सरस सलिल विशेष

यह उन दिनों की बात है जब मैं पंजाब के एक छोटे से शहर के एक थाने में तैनात था. एक दिन दोपहर लगभग 3 बजे एक अधेड़ उम्र की औरत थाने में आई, उस के साथ 2 आदमी भी थे. उन्होंने बताया कि एक औरत मर गई है, उन्हें शक है कि उस की हत्या की गई है. पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्हें संदेह इसलिए है कि देखने से ऐसा लग रहा है जैसे उसे जहर दिया गया हो.

मैं ने देखा मर्द बोल रहे थे लेकिन औरत चुप थी. मैं ने पूछा रिपोर्ट किस की ओर से लिखी जाएगी. उन्होंने औरत की ओर इशारा कर दिया. वे दोनों मर्द उस के पड़ोसी थे. औरत का नाम शादो था और मरने वाली का नाम सरदारी बेगम. मैं ने मरने वाली से उस का संबंध पूछा तो उस ने बताया कि मरने वाली उस की सौतन थी. उस के पति का 9 महीने पहले देहांत हो चुका था. सौतनों के झगड़े होना मामूली बात है. मैं ने भी इसी तरह का केस समझ कर रिपोर्ट लिख ली और उनके घर पहुंच गया.

मैं ने लाश को देखा तो लगा कि मृतका को जहर दिया गया है. मैं ने कागजी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और केस की जांच में लग गया. मैं ने देखा कि घर में एक ओर चीनी की प्लेट में थोड़ा सा हलवा रखा हुआ था, उस में से कुछ हलवा खाया भी गया था.

मैं ने अनुमान लगाया कि मृतका को हलवे में जहर मिला कर खिलाया गया होगा. मैं ने उस हलवे को जाब्ते की काररवाई में शामिल कर के उसे मैडिकल टेस्ट के लिए भेज दिया. मैडिकल रिपोर्ट आने पर ही आगे की काररवाई की जा सकती थी.

शादो से मैं ने पूरी जानकारी ली तो पता लगा कि उस के और सरदारी बेगम के पति का नाम मसूद अहमद था. वह छोटामोटा कारोबार करते थे. सरदारी बेगम अपने पति की दूर की रिश्तेदार भी थी, जबकि शादो की उन से कोई रिश्तेदारी नहीं थी. सरदारी बेगम से मसूद के 2 बेटे और एक बेटी थी. जबकि शादो से कोई संतान नहीं थी. तीनों बच्चों की शादी हो चुकी थी. लड़की अपने घर की थी और दोनों लड़के मांबाप से अलग रहते थे. शादो ने कहा कि उन दोनों को उन की मां के मरने की जानकारी दे दी गई है.

शादो से जो जानकारी मिली, वह संक्षेप में लिख रहा हूं. मसूद अहमद का कारोबार ठीकठाक चल रहा था. उन्होंने शादो से चोरीछिपे शादी कर ली थी और उसे एक अलग मकान में रखा हुआ था. इसी बीच मसूद बीमार पड़ गए. उन की हालत दिनबदिन गिरती जा रही थी. तभी एक दिन उन्होंने सरदारी बेगम से कहा कि उन्होंने चोरी से एक और शादी की हुई है.

यह सुन कर सरदारी बेगम को दुख तो हुआ लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था. मसूद अहमद ने दूसरी पत्नी शादो को बुला कर उस का हाथ सरदारी बेगम के हाथ में दे कर कहा कि मेरा कोई भरोसा नहीं है कि मैं कितने दिन जिऊंगा. मेरे बाद तुम शादो का खयाल रखना, क्योंकि इस के आगेपीछे कोई नहीं है. मैं तुम्हारी खानदानी शराफत की वजह से इस का हाथ तुम्हें दे रहा हूं और उम्मीद करता हूं कि तुम इस का खयाल रखोगी.

सरदारी बेगम ने मसूद से वादा किया कि वह शादो का पूरा खयाल रखेगी और उसे कभी भी अकेला नहीं छोड़ेगी. इस के कुछ दिन बाद ही मसूद का देहांत हो गया.

सरदारी बेगम ने शादो को अपने पास बुला कर रख लिया और उस से कहा कि वह उसे सौतन की तरह नहीं, बल्कि अपनी सगी बहन की तरह रखेगी. शादो के इस तरह घर में आ कर रहने से सरदारी के दोनों बेटे खुश नहीं थे. न ही उन्होंने उसे अपनी सौतेली मां माना. उस के आने से घर में रोज झगड़े होने लगे. हालात से तंग आ कर सरदारी बेगम शादो के उस मकान में चली गई, जिस में वह रहा करती थी.

दोनों बेटे इस बात से खुश थे, लेकिन दुनियादारी निभाने के लिए मां से कहते थे कि तुम हमारे पास आ जाओ, लेकिन शादो को साथ नहीं लाना. सरदारी ने कहा कि मैं मरते दम तक अपने पति से किया वादा पूरा करूंगी और शादो का साथ नहीं छोड़ सकती.

महीने-2 महीने में सरदारी बेगम अपने बेटों से मिलने चली जाती थी. बड़ा बेटा मां से खुश नहीं था. वह कहता था कि शादो को छोड़ कर यहां आ जाओ, लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं थी.

बड़े बेटे शरीफ ने बहाने बना कर अपने पिता के कारोबार और बैंक में जमा रकम पर कब्जा कर लिया था. इस से उन दोनों को खानेपीने की तंगी होने लगी. सरदारी बेगम पढ़ीलिखी थी, उस ने घर में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया.

शादो ने एक स्कूल की हेडमिस्ट्रैस से मिल कर अपने लिए स्कूल में छोटेमोटे कामों के लिए नौकरी कर ली. इस तरह उन की आय बढ़ गई और खानेपीने का इंतजाम हो गया. शरीफ अपनी मां से बारबार शादो को छोड़ने के लिए कहा करता था लेकिन वह किसी तरह भी तरह तैयार नहीं होती थी. इस से शरीफ अपनी मां से बहुत नाराज था.

जिस दिन सरदारी बेगम का देहांत हुआ था, उस दिन शादो स्कूल से अपनी ड्यूटी पूरी कर के घर पहुंची तो देखा सरदारी बेगम मर चुकी हैं. वह रोनेचीखने लगी. मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. उन्होंने लाश को देखा तो मृतका का रंग देख कर उन्हें भी लगा कि उसे जहर दिया गया है या उस ने खुद जहर खा लिया है, इसलिए पुलिस में रिपोर्ट करनी जरूरी है. और इस तरह वे 2 आदमी शादो के साथ रिपोर्ट लिखाने थाने आए थे.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में लिखा था कि मृतका की मौत जहर के कारण हुई है. उस के पेट में जो हलवे की मात्रा निकली, वह हजम नहीं हुई थी, उस में जहर मिला हुआ था. शाम तक हलवे के टेस्ट की रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट में लिखा था कि हलवे में संखिया की मात्रा पाई गई है. संखिया को अंगरेजी में आर्सेनिक कहते हैं. यह इंसान के लिए बहुत खतरनाक होता है.

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मैडिकल टेस्ट से यह बातसाफ हो गई कि सरदारी बेगम को जहर दे कर मारा गया था. मैं ने शादो से पूछा कि क्या उस दिन घर में हलवा बना था? लेकिन उस ने इस बात से इनकार कर दिया.

अब सोचने वाली बात यह थी कि अगर घर में हलवा नहीं बना तो सरदारी को हलवे में जहर किस ने दिया? सरदारी बेगम के नाम कोई जायदाद भी नहीं थी और न ही वह सुंदर थी, जिस की वजह से उसे जहर दे कर मार दिया गया हो. मैं ने शादो से पूछा कि उस का किसी से कोई लड़ाईझगड़ा तो नहीं था.

उस ने कहा, ‘‘नहीं जी, मेरी सौतन तो बहुत भली औरत थी. कभी किसी से न झगड़ने वाली. मैं ने उसे कभी गुस्से में नहीं देखा. मैं खुद सोच रही हूं कि उसे जहर कौन दे सकता है?’’

केस मेरी समझ से बाहर था. मैं ने सरदारी बेगम के दोनों बेटों को बुला कर जांच करने का मन बनाया. शादो से मैं ने पूछा कि उसे किसी पर शक तो नहीं, उस ने कहा नहीं.

मैं ने शादो से बहुत से सवाल किए और कुरेदकुरेद कर पूछा कि कोई काम की बात पता चल सके, लेकिन उस से कुछ पता नहीं लग सका. अगले दिन तो वे लोग सरदारी बेगम के अंतिम संस्कार में लगे रहे. इस के तीसरे दिन मैं ने उस के दोनों बेटों को थाने बुलवाने का प्रोग्राम बनाया.

थाने बुला कर मैं ने शरीफ और उस के छोटे भाई इदरीस से पूछताछ की. लेकिन उन से भी कोई बात पता नहीं लगी. इदरीस कम बोलता था, मेरे हर सवाल का संक्षेप में जवाब देता था. उस ने अधिकतर सवालों के जवाब हां या ना में दिए थे. मैं ने दोनों भाइयों को यह कह कर भेज दिया कि जरूरत पड़ी तो फिर बुला लूंगा.

मैं ने अपने मुखबिर चारों ओर फैला दिए थे. मुझे उम्मीद थी कि वे जरूर कुछ न कुछ पता लगा लेंगे. मैं ने उन से कह दिया था कि वे यह पता करें कि शादो और सरदारी बेगम के आपसी संबंध कैसे थे? क्या उन में कभी झगड़ा हुआ था? हत्या वाले दिन मृतका के घर कौनकौन आया था? किसी ने प्लेट में किसी को कोई चीज लाते तो नहीं देखा था?

यह केस मेरे लिए सिरदर्द बन गया था. हत्या का कोई कारण पता नहीं लग रहा था. मैं ने बहुत दिमाग लगाया. घूमफिर कर शादो ही दिमाग में आ रही थी, इसलिए मैं ने शादो से पूछताछ करने का फैसला कर लिया.

सरदारी बेगम के मरने के बाद शादो अकेली रह गई थी. वह अकसर सरदारी को याद कर के रोती रहती थी. स्कूल की हेडमिस्ट्रैस ने उस की यह हालत देख कर उस के रहने के लिए स्कूल में एक कमरा दे दिया था. वह उसी कमरे में रहने लगी थी. मैं ने एक सिपाही को बुला कर स्कूल का पता दे कर कहा कि छुट्टी के बाद शादो को ले आए.

करीब ढाई बजे वह शादो को ले कर आ गया. उस के साथ स्कूल की हेडमिस्ट्रैस भी थीं. उस ने बताया कि वह शादो के साथ इसलिए आई है क्योंकि वह बहुत डरी हुई थी.

मैं ने हेडमिस्ट्रैस को तसल्ली दी कि शादो से केवल पूछताछ करनी है, आप इसे यहीं छोड़ जाएं. वह चली गई तो मैं ने शादो के दिल से थाने का डर निकालने के लिए इधरउधर की बातें कीं और फिर बातों का रुख उस के दिवंगत पति की ओर मोड़ दिया.

पति की बात सुन कर वह भावुक हो गई और उस की ऐसे तारीफ करने लगी, जैसे वह कोई फरिश्ता हो.

बातोंबातों में मैं ने एक सवाल पूछा, ‘‘क्या यह सच है कि तुम एक वेश्या हो?’’ न चाहते हुए भी मैं ने उस से सवाल किया.

यह सवाल सुन कर उसे झटका सा लगा. उस के चेहरे का रंग लाल हो गया, उस की आंखों से आंसू निकल आए. उस ने सिर झुका कर जवाब दिया, ‘‘हूं नहीं, लेकिन कभी थी.’’

फिर झटके से अपना सिर उठा कर बोली, ‘‘यह बात आप से शरीफ ने कही होगी. उस के पिता ने मुझे गंदगी से निकाल कर इज्जत की जगह दी थी. इस हिसाब से मैं उस की मां लगती हूं, लेकिन वह मुझे मां समझने के बजाय अपने पिता की रखैल समझता है.’’

शादो की यह बात सुन कर मेरी रुचि बढ़ी और मैं ने उस से कहा कि वह मुझे विस्तृत जानकारी दे कि उस की शादी मसूद से कैसे हुई. उस ने कहा, ‘‘यह बहुत लंबी कहानी है.’’

मैं ने उस से कहा कि वह निश्चिंत हो कर सब कुछ बताए. इस पर उस ने अपनी दुखभरी लंबी कहानी सुनाई, जो मैं यहां संक्षेप में लिख रहा हूं.

शादो का असली नाम शमशाद बेगम था लेकिन घर वाले उसे शादो कहा करते थे. उस का बाप एक सरकारी औफिस में चपरासी था. बहुत गरीब थे ये लोग. मुश्किल से गुजारा होता था. शादो के 2 भाई और 2 बहनें थीं. शादो सब से बड़ी थी इसलिए

वह सब की लाडली थी. पिता उस की हर चाहत पूरी करता था, इसलिए उस की आदत बिगड़ गई थी.

5 बच्चे होने के कारण घर का खर्च मुश्किल से चलता था, इसलिए उस के पिता ने पार्टटाइम दुकान कर ली, जो चल निकली. इस के बाद घर का खर्च भी ठीक से चलने लगा.

शादो गरीब के घर जरूर पैदा हुई थी, लेकिन थी बहुत सुंदर. शादो को 5 जमात पढ़ाने के बाद घर बैठा लिया गया. वह घर पर मां के साथ घर का काम करने लगी.

शादो को फिल्मों और फिल्मी गानों का शौक था, लेकिन उस ने फिल्म कभी नहीं देखी थी. इस के बावजूद वह अपने आप को किसी हीरोइन से कम नहीं समझती थी. बाप से जिद कर के उस ने एक ट्रांजिस्टर मंगवा लिया, जिस पर वह बराबर गाने सुनती थी. जवान होते ही उस पर मोहल्ले के लड़कों की नजर पड़ी. उन में एक लड़का जमाल था. वह खातेपीते घर का था. गोराचिट्टा जवान. जमाल के रिश्तेदार लाहौर में रहते थे.

वह अकसर लाहौर जाता रहता था. शादो भी उसे चाहने लगी थी. दोनों छिपछिप कर मिलते थे. एक दिन ऐसा भी आया जब वह उस के साथ भागने को तैयार हो गई. जमाल ने उसे बताया था कि लाहौर के फिल्म उद्योग में उस की जानपहचान है. वह उसे फिल्मों में काम दिलवा देगा. उस ने शादो से यह वादा भी किया कि वह उस के साथ शादी कर लेगा.

और फिर एक दिन वह अपनी मां से सहेली के घर जाने का बहाना कर के जमाल के साथ भाग गई. उसे मांबाप, अपने घर की याद  तो आई लेकिन उस की सोच पर जमाल के जादू ने परदा डाल दिया. लाहौर की फिल्मी दुनिया की चकाचौंध ने उसे अंधा कर दिया था. वह यह बात सुनातेसुनाते हिचकियां ले कर रोने लगी.

जरा सी देर रुक कर वह आगे बोली, ‘‘जमाल ने मुझे बता दिया था कि घर से निकल कर कहां पहुंचना है. मैं उस जगह पहुंच गई. वहां जमाल मेरा इंतजार कर रहा था. जमाल घर से काफी रकम चुरा कर लाया था. हम दोनों लाहौर पहुंच गए. वहां जमाल का एक मित्र सरकारी औफिस में नौकरी करता था. वह मुझे उस के क्वार्टर पर ले गया. जमाल के मित्र ने उसे एक अलग कमरा दे दिया. अगले दिन वह हमें नाश्ता करा कर अपने औफिस चला गया. जमाल और मैं कमरे में अकेले रह गए.’’

दोस्त के जाने के बाद जमाल ने शादो के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. शादो ने उसे रोका तो वह बोला, ‘‘फिल्मों में काम करने के लिए इस तरह की झिझक दूर करना जरूरी है.’’ फिर धीरेधीरे जमाल ने उस की ऐसी शर्म उतारी कि वह अपनी इज्जत खो बैठी. इस तरह एक शरीफ औरत बेगैरत बन गई.

जमाल का मित्र अंधा नहीं था. वह जानबूझ कर अनजान बना हुआ था. वह भी मौके की तलाश में था और लूट के माल में अपना हिस्सा लेना चाहता था. दूसरी ओर शादो जमाल पर शादी के लिए जोर डाल रही थी.

लेकिन उस ने यह कह कर मना कर दिया कि फिल्मों में शादीशुदा औरतों को नहीं लेते. फिर एक दिन जमाल यह कह कर चला गया कि वह अपने एक फिल्मी दोस्त के पास जा रहा है. उस के जाने के बाद उस का वह मित्र आ गया, जिस ने उसे कमरा दिया हुआ था. उस ने शादो के साथ जबरदस्ती शुरू कर दी.

वह कमजोर औरत थी, कुछ नहीं कर सकी. वेश्या का तो कुछ मोल भी होता है, लेकिन वह तो लूट का माल थी. पहले जमाल लूट रहा था और अब एक और लुटेरा आ गया था.

जमाल जब वापस आया तो उस ने उसे यह बात बताई. सुन कर वह गुस्से में आ गया और अपने दोस्त से झगड़ने लगा. उस के दोस्त ने कहा कि ये कौन सी शरीफ है. तुम दोनों का रिश्ता क्या है? अगर यहां रहना है तो मेरी शर्तों पर रहना होगा, नहीं तो पुलिस को बता दूंगा, फिर समझ लेना तुम दोनों का क्या होगा. यह सुन कर वे दोनों चुप हो गए.

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मित्र के औफिस जाने के बाद जमाल शादो को एक ऐसे इलाके में ले गया, जहां चारों ओर फिल्मों के बोर्ड लगे थे. वह उसे साथ लिए एक ऐसे औफिस में गया, जहां 3-4 लोग बैठे थे. कमरे में सिगरेट का धुआं भरा हुआ था. शादो के आते ही सब उस के शरीर को ऐसे देखने लगे, जैसे कोई कसाई बकरे को देखता है. शादो घबराई लेकिन जमाल ने कहा, ‘‘घबराओ नहीं, ये लोग फिल्म के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर हैं.’’

जमाल ने एक मोटे से आदमी से कहा, ‘‘अच्छी तरह देख लो राठौर साहब, हीरा है हीरा…आप इसे अपनी फिल्म में काम दे कर घाटे में नहीं रहेंगे.’’

राठौर बोला, ‘‘लड़की तो ठीक है, लेकिन खर्च कुछ कम कर दो.’’

जमाल ने कहा, ‘‘खर्च कम नहीं होगा, अगर आप को पसंद नहीं तो मैं दूसरे डायरेक्टर से बात कर लेता हूं. ऐसी हीरोइन के लिए तो मुंहमांगा पैसा मिलेगा.’’

राठौर साहब ने उसे एक लिफाफा देते हुए कहा, ‘‘चलो, ये रखो, हम इसे काम दे देंगे. इस खुशी में मुंह मीठा होना चाहिए.’’

राठौर ने जमाल को सौ रुपए का नोट दे कर कहा कि जा कर मिठाई ले आए. जमाल ने शादो से कहा, ‘‘मैं मिठाई ले कर आता हूं.’’

जब जमाल को गए काफी देर हो गई तो शादो घबरा कर रोने लगी. वे लोग बोले, ‘‘रोओ नहीं, जमाल अभी आ जाएगा.’’

लेकिन वह नहीं मानी और जोरजोर से रोने लगी. इस पर राठौर ने कहा, ‘‘यार, ये लड़की तो हमारे लिए मुसीबत खड़ी कर देगी. इसे सुला दो.’’

एक आदमी ने एक शीशी ले कर रुमाल पर लगाई और शादो का मुंह दबोच लिया. इस से वह बेहोश हो गई. जब उसे होश आया तो वह एक कमरे में बंद थी. इस के बाद उस के साथ वही खेल खेला जाने लगा जो जमाल और उस का मित्र खेल चुके थे.

राठौर से पता लगा कि जमाल उसे बेच कर चला गया है. राठौर ने उसे यह भी बताया कि जब उस से दिल भर जाएगा तो उसे वेश्याओं को बेच देगा. यह सुन कर शादो ने वहां से भागने का इरादा किया.

एक दिन राठौर ने बहुत शराब पी और सो गया. शादो ने उस की जेबों की तलाशी ली तो उसे काफी नोट मिल गए. उस ने जल्दीजल्दी उस की जेब से नोट निकाले और वहां से भाग कर सीधा रिक्शा कर के स्टेशन पहुंची. वह अपने घर वापस जाना नहीं चाहती थी. उस ने आत्महत्या करने के बारे में भी सोचा.

शादो परेशान हाल सी बेंच पर बैठी रो रही थी कि उस पर एक शरीफ से आदमी की नजर पड़ गई. उस व्यक्ति ने उस की परेशानी का कारण पूछने के बाद कहा, ‘‘अगर ऐसे ही रोती रही तो किसी गलत आदमी के हत्थे चढ़ जाओगी.’’

उस ने रोरो कर अपनी विपदा सुनाई. उस आदमी ने उस से कहा कि वह उस की पूरी मदद करेगा और उसे उस के घर छोड़ देगा. शादो ने घर जाने से मना कर दिया तो वह आदमी कहने लगा कि अगर उसे विश्वास हो तो वह उस के साथ चले. उस आदमी की शराफत को देख कर वह उस के साथ चलने को तैयार हो गई.

वह आदमी मसूद अहमद था. मसूद उसे अपने एक मित्र के घर ले गया और वहां उस से शादी का प्रस्ताव रखा. साथ ही उसे यह भी बता दिया कि वह विवाहित है और उस के बच्चे भी हैं. शादो उस से शादी के लिए तैयार हो गई. मसूद ने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया और शादो से निकाह कर के उसे एक अलग मकान में रखा.

अपनी इस शादी के बारे में मसूद ने अपने घर वालों को नहीं बताया. शादो मसूद द्वारा दिलाए गए घर में रह कर उस की सेवा करने लगी. उस के साथ जो गलत काम हुआ था, उस की वजह से उस के शरीर में ऐसी खराबी आ गई कि वह मां बनने के लायक नहीं रह गई थी. साल डेढ़ साल ठीक से गुजरा. फिर अचानक मसूद गंभीर रूप से बीमार हो गया. उस ने शादो से कहा कि मेरे मरने के बाद पता नहीं तुम्हारा क्या हो, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम्हें अपनी पत्नी के हवाले कर जाऊं, वह बहुत शरीफ औरत है, तुम्हारा पूरा ध्यान रखेगी.

फिर मसूद अहमद ने अपनी पहली पत्नी सरदारी बेगम को बुला कर पूरी कहानी सुनाई और शादो को उस के हवाले कर दिया. सरदारी बेगम ने पति से वादा किया कि वह उस का पूरा खयाल रखेगी. उस ने शादो का इतना साथ दिया कि वह अपने बच्चों को छोड़ कर शादो के साथ रहने लगी.

शादो के इतने लंबे बयान से मुझे लगा कि शादो जैसी शरीफ औरत सरदारी बेगम को जहर नहीं दे सकती, इसलिए मैं ने उसे घर जाने दिया. मैं सरदारी के हत्यारे के बारे में सोचने लगा. सोचविचार कर मैं ने शरीफ से पूछताछ करने का इरादा किया. एक मुखबिर ने मुझे बताया कि शरीफ शादो के खिलाफ तो था ही, जब उस की मां ने उस की बात नहीं मानी तो वह अपनी मां के भी खिलाफ हो गया था.

वह कहता था कि उस की मां उस की बदनामी करा रही है. लोग उस पर थूथू कर रहे हैं. जवान बेटों के होते हुए वह बच्चों को पढ़ा कर अपना गुजारा कर रही है. शरीफ ने पूरी कोशिश कर के देख ली कि उस की मां शादो को छोड़ दे, लेकिन उस की मां अपने दिवंगत पति से किया हुआ वादा तोड़ना नहीं चाहती थी.

अगले दिन मैं ने अपने एएसआई से शरीफ को उस के औफिस से लाने के लिए कहा. शरीफ एक सरकारी औफिस में स्टेनो था. वह उसे लेने चला गया. तभी 2 औरतें मेरे कमरे में आईं. उन में से एक शादो थी और दूसरी उस के स्कूल की टीचर. दूसरी औरत ने अपने पर्स में से एक पर्चा निकाल कर मुझे दिया. वह पर्चा शादो के नाम था. मैं ने उसे पढ़ा तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरी समस्या इतनी जल्दी हल हो जाएगी.

यह पर्चा सरदारी बेगम का शादो के नाम था, जिस में लिखा था, ‘आज शरीफ मेरे पास हलवा ले कर आया और उस ने बहुत कोशिश कर के मुझे हलवा खिलाया. कुछ देर तक वह मेरे पास बैठा और फिर चला गया. उस के जाने के बाद मेरा दिल मिचलाने लगा. मेरी सांस रुकने लगी. मैं समझ गई कि हलवे में वह मुझे जहर दे कर गया है. अब मैं बच नहीं सकूंगी. मैं यह तहरीर लिख कर संदूक में रख रही हूं, जिस से कि किसी निर्दोष को तंग न किया जाए.’ उस पर्चे में सब से नीचे सरदारी बेगम ने अपना नाम भी लिखा था.

मैं ने मिस्ट्रैस से पूछा कि यह पर्चा तुम्हें कहां से मिला. इस का जवाब शादो ने दिया. उस ने बताया कि सरदारी बेगम के पास एक ट्रंक था. उस की चाबी वह अपने सिर के पीछे की ओर बालों के नीचे लटका कर रखती थी. जिस दिन वह मरी तो मैं ने सब से पहले वह चाबी बालों से निकाल कर अपने पास रख ली थी. बाद में मैं उस चाबी के बारे में भूल गई थी.

भूलने का कारण यह था कि वह ट्रंक इतना महत्त्वपूर्ण नहीं था. उस में पैसा या जेवर जैसी कीमती कोई चीज नहीं थी. उस में वह अपने पति के कपड़े रखती थी. शादो उसे याद कर के बहुत रोती थी. यह उस दिन की बात है जब वह थाने आई थी. उस दिन वह रो रही थी तो वही मिस्ट्रैस जो उस के साथ आई थी. उस ने रोने का कारण पूछा तो उस ने कहा, ‘‘सरदारी को मरे काफी दिन हो गए हैं. उसे अपना कुछ सामान उस घर से लाना है, लेकिन वहां जाते डर लगता है.’’

मिस्ट्रैस ने कहा, ‘‘चलो मेरे साथ.’’

वह उस के साथ चली गई और वहां जा कर उस ने अपना सामान इकट्ठा किया. तभी उस की नजर सरदारी के संदूक पर पड़ी तो शादो से चाबी ले कर उसे खोला. कपड़ों के ऊपर यह पर्चा रखा मिला. पर्चा पढ़ते ही टीचर शादो को ले कर सीधी थाने आ गई थी.

पर्चा पढ़ कर मैं ने शादो से पूछा कि क्या सरदारी बेगम की कोई लिखावट मिल सकती है? उस ने बताया कि वह बच्चों को पढ़ाती थी, घर में जरूर उन का लिखा हुआ कुछ न कुछ मिल जाएगा. मैं ने एक कांस्टेबल को शादो के साथ भेज दिया. उस ने घर जा कर सरदारी बेगम की लिखावट ढूंढ कर दे दी.

उन दोनों के जाते ही एएसआई शरीफ को ले कर आ गया. उसे देख कर मुझे गुस्सा आ गया. मैं ने एएसआई को जाने के लिए कहा. उस के जाते ही शरीफ कुरसी पर बैठ गया.

‘‘खड़े हो जाओ,’’ मैं ने छड़ी को जोर से मेज पर मार कर कहा, ‘‘सामने दीवार की ओर मुंह कर के खड़े हो जाओ.’’

उस ने कहा, ‘‘क्या हुआ आगा साहब, मैं ने क्या गलती कर दी?’’

वह मेरे सामने नाटक कर रहा था. उस ने अपनी मां की हत्या की और नाम शादो का लगा दिया. उसे हत्यारिन साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और मुझे भी झूठ बोल कर गलत रास्ते पर जांच करने पर लगा दिया.

वह कुरसी पर बैठ चुका था और मेज पर हाथ रख लिए. मैं ने जोर से उस के हाथों पर छड़ी मारी, वह अपने हाथों को बगल में दबा कर सी…सी… करने लगा. उस की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘अपना इकबाली बयान दो, नहीं तो तुम्हारी चमड़ी उधेड़ कर रख दूंगा.’’ मैं ने गुस्से में कहा.

‘‘कैसा इकबाली बयान आगा साहब?’’ वह ढिठाई से बोला.

मैं उस के पास गया और छड़ी से उस का गला दबा कर कहा, ‘‘बको, जल्दी बको. तुम ने अपनी मां की हत्या की है या नहीं?’’

‘‘आप कैसी बातें कर रहे हैं आगा साहब, मैं अपनी मां की हत्या कैसे कर सकता हूं?’’

मैं ने उस की मां के हाथ का लिखा हुआ पर्चा दिखाते हुए कहा, ‘‘पढ़ो.’’

वह पर्चा लेना चाह रहा था. मैं ने उस का हाथ झटक दिया और कहा, ‘‘दूर से पढ़ो.’’

वह जैसेजैसे पर्चा पढ़ता जा रहा था, वैसेवैसे उस का शरीर ढीला पड़ता जा रहा था. फिर उस ने सिर झुका लिया. मैं ने उसे बताया कि यह पर्चा उस की मां के संदूक से मिला है. वह मेरी ओर आंखें फाड़ कर देखता रहा, बोला कुछ नहीं. मैं ने उसे बयान देने के लिए तैयार कर लिया. उस ने अपने बयान में बताया कि उसे मां के साथ शादो का रहना बिलकुल पसंद नहीं था. उस ने कई बार मां को शादो से अलग रहने के लिए कहा भी था, लेकिन वह तैयार नहीं हुई. उसे उस वक्त जबरदस्त झटका लगा, जब उस के पिता मसूद अहमद के एक मित्र ने उसे बताया कि शादो एक वेश्या है और उस का पिता शादो को लाहौर की हीरामंडी से ले कर आया था. ऐसी बातें सुनसुन कर वह कुढ़ता रहता था. उसे अपनी मां का एक बाजारू औरत के साथ रहना बिलकुल पसंद नहीं था, इसलिए उस ने तय कर लिया कि वह अपनी मां और शादो दोनों को जहर दे कर मार देगा.

उस ने हकीम जुम्मा खां से संखिया लिया और हलवा बना कर उस में मिला दिया और अपनी मां के घर ले गया. लेकिन उस दिन शादो घर में नहीं थी. उस ने मां को जोर दे कर हलवा खिलाया और उस से कहा कि यह हलवा शादो को भी खिलाना.

कुछ ही देर में उस ने देखा, मां की हालत खराब हो रही है, वह सांस खींचखींच कर ले रही थी. वह वहां से भाग आया. बाद में उसे पता चला कि उस की मां मर गई. उस ने अपने बयान में यह भी कहा कि उसे क्या पता था कि उस की मां मरतेमरते उसे फंसा जाएगी. उस ने वहां से भागने में जल्दी की, मरने के बाद आता तो मां को लिखने का मौका ही नहीं मिलता.

बयान लिख कर मैं ने शरीफ के हस्ताक्षर करा लिए और एक कांस्टेबल को हकीम जुम्मा खां को गिरफ्तार करने के लिए भेज दिया. वह भी गिरफ्तार हो कर थाने आ गया. मैं ने उसे अवैध रूप से जहर रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. मैं ने पूरे केस को मेहनत से तैयार किया और अदालत में पेश कर दिया. शरीफ को आजीवन कारावास की सजा मिली और हकीम को 2 साल की. इस तरह एक निकृष्ट बेटा अपने अंत को पहुंचा.

प्रस्तुति : एस. एम. खा