News Story: इ बार दिल्ली में मौसम नेताओं की तरह पलटूराम बना हुआ है, कभी सर्द तो कभी गरम. बेचारे कूलर बेचने वाले दुकान पर मक्खियां मारते दिख रहे हैं और सिर खुजा रहे हैं कि कूलर का बाजार तेज रहेगा या मंदा. पर आम आदमी थोड़ी राहत की सांस ले रहा है. विजय भी ऐसे ही लोगों की लिस्ट में शामिल है और चूंकि आज रविवार है तो उस ने अनामिका के साथ कहीं घूमने का प्लान बनाया है. पर अनामिका अब तक क्यों नहीं आई? इतने में बाहर कोई हलचल हुई. विजय ने देखा कि कोई काले रंग की उबर गाड़ी से आया था. एक जवान लड़की. पर जैसे ही वह गाड़ी से नीचे उतरी, तो आसपास जमा लोगों की भीड़ की नजरें उस पर ही जम गईं.

उस लड़की ने बिहार के मछुआरों की पारंपरिक चोली और घाघरा जैसी ड्रैस पहनी हुई थी. उस ड्रैस से उस के उभार और ज्यादा उभर आए थे. सिंगार भी किसी मछुआरिन सा था. नंगे पैर जब वह मटकमटक कर चल रही थी, तब कुछ मनचले सीटियां बजाने लगे. चूंकि अभी वह लड़की विजय को साफसाफ नहीं दिख रही थी, तो उसे महसूस ही नहीं हुआ कि यह बिंदास मछुआरिन किस के घर जाएगी. थोड़ा आगे आने पर जब विजय ने उस लड़की को देखा, तो अपना सिर पीट लिया, क्योंकि वह और कोई नहीं, अनामिका थी. विजय हैरान रह गया कि आज अनामिका को इस तरह उस के घर आने की क्या जरूरत थी. थोड़ी देर में डोरबैल बजी और बाहर से आवाज आई, ‘‘ बाबू, हम बाड़, हमरा के जान…’’

विजय ने जल्दी से दरवाजा खोला और अनामिका को ऊपर से नीचे घूरा. टाइट ब्लाउज, बदन से चिपकी धोती और हाथ में एक बैग, अनामिका एकदम अतरंगी लग रही थी.
‘‘जल्दी से अंदर आओ. और यह सब क्या नौटंकी है?’’
‘‘हम बाड़हमरा के खाना चाही,’’ अनामिका ने इतना कहा और खिलखिला कर हंस दी.
‘‘अनामिका, ज्यादा मजाक नहीं.
तुम उतरी तो काली गाड़ी से हो और यह सब प्रपंच क्यों? गाड़ी से आने की क्या जरूरत थी? और तुम आज बिहारी क्यों बोल रही हो? यह मेरे सिर के ऊपर से जा रही है,’’ विजय झल्लाया.
‘‘क्या एक मछुआरे की बेटी अपनी पारंपरिक वेशभूषा नहीं पहन सकती?’’ अनामिका ने सवाल किया.
‘‘पर मौका भी तो होना चाहिए . कोई फैंसी ड्रैस कंपीटिशन तो चल नहीं रहा. तुम तो टीशर्ट और जींस ज्यादा पहनती हो. तुम ने देखा नहीं, लोग तुम्हारी खिल्ली उड़ा रहे थे,’’ विजय
ने कहा.

‘‘मैं विश्वगुरु बनने निकली हूं. मुझे अपनी पारंपरिक वेशभूषा और बिहारी भाषा पर गर्व है.’’
‘‘यहां भाषा कहां से बीच में गई?’’ विजय बोला.
‘‘अपनी महल्ले वाली लड़ाई भूल गया. उन सरदारजी के हक में तू ने खूब बोला, पर उन की ठेठ पंजाबी तू खुद नहीं समझ पाया था. बड़ा चला था तू उन अंकलों का झगड़ा सुलटाने, खुद ही बुराई मोल ले कर बैठ गया. तू भी मोदीजी की तरह कूटनीति में फेल हो गया.’’
‘‘अब यहां पर कूटनीति और मोदीजी कैसे बीच में गए?’’

‘‘जैसे तू उन अंकलों का झगड़ा निबटाने में नाकाम रहा, उसी तरह मोदीजी दावे तो बहुत कर रहे थे, पर ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच की जंग की कूटनीति पर वे फेल हो गए. इस में भाषा का बड़ा रोल होता है. शब्दों का सही खेल ही कूटनीति की कामयाबी की पहली सीढ़ी है. विदेश के मसलों पर आप की भाषाई जानकारी बेवकूफी भी जाहिर कर सकती है.’’
‘‘क्या तुम मुझे आसान शब्दों में समझा सकती हो? मुझ में और मोदीजी की कूटनीति में क्या समानता है?’’
‘‘तुम समझ नहीं रहे हो. किसी राज्य का मुख्यमंत्री होने और देश का प्रधानमंत्री होने में बहुत ज्यादा फर्क है. आप को दुनियाभर में आनाजाना पड़ सकता है. यह ठीक है कि आप की अपनी भाषा पर अच्छी पकड़ है, पर उस का असर विदेशी कूटनीति पर पड़ भी रहा है या नहीं, यह भी बहुत ज्यादा अहम बात है.
‘‘विदेश कूटनीति में भाषा का रोल बहुत खास होता है. वहां वह भाषणबाजी के टूल की तरह इस्तेमाल नहीं होती है, बल्कि एक देश की संस्कृति, इतिहास, और मूल्यों को भी सब के सामने रखती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘जैसे?’’ विजय ने सवाल किया.
‘‘जैसे तुम्हें मेरी बिहारी भाषा के चंद शब्द ही बरदाश्त नहीं हो रहे थे. तुम्हें कोफ्त हो रही थी. तुम मुझे झेल रहे थे.
‘‘पर जब विदेश कूटनीति की बात होती है, तो भाषा विदेश मंत्रियों, राजदूतों और दूसरे कूटनीतिज्ञों के बीच संचार का मुख्य साधन बन जाती है.
‘‘भाषा एक देश की संस्कृति को दूसरे देश में पहुंचाने में मदद करती है, जिस से दोनों देशों के बीच समझ और सहयोग बढ़ता है. यही वजह है कि भाषा व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने में मदद करती है, क्योंकि यह व्यावसायिक संचार को आसान बनाती है.
‘‘सब से जरूरी बात तो यह है कि भाषा राजनयिक संबंधों को मजबूत बनाने में मदद करती है, क्योंकि यह दोनों देशों के बीच समझ और विश्वास को बढ़ाती है.

‘‘मैं हिंदी में किसी प्रधानमंत्री के बात करने को गलत नहीं मानती, पर उस हिंदी को अन्य भाषाओं में जब ट्रांसलेट किया जाता है और दूसरे लोगों को सुनाया जाता है, तब उस दुभाषिए ने क्या उसे सही से समझा है या कहने वाले कीमन की बातका मतलब समझा है, इस की जवाबदेही कौन तय करेगा?’’
‘‘क्या तुम किसी उदाहरण से अपनी बात समझा सकती हो?’’ विजय ने सवाल किया.
‘‘बात बहुत पुरानी है. मैं ने बीबीसी में एक लेख पढ़ा था देवीलाल के बारे में. वही देवीलाल जो हरियाणा के दबंग नेता थे और जिन्हें हरियाणा की जनता नेताऊकी उपाधि दी थी.
‘‘बात साल 1989 की है. 1 दिसंबर, 1989 को आम चुनाव के बाद नतीजे आने के बाद संयुक्त मोरचा संसदीय दल की बैठक हुई और उस बैठक में विश्वनाथ सिंह के प्रस्ताव पर चंद्रशेखर के समर्थन से चौधरी देवीलाल को संसदीय दल का नेता मान लिया गया था.


‘‘देवीलाल धन्यवाद देने के लिए खड़े जरूर हुए, लेकिन सहज भाव से उन्होंने कहा, ‘मैं सब से बुजुर्ग हूं, मुझे सबताऊकहते हैं, मुझेताऊबने रहना ही पसंद है और मैं यह पद विश्वनाथ प्रताप को सौंपता हूं.’
‘‘उस समय तरह तरह की बातें चली थीं. देवीलालकिंगबन सकते थे, परकिंगमेकरबन गए. वीपी सिंह और उन के बीच पहले ही कोई समझौता हो चुका था. हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक तो देवीलाल के खुद का आत्मविश्वास प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं था.
‘‘मुझे लगता है कि अगर खुद में आत्मविश्वास की कमी में भाषा पर अच्छी पकड़ होना भी बहुत माने रखती है. मैं 2 लोगों की बातों से अपना पक्ष रखूंगी. नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री और नामचीन संपादक पत्रकार रहे एमजे अकबर ने देवीलाल के निधन पर लिखे स्मृति लेख में लिखा था, ‘दरअसल, देवीलाल ने महसूस कर लिया था कि शहरी भारत उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, लिहाजा उन्होंने खुद को सब से बड़े पद की दौड़ से अलग कर लिया था.’


‘‘इसी तरह देवीलाल की राजनीतिक जीवनी लिख चुके और आधुनिक भारतीय इतिहासकार प्रोफैसर केसी यादव बताते हैं, ‘देवीलाल खुद बहुत संपन्न परिवार के थे. वे 1930 से ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे, लेकिन उन का अंदाज ठेठ ग्रामीणों वाला ही रहा. वे दिल्ली के पावर कौरिडोर में खेतिहर मजदूरों और गरीबगुरबों की सब से बड़ी उम्मीद थे. देश का अभिजात्य तबका उन को भदेस, दबंग और लठैत नेता की तरह ही देखता रहा.’
‘‘देवीलाल की यहताऊवाली इमेज हरियाणा में तो लोगों को खूब पसंद थी, पर पूरा देश उन्हें उन के भाषाई तेवर से पसंद करता, शायद देवीलाल को भी इस में शक था. खुद उन्होंने या उन के सलाहकारों ने इसे ध्यान में रख कर ही यह फैसला लिया होगा, जो समझदारी भरा फैसला था. इस से देवीलाल कीकिंगमेकरकी इमेज हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई.’’
‘‘तुम्हारी बात में दम है. हम 8,000 करोड़ के हवाईजहाज में तो चल सकते हैं, करोड़ों की काली गाड़ी में सड़कें नाप सकते हैं, पर जब विदेश की कूटनीति पर बात करनी हो, तो भाषा का टूल सब से खास होता है.

‘‘अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मुंहफट नेता हैं. वे कब क्या बोल दें, कोई नहीं जान सकता. वे दुनिया के एक धड़े में मशहूर हो सकते हैं, पर उन का भाषा का लैवल भी कोई कमाल का
नहीं है. ‘‘इधर नरेंद्र मोदीविश्वगुरुहोने का दावा तो करते हैं, पर विदेश कूटनीति में फेल दिखते हैं. उन के हाल में लिए गए बहुत से फैसले लोगों के मन में शक पैदा करते हैं. पड़ोसी देशों से बिगड़ते संबंध इस का सब से बड़ा उदाहरण है.
‘‘चीन की बात करें तो साल 2020 में गलवान घाटी झड़प के बाद एलएसी पर तनाव लगातार बना रहा. व्यापार घाटा रिकौर्ड लैवल पर पहुंचा और सीमा विवाद का कोई पक्का हल नहीं निकला.
‘‘इतना ही नहीं, पाकिस्तान में तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट के बाद भी आतंकवाद और सीमा पार घुसपैठ जारी रही. कूटनीतिक संवाद पूरी तरह ठप है. भारत नेपाल, मालदीव और बंगलादेश में चीन के बढ़ते असर को रोकने में भारत नाकाम रहा. नेपाल ने नया नक्शा जारी किया, मालदीव मेंइंडिया आउटअभियान चला, बंगलादेश में भी चीन का निवेश बढ़ा.


‘‘इजराइल के खुल कर समर्थन से अरब देशों में भारत की पारंपरिक साख को नुकसान पहुंचा है. कतर में
8 पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा का मामला और फिर ईरान इजराइल तनाव में साफ रुख ले पाना, विदेश नीति की दुविधा दिखाता है,’’ विजय ने अपनी बात रखी.
‘‘अब तुम ने सही रग को पकड़ा है. चुनाव के समय जनता के सामने विदेश नीति की बड़ी बड़ी बातें करने से देश की कूटनीति पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, बल्कि हमें समस्या की जड़ में जा कर उस का पक्का हल ढूंढ़ना होता है.
‘‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष असीम मुनीर ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध में कितना अहम रोल निभाते हैं, यह तो आने वाला समय बताएगा, पर उन की गुपचुप कूटनीति पर आज दुनियाभर में बात हो रही है. जो काम भारत के लोग नरेंद्र मोदी से पूरा होने की उम्मीद देख रहे थे, वे सीन में कहीं भी नहीं दिखाई दे रहे हैं,’’ अनामिका बोली.


‘‘तभी तुम आज अपनी पारंपरिक वेषभूषा और बिहारी भाषा का ज्यादा ही दिखावा कर रही थी. मुझे समझ गया है कि दिखावा करना और अमल में लाना दोनों अलग बातें हैं.
‘‘किसी प्रदेश में दिए गए चुनावी भाषण में आप कुछ भी पारंपरिक पहन कर वहां की भाषा के
2-4 वाक्य बोल कर जनता का दिल एक बार को जीत सकते हैं, पर विदेश कूटनीति में हर कदम सोचसमझ कर उठाना पड़ता है. यहीविश्वगुरुबनने का मूलमंत्र है,’’ जब विजय ने यह बात कही, तो अनामिका ने तालियां बजाईं.
‘‘चलो, आज इसी खुशी में मैं तुम्हें लिट्टीचोखा खिलाती हूं. हरी मिर्च का अचार जरूर खाना, उस का स्वाद ही अलग लैवल का होता है,’’ अनामिका ने इतना कहा और आईने के सामने अपने बाल संवारने लगी. अभी उसे अपनी ड्रैस भी बदलनी थी. टीशर्ट और जींस, जिस में वह कमाल की लगती है.         

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