Power of Hard Work. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की 19 साल की भावना का भगवान में इतना ज्यादा विश्वास था कि वह अपना हर छोटाबड़ा काम मंदिर जा कर ईश्वर की सलाह से करती थी. कई बार तो वह परची निकालती थी कि यह काम करना चाहिए या नहीं. वैसे वह पिछड़ी जाति की है जिनके पुरखों ने मंदिरों में घुसने की भी हिम्मत नहीं की थी पर अब वह समझाती है कि ऊंची जातियों के लोग अमीर हैं क्योंकि भगवान उन की पूजा से प्रसन्न हैं. वह भी ऊंची जातियों से बढ़ कर पूजापाठ कर रही है.
एक बार भावना के छोटे भाई नीरज का 12वीं का रिजल्ट आना था तो उस ने मंदिर जा कर यह पूछा कि आज वह क्या कपड़े पहने कि उस के भाई के अच्छे नंबर आ जाएं? वहां एक पंडित बता दिया कि लाल रंग का सूट पहन ले काम बन जाएगा.
नीरज पढ़ाई में होशियार था, तो अच्छे नंबर आने थे, पर चूंकि भावना ने मंदिर में भगवान से पंडित के मार्फत किए वार्तालाप के मुताबिक लाल रंग का सूट पहना था तो उसे यह भरोसा हो गया कि ईश्वर से उस की डायरैक्ट बात होती है और वह कुछ भी कर सकती है. इंटरव्यू में सब जने सादे प्रैस किए शर्टपैंट पहन कर आए थे और नीरज लाल रंग के सूट में जोकर लग रहा था. वह रिजैक्ट हो गया.
क्या पूजापाठ और मंदिर जाने से भावना का भाग्य इतना ज्यादा बदल जाता था कि वह हर काम में कामयाब हो रही थी? नहीं. इस के उलट भाग्य के पीछे भागने वाली लड़की ‘इंतजार’ करती है, जबकि मेहनत के पीछे भागने वाली लड़की ‘इतिहास’ बनाती है.
ऐसा ही कुछ हाल दिल्ली की रहने वाली मोना का था. सुबहशाम नंगे पैर मंदिर जाना, पूरे मन से आरती करना. सोमवार को शिव के नाम का उपवास करना. वजह, मोना की उम्र 27 साल हो गई थी और मंदिर के पुजारी का कहना था कि सोलह सोमवार का उपवास करने से उसे मनचाहा वर मिल जाएगा. वह खेतों में काम करने वाले घर से थी, इसलिए वह नंगे पैर चल भी सकी थी. ऊंची जातियों की लड़कियां तो बैड से बाथरूम तक बिना चप्पल के नहीं जा सकतीं.
मोना ने सिर्फ 12वीं तक पढ़ाई की थी और वर चाहती थी कोई सरकारी नौकरी वाला. पर वह खुद को इतना ज्यादा आस्थावान मानती थी कि पूजापाठ से उस के सारे दुखदर्द दूर हो जाएंगे.
क्या होता है भाग्य के पीछे भागने से
धर्म के सारे कर्मकांड हमें कर्म से दूर ले जा कर भाग्य के भरोसे छोड़ देते हैं. जब हमारा कोई काम नहीं बनता है तो पंडेपुजारी के पढ़ाए पाठ से ‘मेरा भाग्य ही खराब है’ बोल कर हम कंट्रोल किसी और को दे देते हैं, जैसे पंडित, तारीख, कुंडली. इस से खुद पर से भरोसा हट जाता है.
जब हम पूजापाठ में लीन होते हैं तो 1-2 घंटे के इस समय में हमारा सारा ध्यान ‘मेरा कब अच्छा दिन आएगा’ सोचने में ही निकल जाता है, जबकि उसी समय में अगर कोई स्किल सीख लिया जाए, तो ज्यादा बेहतर रहता है.
पूजापाठ करने और भाग्यवादी होने से धीरेधीरे यह मन में यह सवाल उठने लगता है कि ‘अगर भाग्य साथ न दे तो?’ यह सोच हिम्मत तोड़ देती है. नतीजतन, लड़की रिस्क नहीं लेती, किसी नए काम को सीखने की ट्राई ही नहीं करती.
लोग फायदा उठाते हैं
धर्म का डर दिखा कर लड़कियों को दिमागी तौर पर कुंद करने के हजार तरीके हैं. सब से ज्यादा उन की शादी को ले कर मनोवैज्ञानिक खेल खेला जाता है. जैसे, ‘‘बेटा, तुम्हारी शादी में अड़चन है, एक पूजा करवा लो, फिर सारे संकट दूर.’’
कहने का मतलब है कि भाग्य के नाम पर लड़कियों को सब से ज्यादा डराया जाता है. नजर न लगे तो एक पैर में काला धागा बांध लो, लड़का नहीं मिल रहा तो रत्नजड़ी अंगूठी पहन लो, बस ऐसे ही टोटकों का इस्तेमाल कर लड़कियों को भाग्यवादी और पूजापाठी बना दिया जाता है.
मेहनत क्यों जरूरी
पहली नजर में ऐसा लगता है कि भाग्य वाली सोच मेहनत वाली सोच से बेहतर होती है और ज्यादातर लड़कियां ऐसा मान भी लेती हैं. लेकिन ‘मिलेगा तो ठीक’ से ‘मैं ले कर रहूंगी’ तक का सफर इतना भी मुश्किल नहीं होता है. बस लड़कियों को अपना भविष्य बनाने का 4 पिलर वाला फार्मूला नहीं भूलना चाहिए.
इस का पहला कदम है खुद को मजबूत बनाना. यह मजबूती पढ़ाई के बेस, एक्स्ट्रा स्किल और ‘न’ बोलना सीखने से आएगी. दूसरा कदम है अपने पैरों पर खड़ा होना. अच्छी पढ़ाई से बढि़या नौकरी मिलती है और बढि़या नौकरी पैसे दिलाती है. पैसा आप को आजाद होने का एहसास देता है.
तीसरे कदम की खासीयत है कि काम से आप को नाम और पहचान मिलती है. इस से आप को फैसला लेने की ताकत बढ़ जाती है. जब यह सब हो जाए तो चौथा कदम है दूसरों की मदद करना. उन्हें पढ़ाई और काम की अहमियत समझाना, पूजापाठ से दूर रहने की सलाह देना. मतलब, जब तुम कुछ बन जाओ, तो 2 लड़कियों को नौकरी दिलाओ या स्किल सिखाओ.
पिछले कुछ सालों में पूजापाठ बढ़ा
लड़कियों पर धर्म के ठेकेदारों का पहरा हमेशा रहा है, पर पिछले कुछ सालों से धर्म को ग्लैमराइज करने की कोशिश की गई है. अब धार्मिक जगहें ही नहीं, बाजार भी धर्म का प्रचारक बन गया है.
सोशल मीडिया ने भी हर छोटे से छोटे त्योहार को बड़ा बना कर नौजवान पीढ़ी को टारगेट किया है. धार्मिक अंधविश्वास को बढ़ाने वाली जूलरी लड़कियां खूब खरीद रही हैं. यह सारा भ्रमजाल सरकार के उकसावे पर खूब फलफूल रहा है. नतीजतन, नौजवान पीढ़ी को लगता है कि ऊपर वाले से सही समय पर मौका मिलेगा और उन का भाग्य जाग जाएगा.
पर याद रखिए कि मौका अपनेआप नहीं आता है. मेहनत और स्किल से हम मौका खुद बनाते हैं. पूजापाठ हमें भाग्यवादी बनाता है, जिस की कोई जरूरत नहीं है. Power of Hard Work




