सरस सलिल विशेष

‘वक्तेरुखसत तसल्लियां दे कर, और भी तुम ने बेकरार किया.’

यहां शायर उन नेताओं के मन का दर्द कह रहा है, जो चुनावों में पार्टी के प्रचार के लिए किसी दूसरे राज्य में गए थे. वहां मीडिया ने उन्हें रंगरलियां मनाते हुए ऐक्सपोज कर दिया. अब अपने राज्य में उन के खिलाफ विपक्ष वालों ने खूब प्रचार किया है कि इस तरह के रंगीनमिजाज विधायकों की सदस्यता खारिज की जाए. उन के सुप्रीमो ने अब उन्हें तसल्ली दी है कि यह गर्दगुबार जल्दी ही छंट जाएगा, क्योंकि होहल्ला करने वाले विपक्ष के नेताओं का मुंह हीरेजवाहिरात से भर दिया गया है.

ये नेता वहां खूब रंगरलियां मनाते रहे, खरीदारी भी कमाल की हुई. सारा इंतजाम बढि़या था. घूमाघूमी भी बहुत अच्छी रही. शराब भी विलायती थी और मुरगा भी ताजा व जायकेदार मिलता रहा. दोस्तों की रंगीन महफिलें भी खूब जमीं.

इन नेताओं के अपने राज्य की तरफ चलने से 2 दिन पहले अखबार वालों ने पता नहीं कैसे यह राज उजागर कर दिया कि कुछ विधायक चुनावी प्रचार के दौरान रंगरलियों में डूबे रहे.

शायर कहता है कि हे देशवासियो, चुनाव प्रचार तो अपनेआप में एक नैशनल फैस्टिवल है. चुनावी परचा भरने से कई दिन पहले ही भावी उम्मीदवार के घर हलवाई बैठा दिया जाता है. लजीज, लुभावने और तर व्यंजनों की मनभावन खुशबू चारों तरफ फैल जाती है. दूरदूर से बधाइयों व समर्थनप्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है.

असली भांगड़ा तो उस दिन होता है, जब उम्मीदवार को पार्टी का टिकट मिल जाता है. साकी इतनी जोर से जाम छलकाता है कि हर तरफ मय ही मय बरसती है और सारी फिजां पर मदहोशी का नशा छा जाता है. गाजेबाजे के साथ हमारा होनहार उम्मीदवार पूरी तरह सजधज कर अपना नामांकन परचा भरने जाता है.

सजी हुई सैकड़ों कारें, आदमकद बैनर, कारोंबसों पर चस्पां पोस्टर और लोकलुभावन नारे हवा में उछलते हैं. पूरे शहर का ट्रैफिक गड़बड़ा जाता है. पुलिस वाले खुद आगे बढ़ कर बैरिकेड लगाते हैं, ताकि बड़े लोगों की कारों के काफिले रुकने न पाएं.

आम आदमी को आनेजाने में कोई परेशानी न हो, इस बात की किसे चिंता है. पुलिस वाले तो बस पार्टी उम्मीदवार के गुस्से से ही डरते हैं. कल को अगर वह जीत गया, तो वही उन का माईबाप होगा.

ताकत दिखाने का यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहता है. परचा भरतेभरते आधा प्रचार तो यों ही हो जाता है.

चुनाव में विरोधी को मात देने के लिए एक और तरीका अपनाया जाता है. जगहजगह स्टेज शो कराए जाते हैं. फिल्मी सितारे, बड़े खिलाड़ी, गायक व कलाकार भीड़ जुटाने में एड़ीचोटी का जोर लगाते हैं. सब को वक्त पर पैसा जो मिल जाता है. कूल्हे मटकाती मौडलें स्टेज पर कैबरे दिखाती हैं. इस दौरान उम्मीदवार के घर के बाहर लंगर चलता रहता है.

आखिरी हफ्ते में तो यह चुनावी फैस्टिवल पूरे रंग में होता है. आसपास के राज्यों से दबदबे वाले नेता बुलाए जाते हैं. वोटरों के दुखते कानों में इतना चुनावी कचरा फेंका जाता है कि वे बेचारे भी सोचते हैं कि कब चुनाव का दिन आए और वे वोट फेंक कर शांति से सो सकें.

प्रशासन की नाक में भी दम रहता है. सरकारी मुलाजिमों की नींद हराम हो जाती है. उन की जान तब आफत में पड़ जाती है, जब वे रातदिन एक कर के वोटिंग मशीनों को संभालते हैं, चुनाव कराते हैं, पहरा देते हैं.

शायर सही कहता है, ‘… और भी तुम ने बेकरार किया,’ यानी सुप्रीमो ने चलतेचलते कहा था, ‘अगले 6 महीने बाद दूसरे राज्यों में भी चुनावी बिगुल बजने वाला है. तुम्हारी ऐसी धमाकेदार सेवा फिर की जाएगी. ये मीडिया वाले तो सिरफिरे हैं, जो चुनावी फर्ज व शानोशौकत को रंगरलियों जैसे घटिया नाम से पुकारते हैं. हम ने तुम्हारे राज्य के मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष को फोन कर दिया है. तुम आराम से जाओ, वहां तुम्हारा बाल बांका तक नहीं होगा.

‘हां, फिर तैयार रहना लल्ला. इस बार तुम्हें बंगाल के काले जादू व असम की ब्लैक ब्यूटी का स्वाद चखाएंगे.’

‘वक्तेरुखसत तसल्लियां दे कर…’ वाह, क्या रुतबा है चुनावी प्रचार से लौटने वाले जत्थे का. शायर की बेकरारी काबिलेगौर है. नेताओं को अपने सुप्रीमो पर पूरा भरोसा है कि ऐसे नायाब चुनावी फैस्टिवल कभी नहीं थमेंगे. इलैक्शन कमिश्नर लाख सयाना बने, मगर हमारे रहनुमा कोई न कोई चोर दरवाजा तलाश ही लेते हैं.

शायर कहता है कि धन्य हैं हमारे भविष्य निर्माता, जो चुनावों को एक रंगारंग फैस्टिवल की तरह मनाते हैं, लंगर चलाते हैं, कंबलसाडि़यां बांट कर गरीबगुरबों की लाज ढकते हैं, बाजेगाजे, ठुमके, दवादारू का कामयाब आयोजन करते हैं और देश की एकता की अनूठी मिसाल कायम करते हैं. आखिर में जीत उन्हीं की होती है, जो गरीब जनता की जितनी ज्यादा सेवा करते हैं. जनता एक बार फिर चुनावों का बेसब्री से इंतजार करने लगती है.

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