सहानुभूति जताने अस्पताल पहुंचे वर्माजी और गुप्ताजी ने तो बीमार का दर्द ही बढ़ा दिया. जब तक वे रहे, अशांति रही. दरअसल, दोनों स्वार्थ की बकझक में लगे थे, जबकि मरीज को शांति की दरकार थी