही नहीं मिली?’’ छमिया की आंखें मुसकरा रही थीं और देह में मस्ती दिख रही थी.
‘‘अगर मिली होती, तो तुम्हें क्यों ताकता?’’ छमिया के खुलेपन ने श्यामू को ढीठ बना दिया था.
‘‘तो कब आ रहे हो माखनदही चुराने?’’ यह कहते हुए छमिया की आंखों में न्योता था.
पासपड़ोस के लोग ज्यादा दिनों बाद गांव आते हैं, तो घरघर में उन का मेहमान जैसा स्वागत होता है. वैसे तो श्यामू भले ही न जाता, पर अब तो जाना उस के मन की मजबूरी बन गया.
‘‘दहीमाखन के बजाय चाय ही मिल जाए, तब आ जाऊं,’’ कह कर श्यामू मुसकरा उठा. उस के चेहरे पर हसरत बरस रही थी.
‘‘तो अभी आ जाओ, लेकिन दरवाजे से आना, ताकि तुम्हारी चाची कुछ और न सोचने लगें. अभी वे दरवाजे पर अन्ना दीदी को बैठा कर गई हैं. जैसे मैं अकेली रहूंगी, तो भाग जाऊंगी,’’ छमिया हंसी, तो श्यामू रीझ कर रह गया.
छमिया का पति सुशील 7 साल से बाहर कमाई कर रहा था. यही देख कर तो छमिया की मां ने कहा था, ‘बेटी राज करेगी, लड़का बड़ा कमाऊ है.’
मां की बात तो ठीक थी. सुशील ठेके पर काम ले कर अच्छी कमाई कर के घर बनवाने के अलावा 2 एकड़ खेत भी खरीद चुका था. दरवाजे पर 2 भैंसें भी बंधी थीं. जब वह गांव आता, तो छमिया के लिए बढि़या कपड़े और छोटामोटा जेवर भी लाता. घर में खानेपीने की कमी नहीं थी. पर पेट के अलावा भी तनमन में कोई भूख जगती है. इस बात को सुशील भले न जानता हो, पर छमिया उस से अनजान नहीं है.
जाड़े की रातें, सावनभादों की झाड़ी, गरमी की लंबी दोपहरें क्या तनमन को बेचैन नहीं करती हैं? पर यह क्या छमिया के कहने की बातें हैं? अंधे के आगे रोने से क्या फायदा?
एक बार तो छमिया ने सुशील से कहा भी था, ‘अब बाहर कमाने की जरूरत नहीं है. यहां खानेखर्चने भर को खेत हैं ही. उन्हीं में पसीना बहाएंगे, तो धरती माता दुखी नहीं रहने देंगी. तुम्हारे बिना अकेला घर काट खाता है.’
‘क्यों, घर में अम्मां और दीदी नहीं रहतीं? चौपाल पर बापू तो रहते ही हैं,’ कहते हुए सुशील हंसा था.
‘तुम हंसते हो. इन सब की नजरें कोतवाल की नजरें हैं. औरत का खयाल रखने वाली नजर तो अपने आदमी की ही होती है,’ छमिया ने गंभीर हो कर कहा था. यह सुन कर सुशील ने उस के गले में अपनी बांहें डाल दी थीं.
सुशील बोला था, ‘घर बैठ कर मैं तुम्हें देखूं और तुम मुझे देखो, तो हो चुकी कमाई. जवानी में कमाया हुआ ही जिंदगीभर काम आता है.’
छमिया का मन हुआ कि कह दे अगर जवानी ही रीती बीत गई, तो कमाई में क्या आग लगाई जाएगी. मगर कह न सकी. उस के मन में आया कि कह दे कि जब और कोई देखने लगेगा, तब तुम्हारी आंखें खुलेंगी.
आज सजीली कदकाठी के श्यामू को देख कर छमिया का मन खुशी से झूमने लगा. वैसे वह बात ही क्यों करती. बातें भी तो इच्छाओं की खिड़कियां होती हैं.
10 मिनट बाद श्यामू ने दरवाजे पर बैठी अन्ना दीदी के पैर छुए और ‘चाचीचाची’ कहता हुआ सीधे आंगन में चला गया. चाची यानी छमिया की सास के बारे में उसे पता था कि वे हैं नहीं, पर बहाने के लिए ही सही, कुछ तो कहना ही था.
छमिया रसोई में पकौड़े तल रही थी. चाय तैयार हो चुकी थी.
श्यामू को अपनी ओर आता देख कर छमिया ने अपने कमरे की ओर इशारा कर दिया.
छमिया का सजाधजा कमरा उस की सुरुचि की गवाही दे रहा था. श्यामू को खुशी हुई. वह कोने में रखी कुरसी पर बैठ गया.
जब छमिया चायनाश्ता ले कर आई, तो वह बोली, ‘‘यह लो, अजनबियों की तरह किनारे बैठ गए. सीधे पलंग पर आ जाओ. यहां तो देवरभाभी ही हैं… है न? इतनी दूरी ठीक नहीं होती है. न आओ, तो मैं बांह पकड़ कर उठाऊं.’’
श्यामू को लगा, अगर उस ने देर की, तो छमिया बांह पकड़ ही लेगी. वह उठ कर पलंग पर बैठ गया.
श्यामू ने पकौड़ों की तारीफ की, तो छमिया बोली, ‘‘मुझे बनाओ मत. अच्छे होते, तो 2 पकौड़ों में ही हाथ न जोड़ जाते.’’
‘‘तुम्हें बनाने की मेरी कूवत कहां है? पर जिस ने बनाया है, फुरसत में बनाया है. फिर तुम्हारे पकौड़े क्यों न अच्छे होंगे?’’ श्यामू ने उस की आंखों में झांक कर कहा.
‘‘सच कहना. तुम्हारे भैया ने तो कभी यह नहीं कहा,’’ लाज की गुलाबी लाली छमिया के गोरे मुंह में घुल कर बिखर गई.
‘‘भैया यही जानते तो बाहर क्यों पड़े होते? हीरे की कदर तो जौहरी ही जानता है,’’ श्यामू ने हंस कर कहा.
बात छमिया के मन में उतर गई. श्यामू इतना प्यारा उसे पहले कभी नहीं लगा था. उस का मन तन को भी पिघला रहा था. पर छमिया बहू थी, जिस पर अपनी नहीं, समाज की बेडि़यां हैं. दरवाजे पर बैठी 40 साल की विधवा ननद की नजरें, सास की नजरें, ससुर की मर्यादा उस के मन की लहरों पर भारी पड़ रही थीं. वह पकौड़े खाना भूल गई थी.
श्यामू ने कहा, ‘‘मेरी बात बुरी लगी हो, तो माफ करना. तुम तो पकौड़े खाना तक भूल गई हो. अब मैं भी नहीं खाऊंगा.’’
श्यामू उठने को हुआ, तो अनजाने ही छमिया ने हाथ पकड़ कर उसे बैठा लिया. अब श्यामू से न रहा गया. उस ने छमिया के मुंह में पकौड़ा ठूंसते हुए कहा, ‘‘तुम न खाओगी, तो मैं भी नहीं बैठूंगा.’’
छमिया को मुंह खोलना पड़ा. एक पल में बेतकल्लुफी बढ़ गई और वह श्यामू की ओर ऐसे अपनेपन से देखने लगी, जिस का अनुभव श्यामू ने सारी जिंदगी नहीं किया था. उसे लगा कि ऊपर से सुखी छमिया भाभी के मन में जाने कितनी सावनभादों की घटाएं हैं, जो बरसने को बेचैन हैं.
श्यामू को जाना अच्छा नहीं लग रहा था, पर छमिया की मर्यादा की खातिर उठने लगा, तो कमरे के दरवाजे तक आई छमिया ने कहा, ‘‘रात 11 बजे आना. मेरे कमरे की कुंडी खुली रहेगी. और हां, छत पर पैर न रखना. मुंडेरमुंडेर ही आना, नहीं तो दारोगा साहब यानी तुम्हारी दीदी कुत्ते की नींद सोती हैं, तूफान मचा देंगी,’’ उस ने श्यामू का हाथ पकड़ लिया.
श्यामू ने अपनी बांहें उस के गले में डाल कर आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘और अगर दीदी अपने बाहरी कमरे का दरवाजा खोल कर आंगन में इधरउधर झांकीं तो?’’
‘‘इतना डरते हो? आंगन की तरफ से कुंडी बंद कर लूंगी. वे बाहर भले ही चली जाएं, अंदर आने का रास्ता ही न रहेगा,’’ छमिया ने श्यामू का शक दूर करते हुए उसे विदा किया.
कई दिन बीत जाने पर अन्ना दीदी को लगा कि छमिया आजकल बहुत खिली सी रहती है. खानेपीने की चीजें अच्छी बनती हैं. उन की कुटिल बुद्धि ने सोचा कि हो न हो, दाल में कुछ काला है. उन्हें लगा कि श्यामू के आने के बाद से ही यह बदलाव हुआ है. वह पता लगाएंगी. यों भी उन्हें नींद कम ही आती थी, पर उस रात तो वे सोई नहीं.
रात के 11 बजे अन्ना दीदी को लगा जैसे कोई छत से नीचे उतरा है. वे बोलीं, ‘‘बहू, यह आवाज किस की थी?’’
‘‘बिल्ली कूदी है. दूधमट्ठा खा कर इस पर जवानी चढ़ी है न. दिनभर काम में मरोखपो, बाद में ये नींद में खलल करें,’’ छमिया ने जवाब दिया.
अन्ना दीदी ने चुप रहना ही ठीक समझा. वे ननद हैं, पर मायके पर बहू जैसा उन का हक कैसे होगा. यह बेटे की बहू है, तभी झल्लाती है. होगी बिल्ली, उन्हें क्या? वे तो चोरचकार के मारे बोली थीं.
वे अनमनी हो कर लेट गईं. तब तक उन के कानों में श्यामू की हंसी गूंजी.
वह धीरे से बोला, ‘‘उलटा चोर कोतवाल को डांटे.’’
‘‘कोतवाली सहतेसहते प्राण घुट गए हैं,’’ छमिया की आंखों में आंसू थे.
अब अन्ना दीदी से रहा न गया. उन्होंने कुछ सुना, कुछ न सुना. पर उन के मन का शक बढ़ गया. मरदानी हंसी के होने का शक बढ़ गया. अजीब बात है, दरवाजा उन के कमरे से ही है. कोई है, तो आया कहां से? पूछने पर बहू गुर्राती है.
वे दरवाजा खोल कर खुद नजर डाल लेंगी, इसी सोच से आंगन की ओर का दरवाजा खोला, पर वह खुल न सका. खुलता भी कैसे? छमिया ने उस में कुंडी जो लगा दी थी.
दीदी के दरवाजा भड़भड़ाने पर छमिया बोली, ‘‘दिनभर हाड़ जला कर काम करो, रात में बारबार दरवाजा मुझ से न खोला जाएगा.’’
‘‘तुम ने दरवाजा बंद ही क्यों किया?’’ दीदी ने अपना सब से बड़ा दांव चल दिया.
‘‘अब मैं अपने घर में दरवाजा भी बंद नहीं कर सकती. तुम्हारे कमरे में आ कर आवारा कुत्ते बंद रह जाते हैं. सवेरे उन की गंदगी क्या मेरा बाप साफ करेगा?’’ बात इतने ताव में कही गई थी कि अन्ना दीदी सन्न रह गई थीं.
अब उन के पास यही चारा था कि भाई से कह कर जी हलका करें, ताकि उन पर समय रहते चेताने का दोष न लगे. घर में एक मोबाइल फोन है, वह इन्हीं रानी के पास रहता है. पड़ोस के मोबाइल वालों के मोबाइल पर हर बात कही नहीं जा सकती है.
फिर भी उन्होंने भाई को फोन किया और वह आया भी. दीदी ने उस से अपने कमरे में ही कहासुना भी.
जब त्योरी चढ़ाए सुशील कमरे में घुसा, तो छमिया टपटप आंसू बहा रही थी. वह बोला, ‘‘रोओ नहीं, साफसाफ बताओ?’’
‘‘मेरी मानोगे? मैं तो यहां पराई हाड़ हूं. और तो सब तुम्हारे अपने ही हैं. उन की सुनो. मुझे मेरे मायके छोड़ दो या जहर की गोलियां ला दो. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी,’’ छमिया ने सुशील के गले में बांहें डाल कर कहा. उस की हिचकियां बंध गई थीं.
सुशील सोच में पड़ गया. हो सकता है, दीदी को धोखा हुआ हो, पर इसे दरवाजा तो अंदर से बंद न रखना चाहिए था. वह बोला, ‘‘अच्छा, तुम ने आंगन का दरवाजा अंदर से बंद क्यों किया था?’’
‘‘अब मेरा मुंह मत खुलवाओ,’’ छमिया आंसू पोंछते हुए बोली.
‘‘क्यों, क्या बात है?’’ यह कहते हुए सुशील सकते में आ गया.
‘‘यह जांघ खोलो तो अपनी लाज जाती है, वह खोलो तो…’’ आगे की बात उस ने अधूरी सी छोड़ दी.
‘‘साफसाफ कहो, पहेली न बुझाओ,’’ सुशील सुनने को बेचैन था.
‘‘इन के कमरे में जाने कौनकौन आता है और क्याक्या होता है. यह देखने से अच्छा है, मैं इधर का दरवाजा ही बंद कर लेती हूं. सुनोगे, तो हैरान रह जाओगे. इन का क्या बिगड़ेगा? तुम जेल में होगे या फिर मैं इन्हीं की तरह विधवा हो जाऊंगी. ये तो यही चाहती हैं.
‘‘अब या तो मुझे मायके छोड़ दो या अपने साथ लिए चलो. जिस इज्जत के लिए तुम रातदिन एक किए हो, उस का उछलना मैं न देख सकूंगी,’’ सुशील के गले में बांहें डाल कर सिसकसिसक कर छमिया ने कहा.
सुशील ने अपने हाथों से उस के आंसू पोंछ कर कहा, ‘‘मायके जाने का नाम न लो. यहां तुम्हारे जिम्मे घर की मर्यादा है. मैं खुद अब यहीं रहूंगा, कमाई बहुत हो गई. हराम का खाखा कर झूठमूठ का लांछन लगाने वालों की असलियत मैं भी देखूंगा.’’
दरवाजे की ओट से सबकुछ सुनती अन्ना दीदी के तो होश उड़ गए. वे सोच नहीं पा रही थीं, किस जगह जमीन फटे और वे समा जाएं.
इस ठगिनी के इस ढंग से समझने के बाद क्या सुशील उन की बात सुनेगा या मानेगा? वे खुद अपनी ससुराल के झोपड़े में रहेंगी, लेकिन यह लांछन न सहेंगी. औरत के सामने बकरा बने आदमी से बहस करना बेकार है.
और छमिया सोच रही थी, ‘पहले ही यह अक्ल आ जाती, तो यह नौबत ही क्यों आती. खैर, मैं आगे से श्यामू को मना कर दूंगी. श्यामू कोई मेरा मर्द तो है नहीं, जिस से कोई नाता हो.’ Manoranjak Kahanhi
–मदनमोहन पांडेय




