Emotional Hindi Story. ट्रेन की सीट पर कमर टिकाए नीरज ने खिड़की से बाहर भागते हुए दृश्यों को देखा. शाम ढल रही थी और सूरज की आखिरी सुनहरी किरणें खेतों पर अपनी विदाई लिख रही थीं. वह अपने काम से लौट रहा था. एक लंबा, थका देने वाला सफर, जिस के आखिर में घर और अपनी बूढ़ी मां का इंतजार था.

डब्बे में मुसाफिरों का शोर और सामान बेचने वालों की आवाजें आ रही थीं. तभी एक पतली, दबी हुई आवाज ने नीरज का ध्यान भंग किया.

‘‘बाबूजी… कुछ खाने को दे दो. 2 दिन से कुछ खाने को नहीं मिला.’’

नीरज ने मुड़ कर देखा. दरवाजे के पास, मुश्किल से 7-8 साल की एक लड़की, फटेमैले कपड़े पहने, कांपती हुई खड़ी थी. उस की आंखें बड़ी और गहरे रंग की थीं, जिन में एक अजीब सी शून्यता और डर भरा हुआ था. उस का चेहरा मैल से सना था, लेकिन उस पर एक मासूमियत थी, जो दिल को चीर रही थी.

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मुसाफिर उस लड़की को अनदेखा कर रहे थे, कुछ झिड़की दे रहे थे और कुछ ने सिक्के फेंक कर जैसे अपना फर्ज पूरा कर दिया था. लड़की हर तिरस्कार को चुपचाप सह रही थी, जैसे यह उस के रोजमर्रा का हिस्सा हो.

नीरज को लगा, जैसे किसी ने उस के अंदर कुछ निचोड़ दिया हो. यह सिर्फ गरीबी नहीं थी, बल्कि यह असुरक्षा और अकेलेपन का वह बोझ  था, जिसे वह लड़की अपने कंधों पर ढो रही थी. भीख मांगना उस की मजबूरी थी, लेकिन आंखों में जो अपमान सहने का भाव था, वह नीरज से देखा नहीं गया. उस ने अपने झोले से बिसकुट का एक पैकेट निकाला और उसे बुलाया, ‘‘ओ लड़की, इधर आ.’’

लड़की सहम कर रुकी, उसे लगा जैसे कि अब डांट पड़ेगी. पर नीरज की आवाज में प्यार था. वह धीरे से उस के पास आई. ‘‘यह लो, कुछ खा लो.’’

उस लड़की ने बिना कुछ कहे, बिसकुट का पैकेट ले लिया था. उस की गोरी, गंदी उंगलियां कांप रही थीं. नीरज ने देखा कि वह लड़की बिसकुट के पैकेट को कस कर पकड़े हुए है.

‘‘तेरा नाम क्या है?’’ नीरज ने पूछा. ‘‘काजल,’’ उस लड़की ने तकरीबन फुसफुसाते हुए जवाब दिया. ‘‘अकेली है?’’

काजल ने बस सिर हिला दिया. वह अनाथ थी. कौन उसे इस नरक में धकेल गया, कहां से आई, उसे कुछ याद नहीं था. बस ट्रेन, भीख और हर रात का डर यही उस की दुनिया थी.

नीरज ने उस लड़की को बगल में बैठने की जगह दे दी. वह उसे ट्रेन में, उसी डर और असुरक्षा के बीच वापस नहीं छोड़ सकता था.

अब सुबह होने वाली थी, ट्रेन बक्सर स्टेशन पर आ कर रुकी. नीरज ने गहरी सांस ली और एक फैसला लिया कि काजल के लिए कुछ करना चाहिए.

‘‘काजल, क्या तू मेरे साथ मेरे घर चलेगी?’’ नीरज ने पूछा. काजल ने ऊपर देखा. उस की आंखों में अविश्वास था. क्या कोई उसे डांटेगा नहीं, मारेगा नहीं?

‘‘मैं तुझे  भीख नहीं मंगवाऊंगा. मैं तुझे  अपनी बहन मानूंगा. तुझे  पढ़ाई कराऊंगा. तू मेरे घर में सुरक्षित रहेगी, मेरी मां के पास.’’

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शायद नीरज की आवाज में वह सच्चाई थी, जिस ने काजल के अंदर सालों से जमी बर्फ को पिघला दिया. वह चुपचाप खड़ी रही, फिर धीरे से अपना सिर ‘हां’ में हिला दिया.

नीरज जब काजल को ले कर घर पहुंचा, तो उस की मां, राधा देवी चौंक गईं. ‘‘यह कौन है?’’ मां ने पूछा.

नीरज ने उन्हें पूरी कहानी बताई. राधा देवी, जो बचपन से ही दूसरों के दुख को अपना दुख समझती थीं, ने एक पल की भी देरी नहीं की. ‘‘ला बेटा, मेरी परी को अंदर ला. यह अब हमारी बेटी है.’’

राधा देवी ने काजल को नहलाया, उसे साफ कपड़े पहनाए. जब मैल उतरा, तो उस की खूबसूरती सामने आई. लेकिन उस से भी ज्यादा खास, काजल की आंखों का डर धीरेधीरे कम होने लगा.

अगले दिन नीरज ने काजल के नाम से एक फार्म भरा. ‘काजल’ अब भी उस का नाम था, लेकिन उस के आगे जुड़ गया ‘काजल वर्मा’.

‘‘आज से तू मेरी बहन है. मेरा नाम तेरा नाम है,’’ नीरज ने प्यार से कहा.

काजल पहली बार खुल कर मुसकराई. वह मुसकान इतनी शुद्ध और प्यारी थी कि नीरज को लगा जैसे उस के सालों की थकान उतर गई हो.

अब घर में काजल को प्यार मिलता था. उसे भूखा नहीं रहना पड़ता था. उसे सम्मान मिलता था. नीरज और राधा देवी ने उसे स्कूल भेजा. शुरू में, उसे पढ़ने में मुश्किल हुई, लेकिन उस की सीखने की जबरदस्त इच्छाशक्ति ने हर बाधा को पार कर लिया.

स्कूल में बच्चे उसे नहीं चिढ़ाते थे, क्योंकि वह अब ‘भीख मांगने वाली लड़की’ नहीं थी, बल्कि वह नीरज वर्मा की बहन थी. यह नाम, यह पहचान उस के लिए किसी राजसी ताज से कम नहीं थी.

साल बीतते गए. काजल ने सिर्फ पढ़ाई में ही नहीं, बल्कि संगीत में भी महारत हासिल की. वह एक आत्मविश्वास से भरी, हंसमुख और समझदार लड़की बन गई थी.

एक दिन, जब काजल अपने इम्तिहान में टौप कर के घर आई, तो उस ने राधा देवी और नीरज के पैर छूए.

‘‘भाई, मां… आप ने मुझे  सिर्फ एक छत और खाना नहीं दिया. आप ने मुझे  एक जिंदगी दी, एक नाम दिया. मैं आज जो कुछ भी हूं, वह सिर्फ आप की वजह से हूं.’’

राधा देवी ने उसे गले लगा लिया. ‘‘नहीं बेटी, तू कुदरत का तोहफा है. तू हमारी जिंदगी में आई और हमारी बेटी की कमी पूरी हो गई.’’

नीरज, जो कोने में खड़ा था, उस की आंखें नम थीं. वह आज भी उस रात को याद करता है जब उस ने उस ट्रेन के डब्बे में डर से कांपती काजल को देखा था. उस ने बस एक असहाय बच्चे को सहारा दिया था, लेकिन बदले में उसे मिला था एक बहन का अटूट प्यार और अपनी इनसानियत पर गर्व करने का मौका.

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