सरस सलिल विशेष

नेपाल में संसद का कार्यकाल समाप्त होने के चंद हफ्ते पहले कानूनों की एक नई और व्यापक सीमा तय करने-कराने की जद्दोजहद दिखी थी. इनमें कई कानून व्यापक जनहित के तो हैं ही, कुछ ऐसे हैं, जिन्हें राजनीतिक दलों की स्वार्थ लिप्सा के कारण पारित करा पाना संभव न था. स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए तैयार विधेयक है ऐसा ही है, जिसका सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-माओइस्ट सेंटर जैसे दल विरोध में हैं. सभी जानते हैं कि इनके कैसे-कैसे हित इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और वे कभी भी इस लाभ से वंचित नहीं होना चाहेंगे.

दूसरा, नेशनल असेंबली चुनाव संबंधी विधेयक चुनाव प्रणाली में सुधार की बातें करता है. सरकार ये दोनों कानून अब अध्यादेश के जरिए लाने जा रही है, जिन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जा चुका है. ये महज इसलिए बेहतर नहीं हैं कि ये जरूरी कानूनी मामले हैं, बल्कि इसलिए भी कि इनके प्रावधान आम नागरिकों के हित में हैं.

स्वास्थ्य-शिक्षा सुधार अध्यादेश में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरी को रोकने के व्यापक प्रावधान हैं. यह काठमांडू घाटी में अगले दस साल तक कोई नया मेडिकल कॉलेज खोलने पर रोक की बात करता है. इसे लेकर सबसे ज्यादा घबराहट है. काठमांडू में रसूखदारों और नेताओं ने जिस तरह मेडिकल कॉलेज खोलकर इन्हें मोटी कमाई का जरिया बना रखा है, उसमें यह विरोध स्वाभाविक है. सच तो यह है कि काठमांडू में मेडिकल कॉलेजों का जाल है, जिनका काम प्रवेश के नाम पर छात्रों से मोटी धनराशि वसूलना और फिर उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना है. संसाधन विहीन ये कॉलेज महज छात्रों के सपनों और मरीजों का दोहन करने का जरिया बनकर रह गए हैं. ऐसे में, सख्त कानून की दरकार थी.

यह सच है कि चुनाव खत्म होने के बाद अध्यादेशों को संसद से पास कराना होगा, लेकिन फिलहाल तो यही कहा जाना चाहिए कि नेपाल सरकार ने इन विवादास्पद लेकिन व्यापक जनहित के मामलों को खासी समझदारी और संतोषजनक तरीके से सुलझाने की कोशिश की है, जिसका स्वागत होना चाहिए.