Politics: तृणमूल कांग्रेस या किसी भी अन्य पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचने वाले नेताओं ने केवल पार्टी के साथ ही नहीं, बल्कि सबसे बड़ा धोखा अपने क्षेत्र की जनता के साथ करते है. जनता व्यक्ति को नहीं, बल्कि एक खास, दल और उसके वादों को देखकर अपना कीमती वोट देती है.
रातों-रात दलबदल करने की यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है. जब नेता अपने निजी स्वार्थ के लिए जनादेश का सौदा करने लगें, तो राजनीति से जनता का भरोसा उठने लगता है. नेताओं को अपने लोगों के प्रति जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.

एक दलबदलु ने एक कहा था, मैं चड्डा नही जो चड्डी हो जाऊं बंगाल चुनावों में सफेद साड़ी हवाई चप्पल पहन खुद को ममता बनर्जी की परछाई दिखाने वाली, अपने चुनावी भाषणों से गदर मचाने वाली तृणमूल कॉग्रेंस की फायरब्रांड नेता सयोनी घोष इन दिनों मास्क और कैप में मुंह छुपाए घूम रही है, बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की पुर्नवापसी का दावा करने वाली सायोनी घोष, चुनावी नतीजों के बाद ममता बनर्जी के खिलाफ खड़ी नजर आ रही है, और वह अकेली नही है तृणमूल कॉग्रेंस के उन्नीस और सांसदो ने उनके साथ पार्टी से बगावत की है, टीएमसी के उन्नीस बागी सांसदो ने बंगाल में रजिस्टर्ड त्रिपुरा में भाजपा की नेतृत्व वाली नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस की नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर लिया है.

चुनावी परिणाम
2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद बंगाल की कुल 294 सीट पर नेक टू नेक फाइट में भाजपा ने कुल 208 सीट पर जीत हासिल कर प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई और तृणमूल कॉग्रेंस के कुल 86 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे है, 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में बंगाल की कुल 42 सीट में से 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी 1 कॉग्रेस ने जीती और 12 पर भाजपा काबिज हुई थी 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद 29 में से 20 सांसदो ने ममता बनर्जी से बगावत कर अलग रास्ते जाने का चयन किया है, इसके अलावा पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी लगभग 58-60 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता रिताब्रेटा बनर्जी को अपना नेता चुना है.

सांसद
बारासात की सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 19 लोकसभा सांसदों ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉग्रेस से बगावत कर अलग गुट बनाने और एनडीए का समर्थन करने का ऐलान किया जादवपुर लोकसभा ये वही ऐतिहासिक सीट है जिसपर 1986 में ममता बनर्जी ने सोमनाथ चट्रर्जी को हराया था 40 साल बाद इस सीट पर 2024 में सयोनी घोष को लड़ाया गया और वह वहां से जीतकर लोकसभा पहुंची थी, पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान बहरामपुर से सांसद थे, दीपक अधिकारी / देव लोकसभा में घाटल लोकसभा का प्रतिनिधत्व कर रहे थे.

शताब्दी रॉय बीरभूम क्षेत्र से सांसद, माला रॉय – कोलकाता दक्षिण के प्रतिनिधि, अजीत कुमार मल बोलपुर से एमपी, बापी हलदर – मथुरापुर से सांसद प्रसून बनर्जी / प्रसून बंद्योपाध्याय हावड़ा लोकसभा सीट से सांसद, जगदीश बर्मा बसुनिया – कूच बिहार के जनता के प्रतिनीधि, अरूप चक्रवर्ती – बांकुड़ा से सांसद, खलीलुर रहमान – जंगीपुर से सांसद अबू ताहेर खान – मुर्शिदाबाद से एमपी, शर्मिला सरकार – बर्धमान पूर्व से सांसद, रचना बनर्जी – हुगली से प्रतिनीधि, कालीपद सोरेन – झारग्राम से सांसद, जून मालिया – मेदिनीपुर से सांसद, मिताली बाग – आरामबाग से सांसद, पार्थ भौमिक से सांसद

कारण
तृणमूल कांग्रेस सांसदों द्वारा बगावत करने और पार्टी में आंतरिक कलह के पीछे I-PAC की तानाशाही, महिलाओं का अपमान और RG कर मेडिकल कॉलेज की घटना का नैतिक प्रभाव सबसे प्रमुख कारण बना है.

निलंबित टीएमसी नेता रिजु दत्ता और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने आरोप लगाया कि पिछले कई महीनों से पार्टी को जमीनी कार्यकर्ता नहीं, बल्कि चुनावी सलाहकार संस्था I-PAC चला रही है। I-PAC के दखल के कारण पार्टी के पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया गया.

काकोली घोष दस्तिदार ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर पार्टी के ही एक अन्य वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी पर संसद के भीतर महिला सांसदों के साथ अभद्र व्यवहार, गाली-गलौज और महिला-विरोधी मानसिकता रखने का आरोप लगाया। पार्टी नेतृत्व द्वारा इस पर कोई कार्रवाई न किए जाने से आहत होकर उन्होंने टीएमसी महिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था.

सांसदों ने RG कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की घटना का विशेष रूप से उल्लेख किया। सांसदो ने कहा की RG कर जैसे संवेदनशील मामले को संभालने में राज्य सरकार और पार्टी नेतृत्व न सिर्फ नाकाम रहा, मामले पर लीपा पोती करने की कोशिश की जिससे पार्टी की छवि खराब हुई। उसके कारण वे अब इस पार्टी में बने रहने के लिए नैतिक रूप से सहज नहीं थे.

पार्टी छोड़ने वाले नेताओं ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के निचले स्तर के कैडरों में भ्रष्टाचार और कट-मनी का चलन बहुत ज्यादा बढ़ गया था, वरिष्ठ सांसदों को यह रास नहीं आ रहा था कि पार्टी के सारे फैसले अभिषेक बनर्जी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं और पुराने नेताओं की राय की कोई कद्र नहीं हो रही है.
विधानसभा चुनाव 2026 में टीएमसी को मिली हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष चरम पर पहुंच गया. नेताओं का कहना है कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को इस हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने आत्ममंथन करने के बजाय तानाशाही जारी रखी.

इन्हीं सब कारणों से 19 सांसदों (जिनमें यूसुफ पठान, सायोनी घोष और शताब्दी रॉय जैसे बड़े नाम शामिल हैं) ने लोकसभा स्पीकर को पत्र सौंपकर खुद को अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग की है.

NCPI से विलय
इन सभी बागी सांसदो ने एनसीपीआई में विलय किया है। इलेक्शन कमीशन के रिकॉर्ड के मुताबिक नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया का रजिस्ट्रेशन 20 जनवरी 2023 को हुआ था. पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा में है. इसकी राजनीतिक गतिविधियां त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के इलाकों में हैं. 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी किस्मत आजमाई थी. नतीजे बेहद निराशाजनक रहे. कुछ सीटों पर पार्टी को NOTA से भी कम वोट मिले.

दिलचस्प बात ये है कि उस समय पार्टी का नारा था ‘राजनीतिक दलबदलुओं को खारिज करो’. लेकिन आज वही पार्टी देश के सबसे बड़े राजनीतिक दलबदल की होस्ट बन गई है. जो पार्टी अभी तक लगभग राजनीतिक गुमनामी में थी, अब वही 20 सांसदों का नया ठिकाना बन गई है.

NCPI के राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्तीय कुंडू हैं. उनकी पत्नी शिउली कुंडू पार्टी की कोषाध्यक्ष हैं. पार्टी के बारे में सार्वजनिक जानकारी बहुत सीमित है. शांतनु डे ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा कि वो RSS कार्यकर्ता और समाज सेवक हैं. पार्टी के संस्थापक सदस्य भी हैं. लेकिन बागी TMC सांसदों के NCPI में शामिल होने के फैसले से नाखुश हैं. डे ने कहा कि उनकी पार्टी ने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में TMC के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. NCPI का राजनीतिक रुख TMC विरोधी है.

ये और भी दिलचस्प है शिउली कुंडू से जब TMC के मर्जर के बारे में पूछा गया तो उन्होनें कहा हां मैं पार्टी प्रेसिडेंट थी पर अब मैनें रिजाइन कर दिया है क्योंकि मुझे अपनी हाई कोर्ट की प्रैक्टिस पर फोकस करना था, आपको पार्टी के नए प्रेसिडेंट ही इस बारे में कुछ बता पायेंगे। और मुझे नही पता अभी पार्टी का प्रेसिडेंट कौन है.

शांतनु डे पार्टी सहसंस्थापक से पूछा गया तो उन्होंनें कहा पार्टी प्रेसिडेंट होने के नाते सिर्फ शिउली कुंडू ही टीएमसी सांसदो के NCPI में मर्जर के बारे में जानकारी दे सकती है, हमसे इस विषय में कोई डिसकशन नही किया गया, उनसे पूछा गया की शिउली ने पद से इस्तीफा दे दिया है, तो उन्होंनें कहा मैं अभी आपसे इस बारे में सुन रहा हू.

NCPI के जनरल सेकरेटरी एडवोकेट दिलिप रॉय से पूछा गया तो उन्होंनें कहा मैंने अभी सोशल मीडिया से इस बारे में सुना है मुझे लगा शिउली कुंडू के नेतृत्व में ये मर्जर हुआ है हम जल्दी ही अपना स्टैंड क्लीयर करेंगे. Politics

हैरानी की बात है कि नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया के संस्थापकों को पता ही नही है कि पार्टी की वर्तमान स्थिति क्या है कौन किस पोजिशन पर है, और किसने अपनी पोजिशन से रिजाइन कर दिया है, 20 सांसदो का मर्जर पार्टी सें किसकी अनुमति से हुआ किसने अप्रूव किया ये मर्जर किसीको कोई आइडिया नही है.

ये सांसद जिनको रातों रात पार्टी से इतनी शिकायती हो गई क्या पहले लोगो को पता नही था कि इनके बारे में क्या वजह है कि लोगो इतनी शिकायत हो गई पार्टी के सत्ता गवांते ही, जो लोग जो चड्डा नही जो चड्डी हो जाउं जैसे बयान देते थे, हर हाल में साथ रहने के दावे करते थे, उन्होनें रातों रात दलबदल कर लिया, टीएमसी के चुनाव चिन्ह पर लड़कर जीते सांसदों ने न सिर्फ पार्टी के साथ बल्कि अपनी क्षेत्र की जनता के साथ भी धोखा किया है.

राजनीति में जब सत्ता बदलती है, तो नेताओं के सुर और वफादारियां भी बदल जाती हैं। जो सांसद कल तक अपनी पार्टी के गुणगान गाते नहीं थकते थे, उन्हें रातों-रात अपनी ही पार्टी से इतनी शिकायतें कैसे हो गईं? क्या इन कमियों का अहसास उन्हें पहले कभी नहीं हुआ था, या फिर सत्ता का छिन जाना ही उनकी इस अचानक जागी ‘अंतरात्मा’ की असली वजह है?

जो नेता कभी विपक्ष पर हमला करने के लिए मर्यादा की सीमाएं लांघ जाते थे और विवादित बयान (जैसे ‘चड्डी’ जैसे शब्दों का प्रयोग) देने से भी नहीं हिचकते थे, वे आज खुद को पाक-साफ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. हर हाल में साथ निभाने के बड़े-बड़े दावे सिर्फ सत्ता सुख भोगने तक ही सीमित दिखाई देते हैं.

जैसे ही पार्टी के हाथ से सत्ता गई, इन नेताओं को अचानक संगठन में तानाशाही, भ्रष्टाचार या वैचारिक मतभेद दिखने लगे. यह साफ तौर पर राजनीतिक ढोंग है, जो केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और ईडी, सीबीआई का डर अपने भ्रष्टचार को उजागर न होने देने के लिए, और राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए किया जाता है. Politics

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