‘‘रे, निर्मला सुन तो सही…’’ ठेकेदार रतन सिंह जैसे ही गाड़ी बाहर खड़ी कर अपने ड्राइंगरूम में आए, तब उन के चेहरे पर अपार खुशियां छाई थीं.
निर्मला सिंह ड्राइंगरूम में कर बोली, ‘‘हां, रतनजी, क्या कहना चाहते हैं? आज आप के चेहरे पर इतनी खुशियां क्यों झलक रही हैं?’’
‘‘अरे निर्मला, मुझे 65 करोड़,
40 लाख रुपए का सरकारी ठेका मिल गया है.’’
‘‘सचमुच रतनजी, यह तो मेरे लिए भी खुशी की बात है. बहुत शुक्रिया रतनजी.’’
‘‘अरे, शुक्रिया तो उस औरत का करो निर्मलाहमारी मेहरी कमला ने उस औरत को सरकारी अफसर के यहां एक रात के लिए भेजा था. क्या नाम था उस कामीनाक्षी. उसी की वजह से मुझे यह ठेका मिला है.’’
‘‘आप की बहुत इच्छा थी यह ठेका पाने की. आप को यह ठेका मिल भी गया,’’ निर्मला सिंह ने यह बात कही और फिर वह अपने काम में लग गई. मगर उस का मन काम में कहां लगा. उस का मन तो पुरानी यादों में खो गया.

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निर्मला सिंह के पति रतन सिंह ठेकेदार थे. वे सरकारी या गैरसरकारी दोनों तरह के ठेके लेते थे, फिर चाहे मकान बनाना हो चाहे पुल बनाना हो. वे शहर के नामी ठेकेदार थे. कमला उन के यहां मेहरी का काम करती थी. 30 साल की खूबसूरत जवान औरत कमला अपना काम ईमानदारी से करती थी. उसे अभी काम पर आए 2 महीने भी नहीं हुए थे, मगर बंगले की झाड़ूबुहारी, बरतन मांजना और पोंछा लगाना वही करती थी. उस के काम से निर्मला सिंह खुश थी. उस दिन जब कमला पोंछा लगा रही थी, तब ठेकेदार रतन सिंह सोफे पर बैठे हुए थे. उन कोनमस्तेकर के अपना पेटीकोट घुटनों तक चढ़ा कर कमला फर्श पर पोंछा लगाने लगी. तब रतन सिंह कनखियों से उस की गोरी पिंडलियों को बारबार देख रहे थे. मगर कमला भी बेफ्रिक हो कर पोंछा लगा रही थी.

थोड़ी देर बाद रतन सिंह बोले, ‘‘कमला, मेरे पास आना.’’
‘‘जी साहब, आती हूं,’’ कमला पोंछा वहीं रख कर रतन सिंह के पास कर बोली, ‘‘हां साहब, कहिए.’’
‘‘मेरा एक काम करोगी, उस का अलग से पैसा दूंगा. करोगी?’’
‘‘कौन सा काम है साहब?’’
‘‘काम तो खास है, पर तुम कर सकती हो,’’ जब रतन सिंह ने यह कहा, तब कमला सोच में पड़ गई. फिर वह बोली, ‘‘ऐसा कौन सा काम है, जो मैं कर सकती हूं. पहले आप काम तो बताइए साहब?’’
‘‘बस, एक अफसर के यहां एक रात गुजारनी है. इतना सा काम है. क्या कर सकोगी? उस सरकारी अफसर ने इसलिए काम अटका भी रखा है,’’ जब रतन सिंह ने यह बात कही, तब भीतर से कमला आगबबूला हो उठी, मगर उस गुस्से को बाहर नहीं आने दिया. कमला नाराज हो कर बोली, ‘‘मैं बिकाऊं औरत नहीं हूं साहब. मैं गरीब और लाचार जरूर हूं, मगर मेरी भी इज्जत है,’’ कमला अभी यह बात कह रही थी कि तभी रतन सिंह का फोन गया. वे फोन सुनने बाहर चले गए.

इसी बीच आड़ में रह कर निर्मला रतन सिंह और कमला की सारी बातें
सुन रही थी. वह बोली, ‘‘कमला, मैं
ने साहब की और तेरी सारी बातें सुन ली हैं.’’
‘‘देखो मेमसाहब, साहब मुझ से घिनौना काम करवाना चाहते हैं. हम गरीबों की इज्जत जैसे सस्ती है. जब चाहे खरीद लेंगे, ये पैसे वाले,’’ नाराजगी से कमला ने यह बात कही.
निर्मला सिंह बोली, ‘‘गुस्सा मत कर कमला. तू मत जाना. मगर मेरी निगाह में एक औरत है. तू साहब से उसे भेजने का कहना. इतना तो कर सकती है ?’’
‘‘मगर वह औरत कौन है मेमसाहब? साहब पूछेंगे उस औरत का नामपता,’’ कमला ने पूछा.
‘‘हां, उस औरत का नाम मीनाक्षी कहना. साहब से आज ही पता और समय ले लेना, बाकी की बात मैं मीनाक्षी को सब समझा दूंगी. समझी
‘‘और सुन, साहब अभी फोन पर बात करने बाहर गए हैं. वे जैसे भीतर आएंगे, मैं आड़ में रह कर सारी बातें सुन लूंगी.’’

तभी रतन सिंह ड्राइंगरूम में आए. कमला उन्हें देख कर बोली, ‘‘साहब, आप काम हो जाएगा.’’
‘‘सच कमला, तुम ने जाने के लिए अपनेआप को तैयार कर लिया?,’’ खुश हो कर रतन सिंह बोले.
‘‘साहब, आप जैसे फोन सुनने बाहर गए, तब मेरे मन में एक बात आई. मेरी एक सहेली है मीनाक्षी, वह यह काम भी करती है. पर उस ने यह कहा…’’
‘‘क्या कहा?’’ बीच में बात काट कर रतन सिंह ने पूछा.
‘‘मैं ने उस से फोन पर बात की. वह जाने को तैयार हो गई है, पर कब और किस समय जाना है? वह खुद ही आप के बताए गए पते पर पहुंच जाएगी?’’
‘‘ठीक है, मैं सरकारी अफसर को आज का ही समय देता हूं. वैसे भी मुझे रात को गांव जाना है. वहां कारीगर और मजदूरों के बीच कोई झगड़ा हो गया है और स्कूल भवन बनाने का काम रुक गया है,’’ कह कर रतन सिंह ने सरकारी अफसर को फोन लगाया और मीनाक्षी के बारे में बताया.
इस के बाद निर्मला सिंह खुद मीनाक्षी बन कर साहब के बताए समय और जगह पर पहुंच गई. साहब
विदेशी शराब पी रहे थे. चौकीदार ने अंदर जाने दिया.

जाते ही निर्मला सिंह बोली, ‘‘मैं मीनाक्षी हूं साहब, ठेकेदार रतन सिंह ने मुझे भेजा है.’’
‘‘आओ मीनाक्षी, मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था. आओ, बैठो मेरे पास,’’ सरकारी अफसर ने नशे में झूमते हुए मीनाक्षी को खींच कर अपने पास बैठा लिया.
तब मीनाक्षी बोली, ‘‘साहब, आप ठेकेदार रतनजी को यह ठेका दे
देंगे ?’’
‘‘कागज तो तमाम उन के नाम के पड़े हैं, बस इंतजार तो था तुम्हारा ही. सारे कागज सुबह ले जाना,’’ सरकारी अफसर ने जब यह कहा, तब मीनाक्षी बोली, ‘‘नहीं साहब, कागज तो आप रतनजी साहब को ही देना. मैं क्या करूंगी?’’
‘‘ठीक है, उन्हीं को देंगे,’’ कह कर सरकारी अफसर ने एक जाम और हलक में गटक लिया.
‘‘निर्मला, निर्मला,’’ जब रतन सिंह ने कर कहा, तब वह यादों से आज में लौट आई और बोली, ‘‘हां, रतनजी, बोलिए?’’
‘‘किस सोच में डूबी हुई थी?
अरे, वह कमला आई क्या?’’ रतन सिंह ने पूछा.


‘‘अरे, अभी तो नहीं आई,’’ निर्मला सिंह ने जवाब दिया.
तभी वहां कमला गई. तब निर्मला सिंह बोली, ‘‘लो, कमला का नाम लिया और वह हाजिर हो गई. बड़ी लंबी उम्र है कमला तेरी. अभी तुझे ही याद किया था.’’
‘‘मेमसाहब, मुझे क्यों याद किया?’’ कमला ने पूछा.
‘‘अरे कमला, उस मीनाक्षी को शुक्रिया कहना. उस की वजह से
मुझे यह ठेका मिला है,’’ रतन सिंह ने जब यह कहा, तब कमला बोली, ‘‘कह दूंगी साहब.’’
‘‘अरे, उसे बुला कर लाना, मैं
देखूं तो सही कौन है मीनाक्षी?’’ रतन सिंह बोले.
‘‘साहब, उस ने आप से मिलने से मना कर दिया है. जब आप का काम हो गया, तब क्या मिलना?’’
‘‘ठीक है कमला. वह नहीं मिलना चाहती है, तब कोई बात नहीं. बस, अपना काम हो गया,’’ कह कर रतन सिंह बाथरूम में चले गए.
कमला रसोईघर में जा घुसी. इधर निर्मला मंदमंद मुसकरा रही थी

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