Sociopolitics: उत्तर प्रदेश और बिहार प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे दक्षिण भारत के कई प्रमुख राज्यों से पीछे हैं. इन राज्यों की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है. उत्तर प्रदेश और बिहार सब से कम आय वाले देश के 2 सब से बड़े राज्य हैं.
कर्नाटक की प्रति व्यक्ति आय
2 लाख, 4 हजार, 605, तमिलनाडु की 1 लाख, 96 हजार, 309 और तेलंगाना की 1 लाख, 87 हजार, 912 रुपए है. इन के मुकाबले उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 1 लाख, 8 हजार, 572 और बिहार की महज 69 हजार, 321 रुपए है.
उत्तर प्रदेश और बिहार देश के 2 सब से बड़े राज्य हैं. उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें और बिहार में 40 सीटें हैं. इस के बावजूद ये विकास की दौड़ में सब से पीछे हैं.
इस की सब से बड़ी वजह यह है कि साल 1990 के बाद से इन राज्यों में उन राजनीतिक दलों का कब्जा हो गया, जो जाति और धर्म के नाम पर सरकार चला रहे थे. उन का प्रदेश के विकास से कोई लेनादेना नहीं था.
जाति के नाम पर राजनीति करने वाले ऐसे दल परिवार और अपनी जाति से बाहर नहीं निकल पाए. जाति और धर्म की सोच ने संविधान और विकास को पीछे धकेल दिया. कोविड काल में इन दोनों राज्यों के रहने वाले मजदूर सब से ज्यादा सड़कों पर मर रहे थे. जान बचाने के लिए वे सब से ज्यादा पैदल चल रहे थे, जिस से इन राज्यों की माली हालत को सम?ा जा सकता है.
अपने घरपरिवार और प्रदेश को छोड़ कर मजदूरी करने वाले सब से ज्यादा उत्तर प्रदेश और बिहार के ही लोग बाहर रह रहे हैं.
उत्तर प्रदेश के ईश्रम पोर्टल पर रजिस्टर्ड श्रमिकों की संख्या 8 करोड़, 40 लाख है. बिहार में यह संख्या
3 करोड़ है. देश के किसी भी राज्य के मुकाबले उत्तर प्रदेश और बिहार के ही मजदूर सब से ज्यादा बाहर मजदूरी करते पाए जाते हैं.
उत्तर प्रदेश और बिहार की गरीबी के प्रमुख राजनीतिक कारणों में सुशासन की कमी, नीति निर्माण में नाकामी, भ्रष्टाचार और जाति पर आधारित राजनीति व बाहुबलियों और अपराधियों का दबदबा शामिल है.
गरीबी मिटाने की जगह जातिवाद को बढ़ावा
इस के कारण शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश कम ही रहा है. इस के अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार में राज करने वाली सरकारों का औद्योगिक विकास पर ध्यान नहीं दिया. सत्ता में बने रहने के लिए विकास की जगह इन दलों ने जातीय और धार्मिक धु्रवीकरण को बल दिया.
इन राज्यों में लंबे समय तक
स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं में ढंग से निवेश नहीं किया गया. राजनीतिक स्तर पर संसाधनों की लूट और विकास की जगह पर केवल सत्ता के लिए काम करने वाली सोच ने गरीबी को बढ़ावा दिया.
कमजोर बुनियादी ढांचे, नीतिगत अस्थिरता और खराब कानून व्यवस्था के कारण औद्योगिक विकास को बढ़ावा नहीं मिला. कृषि पर बहुत ज्यादा निर्भरता और गैरकृषि उद्योगों की कमी के चलते लोगों को दूसरे राज्यों में काम के लिए मजबूरन पलायन करना पड़ता है.
90 के दशक में शुरू हुए राममंदिर आंदोलन ने नौजवानों को धर्म से जोड़ दिया, जिस से वे विकास की बात को सम?ा ही नहीं पाए. इस से पूरी युवा पीढ़ी कांवड़ यात्रा और कलश यात्राओं के लिए ही काम करती रही.
राजनीतिक दलों ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जाति और धर्म का सहारा लिया. प्रदेश के विकास की सोच रखने वाले दलों को सत्ता से बाहर कर दिया गया.
1990 के पहले आईएएस परीक्षा में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की संख्या ज्यादा होती थी. धीरेधीरे बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के नाम कम होने लगे. इस की जगह यहां अपराध और अपराधियों का बोलबाला हो गया.
एक नहीं रह पाए एससी और ओबीसी
बिहार में जमींदारी प्रथा खत्म होने का फायदा यादव, कुर्मी, कोइरी और भूमिहार जैसी जातियों को मिला. वे नए तरह के जमींदार बन कर उभरे. उन का बरताव एससी और एसटी के साथ वैसा ही होने लगा, जैसे पहले के जमींदारों का होता था.
1970 के दशक में इंदिरा गांधी के विरोध और 1990 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार पर ऊंची जातियों का असर कम हुआ.
इस के उलट पिछड़ों में अगड़े खासकर यादव वर्ग ने लालू प्रसाद यादव के सहारे बिहार में जो किया उस ने बिहार को जंगलराज की तरफ धकेल दिया. कांग्रेस की सरकारों के समय बिहार में उद्योगधंधे लगे थे, वे सब बिहार छोड़ कर चले गए.
जिस बिहार को जमींदारी उन्मूलन के बाद पलायन पर काम करना था, वह जातीय बदले लेने पर उतर आया. इस ने नक्सलवाद को जन्म दिया. बिहार के पिछड़े तबके के नेता एससी और एसटी जातियों को कभी खुद के साथ जोड़ नहीं पाए.
1970 के बाद बिहार की राजनीति में कांग्रेस का ब्राह्मणवाद खत्म हुआ, तो 3 गुट बन गए. अगड़ी जातियां नीतीश कुमार के साथ, एससीएसटी जातियां रामविलास पासवान के साथ और ओबीसी जातियां लालू प्रसाद यादव के साथ जुड़ गईं.
लालू प्रसाद यादव ओबीसी में अतिपिछड़ी जातियों को अपने साथ रख कर नहीं चल पाए.
लालू प्रसाद यादव अपनी जाति और परिवार से अलग कोई और समुदाय जोड़ नहीं पाए. वे नए तरह के दबंग बन कर उभरे, जिस को लालू का जंगलराज कहा जाता है. वे अपने साथ रहने वाले को भी बेइज्जत करने से चूकते नहीं थे.
पान खाने के शौकीन लालू प्रसाद यादव जनता के बीच भी अपने किसी मंत्री और अफसर से पान थूकने के
लिए पीकदान उठाने के लिए कह देते थे. वे अपने करीबी रामविलास पासवान और नीतीश कुमार को जोड़ कर नहीं चल पाए. जमींदारी भले ही बिहार में खत्म हुई है, पर नए पैदा हुए जमींदारों ने बिहार को आगे नहीं बढ़ने दिया, जिस के चलते नीतीश कुमार प्रभावी हो गए और लालू राज को खत्म कर वे 20 साल बिहार के मुख्यमंत्री रहे.
साल 2025 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को जीत मिली. कांग्रेस को वहां की सत्ता से बाहर हुए 35 साल का समय बीत गया है. इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी साल 1989 के बाद से कांग्रेस का राज नहीं बन सका. कांग्रेस सभी जाति और धर्म को ले कर साथ चलते हुए विकास का काम करती थी.
जाति और धर्म की राजनीति ने उत्तर प्रदेश और बिहार को खत्म कर दिया है. यह चीन और दूसरे देशों से मुकाबला तो बाद में करेगे अभी तो कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे दक्षिण भारत के कई प्रमुख राज्यों से पीछे हैं.
साल 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल बिहार की जनता को नहीं सम?ा पाई कि लालू के दौर वाला जंगलराज वापस नहीं आएगा. राजद ने कांग्रेस को दबाकुचला सम?ा कर बरताव किया, जिस वजह से उसे हार का सामना करना पड़ा.
बिहार जैसे हालात हैं उत्तर प्रदेश में साल 1989 में उस समय के प्रधानमंत्री वीपी सिंह के मंडल कमीशन लागू करने के फैसले के बाद भाजपा ने इस की काट के तौर पर राम जन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाया. धर्म बनाम जाति या कहें या मंडल बनाम कमंडल की राजनीति में भाजपा को कामयाबी मिलती रही.
उत्तर प्रदेश और बिहार का इस से भला नहीं हुआ. भाजपा ने सवर्णों के अलावा गैरयादव ओबीसी को एकसाथ लाने में कामयाबी हासिल की.
उत्तर प्रदेश में सवर्ण यानी ऊंची जातियों के अलावा राज्य में ओबीसी तबके में कई जातियां हैं, जिन का राजनीतिक वजूद भी है. यादव, कुर्मी, शाक्य, कुशवाहा, निषाद, मौर्य, इन सब के अपने नेता भी हैं.
भारतीय जनता पार्टी ने कुर्मियों की अगुआई करने वाले अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल को अपने साथ लिया. अनुप्रिया पटेल केंद्र सरकार में राज्य मंत्री हैं, वहीं उन के पति आशीष पटेल प्रदेश में मंत्री हैं. उन की बहन डाक्टर पल्लवी पटेल जो समाजवादी पार्टी के सहयोग से साल 2022 का विधानसभा चुनाव जीती थीं, इस के बाद भी समाजवादी पार्टी उन को अपने साथ जोड़ कर नहीं चल पाई.
भाजपा के दूसरे सहयोगी दलों में निषाद पार्टी और सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) भी हैं. निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद, अपना दल के आशीष सिंह और सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं.
समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुसलिम और यादव के समीकरण के साथ चल रही है. साल 2024 में पार्टी ने पीडीए का नारा दिया और लोकसभा चुनाव में प्रदेश में सब से ज्यादा सीटें जीतीं.
समाजवादी पार्टी ने पीडीए का मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक बताया था. हालत यह है कि इस के नेता अखिलेश यादव समय के साथसाथ इस परिभाषा को बदलते रहते हैं.
बसपा ने दलितों को एकजुट कर के अपनी राजनीतिक पहचान बनाई और प्रदेश में मायावती 4 बार मुख्यमंत्री बनीं. इस के बाद भी दलितों के लिए कोई काम नहीं कर पाईं. बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई. वहीं प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में उस का एक विधायक है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले
2 दशक में मायावती ने साल 2007 में अपने दम पर सर्व समाज का नारा दे कर सत्ता हासिल की थी. बसपा को 206 सीटों पर जीत मिली थी. इस के बाद कमोबेश अखिलेश यादव सब की बात कर के और मायावती सरकार के खिलाफ बने माहौल पर चुनाव जीते और साल 2012 में मुख्यमंत्री बने थे.
भाजपा ने 2017 और 2022 में सरकार बनाई है. इन दोनों चुनाव में हिंदुत्व का और सोशल इंजीनियरिंग का खास खयाल किया गया था. इस में कट्टर हिंदुत्व का तड़का लगाया.
भाजपा ने पहली बार प्रदेश में 312 सीटें जीती थीं. 2022 में भाजपा की सीटें पहले से कम हुईं, लेकिन तब भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बने.
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव हैं. समाजवादी पार्टी पीडीए के भरोसे राजनीतिक दांव चल रही है. कांग्रेस अभी समाजवादी पार्टी के साथ है. मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की है.
एक साल पहले ही 2027 के उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अपने अपने असर को बढ़ाने में जुट गई हैं. इस के तहत समाजवादी पार्टी कांग्रेस को ही कमजोर करने में लगी है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रभारी और कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस छोड़ कर समाजवादी पार्टी जौइन कर ली.
साल 2024 के लोकसभा चुनाव
में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने एकदूसरे का साथ दे कर चुनाव लड़ा था, जिस के असर से लोकसभा चुनाव में सपा को 37 और कांग्रेस को 7 सीटों पर कामयाबी मिल गई थी.
लोकसभा चुनावों के बाद जो भी उपचुनाव हुए उस में सपा और कांग्रेस ने अलगअलग चुनाव लड़े थे. ये चुनाव भाजपा जीती और सपा और कांग्रेस हार गईं. साल 2027 के विधानसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी कांग्रेस को कम से कम सीट देने की योजना पर चल रही है. वह सोच रही है कि जातीय राजनीति कर के चुनाव जीत लेगी.
ऐसे में सब से पहले वह मुसलिम तबके को अपने साथ रखना चाहती है. दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी है. वह ब्राह्मण तबके को अपने साथ रख कर चुनाव जीतना चाहती है.
साल 1993 का एक दौर था जब बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी मिल कर भारतीय जनता पार्टी को रोक रहे थे. सपाबसपा के बीच आपसी टकराव से यह गठबंधन टूट गया. इस के बाद एससी और ओबीसी जातियां एकजुट नहीं हो पाईं.
जिन मुलायम सिंह यादव और कांशीराम को एससी और ओबीसी जातियों के लिए काम करना था, वे मायावती और अखिलेश यादव की राजनीति को स्थापित करने में लग गए. दलित आंदोलन हो या मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करना, सत्ता की दौड़ में यह पीछे छूट गया.
उत्तर प्रदेश हो या बिहार कांग्रेस ने जाति और धर्म की राजनीति नहीं की. वह हर समाज और संप्रदाय को साथ ले कर चल रही थी. उस के नेताओं ने भले ही इस को बढ़ाने का काम किया था, पर कांग्रेस की नीतियां विकासवादी थीं. जैसेजैसे कांग्रेस का उत्तर प्रदेश और बिहार से खात्मा हुआ, इन दोनों ही प्रदेशों में विकास की जगह जाति और धर्म ने ले ली. यहां विकास ठप हो गया.
उत्तर प्रदेश और बिहार को अब जातिवादी सोच वाले दल नहीं चाहिए. जब तक जनता को यह सम?ा नहीं आएगा, ये दोनों ही प्रदेश विकास में अपने से छोटेछोटे प्रदेशों से पीछे रहेंगे.




