सरस सलिल विशेष

उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गृहप्रवेश करते समय उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री निवास में शुद्धिकरण हवन कराया और वास्तुदोष निकलवाए. देश की जनता के बड़े हिस्से को, पिछले 50 सालों में, जम कर वास्तुशास्त्र बेचा गया है और इस में वैज्ञानिकों, विचारकों, बुद्धिजीवियों तक को नहीं छोड़ा गया, आम धार्मिक कर्मकांडों के बीच पलेबड़े लोगों का तो कहना ही क्या. धर्म का धंधा अब जम कर फूलेफलेगा, इस में संदेह नहीं है.

लेकिन, इस बारे में शिकायत करने की बड़ी गुंजाइश नहीं है. धर्मों ने दुनियाभर में एक बार फिर मानसिक लड़ाई जीत ली है. मुसलिम देश तो ‘घर फूंक तमाशा देख’ कर खुश हो रहे हैं. उन के लिए धर्म बंदूकों की गोलियों और बमों के धमाकों से ही स्थापित होता है. मुसलिम अरब देशों के लाखों घरों में मुसलमान ही मौत का संदेश पहुंचा चुके हैं. और साथसाथ वे यूरोप व अमेरिका में घुसपैठ भी कर रहे हैं.

अमेरिका और यूरोप में धर्म की फौज का मुकाबला करने के लिए जो जनमत तैयार हो रहा है, उस का नेतृत्व ईसाई चर्च कर रहा है. तार्किकता, व्यावहारिकता, दूरगामी सोच छोड़ कर धर्म की सत्ता को नमन पूरे यूरोप और अमेरिका में किया जा रहा है तो भारत कैसे पीछे रह सकता है जहां धर्मजनित वर्र्णव्यवस्था, जातिव्यवस्था, रीतिरिवाज, अनुष्ठान, हवन, पूजापाठ, उत्सव, आयुर्वेद आदि जिंदगी का हिस्सा हमेशा ही बने रहे हैं. भारत के जिन राज्यों में कम्युनिस्टों ने लंबे समय तक सरकारें चलाईं वहां भी धर्म का प्रचारप्रसार कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा ही है.

उत्तर प्रदेश में पहले मुख्यमंत्री भी ऐसा कर चुके हैं. फर्क इतना है कि वे सफेद खादी पहनते थे. धर्म के बारे में उन की भी मानसिक गुलामी इसी तरह की थी. विकास की बातें तो हमेशा ही दूसरे दरजे पर रही हैं. लोगों को सुख न राम या शिव मंदिर बनाने से मिलता है, न अंबेडकर स्मारक. लोगों को जिस से सुख मिलता है वह कुछ और ही है और चाहे सरकारें वैज्ञानिक अधार्मिक सोच से पैदा हुई तकनीक के कारण उस को उपलब्ध करा भी देती हों, लेकिन फिर भी वे ढिंढोरा अपने धार्मिक क्रियाकलापों का करती रही हैं.

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर जो लोग आश्चर्य प्रकट कर रहे हैं उन्हें समझना चाहिए कि इस देश के अधिकांश मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री इसी मिट्टी के बने हैं.

उत्तर प्रदेश का कुछ बनेगा या बिगड़ेगा, तो यहां के लोगों की मेहनत से ही. इस का तो पहले के मुख्यमंत्री भी कोई रास्ता तैयार नहीं कर रहे थे. नए करें या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ता.

देश की जनता को अपने लिखे भाग्य पर इतना अंधा भरोसा है कि वह किसी भी नेता को दोष देने को तैयार ही नहीं हैं. तभी तो हारे हुए नेता पार्टियों पर कब्जा जमाए रखते हैं और जिन की उम्मीद नहीं होती, वे मंत्री, मुख्यमंत्री बन जाते हैं.