Bharat Bhushan Tiwari Encounter. एक काफी प्रचलित लोककथा है. वह यह कि एक जज अपराधियों को फांसी के फंदे तक झुलाने में काफी यकीन रखता था. उसी जज के कोर्ट में एक ऐसा मामला आया, जिस में आरोपी उस का बेटा ही था. अब वह जज लगातार हीलहवाला करने लगा, फांसी की सजा के खिलाफ बेढंगी बातें गढ़ने लगा.

कुछ ऐसी ही बात बिहार के भोजपुर जिले के शाहगंज गांव में भरत भूषण तिवारी के तथाकथित फर्जी एनकाउंटर के बाद हो रही है. बिहार भाजपा के अनेक कद्दावर नेता इस पुलिस एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और  केंद्रीय मंत्री रह चुके अश्विनी चौबे जब यह बयान देते हैं कि यहां तो ब्रह्महत्या का पाप लगता है, तो लोग हंस रहे हैं.

मध्यकाल में मनु संहिता द्वारा रचित कानून द्वारा कभी अलगअलग जातियों के लिए अलगअलग सजा के प्रावधान थे. मगर अब वे अच्छी तरह जानते हैं कि यहां देश के कानून में ब्राह्मण की हत्या और दलित की हत्या में एकजैसी सजा का प्रावधान है. मगर वे जब अपने पुराने चुनाव क्षेत्र से बिलकुल सटे इलाके में अपनी जाति के एक नौजवान के एनकाउंटर पर टिप्पणी करने पहुंचते हैं

तो वे संविधान की बात नहीं करते, वे उस मनु संहिता को कोट करते हैं, जिस के अपने देश के संविधान में कोई जगह नहीं.

मगर अश्विनी चौबे ‘ब्रह्महत्या का जिक्र करते हैं’, क्योंकि जिस बक्सर लोकसभा से उन की पार्टी ने उन्हें या उन के बेटे को टिकट नहीं दिया, वहां ब्राह्मण एक प्रभावी जाति रही है. अश्विनी चौबे अपने इस बयान से अपनी जाति का भावनात्मक सहानुभूति लेना चाहते हैं.

दिलचस्प यह है कि सिर्फ वे ही अपनी जाति को एड्रैस नहीं कर रहे, बल्कि राज्य सरकार के मंत्री और बक्सर से लोकसभा चुनाव लड़ चुके मिथिलेश तिवारी और चुनावी टिकट न मिलने पर संन्यास ले चुके पूर्व पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय भी सक्रियता दिखा रहे हैं.

उस इलाके के एक अन्य भाजपा विधायक आनंद मिश्रा पर भी दबाव है कि वे भी कुछ बोलें और वे कुछ बोलते भी हैं. हांलाकि उन का सुर कुछ संयत रहता है. लेकिन देखा जाए तो कुलमिला कर कानून व्यवस्था की लापरवाह चूक के मामले में जाति का विमर्श खड़ा किया जा रहा है.

स्पष्ट ही इस का विरोध भी हो रहा है. एक समानांतर विमर्श खड़ा होने लगता है कि एक ब्राह्मण के एनकाउंटर पर ही इतना शोर क्यों? यादव, मुसलिम जैसी सत्ता विरोधी करार दिए गए समूह और दूसरी दलित पिछड़ी जाति के लोगों के एनकाउंटर पर इतनी भावना क्यों नहीं उमड़ती और सरकार इतने दबाव में क्यों नहीं आती?

यह सवाल बिलकुल वाजिब है. मुद्दों का यह विचलन एक सम?ादार इनसान के लिए माथा फोड़ लेने जैसा है. जो उम्मीद करता है कि इस घटना के बाद बने मोमैंटम से सत्ता अब एनकाउंटर जैसे विकल्प पर गंभीरता से विचार करेगी, मगर वह देखता है कि विमर्श तो भटक कर आखिरकार जाति की सहूलियत भरी डाल पर ही फिर से अटक गया है. जो राजनीति के लिहाज से सब को सूट करता है.

अगर भरत भूषण तिवारी बच जाता, तो क्या ये तथाकथित ब्राह्मण नेता और जनप्रतिनिधि इस बात से सहमत होते कि एनकाउंटर अपराध नियंत्रण का अच्छा तरीका नहीं है? भरत के फेसबुक प्रोफाइल को स्क्रोल करते हुए देखा जा सकता है कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की एनकाउंटर पौलिसी के समर्थन में था.

आज उस के इलाके के लोग काफी उग्र हैं. लेकिन वे यहां सिर्फ भरत तिवारी के एनकाउंटर को गलत बता रहे हैं. उन का सवाल एनकाउंटर की अलिखित नीति पर नहीं है. कोई भरत भूषण को समाजसेवी बता कर उस के एनकाउंटर को गलत बता रहा है, तो कोई विक्षिप्त. कुछ तो भरत तिवारी को शहीद तक भी बता रहे हैं.

शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी जो बक्सर की यात्रा पर थे, उन्होंने भी कहा, ‘‘बच्चे का एनकाउंटर नहीं किया जाना चाहिए था, बहुत जरूरी था तो हाफ एनकाउंटर करते.’’

बच्चा उन के समाज का था, इसलिए उन का दर्द छलक रहा था. मगर इन सब के बीच किसी ने नहीं कहा कि किसी भी हालात में अपराध नियंत्रण के लिए एनकाउंटर सही तरीका नहीं है.

बिहार में भाजपा के कई नेता एनकाउंटर और बुलडोजर की योगी आदित्यनाथ की नीति के समर्थक रहे हैं. जब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहे उन्होंने कभी खुल कर इस नीति का समर्थन नहीं किया.

नीतीश कुमार जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कानूनी तरीकों से अपराध नियंत्रण की वकालत की. आर्म्स एक्ट, स्पीडी ट्रायल और ऐसे दूसरे तरीकों से नीतीश के पहले कार्यकाल में अपराध नियंत्रण हुआ.

इस के अगुआ अभयानंद जैसे पुलिस अधिकारी रहे. मगर पिछले 2-3 साल में जब नीतीश कमजोर पड़ने लगे, राज्य में पुलिस दबेछिपे ‘आपरेशन लंगड़ा’ चलाने लगी, जिसे अब हाफ एनकाउंटर कहते हैं.

पुलिस आयुक्त अभयानंद से पूछा गया कि क्या वे इस तरीके को सही मानते हैं? वे बोले, ‘‘एक पुलिस अधिकारी के तौर पर मैं वह हर काम करने को तैयार था जो कानूनी था. अगर कोई सरकार आज एनकाउंटर की वकालत करती है तो उसे विधानसभा में इसे पारित कर कानूनी मान्यता देनी चाहिए. यह नहीं कि आप पुलिस के मत्थे सब मढ़ दें. ऐसे में आप को जो एनकाउंटर पसंद आएगा वह तो ठीक, जो पसंद नहीं आएगा, उस में पुलिस पर गाज गिरेगी. आप कानून बनाइए, हम मानने के लिए तैयार हैं.’’

उन की बात में दम था. मगर जब बिहार में सरकार बदली तो नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इशारेइशारे में पुलिस से कहा कि वे एनकाउंटर कर सकते हैं. पुलिस करने लगी. हाफ भी और फुल भी. पिछले 2 महीने में 13 एनकाउंटर की खबर मीडिया में दिखी, जिस में 4 फुल एनकाउंटर थे, बाकी हाफ. पैर में गोली मारना तो आम बात हो गई. हाफ एनकाउंटर को ‘लंगड़ा एनकाउंटर’ नाम दे कर अखबारों में समाचार भी चले.

भरत तिवारी को भी पुलिस ने पांव में गोली मारने की कोशिश की, जो कहा जाता है कि उस के पेट में लग गई. हाफ एनकाउंटर फुल में बदल गया. इस के बावजूद कि वे वायरल वीडियो में पिस्तौल फेंकते नजर आ रहे थे.

एनकाउंटर के बारे में एक बात तो यह है कि यह गैरकानूनी है, हर एनकाउंटर के बाद पुलिस को कहानी गढ़नी होती है कि उस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई. फिर अगर जनभावना और सरकार एनकाउंटर के पक्ष में हो तो लचर कहानी भी चल जाती है. मगर कई बार दांव उलटा पड़ जाता है, तो पुलिस वाले सस्पैंड हो जाते हैं.

दूसरी बात, एनकाउंटर करना है या नहीं, यह पूरी तरह पुलिस के विवेक पर निर्भर होता है. वह चाहे तो पर्सनल दुश्मनी भी निकाल सकती है, कौन्ट्रैक्ट किलर भी बन सकती है. जैसा हम ने हिंदी फिल्मों में देखा है, जबकि पुलिस का काम न्याय करना नहीं है. उस के लिए अदालतें हैं. मगर अदालतों की सुस्त कार्रवाई, वहां पैसों के बल पर न्याय खरीदने की घटनाएं और न्याय मिलने में लगने वाला वक्त लोगों को उद्वेलित करता है कि वे एनकाउंटर को त्वरित न्याय मान लें. हम उस से दुखी हो कर पुलिस को न्याय करने का जिम्मा सौंप देते हैं.

सरकारों को भी यह आसान तरीका लगता है. न्याय प्रणाली को कारगर बनाने का धैर्य अब किसी सरकार में नहीं. यह फास्ट फूड न्याय है, जिस में कई दफा फूड पौइजनिंग भी हो जाती है, इसलिए बेहतर है कि हम अपनी सरकारों पर न्याय प्रणाली को दुरुस्त करने का दबाव दें. एनकाउंटर किसी का भी हो, गलत ही है, इसे हमें स्वीकार करना होगा. Bharat Bhushan Tiwari Encounter

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