अपने घर में : सासबहू की बेमिसाल जोड़ी-भाग 2

नीरजा ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली थी. सैटरडे, संडे उस की छुट्टी होती थी. उस दिन कमला देवी जरूर आतीं. उस के और अपनी पोतियों के साथ समय बितातीं. उन की हर समस्या का हल निकालतीं और फिर शाम तक अपने घर लौट जातीं.

इधर, दूसरी शादी के बाद जब भी सागर ने मिनी और गुड़िया से मिलना चाहा, तो मिनी ने साफ इनकार कर दिया. अब उसे अपने पापा से बात करना भी पसंद नहीं था. उस ने पापा के बिना जीना सीख लिया था और गुड़िया को भी सिखा दिया था. वह उस पापा को कभी माफ नहीं कर पाई जिस ने उस की सीधीसादी मां को छोड़ कर किसी और के साथ शादी कर ली थी.

वक्त इसी तरह निकलता गया. नई शादी से सागर को कोई संतान नहीं हुई थी. दिनोंदिन श्वेता के नखरे बढ़ते जा रहे थे. सागर का जीना मुहाल हो गया था. दोनों के बीच अकसर झगड़े होने लगे थे. श्वेता अकसर घर से बाहर निकल जाती. सागर भी देर रात शराब पी कर घर लौटता.

कमला देवी यह सब देखसमझ रही थीं. पर वह अपने बेटे के स्वार्थी रवैए से भी अच्छी तरह परिचित थीं, इसलिए उन्हें बेटे पर तरस नहीं बल्कि गुस्सा आता था.

कमला देवी को अकसर वह समय याद आता जब पति से तलाक के बाद उन की जिंदगी का एक ही मकसद था और वह था सागर को पढ़ालिखा कर काबिल बनाना. इस के लिए उन्होंने अपनी सारी शक्ति लगा दी थी. स्कूल टीचर की नौकरी करते हुए बेटे को ऊंची शिक्षा दिलाई, काबिल बनाया. मगर अब एहसास होने लगा था कि कितना भी काबिल बना लिया, वह रहा तो अपने बाप का बेटा ही जो बाप की तरह ही शराबी, स्वार्थी और बददिमाग निकला.

इधर कमला द्वारा नीरजा को अपनाने और हर जगह उस की तारीफ किए जाने की वजह से नातेरिश्तेदारों का व्यवहार भी नीरजा के प्रति काफी अच्छा बना रहा. सागर के चचेरेममेरे भाईबहनों के घर कोई भी आयोजन होता तो नीरजा और उस की बेटियों को परिवार के एक महत्त्वपूर्ण सदस्य की तरह आमंत्रित किया जाता और उन की पूरी आवभगत की जाती. यही नहीं, सागर के विवाहित दोस्त भी नीरजा को अवश्य बुलाते. यह सब देख कर सागर और श्वेता भुनभुनाते हुए घर लौटते.

श्वेता चिढ़ कर कहती, “देख लो तुम्हारी रिश्तेदारी में हर जगह अभी भी मुझ से ज्यादा नीरजा की पूछ होती है. लगता है जैसे मैं जबर्दस्ती पहुंच गई हूं. तुम्हारी मां भी जब देखो, नीरजा और उस की बेटियों से ही चिपकी रहती हैं.”

सागर समझाने के लिहाज से कहता, “बुरा तो मुझे भी लगता है पर क्या करूं श्वेता? नीरजा के साथ मेरी बेटियां भी हैं न. बस, इसीलिए चुप रह जाता हूं.”

एक दिन तो हद ही हो गई. सागर के एक दोस्त के बेटे की बर्थडे पार्टी थी. आयोजन बहुत शानदार रखा गया था. सागर के सभी दोस्त वहां मौजूद थे. सागर ने इधरउधर नजरें दौड़ाईं. उसे नीरजा कहीं भी नजर नहीं आई.

सागर ने चैन की सांस लेते हुए श्वेता को कुहनी मारी और बोला, “शुक्र है, आज नीरजा नहीं है.”

श्वेता मुसकरा कर बच्चे को गिफ्ट देने लगी. तभी दरवाजे से नीरजा और उस की दोनों बेटियों ने प्रवेश किया. नीरजा ने खूबसूरत सी बनारसी साड़ी पहन रखी थी और बाल खुले छोड़े थे. उस के आकर्षक व्यक्तित्व ने सब का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. श्वेता जलभुन गई और सागर पर अपना गुस्सा निकालने लगी.

कुछ देर बाद जब पार्टी उफान पर थी तो सागर किनारे खड़े अपने दोस्तों के ग्रुप को जौन करता हुआ बोला, ‘यार, यह थोड़ा अजीब लगता है कि तुम लोग अब तक हर आयोजन में नीरजा को जरूर बुला लेते हो. तुम लोग जानते हो न, कि मैं नीरजा से अलग हो चुका हूं. अब उसे बुलाने की क्या जरूरत?”

एक दोस्त गुस्से में बोला, “क्या बात कह दी यार, तू अलग हुआ है भाभी से. पर हम तो अलग नहीं हुए न. उन से हमारा जो रिश्ता था वह तो रहेगा ही न.”

“पर क्यों रहेगा? जब वह मेरी पत्नी ही नहीं, तो तुम लोगों की भाभी कैसे हो गई?” सागर ने गुस्से में कहा तो एक दोस्त हंसता हुआ बोला, “ठीक है यार, भाभी नहीं तो दोस्त ही सही. यही मान ले कि अब एक दोस्त की हैसियत से हम सब उन्हें बुलाएंगे. रही बात तेरी, तो ठीक है. तेरी वर्तमान बीवी यानी श्वेता को भी हम न्योता भेज दिया करेंगे, मगर नीरजा को नहीं छोड़ेंगे. समझा?”

इस बात पर काफी देर तक उन के बीच तूतू मैंमैं होती रही. श्वेता पास खड़ी सबकुछ सुन रही थी. अंदर ही अंदर उसे नीरजा पर गुस्सा आ रहा था. उसे महसूस हो रहा था जैसे नीरजा उस की खुशियों के आगे आ कर खड़ी हो जाती है. सागर और उस के बीच कहीं न कहीं नीरजा अब भी मौजूद है. घर लौटते समय भी पूरे रास्ते श्वेता हमेशा की तरह सागर से लड़तीझगड़ती रही.

एक दिन शनिवार को जब कमला देवी बहू और पोती के साथ थीं, तो दोपहर में उछलतीकूदती मिनी घर में घुसी. आते ही उस ने मां और दादी के पैर छुए. नीरजा ने खुशी की वजह पूछी, तो मिनी खुशी से चिल्लाई, “मम्मा मैडिकल एंट्रेंस टैस्ट में मेरे बहुत अच्छे नंबर आए हैं और मुझे यहां के सब से बेहतरीन मैडिकल कालेज में दाखिला मिल रहा है.”

“सच बेटी?” दादी ने खुशी से पोती को गले लगा लिया.

मगर नीरजा थोड़ी उदास स्वर में बोली, “बेटा, यहां दाखिले में और उस के बाद पढ़ाई में कुल खर्च लगभग कितना आएगा?”

अब मिनी भी सीरियस हो गई थी. सोचते हुए उस ने कहा, “मम्मा, मेरे खयाल से लगभग दोढाई लाख रुपए तो लग ही जाएंगे. इस से ज्यादा भी लग सकते हैं.”

“पर बेटा, इतने रुपए मैं कहां से लाऊंगी?”

“मम्मा, मेरी शादी वाली जो एफडी आप ने रखी है न, बस, उसे तोड़ दो.”

“पागल है क्या? नहीं नीरजा, तू वैसा कुछ नहीं करेगी. पढ़ाई का खर्च मैं उठाऊंगी मिनी,” कमला देवी ने कहा.

“पर कैसे मम्मी? आप के पास इतने रुपए कहां से आएंगे?”

“बेटा, मैं ने अपनी नौकरी के दौरान कुछ रुपए बचा कर अलग रखे थे. वे रुपए मैं ने कभी सागर को भी नहीं दिए. अब उन्हें अपनी मिनी के मैडिकल की पढ़ाई के लिए खर्च करूंगी. इस का अलग ही सुख होगा.”

“नहीं मम्मी, उन्हें आप न निकालें. वैसे भी, इस उम्र में आप को पैसे अपने पास रखने चाहिए. कल को सागर ने कुछ गलत व्यवहार किया या बिजनैस डुबो दिया तो आप…?”

विधायक को जवाब : निशा किस वारदात से डरी हुई थी- भाग 2

मगर निशा उस के सीने में चेहरा छिपाए रोती ही रही. तभी निशा के पिता वहां आ पहुंचे. राजन उन्हें देख कर निशा से अलग हो गया. निशा भी आंसू पोंछते हुए सिर झुका कर खड़ी हो गई. कुछ पलों तक वहां शांति छाई रही. फिर निशा के पिता बोले. ‘‘देखो राजन साहब, इस तरह रात में किसी के घर में घुसना अच्छी बात नहीं. आप…’’ राजन उन की बात को काटते हुए बोला, ‘‘आप जो कुछ भी कहिए, मगर मैं निशा से प्यार करता हूं और हम दोनों शादी करना चाहते हैं.

जाति के बंधन तोड़ कर क्या शादी करना बुरी बात है?’’ ‘‘देखिए, निशा मेरी बेटी है और मैं एक हरिजन हूं. आप के पिताजी बारबार कह चुके हैं कि एक हरिजन की बेटी को वह अपनी बहू कभी नहीं बनाएंगे.’’ ‘‘मगर मैं निशा को अपनी पत्नी जरूर बनाऊंगा. मैं घर छोड़ दूंगा. उन की जायदाद से एक कौड़ी नहीं लूंगा.’’ ‘‘राजन बाबू, मेरी पीठ पर आप के पिताजी के आदमियों के डंडों के निशान हैं. अच्छा होगा कि आप यहां से चले जाएं, वरना यदि मेरी बिरादरी के लोग भी यहां आ गए, तो गजब हो जाएगा.’’

‘‘मैं निशा से सच्चा प्यार करता हूं बाबूजी, और प्यार करने वाले मौत से नहीं घबराते, मैं पिताजी की तरफ से…’’ राजन इतना ही बोल पाया था कि 4-5 लोग हाथ में लाठियां लिए अंदर आ गए. एक आदमी बोला, ‘‘राजनजी, हम हरिजन हैं तो क्या, हमारी भी अब इज्जत है. अब हम अपनी इज्जत की नीलामी कभी बरदाश्त नहीं कर सकते. बेहतर होगा कि आप यहां से चले जाएं. पुलिस कुछ नहीं करेगी तो भी हम बहुतकुछ कर सकते हैं.’’ निशा डर गई. राजन भी उस की हालत को समझ गया. राजन बोला, ‘‘भाइयो, इज्जत की नीलामी तो कोई भी बरदाश्त नहीं कर सकता. मगर, आप लोग बताइए कि शादी करना क्या जुर्म है?’’ ‘‘ऐसी बात मत कहिए राजन साहब, जिसे पूरा कर पाना नामुमकिन हो.’’ ‘‘मैं पूरे होश में कह रहा हूं और इस का सुबूत आप लोगों को कल ही मिल जाएगा.’’ तुरंत दूसरे आदमी ने कहा, ‘‘कल क्यों, आज क्यों नहीं?’’ सभी ने देखा कि राजन ने अपनी जेब से कुछ निकाला और निशा की तरफ मुड़ा. देखते ही देखते उस ने निशा की सूनी मांग में सिंदूर भर दिया.

निशा के साथसाथ सभी चौंक गए. निशा हैरानी से उसे देखने लगी. अचानक राजन बोला, ‘‘आज से यह मेरी पत्नी और कल कचहरी में जा कर अप्लाई कर देंगे और महीनेभर में हम दोनों कानूनी तौर पर पतिपत्नी बन जाएंगे. मैं ने वकील से बात कर ली है,’’ इतना कह कर वह निकल गया. राजन जब अपने घर के पास आया, तो गेट पर ही रामू से मुलाकात हो गई, जो उस का सब से वफादार नौकर था. वह उस को देखते ही बोला, ‘‘भैयाजी, बड़े मालिक आप ही की राह देख रहे हैं.’’ ‘‘ठीक?है,’’ कहते हुए राजन आगे बढ़ गया, तो रामू बोला, ‘‘बड़े मालिक आप पर बहुत गुस्सा हो रहे हैं.’’ राजन खड़ा हो गया. रामू की तरफ मुड़ा और मुसकरा कर आगे बढ़ गया. रामू हैरानी से उसे देखता रह गया.

राजन सीधा ठाकुर साहब के कमरे में गया. वह मुंह में सिगार दबाए इधरउधर घूम रहे थे. राजन उन को देखते ही बोला, ‘‘पिताजी…’’ ठाकुर साहब उसे देखते ही गुस्से से बोले, ‘‘कहां गए थे तुम?’’ ‘‘निशा के घर,’’ राजन ने साफ बोल दिया. ठाकुर साहब को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी, इसलिए उन का गुस्सा और बढ़ गया, ‘‘क्यों गए थे?’’ ‘‘पिताजी, आप के आदमियों ने निशा के पिता को आज का तोहफा दिया. फिर भी आप पूछ रहे हैं कि क्यों गए थे?’’ आज बेटे के जवाब देने के इस तरीके पर वे हैरान रह गए, पर खुद पर काबू करते हुए बोले, ‘‘वाह बेटे, वाह. मैं ने तुम्हें मांबाप दोनों का प्यार दिया और आज तू मुझे उस का यह फल दे रहा?है. बड़ी इज्जत बढ़ाई है तू ने अपने बाप की.’’ ‘‘आप की इज्जत करना मेरा फर्ज है पिताजी, मैं जिंदगीभर आप की सेवा करूंगा… मगर मैं निशा को कैसे भूल जाऊं?’’

निशा का नाम सुन कर ठाकुर अपने गुस्से पर काबू न कर सके और चिल्ला कर बोले, ‘‘तो इतना जान लो कि मेरे जीतेजी एक हरिजन की बेटी इस खानदान की बहू कभी नहीं बन सकती.’’ राजन से भी नहीं रहा गया. वह बोला, ‘‘क्यों नहीं बन सकती?’’ ‘‘इसलिए कि नाली का कीड़ा नाली में ही अच्छा लगता है, समझे…’’ ‘‘तो ठीक है पिताजी, मैं निशा से बात तक नहीं करूंगा. मगर इस से पहले आप को मेरे सवालों का जवाब देना पड़ेगा.’’ ‘‘बोलो.’’ ‘‘मेरे खून का रंग कैसा है?’’ ‘‘लाल.’’ ‘‘और निशा के खून का रंग?’’ ‘‘तुम कहना क्या चाहते हो?’’ ‘‘जवाब दीजिए पिताजी.’’ ‘‘लाल.’’ ‘‘अगर मेरे और निशा दोनों के खून का रंग लाल ही है, तो वह नीची जाति की क्यों और मैं ऊंची जाति का क्यों?’’ ‘‘ऐसा सदियों से चलता आ रहा है…’’ ‘‘नहीं पिताजी, यह एक ढकोसला है. और मैं इसे नहीं मानता.’’

‘‘तुम्हारे मानने और न मानने से समाज नहीं बदल जाएगा. हम जिस घर का पानी तक नहीं पीते, उस घर की बेटी को किसी भी शर्त पर अपनी बहू नहीं बना सकते. समाज के रीतिरिवाजों से खिलवाड़ करने की कोशिश मत करो.’’ राजन गुस्से से पागल सा हो गया. वह जोर से चिल्लाया, ‘‘लानत है ऐसे समाज पर, जहां जातपांत और ऊंचनीच की दीवार खड़ी कर के इनसानियत के बंटवारे होते हैं. मैं उस समाज को नहीं मानता पिताजी, जहां इनसान को जात के नाम से अपनी पहचान बतानी पड़ती है.’’ ठाकुर साहब बेटे की इस हरकत से गुस्से से लाल हो रहे थे. वे जोर से चीखे, ‘‘मैं तुम से बहस नहीं करना चाहता. तुम्हारे लिए इतना ही जानना काफी?है कि तुम्हारी शादी उस लड़की से किसी भी हालत में नहीं होगी.’’

राजन भी मानने वाला नहीं था. उस ने साफसाफ शब्दों में बोल दिया कि वह निशा की मांग में सिंदूर भर के उसे अपनी पत्नी बना चुका है और एक महीने बाद कचहरी में जा कर कानूनी तौर पर भी शादी कर लेगा. राजन तेजी से अपने कमरे में चला गया तो ठाकुर साहब को मानो पैरों से धरती खिसकती हुई मालूम पड़ी. मगर ठाकुर साहब ने भी ठान लिया कि राजन और निशा को कचहरी तक पहुंचने ही नहीं देंगे. उन्होंने एक खतरनाक योजना बना डाली. वे निशा को जान से मरवा डालना चाहते थे. निशा और राजन इस बारे में जानते थे. उन्होंने उसी रात शहर छोड़ने का फैसला कर लिया. अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा इस समाज की खोखली शान को मन ही मन कोसने लगा. उस की आंखों से नींद कोसों दूर थी. अचानक ‘छोटे मालिक… छोटे मालिक…’ चिल्लाता हुआ रामू राजन के पास दौड़ा आया. उस ने एमएलए साहब की योजना बताते हुए यह भी कहा कि वे और उन के कुछ आदमी और अभीअभी पुलिस वाले सादा वरदी में निशा के घर की तरफ गए हैं. राजन ने भी तुरंत मेज की दराज से पिस्तौल और कुछ गोलियां निकालीं और गिरतापड़ता निशा के घर की तरफ दौड़ पड़ा. पूरी बस्ती रात के अंधेरे में डूबी थी.

राजन जब कुछ दूर पहुंचा तो ‘भागोभागो’ की आवाजें उस के कानों में गूंजने लगीं. कहीं टौर्च, तो कहीं लालटेन की रोशनी नजर आने लगी. चारों तरफ कुत्तों के भूंकने की आवाजें सुनाई देने लगीं. राजन डर से कांप गया. अभी वह कुछ ही दूर आगे बढ़ा था कि देखा बस्ती के कई हरिजन हाथों में लाठियां लिए चिल्लाते हुए निशा के घर की तरफ बढ़ रहे हैं. वह भी उन लोगों से छिपता हुआ उसी ओर भागा. जैसे ही राजन निशा के घर के नीचे पहुंचा, उसे उस के पिता के कराहने की आवाज सुनाई पड़ी. वह उधर ही लपका. विधायक के पालतू गुंडों ने निशा के बापू को मारमार कर बुरा हाल बना दिया था. निशा के पिता राजन को अंधेरे में भी पहचान गए. उसे देखते ही चिल्लाने लगे, ‘‘राजन, मेरी बेटी को बचा लीजिए. विधायक साहब और उन के आदमी उसे मार डालेंगे.’’ राजन ने घबराई आवाज में पूछा, ‘‘निशा कहां है?’’ ‘‘वे लोग…’’ तब तक राजन अपने पिताजी की गर्जन सुन कर उधर ही भागा. टौर्च और लालटेन की रोशनी में वहां का नजारा देख कर वह सिर से पैर तक कांप गया. विधायक कृपाल सिंह के आदमी हरिजनों की तरफ बंदूकों की नालें किए खड़े थे.

काले घोड़े की नाल: आखिर क्या था काले घोड़े की नाल का रहस्य ?- भाग 2

शादी के बाद सीमा को घर में मेहमानों के होने के कारण मुखियाजी से मिलने में बहुत परेशानी हो रही थी. ऐसे में उसे अपने पति संजय का साथ और सुख मिला. संजय भी बिस्तर पर ठीक ही था, पर मुखियाजी की ताकत के आगे वह फीका ही लगा था, इसीलिए सीमा मन ही मन सभी मेहमानों के जाने का इंतजार करने लगी, ताकि वह फिर से मुखियाजी के साथ रात गुजार सके.

सारे मेहमान चले गए थे. संजय और विनय को आज ही शहर जाना पड़ गया था.

अगले दिन से सीमा ने ध्यान दिया कि मुखियाजी उस के बजाय नई बहू रानी का अधिक मानमनुहार करते हैं. उन की आंखें रानी के कपड़ों के अंदर घुस कर कुछ तौलने का प्रयास करती रहती हैं. सीमा मुखियाजी की मनोभावना समझ गई थी.

‘‘तो क्या मुखियाजी ने अपने भाइयों को इसलिए पालापोसा है, ताकि वे हमारे पतियों को हम से दूर कर के हमें भोग सकें… पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे पति ही अपने बड़े भाई के खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते हैं…‘‘ ऐसा सोच कर सीमा को नींद न आ सकी.

रानी के कमरे से सीमा को कुछ आवाज आती महसूस हुई, तो आधी रात को वह उठी और नई बहू रानी के कमरे के बाहर जा कर दरवाजे की झिर्री में आंख गड़ा दी. अंदर रानी बेसुध हो कर सो रही थी, जबकि मुखियाजी उस के बिस्तर के पास खड़े हो कर उस के बदन को किसी भूखे भेड़िए की तरह घूरे जा रहे थे. अभी मुखियाजी रानी के सीने की तरफ अपना हाथ बढ़ाने ही जा रहे थे कि उन की हरकत देख कर सीमा को गुस्सा आया और उस ने पास में रखे बरतन नीचे गिरा दिए, जिस की आवाज से रानी जाग गई, “मु… मुखियाजी आप यहां… इस समय…”

“हां… बस जरा देखने चला आया था कि तुझे कोई परेशानी तो नहीं है,” इतना कह कर मुखियाजी बाहर निकल गए.

रानी भी मुखियाजी की नजर और उन के मनोभावों को अच्छी तरह समझ गई थी, पर प्रत्यक्ष में उस ने अनजान बने रहना ही उचित समझा.

“कल तो आप रानी के कमरे में ही रहे… हमें अच्छा नहीं लगा,” सीमा ने शिकायती लहजे में कहा, तो मुखियाजी ने बात बनाते हुए कहा, “दरअसल, अभी वह नई है… विनय शहर गया है, तो रातबिरात उस का ध्यान तो रखना ही है न.”

एक शाम को मुखियाजी सीधा रानी के कमरे में घुसते चले गए. रानी उन्हें देख कर सिर से पल्ला करने लगी, तो मुखियाजी ने उस के सिर से साड़ी का पल्ला हटाते हुए कहा, “अरे, हम से शरमाने की जरूरत नहीं है… अब विनय यहां नहीं है, तो उस की जगह हम ही तुम्हारा ध्यान रखेंगे… विश्वास न हो, तो अपने पिता से पूछ लेना. वो तुम से हमारी हर बात का पालन करने को ही कहेंगे,” रानी की पीठ को सहला दिया था मुखियाजी ने और मुखियाजी की इस बात पर रानी के पिताजी ने ये कह कर मोहर लगा दी थी कि ‘‘बेटी, तुम मुखियाजी की हर बात मानना. उन्हें किसी भी चीज के लिए मना मत करना.‘‘

एक अजीब संकट में थी रानी.नई बहू रानी ने आज खाना बनाया था. पूरे घर के लोग खा चुके तो घर के नौकरों की बारी आई. घोड़ो की रखवाली करने वाला चंद्रिका भी खाना खाने आया. उस की और रानी की नजरें कई बार टकराईं. हर बार चंद्रिका नजर नीचे झुका लेता.

खाना खा चुकने के बाद चंद्रिका सीधा रानी के सामने पहुंचा और बोला, “बहुत अच्छा खाना बनाया है आप ने… हम कोई उपहार तो दे नहीं सकते, पर ये हमारे काले घोड़े की नाल है… इसे आप घर के दरवाजे पर लगा दीजिए, बुरे वक्त और भूतप्रेत से आप की रक्षा करेगी ये,” सकुचाते हुए चंद्रिका ने कहा.

“अरे, ये सब भूतप्रेत, घोड़े की नाल वगैरह कोरा अंधविश्वास होता है… मेरा इन पर भरोसा नहीं है,” रानी ने कहा, पर उस ने देखा कि उस के ऐसा कहने से चंद्रिका का मुंह उतर गया है.

“अच्छा… ये तो बताओ कि तुम मुझे घुड़सवारी कब सिखाओगे?” रानी ने कहा, तो चंद्रिका बोला, “जब आप कहें.”

“ठीक है, 1-2 दिन में अस्तबल आती हूं.”

घर की छत से अकसर रानी ने चंद्रिका को घोड़ों की मालिश करते देखा था. 6 फुट लंबा शरीर था चंद्रिका का. जब वह अपने कसरती बदन से घोड़ों की मालिश करता, तो वह एकदम अपने काम में तल्लीन हो जाता, मानो पूरी दुनिया में एकमात्र यही काम रह गया हो.

2 दिन बाद रानी मुखियाजी के साथ अस्तबल पहुंची. चंद्रिका ने काला वाला घोड़ा एकदम तैयार कर रखा था. मुखियाजी वहीं खड़े हो कर रानी को घोड़े पर सवार हो कर घूमते जाते देख रहे थे. चंद्रिका पैदल ही घोड़े की लगाम थामे हौलहौले चल रहा था.

“तुम ने सवारी के लिए वो सफेद वाली घोड़ी धन्नो क्यों नहीं चुनी?”

“जी, क्योंकि धन्नो इस समय उम्मीद से है न (गर्भवती है)… ऐसे में हम घोड़ी पर सवार नहीं होते,” चंद्रिका का जवाब दिलचस्प लगा रानी को.

“अच्छा… तो वो धन्नो मां बनने वाली है, तो फिर उस के बच्चे का बाप कौन है?”

“यही तो है… बादल, जिस पर आप बैठी हुई हैं. बहुत प्रेम करता है ये अपनी धन्नो से,” चंद्रिका ने उत्तर दिया.

“प्रेम…?” एक लंबी सांस छोड़ी थी रानी ने.

“इस घोड़े को जरा तेज दौड़ाओ… जैसा फिल्मों में दिखाते हैं.”

“जी, उस के लिए हमें आप के पीछे बैठना पड़ेगा,” चंद्रिका ने शरमाते हुए कहा.

“तो क्या हुआ… आओ, बैठो मेरे पीछे.”

चंद्रिका शरमातेझिझकते रानी के पीछे बैठ गया और बादल को दौड़ाने के लिए ऐंड़ लगाई. बादल सरपट भागने लगा. घोड़े की लगाम चंद्रिका के मजबूत हाथों में थी. चंद्रिका और रानी के जिस्म एकदूसरे से रगड़ खा रहे थे. रानी और चंद्रिका दोनों ही रोमांचित हो रहे थे. एक अनकहा, अनदेखा, अनोखा सा कुछ था, जो दोनों के बीच में पनपता जा रहा था.

हां… पर, चंद्रिका के स्पर्श में कितनी पवित्रता थी, कितनी रूहानी थी उस की हर छुअन.

तहखाने: क्या अंशी दोहरे तहखाने से आजाद हो पाई?

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अपने घर में : सासबहू की बेमिसाल जोड़ी-भाग 1

लंच के समय स्कूल के गैस्टरूम में बैठा सागर बेसब्री से अपनी दोनों बेटियों का इंतजार कर रहा था. आज वह उन्हें अपनी होने वाली पत्नी श्वेता से मिलवाना चाहता था. कल वह श्वेता से शादी करने वाला था.

वह श्वेता की तरफ प्यारभरी नजरों से देखने लगा. उसे श्वेता बहुत ही सुलझी हुई और खूबसूरत लगती थी. श्वेता के लंबे स्ट्रेट बाल, आंखों में शरारत, दूध सा गोरा रंग और चालढाल तथा बातव्यवहार में झलकता आत्मविश्वास. श्वेता के आगे नीरजा उसे बहुत साधारण लगती थी. वह एक घरेलू महिला थी.

नीरजा से सागर की अर्रेंज मैरिज हुई थी. शुरूशुरू में सागर नीरजा से भी प्यार करता था. पर सागर की महत्त्वाकांक्षाएं काफी ऊंची थीं. उस ने अपने कैरियर में तेजी से छलांग मारी. वह आगे बढ़ता गया और नीरजा पीछे छूटती गई.

सागर ने शहर बदला, नौकरी बदली और इस के साथ ही उस की पसंद भी बदल गई. नई कंपनी में उसे श्वेता का साथ मिला. तब उसे समझ आया कि उसे तो एक बला की खूबसूरत लड़की अपना जीवनसाथी बनाने को आतुर है और कहां वह गंवार( उस की नजरों में) नीरजा के साथ बंधा पड़ा है. बस, यहीं से उस का रवैया नीरजा के प्रति बदल गया था और एक साल के अंदर ही उस ने खुद को नीरजा से आजाद कर लिया था. पर वह अपनी दोनों बेटियों के मोह से आजाद नहीं हो सका था. दोनों बेटियों में अभी भी उस की जान बसती थी.

उस ने श्वेता को अपने बारे में सबकुछ बता दिया था और अब दोनों कोर्ट मैरिज कर हमेशा के लिए एकदूसरे के होने वाले थे. पर इस से पहले श्वेता ने ही इच्छा जताई थी कि वह उस की बेटियों से मिलना चाहती है, इसलिए आज दोनों बच्चियों से मिलने उन के स्कूल आए थे. सागर अकसर स्कूल में ही अपनी बेटियों से मिला करता था.

तभी 4 नन्हीनन्ही आंखों ने दरवाजे से अंदर झांका, तो सागर दौड़ कर उन के पास पहुंचा और उन्हें सीने से लगा लिया. 10 साल की मिनी थोड़ी समझदार हो चुकी थी. जब कि 6 साल की गुड़िया अभी नादान थी.

सागर ने उन दोनों को श्वेता से मिलवाते हुए कहा, “देखो बच्चो, आज मैं आप को किन से मिलवाने वाला हूं?”

“ये कौन हैं, इन के बाल कितने सुंदर है?” गुड़िया ने पूछा तो सागर ने गर्व से श्वेता की तरफ देखा और बोला, “बेटी, ये आप की मम्मी हैं. कल से यर आप की नई मम्मी कहलाएंगी. कल ये आप के पापा की पत्नी बन जाएंगी.”

श्वेता ने प्यार से बच्चों की तरफ हाथ बढ़ाया, तो थोड़ा पीछे हटती हुई गुड़िया ने पूछा, “पर पापा, हमारी मम्मी तो हमारे पास ही हैं. फिर नई मम्मी की क्या जरूरत?”

“पर बेटा, ये मम्मी ज्यादा अच्छी हैं. है न?”

“नो, नैवर. पापा, हमें नई मम्मी की कोई जरूरत नहीं. हमारी मम्मी बहुत अच्छी हैं. एंड यू नो पापा…” मिनी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.

“क्या बेटी, बताओ…”

“यू नो, आई हेट यू. आई हेट यू फौर दिस,” यह कह कर रोती हुई मिनी ने गुड़िया का हाथ थामा और तेजी से कमरे से बाहर निकल गई.

श्वेता ने जल्दी से अपने बढ़े हुए हाथों को पीछे कर लिया. अपमान और क्षोभ से उस का चेहरा लाल हो उठा था. सागर की आंखें भी पलभर में उदास हो गईं. उसे लगा जैसे उस के दिल का एक बड़ा टुकड़ा आज टूट गया है. उस ने श्वेता की तरफ देखा और फिर आ कर निढाल सा कुरसी पर बैठ गया. उस ने सोचा भी नहीं था कि उस की अपनी बेटी उस से नफरत करने लगेगी.

श्वेता ने रूखी आवाज में कहा, “चलो सागर, यहां रुक कर कोई फायदा नहीं. तुम्हारी बेटियां मुझे नहीं अपनाएंगी. लगता है तुम्हारी पत्नी ने पहले से ही उन के मन में मेरे खिलाफ जहर भर दिया है.”

सागर ने कुछ भी नहीं कहा. दोनों चुपचाप वापस चले गए.

इधर, नीरजा ने जब सुना कि उस का सागर दूसरी शादी करने वाला है तो वह और भी टूट गई. उस ने तुरंत अपनी सास कमला देवी को फोन लगाया, “मम्मी, कल आप का बेटा नई बहू ले कर आ रहा है. मुबारक हो, आप की जिंदगी में एक बार फिर बहू का सुख वापस आने वाला है.”

“चुप कर नीरजा, तेरे सिवा मेरी न कोई बहू है और न कभी होगी. मैं शरीर से भले ही यहां हूं पर मेरा दिल अब भी तेरे और तेरी दोनों बच्चियों के पास ही है. तू मेरी बेटी से बढ़ कर है. तेरी जगह कोई नहीं ले सकता, समझी पगली. और जानती है, तू मेरी बेटी कब बनी थी?”

“कब मम्मी?”

“उस रात जब मुझे तेज बुखार था. सागर ने मेरी तरफ देखा भी नहीं. पर तूने रातभर जाग कर मुझे ठंडी पट्टियां लगाई थीं. मेरी सेवा की थी. उसी रात मैं ने तुझे अपनी बेटी मान लिया था.”

“मम्मी, आप की जैसी मां पा कर मैं धन्य हो गई. आज मेरी मां जिंदा होतीं तो वे भी आप का प्यार देख कर…,” कहतेकहते वह रोने लगी तो सास ने टोका, “देख बेटी, मुझे मां कहा है न, फिर रोनेधोने की क्या जरूरत? हमेशा मुसकराती रह मेरी बच्ची. अपने बेटे पर तो मेरा काबू नहीं पर दुनिया की और किसी भी मुसीबत को तेरे पास भी नहीं फटकने दूंगी. जानती है यह बात?”

“जी मम्मी?”

“जब मेरे पति ने मुझे तलाक दिया था तब मेरे पास कोई नहीं था. मैं उन से कोई सवाल भी नहीं कर सकी थी. तेरे गम को मैं समझ सकती हूं. तलाक के बाद औरत मन से बिलकुल अकेली रह जाती है. पर तू जरा भी चिंता न कर. तेरे साथ हमेशा तेरी यह मां रहेगी तेरा मानसिक संबल बन कर.”

सास की बातें सुन रोतेरोते भी नीरजा के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई. सास की बातों से उसे बहुत सुकून मिला. आज वह अकेली नहीं, बल्कि सास का सपोर्ट उस के साथ था.

नीरजा के अपने मांबाप पहले ही गुजर चुके थे. एक भाई था जो मुंबई में सैटल था. 3 बहने थीं जिन का घर इसी शहर में था. पर चारों भाईबहनों ने उस से कन्नी काट ली थी. ऐसे में तलाक के बाद उस का और उस की दोनों बच्चियों का संबल उस की सास ही थी और यह उस के लिए बहुत बड़ा सहारा था. जब भी वह परेशान होती या अकेला महसूस करती तो सास से बात कर लेती.

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया

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काले घोड़े की नाल: आखिर क्या था काले घोड़े की नाल का रहस्य ?- भाग 1

मुखियाजी को घोड़े पालने का बहुत शौक था. बताते हैं कि ये शौक उन को विरासत में मिला हुआ था. आज भी मुखियाजी के पास 5 घोड़े थे, जिन की देखभाल का काम उन्होंने चंद्रिका नाम के 35 साला एक शख्स को दे रखा था.

मुखियाजी की उम्र तकरीबन 50-55 उम्र के बीच, फिर भी बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं पता चलता था. रोज सुबहशाम दूध पीते और लंबी सैर को जाते. अपनी जवानी के दिनों में आसपास के इलाकों में खूब दंगल जीते थे मुखियाजी ने.

पीठ पीछे कोई मुखियाजी को कुछ भी कहे, पर उन के सामने सभी नतमस्तक नजर आते थे.

मुखियाजी और उन की पत्नी के जीवन में एक बहुत भारी कमी थी कि दोनों के कोई औलाद नहीं थी. घरेलू नुसखों से कई बार उपचार करने की कोशिश भी की गई, पर कुछ नतीजा नहीं निकला. मुखियाइन की गोद हरी नहीं हो सकी और दोनों हार कर हाथ पर हाथ धर कर बैठ गए.

मुखियाजी को अपनी वंश बेल सूखने की कतई परवाह नहीं थी. उन्हें तो अपनी जिंदगी में अपनी सभी इंद्रियों से सुख उठाना अच्छी तरह आता था.

मुखियाजी कुल मिला कर 3 भाई थे, मुखियाजी से छोटा वाला संजय और सब से छोटा विनय, दोनों भाई मुखियाजी के प्रभाव में दबे हुए रहते थे. किसी की भी उन के सामने जबान खोलने की हिम्मत नहीं थी.

पिछले कुछ दिनों से मुखियाजी के मन में उन के किसी चमचे ने समाजसेवा का शौक लगा दिया था, तभी तो मुखियाजी हर किसी से यही कहते कि बड़े घर से तो हर कोई रिश्ता जोड़ना चाहता है, पर मैं तो संजय और विनय की शादी किसी गरीब घर की लड़की से ही करूंगा.

हां… पर लड़की खूबसूरत और सुशील होनी चाहिए, समाजसेवा भी होगी और किसी गरीब का भला भी हो जाएगा.

आसपास के गांव में कम पैसे वाले ठाकुर भी रहते थे. उन में से बहुत से लोग मुखियाजी के यहां अपनी लड़कियों का रिश्ता ले कर पहुंचे. मुखियाजी ने लड़कियों के फोटो रखवा लिए और बाद में संपर्क करने को कहा.

कुछ दिन बाद मुखियाजी ने उन सारे फोटो में से 2 खूबसूरत लड़कियों को पसंद किया. हैरानी की बात थी कि मुखियाजी ने जो 2 लड़कियां पसंद की थीं, वो अपेकक्षाकृत भरेपूरे बदन की थीं.

मुखियाजी ने उन दोनों के पिताजी को बुला भेजा और हर किसी से अकेले में बात की, “देखिए, हम अपने भाई संजय के लिए एक लड़की ढूंढ़ रहे हैं… पर हमारी 2 शर्तें हैं…

“पहली शर्त तो यह है कि फोटो देख कर लड़की की बुद्धिमत्ता का परिचय नहीं मिलता, इसलिए हम व्यक्तिगत रूप से लड़की से मिलना चाहेंगे… और दूसरी शर्त क्या होगी कि ये हम आप को रिश्ता तय होने के बाद बताएंगे.”

दूसरी शर्त वाली बात से लड़की का पिता थोड़ा घबराया, तो मुखियाजी ने उस से कहा कि ऐसी कोई शर्त नहीं होगी, जिसे वे पूरा न कर सकें. उन की इस बात पर लड़की के बाप को कोई आपत्ति नहीं हुई.

उन लोगों ने घर जा कर अपनी बेटियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया कि मुखियाजी के सभी सवालों का उत्तर सही से देना और सासससुर की बात मानना एक अच्छी बहू के गुण होते हैं.

मुखियाजी को आखिरकार सीमा नाम की एक लड़की पसंद आ गई.

“देखो सीमा, संजय को हम ने ही पालपोस कर बड़ा किया है, इसलिए हमारी हर बात मानता है वह. यही उम्मीद हम तुम से भी करते हैं… मानोगी न हमारी बात,” सीमा की पीठ पर हाथ घुमाते हुए मुखियाजी ने कहा. सीमा ने सिर्फ हां में सिर हिला दिया.

मुखियाजी ने सीमा के बाप मोती सिंह को बुलाया और कहा कि उन की लड़की उन्हें पसंद आ गई है और सब से पास वाले मुहूर्त बमें वे सीमा और संजय की शादी कर दें और फिर मुखियाजी ने सीमा के बाप मोती सिंह को अपनी दूसरी शर्त के बारे में बताया, “हमारी दूसरी शर्त ये है कि तुम हमें अपनी लड़की दे रहे हो, इसलिए हमारा भी फर्ज है कि हम तुम्हें अपनी तरफ से कुछ भेंट दें,” ये कह कर मुखियाजी ने 50,00 रुपए मोती सिंह को पकड़ा दिए. मोती सिंह उन की दरियादिली पर खुश हो गया. उस ने मुखियाजी के सामने हाथ जोड़ लिए.

संजय और सीमा की शादी हो गई थी, पर मुखियाजी का सख्त आदेश था कि अभी संजय और सीमा की सुहागरात का उचित समय नहीं है, इसलिए संजय को अलग कमरे में सोना पड़ेगा.

मुखियाजी अपने दोनों भाइयों के गांवों में रहने के सख्त खिलाफ थे. उन का साफ कहना था कि अगर तुम लोग गांव में रुक गए, तो यहां के गंवार लड़कों के साथ तुम लोग भी नहर पर बैठ कर चिलम पीया करोगे और आवारागर्दी करोगे और ये बात मुखियाजी को मंजूर नहीं, इसलिए मेहमानों के जाते ही संजय और विनय को शहर चलता कर दिया गया. बेचारा संजय अभी अपनी पत्नी के साथ सैक्ससुख भी नहीं ले पाया था और उस से अलग हो जाना पड़ा.

सीमा ने संजय से न जाने की फरियाद भी की, पर मुखियाजी का आदेश संजय के लिए पत्थर की लकीर था, इसलिए वह कुछ न बोल सका.

इसी तरह पूरे 6 महीने हो गए थे संजय को गए हुए, सीमा ने एक मर्द के शरीर का सामीप्य अभी तक नहीं जाना था. वह अकसर सोचती कि ऐसी शादी से क्या फायदा कि दिनभर घर का काम करो और रात में बिस्तर पर करवटें बदलो…

बाहर बारिश हो रही थी. सीमा अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी कि उसे अपने पैरों पर किसी के गरम हाथ की छुअन महसूस हुई. वे हाथ उस की जांघों तक पहुंच गए थे, कोई उस के सीने पर अपने हाथों का दबाव बढ़ा रहा था. सीमा की सांसें गरम हो गई थीं. उस का स्पर्श सीमा को बहुत अच्छा लग रहा था. सीमा को लगा कि उस का पति संजय ही वापस आ गया है. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं और आंनद लेना शुरू कर दिया. उस आदमी ने सीमा के सारे कपड़े हटा दिए और सीमा के स्त्री शरीर में प्रवेश कर गया.

सीमा को आज पहली बार मर्द की मर्दानगी का मजा मिला था. संभोग खत्म होते ही वह व्यक्ति सीमा से अलग हो गया.

सीमा ने उस की तरफ देख कर प्यारमनुहार करना चाहा और अपनी आंखें खोलीं…पर ये क्या, ये तो संजय नहीं था, बल्कि मुखियाजी थे… बिस्तर में पूरी तरह नग्न सीमा भला मुखियाजी का सामना कैसे करती. उस ने तुरंत ही चादर से अपने शरीर को ढकने की असफल कोशिश की और अस्फुट स्वर में बोली, “ये क्या किया मुखियाजी आप ने?”

“एक बात अच्छी तरह समझ ले सीमा… तुझे अब मुझे ही अपना पति समझना होगा, क्योंकि संजय का सारा खर्चा मैं उठाता आया हूं. मेरे सामने वह चूं तक नहीं करेगा. मैं उस के माल का मजा उड़ा सकूं, इसीलिए उस को मैं ने शहर भेज दिया है…

“और वैसे भी हम ने तेरे बाप को हमारी हर बात मानने के लिए पैसे दिए हैं,” नशे में बोल रहे थे मुखियाजी.

ऐसा सुन कर सन्न रह गई थी सीमा, पर मन ही मन उस ने अपनेआप को समझा लिया था, क्योंकि उसे मुखियाजी के रूप में उस के जिस्म को सुख पहुंचाने वाला मर्द जो मिल गया था.

फिर क्या था, मुखियाजी लगभग रोज ही सीमा के कमरे में आ जाते और दोनों सैक्स का जम कर मजा उठाते. मुखियाजी के चेहरे की लालिमा बढ़ गई थी. नई जवान लड़की के जिस्म का रस पी कर जैसे उन की जवानी ही वापस आ गई थी.

कभीकभी जब मुखियाजी अपनी पत्नी के पास ही सो जाते तो सीमा को जैसे सौतिया डाह सताने लगता. उसे अकेले नींद न आती, इसलिए कभी वह चूड़ियां खनकाती, तो कभी अपनी पायलें बजाते हुए मुखियाजी के कमरे के सामने से निकलती. हार कर मुखियाजी को उठ कर आना पड़ता और सीमा के जिस्म की आग को बुझाना पड़ता.

इस दौरान शहर से संजय वापस आया, तो मुखियाजी की त्योरियां चढ़ने लगीं और उन्होंने उसे किसी बहाने यहांवहां दौड़ा दिया, ताकि वह सीमा के साथ न रह पाए. फिर एक दिन उसे पैसावसूली के लिए दूसरे गांव भेज दिया और जब वह वापस आया, तब तक शहर से उस के ठेकेदार का बुलावा आ चुका था. बेचारा संजय अपनी पत्नी के संसर्ग को तरसता रह गया.

कुछ समय बीता तो मुखियाजी अपने छोटे भाई विनय की शादी के बारे में सोचने लगे. उन्होंने शहर से विनय को भी बुलवा लिया था और बहू ढूंढ़ने लगे. जल्दी ही उन्हें मुनासिब बहू मिल भी गई, जिस का पिता गरीब था और पहले की तरह ही उसे पूरे 50,000 रुपए देते हुए मुखियाजी ने लड़की के बाप से कहा कि बस अपनी लड़की से इतना कह दो कि विनय को पढ़ानेलिखाने में हम ने बहुत खर्चा किया है. हम ही उस के मांबाप हैं, इसलिए हमारी बात मान कर रहेगी तो सुखी रहेगी.

विधायक को जवाब : निशा किस वारदात से डरी हुई थी- भाग 1

निशा दोपहर की वारदात से बहुत ज्यादा डरी हुई थी, पर उस में बहुत हिम्मत बाकी थी. वह उदास सी कच्चे मकान की तीसरी मंजिल पर पलंग पर लेटी हुई थी. उसे हलका बुखार था. माथा दर्द से फटा जा रहा था. कभीकभी तो निशा अपने दोनों हाथों से सिर को इस तरह पकड़ लेती मानो उसे दबा कर निचोड़ देना चाहती हो. उस के बाल इधरउधर बिखर गए थे. वह बहुत बेचैन थी. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. अचानक निशा ने अपने दिल की आवाज सुनी, ‘निशा, तू इस शहरगांव, देश को छोड़ दे,’ और उस ने मरने की ठान ली. उस का चेहरा धीरेधीरे सख्त होने लगा. अचानक वह उठ कर बैठ गई. मगर जैसे ही उस ने उठना चाहा, बगल वाले टूटे पलंग पर लेटे पिता पर उस की नजर पड़ गई.

निशा ने जब गौर से पिता की नंगी पीठ देखी, तो उस के कानों में एमएलए कृपाल सिंह के आदमियों के डंडों की सरसराहट और पिता की चीखें गूंजने लगीं. उसे लगा मानो एमएलए की धमकी भरी तेज आवाज से उस का घर चरमरा कर गिर पड़ेगा. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. वह अपने दोनों हाथों से चेहरा छिपा कर रोने लगी. निशा और राजन एकसाथ कोचिंग क्लासों में मिले थे. निशा के पास कुछ नहीं था, पर उस के हर ऐग्जाम में 98 फीसदी मार्क्स आते थे. राजन ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया. राजन पहले मौजमस्ती वाला लड़का था, पर निशा के पढ़ाने पर कोचिंग के मौक टैस्टों में अब वह भी 90 फीसदी मार्क्स लाने लगा था. मार्क्स ही नहीं मिले, दिल भी मिले और बदन भी. अब दोनों को अलग करना मुश्किल था. अचानक निशा के दिल ने फिर आवाज दी, ‘धीरज रखो निशा, सब ठीक हो जाएगा. अगर तुम भाग जाओगी तो पिता का क्या होगा? उस राजन का क्या होगा, जो तुम्हारे प्यार में अपना सबकुछ छोड़ने को तैयार है? तुम्हारे प्यार को ही वह अपनी मंजिल मानता है.

और जब तुम ही नहीं रहोगी तो वह कहां जाएगा? तब शायद वह भी मर जाएगा.’ राजन की बातें निशा के कानों में गूंजने लगीं, ‘नहीं निशा, तुम्हें कुछ नहीं होगा. मुझ पर यकीन करो. मैं इस ऊंचनीच की दीवार को तोड़ कर एक दिन इस सारी बस्ती की क्या सारे शहर के सामने तेरी मांग में सिंदूर भरूंगा. मरने की बात मत करो. अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मैं खुद को आग लगा दूंगा.’ निशा बड़बड़ाने लगी, ‘‘मुझे कुछ नहीं होगा राजन… मैं तुम्हारे साथ हूं… मैं भी लड़ूंगी इस समाज से भी, पुलिस से भी, मैं भी लड़ूंगी…’’ अचानक निशा ने देखा कि उस के पिता उसी की तरफ आ रहे हैं. वह आंखें बंद कर के सोने का नाटक करने लगी. मगर पिता तो पिता होता है, वे बेटी की हर हरकत को भांप चुके थे. वे उस के टूटे से पलंग पर बैठ गए. उस के गालों पर आंसू देख कर पहले तो सहमे, फिर प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘‘तेरा बाप हूं… तेरी हालत को मैं जानता हूं. मगर मैं ऐसा बाप हूं,

जो तेरी इच्छा को जानते हुए भी तेरे लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं. मैं बेसहारा हूं. ‘‘बेटी, मेढ़क अगर चांद के पास जाना चाहे तो वह फुदकफुदक कर जान दे देगा, फिर भी वह चांद तक नहीं पहुंच पाएगा. हम उसी मेढ़क की तरह हैं. बेटी, भूल जा राजन को. ‘‘मैं मानता हूं कि प्यार करना कोई जुर्म नहीं है. मगर तुम्हारा सब से बड़ा जुर्म यह है कि तुम मेरी बेटी हो… एक हरिजन की बेटी. राजन इस इलाके के एमएलए के बेटे हैं, राजपूत खानदान के एकलौते वारिस हैं. वे ऊंची जाति वाले लोग हम हरिजनों को अपने आंगन में बैठा कर खाना तक नहीं खिलाते… अपना बेटा कहां से देंगे? ‘‘यह दुनिया फूलों की सेज नहीं है बेटी, बहुत कांटे हैं इस में. अपनी जिंदगी बचा लो, भूल जाओ राजन को. पोंछ लो आंसू… पत्थर आंसुओं से कभी नहीं पिघला करते. पत्थरों से सिर टकराने से अपना ही सिर फूटता है बेटी.’’ निशा जो अब तक चुप थी, फफक कर रो पड़ी. उस ने अपने पिता के सीने में अपना चेहरा छिपा लिया. कुछ देर तक बापबेटी एकदूसरे की बांहों में सुबकते रहे. फिर किसी तरह अपनेआप को संभालते हुए पिता बोले, ‘‘बेटी, इतना याद रखो कि हम हरिजन हैं… छोटी जाति के हैं. तुम…’’ बात को बीच में ही काटते हुए निशा बोली, ‘‘मगर बापू, आज जमाना बदल गया है. आप भी जानते हो और राजन भी जानता है कि यह कच्ची बस्ती का मकान हम जल्दी छोड़ देंगे. मुझे जरा इंजीनियरिंग करने दो, मैं लाखों कमाऊंगी. अब कोई हमारे रास्ते को जाति के नाम पर नहीं रोक सकता.

‘‘पर जब मेरे नंबर पता चलते हैं, तो चकरा जाते हैं, इसीलिए राजन इस फर्क को नहीं मानता.’’ ‘‘मैं जानता हूं बेटी, राजन का दिल साफ है. मगर जातपांत और ऊंचनीच की दीवारों को तोड़ना आसान नहीं है. विधायक कृपाल सिंह और वह भी सत्ताकद पार्टी का, किसी भी शर्त पर एक हरिजन की बेटी को अपनी बहू बनाना कबूल नहीं करेगा. यह बात दूसरी है कि वोट मांगने वह घरों में घुसता हो, पर बहू मांगने इस मकान में कभी नहीं आएगा.’’ कुछ देर बाद पिता उठे और अपने पलंग पर जा कर लेट गए. निशा चुपचाप बुत बनी वहीं बैठी रही. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. एक तरफ राजन का प्यार था, तो वहीं दूसरी तरफ जातपांत की दीवार थी. आखिर वह क्या करे? धीरे से निशा भी लेट गई और राजन के बारे में सोचने लगी. राजन तो दिल का राजा था. आज के जमाने में ऊंचनीच और जातपांत को न मानने वाला वह नौजवान सचमुच दिल का बादशाह था. यही वजह थी कि एक हरिजन की बेटी को वह अपना दिल दे बैठा था. उसे उस के कुछ दोस्तों ने कहा था कि नंबरों पर मत जा, औकात देख. निशा को एक दिन की बात याद आ गई, जब राजन उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर शहर से काफी दूर निकल गया था.

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी निशा ने राजन को कस कर पकड़ा हुआ था कि कहीं वह गिर न जाए. कभीकभी राजन जब अचानक ब्रेक लगा देता, तो निशा पूरी तरह उस पर झुक जाती. तब शरमाते हुए वह सिर्फ इतना ही कह पाती, ‘ठीक से चलाओ न.’ जब दोनों काफी दूर निकल आए तो निशा से नहीं रहा गया और पूछ बैठी कि वे कहां जा रहे हैं? मगर राजन मुसकरा कर बारबार अनसुनी कर देता. आखिर निशा अचानक जोर से बोली, ‘गाड़ी रोकिए.’ राजन मोटरसाइकिल रोक कर निशा की तरफ मुड़ा और मुसकराते हुए बोला कि वह एक रिजौर्ट में पूरा दिन बिताने ले जा रहा?है. पहले तो वह मना करती रही, मगर राजन की बात को ठुकरा नहीं पाई थी. वह निशा को पहली बार इतने शानदार रिजौर्ट में ले कर आया था. निशा ने छक कर खाया. दोनों ने बाद में एक कमरे में पूरा दिन बिताया. राजन निशा की गोद में सिर रख कर लेट गया. तब निशा प्यार से उस के माथे पर हाथ फेरते हुए बोली थी, ‘थक गए क्या?’ राजन भी निशा की आंखों में झांकते हुए प्यार से बोला था,

‘नहीं निशा, इस समय मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे मुझे दुनियाभर की खुशियां मिल गई हैं.’ निशा कुछ नहीं बोली, तो राजन ने कहा, ‘चुप क्यों हो?’ ‘डरती हूं.’ ‘क्यों?’ हिचकिचाते हुए निशा ने कहा, ‘आप विधायक के बेटे, ऊंची जाति के…’ ‘और तुम एक हरिजन की बेटी… यही कहना चाहती हो न तुम?’ राजन थोड़े गुस्से से बोला था. निशा खामोश ही रही. फिर बड़े प्यार से राजन ने अपने दोनों हाथों से उस का चेहरा सामने करते हुए कहा, ‘मैं तुम से कितनी बार कह चुका हूं कि इस तरह की बातें मत किया करो. मैं जो कुछ भी हूं सिर्फ तुम्हारा हूं और तुम मेरी होने वाली पत्नी हो.

मैं तो इतना ही जानता हूं कि अगर तुम नहीं तो मैं भी नहीं.’ निशा अपने बीते हुए दिनों में खोई हुई थी कि अचानक पीछे की छोटी सी खिड़की से कोई कूदा. वह डर गई. घबराते हुए वह पलंग से उठने लगी. फिर जैसे ही बोलने के लिए उस ने मुंह खोलना चाहा, उस साए ने उस का मुंह बंद कर दिया और धीरे से कहा, ‘‘मैं हूं निशा, राजन, तुम्हारा राजन.’’ निशा राजन की बांहों में समा गई. उस के सीने में अपना चेहरा छिपा कर सुबकने लगी. राजन ने उस के बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘मुझे सब मालूम हो गया निशा, लेकिन अब सब ठीक हो जाएगा.

Raksha Bandhan : टूटती और जुड़ती डोर- रिश्तों का बंधन

रक्षाबंधन का दिन था, इसलिए आज सांवरी को अपने छोटे भाई राहुल की बहुत याद आ रही थी. उस का चाय का ठेला लगाने का बिलकुल भी मन नहीं था, लेकिन फिर भी वह अपनी यादों को परे रख कर बेमन से अपना ठेला सजा रही थी. चूल्हा, गैस का छोटा सिलैंडर, दूध का भगौना, चायपत्ती व शक्कर का डब्बा, चाय के साथ खाने के लिए समोसा वगैरह… और भी न जाने क्याक्या.

सुबह के 5 बज चुके थे, इसीलिए सांवरी जल्दीजल्दी अपना ठेला तैयार कर रही थी, क्योंकि अगर वह अपना ठेला ले कर जल्दी नहीं पहुंची तो कोई दूसरा उस की जगह पर अपना ठेला खड़ा कर लेगा और फिर उसे ठेला ले कर इधरउधर भटकना पड़ेगा.

दूसरी बड़ी वजह यह भी थी कि सुबहसुबह सांवरी की चाय की बिक्री अच्छी हो जाती थी, क्योंकि सुबहसुबह चौराहे पर काम पर जाने वाले मजदूरों की अच्छीखासी भीड़ रहती थी और

वहीं से लोगों को काम करवाने के लिए मजदूर भी मिल जाते थे. उन में बहुत से ऐसे मजदूर भी थे, जो सांवरी की हर रोज चाय जरूर पीते थे, जिस से उस की कुछ आमदनी भी हो जाती थी.

पहले सांवरी को चाय का ठेला लगाने में बहुत शर्म महसूस होती थी, लेकिन पेट की आग, मां की बीमारी और मजबूरी की जंग के बीच उस की शर्म हमेशा हार जाती थी.

ठेला तैयार होते ही सांवरी मां के पास पहुंची. वे अभी सो रही थीं, इसीलिए उस ने उन्हें जगाना उचित नहीं समझा और वह चुपचाप कमरे से बाहर आ गई.

आज कितने दिनों के बाद मां को गहरी नींद में सोते देख कर सांवरी को बहुत सुकून महसूस हो रहा था. वे बेचारी सो भी कहां पाती हैं, बस दर्द में कराहती रहती हैं.

एक वक्त था, जब सांवरी भी दूसरी लड़कियों की तरह ही अपने बाबूजी, मां और अपने छोटे भाई राहुल के साथ शहर से सटे छोटे से गांव में खुशीखुशी रहती थी. बाबूजी के पास थोड़ीबहुत खेती थी. उसी में खेती कर के बाबूजी घरखर्च के अलावा सांवरी और राहुल की पढ़ाई का खर्च उठाते थे.

बाबूजी हमेशा सांवरी और राहुल को पढ़ालिखा कर बड़ा साहब बनाने की बात कहा करते थे. सांवरी और राहुल भी अपने बाबूजी के इस सपने को पूरा करने के लिए खूब मन लगा कर पढ़ते थे.

सांवरी के घर में कुछ न होते हुए भी सबकुछ था, लेकिन एक दिन घर की सारी खुशियां मातम और बेबसी में बदल गईं. उस दिन भी बाबूजी खेत से काम कर के आए थे और नल पर जा कर हाथमुंह धो रहे थे कि अचानक उन के सीने में तेज दर्द उठा और वे वहीं गिर गए. चीख सुन कर मां उन के पास पहुंच गईं, पर तब तक बाबूजी उन्हें छोड़ कर बहुत दूर चले गए थे.

बाबूजी के जाने के बाद धीरेधीरे सबकुछ बदल गया. घर में मां के पास बचेखुचे रुपए भी कुछ दिनों में ही खर्च हो गए. भूखे मरने की नौबत आ गई.

दिन बदलते ही नातेरिश्तेदारों ने मुंह फेर लिया. खराब हालत देख कर सांवरी की मां ने खेती की जमीन भी बेच दी. राहुल और उस की पढ़ाई भी छूट गई थी, लेकिन जमीन बेचने के बाद थोड़ेबहुत रुपए हाथ में आते ही सांवरी ने मां से जिद कर के राहुल की पढ़ाई दोबारा शुरू करवा दी और वह भी कुछ कमाने के इरादे से बाजार में चाय का ठेला लगाने लगी, जिस से घर का थोड़ाबहुत खर्च निकल आता था.

तभी सांवरी की बचीखुची खुशियों पर भी पानी फिर गया. उस की मां को लकवा मार गया और वे बिस्तर पर पहुंच गईं. अब राहुल की पढ़ाई और मां के इलाज की सारी जिम्मेदारी सांवरी पर आ गई थी.

फिर समय अपनी रफ्तार पकड़ता चला गया. राहुल आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर चला गया. वह वहीं रह कर पढ़ाई कर रहा था.

सांवरी राहुल को अकसर जमा किए रुपए भेज दिया करती थी. उधर वह भी अब जवानी में कदम रख चुकी थी. उस के जिस्म में भी बदलाव आने शुरू हो गए थे. उस के सीने के उभार, उस का गदराया बदन और नाजुक पतली कमर देख कर जवान तो जवान बूढ़ों का भी का दिल मचल जाता था. अब कुछ लोग राह चलते उस पर छींटाकशी भी करने लगे थे, लेकिन उसे ऐसे लोगों से कोई मतलब नहीं था.

इन सब लोगों के बीच सुबोध भी था, जो सांवरी को अकसर आतेजाते देखा करता था. यही नहीं, वह कभीकभी उस के ठेले पर चाय पीने भी आ जाता था, जिसे देख कर वह डर जाती थी.

उसे पता चला था कि वह गुंडा है. सड़कों पर मारपीट करते और दुकानदारों से पैसा वसूली करते वह खुद उसे देखा करती थी.

हालांकि सुबोध ने कभी सांवरी के साथ छेड़छाड़ नहीं की थी और न ही वह उस से कभी गलत तरीके से बोला था, लेकिन फिर भी वह एक तरह के डर में घिरी रहती थी कि कब सुबोध उस की इज्जत से खेल डाले और उस की जवानी को तारतार कर दे.

अचानक पड़ोस में मुरगे की बांग सुन कर सांवरी यादों के भंवर से धरातल पर आ गई. तभी उसे अपने ठेले का ध्यान आया और वह बाहर आ गई. बाहर आते ही उस ने अपना ठेला संभाला और उसे ढकेलते हुए चलने लगी.

सांवरी जब चौराहे पर पहुंची, तो अभी वहां इक्कादुक्का लोग ही उसे दिखाई दिए. उस ने ठेले को अपनी तय जगह पर खड़ा कर दिया और स्टूल को ठेले से उतार कर वहीं जमीन पर रख कर उस पर बैठ गई.

‘‘ऐ सांवरी, जरा एक चाय बना दे,’’ तभी सेवकराम सांवरी के ठेले पर आ कर बोला.

सांवरी ने एक नजर सेवकराम को देखा. उस के कपड़ों को देख कर लगा कि वह आज मजदूरी करने नहीं जा रहा था.

सांवरी ने चूल्हा जला कर चाय का भगौना उस पर रख दिया और उस में दूध वगैरह डाल कर चाय बनाने लगी.

‘‘क्या बात है सेवकराम, आज कहां जाने की तैयारी है?’’ सांवरी ने सेवकराम से पूछा.

‘‘कहीं नहीं. दीदी के यहां जा रहा हूं. आज रक्षाबंधन है. इसी बहाने दीदी से भी मिल लूंगा और राखी भी बंधवा लूंगा. वैसे भी पिछले 2 साल से मैं अपनी दीदी से मिल भी नहीं पाया हूं,’’ सेवकराम कुछ खीजते हुए बोला.

यह सुन कर सांवरी कुछ न बोली. चाय बन चुकी थी. उस ने चाय गिलास में डाल कर सेवकराम को दे दी और खुद स्टूल पर बैठ गई.

सेवकराम ने सांवरी को राहुल की याद दिला दी थी और उस का मन राहुल से मिलने को होने लगा था. उस ने गुल्लक से राखी निकाल कर अपने हाथ में पकड़ ली. उसे मालूम था कि आज फिर उस की खरीदी हुई राखी राहुल की सूनी कलाई की शोभा नहीं बढ़ा पाएगी, क्योंकि राहुल शायद उसे कब का भूल चुका था. आज भी राहुल के कड़वे शब्द उस के कानों में गूंज रहे थे.

अचानक एक बार फिर सांवरी यादों के भंवर में उलझ गई. कितनी खुश थी वह उस दिन, जब उसे पता लगा था कि राहुल पूरे 5 साल के बाद घर वापस आ रहा है. राहुल ने ही उसे बताया था कि उस की एक बड़ी कंपनी में नौकरी लग गई है, जहां वह मैनेजर है.

यह सुन कर सांवरी को लगा था  कि आज राहुल ने बाबूजी और उस के सपने को सच कर दिया और वह जिंदगी में कामयाबी की पहली सीढ़ी चढ़ गया है.

सांवरी को अब लग रहा था कि उस का छोटा भाई आते ही उस के सारे दुख दूर कर देगा और उस से कहेगा ‘दीदी, अब यह चाय बेचने का काम तुम नहीं करोगी. अब तुम्हारा और मां का खयाल मैं रखूंगा और तुम आराम करोगी.’

राहुल के घर आने की खबर मिलने की खुशी में सांवरी ने अपना चाय का ठेला भी नहीं लगाया. उस के अगले दिन रक्षाबंधन का त्योहार था, इसीलिए सांवरी ने बाजार से एक अच्छी राखी भी खरीद ली थी, जो वह अपने प्यारे भैया की कलाई पर बांधेगी.

दोपहर के तकरीबन एक बजे राहुल घर आ गया. राहुल को देख कर अनायास ही सांवरी उस से लिपट कर रो पड़ी और उस की सूख चुकी आंखों से धारा बह निकली. किसी बड़े साहब से कम नहीं लग रहा था उस का भाई.

आखिर मन हलका होने पर उस ने राहुल से हालचाल पूछा और फिर मां के पास उसे बैठा कर वह चायपानी का इंतजाम करने लगी.

उधर राहुल मां से बातें करने लगा. राहुल के आने पर मां भी अपनी बीमारी को भूल कर उस से बातें करने की कोशिश कर रही थीं. आज उन का चेहरा भी खुशी से दमक रहा था.

लेकिन आज सांवरी को राहुल कुछ बदलाबदला सा लग रहा था. वह काफी देर से राहुल को नोटिस कर रही थी कि वह उस से कटाकटा सा है. सफर की थकान होगी, ऐसा सोच कर उस ने राहुल से कुछ नहीं कहा था.

राहुल फ्रैश होने के बाद कमरे में आराम करने के लिए चला गया. सांवरी ने शाम को राहुल का मनपसंद खाना बनाया, लेकिन उस ने पेट भरा होने का बहाना बना कर उसे छुआ तक नहीं.

राहुल के खाना न खाने पर सांवरी का मन भी कुछ खाने का नहीं हुआ और उस ने खाने को यों ही वापस ढक कर रख दिया था. हां, उस ने मां को थोड़ाबहुत जरूर खिला दिया, जिस से वे दवा खा सकें.

सांवरी राहुल से ढेर सारी बातें करना चाहती थी, लेकिन राहुल उस से बात ही नहीं कर रहा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर राहुल को क्या हो गया है. लेकिन सुबह होते ही राहुल उस

से कुछ न बोला और अपना बैग पैक करने लगा.

यह देख कर सांवरी चौंक गई. उस ने राहुल से बैग पैक करने की वजह पूछी, तो वह एकदम गुस्से से चीख पड़ा, ‘‘मुझे नहीं रहना तुम्हारे घर में, जहां कोई वेश्या रहती हो. मुझे शर्म आती है तुम्हें अपनी बहन कहने पर. मुझे लगता था कि तुम यहां सही से रहती होगी, लेकिन तुम तो अपने जिस्म को बेचती घूमती हो,’’ राहुल ने चीखते हुए उस से कहा.

‘‘राहुल, यह तुम क्या बक रहे हो…’’ राहुल की बात सुन कर सांवरी का खून खौल उठा था और उस ने एक जोरदार थप्पड़ राहुल को मार दिया, ‘‘मैं यहां कोई ऐसा गलत काम नहीं करती हूं कि तुम्हारा सिर शर्म से झुक जाए.

‘‘हां, मैं मेहनत करती हूं और चाय बेच कर मां का, अपना और तुम्हारा पेट भरती हूं. अपना जिस्म नहीं बेचती मैं…

‘‘और सुनो, मैं तुम्हारी पढ़ाई का खर्च भी चाय बेच कर ही उठाती थी. आज तुम जोकुछ भी हो, इसी की बदौलत हो… समझे तुम,’’ सांवरी गुस्से से राहुल को बोलती जा रही थी, लेकिन यह सब बोलते हुए उस की आंखों से आंसुओं की झड़ी बहने लगी थी.

सांवरी को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि उस का छोटा भाई राहुल उस से इस तरह बात करेगा और उस पर इतने भद्दे इलजाम लगाएगा.

सांवरी की इज्जत पर अभी तक किसी तरह की आंच नहीं आई थी, लेकिन आज उस के अपने छोटे भाई

ने ही उस की इज्जत को तारतार कर दिया था.

उधर राहुल सांवरी का थप्पड़ खाने के बाद एक पल भी वहां नहीं रुका और अपना बैग उठा कर घर से बाहर चला गया. सांवरी ने भी राहुल को रोकने की कोशिश नहीं की.

उस के बाद कितना वक्त बीत गया था, लेकिन राहुल ने सांवरी और मां की कोई खोजखबर नहीं ली थी. राहुल ने भाईबहन के बीच की डोर को भी तोड़ दिया था, लेकिन रक्षाबंधन का त्योहार आते ही सांवरी को राहुल की याद कुछ ज्यादा ही आने लगती थी, लेकिन राहुल के कड़वे शब्द उस के सीने में आज भी तीर की तरह चुभते थे.

‘‘सांवरी…’’ तभी किसी की आवाज सुन कर सांवरी चौंक गई. उस ने देखा कि सामने सुबोध खड़ा हुआ था. सांवरी ने आंखों से निकल कर गालों पर लुढ़क आए आंसुओं को पोंछ लिया.

सांवरी सुबोध को देख कर समझ गई कि वह चाय पीने के लिए ही उस के ठेले पर आया हुआ है. उस ने उस से बिना पूछे ही चाय बनने के लिए चूल्हे पर चढ़ा दी.

‘‘सांवरी, मुझे आज चाय नहीं पीनी. मैं किसी और काम से आया हूं तेरे पास,’’ सुबोध सांवरी से बोला.

‘‘फिर क्या काम है मुझ से?’’ सांवरी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘क्या तुम मुझे अपना भाई समझ कर मुझ को राखी बांध दोगी? मेरी कोई बहन नहीं है. मैं जब भी तुम्हें देखता हूं, तो मुझे लगता है कि जैसे मेरी छोटी बहन मेरे सामने आ गई हो,’’ सुबोध ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए सांवरी से कहा.

सुबोध की बात सुन कर सांवरी उसे देखती ही रह गई. उसे सुबोध की बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि जिसे उस ने इतना गलत समझा था, वह उसे किसी तरह की गलत नजरों से नहीं, बल्कि छोटी बहन के रूप में देखता था. एक भाई बहन के बीच की डोर तोड़ कर उस से दूर चला गया था और दूसरा उस डोर को जोड़ने की बात कर रहा था.

सुबोध की बात सुन कर सांवरी की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी थी और उस ने बिना देर किए राखी सुबोध की कलाई पर बांध दी. राखी के कलाई पर बंधते ही सुबोध की आंखों के कोर भी गीले होने लगे थे.

सांवरी सोच रही थी कि जहां कभी रिश्ते की एक डोर हमेशा के लिए टूट गई थी, तो वहीं आज दूसरी डोर जुड़ गई थी.

 

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया-भाग 3

अनिता चुंबन से रोमांचित हो गई. उस ने प्रतिरोध करने के बजाय बस इतना ही कहा, ‘‘कोई आ गया तो…’’

अनिरुद्ध समझ गया कि अनिता को भी पुराने प्रेम प्रसंग को चलाए रखने में कोई आपत्ति नहीं है. बस, सब कुछ छिपा कर सावधानीपूर्वक करना पड़ेगा.

‘‘सौरी यार, इतने दिनों बाद तुम्हें अकेले पा कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पा रहा हूं.’’

‘‘धीरज रखो, सब हो जाएगा,’’ कह कर अनिता ने अपनी मादक मुसकान बिखेरते हुए हामी भर दी. बदले में अनिरुद्ध भी मुसकरा पड़ा.

अनिता को लग रहा था कि आज उस का पुराना प्रेम उसे वापस मिल गया. पर इस प्रेम प्रसंग को चलाए रखने के लिए यह जरूरी था कि अविनाश की प्रमोशन हो जाए. इसी प्रमोशन के लिए तो अविनाश उसे आज अनिरुद्ध के यहां लाया और उन्हें एकांत में छोड़ कर चला गया. अनिता ने बिना किसी भूमिका के अनिरुद्ध को सब कुछ बता दिया.

‘‘यह प्रमोशन क्या चीज है, तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने एक बार फिर से अनिता का दीर्घ चुंबन ले डाला.

अनिता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और बनावटी नाराजगी दिखाते हुए बोली, ‘‘मैं ने कहा न सब कुछ हो जाएगा. मैं तो शुरू से ही तुम्हारी हूं, थोड़ा धीरज रखो,’’ और अपने पर्स से रूमाल निकाल कर अनिरुद्ध के मुंह पर लगी लिपस्टिक पोंछने लगी. फिर यह कहते हुए अंजलि के कमरे की तरफ मुड़ गई, ‘‘यहां बैठना ठीक नहीं. पता नहीं तुम क्या कर बैठो.’’

अविनाश काफी देर बाद लौटा. आते ही वह फिर आने का वादा कर के अनिता और बेटे के साथ वहां से चल पड़ा. उस से रहा नहीं जा रहा था. वह रास्ते में ही अनिता से पूछ बैठा, ‘‘क्या हुआ, प्रमोशन के लिए कहा कि नहीं ’’

‘‘कहा तो है. कह रहा था कि देखूंगा,’’ अनिता ने पर्याप्त सतर्कता बरतते हुए बताया.

‘‘प्रमोशन हो जाए तो मजा आ जाए,’’ अविनाश अपने सपने में खोया हुआ बोला.

2-3 दिन बाद ही अविनाश को प्रमोशन का और्डर मिल गया, उस की खुशी की कोई सीमा न रही. दफ्तर से लौटते ही उस ने मारे खुशी के अनिता को गोद में उठा लिया और लगा चूमने.

‘‘अरे, क्या हो गया  आज तो बहुत खुश लग रहे हो ’’

‘‘खुशी की बात ही है. जानती हो, आज मेरी प्रमोशन हो गई. पिछले कई सालों से इंतजार कर रहा था मैं. सचमुच, नए मैनेजर साहब बड़े अच्छे आदमी हैं. तुम सोच रही थीं कि पता नहीं सुनेंगे भी कि नहीं, लेकिन उन्होंने मेरी प्रमोशन कर दी. सुनो, छुट्टी के दिन उन के घर चलेंगे, उन्हें धन्यवाद देने,’’ अविनाश खुशी में कहे जा रहा था.

अविनाश को खुश देख कर अनिता की आंखों में भी आंसू छलक आए.

छुट्टी के दिन वे अनिरुद्ध के यहां गए. इस के बाद तो आनेजाने का सिलसिला चल निकला. अनिरुद्ध अविनाश को आर्थिक फायदा दिलाने की गरज से कंपनी के काम से बाहर भी भेजने लगा. अब तो अविनाश हर शाम दफ्तर से आते वक्त अनिरुद्ध के घर हो कर ही आता था. अंजलि को भी मानो मुफ्त का एक नौकर मिल गया था. वह कभी अविनाश को सब्जी लेने भेज देती तो कभी दूध लेने. अविनाश बिजली, पानी, मोबाइल के बिल, पिंकी की फीस आदि भरने का काम भी खुशी से करता.

अनिरुद्ध अगर कंपनी के काम से कहीं बाहर जाता तो वह अविनाश को कह जाता कि मेरे घर का कोई काम हो तो देख लेना. प्रमोद भी पिंकी से घुलमिल गया था, इसलिए वह भी अकसर पिंकी के घर चला जाता और दोनों पिंकी के कमरे में घंटों बातें करते, खेलते.

उधर अनिरुद्ध और अनिता के दिल में प्रेम की पुरानी आग भड़क गई थी. वे अपनी सारी हसरतें पूरी कर लेना चाहते थे, इसलिए वे दोनों अपने में मगन थे. जब भी मौका मिलता अनिता अनिरुद्ध को फोन कर के घर आने के लिए कह देती और दोनों एकदूसरे में खो जाते. कहीं कुछ और भी हो रहा है, यह जानने और समझने की उन्हें मानो फुरसत ही न थी.

उस दिन अनिरुद्ध काम से थक कर रात में लगभग 8 बजे अपने कमरे से बाहर थोड़ी देर के लिए निकला, तो उस ने देखा कि पिंकी के कमरे की लाइट जल रही थी. पिछले कई दिनों की व्यस्तता की वजह से वह अपनी बेटी पिंकी से कायदे से बात तक नहीं कर पाया था. उस के दिल में आया कि पिंकी के कमरे में ही चल कर बातें करते हैं. अभी पिंकी के कमरे से वह कुछ दूरी पर ही था कि उसे कुछ आवाजें सुनाई पड़ीं. उस ने सोचा कि शायद पिंकी की कोई सहेली आई है और वह उस से बातें कर रही है. यों जाना ठीक नहीं , खिड़की से झांक लेता हूं कि कौन है.

उस ने खिड़की से झांक कर देखा तो मानो उसे चक्कर सा आ गया. उस ने देखा कि पिंकी और प्रमोद अर्धनग्न अवस्था में एकदूसरे से लिपटे हुए हैं. प्रमोद पिंकी से कह रहा था, ‘‘तुम्हारे पापा मेरी मम्मी से रोमांस करते हैं. एक दिन मैं ने देखा कि दोनों बैडरूम में एकदूसरे से लिपटे पड़े हैं.’’

‘‘तेरे पापा का भी मेरी मम्मी से ऐसा ही रिश्ता है. एक दिन मैं ने भी उन्हें सामने वाले कमरे में एकदूसरे से लिपटे देखा,’’ पिंकी बोली.

‘‘क्या मजेदार बात है. तेरे पापा मेरी मम्मी से और मेरी मम्मी तेरे पापा से रोमांस कर रही हैं और हम दोनों एकदूसरे से,’’ कह कर प्रमोद हंस पड़ा.

‘‘लेकिन यार, वे लोग तो शादीशुदा हैं. कुछ गड़बड़ हो गई तो भी किसी को पता नहीं चलेगा. पर हम लोगों के बीच कुछ हो गया तो मैं मुसीबत में पड़ जाऊंगी.’’

‘‘तुम चिंता मत करो, मैं कंडोम लाया हूं न.’’

‘‘तुम हो बड़े समझदार,’’ कह पिंकी ने खिलखिलाते हुए प्रमोद को भींच लिया.

आगे कुछ सुन पाना अनिरुद्ध के बस में न था. वह किसी तरह हिम्मत बटोर कर अपने कमरे तक आया और बिस्तर पर निढाल पड़ गया. आज वह खुद की निगाहों में ही गिर गया था. वह किसी से कुछ कह भी तो नहीं सकता था. बेटी तक से नहीं. अगर कुछ कहा और पिंकी ने भी पलट कर जवाब दे दिया तो  वह खुद को ही दोषी मान रहा था कि अपने क्षणिक सुख के लिए उस ने जो कुछ किया, अब उसी राह पर बच्चे भी चल पड़े हैं. उस की हरकतों के कारण बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया. कितना अंधा हो गया था वह. अंजलि को भी क्या कहे वह. इस सब के लिए वह खुद जिम्मेदार है. शुरुआत तो उस ने ही की.

रात को अनिरुद्ध ने खाना भी नहीं खाया. रात भर वह दुख और पश्चात्ताप की आग में जलता रहा और रो कर खुद को हलका करता रहा. सुबह होने से पहले ही उस ने सोचा कि जो हो गया, रोने से कोई फायदा नहीं. फिर अब क्या किया जाए, इस पर वह सोचताविचारता रहा.

थोड़ी देर में ही वह निर्णय पर पहुंच गया और सुबह होते ही उस ने कंपनी के जीएम से फोन पर अपना स्थानांतरण करने का निवेदन किया. जीएम उस के काम से सदैव खुश रहते थे, इसलिए उन्होंने उस के निवेदन को स्वीकार करने में तनिक भी देर न लगाई. उस का स्थानांतरण उसी पल कोलकाता कर दिया.

4 दिन बाद अनिरुद्ध परिवार सहित कोलकाता की ट्रेन पर सवार हो गया. किसी को भी न पता चला कि क्या हुआ. अनिरुद्ध ने सारा राज अपने सीने में दफन कर लिया.

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