Hindi Story: डो बैल की आवाज सुन कर अमन ने दरवाजा खोला.
‘‘अरे, मंजरी तुम? यहां कैसे अचानक?’’
‘‘अंदर नहीं आने दोगे क्या? सारे सवालों के जवाब यहीं चौखट पर चाहिए?’’
‘‘अरे, नही. आओ, अंदर आओ,’’ अमन ने पानी का गिलास पकड़ाते हुए पूछा, ‘‘यहां कैसे?’’
‘‘तुम एक्सपैक्ट नहीं कर रहे थे मुझे’’
‘‘यों अचानक कैसे कर सकता हूंतुम्हीं बताओ?’’
अभी उन्होंने बात शुरू ही की थी कि अचानक मौसम पलटने लगा. सुरमई घटाओं के साए यहांवहां दौड़ने लगे, हवा ने भी ठंडक से दोस्ती कर ली और बादल भी अपनी धीमी आवाज में ताल छेड़ने लगे. सावन का महीना, कब धूप कब बारिशवैसे भी दिल्ली का अपना कोई मौसम तो है नहीं. आसपास के मौसम में रंग जाता है और बिखर भी जाता है.
‘‘लगता है कि बारिश होगी…’’ अमन ने मंजरी के हाथ से गिलास वापस लेते हुए कहा.
‘‘हां, लगता तो है.’’
‘‘इस से तो तुम्हें वापसी में परेशानी हो सकती है.’’
‘‘तो क्या मैं यहां नहीं रुक सकती?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘फैसला तुम्हारा ही था, रुकने का,’’ अमन ने मंजरी की बु? सी आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें जाना क्यों है? क्यों जाना चाहती हो अपना भरापूरा, बसाबसाया घर छोड़ कर
‘‘सबकुछ तो है तुम्हारे पास. एक बड़ा घर, बैंक बैलेंस, 2 खूबसूरत बच्चे, एक अच्छी नौकरी वाला सच्चा पति और उस पर तुम्हारी इतनी अच्छी जौब. मु? से ज्यादा ही कमाती हो, फिर संतुष्ट क्यों नहीं हो तुम?’’
‘‘हां, मैं संतुष्ट नहीं हूं तुम से.’’
‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ अमन
ने पूछा
‘‘यही कि तुम मु? संतुष्ट नहीं कर पाते हो.’’
अमन पर जैसे बिजली गिरी. कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर अपने अंदर की सारी ताकत जमा करता हुआ वह बोला, ‘‘देखो, मैं एक आम इनसान हूं, कोई सुपरमैन नहीं.’’
‘‘पर मु? सुपरमैन ही चाहिए…’’ मंजरी ने अमन के चेहरे पर नजर गड़ाए हुए कहा, ‘‘जो मु? शारीरिक रूप से संतुष्ट कर सके, चरम सुख का अहसास
करा सके.’’
‘‘वाहियात किस्म की मैगजीन पढ़ कर दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा.’’
‘‘छोड़ो, मैं तुम से किसी बहस में उल?ाना नहीं चाहती.’’
‘‘अगर मु? में कुछ कमी होती तो हमारे ये 2 बच्चे कैसे हो गए?’’
‘‘बच्चे तो हिजड़ों के भी हो जाते हैं,’’ मंजरी की यह बात सुन कर अमन भीतर ही भीतर गुस्से से तमतमाने लगा. उस का दिल चाहा कि 2 थप्पड़ में सारा चरम सुख पानी की तरह बहा दे, लेकिन उस ने खुद पर बड़ी मुश्किल से
कंट्रोल पाते हुए कहा, ‘‘देखो, अभी तुम बहकी हुई हो, सोचसम? कर सही फैसला लो.’’
‘‘अच्छी तरह सोच समझकर लिया है मैं ने यह फैसला. वैसे भी तुम्हारे साथ बहुत समय गंवा दिया है मैं ने. मैं तुम से तुम्हारी दौलत और जायदाद मैं से कोई हिस्सा नहीं मांग रही हूं और ही तुम्हें कोर्टकचहरी में फंसाना चाहती हूं. मैं बस तुम से आजाद हो कर अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बिताना चाहती हूंबिंदास.’’
‘‘चलो, मैं मान लेता हूं कि तुम्हें चरम सुख नहीं दे पाता हूं, मगर ऐसा
प्ले बौय टाइप का आदमी तुम्हें
मिलेगा कैसे और कहां?’’ अमन ने चिंतित आवाज में कहा.
मंजरी मुसकराती हुई अपना बैग उठा कर दरवाजे से बाहर निकल गई.
‘‘हां, फैसला तो मेरा ही था. बच्चे कहां हैं? आज तो संडे है, घर पर ही होना चाहिए,’’ मंजरी ने इधरउधर नजर दौड़ाते हुए कहा.
‘‘बच्चे याद हैं तुम्हें?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.
‘‘ताना दे रहे हो?’’
‘‘तुम जो चाहे सम?. तुम्हारा अपना दिमाग है और अपनी सोच.’’
‘‘जन्म तो मैं ने ही दिया था.’’
‘‘काश, जाते समय यह सोच लेती. खैर, छोड़ो मैं भी किन बातों में उल? गयाकौफी पियोगी?’’ अमन ने पूछा.
‘‘तुम ने बच्चों से क्या कहा? उन की मां कहां गई?’’
‘‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं दिल्ली शिफ्ट हो गया हूं?’’ अमन
ने कुरेदा.
‘‘तुम सरकारी नौकर हो, आसानी से पता मिल गया. बच्चों से क्या कहा तुम ने? और बच्चे हैं कहां?’’
‘‘इन सब बातों में क्यों उल? रही हो तुम? वैसे, तुम आई क्यों हो?’’
‘‘बताते क्यों नहींबच्चे कहां हैं?’’
‘‘जैसे मेरा पता किया, बच्चों का भी पता कर लेती…’’
‘‘मतलब तुम नहीं बताओगे?’’
‘‘क्या तुम भी बच्चों की रट
लगा रही होतुम ने कल रात कोई
सामाजिक उपन्यास पढ़ लिया क्या पोर्न मैगजीन की जगह?’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
बादलों की तेज गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी और बारिश होने लगी. अभी बारिश थोड़ी हलकी ही थी,
लेकिन शोर बहुत था पानी काजो पानी कभीकभी गंदगी अपने साथ बहा ले जाता है और ले भी आता है.
बाहर लौन में पानी के ऊपर गंदगी जमा होने लगी. साथ ही बारिश धीरेधीरे तेज होने लगी, लेकिन अब शोर कुछ कम हो गया था.
मंजरी कुछ बोली, बस आंखें बंद किए सोफे से सिर टिकाए रही.
अमन ने उठ कर कौफी बनाई, साथ ही कुछ स्नैक्स भी टेबल पर ला कर रखते हुए बोला, ‘‘कौफी पियो.’’
‘‘तुम तो मेहमान सम? कर खातिरदारी कर रहे हो…’’ मंजरी ने अमन की आंखों में ?ांकते हुए कहा.
‘‘लेकिन मेहमानों से लोग खुश
होते हैं.’’
‘‘पर मेरे आने से तुम खुश नहीं हो.’’
‘‘सच तो यह है कि कोई अहसास ही नहीं हो रहा है.’’
‘‘अगर मैं आती तो?’’
‘‘तो कुछ नहींअब आई हो तो भी कुछ नहींकुछ जिंदा नहीं है.’’
‘‘ठीक कहा तुम ने. हम मर ही तो जाते हैं ख्वाहिशों में घिर कर…’’
‘‘तुम्हारे चरम सुख का अहसास कैसा रहा और अनुभव भी?’’
‘‘कुछ दिन तो अच्छा लगता है, फिर हम थकने लगते हैं.’’
‘‘तो अभी अच्छा लगता है या थक गई हो?’’
‘‘तुम्हें क्या लगता है?’’
‘‘थकावट तुम पर ज्यादा भारी पड़ गई है शायद.’’
‘‘तुम पहले से भी ज्यादा सम?ादार हो गए हो.’’
बारिश अब मूसलाधार हो गई है.
घर के आंगन में थोड़ा पानी ठहरने लगा है. बाहर की सड़कें डूब गई हैं. सारा कूड़ाकचरा पानी पर तैरने लगा है. बारिश के दिनों में दिल्ली बद से बदतर हो
जाती है.
‘‘तुम यहां कहां ठहरी हुई हो? वैसे, मु? पूछना तो नहीं चाहिए था,’’ अमन ने चुप्पी तोड़ी.
‘‘क्या जाने के लिए कह रहे हो?’’
‘‘सम?ादार तो तुम भी बहुत हो,’’ कहते हुए अमन ने खिड़कियों के परदे हटा दिए और कांच वाले पल्ले खोल दिए. अब ड्राइंगरूम में कुछ ताजा हवा आने लगी.
‘‘अभी तो शाम होने में समय है,
जब बरसात रुक जाए तो चली जाना,’’ अमन बोला.
‘‘सैक्स में भी यही होता हैपानी खत्म सैक्स खत्म. बरसात हवस एकजैसे ही हैं, जब तक बरसात कायम है तब तक मौसम सुहाना रहता है, उस के बाद उमस. सैक्स में आकर्षण तो है, पर हमेशा के लिए नहीं.’’
‘‘हमेशा के लिए तो कुछ भी नहीं होता मंजरी.’’
‘‘प्यारहोता है हमेशा के लिए.’’
‘‘अब तुम 40 की हो गई हो. जब
28 की थी तो चरम सुख के लिए भटकी, अब प्यार के लिए? तुम ने जिंदगी को जरूरतों के हिसाब से जीने की कोशिश की, पर जिंदगी आपसी तालमेल और सहयोग से भी जी जा सकती थी,’’ अमन ने कहा.
‘‘उपदेश दे रहे हो?’’
‘‘जब उपदेश देना चाहता था, तब तुम ने सुना नहीं. अब क्या फायदा इन प्रवचनों का?’’
‘‘भूल सुधारी भी जा सकती है और राह से भटका इनसान सही राह पर भी सकता है.’’
‘‘बिलकुल, अगर वह भूल हो तो.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो ? मैं पछतावा करूं?’’ मंजरी थोड़ी तेज आवाज में अमन से बोली.
‘‘नहीं. मैं क्यों चाहूंगा? मेरा इस
से क्या सरोकार?’’ अमन ने कहा.
‘‘सरोकार होता तो तुम वह करते जो मैं कहती थी.’’
‘‘मतलबजोश बढ़ाने वाली
दवा? जो तुम मैगजीन में पढ़ कर सजैस्ट करती थी…’’
‘‘पर तुम एक बार कोशिश कर के तो देखते.’’
‘‘मैं जैसा था खुद से सैटिस्फाई था और हूं भी. तुम भी अब सैटिस्फाई
तो होगी? 12 साल से चरम सुख लेने
के बाद?’’
कमरे में खामोशी छा गई. सिर्फ बारिश की आवाज अपने सुरीले अंदाज में आलाप ले रही थी. हवा में थोड़ी और ठंडक बढ़ गई थी और थोड़ा अंधेरा भी बढ़ गया था. ऐसा लगता था सावन आज अपने पूरे जोबन पर है.
‘‘तुम मु? माफ नहीं कर सकते?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘शायद तुम जानती हो कि मैं इस तरह नहीं सोचता. अंधेरा बढ़ रहा है और बारिश भी. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहेगा. बारिश भी रुकेगी और अंधेरा भी छंटेगा. बस, थोड़ा सा समय लगेगा,’’ अमन ने कहा.
‘‘मगर, इस चक्कर में कहीं ज्यादा देर हो जाए?’’
‘‘तुम फिक्र मत करो, मु? खाना बनाना आता है. आज मेरे हाथ का बना खाना खा कर जाना,’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘मैं ने खाने की बात नहीं की. और यह क्या तुम ने जाने की रट सी लगाई हुई है?’’
‘‘तो फिर…’’ अमन बोला.
‘‘मैं कहीं नहीं जाने वाली.’’
‘‘इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी मंजरी.’’
‘‘इस बार भी मेरी ही चलेगी. मैं यहां  तुम्हारे पास मरने आई हूं. मेरा हक है अपने घर में मरना. मैं अभी भी तुम्हारी पत्नी हूं.’’
‘‘कहना क्या चाहती हो?’’
‘‘2 महीने हैं मेरे पास, वे तुम्हारे साथ  बिताना चाहती हूं. यूटरस में कैंसर पड़ गया है.’’
‘‘यूटरस तो निकाला जा सकता है.’’
‘‘तो तुम मु? जिंदा देखना चाहते हो?’’ मंजरी पहली बार खिलखिला
कर हंसी और हंसती ही रही बड़ी देर तक, फिर अचानक मंजरी की हंसी
रुक गई.
अमन ने मंजरी की तरफ देखा. वह एक ओर को लुढ़की हुई थी.
अमन लपक कर उस तक पहुंचा. मंजरी को सीधा कर लिटाया. उस
ने चैक किया, सांसें चल रही थीं.
उस ने जल्दी से पानी के छींटे मुंह
पर मारे.
कुछ ही देर के बाद मंजरी को होश गया. वह थकी हुई आवाज में
बोली, ‘‘लास्ट स्टेज. यूटरस निकलवा चुकी हूं. आपरेशन हो चुका है, पर
कैंसर बाकी हिस्से में फैल चुका है. सिर्फ 2 महीने…’’
बारिश आहिस्ताआहिस्ता कम होने लगी. काली घटाएं छटने लगीं और  अंधेरा भी कम होने लगा था. सड़क का पानी अपने साथ गंदगी बहा कर ले गया. घर का आंगन भी बरसात के पानी से धुल कर चमकने लगा था.
‘‘अब कहो तो मैं चली जाऊं?’’ मंजरी ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘नहीं. इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी,’’ मौसम की नमी अब अमन की आंखों में थी.
मौसम बिलकुल साफ था.      

लेखक – अहमद मुख्तार

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