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पुलिस को फटकार

दिल्ली की जिला अदालत ने भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर को जमानत पर रिहा करने का आदेश तो दिया पर जो फटकार पुलिस को लगाई वह मजेदार है. आजकल पुलिस की आदत बन गई है कि किसी पर भी शांति भंग करने, देशद्रोह, भावनाएं भड़काने का आरोप लगा दो और जेल में बंद कर दो. आमतौर पर मजिस्ट्रेट पुलिस की बात बिना नानुकर किए मान जाते हैं और कुछ दिन ऐसे जने को जेल में यातना सहनी ही पड़ती है.

जिला न्यायाधीश कामिनी लाऊ ने पुलिस के वकील से पूछा कि क्या जामा मसजिद के पास धरना देना गुनाह है? क्या धारा 144 जब मरजी लगाई जा सकती है और जिसे जब मरजी जितने दिन के लिए चाहो गिरफ्तार कर सकते हो? क्या ह्वाट्सएप पर किसी आंदोलन के लिए बुलाना अपराध हो गया है? क्या यह संविधान के खिलाफ है? क्या बिना सुबूत कहा जा सकता है कि कोई भड़काऊ भाषण दे रहा था? पुलिस के वकील के पास कोई जवाब न था.

दलितों के नेता चंद्रशेखर से भाजपा सरकार बुरी तरह भयभीत है. डरती तो मायावती भी हैं कि कहीं वह दलित वोटर न ले जाए. छैलछबीले ढंग से रहने वाला चंद्रशेखर दलित युवाओं में पसंद किया जाता है और भाजपा की आंखों की किरकिरी बना हुआ है. वे उसे बंद रखना चाहते हैं.

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सहारनपुर का चंद्रशेखर धड़कौली गांव के चमार घर में पैदा हुआ था और ठाकुरों के एक कालेज में छुटमलपुर में पढ़ा था. कालेज में ही उस की ठाकुर छात्रों से मुठभेड़ होने लगी और दोनों दुश्मन बन गए. जून, 2017 में उसे उत्तर प्रदेश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया और महीनों तक बेबात में जेल में रखा और कानूनी दांवपेंचों में उलझाए रखा. कांग्रेस ने उसे सपोर्ट दी है और प्रियंका गांधी उस से मिली भी थीं, जब वह जेल के अस्पताल में था. उसे बहुत देर बाद रिहा किया गया था और फिर नागरिक कानून पर हल्ले में पकड़ा गया था.

पुलिस का जिस तरह दलितों और पिछड़ों को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, यह कोई नया नहीं है. हार्दिक पटेल भी इसी तरह गुजरात में महीनों जेल में रहा था. नागरिकता संशोधन कानून के बारे में सरकार ने मुसलिमों के साथ चंद्रशेखर की तरह बरताव की तैयारी कर रखी थी, पर जब असल में हिंदू ही इस के खिलाफ खड़े हो गए और दलितपिछड़ों को लगने लगा कि यह तो संविधान को कचरे की पेटी में डालने का पहला कदम है तो वे उठ खड़े हुए हैं. चंद्रशेखर को पकड़ कर महीनों सड़ाना टैस्ट केस था. फिलहाल उसे जमानत मिल गई है, पर कब उत्तर प्रदेश या कहीं और की पुलिस उस के खिलाफ नया मामला बना दे, कहा नहीं जा सकता.

सरकारों के खिलाफ जाना आसान नहीं होता.

जब पूर्व गृह मंत्री व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को 100 दिन जेल में बंद रखा जा सकता है तो छोटे नेताओं को सालों बंद रखने में क्या जाता है. अदालतें भी आमतौर पर पुलिस की मांग के आगे झुक ही जाती हैं.

देश दिवालिएपन की ओर

देश के छोटे व्यापारियों को किस तरह बड़े बैंक, विदेशी पूंजी लगाने वाले, सरकार, धुआंधार इश्तिहारबाजी और आम जनता की बेवकूफी दिवालिएपन की ओर धकेल रही है, ओला टैक्सी सर्विस से साफ है. उबर और ओला 2 ऐसी कंपनियां हैं, जो टैक्सियां सप्लाई करती हैं. कंप्यूटरों पर टिकी ये कंपनियां ग्राहकों को कहीं से भी टैक्सी मंगाने के लिए मोबाइल पर एप देती हैं और इच्छा जाहिर करने के 8-10 मिनट बाद कोई टैक्सी आ जाती है, जिस का नंबर पहले सवारी तक पहुंच जाता है और सवारी का मोबाइल नंबर ड्राइवर के पास.

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पर यह सेवा सस्ती नहीं है. बस, मिल जाती है. इस ने कालीपीली टैक्सियों का बाजार लगभग खत्म कर दिया है और आटो सेवाओं को भी धक्का पहुंचाया है. इन्होंने जवान, मोबाइल में डूबे, अच्छे जेबखर्च पाने वालों का दिल जीत लिया है. वे अपनी खुद की बाइक को भूल कर अब ओलाउबर पर नजर रखते हैं.

अब इतनी बड़ी कंपनियां हैं तो इन्हें मोटा मुनाफा हो रहा होगा? नहीं. यही तो छोटे व्यापारियों के लिए आफत है. ओला कंपनी ने 2018-19 में 2,155 करोड़ रुपए का धंधा किया, पर उस को नुकसान जानते हैं कितना है? 1,158 करोड़ रुपए. इतने रुपए का नुकसान करने वाले अच्छेअच्छे धन्ना सेठ दिवालिया हो जाएं पर ओलाउबर ही नहीं अमेजन, फ्लिपकार्ट, बुकिंगडौटकौम, नैटफिलिक्स जैसी कंपनियां भारत में मोटा धंधा कर रही हैं, जबकि भारी नुकसान में चल रही?हैं. उन का मतलब यही है कि भारत के व्यापारियों, धंधे करने वालों, कारीगरों, सेवा देने वालों की कमर इस तरह तोड़ दी जाए कि वे गुलाम से बन जाएं.

ओलाउबर ने शुरूशुरू में ड्राइवरों को मोटी कमीशनें दीं. ज्यादा ट्रिप लगाने पर ज्यादा बोनस दिया. ड्राइवर 30,000-40,000 तक महीना कमाने लगे, पर जैसे ही कालीपीली टैक्सियां बंद हुईं, उन्होंने कमीशन घटा दी. अब 10-12 घंटे काम करने के बाद भी 15,000-16,000 महीना बन जाएं तो बड़ी बात है.

यह गनीमत है कि आटो और ईरिकशा वाले बचे हैं, क्योंकि उस देश में हरेक के पास क्रेडिट कार्ड नहीं है और यहां अभी भी नकदी चलती है. ओलाउबर मोबाइल के बिना चल ही नहीं सकतीं. आटो, ईरिकशा 2 या 4 की जगह 6 या 10 जनों तक बैठा सकते हैं और काफी सस्ते में ले जा सकते है. यही हाल आम किराने की दुकानों का है. जो सस्ता माल, चाहे कम क्वालिटी का हो, हाटबाजार में मिल सकता है वह अमेजन और फ्लिपकार्ट पर नहीं मिल सकता, पर ये अरबों नहीं खरबों का नुकसान कर के छोटे दुकानदारों को सड़क पर ला देना चाहते हैं और सड़कों से अपना आटो और ईरिकशा चलाने वाले लोगों को भगा देना चाहते हैं.

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यह अफसोस है कि सरकार गरीबों की न सोच कर मेढकों की तरह छलांग लगाने के चक्कर में देश को साफ पानी तक पहुंचाने की जगह लूट और बेईमानी के गहरे गड्ढे में धकेलने में लग गई है.

फेल हुए मोदी

मोदी सरकार के फैसले धीरेधीरे घुन की तरह समाज, अर्थव्यवस्था, कानून, संविधान में सभी को खोखला करते नजर आ रहे हैं. जिन उम्मीदों के साथ 2014 में नए बदलावों और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार की आशा जगी थी, अब धूमिल ही नहीं हो गई, जो पिछले 6 सालों में हुआ है, वह दशकों तक तंग करता रहेगा.

नोटबंदी का फैसला तो बेमतलब का साबित हो चुका है. बजाय धन्ना सेठों के घरों से कमरों के कमरे वाले धन के मिलने के महज 50 दिन में जो नोट बदलने की बंदिश लगाई गई थी उस से आज भी महिलाएं तब दर्द की टीस सहती हैं जब उन के कपड़ों, किताबों, अलमारियों के नीचे से, गद्दों के बीच से 500 या 1000 के पुराने नोट निकलते हैं. यह रकम सरकार के लिए बड़ी नहीं क्योंकि 15.41 लाख करोड़ नोटों में से 99.3 फीसदी वापस आ ही गए हैं पर जिस घर में पूंजी हजारों की हो, वहां 2000-4000 की भी बहुत कीमत होती है.

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अब दूसरी आजादी, जीएसटी, की मार सरकार और जनता को सहनी पड़ रही है. अरुण जेटली ने अपने कागज के पैड पर अंदाजा लगा लिया था कि कर संग्रह 14 फीसदी बढ़ेगा हर साल, क्योंकि कर चोरी बंद हो जाएगी. पर जीएसटी कर तो बचा ले गई, लेकिन धंधे चौपट कर गई. न धंधे बढ़े, न कर संग्रह. केंद्र सरकार ने राज्यों को जो एक कर का खमियाजा देने का वादा किया था, उस में 1,56,000 करोड़ से ज्यादा की भरपाई का पैसा ही नहीं है.

लोगों को आज रिटर्न भरने में ज्यादा समय लगाना पड़ता है, व्यापार करने में कम. सरकार पंडों की तरह हर समस्या का उपाय एक और हवन, एक और तीर्थयात्रा, एक और धागे बांधने की तरह एक और रिटर्न का सुझाव दे डालती है. इस सरकार के दिमाग में भरा है कि ज्यादा प्रपंच, ज्यादा लाभ. मेहनत तो सरकार के मंत्रियों और संतरियों ने कभी न खुद की, न करने वालों की उन्होंने कदर की.

अब संविधान से एक के बाद एक खिलवाड़ करे जा रहे हैं कि कट्टरपंथियों को खुश रखा जा सके. ऊंचे पौराणिकपंथी चाहे उस से खुश हो जाएं, पर मेहनतकशों को क्षणिक गुस्से या खुशी के अलावा कोई फर्क नहीं पड़ता. जिन मुसलमानों को निशाना बना कर सरकार पूरा कार्यक्रम चला रही है, वे हर तरह का जोखिम सहने के आदी हैं. वे उन पिछड़ों व दलितों से ही मुसलमान बने हैं जो सदियों से सामाजिक अत्याचार सहते रहे हैं.

हां, ये सब फैसले उन्हें सरकार से नाराज कर देंगे. अगर भाजपा नहीं भी रहती, जैसा राज्यों में हो रहा है, इन बदलावों का असर रहेगा. घुन खाई लकड़ी पर दवा छिड़क दो तो घुन चाहे मर जाए पर जो लकड़ी खोखली हो चुकी है, वह तो खोखली ही रहेगी.

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हकों को कुचला

सरकार अब हक की जगह फर्ज का पाठ पढ़ाने में लग गई है. संविधान व कानूनों में बदलाव के बाद जो गुस्सा फूटा है उस से मुकाबला करने के लिए सरकार को लग रहा है कि पाठ पढ़ाया जाए कि नागरिकों के कोई हक नहीं हैं, सिर्फ फर्ज हैं. यह शासन करने का पुराना तरीका है. हर पुलिस थाने में, हर पंचायत में, हर घर में यही होता है.

यह हमारे समाज की देन है कि हम बात ही फर्ज की करते हैं, मान जाने की करते हैं, चुप रहने की करते हैं, जिस के पास ताकत है उस की आंख मूंद कर सुनने की करते हैं. यही फर्ज है और उस के आगे सारे हक खत्म हो जाएं.

सदियों से औरतों को, पिछड़े कामगारों को, किसानों को, मजदूरों को, समाज से बाहर रह रहे अछूत दलितों को अपने फर्जों की लिस्ट पकड़ाई गई है, हकों की नहीं. आज संविधान है पर बात बारबार उस में दिए गए हकों को कुचलने की की जाती है. ऐसे कानून बनाए जाते हैं जो एक के या दूसरे के हक छीन लें, ऐसे भाषण दिए जाते हैं, जिन में इस संविधान के हकों की जगह फर्जों की बात की जाती है.

यह जानबू झ कर करा जाता है ताकि हैसियत वाले नेता, अफसर, मंत्री, सेठ, घर में आदमी अपनी मनमानी कर सके. अब जब जनता ने नोटबंदी, जीएसटी और नागरिकता कानूनों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं तो उन्हें फर्ज का पाठ पढ़ाया जा रहा है, जबकि फर्ज का पाठ तो सरकार को पढ़ना था.

सरकारों का फर्ज था कि लोग खुश रहे. 6 साल कम नहीं होते खुशी लाने में. अगर 1947 से 2014 तक कुछ भी अच्छा नहीं हुआ तो सरकार ने जनता के बारे में 2014 से कौन से फर्ज पूरे किए.

सरकार ने रेलों की भीड़ नहीं कम की, हां, एयरकंडीशंड महंगी ट्रेनें चालू रखीं. सरकार ने गंदी  झोंपड़पट्टी खत्म नहीं की, हां, ऊंचेऊंचे मौल जरूर बन गए. दिल्ली जैसे शहर में 750 बस्तियों में सीवर नहीं हैं, पर हां, सरकार ने आरओ की बोतल वाले पानी को हर अमीर घर में पहुंचा दिया. सरकार ने नदियों की सफाई नहीं की जहां से मछुआरे मछली पकड़ सकते थे, हां, नदियों के किनारे घाट पक्के बनवा दिए जहां पौराणिक पाखंडबाजी का बाजार चालू है.

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सरकार ने अपने फर्ज में पढ़ेलिखे नौजवानों को रोजगार नहीं दिया, हां, जिस ने भगवा दुपट्टा ओढ़ लिया उसे धौंस जमाने का हक दे दिया. सरकार ने कारखानों के बारे में नई तकनीक का फर्ज पूरा नहीं किया, हां, पटेल की चीन से बनवा कर ऊंची मूर्ति लगवा दी, जहां अब अमीर लोग सैरसपाटे के लिए शेरों की सफारी देखने जा रहे हैं.

सरकार किस मुंह से कहती है कि जनता को हकों की नहीं फर्जों की सोचनी चाहिए. सरकारें लोकतंत्र में जनता के हकों को बचाने के लिए बनती हैं और जनता के बारे में अपने फर्ज पूरे करने के लिए बनती हैं. अपनी जिम्मेदारी जनता के सिर मढ़ने की कोशिश गलत है.

गहरी पैठ

अपने कैरियर की शुरुआत से ठाकरे परिवार ने यदि कोई सही फैसला लिया है, तो अब भारतीय जनता पार्टी के साथ बिना मुख्यमंत्री बने सरकार न बनाने का फैसला लिया है. वरना तो यह पार्टी बेमतलब में कभी दक्षिण भारतीयों, कभी बिहारियों, कभी हिंदू पाखंडवादियों के नाम पर हल्ला मचाती रहती थी. शिव सेना का असर महाराष्ट्र में गहरे तक है. महाराष्ट्र की मूल जनता जो पहले खेती करती थी, छोटी कारीगरी करती थी, बाल ठाकरे की नेतागीरी में ही अपना वजूद बना पाई थी.

अफसोस यह है कि 1966 में जन्म से ही शिव सेना भगवा दास की तरह बरताव कर रही है. उस ने वे काम किए जो भारतीय जनता पार्टी सीधे नहीं कर सकती थी. उस ने तोड़फोड़ की नीति अपनाई जिस से वह भगवा एजेंडे का दमदार चेहरा बनी, पर हमेशा भारतीय जनता पार्टी की हुक्मबरदार थी. महाराष्ट्र के मराठे लोग खेती करने वालों में से आते हैं. उन्होंने ही महाराष्ट्र को ऊंचाइयों पर पहुंचाया था. शिवाजी ने ही औरंगजेब से तब दोदो हाथ किए थे, जब उस की सत्ता को चुनौती देने वाला कोई न था. मुगल राज को खत्म करने में मराठों की सेना का बड़ा हाथ था.

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लेकिन शिवाजी के बाद मराठों की नेतागीरी फिर पुरोहितपेशवाओं के हाथों में आ गई. वे ही मराठा साम्राज्य को चलाने लगे थे. 1966 में बाल ठाकरे ने जिस भी वजह से शिव सेना बनाई हो, उस को इस्तेमाल किया गया. उस के लोग महाराष्ट्र के गांवगांव में हैं. वे ही कारखानों की यूनियनों में  झंडा गाड़े रहे. कम्यूनिस्ट आंदोलन को उन्होंने ही हराया, लेकिन वे हरदम चाह कर या अनजाने में सेवक बने रहे. जब मुख्यमंत्री पद एक बार मिला था तो भी भाजपा की कृपा से.

अब 2019 में उद्धव ठाकरे अड़ गए कि वे अपनी कीमत लेंगे. वे केवल मजदूर नहीं हैं जो भाजपा की पालकी उठाएंगे. वे खुद पालकी में बैठेंगे. शिव सेना का मुख्यमंत्री पर हक जमाना सही है, क्योंकि भाजपा की जीत शिव सेना की वजह से हुई है. 2014 में भी भाजपा और शिव सेना अलगअलग लड़ीं, पर भाजपा को 122 सीटें मिली थीं और शिव सेना को 63. भाजपा ने 2019 में मई में लोकसभा चुनावों के बाद एक फालतू का सा मंत्रालय दिल्ली कैबिनेट में दे कर बता दिया था कि उद्धव ठाकरे या नीतीश कुमार की हैसियत क्या है.

कांग्रेस के लिए इस हालत में शिव सेना से समझौते का फैसला करना आसान नहीं है, क्योंकि भाजपा हर तरह से शिव सेना को फुसला सकती है. 6-8 महीने में शिव सेना को मजबूर कर सकती है कि वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी या कांग्रेस से किसी बात पर  झगड़ कर फिर भाजपा के खेमे में आ जाए. 11 दिसंबर को कांग्रेस ने फैसले में देर लगाई तो शिव सेना को निराशा हुई, पर जो यूटर्न शिव सेना ले रही है वह आसानी से पचने वाला नहीं है. शिव सेना को यह जताना होगा कि अब तक उस को गुलामों की तरह इस्तेमाल किया गया है. वह महाराष्ट्र की राजा नहीं थी, केवल मुख्य सेवक थी. उम्मीद करें कि यह अक्ल उन और पार्टियों को भी आएगी जो भाजपा के अश्वमेध घोड़े के साथ चल कर अपने को चक्रवर्ती सम झ रही हैं. वे केवल दास हैं, जैसे उन के वोटर हैं.

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देश के सामने असली परेशानी मंदिरमसजिद नहीं है, बेरोजगारी है. यह बात दूसरी है कि आमतौर पर धर्म के नाम पर लोगों को इस कदर बहकाया जा सकता है कि वे रोजीरोटी की फिक्र न कर के अपनी मूर्ति के लिए जान भी दे दें और अपने पीछे बीवीबच्चों को रोताकलपता छोड़ जाएं. जब देश के नेता मंदिर की जीत पर जश्न मना रहे थे, उस समय 15 साल से 35 साल की उम्र के 58 करोड़ लोगों में नौकरी की फिक्र बढ़ रही थी.

इन में से काफी नौकरी के लिए तैयार से हैं और काफी नौकरी पाए हुए हैं. जिन के पास नौकरी है उन्हें पता नहीं कि यह नौकरी कब तक टिकेगी. जिन के पास नहीं है वे अपना पैसा या समय गलियों, खेतों में बेबात गुजारते हैं. इस देश में हर साल 1 से सवा करोड़ नए जवान लड़केलड़कियां पहले नौकरी ढूंढ़ते हैं. क्या इतनी नौकरियां हैं?

देश में बड़े कारखानों की हालत बुरी है. सरकार की सख्ती से बैंकों ने कर्ज देना बंद सा कर दिया है. कभी प्रदूषण के मामले को ले कर, कभी टैक्स के मामले को ले कर कभी सस्ते चीनी सामान के आने से भारतीय बड़े उद्योग न के बराबर चल रहे हैं, लगना तो दूर. अखबार हर रोज उद्योगों, बैंकों, व्यापारों के घाटे के समाचारों से भरे हैं.

छोटे उद्योगों, कारखानों और दुकानों में काफी नौकरियां निकलती हैं. देश के 6 करोड़ छोटे कामों में 14 करोड़ को रोजगार मिला हुआ है, पर इन में से 5 करोड़ लोग तो अपना रोजगार खुद करते हैं. ये खुद काम करने वाले हर तरह की आफत सहते हैं. इन के पास न तो काम करने की सही जगह होती है, न ही कोई नया काम करने का हुनर. इन 6 करोड़ छोटे काम देने वालों में 10 से ज्यादा लोगों को काम देने वाले सिर्फ 8 लाख यूनिट हैं.

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इन 14 करोड़ लोगों को जो काम मिला है वह बड़ी कृपा है पर उन के पास न नया हुनर है, न उन की कोई खास तमन्ना है. वे जेल व कैदियों का सा काम करते हैं. वे इतना न खुद कमा पाते है, न कमा कर मालिक को दे पाते हैं कि कुछ बचत हो, बरकत हो, काम बड़ा हो सके. 50 करोड़ लोग जहां नौकरी पाने के लिए खड़े हों वहां ये 6 करोड़ काम देने वाले क्या कर सकते हैं?

सरकारी नौकरियां देश में कुल 3-4 करोड़ हैं. इस का मतलब हर साल बस 30-40 लाख नए लोगों को काम मिल सकता है. आरक्षण इसी 30-40 लाख के लिए है और उसी को खत्म करने के लिए मंदिर का स्टंट रचा जा रहा है, ताकि लोगों का दिमाग, आंख, कान, मुंह बेरोजगारी से हटाया जा सके और जो नौकरियां हैं, वे भी ऊंचे लोग हड़प जाएं और चूं तक न हो.

दलितों को तो छोडि़ए वे बैकवर्ड जो भगवा गमछा पहने घूम रहे हैं, यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर कोई भी मंदिर उन की नौकरी को पक्का कैसे करेगा. उन्हें लगता है कि भगवान सब की सुनेगा. भगवान सुनता है, पर उन की जो भगवान की झूठी कहानी बनाते हैं, सुनाते हैं, बरगलाते हैं.

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गहरी पैठ

दिल्ली में तुगलकाबाद के एक मंदिर को ले कर जमा हुए दलितों के समाचारों को जिस तरह मीडिया ने अनदेखा किया और जिस तरह दलित नेता मायावती ने पहले इस आंदोलन का समर्थन किया और फिर हाथ खींच लिए, साफ करता है कि दलितों के हितों की बात करना आसान नहीं है. ऊंची जातियों ने पिछले 5-6 सालों में ही नहीं 20-25 सालों में काफी मेहनत कर के एक ऐसी सरकार बनाई है जिस का सपना वे कई सौ सालों से देखते रहे हैं और वे उसे आसानी से हाथ से निकलने देंगे, यह सोचना गलत होगा.

दलित नेताओं को खरीदना बहुत आसान है. भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, कम्यूनिस्ट पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल आदि में दलित हैं पर उन के पास न तो कोई पद है और न उन की चलती है. कांशीराम के कारण पंजाब और उत्तर प्रदेश में दलित समर्थक बहुजन समाज पार्टी ने अपनी जगह बनाई पर उस में जल्दी ही ऊंची जातियों की घुसपैठ इस तरह की हो गई कि वह आज ऊंची जातियों का हित देख रही है, दलितों का नहीं.

दलितों की समस्याएं तुगलकाबाद का मंदिर नहीं हैं. वे तो कदमकदम पर समस्याओं से घिरे हैं. उन पर हर रोज अत्याचार होते हैं. उन्हें पढ़नेलिखने पर भी सही जगह नहीं मिलती. ऊंची जातियां उन्हें हिकारत से देखती हैं. उन को जम कर लूटा जाता है. उन का उद्योगों, व्यापारों, कारखानों में सही इस्तेमाल नहीं होता. उन्हें पहले शराब का चसका दिया हुआ था अब धर्म का चसका भी दे दिया गया है. उन्हें भगवा कपड़े पहनने की इजाजत दे कर ऊंची जातियों के मंदिरों में सेवा का मौका दे दिया गया है पर फैसलों का नहीं.

हर समाज में कमजोर वर्ग होते ही हैं. गरीब और अमीर की खाई बनी रहती है. इस से कोई समाज नहीं बच पाया. कम्यूनिस्ट रूस भी नहीं. वहां भी कमजोर किसानों को बराबरी की जगह नहीं मिली. पार्टी और सरकार में उन लोगों ने कब्जा कर लिया था जिन के पुरखे जार राजाओं के यहां मौज उड़ाते थे. कम्यूनिज्म के नाम पर उन्हें बराबरी का ओहदा दे दिया गया पर बराबरी तो जेलों में ही मिली.

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आज भारत में संविधान के बावजूद धर्मजनित एक व्यवस्था बनी हुई है, कायम है और अब फलफूल रही है. दिल्ली का आंदोलन इसी का शिकार हुआ. इसे दबाना पुलिस के बाएं हाथ का काम रहा क्योंकि इस में हल्ला ज्यादा था. पुलिस ने पहले उन्हें खदेड़ा और फिर जैसा हर ऐसी जगह होता है, उन्हें हिंसा करने का मौका दे कर 100-200 को पकड़ लिया. उन के नेता को लंबे दिनों तक पकड़े रखा जाएगा. दलितों का यह आंदोलन ऐसे ही छिन्नभिन्न हो जाएगा जैसे 20-25 साल पहले महेंद्र सिंह टिकैत का किसान आंदोलन छिटक गया था.

जब तक ऊंचे ओहदों पर बैठे दलित आगे नहीं आएंगे और अपना अनुभव व अपनी ट्रेनिंग पूरे समाज के लिए इस्तेमाल न करेंगे, चाहे चुनाव हों या सड़कों का आंदोलन, वे सफल न हो पाएंगे. हां, दलितों को भी इंतजार करना होगा. फिलहाल ऊंची जातियों को जो अपनी सरकार मिली है वह सदियों बाद मिली है. दलितों को कुछ तो इंतजार करना होगा, कुछ तो मेहनत करनी होगी. कोई समाज बिना मेहनत रातोंरात ऊंचाइयों पर नहीं पहुंच सकता.

देशभर में पैसे की भारी तंगी होने लगी है. यह किसी और का नहीं, सरकार के नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार का कहना है. पिछले 70 सालों में ऐसी हालत कभी नहीं हुई जब व्यापारियों, उद्योगों, बैंकों के पास पैसा न हो. हालत यह है कि अब किसी को किसी पर भरोसा नहीं है. सरकार के नोटबंदी, जीएसटी और दिवालिया कानून के ताबड़तोड़ फैसलों से अब देश में कोई कहीं पैसा लगाने को तैयार ही नहीं है और देश बेहद मंदी में आ गया है.

राजीव कुमार ने यह पोल नहीं खोली कि पिछले 2-3 दशकों में जिस तरह पैसा धर्म के नाम पर खर्च किया गया है वह अब हिसाब मांग रहा है. पिछले 5-7 सालों में तो यह खर्च कई गुना बढ़ गया है क्योंकि पहले यह पैसा लोग खुद खर्च करते थे पर अब सरकार भी खर्च करती है.

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कश्मीर में ऐक्शन से पहले सरकार को अमरनाथ यात्रा पर गए लोगों को निकालना पड़ा. हजारों को लौटना पड़ा. पर ये लोग क्या देश को बनाने के लिए गए थे? देश तो खेतों, कारखानों, बाजारों से बनता है. जब आप किसानों को खेतों में मंदिरों को बनवाने को कहेंगे, कारखानों में पूजा करवाएंगे, बाजारों में रामनवमी और हनुमान चालीसा जुलूस निकलवाएंगे तो पैसा खर्च भी होगा, कमाई भी कम होगी ही.

जो समाज निकम्मेपन की पूजा करता है, जो समाज काम को निचले लोगों की जिम्मेदारी समझता है, जो समाज मुफ्तखोरी की पूजा करता है, वह चाहे जितने नारे लगा ले, जितनी बार चाहे ‘जय यह जय वह’ कर ले भूखों मरेगा ही. चीन में माओ ने यही किया था और बरसों पूरी कौम को भूखा मरने पर मजबूर किया था. जब चीन कम्यूनिज्म के पाखंड के दलदल से निकला तो ही चमका.

भारत का गरीब आज काम के लिए छटपटा रहा है. पहली बार उस ने सदियों में आंखें खोली हैं. उसे अक्षरज्ञान मिला है. उसे समझ आया है कि काम की कीमत केवल आधा पेट भरना नहीं, उस से कहीं ज्यादा है. धर्म के नाम पर उस का यह सपना तोड़ा जा रहा है और नतीजा यह है कि वह फिर लौट रहा है दरिद्री की ओर और साथ में पूरे बाजार को डुबा रहा है.

सरकार की कोई भी स्कीम काम करने का रास्ता नहीं बना रही है. सब रुकावटें डाल रही हैं. कश्मीर के नाम पर देश का अरबों रुपया हर रोज बरबाद हो रहा है. अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट दिनोंदिन खर्च कर रहा है. बड़ी मूर्तियां बनाई जा रही हैं. कारखाने न के बराबर लग रहे हैं. उलटे छंटनी हो रही है. पहले अमीरों के उद्योग गाडि़यों के कारखानों में छंटनी हुई अब बिसकुट बनाने वाले भी छंटनी कर रहे हैं. नीति आयोग के राजीव कुमार में इतनी हिम्मत कैसे आ गई कि उन्होंने सरकार की पोल खोल दी. अब उन की छुट्टी पक्की पर जो उन्होंने कहा वह तो हो ही रहा है. अमीरों के दिन तो खराब होंगे पर गरीब भुखमरी की ओर बढ़ चलें तो बड़ी बात न होगी.

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गहरी पैठ

उन की औरतों को नंगा किया जाता था, उन को देह व्यापार में धकेला जाता था, उन से गुलामों से बदतर काम कराया जाता था. मुसलमानों के साथ यह व्यवहार न मुसलमानों के राज में हो पाया था, न ब्रिटिश राज में. मुसलिम राजाओं के और ब्रिटिशों के जमाने में भी पिछड़े व दलित ही शिकार हो रहे थे.

1947 के बाद भक्तों की बन आई. शुरू में उन्होंने मंदिरों को बनवाया. हर छोटा मंदिर बड़ा बन गया है. दलितों और पिछड़ों को छोटे देवता, जो आमतौर पर बड़े देवताओं के दास, वाहक या किसी और तरह पैदा हुए बच्चे थे, पकड़ा दिए गए और उन से दुश्मनी कम हो गई. उन की जगह मुसलमानों में दुश्मन खोजा गया जो पाकिस्तान बनाने के लिए जिम्मेदार थे. भक्त यह भूल जाते हैं कि अगर भारत के टुकड़े नहीं हुए होते तो पूरे हिंदुस्तान की करीब 160-170 करोड़ जनता में 60 करोड़ मुसलमान होते. लेकिन भक्तों को सच की फिक्र कहां होती है. वे तो झूठों पर जिंदा रहते हैं.

बाबरी मसजिद की पूरी नौटंकी मुसलमानों को देश का दुश्मन बनाने के लिए रची गई और उस में दलितों और पिछड़ों ने भी आहुति दे डाली कि शायद इस से उन को ऊंचा स्थान मिल जाए. लेकिन न 1998 से 2004 तक और न 2014 से अब तक के भक्तों के राज में दलितों और पिछड़ों को राज में बराबर का हिस्सेदार बनाया जा रहा है. उन से दुश्मनी है पर उस पर परदा डाला हुआ है. छिपेतौर पर आरक्षण की जम कर खिंचाई होती है. दलितों को मारापीटा जाता है.

भक्तों को पुलवामा के बहाने कश्मीरी मुसलमानों से बदला लेने का मौका मिला क्योंकि उन्हें तो दुश्मन चाहिए. भक्ति का एक बड़ा सुबूत दुश्मनी ही है. राम हो, कृष्ण हो, शिव हो, इंद्र हो, विष्णु हो, दुर्गा हो, हमारे ज्यादातर भगवान दुश्मनों के सहारे बने हैं. दुश्मनी भक्ति की जड़ में है. भक्तों को कश्मीरी मुसलमानों से दुश्मनी दिखाने का मौका मिला और सारे देश से कश्मीरियों को चुनचुन कर भगाया गया. जब यह मामला ठंडा पड़ जाएगा तो कोई और दुश्मन ढूंढ़ना पड़ेगा. मैदानी इलाकों के मुसलमानों को आतंकवाद की वजह फिलहाल नहीं कहा जा सकता क्योंकि वे ऐसा कुछ नहीं कर रहे.

भक्तों को मीडिया में भी दुश्मन नजर आने लगे क्योंकि वह उन की भक्ति के अंधेपन की पोल खोल रहा था. भक्त दिमाग से इतने अंधे हैं कि उन्हें यह भी समझ नहीं आता कि मीडिया उन की आंखें खोलना चाहता है जबकि उन का इस्तेमाल कर रहे उन्हें अंधा बनाए रखना चाहते हैं.

दुश्मनी से बढ़ कर अंधभक्तों के लिए कोई बड़ा वरदान नहीं है. तभी आप ने देखा होगा कि जिन घरों में पूजापाठ ज्यादा होता है वहां कलह भी ज्यादा होती है. अंधे बनिए, लाठी को सहारा नहीं, ऐरेगैरे पर चलाने के लिए इस्तेमाल करिए. जय बोलो देवीदेवता की. चुनावों के बाद थोड़ी शांति है, पर भक्त जल्दी ही किसी दुश्मन को ढूंढ़ लेंगे, यह गारंटी है.

मोटरबाइकों, गाडि़यों और बसों की बिक्री एक पैमाना है जिस में पता चलता है कि देश की माली हालत कैसी सुधर रही है. पिछले 3 माहों में इन की बिक्री 12 फीसदी से कम हो गई है क्योंकि शहरी खरीद के साथसाथ गांवकसबों में भी खरीदी कम हो गई है. यह गिरावट 2008 के बाद सब से ज्यादा है. जो लोग सोच रहे थे कि रामनाम दुपट्टा पहनने और जय श्रीराम के नारों से उन को नई ऊंचाइयां मिलेंगी, वे थोड़े परेशान तो होंगे ही.

यह तब है जब दुनियाभर में तेल की बहुतायत की वजह से पैट्रोलडीजल के दाम हाल के बजट के टैक्स से पहले बढ़ नहीं रहे थे. जब देश में न सड़कों की कमी हो, न वाहन बनाने वालों की, न लोहे की तो वाहन क्यों कम बिक रहे हैं? जवाब है कि लोगों को कामधाम से हटा कर बेमतलब के गुणगान में लगाया जा रहा है.

मेहनत करना एक सामाजिक आदत है. कुछ समाज हैं जहां 10-12 घंटे काम करना आम समझा जाता है. कहीं 2-3 घंटे के काम पहाड़ तोड़ना समझा जाता है. हमारे यहां पहले चौराहों पर चाय पीते या तंबाकू फांकने बकबक करने को काम करना समझा जाता था. बीच के सालों में यह कुछ बदला था और युवा लोग नारे लगाने की जगह नौकरियों की खोज में लगने लगे थे, बल्कि उलटा हो रहा था. रोजगार देने वालों को लोग नहीं मिल रहे थे. हर वर्कर अकड़ रहा था.

अब फिर इस पुराने ढर्रे पर आ गए हैं जहां सड़क पर जमा हो कर जय श्रीराम का नारा लगाना और लगवाना बड़ा काम हो गया है. गौरक्षकों की एक बड़ी जमात पैदा कर दी गई है जो काम नहीं करती, बल्कि दूध, चमड़े का व्यापार करने वालों के आड़े आ रही है. मंदिरों में पूजापाठ जोरशोर से होने लगा है.

ऐसे में वाहन खरीदने लायक कमाई कैसे होगी? किसी भी युवा से पूछ लें, वह ऐसा काम चाहता है जिस में उसे हाथ न हिलाने पड़ें. बदन से काम करना न पड़े. वैसे भी अब जाति का सवाल बड़ा हो गया है इसलिए छोटे काम को करना एक बार फिर अपनी जाति का अपमान माना जाने लगा है. एक समय ब्राह्मणों ने कारखानों में मशीनों पर खूब काम करना शुरू किया था जिस का फायदा पूरे देश को हुआ था. आज तो दलित व पिछड़ा भी पंडागीरी चाहता है ताकि उस की जाति का नहीं तो उस के परिवार का उद्धार तो हो जाए.

वाहनों की ही नहीं और बहुत सी चीजों की बिक्री सरकारी फैसलों की वजह से कमजोर हो रही है. जब देश में बेरोजगार बढ़ रहे हों, तो यह खतरनाक है. एक ऐसा लावा पैदा हो रहा है जो ज्वालामुखी की तरह फूटेगा और तहसनहस कर डालेगा.

न करें सेना का इस्तेमाल

लड़ाई की लाठियां बजाना आसान है पर देशों के लिए लड़ाई उतनी ही महंगी होती है जितनी 2 किसानों के लिए जो खेत की हदबंदी पर झगड़ रहे हों. भारतीय सेना पर देश को भरोसा है पर यह भरोसा तभी तक कायम रह सकता है जब तक देश सेना को खासा पैसा देता रहे. खाली पेटों से लड़ाइयां नहीं लड़ी जातीं. देश की जातिप्रथा का छिपा मतलब हमेशा यही रहा है कि पिछड़ों व दलितों को हमेशा खाली हाथ रखो ताकि वे कभी भी पंडों, बनियों, राजपूतों के खिलाफ न खड़े हो सकें.

भारत पाकिस्तान दोनों की सेनाओं के साथ यही हाल है. पाकिस्तान के पास भारत से कम पैसा है पर उसे लगातार अमेरिका, सऊदी अरब, चीन से पैसा मिलता आया है. भारत के नेताओं की अकड़ कुछ ज्यादा रही है और इसलिए सैनिक सहायता हमेशा न के बराबर मिली है. सेना के लिए देश को पेट काट कर सामान खरीदना पड़ा है और अगर राफेल हवाई जहाज यूपीए सरकार ने पहले नहीं खरीदे और मोदी सरकार ने भी आखिर में फैसला किया तो इसलिए कि पैसा दिख नहीं रहा था.

सेना की अपनी जानकारी के हिसाब से पिछले 1 साल में वायु सेना ने अरबों रुपए की लागत के 16 हवाईजहाज दुर्घटनाओं में तकनीकी खराबियों की वजह से खो दिए. इन में 2 मिग बाइसन, 2 जगुआर, 2 मिग 27, मिराज हैलीकौप्टर, 2 हौक, कई ट्रांसपोर्ट हवाईजहाज शामिल हैं. इतने हवाईजहाजों का गिरना और उन में सैनिकों का बिना युद्ध के मरना एक खतरे की घंटी है. मिगों को तो उड़ते ताबूत कहा जाने लगा है. ये रूसी विमान बनावट में ही कमजोर हैं पर चूंकि दूसरे देशों से अच्छे मिल ही नहीं रहे, इन्हें खरीदना पड़ रहा है.

भारत पुराने हवाई जहाज कैरियर व पनडुब्बियां ही खरीद पा रहा है. अब पुराने मिग 29 खरीदने की बात चल रही है. सैनिकों की राइफलें पुरानी हैं. अभी अमेठी में राइफल कारखाने का उद्घाटन करते हुए नरेंद्र मोदी ने यह बात मानी है. सैनिकों के वेतनों व पैंशनों का मामला अटका रहता है. उन्हें अच्छा खाना नहीं मिल पाता. छावनियों की शक्लों को देखें तो पता लग जाएगा कि ज्यादातर बिल्डिंगें अंगरेजों के जमाने की हैं.

एक गरीब देश के लिए सेना पर खर्चा करना आसान नहीं है. उत्तर कोरिया ने इसी वजह से अमेरिका से समझौता किया. जर्मनी और जापान ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जम कर विकास किया क्योंकि सेना पर खर्च नहीं किया. हमारे यहां सोशल मीडिया पर हल्ला मचाया जा रहा है मार दो, जला दो, खात्मा कर दो, बिना यह सोचे कि इस की कीमत क्या है. मोदी कहते हैं घर में घुसघुस कर मारेंगे, पर किसलिए और किस कीमत पर.

हम देश में गाय को बचाने पर ज्यादा खर्च करने लगे हैं, मंदिरों, कुंभों, आश्रमों, पूजाओं पर भयंकर खर्च कर रहे हैं पर सेना के लिए जेब खाली है. अगर जेब में पैसे नहीं, जो पाकिस्तान के पास भी नहीं, तो लोगों का खयाल रखें. उन्हें लड़ाई के लिए न उकसा कर काम के लिए तैयार करें. सरकार अपनी फाइलों की सुरक्षा करे, धर्म की सुरक्षा के नाम पर सेना का इस्तेमाल करना बंद कर दे तो ठीक रहे.

उत्तर प्रदेश, बिहार और लोकसभा चुनाव साल 2019 के आम चुनाव बिहार व उत्तर प्रदेश के लिए काफी अहमियत रखते हैं. देश के सब से ज्यादा गरीब यहीं बसते हैं और गंगा नदी के बावजूद सदियों से उन की बीमारी, गरीबी, भूख, टूटे मकानों में कोई फर्क नहीं आया है. पगपग पर बिखरे मंदिरों के बावजूद यहां के लोगों की फटेहाल हालत दूर से दिख जाती है.

अगर रेल से सफर कर रहे हों तो गांव के बाद गांव और शहर के बाद शहर कूड़े के बीच बेतरतीब मकान दिखेंगे और उन के बीच आदमी जानवरों की तरह रहते दिखेंगे. ये राज्य वही हैं जहां से मुगलों ने 250 साल राज किया. इन्हीं 2 राज्यों का गुणगान हर शास्त्र में है पर इन की गरीबी यहां से आने वाले प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, राष्ट्रपतियों के होते दूर नहीं हुई. वजह साफ है. ये दोनों राज्य गलत नेताओं को चुनते रहे हैं और जब भी उन्होंने सही नेता चुन लिया तो वह बिगड़ते देर नहीं लगाता.

यह बिगड़ना भ्रष्टाचार नहीं है. भ्रष्टाचार से तो थोड़ा सा नुकसान होता है, कुछ सौ करोड़ों का. असल नुकसान उस निकम्मेपन से होता है जो यहां के नेता अपने लोगों पर थोपते हैं. चुनाव में जो भी जीते उस से यही उम्मीद की जाती है कि वह नौकरी लगवा दे, ठेका दिलवा दे. इस के लिए उस की पूजा की जाती है, जैसे गंगा जमुना मैयाओं की की जाती है. मेहनत करना न नेता जानते हैं, न बताना चाहते हैं. घोर ब्राह्मणवादी सोच इतनी गहरी है कि चाहे समाजवादी लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल हो या अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी या फिर मायावती की बहुजन समाज पार्टी, सब को मंदिरों और पूजा की लगी रहती है.

नरेंद्र मोदी ने गुजरात छोड़ कर यों ही बनारस को चुनाव लड़ने के लिए नहीं अपनाया है. यहीं तो बिहार व उत्तर प्रदेश का दिल है जो आज भी पुरानी सोच, जातिवाद, पाखंड का जहरीला खून दोनों राज्यों में बहाता है. न भाजपा, न कांग्रेस इस सोच या इस तरह की राजनीति को बदलने की बात भी कर रही हैं जो यहां के लोगों को बदबूदार दलदल से निकालने की हो. उलटे भाजपा तो फिर अयोध्या में राम मंदिर का मामला उठा कर दलदल में धकेलने की बात कर रही है.

इन दोनों राज्यों ने पिछले 20-25 सालों में कई तरह की सरकारें देखी हैं पर सब का रवैया एक ही सा है. इन्हीं दोनों राज्यों के लोग दुनियाभर में जा कर नाम और पैसा कमाते हैं पर यहां अपने देश, अपने राज्य में नेताओं की सड़ी सोच की वजह से सड़ी जिंदगी जीने को मजबूर हैं. ये नेता लखनऊ और पटना में ही नहीं हैं, हर गांव में हैं. एक और चुनाव इन दोनों राज्यों की हालत नहीं बदलेगा. अगर यही लोग रहे तो पक्का है कि तीर्थों का उद्धार होगा, जनता को पाताल में ही जगह मिलेगी.

जनता का समय

23 मई को जनता का फैसला सुनाए जाने तक कम से कम सरकारी विज्ञापनों के खोखले वादों से तो छुटकारा मिलेगा. चुनाव आयोग की आदर्श आचार संहिता लागू होने के पहले के सप्ताहों में सरकार ने जिस तरह विज्ञापनबाजी की है वह अभूतपूर्व है. उस ने समाचारपत्रों में एक एक दिन में 10-10, 12-12 पृष्ठों के विज्ञापन छपवा कर जनता पर मानसिक प्रहार किया है. विरोधी दलों के पास तो सरकारी खजाना नहीं था,  सो, वे बेचारे मन मसोस कर रह गए.

अब 60 दिनों तक जो सरकारी शांति रहेगी, वह जनता को मौका देगी कि वह, क्या सही था क्या गलत था, का फैसला कर सके. 2014 में हिंदूवादी लहर बनाने के साथ ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’, ‘15 लाख रुपए खाते में आएंगे’, ‘भ्रष्टाचारमुक्त भारत बनाएंगे’, ‘सब का साथ सब का विकास’ आदि नारों और नरेंद्र मोदी के नए तरीके के धुआंधारी भाषणों के बल पर जीत कर आई भारतीय जनता पार्टी से जनता को उम्मीदें थीं. भाजपा के कट्टर हिंदू तेवरों से जो डरे थे वे भी एक नए तरह के बेहतर शासन की उम्मीद कर रहे थे.

चुनाव आयोग के मौडल कोड औफ कंडक्ट लागू होने के बाद के ये 60 दिन तय करेंगे कि 2019 में अब जनता का फैसला क्या है? जनता हमेशा सही होती है, यह जरूरी नहीं. जनता ने खुशी खुशी से हमारे ही देश में भी और कई दूसरे देशों में भी बेईमानों, झूठों, विघटनकारियों को चुना है. कितने ही परिपक्व लोकतंत्र गलत नेताओं के हाथों में सौंपे जा चुके हैं. कितने ही देशों में जनता ने तानाशाहों को खुशी खुशी वोट दिया है. जनता ने धार्मिक, देशप्रेम, बराबरी के नारों में उलझ कर गलत सरकारें बनाई हैं.

भारत का लोकतंत्र कोई अलग नहीं है. यहां का मतदाता जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण, पैसे, रिश्वत के आधार पर वोट देता है. ज्यादातर मामलों में उसे मालूम ही नहीं है कि सही क्या है, गलत क्या है. जनता की राय सही हो, यह कोई गारंटी नहीं है. वहीं, इस के अलावा कोई और उपाय भी नहीं है सरकारें बनाने का. राजाओं के दिन लद गए हैं और सभी लड़ाकू राजा अच्छे प्रबंधक साबित नहीं होते.

अच्छे वक्ता अच्छे शासक नहीं होते. अच्छे शासक पूरी बात साफ शब्दों में कह सकें, जरूरी नहीं. जनता को तो उसी आधार पर वोट देना होगा जो वह सुनेगी, देखेगी या महसूस करेगी. ये 60 दिन जनता के लिए मनन करने के हैं. पर जनता में सही फैसला लेने की क्षमता हो, यह जरूरी नहीं.

भाजपाई तीर…

भारतीय जनता पार्टी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन होने के बाद भी उन पार्टियों पर ऐसे तीर नहीं छोड़ रही जैसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर छोड़ रही है. जिन्हें जातिवादी और विभाजक कह कह कर गालियां दी जाती थीं उन पर भाजपा की ट्रौल फौज चुप है और रातदिन केवल राहुल गांधी और सोनिया गांधी का मखौल उड़ाने की कोशिशें हो रही हैं. हालांकि, ये कोशिशें अब अपने खिसकते समर्थकों को बचाने के लिए हैं, दूसरों को भाजपा में लाने के लिए नहीं.

मायावती और अखिलेश का प्रभाव केवल उत्तर प्रदेश में है. दलित होने के कारण दूसरे राज्यों में मायावती इक्कादुक्का विधायकों या कौर्पोरेशनों में 5-7 पार्षदों को ही जिता पाती हैं. देशभर के दलितों में वे गहरी पैठ नहीं बना पाईं. दूसरे राज्यों में दलित या तो राज्य तक सीमित रहने वाली पार्टी को वोट देते हैं या फिर कांग्रेस से जुड़े हैं.

उत्तर प्रदेश में दम ठोकने वाली समाजवादी पार्टी का भी यही हाल है. मुलायम सिंह ने कभी इसे उत्तर प्रदेश से बाहर नहीं फैलाया और उन का समर्थन कई राज्यों में कांग्रेस के साथ है, तो कई राज्यों में किसी स्थानीय पार्टी के साथ.

उत्तर प्रदेश अकेला राज्य है जहां दलितों व पिछड़ों की पार्टियां हैं और दोनों ने कईकई बार राज भी किया है. प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में या उस के करीब भी आए अरसा हो चुका है.

मायावती और अखिलेश यादव के खिलाफ सोशल मीडियाई मोर्चा न खोलना भाजपा के लिए संकट पैदा करेगा क्योंकि 80 सीटों पर मुख्य मुकाबला तो उन्हीं के गठबंधन से है. चुनावी नतीजों के बाद उन्हीं से मिलना न पड़े, इस के लिए उन पर हमला न किया जाए, चुनावी जंग में यह भी संभव नहीं है.

यह देश ऐसा है जहां वक्त पर गधे को बाप बनाना बुद्धिमानी मानी जाती है और जहां पौराणिक गाथाओं में दुश्मनों को पटाना या वक्त पर जी हुजूरी करना धर्मयुत है. अमृतमंथन में भी यही हुआ था जिस में विष्णु के 2 अवतार बने थे- कश्यप व मोहिनी. तीसरे अवतार शिव ने जहर पिया था. अब जहां अवतारों ने पहले दस्युओं के साथ काम करने पर और बाद में उन्हें धोखा देने पर मुहर लगा दी हो, वहां उन को हजारों साल बाद पूजने वाले कैसे गलत हो सकते हैं?

सत्ता के अमृतमंथन में कब, किस की जरूरत पड़ जाए, यह नहीं कहा जा सकता. इसलिए मायावती और अखिलेश यादव फिलहाल भाजपा की ट्रौल आर्मी की गोलियों से बचे हैं. आने वाले दिनों में पता चलेगा कि मोहिनी अवतार बन कर अमृत का घड़ा धोखे से छीन कर कैसे देवताओं के हाथों में आता है. पुराणों में ब्लूप्रिंट तैयार है.

बेरोजगारी बेलगाम?

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे औफिस आजकल विवादों के तूफान में घिरा है क्योंकि उस की रिपोर्ट, जिसे मोदी सरकार जारी करने से कतरा रही है, कहती है कि युवाओं में 2011-12 के मुकाबले 2017-18 तक बेरोजगारी में 3 गुना वृद्धि हो गई है. करोड़ों नौकरियां पैदा कर के देश में सब का विकास करने का वादा कर के जीती भाजपा के लिए ये आंकड़े शर्मिंदगी पैदा करने वाले हैं, इसलिए वह इन्हें जारी करने में हिचकिचा रही है. सर्वे औफिस कहता है कि ये आंकड़े सरकार की अनुमति के बिना जारी किए जा सकते हैं.

देश में युवाओं में बेकारी तेजी से बढ़ रही है. गांवों में युवाओं की तादाद बहुत ज्यादा है. वे थोड़ाबहुत पढ़ कर बेरोजगार बने हुए हैं. वे सब सरकारी नौकरी चाहते हैं क्योंकि उन्होंने और उन के मातापिताओं ने देखा है कि पढ़लिख कर सरकारी बाबू बन कर लोग दिनभर मौज उड़ाते हैं और शाम को रिश्वत का पैसा घर लाते हैं. गांवों के आज के युवा न खेतों में काम करना चाहते हैं न कारखानों में.

खेतों और कारखानों में काम भी अब कम हो गया है. पहले नोटबंदी ने मारा, फिर जीएसटी ने. ऊपर से चाइनीज सामान बाजार में छा गया, क्योंकि उस के लिए विदेशी मुद्रा विदेशों में काम कर रहे भारतीय मजदूर अपने डौलर व दिरहम हवाईजहाज भरभर कर भेज रहे हैं. नई तकनीकों की वजह से खेतों और कारखानों में नौकरियां कम होने लगी हैं.

रिपोर्ट कहती है कि बेकारी का आंकड़ा जो अब है वह 45 सालों में सब से ज्यादा है. रेलवे क्लर्कों या पटवारियों की कुछ ही नौकरियों के लिए लाखों आवेदन मिलते हैं. सरकार के लिए तो आवेदन सिर्फ कागज भर होता है पर जिस ने आवेदन किया होता है वह रातदिन इसी का सपना देखता रहता है और उस का किसी और काम में मन नहीं लगता. वह परिवार व देश पर बोझ होता है और सरकार के लिए मात्र एक गिनती.

देश में बढ़ते अपराधों, गौरक्षकों, मंदिरों में पूजापाठ के पीछे यही बेकारी है. बैठे ठाले युवा कहीं से भी पैसा जुटाना चाहते हैं और वे कुछ भी कर लेते हैं. शिक्षा ने उन्हें थोड़ा समझदार बना दिया है, लेकिन इतना नहीं कि वे खुद अपने बल पर कारखाने खड़े कर सकें.

सरकार सफाई दे रही है कि नौकरियां हैं पर कम पैसे वाली हैं. यह बड़ी लचर दलील है. नौकरी वह होती है जो संतोष दे, घर चलाने के लायक हो और नौकरी पाने के बाद युवा किसी और सपने की आरे न भटके. सरकार इन युवाओं को नौकरी नहीं दे सकती क्योंकि उस ने तो मान लिया है कि नौकरी भाग्य से मिलती है, पूजापाठ से मिलती है, हिंदू धर्म की रक्षा से मिलती है, गांधी परिवार को दोष देने से मिलती है. अमित शाह और नरेंद्र मोदी के बयानों को सुन लें, तो कहीं काम की कहानी नहीं मिलेगी, सिर्फ मंदिर, कुंभ, नर्मदा यात्रा, संतोंमहंतों की बातें मिलेंगी.

चुनाव से एकदम पहले आए आंकड़े विपक्षियों के लिए सुखद हैं पर बेकारी की समस्या का हल उन के पास भी नहीं है.

सोशल मीडिया और झूठ

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप ने झूठ का प्रचार करने में धर्मों को भी मात दे दी है. हर धर्म को अपने झूठ को ही अंतिम सत्य साबित करने में 100-200 या इस से भी ज्यादा साल लगे हैं, पर इन हाईटैक कंपनियों ने झूठ को सच मानने की आदत कुछ सालों में ही डलवा दी.

धर्मों की खबर फैलाने में लंबा समय लगता था. जिस ने झूठ गढ़ा उसे अपने आसपास के 10-20 लोगों को झूठ दूत बना कर दूसरी जगह भेजना पड़ता था, जिस में महीनों लगते थे. लेकिन आज के टैक प्लेटफौर्मों पर झूठ तैयार करो, और घंटों में दुनिया के कोनेकोने में पहुंचा दो. अगर वहां झूठ को सच मानने वाले मिले तो वह वायरल हो कर कुछ ही दिनों में सदासदा के लिए सच बन जाता है.

फर्क यह रहा है कि धार्मिक झूठ ने पक्की जमीन ली थी. उसे जिस ने माना अंतिम सत्य मान लिया और उसे झूठ कहने वाले का सिर काट दिया या अपना कटवा लिया. पर झूठ को झूठ नहीं माना. लेकिन हाईटैक झूठ की पोल तेजी से खुलने लगी और अब फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप के लिए खतरे की घंटी बज रही है कि उन पर भरोसा किया जाए या नहीं.

अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया का जम कर फायदा उठाया क्योंकि वहां के गोरों को डर था कि काले, भूरे, सांवले, पीले लोग उन के देश पर कब्जा न कर लें. भारत में 2014 में विकास और अच्छे दिनों के पीछे दलितों, पिछड़ों की बढ़ती तादाद और ताकत डरा रही थी. दोनों जगह चुनावों में इस स्पैशल मीडिया पर जम कर झूठ फेंका गया. अब टैक कंपनियां थोड़ी सावधान हुई हैं. फेसबुक ने अब संदेश पढ़ने शुरू कर दिए हैं और उस ने उन के अकाउंट बंद करने भी शुरू कर दिए हैं जो भ्रामक झूठ या घृणा फैलाने में माहिर हैं. मतलब यह है कि अब फेसबुक की चिट्ठी डाकिया पढ़ने लगा है और यदि उसे लगे कि उस में गलत बातें हैं तो वह चिट्ठी दबा सकता है और भेजने वाले या पाने वाले को बैन कर सकता है.

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप और गूगल अब सरकारों से ज्यादा ताकतवर हो गए हैं. वे पार्टियों के ऊपर हैं. वे जनता के अकेले मार्गदर्शक हैं जबकि उन्हें जनता के भले की नहीं, अपने पैसों की चिंता है. वे पैसा मिले तो हर झूठ को फैला देंगे, न मिले तो सच को झूठों के अंबार के नीचे दबा देंगे.

लोग इस की भारी कीमत चुकाने लगे हैं. आज अज्ञान और गलत ज्ञान जम कर फैल रहा है जबकि विज्ञान पिछड़ रहा है. नतीजा यह है कि लोग चुटकुलों से जीवन जीना सीख रहे हैं, पोर्न से साथी बना रहे हैं, मोबाइल के कैमरे से खींची अंतरंग तसवीरों को इन टैक प्लेटफौर्मों से फैलाने की धमकियां दे कर अपनी बात मनवा रहे हैं. इन का असर गलत सरकार चुनने से ले कर घर, परिवार और संबंधों में गलतफहमी पैदा करने तक पर पड़ रहा है.

मजबूत देश बनाएं

यदि अमेरिका चाहता तो उत्तरी कोरिया द्वारा पहले परमाणु बम बनाने पर ही उस पर हमला कर देता पर एक के बाद एक राष्ट्रपतियों ने उत्तरी कोरिया पर केवल आर्थिक प्रतिबंध लगाए. इस बार अमेरिका के खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कोरिया के नेता किम जोंग उन को सिंगापुर के होटल में फेसटूफेस मीटिंग के लिए आने पर मजबूर किया.

इसी तरह कश्मीर समस्या का हल आर्थिक है, सैनिक नहीं. जो लोग गुर्रा रहे हैं कि मार दो, चीर दो, हमला कर दो, युद्ध कर दो वे इतिहास, वास्तविकता और व्यावहारिकता से परे हैं. देश ने हत्या करने वालों की फौज खड़ी कर ली है जिन्होंने 2014 में कांग्रेस को पप्पू की पार्टी साबित कर के भाषणचतुर नरेंद्र मोदी को जितवा दिया था. यह फौज सोचती है कि ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सऐप के जरिए वह पाकिस्तान को डरा देगी. वह यह भी सोचती है कि जैसे तार्किक, समझदार लोगों को अरबन नक्सलाइट कह कर उन का मुंह बंद कर दिया वैसे ही सभी कश्मीरियों को गौहत्यारों जैसा अपराधी बना देगी.

कश्मीर को और पाकिस्तान को कड़ी मेहनत व आर्थिक विकास से जीता जा सकता है. आज पाकिस्तान और भारत के कट्टर एकजैसा व्यवहार कर रहे हैं और दोनों ही तरफ ऐसे लोग भी सत्ता में हैं जिन के लिए आर्थिक विकास नहीं, धमकीभरे बयान सही हैं.

1920 और 1940 के बीच जरमनी ने हार के बावजूद सैकड़ों हवाई जहाज, हजारों टैंक, लाखों बंदूकें बना ली थीं क्योंकि उस के उद्यमियों ने रातदिन मेहनत कर के एक मजबूत आर्थिक देश को जन्म दिया था. हिटलर बकबक करता रह जाता अगर उस के पास वे जहाज, वे लड़ाकू विमान, वे फौजी सामान नहीं होते जिन से उस ने चारों ओर एकसाथ फैलना शुरू कर दिया था.

कई देश, जिन में इंग्लैंड तक शामिल था, हिटलर के जरमनी की आर्थिक शक्ति से डरे हुए थे. उस इंग्लैंड ने चेकोस्लोवाकिया को हिटलर को भेंट में दे डाला था जिस का साम्राज्य दुनियाभर में था.

आज भारत के पास ऐसा कुछ नहीं है कि वह सिर उठा कर पाकिस्तान से या पाकिस्तान से हमदर्दी रखने वाले थोड़े से कश्मीरियों से कह सके कि भारत उन्हें सुख, समृद्धि व सुरक्षा सब देगा. मुख्य भारत अपनेआप में कराह रहा है. कश्मीरियों के साथ भेदभाव तो छोडि़ए, हम तो अपने उस वर्ग को भी जो

85 फीसदी है, खुश नहीं रख पा रहे. हमारे किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, युवा बेरोजगारी से त्रस्त हैं.

पाकिस्तान को करारा जवाब देना है तो भारत को आर्थिक महाशक्ति बनना होगा, केवल ज्यादा जनसंख्या के बल पर नहीं, प्रतिव्यक्ति ज्यादा उत्पादन के बल पर. सेना भी तभी मजबूत होगी जब उस के लायक भरपूर पैसा होगा. आज हम विदेशों द्वारा कबाड़ में पड़े हवाई जहाज, एयरक्राफ्ट कैरियर, सबमैरीन खरीद रहे हैं, अपने नहीं बना पा रहे. यह ट्विटर वाली फौज लोहे को पीट कर टैंक बनाना नहीं जानती.

आज इस तरह का माहौल बना दिया गया है कि जो थोथे नारे न लगाए उसे देशद्रोही मानना शुरू कर दिया जाता है. व्यावहारिक बात करने वाले को लिबटार्ड कह कर गाली दी जाती है, उस के खिलाफ बेमतलब की एफआईआर दर्ज करा दी जाती है ताकि वह जेलों या अदालतों में सड़े.

पुलवामा का बदला मजबूत देश बना कर लेना होगा, एक मजबूर सरकार को युद्ध में बलि चढ़ाने से नहीं. गरीब देश के गरीब सैनिक कितना लड़ सकते हैं. उन्हें आर्थिक व तकनीकी ताकत दो.

बिल्डर ही बदनाम क्यों

अपना घर चाहे सिर्फ 500 फुट का हो, हर साल, सालदरसाल सपना बनता जा रहा है. देशभर में बनते मकानों को देख कर गृहिणियां सोचती हैं कि किसी दिन उन का भी अपना एक मकान होगा पर लगता है कि यह सपना उसी तरह का वादा है जैसे पंडितजी कहते हैं कि 21 बृहस्पतिबार को व्रत रखो, अच्छा पति अपनेआप मिल जाएगा.

जिद्दी सरकार, लालची बैंक, अस्थिर बाजार, बेईमान बिल्डर, ढुलमुल ग्राहक और अदालतों में देरी के कारण जो नुकसान हो रहा है वह औरतों के सपनों का है. जिन्होंने येन केन प्रकारेण मकान हथिया लिए वे तो खुश हैं पर बाकी मनमसोस रहे हैं. लाखों लोगों ने तो अपनी जमापूंजी भी लगा रखी है और महीनों बैंक को कर्ज व मूल भी देते हैं पर उन्हें मकान नहीं मिला है. देश के 11,000 बिल्डरों पर किए गए एक सर्वे से पता चला है कि 7,77,183 करोड़ रुपए के अधूरे मकान पड़े हैं जो कहीं पैसे की वजह से, कहीं बिल्डरों का दिवाला निकलने के, तो कहीं सरकारी नियमों के कारण पूरे बन कर बिक नहीं सके हैं.

इन बिल्डरों ने बैंकों के 4 लाख करोड़ रुपए देने हैं और इतने ही ग्राहकों के भी दबा कर बैठे हैं. दिल्ली के पास आम्रपाली गु्रप के हजारों मकान सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डरों से ले कर नैशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कौरपोरेशन को दे दिए हैं पर इस सरकारी कंपनी का अपना रिकौर्ड खराब है. इस में भयंकर नुकसान और भ्रष्टाचार होता है. इस के ग्राहकों को अपना पैसा या मकान मिलेगा, यह भूल जाएं.

जो लोग पहले छोटे मकानों में रह कर पैसा बचा कर अपना बड़ा और अच्छा मकान बनाने की सोचते थे उन्होंने पैसा खर्चना शुरू कर दिया है और मकानों की मांग कम हो गई है. मुंबई में मकानों के दाम सालभर में 7% तक गिर गए हैं.

अपना मकान होना सपना ही नहीं, घर को सुरक्षा भी देता है. यह शान की नहीं, काम की बात है. बच्चों को अपने मकान में परमानैंट दोस्त मिलते हैं, कल को शादी करने में लाभ रहता है. अपने मकान पर पढ़ाई के लिए लोन मिल जाता है, किराए के मकान पर नहीं. अपना मकान दिलवाना सरकार का काम तो नहीं पर रोक तो न लगाए. अगर बिल्डर कुछ बेईमानी करते हैं, नियमों की अवहेलना कर के ज्यादा बना लेते हैं तो क्या हरज है? देश में नियमों से कौन चल रहा है? न सुप्रीम कोर्ट, न सीबीआई, न प्रधानमंत्री का कार्यालय, न राष्ट्रपति भवन. कोई भी ढंग का है? तो फिर बिल्डर ही क्यों बदनाम हों? जबकि उन का असर हर औरत, हर घर, हर बच्चे पर पड़ता है.

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