Hindi Story: रवि अपने कुछ दोस्तों के बहकावे में कर मौजमस्ती करने चकलाघर पहुंच गया. 1,000 रुपए में उस के लिए एक कमरा और एक लड़की तय की गई. उस के बाकी दोस्त भी अलगअलग कमरों में अपनीअपनीमस्तीतलाशने में बिजी हो गए.


कमरे में पहुंच कर रवि पलंग पर बैठ गया. दीवारें सैक्सी तसवीरों से पटी पड़ी थीं. थोड़ी ही देर में कोई 31-32 साल की नेपाली औरत उस के पास कर बैठ गई. अजीब सी हिचक के बीच रवि ने जैसे ही उस का हाथ छुआ, उस का तपता हुआ शरीर उसे चौंकाने लगा. ‘‘अरे, आप को तो तेज बुखार है,’’ रवि बरबस बोल उठा. ‘‘यह सब रोज का धंधा है साहब, आप जल्दी कीजिए. उस के बाद अगले कस्टमर के पास भी जाना है,’’ दर्द को मुसकान में बदलती हुई वह बोली. रवि गंभीर हो गया और बोला, ‘‘बीमार होने पर भी यह सब करती हो. छोड़ क्यों नहीं देती हो यह सब? आखिर क्यों कर रही हो?’’ वह औरत अपने आंसू रोक पाई और बोली, ‘‘बेटी के लिए साहब.’’


‘‘मतलब?’’ रवि ने पूछा. वह औरत कुछ पल चुप रही, फिर टूटी आवाज में बोली, ‘‘नेपाल में मैं एक इज्जतदार परिवार से हूं. मेरे पति का कारोबार था. घरकार, सबकुछ था. मेरी एक 10 साल की बेटी भी है. लेकिन साल 2015 में आए भूकंप ने सब छीन लिया. मेरे पति मलबे में दब कर मर गए. आंखें खोल कर देखा तो बचा था सिर्फ भूकंप का मलबा, भूख, बेबसी और मेरी 8 महीने की बच्ची. ‘‘फिर रोजगार के लिए मैं दरदर भटकी, पर बिना मर्द की औरत खुले खेत जैसी होती है, जिसे कोई भी जानवर बेहिचक चर जाता है. हर जगह मेरे शरीर का शोषण हुआ. फिर भारत में काम दिलाने के नाम पर एक दलाल मु झे यहां बेच गया.’’


उस औरत की कहानी सुन कर रवि का रोमरोम सिहर उठा. वह जिस्म की आग बु झाने आया था, पर सामने किसी मां की तपती मजबूरियां खड़ी थीं. ‘‘लेकिन इस हालत में भी यह सब क्यों?’’ रवि की बात पूरी होने से पहले ही वह औरत बोली, ‘‘बताया तो है कि बेटी के लिए. इसी तपते हुए जिस्म से कमाए पैसों से उस की बोर्डिंग स्कूल की फीस भरती हूं, ताकि पढ़लिख कर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और उसे मेरी तरह इस जिस्म के बाजार में कभी बिकना पड़े.’’ रवि के भीतर उस औरत के लिए इज्जत उमड़ आई. वह फौरन कमरे से बाहर निकला और गुस्से में चकलाघर चलाने वाली रेशमाबाई के पास पहुंचा.
‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें…’’ रवि फट पड़ा, ‘‘एक औरत हो कर दूसरी औरत की मजबूरी का फायदा उठाती हो. इन्हें जिल्लत की जिंदगी में धकेलती हो.’’


रेशमाबाई ने पान की पीक को पीकदान में फेंकते हुए ठहाका लगाया, ‘‘क्या बात है लल्लालगता है पहली बार आए होयहां चमड़ी का धंधा चलता है, चोंचलेबाजी नहीं. मूड नहीं बना क्या? कुछ कड़क चाहिए तो बोलो पहली बार हो, डिस्काउंट भी दे दूंगी…’’ ‘‘कैसी घटिया औरत हो तुमकोई अपनी मरजी से यह काम करे तो बात और है, पर जबरदस्तीरवि का गुस्सा फूट पड़ा. रेशमाबाई फिर मुसकराई और बोली, ‘‘यह सब यहां चलता रहता है. ज्यादा अक्ल मत लगाओ.’’ रवि जोर से बोला, ‘‘अगर यही मजबूरी तुम्हारी बेटी पर आती तो?’’ रेशमाबाई ठहाका मारते हुए बोली, ‘‘बेटी? अरे चिकने, मैं भी तो अपनी बेटी के लिए ही कर रही हूं यह सब. मेरे बाद यही तो संभालेगी धंधा. क्यों बेटी हसीना?’’


पास  झूले पर बैठी रेशमाबाई की बेटी हसीना ने बालों में उंगली घुमाते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं भी तो इसी इंतजार में हूं अम्मी.’’ उन मांबेटी की बातें सुन रवि हैरान रह गया. वह सम नहीं पा रहा था कि बेटी के भविष्य के लिए कौन ज्यादा चिंतित हैवह नेपाली औरत या फिर रेशमाबाई?  Hindi Story

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