Humor. कहते हैं कि जिस की जिंदगी में कचहरी और अस्पताल का चक्कर लग जाए, उस के आगे ग्रहनक्षत्र भी अपनी चाल धीमी कर लेते हैं. मनुष्य के नश्वर शरीर में बीमारी कभी भी दस्तक दे सकती है और ठीक होने के लिए दवा और डाक्टर की शरण में जाना ही पड़ता है.

इलाज के लिए जब अस्पताल जाना पड़े, तो एक ऐसे एडवैंचर ट्रिप से रूबरू होने का मौका मिलता है, जो जिंदगीभर के लिए यादों में परमानैंट रूप से भरती हो जाता है.

मरीज तो बेचारा बेसुध या बेहोश या दवा के असर के चलते अस्पताल की नौटंकी से तकरीबन अनजान रहता है, असली दर्शक और कलाकार तो उस का अटैंडैंट होता है. अटैंडैंट की हालत उस स्टैपनी जैसी होती है, जिस में पहले से ही आधी हवा भरी हो और उसे अचानक पंचर हुए टायर का पूरा भार सौंप दिया जाए.

दवादारू, डाक्टर के दर्शन, जांचपड़ताल, भोजन का इंतजाम, रिश्तेदारों को सूचना, फोन पर अपडेट… सभी भौतिक, सांसारिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारियां अटैंडैंट के कंधों सवार हो जाती हैं. मरीज बिस्तर पर लेटा रहता है, पर अटैंडैंट पूरे अस्पताल में ऐसे परिक्रमा लगाता है मानो किसी तीर्थस्थल का बारहमासी मेला लगा हो.

बड़े अस्पतालों में मरीज भले ही बीमारी से लंबा न हो, पर परची कटवाने से ले कर डाक्टर के कमरे तक की कतार में खड़ेखड़े अटैंडैंट जरूर लंबा हो जाता है. मरीज शारीरिक रूप से बीमार होता है, जबकि अटैंडैंट मानसिक, शारीरिक और आर्थिक तीनों लैवलों पर बीमारी का रिसर्च पेपर लिखने की हालत में पहुंच जाता है.

जनरल वार्ड में भरती मरीज के लिए फोन पर शुभचिंतकों की चिंता उमड़ती रहती है, ‘अब कैसे हैं?’, ‘डाक्टर क्या बोले?’, ‘रिपोर्ट आई?’, ‘कब तक भरती रहेंगे?’, लेकिन मानसिक और भावनात्मक रूप से गायब आईसीयू में शिफ्ट हो चुके अटैंडैंट की हालत कोई नहीं पूछता. उस की परेशानी उसी तरह गायब रहती है, जैसे शादी समारोह में हाई डिमांड वाली मटरपनीर की सब्जी में से पनीर.

मोबाइल पर आईं सारी शुभकामनाएं और हमदर्दी मरीज के खाते में चली जाती हैं और अटैंडैंट की खैरियत का खाता हमेशा खाली रह जाता है.

एक्सरे, ब्लड और पेशाब की जांच, एमआरआई और अल्ट्रासाउंड के चक्कर लगातेलगाते अटैंडैंट को अस्पताल का नक्शा जबानी याद हो जाता है. वह वास्कोडिगामा की तरह रिसैप्शन, जनरल वार्ड और जांच रूम की खोज करतेकरते पूरे अस्पताल के भौगोलिक हालात का जानकार बन जाता है.

उसे पता चल जाता है कि किस मोड़ पर फार्म मिलता है, किस खिड़की पर मुहर लगती है, और किस दरवाजे के बाहर ‘कृपया शांति बनाए रखें’, ‘केबिन में जाने से पहले मोबाइल स्विच औफ कर दें’, ‘बिना मास्क लगाए अंदर न आएं’ का परमानैंट बोर्ड टंगा रहता है. डाक्टर कब राउंड पर रहेंगे और कब ओपीडी में मिलेंगे और कब आपरेशन थिएटर में, यह तो उसे रट जाता है.

अटैंडैंट अनायास ही चिकित्सा विज्ञान का चलताफिरता विश्वकोश बन जाता है और अपने इलाके या गांव से आने वाले दूसरे मरीजों और उन के अटैंडैंटों के लिए मार्गदर्शक का रोल निभाने लगता है.

ओपीडी में डाक्टर से मिलना किसी ज्योतिर्लिंग के दर्शन से कम नहीं… घंटों इंतजार के बाद 2 मिनट का आशीर्वाद. टोकन नंबर हाथ में आते ही अटैंडैंट के चेहरे पर उम्मीद की किरण चमकती है, पर डिस्प्ले बोर्ड पर बदलते अंकों की रफ्तार देख कर उसे समय के कम रफतार से बीतने का बोध हो जाता है.

आखिरकार जब डाक्टर के कमरे में दाखिल होता है, तब अनुभव होता है कि डाक्टर को ‘दूसरा भगवान’ क्यों कहा जाता है… वे कम बोलते हैं, जल्दी लिखते हैं और उन की लिखावट सम?ाना साधारण इनसान के लिए गहरा राज बनी रहती है.

बहुत जल्दी मुलाकात की चाहत में दर्जनों मरीजों और उन के परिवार वालों का रोनाधोना अटैंडैंट के कानों में मिश्रित ध्वनि का विचित्र संगीत पैदा करता है. माहिर डाक्टर भले केवल संबंधित रोगियों से मिलें, पर अटैंडैंट को आंख, कान, गला, पेट, जुकाम से ले कर बवासीर और कैंसर तक सभी रोगियों के दर्शन करने का मौका मिलता है.

परिवार वालों के सहारे टूटे हाथपैर के साथ बलखा कर चलते मरीजों के अंगों पर चढ़े सफेद प्लास्टर से मानो ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के ओरिजनल सीन उभरते रहते हैं. मनोरंजन के दूसरे साधन के रूप में वेटिंग हाल में 55 इंच वाले एलईडी टीवी पर रंगीन इमेज वाले ‘रामायण’, ‘महाभारत’ सीरियल या फिल्मी गानों के लगातार प्रसारण का भी इंतजाम होता है.

अस्पतालों में सब्र रखना सब से महंगी दवा है, जो मैडिकल स्टोर पर नहीं मिलती. अस्पताल धाम के प्रवास के दौरान अटैंडैंट को यह दवा अपने दिलदिमाग में खुद से पैदा करनी होती है. अगर मरीज लंबी बीमारी वाला ‘टैस्ट मैच’ निकला, तो अटैंडैंट ‘टी 20’ की रफ्तार से भागदौड़ करतेकरते ही ही बीमार पड़ने लगता है. मैडिकल साइंस की तरक्की का असली पैमाना यही है कि कुछ दिनों में मरीज धीरेधीरे ठीक होने लगता है और अटैंडैंट मरीज बनने की दिशा में आगे बढ़ता जाता है.

अस्पताल में केवल इलाज नहीं होता, बल्कि वहां जीवनदर्शन का ज्ञान भी दिया जाता है. यह सिखाता है कि सेहतमंद होना सब से बड़ा धन है, तो अटैंडैंट होना सब से बड़ा तप. मुमकिन है, जिंदगी के किसी मोड़ पर आप भी अस्पताल के इन बहुरंगी दृश्यों से प्रभावित हुए हों.

अगर मेरे लेखन पर थोड़ा सा भी शक हो, तो कभी किसी मरीज के अटैंडैंट बन कर अस्पताल में समय गुजारने का अनुभव जरूर कीजिए, सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

बहरहाल, हम अस्पताल के दर्शनशास्त्र की अज्ञानता में ही बने रहने की कामना करते हुए आप के और आप के परिवार वालों की अच्छी सेहत की मंगलकामना करते हैं.    Humor

लेखक : विनोद कुमार विक्की

 

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...