Panna diamond mines : मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल के पन्ना जिले के बड़गड़ी गांव की रहने वाली मजदूर रचना गोलदार ने हीरा दफ्तर से खदान क्षेत्र हजारा मुद्दा का पट्टा बनवाया था. रचना ने खदान में कड़ी मेहनत कर के हीरे की तलाश शुरू कर दी. एक हफ्ते के अंदर ही रचना को
8 हीरे मिले, तो उस की खुशी देखते ही बनती थी. रचना गोलदार ने 17 सितंबर, 2025 को पन्ना में बने सरकारी हीरा दफ्तर पहुंच कर हीरे जमा करवा दिए. खुदाई में मिले इन 8 हीरों में से 6 नग जेम्स क्वालिटी के थे. इनका कुल वजन 2.53 कैरेट था. इन में से सब से बड़े हीरे का वजन 0.79 कैरेट था. 2 हीरे औफ कलर के थे. हीरा दफ्तर में जमा हीरों को अगली नीलामी में रखा जाएगा. नीलाम होने के बाद सब से ज्यादा कीमत की बोली से मिलने वाली रकम में से टैक्स काट कर बाकी रकम हीराधारक रचना गोलदार के खाते में जमा हो जाएगी.
इसी तरह पन्ना में 1 अक्तूबर को 2 लोगों को हीरा मिला था. हरियाणा के हिसार के रहने वाले जोगिंदर सिंह को पन्ना के गांव पटी की उथली हीरा खदान में उज्ज्वल किस्म का हीरा मिला, जिस का वजन 1.27 कैरेट था. इसे उन्होंने हीरा दफ्तर में जमा करवाया, जिस की कीमत लाखों में आंकी जा रही है.
जोगिंदर सिंह ने हीरा दफ्तर, पन्ना में 16 मई, 2025 को पट्टा बनवाने की अर्जी लगाई थी. 20 मई, 2025 को उन्हें हीरा खोदने के लिए पट्टा मिल गया था. उस के बाद वे 4 महीने से ग्राम पंचायत कृष्णा कल्याणपुर की पटी हीरा खदान में मेहनत कर रहे थे. गोविंद सिंह आदिवासी ने भी पिछले दिनों ही पट्टा बनवाया था और ग्राम कृष्णा कल्याणपुर पटी में हीरे की खदान खोद रहे थे. उन्हें खदान की बजाय रास्ते में हीरा मिल गया. पन्ना में कीमती हीरे मिलने की यह कोई अनूठी घटना नहीं है. यहां बड़ी तादाद में काम कर रहे मजदूरों को हीरे मिलते रहते हैं और इसी आस में हजारों की तादाद में मजदूर यहां की हीरा खदान में रातदिन पसीना बहाते हैं. पन्ना में तकरीबन 25,000 लोग इसी उम्मीद से दिनरात पहाड़ खोद रहे हैं, नदी की रेत छान रहे हैं. इन में से कुछ ने तो परिवार समेत यहां डेरा डाल रखा है.
पन्ना में हीरा तलाशने का काम राजामहाराजाओं के दौर में भी चलता था. राजशाही के समय में हीरा राजघराने के महेंद्र भवन में जमा होता था. तब हीरे के बदले लोगों को उन की जरूरत का राशन और दूसरी सामग्री राजशाही की ओर से दी जाती थी. गोंड बस्ती से बुंदेला राज्य की राजधानी और फिर जिला बना पन्ना ‘हीरा नगरी’ के नाम से मशहूर यह इलाका मध्य प्रदेश के उत्तरपूर्व विंध्यांचल की पर्वतमालाओं के बीच है.
पन्ना जिले का वर्तमान स्वरूप
पन्ना और अजयगढ़ रियासत, चरखारी, बिजावर, छतरपुर और यूनाइटेड प्रोविंस को मिला कर बना है. मूल रूप से 13वीं शताब्दी तक गोंड बस्ती रहे पन्ना को महाराजा छत्रसाल बुंदेला ने अपनी राजधानी बनाया था. अप्रैल, 1949 के पहले यह विंध्य प्रदेश का हिस्सा था. जब 1 नवंबर, 1956 को मध्य प्रदेश का दोबारा गठन हुआ, तब यह मध्य प्रदेश में मिलाया गया था.
पन्ना जिले का नाम पन्ना जिला हैडक्वार्टर में बने पद्मावती देवी मंदिर के नाम पर रखा गया है. पन्ना को महाराजा छत्रसाल के शहर के रूप में भी जाना जाता है. पन्ना उत्तर में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले, पूर्व में सतना जिले, दक्षिण में कटनी और दमोह जिले और पश्चिम में छतरपुर जिले से घिरा हुआ है.
हीरा खोजने के लिए मिलता है पट्टा
पन्ना में सरकारी जमीन का पट्टा पाने के लिए हीरा दफ्तर में जा कर अर्जी फार्म भरना होता है. हीरा दफ्तर में अर्जी फार्म के साथ 3 फोटो, आधारकार्ड की फोटोकौपी और 200 रुपए का बैंक चालान पन्ना की भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में जमा कराना होता है. चालान की एक कौपी हीरा दफ्तर में भी जमा करानी पड़ती है. इस के बाद 20 दिन के अंदर पट्टा मिल जाता है.
हीरा खोजने के लिए जमीन का एक पट्टा 7 गुना 6 मीटर का होता है. हीरे से लबरेज बताई जाने वाली खदान में कई किसानों की निजी और कुछ जमीन सरकार की है. सरकार की जमीन पर खनन के लिए खनिज दफ्तर से परमिशन लेनी पड़ती है. एक पट्टे के लिए 200 रुपए की फीस लगती है.
निजी जमीन पर आमतौर पर 2 तरह के करार होते हैं. एक में कुछ रुपए ले कर खनन की इजाजत दी जाती है, जबकि दूसरे में जमीन मालिक हीरा मिलने पर 25 फीसदी का हिस्सेदार होता है. ज्यादातर करार तो 25 फीसदी हिस्सेदारी वाले ही होते हैं. अगर किसी किसान के खेत में खुदाई होनी है, तो उस किसान का सहमतिपत्र खनन महकमे में जमा कराना होता है.
आमतौर पर जमीन मालिक इस के एवज में 25 फीसदी का करार करते हैं. इस का मतलब है कि अगर हीरा मिला हो तो उस जमीन मालिक को हीरे की कुल कीमत का 25 फीसदी हिस्सा मिलेगा.
चाल वाली मिट्टी में हीरा मिलने की उम्मीद ज्यादा होती है. इसे धो कर साफ किया जाता है और हीरा खोजा जाता है. हीरा मिट्टी की दूसरी लेयर में मिलता है. इसे चाल की लेयर कहा जाता है.
चाल उस मिट्टी की परत को कहते हैं, जिस में पत्थर व हीरे मिक्स होते हैं. यही मिट्टी बेहद काम की होती है, जो हीरा उगलती है. जब तक चाल की मिट्टी मिलती है, उस गहराई तक खुदाई होती है. इस मिट्टी को स्टोर किया जाता है. खुदाई में मिले बड़ेबड़े पत्थरों में हीरा मिलने की सब से ज्यादा उम्मीद होती है.
जो मिट्टी निकलती है उसे अच्छी तरह से 3 लैवल पर धोया जाता है. इस के बाद उसे सुखा कर हीरा तलाशा जाता है. चाल की मिट्टी को रातभर के लिए पानी वाले गड्ढे में भिगो कर रखते हैं.
यहां 3 तरह के पानी के गड्ढे बनाए जाते हैं. सब से पहले भिगोए गए चाल की मिट्टी को हाथों से मसला जाता है, फिर बड़े पत्थरों के टुकड़ों को अलग कर देते हैं. इस के बाद जाली की बनी लोहे की टोकनी में इस चाल वाली मिट्टी को ले कर पानी वाले दूसरे गड्ढे में धोया जाता है. दही की मथनी की तरह हाथों से मथा जाता है. इस से मिट्टी घुल जाती है और टोकनी में कंकड़पत्थर बचते हैं. इसे आखिरी में तीसरे साफ पानी वाले गड्ढे में धोते हैं, फिर इस कंकड़पत्थर को गोबर से लीप कर बनाए मिट्टी के फर्श पर सुखाते हैं. 1-2 घंटे बाद इस में हीरे को वैसे ही खोजा जाता है, जैसे चावल में कंकड़ देखा जाता है. हीरे जैसा चमकदार पत्थर मिलने पर उसे अलग कर देते हैं. हीरा होने का भरोसा होने पर उसे हीरा दफ्तर पहुंचाते हैं, वहां से पुख्ता होता है कि पत्थर हीरा है या कांच का टुकड़ा. पन्ना जिले में 11 जगहों पर हीरा मिलता है. पन्ना में जंगल सहित कुछ अन्य क्षेत्र भी चिन्हित हुए हैं, लेकिन अभी वहां हीरा खनन की इजाजत नहीं दी गई है.
ऐसे तय होती है हीरे की कीमत
हीरा दफ्तर में रोज खनन करने वाले चमकीले पत्थर दे कर जाते हैं, जिन की जांच की जाती है. कुछ ही लोग होते हैं जिन की जिंदगी में हीरा चमक लाता है. कलर क्लियरिटी, कट और वजन से हीरे की कीमत तय होती है. सब से अच्छा हीरा जैम क्वालिटी में ई और डी श्रेणी का माना जाता है.
पन्ना में अमूमन ई श्रेणी का हीरा मिल जाता है. जैम क्वालिटी के हीरे की अंगूठी और दूसरी ज्वैलरी बनती है, जबकि दूसरा इंडस्ट्रियल ब्लैक हीरा होता है. इस का ग्लास कटिंग, एयरप्लेन के छर्रे समेत दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग होता है. इस की कीमत कम होती है. हीरा 50,000 से ले कर 15 लाख रुपए प्रति कैरेट तक बिक सकता है.
पन्ना में साल 1961 में हीरा दफ्तर बनाया गया था, तभी से हर 3 महीने में हीरे की नीलामी होती है. हीरे की नीलामी में गुजरात, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद समेत कई राज्यों के व्यापारी आ कर बोली लगाते हैं.
पट्टे पर खदान ले कर हीरा तलाश करने वाले मजदूर को तुआदार कहा जाता है. खुदाई के दौरान मिलने वाले हीरे की जांच कराने के बाद तुआदार हीरा दफ्तर में उसे जमा कराता है.
हीरा दफ्तर द्वारा वजन और हीरे की क्वालिटी के आधार पर उस की न्यूनतम कीमत तय की जाती है. इस के बाद नीलामी होती है. अधिकतम कीमत में हीरा नीलाम किया जाता है. 11.50 फीसदी टैक्स काट कर बकाया राशि तुआदार को दे दी जाती है.
मालामाल हो चुके लोग
मई, 2022 में प्रताप सिंह यादव नाम के एक मजदूर को जैम क्वालिटी का हीरा मिला था. वह कुआं इलाके का रहने वाला है और उस की माली हालत ठीक नहीं थी. प्रताप सिंह यादव फरवरी, 2025 में सरकारी हीरा दफ्तर गया और 4 गुना 4 की एक जमीन हीरा खदान के लिए मंजूर करा ली. इस के बाद हीरा ढूंढ़ने के लिए वह दिनरात मेहनत करने लगा. 3 महीने की कड़ी मेहनत ने उस की झोली में हीरा डाल दिया. इस तरह रातोंरात गरीब मजदूर लखपति बन गया. उस हीरे का वजन 11.88 कैरेट है, जिस की कीमत तकरीबन 60 से 70 लाख रुपए आंकी गई. प्रताप ने इसे हीरा दफ्तर में जमा कर दिया है.
प्रताप सिंह यादव का कहना है कि हीरे की नीलामी से मिलने वाले पैसे से वह अपनी माली हालत सुधारेगा और बच्चों की पढ़ाई और भरणपोषण का खर्च निकालेगा.
पन्ना में सब से बड़ा 44 कैरेट का हीरा साल 1961 में रसूल मुहम्मद को मिला था. 67 साल बाद 2018 में 4 दोस्तों को 42 कैरेट से ज्यादा वजन का हीरा मिला था. यह हीरा उन्हें पटी की खदान में
9 अक्तूबर, 2018 को मिला था. इस खदान का पट्टा मोतीलाल प्रजापति के नाम पर था. हीरा दफ्तर से मोतीलाल को इस हीरे के एवज में सवा 2 करोड़ के आसपास की कीमत मिली थी.
पन्ना के बेनीसागर महल्ले में रहने वाले मोतीलाल अब भी हीरा खदानों में हीरा तलाशने का काम करते हैं. जब उन से पूछा गया कि करोड़ों का हीरा मिलने के बाद भी इस काम को क्यों नहीं छोड़ा, तो उन का जवाब था, ‘‘मैं ने जो जिंदगी जी है, वह मेरे बच्चे न जिएं. उन को अच्छी पढ़ाई कराना मेरा सपना है. इसी सपने को पूरा करने के लिए मैं अब भी हीरा खदानों की खाक छान रहा हूं.’’
47 साल के मोतीलाल 4 भाईबहनों में सब से बड़े हैं और उन्होंने केवल 10वीं जमात तक की पढ़ाई की है.
घर की माली हालत ठीक न होने से पढ़ाई बीच में छोड़ कर उन्हें मजदूरी करनी पड़ी. अभी परिवार में मां, पत्नी के अलावा 2 बेटे व एक बेटी हैं. मोतीलाल अपने 4 पार्टनरों के साथ 20 सालों से पटी की अलगअलग खदानों में हीरे की खाक छानते रहे हैं. उन की मेहनत रंग लाई, 9 अक्तूबर, 2018 को जब उन्हें पटी की खदान में 42.59 कैरेट का हीरा मिला. जब इस हीरे की नीलामी हुई तो यह हीरा सवा
2 करोड़ रुपए में बिका था. मोतीलाल ने इस रकम से सब से पहले अपना घर बनवाया और 20 सालों में जो उन पर जो कर्ज चढ़े थे, उसे पाईपाई चुकता किया और बची हुई रकम बच्चों के भविष्य की खातिर बैंक में जमा कर दी. पर इतना सबकुछ होने के बाद भी मोतीलाल का रूटीन पहले जैसा ही है. अब भी वे दोस्तों के साथ हीरापुर टपरियन की खदान में हीरे की तलाश में सुबह 5 बजे घर से निकल जाते हैं. दोपहर बाद वहां से ईंटभट्ठे पर काम करने चले जाते हैं और वहां से शाम ढलने के बाद लौटते हैं. मोतीलाल कहते हैं कि खदान में काम करते हुए उन्हें 25 साल हो गए हैं. पिछले साल उन्हें कम क्वालिटी का 5 कैरेट का हीरा मिला था, जो 1.62 लाख रुपए में नीलाम हुआ था. 11.50 फीसदी टैक्स कट गया था. बाकी रकम 4 पार्टनरों में बंट गई थी.
इसी तरह 22 फरवरी, 2022 को पन्ना जिले की पटी की उथली हीरा खदान से किशोरगंज बड़ा बाजार में
रहने वाले सुशील कुमार शुक्ला को 26.11 कैरेट का जैम क्वालिटी का हीरा मिला था.
नयापुवा पन्ना के रहने वाले 45 साल के रामप्यारे विश्वकर्मा 16 साल की उम्र में छतरपुर से पन्ना आए थे. उन के बड़े भाई लोहापत्थर का काम करते थे. यहां आ कर उन्होंने साइकिल पंक्चर की दुकान खोल ली. बेटा भरत बाइक रिपेयरिंग करता है. 5 साल पहले पत्नी की बीमारी से मौत हो गई. 2 बेटियां हैं. बड़ी लड़की मोहिनी 12वीं जमात में तो छोटी लड़की रोहिणी छठी जमात में पढ़ रही है.
पिछले 30 सालों से रामप्यारे भी हीरा तलाश रहे थे. उन की तलाश पूरी हुई
24 फरवरी, 2021 को, जब उन्हें 14.9 कैरेट का हीरा मिला. उन की खदान में कुल 7 पार्टनर थे. हीरे की नीलामी से 39 लाख रुपए मिले थे, जिस में से हरेक के हिस्से में 5.57 लाख रुपए आए थे.
रामप्यारे के हिस्से में आए पैसे वे बेटियों की शादी के लिए जमा कर चुके हैं और अब भी हीरे की तलाश के लिए खदान जाते हैं.
मई, 2022 में इटवां कला की रहने वाली चमेली बाई को 2.08 कैरेट का बेशकीमती हीरा कृष्ण कल्याणपुर पटी की उथली खदान से मिला था. चमेली बाई 10 साल से पन्ना में किराए के मकान में अपने परिवार के साथ रह रही हैं, लेकिन अभी तक मकान नहीं बनवा पाईं.
इसी मकसद को ले कर चमेली बाई ने फरवरी महीने में हीरा दफ्तर से कृष्ण कल्याणपुर पटी की उथली हीरा खदान का पट्टा जारी कराया था. 200 रुपए के चालान में उन्हें 4 गुना 4 मीटर की खदान मंजूर हुई, जिस के बाद उन्होंने खदान में हीरा तलाशने का काम किया और मई के महीने में उन्हें 2.08 कैरेट का उज्ज्वल किस्म का हीरा मिला था.
हीरे के बारे में रोचक जानकारी
भारत का हीरा उत्पादन में स्थान उस के रफ हीरों के उत्पादन से कहीं ज्यादा उस के पौलिशिंग उद्योग के चलते है. कच्चे हीरों को आयात कर के उन्हें तराशने और पौलिश कर के निर्यात करने में भारत अव्वल है.
इंडियन ब्यूरो औफ माइंस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हीरा मध्य प्रदेश के पन्ना जिले और आंध प्रदेश के गोलकोंडा और कोल्लूर खान के अलावा छत्तीसगढ़ के देवभोग इलाके में मिलता है. कोहिनूर नाम का मशहूर हीरा गोलकोंडा में ही मिला था, जो वर्तमान में ब्रिटेन के राजशाही मुकुट की शोभा बढ़ा रहा है.
हीरा रासायनिक तौर पर कार्बन का ही रूप है जो निष्क्रिय होने के साथ पानी में घुलनशील नहीं है. गुजरात के सूरत शहर में ज्यादातर हीरे को काटने और पौलिश करने का काम होता है. हीरे को 700 डिगरी तापमान से ज्यादा गरम करने पर वह जल कर कार्बन डाईआक्साइड के रूप में बदल कर राख जैसा कोई अवशेष नहीं छोड़ता है.
ऐसे करें हीरे की पहचान
हीरा की परख रखने वाले जौहरी बताते हैं कि असली हीरे के अंदर की बनावट ऊबड़खाबड़ होती है, लेकिन नकली या बनावटी हीरा अंदर से सामान्य दिखता है. असली हीरे में कुछ न कुछ खांचें होते हैं, जो 1,200 गुना ताकतवर माइक्रोस्कोप से देखे जा सकते हैं. हीरे को अखबार पर रखें और उस के पार से अक्षरों को पढ़ने की कोशिश करें. अगर टेढ़ी लकीरें दिखें तो हीरा नकली है. हीरे को पराबैंगनी किरणों में देखें. वह नीली आभा के साथ चमकता है तो हीरा असली है, अगर पीली, हरी या स्लेटी रंग की आभा निकले, तो यह मोइसानाइट नाम का पत्थर है. हीरा रोशनी को रिफ्लैक्ट करता है. असली हीरा बहुत कठोर होता है. हीरे को रगड़ने पर किसी भी तरह की खरोंच नहीं आती है. एक गिलास में पानी ले कर उस में हीरा डालने पर असली हीरा अपने घनत्व की अधिकता के चलते पानी में डूब जाता है, लेकिन नकली हीरा पानी में तैरने लगता है. हीरे के कोणों से आरपार देखने पर इंद्रधनुष की तरह सातों रंग दिखाई दें, तो समझिए कि हीरा असली है. जिस तरह चश्मे के ग्लास पर भाप चढ़ जाती हैं, उसी तरह अगर मुंह की भाप हीरे पर जम जाए तो समझ हीरा नकली है. असली हीरे पर नमी नहीं जमती है.
सरकार की उदासीनता की वजह से पन्ना में हीरा उद्योग बंद होने के कगार पर है. ज्यादातर हीरा खदानें बंद हो गई हैं. सरकार को चाहिए कि दुनिया के खूबसूरत रत्न ऐसे ही मिलते रहें, इस के लिए पन्ना के हीरा उद्योग को संरक्षित किया जाना चाहिए और वन भूमि विवाद के चलते जो हीरा खदानें बंद हो गई हैं, उन्हें भी चालू कराया जाना चाहिए, जिस से गरीबों की रोजीरोटी और अमीरों का शौक हमेशा के लिए महफूज रह सके. बुदेलखंड इलाके के पन्ना में कोई रेलवे स्टेशन नहीं है. नजदीकी रेलवे स्टेशन खजुराहो से पन्ना की दूरी 40 किलोमीटर है. जबलपुर डिवीजन के सतना रेलवे जंक्शन से पन्ना शहर की दूरी 75 किलोमीटर है. पन्ना झांसी से रांची जाने वाले नैशनल हाईवे 39 पर है. भोपाल, इंदौर से भी नियमित बस सेवा मुहैया है.
जुए के दांव जैसा है हीरा तलाशने का काम
जुए के खेल में दांव लगाने वाला जुआरी यह सोच कर दांव लगाता है कि जीत गया तो बिना मेहनत किए वह घर बैठ कर आराम की जिंदगी जिएगा, मगर जब वह जुए में हार जाता है तो पछतावा ही हाथ लगता है. ठीक उसी तरह मिट्टी की खदानों में हीरा खोजना जुए के दांव से कम नहीं है.
मध्य प्रदेश के पन्ना जिला हैडक्वार्टर से 40 किलोमीटर दूर खजुराहो के रहने वाले 40 साल के गोविंद रायकवाड़ आटोरिकशा चलाते थे, लेकिन कोविड महामारी में लौकडाउन के दौरान उन के आटोरिकशा का काम बंद हो गया. मजबूरी में गोविंद पन्ना आ गए और हीरा खदानों में अपनी किस्मत आजमाने लगे.
4-5 साल की खुदाई के बाद भी अभी तक उन्हें कुछ नहीं मिला है, जबकि वे चाहते तो फिर से आटोरिकशा चला कर अपना पुराना काम शुरू कर के अपने परिवार की आजीविका चला सकते थे, मगर जल्द करोड़पति बनने के चक्कर में वे हीरा खदान में खुदाई कर रहे हैं.
हीरे की ये खुली खदानें छोटेबड़े गड्ढो से भरी हैं, जिन में से कुछ गड्ढे इतने ज्यादा गहरे होते हैं कि उन में गिरने से जानलेवा हादसा या गंभीर चोट लग सकती है. पन्ना क्षेत्र के बाहर से आए खनिज मजदूर खदानों के अंदर रहने के लिए बेशरम के पौधे की झाड़ियों और प्लास्टिक की चादरों से छोटीछोटी ?ांपडि़यां बना कर रहते हैं. हीरा खनन का सब से बड़ी चुनौती सर्दियों की सर्द रातों में छोटीछोटी ?ांपडि़यों में रात बिताने की होती है. खाना पकाने के लिए पानी लाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना इन मजदूरों की मजबूरी है. हीरा खनन की होड़ ने कई लोगों ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया है, जबकि आंकड़े बताते हैं कि हजारों में से किसी एक मजदूर को ही बेशकीमती हीरा मिलता है. इस के बावजूद लोग दूसरा कामधंधा छोड़ कर अपनी किस्मत बदलने के लिए इस काम में रातदिन लगे हुए हैं.
पन्ना जिले के 42 साल के खदान मालिक रामप्यारे का बताते हैं कि पुरानी खदानों में अब पहले की तरह हीरे नहीं मिलते. 15 साल की उम्र से ही खनन के धंधे में लगे रामप्यारे को अपना पहला हीरा 20 साल पहले मिला था. 10 साल बाद उन्हें एक और हीरा मिला था, पर आजकल कोई अच्छा हीरा नहीं मिल रहा, बस हीरे के कुछ छोटेछोटे टुकड़े मिल रहे हैं, जिन की कीमत कुछ हजार रुपए है. इस आमदनी से जैसेतैसे गुजारा होता है.
पिछले 7 महीने से खुदाई कर रहे छोटूलाल अहिरवार और उन के छोटे भाई चंचल की भी कहानी भी यही है कि हीरे की खुदाई में उन्हें एक भी हीरा नहीं मिला और हजारों रुपए का नुकसान हो गया. जुए के खेल की तरह दोनों की अब सारी उम्मीदें टूट गई हैं और उन्होंने यह काम छोड़ने का मन बना लिया है.
हीरे की खोज में लगे मजदूरों को कोई यह समझने वाला भी नहीं है कि वे क्यों इस जुए के खेल में अपनी और अपने परिवार को जिंदगी को दांव पर लगा रहे हैं?
अंधविश्वास की जद में हीरा खदान
मध्य प्रदेश के उत्तरपूर्वी छोर पर बसा पन्ना आज भी इतना पिछड़ा है कि अब तक कोई रेलवे लाइन तक यहां नहीं पहुंची है. लेकिन साल और सागौन की घेराबंदी में यहां सैकड़ों हीरा खदानें हैं. इन खानों में काम करने वाले मजदूरों में औरतें ज्यादा दिखेंगी. मिट्टी से कंकड़ निकालतीं, कंकड़ से हीरे चुनतीं और अगर किसी तरह हीरा न मिले तो टोनाटोटका करते हुए वे अपनी जिंदगी बसर कर रही हैं.
ज्यादातर खदानों के आसपास पूजापाठ के लिए कुछ जगह छोड़ दी जाती है. हीरा छांटने से पहले मजदूर यहां बैठ कर ऊपर वाले का नाम लेते हैं. उस जगह पर जूताचप्पल पहन कर नहीं जाते. कई और टोटके भी हैं, जिन में मर्दऔरत का मेल आजमाया हुआ और सब से आखिरी टोटका है.
विश्रामगंज इलाके में रुंझ नदी बहती है. इस के बारे में कहा जाता है कि यहां पानी की धार में हीरे बहते मिल जाएंगे. इस अंधविश्वास पर भरोसा करते हुए हजारों लोग नदी के आसपास डेरा डाल चुके हैं. हीरा खोजते हुए कई लोग पार्टटाइम काम भी करने लगे हैं, जैसे चायपकौड़ी की टपरी लगाना. बुधवार और रविवार को खासतौर पर टोटकों का दिन माना जाता है. ऐसे ही एक टोटके में मर्दऔरत पहले तो लोबान जला कर चाल (कंकड़ों का ढेर जिस से हीरा छांटा जाना है) बिखरा दी जाती है.
इस के बाद पास ही जहां मचाई होती है, उस कीचड़ वाले गड्ढे में पतिपत्नी चले जाते हैं और बिना कपड़ों के सैक्स करते हैं. फिर कपड़ेलत्ते पहन कर काम में लग जाते हैं. मजदूरों का मानना है कि यह सब खदान में किसी के भी आने से पहले और भगवान के जागने के पहले होना चाहिए.
एक तरीका और है. जहां कंकड़ रखे होते हैं, वहां बीचोंबीच एक मजदूर को सुलाया जाता है और फिर
7 बार गोलाकार घसीटा जाता है. वह चिल्लाता है, ‘‘मिलेगा… मिलेगा…’’ पर कंकड़ों पर घिसटते हुए वह खूनमखून हो जाता है. कई बार गहरे जख्म भी बन जाते हैं, लेकिन फर्क नहीं पड़ता. मजदूर से ले कर ठेकेदार तक चाहते हैं कि बस किसी तरह हीरा मिल जाए.
सिलिकोसिस बीमारी से जूझ रहे हीरा मजदूर
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की हीरा खदानों से जुड़ा एक पक्ष बेहद डरावना है. खदानों में काम कर रहे ज्यादातर मजदूर सिलिकोसिस नामक बीमारी से जूझ रहे हैं. फेफड़ों में पत्थर जैसी परत जमाने वाली इस लाइलाज बीमारी ने आधी उम्र में ही इन मजदूरों को बूढ़ा बना दिया है और कई मजदूरों की मौतों ने इन परिवारों को बेसहारा बना दिया है. गांधीग्राम, मनोर और बड़ौर जैसे गांवों में खदानों की धूल मजदूरों को सांसों में जा कर उन्हें अंदर ही अंदर खा रही है. पत्थर तोड़ते समय उड़ने वाली सिलिका सैंड सांस के जरीए फेफड़ों में जमा हो जाती है, जिस से सांस लेना दूभर हो जाता है. 16-17 साल की उम्र से खदानों में पसीना बहाने वाले मुकेश आदिवासी इस बीमारी से इस कदर पीडि़त हैं कि अब चलनेफिरने लायक नहीं बचे. सांस फूलना, लगातार खांसी और भूख न लगना उन की रोजमर्रा की जद्दोजेहद बन गई है. ऐसे में अपने बीवीबच्चों का पेट पालना मुश्किल हो गया है. हालात ये हैं कि कभीकभी भूखे पेट ही सोना पड़ता है.
इसी तरह खदानों में रातदिन नंगे पैर काम करने से मजदूरों के पैर भी सूज गए हैं. उन के फेफड़ों में भी दर्द रहता है. सांस लेने में दिक्कत होती है. वे ज्यादा बोल भी नहीं पाते.
हीरा खदानों में काम कर रहे मजदूरों को होने वाली इस बीमारी ने केवल मजदूरों की जिंदगी ही नहीं छीनी, बल्कि परिवारों को आर्थिक तंगी में धकेल दिया है. मजदूरों के हितों की दुहाई देने वाले संगठन और सरकारी अस्पताल मजदूरों को कभीकभार मास्क और दवाओं का वितरण कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं. Panna diamond mines




