Reality . उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के जमलामऊ गांव के किसान हरिओम कोरी अपने इलाके में घूम रहे आवारा जानवरों से इतना परेशान हुए कि उन्होंने अपने 3 एकड़ खेत को जोतनाबोना ही छोड़ (परती रखना) दिया. कंटीले तारों से खेत की बाड़बंदी करवाने के बावजूद जब उन की सरसों और धान की फसल 3 साल तक लगातार नहीं बच सकी, तो उन्होंने खेत परती रखने में ही अपनी भलाई समझा.
अपनी समस्या बताते हुए हरिओम कोरी ने कहा कि इलाके में घूम रहे इन आवारा जानवरों ने फसलों का इतना नुकसान किया कि हम जैसे कई किसानों की लागत तक डूब गई और हम कर्जदार हो गए, इसलिए जब खेत से फसल मिलने की संभावना ही नहीं रही, फिर उसे जोतनेबोने में पैसे क्यों खर्च किए जाते.
दरअसल, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद, प्रदेश में ‘काऊ पौलिटिक्स’ का जो दौर आया उस ने प्रदेश के किसानों को तबाह कर दिया. हालांकि सरकार ने भले ही इस समस्या के निराकरण के लिए भारीभरकम बजट के साथ प्रदेश में कई जगहों पर नई गौशालाएं बनवाने समेत कई दूसरे तरह के उपाय से इस समस्या के निदान का दावा किया, लेकिन जमीनी हालात में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया.
हिंदुत्व राजनीति ने बहुसंख्यक हिंदू आबादी के बीच जिस ‘काऊ पौलिटिक्स के सहारे शासन करने की रूपरेखा बनाई उस में इन जानवरों से होने वाले नुकसान को नियंत्रित करने का कोई रोड मैप नहीं था, इसीलिए इस राजनीति ने प्रदेश के किसानों की जहां आर्थिक कमर तोड़ी, वहीं राज्य की कृषि केंद्रित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.
एक तरफ नरेंद्र मोदी सरकार जहां गाय को ‘माता’ मान कर उस की सुरक्षा के लिए कड़े कानून बना रही है, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में भी गौ संरक्षण के लिए बड़ीबड़ी योजनाओं के दावे किए जाते हैं, लेकिन आवारा जानवरों के इस अनियंत्रित ?ांडों ने किसानों को रातोंरात अपनी ही ‘फसल का पहरेदार’ बना दिया है.
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की लगभग 70 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर ही निर्भर है. प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद (लगभग 25 फीसद) का एक बड़ा हिस्सा खेती से आता है. पिछले 4 सालों में आवारा जानवरों ने केवल फसलों को नहीं रौंदा, बल्कि किसानों की लागत बढ़ने के साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी गहरा नुकसान पहुंचाया है. देर रात तक फसलों की रखवाली से किसान टूट से गए हैं.
कई स्वतंत्र सर्वे के मुताबिक, प्रदेश के बुंदेलखंड, पूर्वांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में आवारा जानवरों से फसलों का नुकसान 20 फीसदी से 35 फीसदी तक दर्ज किया गया है.
पहले से ही संकटग्रस्त किसानों पर इस ‘काऊ पौलिटिक्स’ का गंभीर प्रभाव पड़ा, जिस से प्रदेश की जीडीपी को गंभीर नुकसान के साथ किसानों की आय में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई.
बुंदेलखंड की अन्ना प्रथा ने इस क्षेत्र में किसानों की समस्या में अभूतपूर्व इजाफा किया और इलाके के किसानों की कमर टूट चुकी है. आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के किसानों को सालाना 3,000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है. बाड़बंदी में जहां प्रति एकड़ 25,000 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं वहीं खेतों को फिर से बोने में किसानों को 15 फीसदी ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है. इन सब में रात में फसलों की रखवाली का खर्च जोड़ा ही नहीं गया है, जिस ने किसानों को गहरा मानसिक आघात दिया है.
‘काऊ पौलिटिक्स, का नुकसान केवल किसानों को ही नहीं हुआ है, बल्कि यह इनसानों के लिए भी जानलेवा साबित हुई है. आवारा सांड़ों और गायों के हमलों से होने वाली मौतें उत्तर प्रदेश में एक नई आपदा’ की तरह उभरी हैं. प्रदेश राहत आयुक्त कार्यालय और हालिया मीडिया रिपोर्टों (2024-25) के अनुसार 2023 में सांड़ों और नीलगायों के हमले में 92 लोगों की मौत हुई. 2024 के शुरुआती महीनों में ही यह आंकड़ा 15 के पार चला गया था.
पिछले तकरीबन 4 सालों (2022-2026) का आंकड़ा बताता है कि लगभग 400 से ज्यादा किसान सीधेतौर पर इन जानवरों के हमले में अपनी जान गंवा बैठे. यह संख्या वन्यजीव और मानव संघर्ष (बाघ, तेंदुए के हमले) से होने वाली मौतों से कहीं अधिक है. यही नहीं, सड़कों पर घूमते आवारा जानवरों के कारण एक्सप्रैसवे और नैशनल हाईवे पर रात के समय भीषण दुर्घटनाएं होती हैं.
एक स्टडी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में होने वाली कुल सड़क दुर्घटनाओं में से लगभग 15 से 20 फीसदी का कारण आवारा पशु होते हैं. पिछले 4 सालों में उत्तर प्रदेश में आवारा पशुओं से टकराने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में 2,500 से अधिक लोगों की मौत होने का अनुमान है, जबकि गंभीर रूप से घायल होने वालों की संख्या हजारों में है.
असल में परंपरागत किसानी में जब गाय दूध देना बंद कर देती थी, तो किसान उसे बेच देता था. लेकिन अब इस व्यापारिक श्रृंखला टूटने के कारण, यही गाय किसानों के लिए ‘आर्थिक बो?ा’ बन गई है. इस समस्या का हल हिंदुत्व राजनीति के पास नहीं है.
हालांकि, राज्य की योगी सरकार ने गौशालाएं बनाईं और समस्या के हल के लिए बड़ा बजट भी आवंटित किया, लेकिन भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के कारण ये ‘नरक’ में बदल गईं.
‘काऊ पौलिटिक्स’ के कारण भले ही हिंदुत्व राजनीति ने भावनात्मक रूप से आम जनता के बीच अपनी जगह बनाई और गाय के पौराणिक महत्त्व को आगे कर के भाजपा ने खूब वोट बटोरे, लेकिन इस राजनीति ने किसानों और आम जनता के लिए सिर्फ बेबसी और तबाही ही सुनिश्चित की. भाजपा ने वोटों की फसल भले काटी, लेकिन इस राजनीति में किसान पीछे छूट गए.
नरेंद्र मोदी सरकार ने 7 फरवरी, 2022 को संसद में बताया था कि आवारा जानवरों से फसलों को हुए नुकसान के लिए अखिल भारतीय स्तर पर किसानों को किसी तरह के मुआवजे की कोई योजना देश में नहीं है.
उत्तर प्रदेश में भी इस तरह की कोई योजना राज्य स्तर पर संचालित नहीं होती है. यही कारण है कि प्रदेश का किसान अब अपने खेतों को परती रखने लगा है और इन जानवरों के कारण हुई दुर्घटनाओं के शिकार परिवार तबाही के स्तर तक बिखर कर हिंदुत्व राजनीति और ‘काऊ पौलिटिक्स’ की कीमत चुका रहे हैं.
कुलमिला कर, उत्तर प्रदेश में ‘काऊ पौलिटिक्स’ ने भावनात्मक रूप से भले ही लोगों को संतुष्ट किया हो, लेकिन जमीनी हकीकत में इस ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ‘इकोसिस्टम’ बिगाड़ दिया है.
पिछले 4 सालों में प्रदेश के किसानों को लगभग 15,000 करोड़ का कृषि घाटा हुआ है, लेकिन हिंदुत्व की राजनीति के पास इस आर्थिक नुकसान को नियंत्रित करने, किसानों को इस नुकसान में सहारा देने का कोई ब्लू प्रिंट नहीं है.
हिंदुत्व राजनीति ने किसानों और राहगीरों को सिर्फ आपदा भेंट की है जिस के शिकार प्रदेश के हर जिले में बहुत आसानी से देखे जा सकते हैं. गाय को देवीय पशु बनाने की राजनीति ने भाजपा को चुनावी फायदा दिया, लेकिन किसानों और आम जनता को एक ऐसा दर्द दिया है जिस का कोई इलाज फिलहाल दिखाई नहीं देता है.
लेखक : हरे राम मिश्र




