ज्वर: लड़कियों के जिस्म का शौकीन ऋषि – भाग 5

बाद तुम्हारी राह देखी थी, तुम्हारा इंतजार किया था, पर तुम्हें आज यों पा कर मैं तुम से नफरत करता हूं. तुम तो वेश्या निकली ज्योति… वेश्या.’’

मेरी बात सुन कर वह कुछ पल खामोश मुझे देखती रही, फिर अचानक खड़े हो कर बिफरते हुए वह बोली, ‘‘ऋषि, मैं वेश्या हूं ठीक कहा, पर तुम यहां एक वेश्या के घर क्या करने आए थे? तुम भी तो उतने ही गिरे हुए हो, जितना मैं, बल्कि मुझ से भी ज्यादा.

‘‘और अब मैं खुद को वेश्या कहने वाले को यहां एक पल भी बरदाश्त नहीं कर सकती, दफा हो जाओ यहां से,’’ इतना कह कर उस ने मुझे धक्का देते हुए वहां से बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर लिया. सच तो यह था कि ज्योति ने आज मुझे आईना दिखा दिया था.

ज्योति के दिखाए गए आईने ने मुझे झकझोर कर रख दिया. मैं ने खुद को बड़ी तेजी से बदल लिया. अब मैं सिर्फ और सिर्फ अपनी पढ़ाई और अस्मिता को समर्पित था.

बीटैक कर के मुझे एक नौकरी मिल गई थी और मैं ने अस्मिता के लास्ट सैमेस्टर के एग्जाम होने के बाद शादी का ऐलान कर दिया. हम दोनों के घर वालों ने हमारी होने वाली शादी को मंजूरी दे दी.

पर हमारे परिवार की एक परंपरा के मुताबिक थोड़ी सी अड़चन आ गई. मेरे ताऊजी के बेटे विवेक भैया, जो जन्म से हमेशा गांव से बाहर ही रहे थे, ने अब तक शादी नहीं की थी और परिवार की परंपरा के मुताबिक जब तक किसी बड़े की शादी न हुई हो छोटे की शादी नहीं हो सकती.

पर यह अड़चन भी जल्दी ही खत्म हो गई थी. एक दिन विवेक भैया ने फोन कर के कहा कि उन्होंने लखनऊ में एक जूनियर साइंटिस्ट से शादी कर ली है, जो उन के ही डिपार्टमैंट में इस साल आई थी. विवेक भैया वनस्पति अनुसंधान संस्थान में वैज्ञानिक थे.

यों बिना किसी को बताए शादी कर लेने से परिवार के लोग विवेक भैया से थोड़ा नाराज हुए, फिर स्वीकार करते हुए उन्हें बहू के साथ तुरंत घर आने की ताकीद की.

हां, विवेक भैया के इस तरह शादी कर लेने से मैं बहुत खुश था, मेरा रास्ता जो अब साफ हो गया था. यह खबर मैं ने अस्मिता को भी दे दी थी.

मैं और अस्मिता बाजार से भैया और भाभी के स्वागत के लिए जब गुलदस्ता ले कर घर पहुंचे, तो विवेक भैया और भाभी घर आ चुके थे. लोग उन के स्वागत में बिजी थे. लोगों के मुंह से भाभी की खूबसूरती के कसीदे गढ़े जा रहे थे.

मैं ने भाभी को देखने की कोशिश तो की, पर लोगों से घिरे होने की वजह से उन्हें देख ही नहीं पाया. तभी विवेक भैया की नजर मुझ पर पड़ी और वे चिल्ला कर बोले, ‘‘आओ ऋषि, कैसे हो? आ कर अपनी भाभी से मिलो.’’

भाभी से मिलने की खुशी में मैं तेजी से आगे बढ़ा, पर जल्दी ही ठिठक कर खड़ा हो गया.

‘‘ज्योति…’’ मेरे होंठ हलके से हिले. शरीर पूरी तरह से कांप कर रह गया.

हाथ में पकड़े गुलदस्ते को मेरे हाथ से लेते हुए विवेक भैया बोले, ‘‘यह तो मेरे लिए है, अब बोल अपनी भाभी को क्या दोगे?’’

तभी मां ने कहा, ‘‘चलो ऋषि, भाभी के पैर छू कर आशीर्वाद लो… और देख, तो विवेक किस खूबसूरत लड़की को हमारी बहू बना कर लाया है.’’

मैं ने खामोश हो कर ज्योति की तरफ देखा, तो उस ने हलके से बाईं आंख दबा दी.

मुझे खड़ा देख कर मेरी बहन ने हलके से धक्का मार के कहा, ‘‘भैया, अब जल्दी पैर छू कर यहां से हटो. और भी लोग लाइन में लगे हैं भाभी से मिलने को.’’

ज्योति के रूप में भाभी को देख कर सब बहुत खुश हो रहे थे. मैं न चाहते हुए भी आगे बढ़ा और झुक कर अपने हाथ की उंगली को ज्योति के पैर पर टिका दिया.

ज्योति के पैर छूते ही मुझे लगा कि वह ज्वर मेरे शरीर से उतर गया, जो कभी ज्योति ने मेरे शरीर को छू कर दिया था. मैं पलट कर जब वहां से हटा, तो मेरे कानों में ये शब्द गूंज उठे, ‘एक दिन किसी हमजैसी के पैर तू भरी महफिल में छुएगा, उस दिन मुझे याद करना’.

आज मुझे गुंजा की मां याद आ गई थी.

Friendship Day Special : पोलपट्टी- क्यों मिताली और गौरी की दोस्ती टूट गई?

आज अस्पताल में भरती नमन से मिलने जब भैयाभाभी आए तो अश्रुधारा ने तीनों की आंखों में चुपके से रास्ता बना लिया. कोई कुछ बोल नहीं रहा था. बस, सभी धीरे से अपनी आंखों के पोर पोंछते जा रहे थे. तभी नमन की पत्नी गौरी आ गई. सामने जेठजेठानी को अचानक खड़ा देख वह हैरान रह गई. झुक कर नमस्ते किया और बैठने का इशारा किया. फिर खुद को संभालते हुए पूछा, ‘‘आप कब आए? किस ने बताया कि ये…’’

‘‘तुम नहीं बताओगे तो क्या खून के रिश्ते खत्म हो जाएंगे?’’ जेठानी मिताली ने शिकायती सुर में कहा, ‘‘कब से तबीयत खराब है नमन भैया की?’’

‘‘क्या बताऊं, भाभी, ये तो कुछ महीनों से… इन्हें जो भी परहेज बताओ, ये किसी की सुनते ही नहीं,’’ कहते हुए गौरी की आंखें भीग गईं. इतने महीनों का दर्द उमड़ने लगा. देवरानीजेठानी कुछ देर साथ बैठ कर रो लीं. फिर गौरी के आंसू पोंछते हुए मिताली बोली, ‘‘अब हम आ गए हैं न, कोई बदपरहेजी नहीं करने देंगे भैया को. तुम बिलकुल चिंता मत करो. अभी कोई उम्र है अस्पताल में भरती होने की.’’

मिताली और रोहन की जिद पर नमन को अस्पताल से छुट्टी मिलने पर उन्हीं के घर ले जाया गया. बीमारी के कारण नमन ने दफ्तर से लंबी छुट्टी ले रखी थी. हिचकिचाहटभरे कदमों में नमनगौरी ने भैयाभाभी के घर में प्रवेश किया. जब से वे दोनों इस घर से अलग हुए थे, तब से आज पहली बार आए थे. मिताली ने उन के लिए कमरा तैयार कर रखा था. उस में जरूरत की सभी वस्तुओं का इंतजाम पहले से ही था.

‘‘आराम से बैठो,’’ कहते हुए मिताली उन्हें कमरे में छोड़ कर रसोई में चली गई.

रात का खाना सब ने एकसाथ खाया. सभी चुप थे. रिश्तों में लंबा गैप आ जाए तो कोई विषय ही नहीं मिलता बात करने को. खाने के बाद डाक्टर के अनुसार नमन को दवाइयां देने के बाद गौरी कुछ पल बालकनी में खड़ी हो गई. यह वही कमरा था जहां वह ब्याह कर आई थी. इसी कमरे के परदे की रौड पर उस ने अपने कलीरे टांगी थीं. नवविवाहिता गौरी इसी कमरे की डै्रसिंगटेबल के शीशे पर बिंदियों से अपना और नमन का नाम सजाती थी.

मिताली ने उस का पूरे प्यारमनुहार से अपने घर में स्वागत किया था. शुरू में वह उस से कोई काम नहीं करवाती, ‘यही दिन हैं, मौज करो,’ कहती रहती. शादीशुदा जीवन का आनंद गौरी को इसी घर में मिला. जब से अलग हुए, तब से नमन की तबीयत खराब रहने लगी. और आज हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि नमन ठीक से चलफिर भी नहीं पाता है. यह सब सोचते हुए गौरी की आंखों से फिर एक धारा बह निकली. तभी कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई.

दरवाजे पर मिताली थी, ‘‘लो, दूध पी लो. तुम्हें सोने से पहले दूध पीने की आदत है न.’’

‘‘आप को याद है, भाभी?’’

‘‘मुझे सब याद है, गौरी,’’ मिताली की आंखों में एक शिकायत उभरी जिसे उस ने जल्दी से काबू कर लिया. आखिर गौरी कई वर्षों बाद इस घर में लौटी थी और उस की मेहमान थी. वह कतई उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी.

अगले दिन से रोहन दफ्तर जाने लगे और मिताली घर संभालने लगी. गौरी अकसर नमन की देखरेख में लगी रहती. कुछ ही दिनों में नमन की हालत में आश्चर्यजनक सुधार होने लगा. शुरू से ही नमन इसी घर में रहा था. शादी के बाद दुखद कारणों से उसे अलग होना पड़ा था और इस का सीधा असर उस की सेहत पर पड़ने लगा था. अब फिर इसी घर में लौट कर वह खुश रहने लगा था. जब हम प्रसन्नचित्त रहते हैं तो बीमारी भी हम से दूर ही रहती है.

‘‘प्रणाम करती हूं बूआजी, कैसी हैं आप? कई दिनों में याद किया अब की बार कैसी रही आप की यात्रा?’’ मिताली फोन पर रोहन की बूआ से बात कर रही थी. बूआजी इस घर की सब से बड़ी थीं. उन का आनाजाना अकसर लगा रहता था. तभी गौरी का वहां आना हुआ और उस ने मिताली से कुछ पूछा.

‘‘पीछे यह गौरी की आवाज है न?’’ गौरी की आवाज बूआजी ने सुन ली.

‘‘जी, बूआजी, वह नमन की तबीयत ठीक नहीं है, तो यहां ले आए हैं.’’

‘‘मिताली बेटा, ऐसा काम तू ही कर सकती है, तेरा ही दिल इतना बड़ा हो सकता है. मुझे तो अब भी गौरी की बात याद आती है तो दिल मुंह को आने लगता है. छी, मैं तुझ से बस इतना ही कहूंगी कि थोड़ा सावधान रहना,’’ बूआजी की बात सुन मिताली ने हामी भरी. उन की बात सुन कर पुरानी कड़वी बातें याद आते ही मिताली का मुंह कसैला हो गया. वह अपने कक्ष में चली गई और दरवाजा भिड़ा कर, आंखें मूंदे आरामकुरसी पर झूलने लगी.

गौरी को भी पता था कि बूआजी का फोन आया है. उस ने मिताली के चेहरे की उड़ती रंगत को भांप लिया था. वह पीछेपीछे मिताली के कमरे तक गई.

‘‘अंदर आ जाऊं, भाभी?’’ कमरे का दरवाजा खटखटाते हुए गौरी ने पूछा.

‘‘हां,’’ संक्षिप्त सा उत्तर दिया मिताली ने. उस का मन अब भी पुराने गलियारों के अंधेरे कोनों से टकरा रहा था. जब कोई हमारा मन दुखाता है तो वह पीड़ा समय बीतने के साथ भी नहीं जाती. जब भी मन बीते दिन याद करता है, तो वही पीड़ा उतनी ही तीव्रता से सिर उठाती है.

‘‘भाभी, आज हम यहां हैं तो क्यों न अपने दिलों से बीते दिनों का मलाल साफ कर लें?’’ हिम्मत कर गौरी ने कह डाला. वह इस मौके को गंवाना नहीं चाहती थी.

‘‘जो बीत गई, सो बात गई. छोड़ो उन बातों को, गौरी,’’ पर शायद मिताली गिलेशिकवे दूर करने के पक्ष में नहीं थी. अपनी धारणा पर वह अडिग थी.

‘‘भाभी, प्लीज, बहुत हिम्मत कर आज मैं ने यह बात छेड़ी है. मुझे नहीं पता आप तक मेरी क्या बात, किस रूप में पहुंचाई गई. पर जो मैं ने आप के बारे में सुना, वह तो सुन लीजिए. आखिर हम एक ही परिवार की डोर से बंधे हैं. यदि हम एकदूसरे के हैं, तो इस संसार में कोईर् हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. किंतु यदि हमारे रिश्ते में दरार रही तो इस से केवल दूसरों को फायदा होगा.’’

‘‘भाभी, मेरी डोली इसी घर में उतरी थी. सारे रिश्तेदार यहीं थे. शादी के तुरंत बाद से ही जब कभी मैं अकेली होती. बूआजी मुझे इशारों में सावधान करतीं कि मैं अपने पति का ध्यान रखूं. उन के पूरे काम करूं, और उन की आप पर निर्भरता कम करूं. आप समझ रही हैं न? मतलब, बूआजी का कहना था कि नमन को आप ने अपने मोहपाश में जकड़ रखा है ताकि… समझ रही हैं न आप मेरी बात?’’

गौरी के मुंह से अपने लिए चरित्रसंबंधी लांछन सुन मिताली की आंखें फटी रह गईं, ‘‘यह क्या कह रही हो तुम? बूआजी ऐसा नहीं कह सकतीं मेरे बारे में.’’

‘‘भाभी, हम चारों साथ होंगे तो हमारा परिवार पूरी रिश्तेदारी में अव्वल नंबर होगा, यह बात किसी से छिपी नहीं है. शादी के तुरंत बाद मैं इस परिवार के बारे में कुछ नहीं जानती थी. जब बूआजी जैसी बुजुर्ग महिला के मुंह से मैं ने ऐसी बातें सुनीं, तो मैं उन पर विश्वास करती चली गई. और इसीलिए मैं ने आप की तरफ शुष्क व्यवहार करना आरंभ कर दिया.

‘‘परंतु मेरी आंखें तब खुलीं जब चाचीजी की बेटी रानू दीदी की शादी में चाचीजी ने मुझे बताया कि इन बातों के पीछे बूआजी की मंशा क्या थी. बूआजी चाहती हैं कि जैसे पहले उनका इस घर में आनाजाना बना हुआ था जिस में आप छोटी बहू थीं और उन का एकाधिकार था, वैसे ही मेरी शादी के बाद भी रहे. यदि आप जेठानी की भूमिका अपना लेतीं तो आप में बड़प्पन की भावना घर करने लगती और यदि हमारा रिश्ता मजबूत होता तो हम एकदूसरे की पूरक बन जातीं. ऐसे में बूआजी की भूमिका धुंधली पड़ सकती थी. बूआजी ने मुझे इतना बरगलाया कि मैं ने नमन पर इस घर से अलग होने के लिए बेहद जोर डाला जिस के कारण वे बीमार रहने लगे. आज उन की यह स्थिति मेरे क्लेश का परिणाम है,’’ गौरी की आंखें पश्चात्ताप के आंसुओं से नम थीं.

गौरी की बातें सुन मिताली को नेपथ्य में बूआजी द्वारा कही बातें याद आ रही थीं, ‘क्या हो गया है आजकल की लड़कियों को. सोने जैसी जेठानी को छोड़ गौरी को अकेले गृहस्थी बसाने का शौक चर्राया है, तो जाने दे उसे. जब अकेले सारी गृहस्थी का बोझा पड़ेगा सिर पे, तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी. चार दिन ठोकर खाएगी, तो खुद आएगी तुझ से माफी मांगने. इस वक्त जाने दे उसे. और सुन, तू बड़ी है, तो अपना बड़प्पन भी रखना, कोई जरूरत नहीं है गौरी से उस के अलग होने की वजह पूछने की.’

‘‘भाभी, मुझे माफ कर दीजिए, मेरी गलती थी कि मैं ने बूआजी की कही बातों पर विश्वास कर लिया और तब आप को कुछ भी नहीं बताया.’’

‘‘नहीं, गौरी, गलती मेरी भी थी. मैं भी तो बूआजी की बातों पर उतना ही भरोसा कर बैठी. पर अब मैं तुम्हारा धन्यवाद करना चाहती हूं कि तुम ने आगे बढ़ कर इस गलतफहमी को दूर करने की पहल की,’’ यह कहते हुए मिताली ने अपनी बांहें खोल दीं और गौरी को आलिंगनबद्ध करते हुए सारी गलतफहमी समाप्त कर दी.

कुछ देर बाद मिताली के गले लगी गौरी बुदबुदाई, ‘‘भाभी, जी करता है कि बूआजी के मुंह पर बताऊं कि उन की पोलपट्टी खुल चुकी है. पर कैसे? घर की बड़ीबूढ़ी महिला को आईना दिखाएं तो कैसे, हमारे संस्कार आड़े आ जाते हैं.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो, गौरी. परंतु बूआजी को सचाई ज्ञात कराने से भी महत्त्वपूर्ण एक और बात है. वह यह है कि हम आइंदा कभी भी गलतफहमियों का शिकार बन अपने अनमोल रिश्तों का मोल न भुला बैठें.’’

देवरानीजेठानी का आपसी सौहार्द न केवल उस घर की नींव ठोस कर रहा था बल्कि उस परिवार के लिए सुख व प्रगति की राह प्रशस्त भी कर रहा था.

ज्वर: लड़कियों के जिस्म का शौकीन ऋषि – भाग 4

‘‘इस तरह… इस तरह से ज्योति? मैं उस के कंधे झकझोरते हुए बोला, ‘‘यों गंदगी में गिर कर तुम खड़ा होना चाहती हो? कुछ बनना चाहती हो? क्या बनना चाहती हो तुम?’’

मेरे हाथों को अपने हाथों में लेते हुए ज्योति बोली, ‘‘ऋषि, यह ठीक है कि यह रास्ता गलत है, मैं मानती हूं कि मेरे जिस्म को कई मर्दों ने हासिल किया है, पर कोई लड़की उस शख्स को नहीं भूलती जिस ने उसे पहली बार पाया हो. ऋषि, तुम्हीं वह हो जिस ने मुझे पहली बार पाया था. ऋषि तुम अब तक मेरी सांसों में बसे हो. मैं वह पल नहीं भूली जब तारों की रोशनी में तुम ने मेरे कुंआरेपन को हासिल किया था,’’ मेरे हाथों को पकड़े वह और न जाने क्याक्या बोले जा रही थी, पर मैं ने वह सब अनसुना कर के उसे वापस अपने से परे धकेल दिया था. वह अपने घुटनों पर सिर रख कर सिसकने लगी थी.

मैं ने कहा, ‘‘ज्योति, मैं भी तुम्हें याद करता था. मैं ने भी उस रात के बाद तुम्हारी राह देखी थी, तुम्हारा इंतजार किया था, पर तुम्हें आज यों पा कर मैं तुम से नफरत करता हूं. तुम तो वेश्या निकली ज्योति वेश्या.’’

मेरी बात सुन कर वह कुछ पल खामोश मुझे देखती रही, फिर अचानक खड़े हो कर बिफरते हुए बोली, ‘‘ऋषि, मैं वेश्या हूं ठीक कहा, पर तुम यहां एक वेश्या के घर क्या करने आए थे? तुम भी तो उतने ही गिरे हुए हो जितना मैं, बल्कि मुझ से भी ज्यादा. और अब मैं खुद को वेश्या कहने वाले को यहां एक पल भी बरदाश्त नहीं कर सकती, दफा हो जाओ यहां से,’’ इतना कह कर उस ने मुझे धक्का देते हुए वहां से बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर लिया. सच तो यह था कि ज्योति ने आज मुझे आईना दिखा दिया था.

ज्योति के दिखाए गए आईने ने मुझे झकझोर कर रख दिया. मैं ने खुद को बड़ी तेजी से बदल दिया. अब मैं सिर्फ और सिर्फ अपनी पढ़ाई और अस्मिता को समर्पित था.

बीटैक कर के मुझे एक नौकरी मिल गई थी और मैं ने अस्मिता के लास्ट सैमेस्टर के एग्जाम होने के बाद शादी का ऐलान कर दिया. हम दोनों के घर वालों ने हमारी होने वाली शादी को मंजूरी दे दी.

पर हमारे परिवार की एक परंपरा के मुताबिक थोड़ी सी अड़चन आ गई. मेरे ताऊजी के बेटे विवेक भैया, जो जन्म से हमेशा गांव से बाहर ही रहे थे, ने अब तक शादी नहीं की थी और परिवार की परंपरा के मुताबिक जब तक किसी बड़े की शादी न हुई हो छोटे की शादी नहीं हो सकती.

पर यह अड़चन भी जल्दी ही खत्म हो गई थी. एक दिन विवेक भैया ने फोन कर के कहा कि उन्होंने लखनऊ में एक जूनियर सांइटिस्ट से शादी कर ली है, जो उन के ही डिपार्टमैंट में इस साल आई थी. विवेक भैया वनस्पति अनुसंधान संस्थान में वैज्ञानिक थे.

यों बिना किसी को बताए शादी कर लेने से परिवार के लोग विवेक भैया से थोड़ा नाराज हुए, फिर स्वीकार करते हुए उन्हें बहू के साथ तुरंत घर आने की ताकीद की. हां, विवेक भैया के इस तरह शादी कर लेने से मैं बहुत खुश था, मेरा रास्ता जो अब साफ हो गया था. यह खबर मैं ने अस्मिता को भी दे दी थी और उस ने भी खुश हो कर फोन पर ही मुझे चूम लिया था.

मैं और अस्मिता बाजार से भैया और भाभी के स्वागत के लिए जब गुलदस्ता ले कर घर पहुंचे, तो विवेक भैया और भाभी घर आ चुके थे. लोग उन के स्वागत में बिजी थे. लोगों के मुंह से भाभी की खूबसूरती के कसीदे गढ़े जा रहे थे.

मैं ने भाभी को देखने की कोशिश तो लोगों से घिरे होने की वजह से देख ही नहीं पाया. तभी विवेक भैया की नजर मुझ पर पड़ी और वे चिल्ला कर बोले, ‘‘आओ ऋषि, कैसे हो? आ कर अपनी भाभी से मिलो.’’

भाभी से मिलने की खुशी में मैं तेजी से आगे बढ़ा, पर जल्दी ही ठिठक कर खड़ा हो गया.

‘‘ज्योति…’’ मेरे होंठ. हलके से हिले. शरीर पूरी तरह से कांप कर रह गया. हाथ में पकड़े गुलदस्ते को मेरे हाथ से लेते हुऐ विवेक भैया बोले, ‘‘यह तो मेरे लिए है, अब बोल अपनी भाभी को क्या दोगे?’’

तभी मां ने कहा, ‘‘चलो ऋषि, भाभी के पैर छू कर आशीर्वाद लो… और देख तो विवेक किस खूबसूरत लड़की को हमारी बहू बना कर लाया है.’’

मैं ने खामोश हो कर ज्योति की तरफ देखा तो उस ने हलके से बाईं आंख दबा दी.

मुझे खड़ा देख कर मेरी बहन ने हलके से धक्का मार के कहा, ‘‘भैया, अब जल्दी पैर छू कर यहां से हटो. और भी लोग लाइन में लगे हैं भाभी से मिलने को.’’

ज्योति के रूप में भाभी को देख कर सब बहुत खुश हो रहे थे. मैं न चाहते हुए भी आगे बढ़ा और झुक कर अपने हाथ की उंगली को ज्योति के पैर पर टिका दिया.

ज्योति के पैर छूते ही मुझे लगा कि वह ज्वर मेरे शरीर से उतर गया जो कभी ज्योति ने मेरे शरीर को छू कर दिया था. मैं पलट कर जब वहां से हटा तो मेरे कानों में ये शब्द गूंज उठे कि ‘एक दिन किसी हम जैसी के पैर तू भरी महफिल में छुएगा, उस दिन मुझे याद करना’.

आज मुझे गुंजा की मां याद आ गई थी.

ज्वर: लड़कियों के जिस्म का शौकीन ऋषि- भाग 3

लगातार 2 साल तक क्लास में टौप आ कर मैं ने अपनी धाक पूरे कालेज में बैठा ली. अब न सिर्फ मेरी क्लास की, बल्कि पूरे कालेज की कई लड़कियां मेरी दोस्त थीं. उन में से कई लड़कियां अपनी मरजी से तनहाई में मेरे करीब आ कर मेरे साथ हमबिस्तर हुईं.

वह खिलते गुलाब के ताजा फूल की तरह थी. मुझ से 2 साल जूनियर. अस्मिता कटियार, बीटैक इलैक्ट्रोनिक्स फर्स्ट ईयर. उस खिलते गुलाब के आसपास मैं अपनी आदत के मुताबिक मंडराने लगा था. बहुत जल्द मैं ने अस्मिता से अपनी दोस्ती और फिर प्यार का इजहार किया, जिसे उस ने शरमा कर कबूल कर लिया था.

हां, यह सच था कि मुझे अस्मिता से प्यार हो गया और जल्द ही हमारे प्यार के अफसाने सारे कालेज में चर्चा की बात हो गए थे.

अस्मिता भी अपना पूरा प्यार मुझ पर उड़ेल रही थी और यह उस के प्यार का ही असर था कि मैं अब उस से मिलने के बाद किसी दूसरी लड़की के साथ बिस्तर पर नहीं गया.

भले ही अस्मिता ने मुझे प्यार सिखा दिया हो, पर मेरे जिस्म को दिया गया ज्योति का ज्वर उतरा न था और इस ज्वर ने उस दिन अपना असर दिखाया, जब अस्मिता दोपहर की तनहाई में मुझ से मिलने मेरे कमरे पर आई.

आज उस ने मटमैले ग्रे रंग का कुरता पहना था, जिस पर काले रंग की गुड़हल की पत्तियों की तरह बनावट थी और उस कुरते के नीचे काली सलवार. उस का गोरा बदन इस लिबास में उबलउबल पड़ रहा था.

आज पहली बार अस्मिता मेरे साथ बिस्तर पर थी. उस के नाजुक अंगों से होता हुआ मेरा हाथ उस की सलवार तक पहुंचा ही था कि तभी मेरा हाथ पकड़ कर वह बोली, ‘‘नहीं ऋषि, यह नहीं.’’

उस के हाथ से अपना हाथ छुड़ाते हुए मैं बोला, ‘‘अस्मिता, क्या हुआ? मुझ से प्यार नहीं करती?’’

ऋषि ने ‘‘बहुतबहुत प्यार करते हैं हम आप से,’’ इतना कह कर मेरे हाथ को उस ने अपनी छाती पर रख लिया.

अस्मिता के उभारों को सहला कर मैं वापस उस की सलवार खोलने की कोशिश करते हुए बोला, ‘‘जब हम एकदूसरे से प्यार करते हैं, तो फिर जिस्मों में दूरियां क्यों?’’

अस्मिता बोली, ‘‘जिस्मों में दूरियां इसलिए क्योंकि अभी हमारी शादी नहीं हुई है,’’ फिर मेरे हाथ को अपने उभारों पर रखते हुए वह बोली, ‘‘मेरे प्यारे प्रेमी, जब तक आप हमारे पति नहीं बन जाते तब तक इसी से काम चलाओ.’’

इतना कह कर अस्मिता खिलखिला कर हंस पड़ी और मैं उस निश्छल हंसी में डूब गया.

अस्मिता वह पहली लड़की थी जो मेरे साथ बिस्तर पर लेट कर भी उतनी ही दूर थी जितनी लड़की किसी मर्द के साथ बिस्तर पर बिना लेटे हुए होती है.

भले ही मैं अस्मिता से टूट कर प्यार करने लगा था, पर ज्योति के दिए ज्वर से आजाद न हो सका था. उस शाम अस्मिता के जाने के बाद इस ज्वर ने अपना भयंकर रूप दिखाया और मैं इसे शांत करने के लिए जिस्म की तलाश करने लगा.

इसी हाल में मुझे अपना दोस्त रतन मिला. मेरा चेहरा देख कर ही वह मेरी हालत समझ गया और मेरे कुछ कहने से पहले ही बोला, ‘‘देख ऋषि, कालेज की किसी लड़की से कतई नहीं वरना अस्मिता भाभी का दिल टूट जाएगा.’’

‘‘फिर?’’ मैं ने बेचैनी से पूछा.

‘‘एक लड़की को मैं जानता हूं जो यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रही है. खूबसूरत इतनी कि अप्सरा शरमा जाए. अपने खर्चे के लिए कभीकभी किसी लड़के को बुला लेती है. एक बार मैं गया था, जन्नत का मजा मिला था.

‘‘तू कहे तो मैं बात करूं. अगर उसे जरूरत होगी तो बुला लेगी. हां, थोड़ी उम्र में ज्यादा है हम से.’’

मैं कुछ बोल न सका, बस इकरार में सर हिला कर रह गया. फिर रतन पास के पीसीओ में जा कर किसी से बात करता रहा. कोई 2-3 बार फोन किया, फिर मेरे पास आ कर एक आंख दबाते हुए बोला, ‘‘चल उठ, जा तेरा काम हो गया. उस ने बुलाया है.’’

अगले ही पल उस ने कागज पर उस लड़की का पता लिख कर थमा दिया और बोला कि पैसे ले कर जाना.

दरवाजे पर लगी कुंडी मैं ने 2-3 बार खटखटाई. उस के बाद जब दरवाजा खुला तो एक सांवली सी ठिगनी लड़की सामने खड़ी थी. होंठों पर सवाल लिए, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘जी… जी…,’’ मैं हकला कर रह गया. वैसे भी सामने खड़ी लड़की को देख कर मैं मन ही मन रतन को हजार गालियां दे चुका था.

मुझे हकलाते हुए देख कर वह गुस्से से बोली, ‘‘ओह, यह लड़की बाज नहीं आने वाली.’’

फिर वह चिल्ला कर बोली, ‘‘ओय बाहर आ,’’ इतना कह कर वह कमरे से बाहर चली गई. जातेजाते उस ने दरवाजे को भी बंद कर दिया था.

मुझे अभी कमरे में खड़े 1-2 मिनट ही हुए थे कि अपने गीले बालों को तौलिए से सुखाते हुए वह आ गई. जैसे ही उस ने बाल पीछे कर के सिर उठा कर मुझे देखा, मेरे मुंह से निकला, ‘‘ज्योति.’’

कुछ पल वह मुझे खामोश खड़ी निहारती रही फिर दौड़ कर मुझे गले लगा कर बोली, ‘‘ओह ऋषि, तुम हो?’’

‘‘हां, मैं हूं,’’ मैं उसे अपने से परे धकेलते हुए बोला.

ज्योति वापस आ कर मेरे गले से लगते हुए बोली, ‘‘ऋषि, कितने दिनों बाद हम देख रहे हैं आप को, यकीन ही नहीं होता…’’

‘‘यकीन तो मुझे भी नहीं होता ज्योति कि तुम इस हद तक गिर गई हो.’’

‘‘किस हद तक ऋषि… ओह, यह तुम क्या कह रहे हो. आज कितने दिनों बाद मिले और ये क्या बातें करने लगे.’’

‘‘वही बातें ज्योति जो करनी चाहिए. तुम अपने जिस्म का ज्वर उतारने के लिए उस जिस्म को मर्दों के आगे बेचती हो, क्या इसे गिरना नहीं कहते?’’

‘‘ऋषि, तुम समझ नहीं रहे. तुम्हें कैसे कहें कि यह पढ़ाई, यह पीएचडी इस में कितने पैसे लगते हैं… यह सब कहां से आता जबकि घर वाले मेरी शादी बीए के बाद ही कर देना चाहते थे. पर मैं पढ़ना चाहती थी, कुछ करना चाहती थी. अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी.’’

ज्वर: लड़कियों के जिस्म का शौकीन ऋषि – भाग 2

थोड़ी देर के बाद मैं ज्योति का हाथ पकड़ कर नीचे आ गया. मेरा हाथ छुड़ा कर वह जाते हुए बोली, ‘‘ऋषि, एक काम करना.’’

मैं ने पूछा, ‘‘क्या?’’

‘‘छत पर पड़ी खून की बूंदों को पानी से साफ कर देना,’’ इतना कह कर वह चली गई और मैं हाथ में बालटी ले कर छत की ओर चल दिया.

ज्योति उस रात के बाद फिर मुझे दिखाई न दी. उस की छुट्टियां खत्म हो गई थीं. मैं ने कई दिन की तड़प के बाद अपने दिल को तसल्ली दी कि वह जब अगले साल गरमियों की छुट्टियां बिताने आएगी तो जीभर के उस से बात करूंगा, उसे आगोश में लूंगा, मगर मेरे लाख इंतजार के बाद वह फिर कभी गरमी की छुट्टियां बिताने के लिए हमारे गांव नहीं आई.

मैं अपनी टीनएज में एक लड़की की तरफ आकर्षित हुआ, उस के जिस्म को मैं ने हासिल किया था. मैं जब भी तनहा लेटता, मुझे लगता कि मैं किसी हसीना के जिस्म से लिपटा हुआ हूं. मेरी नसनस कामज्वर से जल उठती. मैं बेचैन हो जाता. मैं कोशिश करता कि रात में अकेला न रहूं, बस इसलिए दोस्तों के साथ देर रात तक घूमा करता.

ऐसे ही एक रात मैं पास के एक गांव की महफिल में पहुंच गया, जहां तवायफें अपने हुस्न से अजब समां बांध रही थीं. लोग उन के थिरकते कदमों की लय पर वाहवाह कर रहे थे.

मेरी नजर भी ऐसे ही लयबद्ध थिरकते एक जोड़ी पांव पर टिक गई थी. वह एक मेरी उम्र की सुंदर नैननक्श वाली तवायफ थी, जिसे लोग गुंजा के नाम से पुकार रहे थे.

जब तक गुंजा उस गांव में रही, मैं रोज उस की महफिल में हाजिर होता रहा. मेरी इस हाजिरी को यकीनन उस ने तवज्जुह दी थी और यह तवज्जुह इतनी गहरी थी कि एक रात जब वह रक्स की महफिल के बाद कमरे में आराम कर रही थी, तो मैं उस के पास पहुंच गया और उस ने मुझे देखते ही अपने पास लेटी दूसरी तवायफ को बाहर जाने का इशारा कर के मेरी ओर अपनी मरमरी बांहें फैला दीं.

जिस कामज्वर को ज्योति ने मेरे शरीर में जगाया था, उसे मैं गुंजा की बांहों में शांत करने लगा. यहां तक कि जब वह अपने गांव गई, तो मैं अपने एक दोस्त के साथ वहां भी जा पहुंचा और वहीं पर मैं ने शालू को देखा.

शालू गुंजा की छोटी बहन थी और उस से भी ज्यादा हसीन. शालू को देखने के बाद जब मैं गुंजा के साथ लेटता तो मुझे लगता कि मैं शालू के साथ लेटा हूं. शालू के प्रति मेरी आकर्षित निगाहों को शायद गुंजा और उस की मां ने समझ लिया था, इसलिए वे दोनों गाहेबगाहे मुझे शालू से दूर रहने की हिदायत देती रहती थीं.

शालू अब मेरे ख्वाबों में आने लगी थी. इसी बीच मुझे लखनऊ के एक कालेज में बीटैक में एडमिशन मिल गया. लखनऊ जाने से पहले मैं शालू को पाना चाहता था. उस की गोद में सिर रख कर सोना चाहता था. अपनी इसी सोच को लिए मैं उस रात गुंजा के घर जा पहुंचा.

एक बड़ी महफिल उस रात गुंजा के घर सजी हुई थी. मुझे देख कर गुंजा मुसकरा उठी. मेरे पास आ कर वह बोली, ‘‘आओ ऋषि, बैठो.’’

मैं ने पूछा, ‘‘गुंजा, यह महफिल, ये इतने लोग किसलिए?’’

‘‘शालू के लिए,’’ वह मुसकराई.

‘‘मैं समझा नहीं,’’ शालू का नाम आते ही मैं उतावलेपन से बोला.

‘‘आज उस की नथ उतराई है,’’ गुंजा मेरे करीब आ कर मेरी कमीज के बटन खोलते हुए बोली.

‘नथ उतराई. कोठों की इस भाषा से मैं अब तक बखूबी परिचित हो चुका था और अच्छे से इस का मतलब भी जानता था.

मैं ने एक झटके से गुंजा को अपने से परे ढकेल दिया था. जमीन पर गुंजा के गिरने की आवाज सुन कर वहां पान चबाते हुए उस की मां आ गई थीं.

जमीन पर गुंजा को गिरा देख कर वह हाथ नचा कर बोली, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’

मैं भी तनिक तेज आवाज में बोला, ‘‘मुझे शालू से दूर रहने की हिदायत दे कर तुम लोग उस की नथ उतराई की रस्म कर रहे हो.’’

‘‘हां तो… तुम्हें एतराज काक्या हक?’’ गुंजा की मां एक कोने में रखे पीकदान में पान की पीक थूकते हुए बोली.

‘‘मैं शालू को चाहता हूं.’’

‘‘तुम शालू को नहीं, बल्कि उस के जिस्म को चाहते हो, जिस की कीमत किसी ने 25,000 रुपए दी है. सौदा हो चुका है.’’

‘‘सौदा…’’ मैं तनिक रोब से बोला, ‘‘एक मासूम लड़की का सौदा कर के तुम्हें शर्म नहीं आती…’’

मेरी बात सुन कर वह अधेड़ औरत बिफर गई थी. न जाने कितनी बातों की बौछार उस ने मुझ पर कर दी. बस मुझे उस की आखिरी बात याद रही, ‘‘दफा हो जाओ यहां से, तुम्हारे जैसे लोग यहां आ कर घुटनों पर बैठ कर हमारे पैर चूमते हैं.’’

वहां से निकलते हुए मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारे पैर चूमे हमारा जूता.’’

मेरी बात सुनते ही वह दहाड़ कर बोली, ‘‘एक दिन किसी हम जैसी के पैर तू भरी महफिल में छुएगा, उस दिन मुझे याद करना.’’

वह चिल्ला रही थी. उस के वह शब्द पिघलते सीसे की तरह मेरे कानों में उतर रहे थे. मैं ने पलट कर भी नहीं देखा और तेज कदमों से वहां से निकल आया था.

लखनऊ शहर ने मेरे जवान होते जिस्म में अंगड़ाई भर दी थी. जिधर देखो उधर खूबसूरती बिखरी पड़ी थी. अब मैं 19 साल का सजीला नौजवान था, जो लखनऊ के एक मशहूर कालेज से बीटैक कर रहा था.

मैं पढ़ने में तो बचपन से ही होशियार था और इसी वजह से क्लास में मेरी धाक बैठ गई थी. लड़के और लड़कियां सब मेरी तरफ आकर्षित थे, पर मैं सिर्फ लड़कियों की तरफ आकर्षित था.

जब खूबसूरत लड़कियां स्लीवलैस टौप और स्किन टाइट जींस पहन कर खूबसूरती की गुडि़या बन कर मेरे सामने आतीं और होंठों पर मुसकान ला कर ‘हाय ऋषि’ कहतीं, तो मेरा दिल बल्लियों उछल जाता.

मेरे मन और शरीर में जो ज्वर ज्योति ने भरा था, न तो वह उतरा था और न ही गुंजा और उस की मां का दिया हुआ दंश कम हुआ था, बल्कि यों कहें तो और उफन उठा था.

ज्वर: लड़कियों के जिस्म का शौकीन ऋषि – भाग 1

आज मेरी चोरी पकड़ ली गई थी. दिल धक से धड़क कर रह गया. वह सिर उठा कर अपनी बड़ीबड़ी गोलगोल आंखों से मुझे देख रही थी और मैं इस बात से लापरवाह कि रंगे हाथों पकड़ा गया हूं, उस की आंखों में डूब जाने की हद तक उस की नजर से नजर मिलाए हुए था.

मैं उस की आंखों की जद से बाहर तब निकला, जब उस ने एक पल को अपनी पलकें झपकाई थीं. उस समय मेरी आंखें उस के गुलाबी होंठों और संगमरमरी गरदन की राह से फिसल कर उस के बड़े उभारों पर उस तरह ठहर गईं, जैसे उठी हुई चोटियों ने किसी पर्वतारोही का रास्ता रोक दिया हो.

इस समय वह ऊपर की तरफ देख रही थी, इसलिए यों लगा कि किसी परी के सीने पर 2 उजले कबूतर बैठे हैं, जो बस पंख फड़फड़ा कर उड़ना चाहते हैं.

मेरी आंखें उन उजले कबूतर के जोड़े में ही उलझी हुई थीं कि उस ने मेरी आंखों की शरारत को पहचान लिया और अगले ही पल अलगनी पर टंगे तौलिए से उस ने अपने बदन को ढक लिया.

उस समय मुझे यों लगा जैसे कबूतर किसी शिकारी की आहट पर अपने दड़बे में दुबक गए हों.

दुबक तो मैं गया था. 16 साल के मेरे मन ने समझ लिया था कि तूफान आएगा और इसी तूफान के डर से मैं तमाम दिन दबासहमा अपने कमरे में दुबका रहा. दिन ढल के शाम आ चुकी थी, पर तूफान ने अब तक दस्तक नहीं दी थी.

रात का अंधेरा अब पूरी तरह छा चुका था. मैं ने देखा कि वह दीदी के साथ घर आ गई थी. सच पूछो तो मैं उस का इंतजार भी करता था. इंतजार तो आज भी कर रहा था, पर उसे देखते ही मेरा दिल धड़क गया था.

ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में उस की पहनी हुई सफेद उजली शर्ट उस की गोरी रंगत में चार चांद लगा रही थी और रात के अंधेरे की कालिमा उस की पहनी हुई काली सलवार से आंखें लड़ा कर उस की जुल्फों की काली रंगत में इजाफा कर रही थी.

‘‘ऋषि, जरा एक गिलास पानी तो पिलाना,’’ जब उस ने यह कहा, तो मेरा ध्यान टूटा.

पानी देते समय जब उस की उंगलियां मेरे हाथ से टकरा रही थीं, तब मेरे दिल में यह सोच बुलंदी पर थी कि अब वह मेरी दीदी के सामने ही मुझ से मेरी चोरी का जिक्र करेगी, पर उस ने ऐसा नहीं किया और थोड़ी देर में वह चली गई.

बीए फाइनल ईयर के एग्जाम दे कर वह अपने मामा के घर गरमियों की छुट्टियां बिताने आई थी. मेरे और उस के मामा का घर बिलकुल अगलबगल था.

वह 19-20 साल की एक गोरी, छरहरी और खूबसूरत लड़की थी. उस का नाम ज्योति था.

ज्योति के मामा के घर बाथरूम नहीं था, इसलिए वह नहाने के लिए मेरे घर आ जाया करती थी.

एक दिन जब वह बाथरूम में थी, मैं अपने बेचैन दिल के साथ टहलते हुए छत पर पहुंच गया. छत पर टहलते हुए मेरी नजर बाथरूम की छत के उस हिस्से पर पड़ी, जिसे पापा ने दूसरी मंजिल पर पानी ले जाने के लिए नल का इंतजाम करवाने के लिए ठीक किया था. इस समय वह हिस्सा एक टीन के टुकड़े से ढका था.

मैं ने धड़कते दिल से घुटनों के बल बैठ कर टीन के टुकड़े को हलका सा एक तरफ सरका दिया. मेरी नजरों ने नीचे बाथरूम में झांका और मुझे यों

लगा जैसे बाथरूम में कमल का फूल खिला हो.

फिर तो यह मेरा रोज का शगल हो गया. उधर ज्योति मलमल कर नहाती रहती और इधर में उस के रूप सागर में डुबकी लगाता रहता.

पर आज वह कुछ देर से आई. मैं तो उस का इंतजार ही कर रहा था. उस के बाथरूम में जाने के कुछ देर बाद मैं ने छत पर जा कर टीन को सरकाया, पर तभी सूरज की रोशनी हजार वाट के बल्ब की तरह बाथरूम में कौंधी.

ज्योति ने चौंक कर रोशनी आने के रास्ते को देखा तो वहां पर मुझे उकड़ू बैठा पाया. मेरी चोरी आज उस के सामने थी, पर अब तक उस ने इस का जिक्र किसी से नहीं किया, यहां तक कि मुझ से भी नहीं.

एक शाम को मैं घर पर अकेला कुछ लिख रहा था. लिखतेलिखते अचानक मुझे लगा जैसे सामने कोई बैठा है. नजरें उठाईं, तो सामने ज्योति थी.

‘‘क्या लिख रहे हो?’’ पूछते हुए उस ने वह कागज अपनी ओर खींच लिया.

उस कागज के टुकड़े पर मैं ने क्या लिखा था, सिवा उस के नाम ‘ज्योति’ के.

ज्योति ने तह कर के वह कागज अपनी स्कर्ट की जेब में रख लिया और फिर मुसकरा कर बोली, ‘‘हमें भी वह जगह दिखाओ, जहां से तुम हमें देखा करते थे.’’

उस की बात सुन कर मेरा दिल धड़क उठा. वह छत की तरफ जाने वाले जीने की तरफ चल दी और मैं उस  पीछे.

खिलते तारों की उस रात को हम दोनों एकदूसरे की बांहों में थे. ज्योति भले ही मुझ से बड़ी थी, पर वह भी सैक्स से अनजान ही थी. और मेरी तो बात ही क्या, मैं ने तो सोलह ही सावन देखे थे.

खुले आसमान तले हम एकदूसरे को पाने को उतावले थे, पर हमारी नादानी हमारा इम्तिहान ले रही थी.

मुझे अपने सीने में भींच कर ज्योति बोली, ‘‘ऋषि…’’ और उस के होंठों से निकले मेरे नाम की गरमी ने कामयाबी की राह मजबूत कर दी.

मैं गम की मारी नहीं – भाग 1

रज चढ़ आया था. आसमान में कहींकहीं बादलों के टुकड़े तैर रहे थे. साढ़े 8 बज गए थे.

दीपक काम पर जाने के लिए एकदम तैयार बैठा था. उस की पत्नी

ने टिफिन मोटरसाइकिल के ऊपर रख दिया था.

दीपक ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और चल पड़ा. मोटरसाइकिल के शीशे में उस ने पत्नी को देखा. वह हाथ हिला रही थी.

दिल्ली में दोपहिया गाड़ी से जाने वालों की जिंदगी हाथ में रखी कांच की प्लेट की तररह है. न जाने कहां चूक हो जाए और जिंदगीनुमा यह प्लेट टूट कर बिखर जाए.

दीपक अपने घर की गली से मुड़ गया था. आगे मेन सड़क थी और बस स्टौप था. बस स्टौप खाली था. शायद कुछ देर पहले बस सवारियों को भर कर ले गई थी.

तभी एक औरत बदहवास सी दीपक की मोटरसाइकिल के पास आई और बोली, ‘‘प्लीज रुकिए, मेरी बस निकल गई है…’’

‘‘आप को जाना कहां है?’’ दीपक ने मोटरसाइकिल रोक कर पूछा.

‘‘मु  झे मायापुरी में मैटल फोर्जिंग

बस स्टौप के पास जाना है. मैं वहां गारमैंट ऐक्सपोर्ट की एक फैक्टरी में काम करती हूं.’’

‘‘बैठो,’’ दीपक ने कहा और वह औरत मोटरसाइकिल पर बैठ गई.

‘‘आप को कैसे पता कि मैं मायापुरी जाता हूं?’’ दीपक ने उस से पूछा.

‘‘मैं ने आप को कई बार मैटल फोर्जिंग बस स्टौप के पास देखा है,’’ वह औरत बोली.

मैटल फोर्जिंग बस स्टौप के नुक्कड़ से जो सड़क अंदर जाती थी, वहीं से दीपक मुड़ता था और आटो गियर बनाने वाली एक फैक्टरी में इंजीनियर के पद पर काम करता था.

सुबह काम पर आते समय दीपक को पश्चिम विहार के पास लगा था कि आसमान में काले बादल घुमड़ने लगे हैं और ये अब बरसे कि तब बरसे.

तभी पीछे बैठी उस औरत ने कहा, ‘‘पीरागढ़ी के पास तो ऐसा कुछ नहीं था और यहां बादल घुमड़ आए हैं.’’

‘‘हां,’’ इतना कह कर दीपक ने मोटरसाइकिल की रफ्तार और तेज कर दी थी.

‘‘थोड़ी धीरे चलाओ न, डर लग रहा है,’’ वह औरत सहमते हुए बोली.

‘‘बरसात शुरू हो गई, तो हम क्या करेंगे? हमारे पास बरसात से बचने का कोई साधन नहीं है.’’

‘‘हां, यह तो है. सड़कों में भी कई जगह गड्ढे हैं. कोई सड़क साफ नहीं दिखती.’’

‘‘आप मोटरसाइकिल बहुत ज्यादा तेज चला रहे हैं. मेरा दिल धड़क रहा है. बरसात नहीं होगी, आप रफ्तार धीमी करो,’’ वह औरत दोबारा बोली.

‘‘आप ईएसआई अस्पताल वाले बस स्टौप पर उतर जाओ. वहां से बस में चली जाना,’’ दीपक बोला.

‘‘सवा 9 बज रहे हैं, मैं साढ़े 9 बजे तक नहीं पहुंच पाऊंगी.’’

‘‘फिर आप चुपचाप बैठी रहिए, मोटरसाइकिल इसी रफ्तार से चलेगी,’’ दीपक ने राजौरी गार्डन के फ्लाईओवर

से गुजरते हुए कहा, ‘‘तभी आप साढ़े

9 बजे तक अपनी कंपनी पहुंच पाएंगी.’’

‘‘आप ठीक कहते हैं,’’ उस औरत ने मासूमियत से कहा.

‘‘आप की छुट्टी कब होती है?’’

‘‘रोजाना 2 घंटे ओवरटाइम लगता है. सवा 8 बजे छुट्टी होती है.’’

‘‘यानी ओवरटाइम न लगे, तो सवा 6 बजे छुट्टी होती है?’’

‘‘हां, हफ्ते में एक या 2 दिन ही सवा 6 बजे छुट्टी हो पाती है.’’

वे मायापुरी चौक पर थे. फ्लाईओवर के नीचे सामने रैडलाइट थी. वहां भीड़ बहुत थी. हरी बत्ती हुई.

‘‘सवा 6 और सवा 8 की बात सम  झ नहीं आई कि 15 मिनट ज्यादा क्यों?’’ दीपक ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘यही तो बात है. 15 मिनट में भी वे बहुत कमा लेते हैं. 3-4 सौ लोग काम करते हों, तो कमाई जरूर होती है.’’

वह औरत काफी तजरबे वाली लगी. एक वर्कर किसी सामान के 15 मिनट में 3 पैकेट भी पैक करे, तो सौ वर्कर कितना करेंगे? कई सैक्शन हैं और

कई काम.

‘‘बहुत ज्यादा शोषण है…’’ दीपक बोला, ‘‘ऐक्सपोर्ट की फैक्टरियों में तो ज्यादातर औरतें और लड़कियां ही काम करती हैं.’’

‘‘नहीं, मर्द भी बहुत काम करते हैं.’’

‘‘बहुत सब्र और हिम्मत है आप में. 20 किलोमीटर दूर से आना, रिकशा

और बस का महंगा किराया, भीड़ की तकलीफ और फिर रात को 10 बजे से पहले किसी हालत में घर नहीं पहुंच पाती होंगी?’’ दीपक ने कहा.

वह बेबसी से हंस पड़ी, ‘‘रोजाना 55 रुपए किराया, रात 10 बजे या इस से ऊपर घर पहुंचना. खाना बनाना, खाना, कुछ मैले कपड़े धो कर और बरतन मांज कर सोना… 12 बज जाते हैं. सुबह फिर साढ़े 5 बजे तक उठना…’’

‘‘आप के पति क्या काम करते हैं?’’ दीपक को उस से हमदर्दी हो आई थी.

वह लंबी सांस ले कर बोली, ‘‘मेरा पति शराब पीता है, लड़ाई  झगड़ा करता है, जुआ खेलता है…’’ और वह हंस दी. उस की हंसी में आग थी, ठंडक नहीं.

दीपक ने मैटल फोर्जिंग रैडलाइट से हलका सा अंदर जाती सड़क में मुड़ते हुए मोटरसाइकिल रोक दी और पीछे बैठी उस औरत से बोला, ‘‘आप यहीं उतर जाओ. मैं भी इसी सड़क की आखिरी फैक्टरी में काम करता हूं.’’

वह उतर कर सामने आ गई, ‘‘आप का बहुतबहुत शुक्रिया. मैं भी अगली सड़क के अंदर ही काम करती हूं,’’ वह औरत बोली.

दीपक ने मोटरसाइकिल को गियर में डालते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आप समय से दफ्तर पहुंच गईं. मैं चलता हूं…’’

उस ने मुसकरा कर हाथ हिला दिया. उस की मुसकराहट और हाथ हिलाने के अंदाज में यकीन और अपनापन   झलक रहा था. मोटरसाइकिल के शीशे में उस का अक्स दिख रहा था. वह तकरीबन आधा मिनट तक वहां खड़ी दीपक को देखती रही थी.

आगे सड़क के हलके घुमाव से दीपक मुड़ गया था. उस की फैक्टरी आ गई थी.

दीपक के जेहन में दिनभर उस औरत की जिंदगी की तसवीर खिंची रही थी. उस के बच्चे भी होंगे, पढ़ते भी होंगे? उस के मन में ऐसे लोगों के प्रति बेहद नफरत हो गई थी, जो शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, निठल्ले रहते हैं.

ऐसे लोग इनसान नहीं शैतान होते हैं, जो औरत किसी की मोटरसाइकिल पर मजबूरी में लिफ्ट लेती है, उस के साथ कुछ भी हो सकता है.

 

मैं गम की मारी नहीं – भाग 2

रास्ते में उस औरत ने दीपक को यह कह कर चौंकाया था, ‘मैं रोज उसी समय बस स्टौप पर पहुंचती हूं.’

यह सुन कर दीपक ने मोटरसाइकिल धीमी कर ली थी. औरत का साथ सफर में अच्छा होता है. सफर छोटा हो या बड़ा, मजे में कट जाता है.

‘‘आप का एक महीने में किराए का 16-17 सौ रुपए तो खर्च हो जाता होगा?’’ दीपक ने पूछा था.

‘‘हां, इतना तो हो ही जाता है.’’

‘‘आप को वहां पर कौन सा ग्रेड मिलता है?’’

‘‘ट्रेंड गे्रड.’’

‘‘यानी साढ़े 6 हजार रुपए महीना?’’

‘‘प्रोविडैंट फंड, ईएसआई और

20 फीसदी बोनस. कटकटा कर 56 सौ रुपए मिल जाते हैं.’’

‘‘अच्छा है, पक्की नौकरी है. आप सारा खर्च कर डालो, पर सरकारी खाते में प्रोविडैंट फंड के रूप में हर महीने आप के दोढाई हजार रुपए जमा होते

ही हैं. ऊपर से साढ़े 8 फीसदी ब्याज… जिंदगी का यह सब से बड़ा सहारा है.’’

‘‘इसलिए ही तो मैं नौकरी कर रही हूं, ईएसआई अस्पताल से मुफ्त इलाज हो जाता है, दवाएं मिल जाती हैं. सालभर बाद साढ़े 8 हजार रुपए बोनस मिल जाता है, घर का सारा सामान और कपड़ालत्ता आ जाता है.’’

‘‘आप अगर उसी समय पर बस स्टौप पहुंचती हों तो देख लिया करो कि मैं आ रहा हूं कि नहीं. उस समय आप मेरी मोटरसाइकिल पर बैठ कर मायापुरी पहुंच सकती हैं और आप का किराया भी बच सकता है,’’ दीपक बोला था.

‘‘ठीक है,’’ उस ने दबी जबान से कहा था.

इस के बाद जब भी दीपक घर से निकला, गली के छोर पर वह नहीं मिली. बस स्टौप या तो खाली होता या फिर 9 बजे जाने वाली बस के इंतजार में 4-6 लोग खड़े दिखाई देते.

दीपक सोचता, ‘शायद उसे कोई दूसरा लिफ्ट देने वाला मिल जाता हो और वह उस के साथ निकल जाती हो?’

फिर वह सोचता, ‘ऐसा नहीं हो सकता.’

एकएक कर के काफी दिन बीत गए. दीपक के मन से पहले दिन की याद भी निकल रही थी. वह रोजाना गली के छोर वाले बस स्टौप के पास मोटरसाइकिल धीमी कर लेता था कि शायद वह खड़ी हो, पर नहीं होती थी.

उस दिन भी उस औरत ने दीपक से कहा था, ‘किसी पराए मर्द के साथ मोटरसाइकिल पर जाने के लिए बड़ा दिल होना चाहिए. मैं एक औरत हूं, और कोई औरत पराए मर्द के साथ बैठे, बड़ा हिम्मत का काम है.’’

‘‘आज यह हिम्मत कहां से आई?’’ दीपक ने पूछा था.

‘‘आज मजबूरी बन गई.’’

‘‘और आगे?’’

‘‘अब हिचक दूर भाग गई,’’ कह कर वह शरमा गई थी.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘पता लग गया कि आप भले और नेक इनसान हैं.’’

‘‘जान कर खुशी हुई कि आप को लगा कि दुनिया एकजैसी नहीं है.’’

इन बातों को महीनाभर हो चला था. उस सुबह दीपक समय से कुछ पहले ही उठ गया था.

पत्नी ने टोका था, ‘‘आजकल नींद नहीं आती आप को. जल्दी उठ जाते हैं. लो, चाय पीओ.’’

‘‘अच्छी पत्नी के यही लक्षण हैं कि वह पति के मन को समझे,’’ चाय का घूंट पी कर दीपक ने कहा था, ‘‘बहुत बढि़या, अच्छी चाय के लिए थैंक्स.’’

पत्नी खिलखिला कर हंस दी थी.

दीपक को नाश्ते में आलू के परांठे और आम का अचार मिला था. खाने में बड़ा मजा आया था.

पत्नी ने टिफिन मोटरसाइकिल की सीट पर रखते हुए कहा था, ‘‘आलूमटर की सूखी सब्जी है.’’

‘‘क्या बात है? आज तो खाने में मजा आएगा. तुम मेरा इसी तरह खयाल रखती रहो,’’ दीपक बोला.

‘‘बातें बनाना तो कोई तुम से सीखे,’’ पत्नी ने प्यार भरा उलाहना दिया था.

दीपक जैसे ही मेन गली के छोर वाले बस स्टौप पर पहुंचा, तो सड़क पर मुड़ते ही किनारे पर वह औरत खड़ी मिल गई.

उस ने अपने हाथ के इशारे से मोटरसाइकिल रुकवाई और चुपचाप पीछे बैठ गई. कुछ खोईखोई, आंखें मानो सोईसोई, अलसाई सी.

दीपक ने भी बिना इधरउधर देखे मोटरसाइकिल को तीसरे गियर में डाल दिया. दरअसल, वह रोजाना के समय से 10 मिनट लेट निकला था. बीच में वह औरत मिल गई. अगर तेज न चलता, तो वह लेट हो जाती.

भीड़ कुछ कम और सड़क साफ दिखी, तो दीपक ने पूछा, ‘‘तकरीबन एक महीने बाद मिली हो आप. क्या आप कहीं चली गई थीं?’’

‘‘नहीं, मैं कहीं नहीं गई थी,’’ उस ने लंबी सांस ली और बताया, ‘‘पति बीमार था. 25 दिन तक तो उस की सेवा में ईएसआई अस्पताल में लगी रही.’’

‘‘क्या हो गया था उन्हें, जो इतने दिन लग गए?’’

‘‘मुंह का कैंसर था. अब वे इस दुनिया में नहीं हैं,’’ उस ने आह भरी, मानो किसी   झं  झट से छुटकारा मिला हो, ‘‘25 साल तक निठल्ला रहा, शराब

पी, जुआ खेला और…’’ कहतेकहते वह रुक गई.

‘‘और क्या?’’ दीपक ने पूछा.

कुछ चुप्पी के बाद वह धीरे से बोली, ‘‘और… औरतबाजी की… बड़ा वैसा आदमी था… रात के अंधेरे में मु  झ से   झगड़ा करता था…’’

‘‘क्या?’’

‘‘मैं कमा कर खाती हूं और उस को खिलाती थी.’’

‘‘आप ने जो किया, अच्छा किया. लाज ही औरत की जिंदगी है और आप लाज की पक्की हैं.’’ कह कर दीपक थोड़ा हंस दिया.

 

मैं गम की मारी नहीं – भाग 3

‘‘अब खत्म हुई कहानी,’’ उस ने कुछ चुप रह कर कहा, ‘‘मेरी एक बेटी है और एक बेटा. उस के पढ़नेलिखने और बड़ा होने तक मैं नौकरी करूंगी, उस के बाद मेरा बेटा संभाल लेगा,’’ उस की आंखों में एक अजीब सी चमक थी, मानो कह रही थी, ‘मैं गम की मारी नहीं, चिंता की वजह जा चुका है.’

मैटल फोर्जिंग का बस स्टौप आ गया था. रैडलाइट से बाईं ओर मुड़ कर दीपक ने उसे उतार दिया और बोला, ‘‘अच्छा तो मैं चलता हूं, कल तो आएंगी ही आप?’’

दीपक ने गौर से उस का चेहरा देखा. वह शांत थी. उस के चेहरे पर गम की कोई शिकन नहीं थी, सिर्फ माथे की गोल बिंदी गुम थी.

‘‘मैं रोजाना आऊंगी. आप जैसे नेक इनसान मु  झे मिल गए, अब मेरे अंदर

डर की भावना खत्म हो गई. दुखसुख में सहारा ढूंढूंगी आप में,’’ कह कर वह मुसकरा दी.

दीपक ने कहा, ‘‘दुख हो या सुख, आप मु  झे जब भी याद करोगी, सेवा में हाजिर रहूंगा.’’

उस की आंखों में खुशी के आंसू तैर आए, ‘‘आप इनसान नहीं…’’ कह कर उस ने हाथ से उमड़ते आंसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश की.

‘‘आप मु  झे इतना बड़ा मत बनाइए, इनसान ही रहूं तो अच्छा है,’’ कह

कर दीपक ने अपना हाथ हिलाया और मोटरसाइकिल को गियर में डाल दिया.

उस ने शीशे में देखा कि वह पीठ फेर कर जा रही थी. कुछ कदम चलने के बाद उस ने एक बार फिर पीछे मुड़ कर जरूर देखा था. ऊंचे पेड़ों के पत्ते फड़फड़ा रहे थे, मानो खुशी मना रहे हों.

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