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आगेआगे बैंडबाजे वाले थे और पीछेपीछे जुलूस की शक्ल में भीड़ चल रही थी. ठाकुर विजय सिंह गले में फूलों के हार डाले बड़ी अकड़ से आगे बढ़ते जा रहे थे.

विजय सिंह पुराने जमींदार थे. वे शहर से सरपंच के चुनाव का नामांकनपत्र भर कर लौटे थे. पंचायत के चुनाव में हर बार ऐसा ही होता था.

ठाकुर विजय सिंह के विरोध में कोई भी खड़ा होने की हिम्मत नहीं करता था और वे बिना मुकाबले के चुन लिए जाते थे.

कभी कोई हिम्मत करता भी, तो वे साम, दाम, दंड, भेद सभी नीतियां अपना कर उसे अपने हक में बैठा लेते थे.

जुलूस पूरे गांव से गुजर कर जब ठाकुर विजय सिंह की खंडहरनुमा हवेली पर पहुंचा, तो उन्होंने एक छोटा सा भाषण दिया, जिस में गांव के लोगों को धन्यवाद देते हुए उन की भलाई और तरक्की के कई वादे किए.

शाम को ठाकुर विजय सिंह गांव के ही अपने कुछ खास लोगों के साथ बैठे शराब पी रहे थे. अचानक उन्हें कुछ याद आया, तो वे हैरानी से बोले, ‘‘दलितों और मुसलिमों के टोले में से किसी ने भी हमारा स्वागत क्यों नहीं किया?’’

‘‘सरकार… वह क्या है… चींटी के पर निकल आए हैं,’’ एक आदमी ने जवाब दिया.

‘‘क्या मतलब?’’ विजय सिंह ने माथे पर बल डालते हुए पूछा.

दूसरे आदमी ने कहा, ‘‘सरकार… दलितों को सरपंची सू  झ रही है. आप जब फार्म भर कर कमरे से बाहर आए थे, तब मैं ने देखा कि मंगलू का लड़का तेजू फार्म भरने अंदर गया था.’’

इतना सुनते ही विजय सिंह ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘बुलाओ उस मंगलू को…अभी उतारता हूं सरपंची.’’

ठाकुर विजय सिंह के पास खड़े मुनीम ने उन्हें शांत करते हुए कहा, ‘‘हुजूर… अभी तो आप जश्न मनाइए, उसे सुबह बुला लेंगे… सारी सरपंची भूल जाएगा.’’

विजय सिंह ने भी अपने गुस्से को दबाते हुए कहा, ‘‘ठीक है मुनीमजी.’’

दूसरे दिन सुबह तकरीबन 10 बजे विजय सिंह का एक नौकर मंगलू को बुला लाया था. उसे देखते ही ठाकुर ने गुस्से से पूछा, ‘‘क्यों रे… तुम लोगों को ज्यादा खाने को मिल रहा है क्या? लगता है कि चरबी ज्यादा ही चढ़ गई है, तभी मेरे खिलाफ खड़े होना चाहते हो?’’

मंगलू ने कांपती आवाज में जवाब दिया, ‘‘सरकार, मेरे लड़के को लोगों ने भड़का दिया है. वे कहते हैं कि जनता का राज है. चुनाव में सब को खड़े होने का हक है… वह नालायक लोगों के बहकावे में आ कर आप के खिलाफ खड़ा हो गया… मैं उसे सम  झा दूंगा.’’

घर पहुंच कर मंगलू ने तेजू को सम  झाया, ‘‘शाम को विजय सिंह ने तु  झे पंचायत भवन में बुलाया है. मेरा कहना मान, तू शहर चला जा. वहीं कोई छोटीमोटी नौकरी कर ले… गांव की राजनीति में मत पड़.’’

पिता की बात सुन कर तेजू ने जवाब दिया, ‘‘बापू, आप बेकार ही चिंता कर रहे हैं. आखिर आप ने मु  झे शहर में पढ़ायालिखाया है… ऐसा कुछ भी नहीं होगा.’’

तेजू पढ़ालिखा और सम  झदार था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे नौकरी की तलाश थी. कई जगह वह अर्जी भी दे चुका था. शाम को वह कई लोगों को पढ़ाता भी था.

बहरहाल, पूरे गांव में यह बात फैल गई थी. शाम को बहुत से लोग पंचायत भवन में पहुंच गए थे. वे देखना चाहते थे कि विजय सिंह तेजू की क्या हालत करते हैं.

विजय सिंह के आते ही सभी लोग खड़े हो गए. उन्होंने कुरसी पर बैठते हुए कहा, ‘‘मंगलू का लड़का तेजू आया है क्या?’’

तेजू ने आगे बढ़ कर उन्हें नमस्कार किया, तो वे ताना कसते हुए बोले, ‘‘आइए… तेजराम सरपंचजी, आइए… आप की हिम्मत कैसे हो गई हमारे खिलाफ खड़े होने की? जरा हम भी तो देखें कि कौन हैं आप के हिमायती?’’

तेजू ने जवाब दिया, ‘‘ठाकुर साहब, मेरे साथ कोई भी नहीं है और इस पूरे गांव में आप के खिलाफ खड़े होने की किसी में हिम्मत भी नहीं है.’’

‘‘फिर तुम ने यह गुस्ताखी किस बूते पर की?’’ विजय सिंह गुस्से में दहाड़े.

‘‘आप की जीत को बल देने के लिए ही मैं ने यह कदम उठाया है.’’ ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘आप हर बार बिना मुकाबले के जीत जाते हैं और आप का विजय जुलूस निकलता है…’’ तेजू ने उन के अहंकार को सहलाया, ‘‘भला उस जीत व जुलूस में क्या दम, क्या मजा, जिस के मुकाबले में ही कोई खड़ा न हुआ हो. आप मु  झे हरा कर विजय जुलूस निकालिए, तब लगेगा कि आप की सही जीत हुई?है.’’

तेजू की बात सुन कर विजय सिंह के चेहरे पर बल पड़ गए. पूरे गांव के सामने उन्हें नंगा कर दिया था. वे अपने गुस्से को दबाते हुए बोले, ‘‘बात तो तुम सम  झदारी की कर रहे हो, पर मुकाबला हमेशा टक्कर का होता है. तुम्हारी औकात क्या है? कौनकौन हैं तुम्हारे साथ? सुन बच्चे, कल जा कर अपना नाम वापस ले लेना… इसी में तुम्हारी भलाई है.’’

तेजू ने फिर उन के अहंकार पर चोट की, ‘‘सरकार, मैं अपना नाम तो वापस ले लूंगा, पर क्या यह मान लूं कि आप मु  झ जैसे अदने से आदमी से भी मुकाबला नहीं कर सकते? वैसे, मैं आप को चुनौती नहीं दे रहा हूं, बल्कि आप की जीत में चार चांद लगाने की कोशिश कर रहा हूं… आगे आप की मरजी.’’

विजय सिंह ने लापरवाही से कहा, ‘‘ठीक है, जाओ और लगा लो अपना दमखम. जब तुम ने अपनी जमानत जब्त कराने का फैसला कर ही लिया है, तो यही सही.’’

दलित और मुसलिम टोले ने बैठक कर के तेजू को अपनी एक दिन की मजदूरी देने का फैसला किया.

विजय सिंह अपनी हवेली में बैठ कर ही अपने प्रचार की अगुआई करने लगे.

एक दिन उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से पूछा, ‘‘तेजू गांव में ही है या भाग गया?’’

एक कार्यकर्ता ने जवाब दिया, ‘‘है तो वह गांव में ही… और जम कर प्रचार भी कर रहा है. हुजूर, आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं.’’

विजय सिंह उस की बात सुन कर सोचने लगे, फिर बोले, ‘‘जाओ, जरा मुनीमजी को भेजो.’’

कुछ देर बाद मुनीमजी उन के सामने हाजिर हो गए, तो उन्होंने कहा, ‘‘तेजू को चुपचाप जा कर बोलो कि हम उस से मिलना चाहते हैं. वह अकेला ही हवेली में आए.’’

जब मुनीम ने तेजू को बताया कि विजय सिंह उस से अकेले में मिलना चाहते हैं, तो उस के साथियों ने मना कर दिया कि वह अकेला न जाए. पर तेजू ने कहा, ‘‘चिंता मत करो, विजय सिंह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता.’’

तेजू हवेली में पहुंचा, तो विजय सिंह ने उठ कर उस का स्वागत किया और अपने पास बैठाया, फिर मुनीम से बोले, ‘‘जरा वे कागजात देना.’’

मुनीम ने पहले से अपने पास रखे कागजात उन्हें थमा दिए.

विजय सिंह ने वे कागजात तेजू को देते हुए कहा, ‘‘ये कागजात तुम्हारी जमीन के हैं, हमारे पास गिरवी रखे थे… हम तुम्हारा कर्ज माफ करते हैं… बस, अब हमारे हक में बैठ जाओ.’’

तेजू ने कागजात लेते हुए जवाब दिया, ‘‘सरकार… ये कागजात तो मेरी जमीन के हैं. बाकी गांव वालों के भी जो कागजात आप के पास हैं वे सब भी मु  झे दे दें… मैं आप के हक में बैठ जाऊंगा.’’

‘‘तुम अपनी देखो, औरों की छोड़ो. कामयाब राजनीतिबाज वही होता है, जो सब से पहले अपना भला देखता है.’’

‘‘पर अब देर हो गई है. गांव के लोगों ने मु  झ में अपना विश्वास जताया है. अपनी जमीन की खातिर मैं उन के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता…’’ तेजू कागजात वापस करते हुए बोला, ‘‘अगर देने हैं तो सभी के कागजात दे दो, वरना ये कागजात भी अपने पास रखो,’’ इतना कह कर वह चला गया.

मुनीम ने कहा, ‘‘हुजूर, आप ने उसे ऐसे ही जाने दिया.’’

‘‘मुनीमजी, वह नहीं बिका तो कोई बात नहीं, गांव के लोगों को खरीदना मुझे आता है.’’

चुनाव प्रचार के आखिरी दिन विजय सिंह ने अपने कार्यकर्ताओं से कह कर शराब की दुकान से कई बोतलें मंगवा लीं, फिर नशे में   झूमते हुए बोले, ‘‘जाओ, ये बोतलें दलित टोले में पहुंचा दो… और रात ही रात में हर घर की छत पर हमारे   झंडे लग जाने चाहिए.’’

दूसरे दिन सुबह विजय सिंह ने अपनी हवेली से देखा कि गांव के तकरीबन हर घर की छत पर उन के   झंडे लग चुके थे. वह मन ही मन खुश हुए, ‘अब देखता हूं तेजू के बच्चे, तू कैसे जीतता है?’

गांव के सभी लोगों ने मतदान में बढ़बढ़ कर हिस्सा लिया. हवेली में जीत के जश्न की तैयारी होने लगी.

दूसरे दिन चुनाव का नतीजा आने वाला था. विजय सिंह नतीजा जानने के लिए शहर जाने की तैयारी कर रहे थे कि अचानक मुनीम ने आ कर बताया, ‘‘सरकार, दलितों के टोले से एक बैलगाड़ी आई है… और साथ में यह चिट्ठी भी…’’

‘‘क्या लिखा है चिट्ठी में, जरा पढ़ कर बताओ?’’ विजय सिंह ने कहा.

मुनीम चिट्ठी पढ़ने लगा :

‘ठाकुर साहब,

‘आप की शराब की बोतलें हम वापस भेज रहे हैं. इन्हें हम ने छुआ भी नहीं है. हम जानते हैं कि आप ने तेजू को खरीदने की काफी कोशिश की थी, पर वह हमारी खातिर नहीं बिका और हम भी आप की बोतलों से बिकने वाले नहीं हैं. तेजू ने हमारा स्वाभिमान जगा दिया है…’

इतना सुनते ही विजय सिंह पास रखी कुरसी पर बैठ गए. वह जान चुके थे कि उन की हार तय है.          Social Story

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