श्रेया इस बेमेल ब्याह से खुश नहीं थी, इसीलिए वह मेरे ब्याह में भी नहीं आई थी. केवल टैलीफोन पर बात होती थी.श्रेया ने कहा, ‘‘जो हुआ उसे मैं बदल नहीं सकती हूं. रिश्ते में तो आप मेरी चाची लगती हैं, मेरी मां जैसी, लेकिन हम दोस्त बन कर रहेंगी. दोस्त के साथ बहन की तरह,’’ इतना हौसला दे कर श्रेया चली गई.मेरे पति ने मुझे मोबाइल फोन दिलवा दिया था.
उन के मन में डर था कि मैं कहीं भाग न जाऊं. बुढ़ापे की शादी में आमतौर पर असंतुष्ट हो कर लड़कियां भाग जाती हैं. वे हमेशा मेरे टच में रहना चाहते थे. मेरी शादी को मुश्किल से 15 दिन हुए थे कि मुझे उलटी आई. अगले 15 दिन भी यही हालत रही. मेरी सासू मां ने अंदाजा लगा लिया कि उन के घर में पोता आने वाला है. पोती क्यों नहीं आ सकती? बस, इसी सवाल का जवाब नहीं मिलता है.
किसी ने मुझे डाक्टर के पास ले जाना जरूरी नहीं समझा. मैं इस हालत में भी मैं पूरे घर का काम करती रही, बिना किसी की हमदर्दी के. पति भी मेरे शरीर को नोचते और सो जाते. उन्हें अपनी संतुष्टि से मतलब था. केवल श्रेया सब से छिपा कर कभी चौकलेट, कभी कुल्फी, कभी कोल्ड ड्रिंक, तो कभी फल ला कर देती. वह कहती,
‘‘समय पर खाना खाया करो. जल्दी सोया करो. कुछ खाने का मन करे तो चाचाजी को बोल दिया करो. मैं दे जाया करूंगी.’’मैं रात को जल्दी सोने लगी.
पति रात को आते और सो जाते. 3 दिन तक यही चला रहा. तीसरे दिन वे उखड़ेउखड़े लगे. वजह मुझे पता नहीं चली. रात को पति ने कंधा पकड़ कर खड़ा किया. मैं हड़बड़ा कर उठ गई. उन्होंने कहा, ‘‘3 दिन से मैं तुम्हारा नाटक देख रहा हूं. तुम रोज जल्दी सो जाती हो. यह सब मुझे बरदाश्त नहीं है. हमारे यहां सभी रात के 10 बजे सोते हैं.’’मैं पति का यह रूप देख कर डर गई.
मैं रोते हुए बोली, ‘‘मुझे दिन में बहुत थकान महसूस होती है. सिरदर्द होता है. मैं सारे घर का काम कर के खुद खाना खा कर सोती हूं.’’पति ने कहा, ‘‘वह मैं कुछ नहीं जानता. कल से 10 बजे के बाद सोना.’’मैं समझ ही नहीं पाई कि यह कैसा पति है, जो अपनी पत्नी की तकलीफ को समझ ही नहीं पा रहा है. मेरे पास सहने के अलावा कोई चारा नहीं था.
मैं 10 बजे के बाद सोने लगी. मैं दिन में सो कर अपनी नींद पूरी कर लेती. इस हालत में मेरा अलगअलग चीजें खाने का दिल करता. कभी वे ला देते, कभी कहते कि पैसे नहीं हैं. इन चीजों में पैसे लगते हैं, फ्री में कुछ नहीं मिलता है.कभीकभार जब ननद अपनी ससुराल जाती तो पति मेरे लिए पानीपुरी, रसगुल्ले, मिर्ची बड़ा, फल वगैरह ला देते थे. पर ननद को पता चलता तो भी मुझे, कभी मेरे पति को डांटती रहती, ‘‘इतना सब खर्च करने की क्या जरूरत थी? खाएगी तो उलटी कर देगी.
पैसे बचाओगे तो काम आएंगे.’’मेरा मन गुस्से से भर जाता. मैं किचन में काम कर रही होती. मन होता कि हाथ की कड़छी ननद के सिर पर दे मारूं.धीरेधीरे मेरी डिलीवरी का समय नजदीक आने लगा. मुझे इस हालत में खाना खाने को नहीं मिलता था. एक दिन मुझे भयंकर दर्द हुआ. मेरे पति स्कूटर पर अस्पताल ले कर गए. इतना भी नहीं हुआ कि वे मुझे आटोरिकशा में ले जाते.डाक्टर को पता चला तो उन्होंने पति को जबरदस्त डांट लगाई,
‘‘इतनी तो समझ होनी चाहिए थी कि पत्नी को आराम से लाते हैं. बस, बच्चे पैदा करने आते हैं.’’मेरे पति कुछ बोल नहीं पाए थे. बोलते भी क्या? फिर धीरे से बोले, ‘‘मेरे घर में गाड़ी नहीं है.’’‘‘तो किराए की ले लेते. हालत देखी है इस की? कुछ हो जाता तो कौन जिम्मेदार होता?’’
डाक्टर ने फिर डांटा.डिलीवरी हुई. लड़का हुआ था. वह टुकुरटुकुर मेरी तरफ देख रहा था. यह देख कर मेरी छाती से दूध बह निकला. मैं करवट ले कर दूध पिलाने लगी.डिलीवरी के बाद मेरा बड़ा मन था कि अपने बच्चे को गुड़ या शहद चटाने की रस्म मैं करूं.
लेकिन मैं बेहोश थी. होश में आई तो ननद यह रस्म पूरी कर चुकी थी. मैं बहुत रोई. मेरे मन के भीतर की चाह सपना बन गई थी.मैं ने पति से कहा, ‘‘आप को इतना तो पता होना चाहिए था कि बच्चे को गुड़ या शहद चटाने की रस्म उस की मां करती है?’’पहली बार पति को मेरे भीतर के गुस्से का सामना करना पड़ा था. काफी देर तक वे बोल नहीं पाए थे, फिर कहा, ‘‘अब पूरी कर लो यह रस्म.
गुड़ भी है और शहद भी है.’’मैं डिलीवरी के बाद घर आई. मुश्किल से अभी 15 दिन हुए थे कि ननद घर में काम करने का गुस्सा छोटीछोटी बच्चियों पर निकालने लगी. एक वजह यह भी थी कि मेरे पहला ही बेटा हो गया था. इस में किसी का क्या कुसूर था?मेरी ननद मेरा सब से बड़ा सिरदर्द थी. उस की 3 लड़कियां थीं और लड़के की चाहत में लड़कियों की फौज इकट्ठी कर ली थी. उस की ससुराल में सासससुर थे, तो अकसर बीमार रहते थे. पति अच्छाखासा कमाता था.



