Social Story: मध्य प्रदेश, जिसेभारत का दिलकहा जाता है, अपनी सांस्कृतिक विरासत और कुदरती नजारों के लिए जाना जाता है. हालांकि, इस राज्य के सामाजिक पहलू पर एक गहरा दाग है बाल विवाह. बाल विवाह केवल एक कानूनी अपराध है, बल्कि यह लड़कियों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को बाधित करने वाला एक गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन भी है.


सरकार भी समयसमय पर इसे ले कर कड़ा रुख अपनाती रही है, इस के बावजूद यह कलंक इस तरह प्रदेश के माथे पर लगा है कि इस से छुटकारा ही नहीं मिल रहा है. सामाजिक संस्थाओं और सरकार के अब तक किए गए काम यह बताते हैं कि वे भी इस रूढि़वादी परंपरा के आगे बौने ही साबित हो रही हैं.
हाल ही में मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश किए गए आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को और भी भयावह रूप से दिखाते हैं. राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया द्वारा कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह के सवाल के जवाब में यह खुलासा हुआ है कि राज्य में पिछले 5 सालों (साल 2020 से साल 2025 तक) के दौरान बाल विवाह के मामलों में लगातार और चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज की गई है.


ये आंकड़े साफतौर पर दिखाते हैं कि सरकारी कोशिशों के बावजूद सामाजिक और माली जड़ें इस बुराई को खत्म होने नहीं दे रही हैं, बल्कि यह समस्या और ज्यादा डरावना रूप लेती जा रही है. पिछले 5 सालों में बाल विवाह के मामले विधानसभा में पेश किए गए आंकड़े इस बात की तसदीक करते हैं कि साल 2020 से साल 2025 तक बाल विवाह के मामलों में कोई कमी नहीं आई, बल्कि इन में बढ़ोतरी हुई है, जो एक गंभीर चेतावनी है.


साल 2020 में 366, साल 2021 में 436, साल 2022 में 519, साल 2023 में 528, साल 2024 में 529 और साल 2025 में 538 (यह आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता है) बाल विवाह होने की बात सामने आई है. इस तरह साल 2020 से साल 2025 तक राज्य में 2,916 बाल विवाह होने के मामले सामने आए हैं.
अगर आंकड़ों को ध्यान से देखें तो साल 2020 में 366 मामले थे, जो साल 2025 में बढ़ कर 538 हो गए. यह तकरीबन 47 फीसदी की बढ़ोतरी को दिखाता है.


यह बढ़ोतरी साल दर साल लगातार जारी रही है (366, 436, 519, 528, 529, 538), जो दिखाता है कि
केवल मामले दर्ज हो रहे हैं, बल्कि इस सामाजिक बुराई का प्रचलन अभी भी जारी है और शायद इसे असरदार ढंग से रोका नहीं जा रहा है. यह भी ध्यान देने लायक है कि ये केवल सामने आए या दर्ज किए गए मामले हैं. बाल विवाह के मामले इस से कहीं ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि गांवदेहात या दूरदराज के इलाकों में कई बाल विवाह दर्ज ही नहीं हो पाते हैं.


सभी जिले एकसमान नहीं बाल विवाह की यह समस्या राज्य के सभी जिलों में एकसमान नहीं है. कुछ जिले इस सामाजिक बुराई केहौटस्पौटबन कर उभरे हैं, जबकि दूसरे जिलों में हालात थोड़ा बेहतर कहे जा सकते हैं. दमोह जिले में 115, राजगढ़ में 44, छतरपुर में 35, गुना में 28, देवास में 24, सागर में 24, नरसिंहपुर में 23 और मंडला में 20 बाल विवाह होना पाया गया है. दमोह जिले के हालात काफी चिंताजनक हैं. साल 2025 में यहां अकेले 115 बाल विवाह दर्ज किए गए, जो कि राज्य में कुल मामलों का तकरीबन 21 फीसदी है.


सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दमोह जिला पिछले कई सालों से ही सब से ज्यादा प्रभावित रहा है. वहां साल 2022 में 64 बाल विवाह हुए थे, जो साल 2025 में बढ़ कर 115 हो गएयह साल 2022 से साल 2025 तक तकरीबन 80 फीसदी की बढ़ोतरी दिखाता है, जो इस बात का सुबूत है कि दमोह जिले में बाल विवाह रोकने की कोशिश केवल नाकाम रही है, बल्कि हालत बदतर हुई है.


दूसरे प्रभावित जिले राजगढ़ (44), छतरपुर (35), गुना (28), देवास (24) और सागर (24) भी उच्च संख्या वाले जिलों में शामिल हैं. इस के उलट मैहर, रीवा, आगर मालवा, उमरिया, मऊगंज, खंडवा और बुरहानपुर ऐसे जिले रहे, जहां साल 2025 में बाल विवाह का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ. बालाघाट में भी साल 2025 में महज एक मामला सामने आया, जबकि साल 2020 से साल 2024 तक यहां एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ था.


इन जिलों के आंकड़ों की स्टडी यह सम?ाने के लिए जरूरी है कि किन जिलों में सरकारी योजनाएं और सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम असरदार ढंग से काम कर रहे हैं. इन जिलों में भी बढ़े बाल विवाह
जबलपुर और छिंदवाड़ा जैसे जिलों में बाल विवाह के मामलों में भारी बढ़ोतरी (400 फीसदी और 116 फीसदी) यह दिखाती है कि यह समस्या अब केवल गांवदेहात के इलाकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शहरी इलाकों में भी फैल रही है. सिवनी में इन की कमी और पांढुर्णा जिलों में स्थिरता 2 अच्छे संकेत हो सकते हैं, जिन की जांच की जानी चाहिए.


बाल विवाह रोकने के लिए सरकारी कदम बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत कार्रवाई की जाती है, जिस के तहत बाल विवाह की सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासन द्वारा शादियों को रोकना होता है. इस के अलावा हर जिले में कलक्टर, पुलिस अधीक्षक की अध्यक्षता में एक विशेष टीम या टास्क फोर्स बनाना, खासतौर परअक्षय तृतीयाऔरदेवउठनी एकादशीजैसे विवाह प्रधान त्योहारों के दौरान जिला बाल संरक्षण इकाई, चाइल्डलाइन (1098) और महिला एवं बाल विकास विभाग के जरीए शिकायत दर्ज करने के इंतजाम को मजबूत करना होता है.


जागरूकता और सामाजिक पहल मध्य प्रदेश सरकार द्वारा संचालित यह अभियान बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता फैलाने पर फोकस किया गया है. लड़कियों को स्कूल में बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं, जैसे कि लाड़ली लक्ष्मी योजना चलाई जा रही है, ताकि पढ़ाईलिखाई के जरीए शादी की उम्र को आगे बढ़ाया जा सके. पंचायत सदस्यों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, टीचरों और धार्मिक नेताओं को बाल विवाह के गलत नतीजों के बारे में ट्रेनिंग देना भी जरूरी है, जो समयसमय पर इसे ले कर जागरूकता ला सकें.


समस्या की जड़ें और हल मध्य प्रदेश में बाल विवाह के होते रहने के पीछे कई सामाजिक, माली और सांस्कृतिक वजहें हैं. गरीब परिवारों में लड़की को अकसर बो? माना जाता है. जल्दी शादी कर के परिवार दहेज और बेटी के पालनपोषण के खर्च से छुटकारा पाना चाहते हैं. इस के अलावा पढ़ाईलिखाई की कमी और जागरूकता की कमी भी एक बड़ी वजह है. ज्यादातर बाल विवाह उन समुदायों में होते हैं जहां पढ़ाईलिखाई का लैवल कम होता है. मातापिता बाल विवाह के कानूनी नतीजों और बेटी की सेहत पर इस के पड़ने वाले बुरे नतीजों से अनजान होते हैं


रूढि़वादी सामाजिक परंपराएं कुछ समुदायों में परंपरागत रूप से शादी के लिए शुभ तिथियां होती हैं (जैसे अक्षय तृतीया), जिस दिन सामूहिक विवाह कराए जाते हैं. इन सामूहिक विवाहों में प्रशासन की निगरानी को धता बताना आसान होता है. इस के अलावा, लड़कियों की शुद्धता (कुआंरापन) बनाए रखने के सामाजिक दबाव के चलते जल्दी शादी कर दी जाती है. कानून तो है पर पालन में कड़ाई नहीं
कानून मौजूद है, लेकिन कई बार स्थानीय लैवल पर राजनीतिक दबाव, सामाजिक बहिष्कार के डर या प्रशासनिक लापरवाही के चलते बाल विवाह की शिकायतें दर्ज नहीं हो पाती हैं या उन पर कार्रवाई नहीं हो पाती है. दमोह जैसे जिलों में इन मामलों में भारी बढ़ोतरी इस बात का सुबूत है कि कानून का पालन करने में कहीं कहीं बड़ी खामी है.


मध्य प्रदेश में बाल विवाह के मामलों में पिछले 5 सालों की लगातार बढ़ोतरी एक गंभीर सामाजिक चिंता का विषय है. साल 2020 में 366 से बढ़ कर साल 2025 में 538 मामलों तक पहुंचना एक चेतावनी है.
नए नजरिए की जरूरत दमोह जैसे जिलों में बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों, पुलिस और महिला एवं बाल विकास विभाग की टीमों की जवाबदेही तय की जाए. नकामी पर कठोर कार्रवाई जरूरी है. पढ़ाईलिखाई को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देना, लड़कियों की पढ़ाई पर फोकस करना और इस के लिए खास
बढ़ावा देना और छात्रवृत्ति योजनाएं शुरू की जानी चाहिए. पढ़ाईलिखाई शादी की उम्र बढ़ाने का सब से कारगर उपाय है.


सरकार को नाबालिग वधुओं द्वारा जन्म दिए गए शिशुओं और शिशु मृत्युदर के आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए. यह डाटा आम लोगों को इस समस्या की गंभीरता सम?ाने में मदद करेगा. बेटियों के लिए यह करना जरूरी मध्य प्रदेश कोभारत का दिलबनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी नौजवान पीढ़ी, खासकर अपनी बेटियों को एक सेहतमंद, तालीमशुदा और सुरक्षित भविष्य दें. बाल विवाह को खत्म करना केवल कानूनी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक जरूरत है. राज्य केवल तभी तरक्की कर सकता है, जब उस की हर बेटी 18 साल की उम्र से पहले दुलहन बनने के बजाय, अपने सपनों को पूरा करने के लिए आजाद होगी.


सुबूत मिला, सजा मध्य प्रदेश में बाल विवाह की जड़ें आज भी समाज में गहरी जमी हुई हैं. सरकारी आंकड़ों में अकसर बाल विवाह रोकने और उन के ग्राफ के गिरने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के उलट एक बड़ी प्रशासनिक नाकामी की ओर इशारा करती है. चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार के पास बाल विवाह होने के आंकड़े तो मौजूद हैं, लेकिन उन पंडितों, मौलवियों या बिचौलियों की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है, जो इन गैरकानूनी शादियों को कराते हैं.
देवउठनी एकादशी, अक्षय तृतीया जैसे मुहूर्तों पर प्रदेश में सैकड़ों बाल विवाह होते हैं. इस बात को सरकार भी स्वीकार कर रही है.


प्रदेश का महिला एवं बाल विकास विभागलाडो अभियानजैसी योजनाओं का प्रचार तो करता है, लेकिन जब बात जिलेवार दर्ज मामलों और कानूनी कार्रवाई की आती है, तो विभाग अकसर चुप्पी साधे रहता है.
बिना किसी ठोस डाटाबेस के यह पहचानना मुश्किल है कि किन इलाकों में इस कानून को सब से ज्यादा तोड़ा जा रहा है. सरकार के पास इस बात के आंकड़े नहीं हैं कि सरकार ने बाल विवाह कराने वाले मातापिता, पंडितों और मौलवियों के खिलाफ कब और किस तरह की कार्रवाई की.


वहीं कुछ जिलों में जरूर यह बात सामने आई है कि अधिकारियों ने बाल विवाह होने की तसदीक होने पर मातापिता, पंडितों के खिलाफ मामले दर्ज कराए, मगर इन मामलों में सरकार के पास ये सुबूत नहीं थे कि वह साबित कर सके कि इन्होंने बाल विवाह कराया. इस के चलते इन मामलों में भी कुसूरवारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है. चिंता की बात यह है कि अगर सरकार बाल विवाह होना चिन्हित करती है तो फिर अदालतों में वह इसे साबित क्यों नहीं कर पाती है? इस के पीछे सब से बड़ी वजह प्रशासनिक लापरवाही ही मानी जा सकती है. मगर सरकार ने अब तक इस लापरवाही को रोकने के लिए कोई कड़ा कदम नहीं उठाया है.


कागजी चेतावनी, जमीनी हकीकत कुछ और मध्य प्रदेश में बाल विवाह रोकने को ले कर सरकार और प्रशासन का रुख अब पहले से कहीं ज्यादा सख्त दिखाई देता है. हाल के सालों में यह साफ हुआ है कि अब केवल मातापिता ही नहीं, बल्कि बाल विवाह कराने वाले पंडित, मौलवी, काजी और आयोजन कराने वाले भी सीधे कानूनी कार्रवाई के दायरे में लाए जा रहे हैं. बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत किसी भी शख्स द्वारा नाबालिग की शादी कराना या उस में सहयोग करना दंडनीय अपराध है.


इस के बावजूद लंबे समय तक प्रैक्टिकल लैवल पर धार्मिक कर्मकांड कराने वाले और आयोजन से जुड़े लोग खुद को जिम्मेदारी से बाहर मानते रहे. अब प्रशासन ने इस सोच को बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं. प्रशासनिक लैवल पर कई जिलों में पंडितों, मौलवियों, बैंडबाजा, टैंट और कैटरिंग सेवाओं को साफ निर्देश दिए गए हैं कि वरवधू की उम्र को सर्टिफाई किए बिना शादी कराई जाए.
इस बात को मानने के हालात में एफआईआर और लाइसैंस रद्द करने जैसी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है. मगर अब तक इस तरह के मामले दर्ज नहीं किए गए हैं और ही प्रदेश में किसी का लाइसैंस ही रद्द किया है.


कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
जब तक शादी कराने वाले पुरोहितों और मददगारों पर कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक इस प्रथा को रोकना नामुमकिन है. कुसूरवारों की जानकारी होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़ा करता है. केवल शादी रोकना ही काफी नहीं है, बल्कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत उन सभी पर कड़ी कार्रवाई जरूरी है जो इसे बढ़ावा देते हैं.
समाज की इस बुराई को खत्म करने के लिए केवल आंकड़ों को जमा करना ही काफी नहीं है, बल्कि अपराधियों की पहचान और जिलेवार साफ और सही जानकारी हासिल कर बाल विवाह को रोकने के लिए उचित और कठोर कदम उठाना चाहिए


जानकारी से खुद अनजान हैं मंत्री
प्रदेश की महिला बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया कहती हैं कि बाल विवाह रोकने के लिए सरकार द्वारा प्रदेश में बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी नियुक्त किए गए हैं. ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओके तहत हर महीने कार्यक्रम कराए जाते हैं. जागरूकता अभियान के तहत अपील जारी करना, कार्यशाला, रैली, नुक्कड़ नाटक, बाल चौपाल वगैरह का आयोजन किया जाता है.
बाल विवाह रोकने के लिए जिले और ब्लौक लैवल पर खास टीमें, सूचना दल, उड़नदस्ता, कंट्रोलरूम बनाए जाते हैं. मगर बाल विवाह नहीं रोकने के लिए कितने अधिकारियों पर कार्रवाई की गई, इस बात की जानकारी से वे भी अनजान हैं. वे खुद विधानसभा में यह कह चुकी हैं कि इस संबंध में उन्हें जानकारी
नहीं है.   

राजेंद्र पाराशर                             

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...