Family Story. कोरोना ने भुवन रावत और उन के परिवार को चंड़ीगढ़ से दोबारा उन के पहाड़ी गांव में पहुंचा दिया. वहां भुवन ने दूध का धंधा किया जिस में उन के दोस्त भोला ने काफी मदद की. इस बीच भोला और उर्मिला नजदीक आ गए. आगे क्या हुआ?

औरत हमेशा आदमी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की कोशिश करती है. कितनी भी मुसीबतें आ जाएं वह उस की हिम्मत बनाए रहती है. वह अपने आदमी को हारते हुए देखना नहीं चाहती.

वह औरत हिम्मत, साहस और संघर्ष का प्रतीक है. वह अपने परिवार रूपी घोंसले को कभी भी टूटते हुए देखना नहीं चाहती. इस के लिए कुदरत ने उसे कला कौशल प्रदान किए हैं और इन्हीं कलाओं से वह अपने नीड़ को संवार कर रखती है.

फिर भी कुछ अलग कहानी बन ही जाती है, इसीलिए शायद कहते हैं कि कुदरत के खेल निराले होते हैं, इनसान की सोच से भी परे. शायद यही कुदरत का वह रहस्यमयी चेहरा है, जिसे इनसान सदियों से पढ़ने की कोशिश में लगा है.

पौड़ी गढ़वाल में एक छोटा सा कसबा है बैजरो. पहाड़ों के बीच और एक छोटी नदी के दोनों किनारों पर बसा सुंदर सा कसबा. उसी कसबे के थे भुवन रावत और उन की पत्नी थी उर्मिला रावत. अब भुवन रावत चंडीगढ़ में अपने परिवार के साथ रहते थे.

चंडीगढ़ में रहते उन्हें लगभग 10 साल हो गए थे. वहां एक जानीमानी कंपनी में वे जूनियर इंजीनियर थे. उन की पत्नी उर्मिला ने भी एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करनी शुरू कर दी थी. वह जूनियर स्कूल के बच्चों को पढ़ाती थी. दोनों पतिपपत्नी अभी 38 और 35 साल के थे और उन के 3 बच्चे थे.

भुवन रावत का परिवार साल में 1-2 बार बैजरो हो आता था, जहां भुवन के बुजुर्ग मातापिता और सगेसंबंधी रहते थे.

चंडीगढ़ में भुवन रावत का परिवार आराम से किराए के फ्लैट में रह रहा था. उन की जिंदगी में कोई खास परेशानी नहीं थी. वर हर महीने अपने बुजुर्ग मातापिता को खर्चा भी भेज देते थे, लेकिन मुसीबतें कभी भी बता कर नहीं आतीं.

ऐसे ही दबे पांव कोरोना आया. बड़ेबड़े ज्योतिष, भविष्यवक्ता और वैज्ञानिक भी इस के बारे में सटीक भविष्यवाणी और आकलन न कर सके. भ्रामक जानकारियां आती रहीं और कोरोना किसी भयंकर आदमखोर की तरह इनसानों को निगलने लगा. लकड़बग्घों के मजबूत जबड़ों की तरह नौकरियों और कामधंधों को चबाने लगा. सब तरफ आफत की मार.

आखिरकार एक दिन भुवन रावत की कंपनी वालों ने भी उन से इस्तीफा लिखवा लिया. उर्मिला को तो स्कूल वालों ने बिना किसी औपचारिकता के ही घर बैठा दिया.

देशदुनिया में कहीं भी कुछ हो सब से पहले गाज स्कूलों पर ही गिरती है. स्कूल बंद, स्कूल बंद और स्कूल बंद. शिक्षा को सरकारों ने तमाशा बना कर रख दिया है.

भुवन और उर्मिला की नौकरी गई तो फ्लैट का किराया भरना भी मुश्किल लगने लगा. जमापूंजी तिनकों की तरह उड़ने लगी. लोकडाउन की अनिश्चितता ने भुवन जैसे लोगों को कहीं का नहीं छोड़ा.

भुवन ने कुछ कंपनियों में अपना बायोडाटा भेजा था, लेकिन उन्हें जल्दी ही मालूम हो गया कि कहीं से कोई जवाब आने वाला नहीं.

कंपनियां धड़ाधड़ कर्मचारियों की छंटनी कर रही थीं. बचेखुचे कर्मचारियों से कमरतोड़ ‘वर्क फ्रोम होम’ करवाया जा रहा था. फिर ऐसे समय में उन्हें कौन नौकरी देता?

आखिरकार भुवन ने भी परिवार सहित अपना बोरिया बिस्तर बांधा और मौका देख कर बैजरो जाने की राह पकड़ी. जैसेतैसे वे सब बैजरो पहुंचे, लेकिन इस बार वहां आने में बड़ा फर्क था. जब आप के पास नौकरी होती है तो आप का रुतबा और सम्मान होता है, समाज आप पर गर्व करता है, लेकिन जैसे ही आप की नौकरी जाती है, समाज की नजर भी बदल जाती है. आप दीनहीन से हो जाते हैं.

यही भुवन के साथ हुआ. हर कोई उन से नौकरी खोने के बारे में पूछता और फिर पीठ पीछे उन का मजाक उड़ाया जाता, लेकिन भुवन को तो सब से अधिक चिंता रोजीरोटी के जुगाड़ की थी. पेट भरा हो तो फिर आदमी कुछ और सोच सकता है.

पहाड़ की खेती अब भुवन के बस की बात नहीं थी. कई सालों से उन के खेत बंजर पड़े थे. उन को खेती लायक बनाने में ही बड़ी लागत आने वाली थी. फिर बीज, खाद आदि का खर्चा और उस के बाद बारिश होने का इंतजार. पहाड़ों में सिंचाई के लिए नलकूप तो होते नहीं कि स्विच औन किया और सिंचाई शुरू. वहां की खेती तो आज भी बारिश भरोसे ही है. बारिश न हो तो फसल ही सूख जाए. बारिश समय पर हो जाए तो फसल आने का लंबा इंतजार.

भुवन ने रोजीरोटी कमाने के दूसरे औप्शन भी सोचे, लेकिन उन्हें कुछ भी सही नहीं लगा. तनाव और चिंता की लकीरें उन के चेहरे पर साफ नजर आ रहीं थीं. तब एक रात सोते समय उन की पत्नी उर्मिला ने उन से पूछा, ‘‘क्यों जी, आप इतने परेशान क्यों हैं?’’

‘‘उर्मिला, परेशान न होऊं तो क्या होऊं? अब पैसा ही नहीं बचा. सब तो लोकडाउन में चंडीगढ़ में ही स्वाह हो गया. यह भी भरोसा नहीं कि यह लोकडाउन कब खत्म होगा? हम चंडीगढ़ पहले ही छोड़ देते तो अच्छा होता. कुछ पैसे तो हमारे हाथ में होते.’’

‘‘लेकिन इस में आप की क्या गलती? किसे पता था कि लोकडाउन खत्म ही नहीं होगा. रेलों तक का तो चक्का जाम हो गया.’’

‘‘हां, वह तो है उर्मिला. गलती तो किसी की नहीं. सरकार भी उलझन में है कि लोकडाउन खत्म करे कि नहीं. जो भी हो खानेकमाने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा. मैं तो चाय की दुकान ही खोल लेता लेकिन यहां तो पर्यटक ही नहीं आते. गिनेचुने औफिस हैं, वे भी बंद ही चल रहे हैं.’’

उर्मिला जानती थी कि समस्या अनिश्चित और विकराल है और भुवन परेशान हैं. उस ने भुवन को अपने आगोश में लेते हुए और उस के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘तुम ज्यादा चिंता मत करो जी, सब ठीक हो जाएगा.’’

इस के बाद दोनों प्यार की दुनिया में समा गए. उर्मिला जानती थी कि दुख को हरने की सब से अच्छी दवा सैक्स ही है. इस के बाद भुवन तो गहरी नींद सो गया लेकिन उर्मिला परिवार को संबल देने के बारे में सोचने लगी और उसे तब तक नींद नहीं आई जब तक कि वह एक फैसले पर नहीं पहुंच गई.

सुबह को उठ कर उर्मिला ने अपने मायके थैलीसैंण फोन लगाया और अपने पिता से पूछा, ‘‘बाबूजी, आप की दूध, दही और पनीर की दुकान है. कुछ टिप्स बताओ, हम भी लोकडाउन खत्म होने तक यही काम करने की सोच रहे हैं.’’

फिर उर्मिला के पिता ने उसे सारी बातें अच्छे से समझा दीं. उर्मिला ने अपनी योजना भुवन से सांझा की. वे खुश हो कर बोले, ‘‘अरे वाह उर्मिला, यह काम तो बहुत सही रहेगा. इस में ज्यादा पैसा भी नहीं लगाना पड़ेगा और अलग से दुकान भी नहीं खोलनी पड़ेगी. बाहर वाले कमरे में जो गली की ओर खुलता है, वहीं से यह काम शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘हां, लेकिन आप को एक काम करना होगा.’’ ‘‘वह क्या? बोलो?’’ ‘‘तुम को किसी दूध वाले को तलाशना होगा जो सही दाम में दूध दे दे और पैसों के लिए एकदम से तकादा न करे.’’

‘‘तुम इस की चिंता मत करो उर्मिला. मैं 2-3 ऐसे दूध वालों को जानता हूं जो सही रेट में अच्छा दूध दे देंगे और पैसों के लिए एकदम से तकादा भी नहीं करेंगे.’’

भुवन का बचपन का दोस्त था भोला जो अब दूध का काम करता था. भुवन की बात सुन कर उस ने कहा, ‘‘भुवन यार, तू चिंता मत कर. तू तो अपने बचपन का साथी है. मैं तुझे दूध भी अच्छा ला कर दूंगा और अपनी जानपहचान वालों को बता कर तेरा दही और पनीर का काम भी चलवा दूंगा. हिसाबकिताब तू सप्ताह भर बाद कर दिया करना. हमारी बचपन की दोस्ती किस दिन काम आएगी…’’

अगले दिन से ही भोला ने भुवन के घर दूध देना शुरू कर दिया. उर्मिला उस दूध से दही जमाती और पनीर तैयार करती. क्वालिटी का पूरा ध्यान रखती. धीरेधीरे यह काम चल निकला. कौन सा घर था जहां दही और पनीर की जरूरत नहीं थी… यह काम चूंकि घर और गली में हो रहा था, तो पुलिस की नजर भी नहीं पड़ती थी.

धीरेधीरे भुवन पहाड़ी रास्तों से आसपास के गांवों में दूधपनीर की सप्लाई का काम करने लगे. आसपास के गांव से वे और्डर ले आते, फिर उसी हिसाब से दूधपनीर तैयार किया जाता. इस से भोला को भी अच्छा मुनाफा होने लगा.

जब से भुवन दहीपनीर के सप्लाई के काम में बिजी हो गए थे, तब से हिसाबकिताब का जिम्मा उर्मिला ने संभाल लिया था. इस से भोला और उर्मिला सीधे एकदूसरे के संपर्क में आ गए थे. कब दोनों की आंखें चार हुईं कुछ पता ही नहीं चला.

भुवन को इस का अहसास तो हुआ लेकिन उन्होंने इसे अपना केवल वहम समझ  कर टाल दिया. उन्होंने खुद को आधुनिक और शिक्षित आदमी मान कर शक करने को केवल गंवारपन समझा. उन्होंने सोचा कि उर्मिला दहीपनीर का यह काम करेगी तो भोला से दूध लेने, दूध का और्डर देने और हिसाबकिताब करने के लिए उस से बोलना तो पड़ेगा ही.

लेकिन भुवन यह भूल गए कि आग और घी को पास पास रखेंगे तो आग एक न एक दिन तो भड़केगी ही. उर्मिला में अभी जवानी की लहर थी. उन्माद का उछाल था. भोला उर्मिला को ‘भाभी’ कहता था और वह उसे ‘देवरजी’ कह कर पुकारती थी, इसलिए देवरभाभी की ठिठोली को मंजूरी भी मिल जाती थी.

हलकीफुलकी मजाकमस्ती तो भुवन के सामने भी हो जाती थी और उस समय भुवन कुढ़ कर रह जाता था, लेकिन भोला और उर्मिला के बीच जो चल रहा था उसे तो बस उन दोनों के दिल ही जानते थे.

फिर एक दिन… भुवन किसी काम से रामनगर गए हुए थे. रामनगर जाने का सीधा सा मतलब ही यह था कि बिलकुल सुबह निकलना और फिर देर शाम या अगले दिन वापस आना.

भोला जब दूध देने आया तो उसे भुवन दिखाई नहीं दिया. ‘‘भाभी, आज भुवन कहीं नहीं दिखाई दे रहा.’’ ‘‘वे रामनगर गए हैं देवरजी.’’ ‘‘बच्चे भी दिखाई नहीं दे रहे.’’ ‘‘अरे देवरजी, कल थैलीसैंण से उन का मामा आया था. बच्चे नानी के घर जाने की जिद करने लगे तो उन का मामा उन्हें कुछ दिन के लिए अपने साथ ले गया.’’

शिकारी का मुआयना पूरा हो चुका था. भोला ने कहा, ‘‘तो फिर अकेली हो?’’ ‘‘अकेली कहां हूं देवरजी, तुम हो तो,’’ उर्मिला ने मुसकराते हुए मस्ती भरी हुई आंखों से कहा.

भोला एकदम से कुछ नहीं कह सका. उस ने मुसकरा कर एक नजर उर्मिला पर डाली, फिर नजरें झुका लीं. उर्मिला समझ गई कि भोला कहने में हिचकिचा रहा है. तब वह बोली, ‘‘देवरजी, उन से कोई काम था क्या?’’

भोला ने बहाना बनाते हुए कहा, ‘‘हां भाभी, आज कुछ पैसों की जरूरत थी.’’ ‘‘तो खुल कर कहो न कि कुछ पैसे चाहिए. इतना हिचकिचा क्यों रहे हो, पैसे ही तो मांग रहे हो कुछ और थोड़े ही मांग रहे हो.’’

‘‘हां भाभी, मिल जाती… मतलब पैसे मिल जाते तो…’’ उर्मिला यह सुन कर मुसकरा पड़ी और भोला की चाहत को समझ  गई. उस ने कहा, ‘‘आओ देवरजी, पैसे ले लो.’’ ‘‘कहां?’’ भोला ने पूछा.

‘‘अरे देवरजी, पैसे यहां खुले में थोड़े ही रखें हैं. वे तो अंदर कोठरी में हैं. लेने हैं तो आ जाओ,’’ उर्मिला ने कोठरी की ओर जाते हुए कहा.

भोला उर्मिला के पीछेपीछे कोठरी में पहुंच गया. कोठरी में अंधेरा था. उर्मिला ने उस के ठीक सामने खड़े हो कर नशीले अंदाज में पूछा, ‘‘कितने चाहिए, देवरजी?’’ ‘‘जितने तुम दे सको,’’ भोला ने मस्ती के मूड में कहा.

‘‘फिर चाबी से ताला खोलो और गिनगिन कर ले लो,’’ उर्मिला ने अपना सिर भोला की छाती पर रखते हुए कहा.

भुवन को जल्दी ही पता चल गया कि उन के घर में बहुतकुछ पक रहा है. भोला और उर्मिला सभी सीमाएं लांघ चुके हैं. भुवन को एक बार को इस बात का पछतावा हुआ कि उन्होंने समय पर दखलअंदाजी न कर के बड़ी गलती कर दी, लेकिन उन्होंने बेवफाई की आग में जलने से बेहतर दूसरा रास्ता अपनाया. जो बेवफाई और धोखे का दर्द उन्हें मिला है, वैसा ही दर्द और धोखे का मजा वे उन्हें भी चखाना चाहते थे. लेकिन कैसे?

भुवन जानते थे कि भोला की शादी माला से हुई है और माला तो उन की बचपन की साथी थी. वह मासों गांव की रहने वाली थी और मासों भुवन का ननिहाल था. वहां उन्होंने बचपन के बहुत दिन गुजारे थे. बचपन में वे माला के साथ खूब खेलेकूदे थे. वे बचपन के अपने प्यार को अभी तक नहीं भूले थे और बचपन का वह प्यार अचानक से हिलोरें मारने लगा था.

बिना देरी किए भुवन ने कुछ ही दिनों में भोला के घर तक पहुंच बना ली. एक दिन जब भोला दूध बांटने के लिए निकला हुआ था तो भुवन किसी बहाने से उस के घर पहुंच गए. आज माला से उन की अकेले में शादी के बाद पहली मुलाकात थी. माला ने उन की खूब आवभगत की और उसे बिना चाय पिलाए न जाने दिया.

इस मुलाकात से भुवन समझ  गए कि माला के अंदर बचपन के प्रेम की पुरानी आग फिर सुलग उठी है. वर इस मौके को अब कैसे हाथ से जाने दें? उन्होंने सुलगती आग को भड़काने के लिए खूब हवा दी. उन की उम्मीद से पहले ही आग धधक उठी. कहते हैं कि औरत प्रेम में अंधी और आदमी पागल हो जाता है. भोला उर्मिला के प्यार में इतना बावला हो गया था कि उसे यही पता नहीं चला कि उस के घर में भुवन ने सेंधमारी कर दी है.

तब एक दिन भोला के घर में, ‘‘भुवन, तुम तो मुझे  बचपन में ही छोड़ कर चले गए थे. कभी तो मुझे  याद कर लेते.’’

‘‘माला, ऐसी बात नहीं है. बस हालात ही कुछ ऐसे बन गए थे. मैं तो हमेशा तुम्हारी यादों में तड़पता रहा. कहो तो दिल चीर कर दिखाऊं,’’ भुवन ने शातिराना पासा फेंका.

‘‘झूठे कहीं के,’’ माला ने भुवन के गाल पर चिकोटी काटते हुए कहा. फिर वह ऐसे ही खिलखिला कर हंसी जैसे ऐसी शरारत पर वह बचपन में हंसा करती थी. ‘‘झूठा मत कहो, माला, नहीं तो सच का ठप्पा ही लगा दूंगा.’’

‘‘ओहो, खुद को बड़े बहादुर बनते हो. जरा हिम्मत है तो लगा कर दिखाओ अपना सच का ठप्पा,’’ भुवन को उकसाते और मुसकराते हुए माला ने कहा.

इतना कह कर माला अपना दुपट्टा उतार कर नशीली आंखों से मुसकराते और भुवन को ललचाते हुए पलंग पर हाथ टिका कर और पैर लटका कर बैठ गई.

फिर बिना किसी देरी के भुवन ने माला के पूरे बदन को अपने प्रेम की सच्चाई के ठप्पे से तरबतर कर दिया.

जैसे कि हर मजे में सजा छिपी होती है, भुवन और भोला के संबंधों में जबरदस्त खटास पैदा हो गई. इस के बाद भी वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे. न ही उर्मिला भोला को छोड़ने को तैयार थी और न ही माला भुवन को.

इश्क चीज ही ऐसी होती है जिस का जितना विरोध किया जाए वह उतना ही भड़कता है. इस के सामने बड़ेबड़े परिवार तबाह हो गए, लेकिन इश्क न झुका. तूफान आता है तबाही लाता है, मगर इश्क खुद तबाही को न्योता देता है.

मामला पंचायत तक पहुंचा तो इश्क और मचला, और वफादार हुआ, और मजबूत हुआ, और बेशर्म हुआ. उर्मिला ने भोला के साथ रहने की कसम खाई तो माला किसी भी सूरत में भुवन का साथ छोड़ने को तैयार नहीं. बच्चों की उम्र देखते हुए पंचायत ने उन्हें मांओं के सुपुर्द किया. बच्चे भी ऐसा ही चाहते थे. बिना कोर्टकचहरी के सारे फैसले हो गए, लेकिन भविष्य में कोई कानूनी अड़चन न आए, इसलिए वकील कर के इन संबंधों को कानूनी मंजूरी दिलाई गई.

कुछ ही दिनों के बाद लोकडाउन हटा तो दुनिया बदल चुकी थी. भोला के साथ उर्मिला तो भुवन के साथ माला थी. भुवन को फिर से उसी कंपनी में नौकरी मिल गई. भुवन माला और उस के बच्चों को ले कर चंडीगढ़ के लिए बस में सवार हो गया.

उन को ले कर लोग आज भी चर्चा करते हैं कि लोकडाउन ने सच मैं दुनिया बदल दी. आदमी सोचता कुछ है और होता कुछ है तो क्या आदमी सच में हालात का गुलाम है?

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