Social Story: भीड़ का इस्तेमाल हर जबरदस्ती के खिलाफ करना नकेवल कानूनी है, यह आसान भी है. भीड़ चाहे सही काम की मांग कर रही हो या गलत की, यह अपनी बात सुनाने का एक तरीका है. 1973-74 में जयप्रकाश नारायण नेकुरसी खाली करो कि जनता आती हैका नारा दे कर 1971 की चुनावी और बंगलादेशी लड़ाई की जीत के बावजूद भीड़ के बल पर इंदिरा गांधी का सिंहासन हिला दिया था.


आज भीड़ को कुचलने की पूरी तैयारी हो गई है. वे लोग जिन्होंने भीड़ के बल पर बाबरी मसजिद गिराई थी, जिस ने भीड़ के बल पर भागलपुर में दंगे कराए थे, जिन्होंने गुजरात में 2002 के दंगे कराए थे, आज भीड़ को कुचल रहे हैं. राजनीतिक मामलों को तो छोडि़ए, अब दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ मोरचा निकालने वालों की भीड़ को कानून के हाथों बुरी तरह कुचला जा रहा है. आजकल भीड़ को कंट्रोल करने का आसान तरीका बन गया है अगर भीड़ सरकार के खिलाफ कुछ मांग कर रही हो. 1-2 लोगों से पाकिस्तानी नारे लगवा दो. फिर क्या पुलिस सब को बंद ही नहीं कर देगी, वर्षों जेलों में बंद रखेगी. सुप्रीम कोर्ट ने भी हरी ?ांडी दे दी है कि पुलिस भीड़ को, ‘देश के खिलाफकाम करने वाली भीड़ को, बुलवाने वालों को बरसों बिना सजा दिए बंद कर सकती है.


यह आम जनता के हक को मारना है. आज वैसे ही आम जनता को अपने मोबाइल से फुरसत नहीं
कि वह दूसरों के फायदे के लिए किसी भीड़ में जाए. आजकल तो भीड़ भाड़े की होती है या भक्ति की. दोनों से चूंकि भीड़ जमा करने वाले को जम कर फायदा होने की उम्मीद होती है, लोग मोबाइल जेब में रखने लगे हैं. पर नारों का खतरा इन में भी है. 2-4 लोगों को फालतू के नारे लगाने के लिए तैयार किया जा सकता है जो चुपके से गायब हो जाएं. यह भीड़ तोड़ने का हथकंडा अब काम का है. सरकार आज भीड़ से नहीं डर रही. किसानों ने हरियाणा की सीमा पर भीड़ जमा कर 3 साल पहले खेती कानून वापस करा लिए थे, पर उस भीड़ पर तरहतरह के सच्चे?ाठे आरोप लगा कर उसे जबरदस्त बदनाम किया गया था. आज
किसान आंदोलन के नेता राकेश टिकैत दूसरे लोग घरों में दुबके हैं, क्योंकि लोग भीड़ में शामिल हो कर जेलों में नहीं सड़ना चाहते.


गांवों में जहां अखबार है, रेडियो स्टेशन, टीवी, लोगों को अपनी बात कहने का अब मौका ही नहीं मिलता, क्योंकि भीड़ जमा करना मुश्किल हो गया है. यह सरकार को हर मामले में मनमानी करने का मौका दे रहा है. जनता की बात सिर्फ ट्रोलिंग तब सीमित है और भीड़ की शक्ल नहीं लेती. ट्रोलर्स को कंट्रोल करने के लिए भी सरकार पूरी तरह जुट गई हैअब गांवों के लिए सब से बुरे दिन गए हैं. सरकारें उन्हें जैसे मरजी हांक सकती हैं.



हले प्राइवेट दलाल लोगों की तस्करी और चोरी करते थे ताकि उन्हें किसी और देश या राज्य में गुलामी करवाने के लिए ले जाया जाए, अब यह काम भारत सरकार ने करना शुरू कर दिया है. शुरू में जब कांग्रेस सरकार के जमाने में लोगों ने दलालों के हत्थे चढ़ कर विदेश जाना शुरू किया था तो सरकार ने इस की देखभाल के लिए एक विभाग बनाया था जिस की इजाजत के बिना किसी को हवाईजहाज या पानी के  जहाज पर नहीं चढ़ने दिया जाता था.


अब दलाली का यह काम सरकार खुद कर रही है. 200 साल पहले से भारत से एग्रीमैंट करा के गरीब मजदूरों को अंगरेज और दूसरे यूरोपीय दलाल भारत के लोगों को अफ्रीका, फिजी, मौरीशस, सूरीनाम ले जाते रहे हैं. यहां काम गुलामी का ही होता था पर वह गुलामी भारत में जाति की गुलामी से ज्यादा बेहतर थी. जो थोड़े से लोग कभीकभार जुगत भिड़ा कर वापस अपने गांव भी जाते थे, वे बढ़ाचढ़ा कर कसीदे पढ़ते थे.


यही काम आजादी के बाद हुआ जब तेल उगलने वाले देशों को पैसा मिलने लगा. उन के यहां आबादी तो थी नहीं. उन्होंने भरभर कर भारत से लोगों को बुलाना शुरू किया. काम गुलामी जैसा ही था पर भारत के गांवों में ईंट के भट्ठों या छोटी फैक्टरियों में जो गुलामी होती है, उस से कहीं कम मुश्किल था और पैसा ज्यादा मिलता था. आज भारत अगर फलताफूलता नजर रहा है तो इस की वजह राम मंदिर से निकलने वाला आशीर्वाद नहीं है, इन मजदूरों की मेहनत का पैसा है जो ये भारत में अपने घर वालों को भेजते हैं. अब घर वाले भी भारत से गए लोगों को नोट छापने की मशीन सम?ाते हैं और चाहे घर का आदमी अपनी हड्डियां गलाए, वे खुश ही रहते हैं.


सरकार तो बहुत खुश है. उसे बैठेबिठाए लगभग 14,00,000 करोड़ (14 लाख करोड़) की भारी रकम मिल रही है, इसीलिए जब इजरायल और गाजा की लड़ाई शुरू हुई और गाजा के मजदूरों ने इजरायल में जाना बंद कर दिया तो भारत सरकार ने बिना फिक्र किए कि यह लड़ाई का इलाका है. कई हजार मजदूरों को इजरायल भेजने की दलाली का काम अपने हाथों में ले लिया. सरकार की एक कंपनी नैशनल स्किल डवलपमैंट कौर्पोरेशन ने दलाली शुरू की और रामजी के प्रदेश से हिंदू मजदूर भक्तों को यहूदियों के देश में बढ़ईगीरी, नलसाजी, लुहारी, मजदूरी के काम के लिए भेजना शुरू कर दिया. अब चूंकि  मंदिरों की हिंदी बैल्ट में गरीबी बेतहाशा है लोगों ने अपनी जमीन, जायदाद, जेवर बेच कर नौजवानों और भगोड़ों को भी भेजने के लिए लाइनों में खड़ा कर दिया. दलाल पैसे नहीं देते थे, लेते थे. प्राइवेट दलाल घर वालों को पैसे दे कर गुलामी के लिए खरीदते हैं पर ये तो सरकारी दलाल हैं, ये लेते हैं.


अब कुछ लोग इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे हैं कि इस दलाली में गुलामों से भेदभाव किया जा रहा है, जो बात कोर्ट की एप्लीकेशन में नहीं है वह यह है कि दलाल कंपनी के अफसरों ने घूस भी ली होगी. जहां घूस का मौका हो, वहां सरकार हाथ नहीं डालती. अब सरकार अपना निकम्मापन दिखाने के लिए ढोल बजा रही है कि देखो हम ने विधर्मी के यहां गुलामी के लिए मजदूर भेजे. चढ़ावे की बात वैसे ही छिपा दी जाती है जैसी सभी मंदिरों में छिपाई जाती है.    Social Story                      

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