Bihar Politics: नीतीश कुमार, जो पिछले 2 दशकों से बिहार के मुख्यमंत्री रहे, अब वे राज्यसभा में हैं. यह नीतीश कुमार का डिमोशन है, लेकिन इतना तय है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी के लिए अब रास्ता पूरी तरह साफ है. नीतीश कुमार कभी सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म की राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक थे, लेकिन राजनीतिक मजबूरियां, गठबंधन और उम्र के साथसाथ उन की इमेज बदलती गई. अब बिहार की राजनीति एक नए दौर में जा रही है, जहां नीतीश युग खात्मे की ओर है.

बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश युग के साथसाथ बिहार में सैकुलरिज्म और सामाजिक न्याय की राजनीति का युग भी खत्म हो जाएगा? इस के साथ ही बिहार के पिछड़ों, दलितों, मुसलिमों की चाबी पूजापाठी ऊंची ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ जातियों के हाथों में अंगरेजों के जमाने की तरह जाएगी.
नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से राजनीति में आए थे. वे राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और वीपी सिंह जैसे समाजवादी नेताओं की वैचारिक विरासत को आगे ले जाने वाले नेता रहे हैं.

साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं, जिस से ओबीसी को
27 फीसदी रिजर्वेशन का रास्ता साफ हुआ था. नीतीश कुमार सामाजिक न्याय की इस विचारधारा का हिस्सा थे और बिहार में ओबीसी रिजर्वेशन के सब से बड़े समर्थक थे. साल 1994 में नीतीश कुमार ने कुर्मीकोइरी वोट बैंक को ध्यान में रख कर जौर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई. साल 1996 में समता पार्टी ने भाजपा से गठबंधन किया. भाजपा से नीतीश कुमार का यह शुरुआती गठबंधन सिर्फ राजनीतिक हितों के लिए था. नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन के बावजूद विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया था. साल 1998 से साल 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में नीतीश कुमार रेल, भूतल परिवहन और कृषि मंत्री रहे. इस दौर तक सांप्रदायिक ताकतों के साथ राजनीतिक गठबंधन के बावजूद नीतीश कुमार की इमेज सैकुलर और समाजवादी नेता की ही रही.

साल 2005 में भाजपा के साथ गठबंधन में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद महिलाओं के लिए 50 फीसदी पंचायती राज आरक्षण लागू किया. अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए अलग श्रेणी ईबीसी बनाई और इस वर्ग के लिए विशेष योजनाएं शुरू कीं. ईबीसी को सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन दिया. साल 2023 में जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ महागठबंधन की सरकार चला रहे थे, तब उन्होंने बिहार में पहली बार जाति पर आधारित सर्वे कराया. यह जातिगत सर्वे ओबीसी और ईबीसी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ. नीतीश कुमार का यह कदम मंडल राजनीति का विस्तार ही था. कभी सैकुलरिज्म के प्रणेता थे नीतीश कुमार  आज भाजपा की गोद में बैठे हैं, लेकिन एक समय था जब वे सैकुलरिज्म को अपना मूल सिद्धांत मानते थे और अपने इस सिद्धांत के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. साल 2013 का उदाहरण सामने है, जब भाजपा ने गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, तो नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन एक झटके में तोड़ दिया था और इसे सिद्धांतों की लड़ाई बताया था.

भाजपा के साथ गठबंधन टूटने के बाद जद (यू) के राष्ट्रीय परिषद में दिए अपने भाषण में नीतीश कुमार ने साफ कहा था, ‘‘हम सैकुलरिज्म पर समझौता नहीं कर सकते. भारत एक ऐसा देश है जहां कई धर्म, जाति, भाषा और कल्चर के लोग साथ रहते हैं. ऐसे देश का नेतृत्व वही व्यक्ति कर सकता है, जिस के पास सैकुलर क्रेडेंशियल्स हों, समावेशी नजरिया हो और जो समाज के सभी वर्गों को साथ ले कर चल सके.’’
बिहार विधानसभा में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मोदी की राजनीति संविधान के मूल्यों पर हमला है. देश का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति सैकुलर होना चाहिए और उसे समावेशी विकास की दृष्टि रखनी चाहिए. यह देश संविधान के तहत बना है. ‘‘सवाल यह है कि संवैधानिक दृष्टि जीतेगी या हम यह देश विभाजन और धु्रवीकरण की विचारधारा को समर्पण कर देंगे? मैं वादा करता हूं हम विभाजन की राजनीति के हाथों इस देश को बरबाद नहीं करने देंगे.’’

सैकुलरिज्म के प्रति इस ईमानदार वक्तव्य के बाद कांग्रेस के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नीतीश कुमार कोसैकुलर लीडरकरार दिया था, जिस पर नीतीश कुमार ने उन्हें धन्यवाद भी दिया था. यह नीतीश कुमार को सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में स्थापित करने वाला दौर था. भाजपा के साथ 17 साल की रिलेशनशिप से साल 2013 के ब्रेकअप के बाद नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथमहागठबंधनबनाया. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन भाजपा के खिलाफ सैकुलर ताकतों का प्रतीक बना. नीतीश कुमार ने तब इस सैकुलर मोरचे कोसंविधान बचाओकी लड़ाई बताया. इस चुनाव में महागठबंधन की भारी जीत हुई और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. इस दौरान उन्होंने भाजपा कोबड़ा झूठा पार्टीजैसे शब्दों से नवाजा और कहा कि उन का सैकुलरिज्म सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांत के लिए है. नीतीश कुमार की राजनीतिक जड़ें समाजवादी आंदोलन से जुड़ी हैं.

उन्होंने जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की परंपरा को कायम रखा. साल 2017 में जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजद छोड़ कर फिर भाजपा से हाथ मिलाया, तब बिहार विधानसभा में उन्होंने कहा था, ‘‘सैकुलरिज्म एक महान विचार है. यह सिर्फ भ्रष्टाचार छिपाने का शब्द नहीं है.’’ राजनीति में सत्ता की मजबूरी अलग बात है, लेकिन इतिहास के पन्नों में नीतीश कुमार का वह चेहरा हमेशा दर्ज रहेगा, जब वे सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में खड़े थे. आज सत्ता की गोद में बैठे होने के बावजूद नीतीश कुमार के पुराने भाषण और फैसले याद दिलाते हैं कि राजनीति में सिद्धांत कभीकभी सत्ता से पहले आते हैं. बिहार की जनता नीतीश कुमार को आसानी से भुला नहीं पाएगी. नीतीश कुमार के पाला पलटने में पिछड़ी जातियों में धर्मकर्म की बढ़ती पैठ भी है. पिछड़ी जातियों का एक हिस्सा सोचता है कि वह भी पूजा कर के ही ऊंची जातियों जैसी ऐश कर सकता है. ऐसी ही सोच अमेरिका तक में है, जहां ईसाई कट्टर गुलामी को चर्चों के दरवाजों से लाने की कोशिश में हैं.

सिद्धांत बनाम सत्ता की जंग नीतीश कुमार की यात्रा समाजवादी विचारधारा से शुरू हुई और सांप्रदायिक सत्ता की गोद में खत्म होने के कगार पर है. नीतीश कुमार का यह राजनीतिक सफर मंडल से शुरू हो कर कमंडल पर खत्म होता नजर रहा है. बिहार में अब भाजपा की दक्षिणपंथी राजनीति हावी हो रही है जहां सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म का नैरेटिव कमजोर पड़ गया है. बिहार की राजनीति में साल 2020 से ही भाजपा का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ. साल 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जद (यू) से ज्यादा सीटें जीतीं. जद (यू) 43 सीटों पर जीती थी, तो भाजपा ने 74 सीटें जीती थीं. इस के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया. नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखना भाजपा की मजबूरी थी. बिहार में भाजपा के पास अपना कोई नेता नहीं था. उस ने धीरेधीरे नीतीश कुमार के कोर वोट बैंक पर कब्जा करना शुरू किया और साल 2026 आतेआते भाजपा ने नीतीश को पूरी तरह साइडलाइन कर दिया.

2025 के विधानसभा चुनाव में राजग जीता और भाजपा सब से बड़ी पार्टी बन गई, फिर भी नीतीश को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया, लेकिन यह सिर्फ ट्रांजिशन पीरियड था. असली खेल तो अब शुरू होने वाला था. नीतीश कुमार ने 5 मार्च, 2026 को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया. यह फैसला अचानक आया और जद (यू) के कई कार्यकर्ताओं ने इस का विरोध भी किया. इस से बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया. समाजवादी पार्टी ने पोस्टर जारी किया, जिस में लिखा था किपहले इस्तेमाल करो, फिर बरबाद करो’. राजद के तेजस्वी यादव ने कहा कि भाजपा नीतीश और जद (यू) को खत्म करने की साजिश रच रही है. भाजपा ने नीतीश कुमार की उम्र और सेहत की दुबली कंडीशन का फायदा उठाया. भाजपा हिंदुत्व कार्ड खेल कर ईबीसी और दलित वोट बैंक को काफी हद तक हड़पने में कामयाब रही. भाजपा ने नीतीश कुमार को धीरेधीरे कमजोर किया. वैसे यह भाजपा की पुरानी रणनीति का हिस्सा है. सहयोगी को जरूरत तक इस्तेमाल करो और खुद को मजबूत बनाओ.

अब बिहार में भाजपा की राजनीति शुरू हो चुकी है और जद (यू) का भविष्य संकट में है. बिहार में अब स्कूलकालेजों की जगह मंदिरों की मरम्मत की जा रही है. नीतीश कुमार खुद सीतामढ़ी में जानकी मंदिर बनवा रहे हैं. सामाजिक न्याय की लड़ाई क्यों जरूरी सदियों पुरानी जाति पर आधारित गैरबराबरी को चुनौती देने के लिए ही सामाजिक न्याय की लड़ाई शुरू हुई थी. यह ओबीसी की जातियों को मुख्यधारा से जोड़ने का मिशन था. सामाजिक न्याय का मतलब केवल आरक्षण या वोट बैंक की राजनीति नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, बराबरी, आजादी और भाईचारे को साकार करने की कोशिश है. ओबीसी वह वर्ग है जो वर्णव्यस्था में शूद्र माना गया और सदियों तक सामाजिक तौर पर अनदेखा और मजदूर बना रहा. यही वजह है कि ओबीसी की आबादी सब से ज्यादा होने के बावजूद संसाधनों में भागीदारी सब से कम रही. इसी भागीदारी को बढ़ाने के लिए ओबीसी के कई नेता उभरे. इन्हीं नेताओं की बदौलत बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई की शुरुआत हुई.

कर्पूरी ठाकुर और बाबू जगदेव प्रसाद जैसे नेताओं ने बिहार में सामाजिक न्याय की सोच को जमीन पर उतारा और नीतीश कुमार ने इस मिशन को आगे बढ़ाया. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में गैरबराबरी को खत्म कर दिया था. संविधान का आर्टिकल 15 और 16 कहता है कि राज्य नागरिकों के बीच जाति, धर्म या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा, लेकिन संविधान लागू होने के दशकों बाद तक सामाजिक लैवल पर यह बराबरी कायम नहीं हो पाई. शिक्षा, नौकरी और राजनीति में आज भी ऊंची जातियों का दबदबा बरकरार है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी हाशिए पर है. यही वजह है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई जरूरी हो जाती है. ओबीसी जातियों की पहचान और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए साल 1979 में बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग बना था. मंडल आयोग ने साल 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट में ओबीसी को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर 27 फीसदी रिजर्वेशन की सिफारिश की गई थी. साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल की शिफारिश को लागू किया जिस से देशव्यापी आंदोलन हुए.

ऊंची जाति को ओबीसी के लिए 27 फीसदी रिजर्वेशन मंजूर नहीं था. पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुए, लेकिन ऊंची जातियों के विरोध के बावजूद ओबीसी रिजर्वेशन लागू हुआ और यहीं से भारत की राजनीति पूरी तरह बदल गई. मंडल से भी पहले 70 के दशक में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में 26 फीसदी ओबीसी रिजर्वेशन लागू किया था. 1990 के बाद लालू प्रसाद यादव नेमाययानी मुसलिमयादव गठबंधन से सामाजिक न्याय को सत्ता में उतारा. नीतीश कुमार ने ईबीसी और महादलितों को जोड़कर सामाजिक न्याय की राजनीति को विस्तार दिया. साल 2023 के बिहार जाति सर्वे ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को नया डाटा दिया. इस सर्वे मे ईबीसी 36 फीसदी, ओबीसी 27 फीसदी, एससी 19 फीसदी, एसटी एक फीसदी और सामान्य वर्ग तकरीबन 15 फीसदी थे. इस ऐतिहासिक सर्वे में सब से खास बात यह निकल कर आई कि तकरीबन 63 फीसदी आबादी पिछड़ी जातियों की है. इस से सामाजिक न्याय की अहमियत पता चलती है. सामाजिक न्याय सिर्फ राजनीति नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक जरूरत भी है.

भारत की सामाजिक सच्चाई यही है कि मंडल लागू होने के 33 साल बाद भी सामाजिक और आर्थिक समानता पूरी तरह हासिल नहीं हुई है. रिजर्वेशन की बदौलत पिछड़ा समाज मुख्यधारा की ओर बढ़ा, लेकिन इस बीच सरकारी नौकरियां सिमटती चली गईं. निजी क्षेत्र में रिजर्वेशन नहीं होने का खमियाजा पिछड़े ही भुगत रहे हैं. सामाजिक न्याय के बिना आर्थिक विकास अधूरा रह जाता है. बिहार जैसे राज्य में जहां गरीबी और बेरोजगारी सब से ज्यादा है, पिछड़ों का मजबूत होना ही प्रगति का आधार है, इसलिए सामाजिक न्याय की लड़ाई बिहार की उन्नति के लिए जरूरी है. पिछड़ा वर्ग तरक्की करेगा तब ही बिहार में सदियों से फैली गरीबी दूर होगी. क्या सामाजिक न्याय हिंदुत्व की भेंट चढ़ा साल 2025 के विधानसभा चुनावों के नतीजे राजद और महागठबंधन की राजनीति का जैसे अंत साबित हुए हैं. सामाजिक न्याय और दलित चेतना की राजनीति हिंदुत्ववादी राजनीति की भेंट चढ़ गई. यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे राजनीतिक गठबंधनों, प्रोपेगेंडा और नए राजनीतिक समीकरणों का नतीजा है.

90 के दशक में लालू प्रसाद यादव के राजद ने मंडल कमीशन के जरीए ओबीसी को सत्ता में ला करसामाजिक न्यायकी लहर चलाई, जिस से पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और राजनीति में जगह मिली. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के काल कोजंगलराजकी श्रेणी में रखा गया. उच्च जातीय मीडिया का नैरेटिव कामयाब हुआ और साल 2005 में नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन बना कर मुख्यमंत्री बन गए. भाजपा के समर्थन वाली इस सरकार को सुशासन का नाम दिया गया, हालांकि नीतीश कुमार ने ईसीबी, महादलित और महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक न्याय को ही मजबूती दी और साल 2023 में जाति जनगणना कर आरक्षण का दायरा बढ़ाया. यह हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ था, फिर भी उन्होंने ऐसा जोखिम भरा कदम उठाया और इसीलिए नीतीश कुमार को साइडलाइन किया जाना भाजपा के लिए बेहद जरूरी हो गया. साल 2025 चुनाव में राजद कासामाजिक न्याय बनाम हिंदुत्वका नारा फेल हो गया और राजग ने जीत हासिल की. चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के नाम पर हर महिला को 10,000 रुपए दिए गए, जिस से पूरा खेल पलट गया. इस चुनाव में महिलाओं का टर्नआउट पुरुषों से ज्यादा रहा और महिला वोटों की इस बढ़ोतरी का पूरा फायदा सीधे राजग के पक्ष में गया.

चुनाव आयोग ने भी भाजपा के एजेंट की भूमिका बड़ी ईमानदारी और कर्मठता से निभाई. एसआईआर के नाम पर तकरीबन 30 लाख वोटों का सत्यानाश हुआ, जिस का फायदा भाजपा को मिला. लालच और साजिश ने सामाजिक न्याय के नारे को पीछे धकेल दिया. जद (यू) ने कुर्मी और कोइरी यानी ईबीसी को थामे रखा तो भाजपा ने ऊपरी जातियों और गैरयादव ओबीसी के साथ शहरी वोटों पर पकड़ बनाए रखी. हालांकि बिहार में भाजपा हिंदुत्व का कार्ड खेलने से परहेज करती रही. राम मंदिर के बजाय डबल इंजन के नैरेटिव पर फोकस रखा. बूथ लैवल मैनेजमैंट को मजबूत रखा और भाजपा के संगठन ने जमीनी लैवल पर काम किया. जिस पिछड़ी जाति के लोगों ने दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, चेन्नई, पंजाब में ही नहीं, बल्कि खाड़ी के देशों में भी चकाचौंध चमक लाने में हड्डी गलाई, वह अपनी जमीन बिहार में लालू और नीतीश की वजह से फिर औंधे मुंह गिर रही है. तेजस्वी यादव कामाययानी मुसलिमयादव बेस तो मजबूत रहा, लेकिन वे ईबीसी, महिलाओं और नई पीढ़ी को नहीं जोड़ पाए.

परिवारवाद, पुराना रिकौर्ड औरकेवल विरोधकी राजनीति की वजह से भी तेजस्वी यादव बुरी तरह हारे. साल 2020 में राजद सब से बड़ी पार्टी थी, लेकिन साल 2025 में तीसरे नंबर पर सिमट गई.
बिहार में जाति हिंदुत्व पर भारी है, लेकिन अब सामाजिक न्याय की मांग ओबीसी के दिमाग से छिटक कर दूर चली गई है. भाजपा का पूजापाठी नैरेटिव सोशल मीडिया के जरीए नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है. गोदी मीडिया के शोर में प्रोपेगेंडा हावी है. नीतीश फैक्टर और मजबूत मंडल राजनीति के चलते ही बिहार में भाजपा का हिंदुत्व उस के जीते गए दूसरे राज्यों जितना कामयाब नहीं है. राजग की जीत में हिंदुत्व से ज्यादा दूसरे फैक्टर कारगर साबित हुए, लेकिन लंबे समय में भाजपा का दबदबा बढ़ने से सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर हुई है. हिंदुत्व ने जाति को धार्मिक एकता से ओवरराइड कर दिया है. गठबंधन के पीछे
भाजपा का असली खेल साल 2014 से भाजपा ने बिहार में संघ के जरीए गांवदेहात के लैवल पर ऊंची जातियों और ओबीसी के खातेपीते घरों के कार्यकर्ताओं को मजबूत किया, जबकि जद (यू) नीतीश की व्यक्तिगत इमेज पर निर्भर रही.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में राजग की जीत के बाद भाजपा ने जद (यू) के विधायकों पर दबाव बढ़ाया. भाजपा ने जद (यू) के कई नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया, जिस से जद (यू) का वोट बैंक सिकुड़ गया. साल 2010 में भाजपा को सिर्फ 10 फीसदी वोट शेयर मिला था, वहीं साल 2025 में 20 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल किया. भाजपा की रणनीति हर राज्य में अलगअलग है, लेकिन हर जगह सिद्धांत एक ही है, सहयोगियों को कमजोर करना. साल 2019 में भाजपा नेआपरेशन कमलके जरीए जेडीएस के 17 विधायकों को तोड़ लिया. साल 2018 में मध्य प्रदेश में भाजपा ने 28 विधायकों को तोड़ा. सहयोगियों को निगलने की साजिश ही भाजपा की कामयाबी का राज है. इस साजिश में भाजपा हर बार कामयाब रहती है. भाजपा की इस साजिश के पीछे संघ बड़ी भूमिका अदा करता है.

इस मामले में संघ के कार्यकर्ता ईमानदारी से काम करते हैं. महाराष्ट्र में शिव सेना और राकांपा को तोड़ कर तबाह कर दिया. भाजपा की यह रणनीति भारतीय लोकतंत्र को खाई की ओर ले जा रही है. वैसे भी भाजपा का फोकस सत्ता पर कब्जा करना है कि साझेदारी निभाने पर. विपक्ष को मजबूत गठबंधन बनाने होंगे वरना भाजपा रूपी इस अजगर का लोकतंत्र को निगलना जारी रहेगा. भाजपा के चलते बिहार की उपजाऊ जमीन पर गरीबी की कीकर उगती रहेगी  और नालंदा वाला बिहार देश का सब से गरीब राज्य बना रहेगा. नीतीश कुमार की वजह से बिहारी शब्द गाली बन जाएगा, ऐसे जने के लिए जो पलटूराम हो और जिसे राज्य और जनता की फिक्र हो. सामाजिक न्याय की लड़ाई अंबेडकर से मंडल तक की कवायद थी.

नीतीश कुमार ने इस लड़ाई को मूर्त रूप देने की कोशिश जरूर की, लेकिन आखिरकार वे संघ के चंगुल में फंस कर फेल हो गए. अपने राजनीतिक सपनों के चलते नीतीश कुमार ने बिहार को ऐसे मझधार में ला कर छोड़ दिया है, जहां एक ओर सामाजिक न्याय पिचका हुआ है, तो दूसरी ओर हिंदुत्व की तिलकधारी सोच है जो बराबरी के मिशन को पूरा निगल चुकी है. बिहार में भाजपा की लगातार बढ़ती हुई ताकत बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जरूर है, लेकिन यह अंत नहीं है. असली चुनौती अब सामाजिक न्याय की जरूरत की पहचान की है. यह भी सच है कि जब तक धर्म और जाति पर आधारित गैरबराबरी रहेगी, तब तक सामाजिक न्याय की यह लड़ाई जारी रहेगी, क्योंकि लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सब से कमजोर को भी बराबरी का हक मिले.            

शकील प्रेम

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