सरस सलिल विशेष

23 जून, 2018 का दिन थाईलैंड वाले कभी भूल नहीं पाएंगे. इसी दिन 11 से 16 साल के थाईलैंड की अंडर-16 फुटबाल टीम के 12 लड़के अपने कोच समेत उत्तरी थाईलैंड की थामलुआंग गुफा में क्या घुसे कि वहीं फंस कर रह गए.

दरअसल, 23 जून, 2018 की शाम को फुटबाल की प्रैक्टिस करने के बाद वे सब घर लौट रहे थे कि उन का गुफा देखने का मन बन गया.

जब वे सब अपनेअपने घर नहीं पहुंचे तो एक लड़के की मां ने अपने बेटे के लापता होने की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई.

24 जून, 2018 को वहां के लोकल अफसरों को बच्चों की साइकिलें और जूते गुफा में जाने के रास्ते के बाहर मिले.

इधर गुफा में फंसे बच्चे और उन का कोच बाढ़ के पानी से बचने के लिए 4 किलोमीटर तक अंदर पहुंच गए थे. जल्दी ही यह खबर जंगल की आग की तरह पहले पूरे थाईलैंड और उस के बाद दुनियाभर में फैल गई.

बचाने की जद्दोजेहद

बच्चों को गुफा से बाहर निकालने में सब से बड़ा रोड़ा बाढ़ का पानी साबित हुआ. 25 जून को बच्चों की तलाश में नेवी सील के गोताखोर गुफा में घुसे.

26 जून को वे गोताखोर कई किलोमीटर तक अंदर एक टीजंक्शन तक पहुंचे, पर वहां चूंकि पानी का तेज बहाव था इसलिए वे लौट आए.

27 जून तक थाईलैंड में अमेरिका के 30 नौसेना वाले और ब्रिटेन के 3 माहिर गोताखोर भी आ चुके थे. उन्होंने भी बच्चों तक पहुंचने की जीतोड़ कोशिश की पर पानी के तेज बहाव ने उन्हें भी आगे बढ़ने से रोक दिया.

इसी बीच दोबारा बारिश हो गई जिस से 28 जून को मजबूरन यह मुहिम रोक देनी पड़ी. गुफा से पानी निकालने के लिए पंप लगाए गए, पर कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली.

तब तक यह भी नहीं पता था कि गुफा में गए सब बच्चे और उन के कोच की हालत कैसी है. वे जिंदा हैं भी या नहीं. इसी बीच बचाव दल ने 1 जुलाई को गुफा के भीतर एक औपरेटिंग बेस बनाया और सैकड़ों एयर टैंक व दूसरी जरूरी चीजें अंदर पहुंचाई गईं.

2 जुलाई का दिन दुनिया के चेहरे पर खुशी और राहत की बात ले कर आया. ब्रिटेन के गोताखोरों ने गुफा के अंदर पट्टापा बीच से 4 किलोमीटर अंदर बच्चों और उन के कोच को जिंदा पाया. इस के बाद उन तक खाने का सामान, दवाएं वगैरह पहुंचाई गईं.

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हुआ एक हादसा

जब यह लगने लगा कि अब फंसे हुए सभी लोगों को बचा लिया जाएगा, तब अचानक ऐसी बात हो गई कि इस हादसे पर पलपल की नजर रखने वाले लोग दुख में डूब गए.

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हुआ यों कि 6 जुलाई को 38 साला पूर्व थाई नेवी सील कमांडर समन गुनान की गुफा के अंदर मौत हो गई. वे बच्चों तक एयर टैंक पहुंचा कर लौट रहे थे कि गुफा के अंदर औक्सिजन की कमी होने से उन की जान चली गई.

यह था असली मिशन

बच्चों को बचाने के शुरुआती दिनों में यह माना गया कि उस इलाके में मानसून खत्म होने तक बच्चों को गुफा के भीतर ही रहना पड़ेगा. लेकिन जब बीच में भारी बरसात हुई तो यह डर लगा कि गुफा में तो पानी भरता ही जाएगा. साथ ही, गुफा में औक्सिजन का लैवल कम और कार्बन डाईऔक्साइड की मात्रा बढ़ रही थी. इस से तो बच्चों की मौत तक हो सकती थी.

इन्हीं सब बातों के मद्देनजर 8 जुलाई को यह फैसला लिया गया कि चाहे कुछ भी हो जाए बच्चों को जल्दी से जल्दी बचाना होगा.

इस बचाव दल में भारत, ब्रिटेन, चीन, म्यांमार, लाओस, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान, थाईलैंड समेत दूसरे कई देशों के लोग शामिल थे. गुफा में 90 गोताखोर भी मौजूद थे.

बच्चों व कोच के जीने के जज्बे ने अपना रंग दिखाया. बचाव दल ने 8 जुलाई को 4 बच्चों को, उस के बाद 9 जुलाई को फिर 4 बच्चों को और 10 जुलाई को 4 बच्चों के साथ उन के कोच को भी गुफा से बाहर निकालने में कामयाबी पाई.

कोच ने बढ़ाई हिम्मत

गुफा में फंसे 12 बच्चे अपने कोच के साथ पूरी दुनिया से कट चुके थे. उन्हें तो यह भी नहीं मालूम था कि वे उस अंधेरे से निकल कर सूरज को दोबारा देख पाएंगे या नहीं.

पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. इस काम में बच्चों के कोच एकापोल ने उन का बखूबी साथ दिया. हालांकि एकापोल बच्चों को मौत के मुंह में ले जाने के लिए खुद को जिम्मेदार मान रहे थे और इस के लिए गलती भी मानी थी पर उन्होंने थाईलैंड के लोगों से वादा भी किया था कि वे बच्चों का खयाल रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. उन्होंने बच्चों का हौसला बनाए रखा जिस से वे सभी तकरीबन 18 दिनों तक गुफा में जिंदा रहे.

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