बड़बोला: कैसे हुई विपुल की बहन की शादी- भाग 3

विपुल की बहन की शादी के दिन पूरे आफिस का स्टाफ नए शानदार चमकते कपड़े पहन कर आफिस आया. ऐसा लगा मानो आफिस बरातघर बन गया हो. महेश को संबोधित करते हुए मैं ने पूछा, ‘‘क्या बात है, श्वेता नजर नहीं आ रही?’’

‘‘सर, आप भी क्या मजाक करते हैं, शादी से पहले अपनी ससुराल कैसे जा सकती है. बस, आज बहन की शादी हो जाए, अगले महीने विपुल का भी बैंड बजा समझें.’’ लंच के बाद सभी बस अड्डे पहुंच गए. थोड़ी देर इंतजार करने के बाद नवगांव की बस मिली. लगभग 4 बजे बस चली. बस चलते ही महेश और सुषमा शादी की बातें करने लगे, खासतौर से शादी के इंतजाम के बारे में और मैं उन की पिछली सीट पर बैठा मंदमंद मुसकराने लगा. तभी मेरे साथ सीट पर बैठे सज्जन ने बीड़ी सुलगाई और मेरे से पूछा, ‘‘भाई साब, क्या आप भी इन लोगों के साथ नवगांव जा रहे हैं बिहारी की छोरी की शादी में?’’

‘‘आप की बात मैं समझा नहीं,’’ मैं ने बीड़ी वाले सज्जन से पूछा. बीड़ी का कश लगाते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम बांके है. मैं और बिहारी अनाज मंडी में दलाली करते हैं. बिहारी का छोरा नवयुग सिटी में किसी बड़े दफ्तर में काम करता है. ऐसा लगता है कि आप लोग उसी दफ्तर में काम करते हैं और उस की बहन की शादी में जा रहे हैं. मैं आप लोगों की बातों से समझ गया कि आप वहीं जा रहे हो, क्योंकि इतनी लंबी बातें पूरे नवगांव में बिहारी का खानदान ही कर सकता है. अगर इतना ही अमीर होता तो उस का लड़का 3 हजार की नौकरी करता, ठाट से 18 ट्रक चलाता.

‘‘बिहारी के महल्ले में रहता हूं, आप सब जिस दाल मिल की बात कर रहे हैं उसे बंद हुए 10 साल हो गए हैं. मैं और बिहारी उस दाल मिल में नौकरी करते थे. जब मिल बंद हुई तब से अनाज मंडी में दलाली कर रहे हैं,’’ बीड़ी का कश लगाते हुए बांके की आवाज में व्यंग्य था. बांके की बातें सुन कर हम सब सकते में आ गए. सब की बोलती बंद हो गई और भौचक से एकदूसरे की शक्ल देखने लगे. साहस जुटा कर बड़ी मुश्किल से आवाज निकाल कर सुषमा बोली, ‘‘अंकल, आप सच कह रहे हो, कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हो.’’

बांके ने एक और बीड़ी सुलगाई, फिर कश लगाते हुए बोला, ‘‘नवगांव पहुंच कर देख लेना. मेरी कोई दुश्मनी थोड़े है. इतना गपोड़ी निकलेगा, पता नहीं था. पूरा नवगांव बिहारी को एक नंबर का गपोड़ी मानता है पर बेटा तो बाप से भी दस कदम आगे निकला.’’

अब बाकी का रास्ता काटना दूभर हो गया. सभी इस सोच में थे कि जल्दी से नवगांव आ जाए और हकीकत से सामना करें. तभी बस एक पुरानी बिल्ंिडग के सामने रुकी. तब बांके ने कहा, ‘‘नवगांव आ गया, यह खंडहर ही दाल मिल है, जहां बिहारी क ा छोरा 18 ट्रक चला रहा है.’’ हम सब टूटे मन से बस से उतरे. अब करते भी क्या, कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. जो दाल मिल 10 साल से बंद है उस की हालत खंडहर से कम क्या और ज्यादा क्या. कच्ची टूटी सड़क पर हम कारपेट ढूंढ़ते रह गए. अब स्टाफ का सब्र टूट गया, सब विपुल को गालियां निकालने लगे, अपनी झूठी शान के लिए विपुल इतना बड़ा झूठ बोलेगा, इस की उम्मीद किसी को नहीं थी.

तभी सामने से एक तांगे में कुछ कारपेट और कुरसियों के साथ विपुल आता दिखाई दिया. उसे देख कर सुषमा जोर से चिल्लाई, ‘‘विपुल के बच्चे, नीचे उतर. हमें बेवकूफ बना कर कहां जा रहा है. इन टूटी गड्ढे वाली सड़कों पर चल कर हमारी टांगें टूट गई हैं और तू मजे में तांगे की सवारी कर रहा है.’’ हमें देख कर विपुल तांगे से नीचे आ कर बोला, ‘‘आइए सर, कारपेट बिछने के लिए गली में जा रहे हैं. बांके अंकल, तांगे का सामान घर पहुंचवा दो, मैं सर के साथ हवेली जाता हूं.’’

महेश ने विपुल का कालर पकड़ कर पूछा, ‘‘बेटे, इतना झूठ बोलने की क्या जरूरत थी. इतने महंगे कपड़े पहन कर आए, सब खराब करवा दिए, अगर सच बता देता तब भी शादी में आते, तब और ज्यादा खुशी होती. पागल बना कर रख दिया, अब राष्ट्रपति भवननुमा हवेली के दर्शन भी करवा दे, उस को भी देख कर तृप्त हो जाएं.’’ शायद विपुल को हमारे आने की उम्मीद नहीं थी. एक पल के लिए वह हमें देख कर सन्न रह गया, लेकिन हर बड़बोले की तरह चतुराई से बातें बनाने लगा. ऐसे व्यक्ति आदत से मजबूर…हार नहीं मानते. बात को पलटते हुए बोला, ‘‘आइए सर, हवेली चलते हैं. आप सफर में थक गए होंगे, कुछ जलपान कर लेते हैं.’’

थोड़ी देर पैदल चलने के बाद हम सब हवेली में पहुंच गए. हवेली एक पुरानी इमारत निकली. हवेली को देख कर लगता था कि किसी समय जमींदार की रिहाइश रही होगी, जो अब एक धर्मशाला बन कर रह गई है, जिस के 2 तरफ कमरे बने हुए थे और बाकी 2 तरफ खाली मैदान. रोशनी के नाम पर 3-4 खंभों पर बल्ब लटक रहे थे. 2-3 कमरों में कुछ हलचल हो रही थी, जहां वरपक्ष के पुरुष तैयार हो रहे थे, कुछ महिलाएं तैयार हो कर तांगे पर बैठ कर जा रही थीं. तभी विपुल ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘हमारे यहां औरतें बरात के साथ नहीं जातीं, इसीलिए पहले हमारे घर जा रही हैं.’’

हलवाई ने विपुल के आग्रह पर कुछ पकौड़े तल दिए और चाय बना दी. जलीभुनी बैठी सुषमा जलीकटी सुनाने लगी, ‘‘विपुल, तू ने यह अच्छा काम नहीं किया, इतना झूठ तो कोई अपने दुश्मन से भी नहीं बोलता. सारा मेकअप खराब हो गया, इतनी महंगी साड़ी धूल से सन गई, ड्राईक्लीनिंग के पैसे तेरे से लूंगी.’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ झेंपती हंसी के साथ विपुल बोला.

‘‘इतनी भूख लग रही है और खिलाने को तुझे ये सड़े हुए बैगन और सीताफल के पकौड़े ही मिले थे. नहीं चाहिए तेरी दावत. इस से तो उपवास अच्छा,’’ कहते हुए सुषमा ने पकौड़े की प्लेट विपुल को ही पकड़ा दी. विपुल ने एक पकौड़ा मुंह में डालते हुए कहा, ‘‘सुषमा, नाराज नहीं होते, फाइव स्टार होटल से अच्छे पकौड़े हैं.’’ ‘‘तेरे घर का एक बूंद पानी भी नहीं पीना,’’ सुषमा तमतमाती हुई बोली.

Raksha Bandhan: कड़वा फल -भाग 3

‘‘रवि, अगर तुम्हारे पापा ने मेरे पापा से लिए पुराने कर्ज को वक्त से वापस कर दिया होता, तो शायद बात बन जाती. मेरे पापा की राय में तुम्हारे मम्मीडैडी फुजूलखर्च इनसान हैं, जिन्हें बचत करने का न महत्त्व मालूम है और न ही उन की आदतें सही हैं. मेरे पापा एक सफल बिजनेसमैन हैं. जहां से रकम लौटाने की उम्मीद न हो, वे वहां फंसेंगे ही नहीं,’’ अरुण के मुंह से ऐसी बातें सुनते हुए मैं ने खुद को काफी शर्मिंदा महसूस किया था.

दादाजी, चाचाओं और बूआओं से हमारे संबंध ऐसे बिगड़े हुए थे कि पापा की उन से इस मामले में कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं पड़ी.

मम्मी ने भी अपने रिश्तेदारों व सहेलियों से कर्ज लेने की कोशिश की, पर काम नहीं बना. यह तथ्य प्रमाणित ही है कि जिन की अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है उन्हें बैंक और परिचित दोनों ही आर्थिक सहायता देने को तैयार रहते हैं. मेरी राय में अगर मम्मीपापा के पास अपनी बचाई आधी रकम भी होती, तो बाकी आधी का इंतजाम कहीं न कहीं से वही रकम करवा देती

अंतत: मैडिकल कालेज में प्रवेश लेने की तिथि निकल गई. उस दिन हमारे घर में गहरी उदासी का माहौल बना रहा. पापा ने मुझे गले लगा कर मेरा हौसला बढ़ाने की कोशिश की, तो मैं रो पड़ा. मेरे आंसू देख कर मम्मीपापा और छोटी बहन शिखा की पलकें भी भीग उठीं.

कुछ देर रो कर मेरा मन हलका हो गया, तो मैं ने मम्मीपापा से संजीदा लहजे में कहा, ‘‘जो हुआ है, उस से हमें सीख लेनी होगी. आगे शिखा के कैरियर व शादी के लिए भी बड़ी रकम की जरूरत पड़ने वाली है. उस का इंतजाम करने के लिए हमें अपने जीने का ढंग बदलना होगा, मम्मीपापा.’’

‘‘मेहनती और होशियार बच्चे अपने मातापिता से बिना लाखों का खर्चा कराए भी काबिल बन जाते हैं. रवि, तुम अपनी नाकामयाबी के लिए न हमें दोष दो और न ही हम पर बदलने के लिए बेकार का दबाव बनाओ,’’ मम्मी एकदम से चिढ़ कर गुस्सा हो गईं.

पापा ने मेरे जवाब देने से पहले ही उदास लहजे में कहा, ‘‘मीनाक्षी, रवि का कहना गलत नहीं है. छोटे मकान में रह कर, फुजूलखर्ची कम कर के, छोटी कार, कम खरीदारी और सतही तड़कभड़क के आकर्षण में उलझने के बजाय हमें सचमुच बचत करनी चाहिए थी. आज हमारी गांठ में पैसा होता, तो रवि का डाक्टर बनने का सपना पूरा हो सकता था.’’

‘‘ऐसा होता, तो वैसा हो जाता, ऐसे ढंग से अतीत के बारे में सोचने से चिंता और दुखों के अलावा कुछ हाथ नहीं आता है,’’ मम्मी भड़क कर बोलीं, ‘‘हमें भी अपने ढंग से जिंदगी जीने का अधिकार है. रवि और शिखा को हम ने आज तक हर सुखसुविधा मुहैया कराई है. कभी किसी तरह की कमी नहीं महसूस होने दी.

‘‘डाक्टर बनने के अलावा और भी कैरियर इस के सामने हैं. दिल लगा कर मेहनत करने वाला बच्चा किसी भी लाइन में सफल हो जाएगा. कल को ये बच्चे भी अपने ढंग से अपनी जिंदगी जिएंगे या हमारी सुनेंगे?’’

‘‘तुम भी ठीक कह रही हो,’’ पापा गहरी सांस छोड़ कर उठ खड़े हुए, ‘‘रवि बेटा, जैसा तुम चाहो, जिंदगी में वैसा ही हो, इस की कोई गारंटी नहीं होती. दिल छोटा मत करो. इलैक्ट्रौनिक्स आनर्स में तुम ने प्रवेश लिया हुआ है. मेहनत कर के उसी लाइन में अपना कैरियर बनाओ.’’

कुछ देर बाद मम्मीपापा अपने दुखों व निराशा से छुटकारा पाने को क्लब चले गए. शिखा और मैं बोझिल मन से टीवी देखने लगे.

कुछ देर बाद शिखा ने अचानक रोंआसी हो कर कहा, ‘‘भैया, मम्मीपापा कभी नहीं बदलेंगे. भविष्य में आने वाले कड़वे फल उन्हें जरूर नजर आते होंगे, पर वर्तमान की सतही चमकदमक वाली जिंदगी जीने की उन्हें आदत पड़ गई है. उन से बचत की उम्मीद हमें नहीं रखनी है. हम दोनों एकदूसरे का सहारा बन कर अपनीअपनी जिंदगी संवारेंगे.’’

मैं ने शिखा को गले से लगा लिया. देर तक वह मेरा कंधा अपने आंसुओं से भिगोती रही. अपने से 5 साल छोटी शिखा के सुखद भविष्य का उत्तरदायित्व सुनियोजित ढंग से उठाने के संकल्प की जड़ें पलपल मेरे मन में मजबूत होती जा रही थीं.

 

वह रात : क्या था उस रात का राज – भाग 3

तनु ने मुझे धीरे से छुआ, तो मैं ने उस की ओर देखा. उस ने इशारे से मुझे बाहर चलने को कहा. चाह तो मैं भी यही रही थी. सो, हम दोनों चुपचाप बाहर निकल आईं.

अब तक बरसात कुछ कम हो गई थी. बरामदे के नीचे के हिस्से में आग जल रही थी और उस की रोशनी में बरामदे से बाहर उन लोगों की परछाइयां दिखाई दे रही थीं.

तीनों आपस में धीरेधीरे बातें कर रहे थे और अंगीठी पर अपने कपड़े सुखा रहे थे. हम दोनों और भी चुप हो कर उन की बातें सुनने लगी थीं.

मैं सोच रही थी कि एक हिसाब से तो हरीश की बात में सच था. आजकल चोरियां भी बढ़ गई थीं और गांव में शाम से ही बिजली भी नहीं थी. अंधेरे में हम उन तीनों को ठीक से पहचान भी नहीं पाए थे. हरीश ने भी रामू को आवाज से ही पहचाना था. अब उन के बात करने से पता चला कि उन में से एक रामू का ताऊ है यानी बूढ़ा आदमी.

‘‘ताऊजी, अगर आज मांजी घर पर न होतीं, तो हम तीनों तो किसी बाघभालू के पेट में होते या फिर सुबह हमारी लाशें सड़क पर मिलतीं, ठंड से सिकुड़ कर,’’ रामू की आवाज खुशी से कांप रही थी.

‘‘बेटे ने तो साफ मना कर दिया था, पर इन का भी क्या कुसूर है. न तो अंधेरे में कोई किसी को पहचान पा रहा है और न ही आजकल किसी पर भरोसा किया जा सकता है. दुनिया में चोरउचक्के भी तो बहुत बढ़ गए हैं.’’

एक दूसरी आवाज उभरी, ‘‘क्यों ताऊजी, आप भी कुछ बोलें न?’’

‘‘तुम दोनों की ही बात ठीक है बेटा, पर मैं तो कुछ और ही सोच रहा हूं,’’ ताऊ ने कहा.

‘क्या ताऊजी?’ वे दोनों एकसाथ बोल उठे.

‘‘देखो, ऊपर से कोई आवाज नहीं आ रही है. कैसे निश्चिंत हो कर सो गई है वह औरत. घर में कोई बड़ा मरद भी नहीं है और 3 अजनबी मरद घर में हैं, पर उसे कोई डर भी नहीं.’’

‘‘इस का क्या मतलब हुआ?’’ रामू ने पूछा.

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि यह औरत किसी बड़े अच्छे संस्कार वाले घर की बेटी है. जरूर इस के मातापिता ने इसे सारे जीवों पर दया करना सिखाया है. ऐसे इनसान के साथ धोखा करने वाला कोई निपट नीच ही होगा. कम से कम मुझे तो ऐसा ही जान पड़ता है.

‘‘सच में बहुत ही संस्कारी औरत है यह. पर इस के बेटे में इस के संस्कार क्यों नहीं आए, यह जरूर सोचने की बात है?’’

हम दोनों ने एकदूसरे की ओर देखा और धीरे से जैसे बाहर आई थीं, वैसे ही भीतर जा कर बिस्तर पर लेट गईं और सोने की कोशिश करने लगीं.

चाची तो पहले ही गहरी नींद सो रही थीं.

 

मां बेटी – कौन थे उन दोनों के जिस्म के प्यासे

Story in Hindi

Raksha bandhan: अब हमारी बारी है-भाइयों ने बनाया बहन को सफल – भाग 3

‘‘मैं शादी नहीं करना चाहती हूं,’’ अंजलि रुंधी आवाज में बोली.

‘‘तो मत करना, पर घर आए मेहमान का स्वागत करने तो चलो,’’ और अरुण उस का हाथ पकड़ कर ड्राइंगरूम की तरफ चल पड़ा. अंजलि की आंखों में चिंता और बेचैनी के भाव और बढ़ गए थे.

ड्राइंगरूम में नीरज को तीनों छोटे बच्चों ने घेर रखा था. उस के सामने उन्होंने कई पैंसिलें और ड्राइंगपेपर रखे हुए थे. नीरज चित्रकार था. वे सब अपनाअपना चित्र पहले बनवाने के लिए शोर मचा रहे थे. उन के खुले व्यवहार से यह साफ जाहिर हो रहा था कि नीरज ने उन तीनों के दिल चंद मिनटों की मुलाकात में ही जीत लिए थे.

अरुण की 6 वर्षीय बेटी महक ने चित्र बनवाने के लिए गाल पर उंगली रख कर इस अदा से पोज बनाया कि कोई भी बड़ा व्यक्ति खुद को हंसने से नहीं रोक पाया.

अंजलि ने हंसतेहंसते महक का माथा चूमा और फिर हाथ जोड़ कर नीरज का अभिवादन किया.

‘‘यह तुम्हारे लिए है,’’ नीरज ने खड़े हो कर एक चौड़े कागज का रोल अंजलि के हाथ

में पकड़ाया.

‘‘आप की बनाई कोई पेंटिंग है इस में?’’ अरुण की पत्नी मंजु ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘जी, हां,’’ नीरज ने शरमाते हुए जवाब दिया.

‘‘हम सब इसे देख लें, दीदी?’’ अंजलि के छोटे भाई अजय की पत्नी शिखा ने प्रसन्न लहजे में पूछा.

अंजलि ने रोल शिखा को पकड़ा दिया.

वह अपनी जेठानी की सहायता से गिफ्ट पेपर खोलने लगी.

नीरज ने अंजलि को उसी का रंगीन पोर्ट्रेट बना कर भेंट किया था. तसवीर बड़ी सुंदर बनी थी. सब मिल कर तसवीर की प्रशंसा करने लगे.

अंजलि ने धीमी आवाज में नीरज से प्रश्न किया, ‘‘यह कब बनाई आप ने?’’

‘‘क्या तुम्हें अपनी तसवीर पसंद नहीं आई?’’ नीरज ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘तसवीर तो बहुत अच्छी है… पर आप ने बनाई कैसे?’’

‘‘शिखा ने तुम्हारा 1 पासपोर्ट साइज फोटो दिया था. कुछ उस की सहायता ली और बाकी काम मेरी कल्पनाशक्ति ने किया.’’

‘‘कलाकार को सत्य दर्शाना चाहिए, नीरजजी. मैं तो बिलकुल भी सुंदर नहीं हूं.’’

‘‘मैं ने इस कागज पर सत्य ही उतारा है… मु झे तुम इतनी ही सुंदर नजर आती हो.’’

नीरज की इस बात को सुन कर अंजलि ने कुछ घबरा और कुछ शरमा कर नजरें  झुका लीं.

सब लोग नीरज के पास आ कर अंजलि की तसवीर की प्रशंसा करने लगे. अंजलि ने कभी अपने रंगरूप की वैसी तारीफ नहीं सुनी थी, इसलिए असहज सी हो कर नीरज के लिए चाय बनाने रसोई में चली गई.

नीरज से उस की पहली मुलाकात शिखा ने अपनी सहेली कविता के घर पर करीब

2 महीने पहले करवाई थी.

42 वर्षीय चित्रकार नीरज कविता के जेठ थे. उन्होंने शादी नहीं की थी. घर की तीसरी मंजिल पर 1 कमरे के सैट में रहते थे और वहीं उन का स्टूडियो भी था.

उस दिन नीरज के स्टूडियो में अपना पैंसिल से बनाया एक चित्र देख कर वह चौंकी थी. नीरज ने खुलासा करते हुए उन सब को जानकारी दी थी, ‘‘अंजलि पार्क में 3 छोटे बच्चों के साथ घूमने आई थीं. बच्चे खेलने में व्यस्त हो गए और ये बैंच पर बैठीबैठी गहरे सोचविचार में खो गईं. मैं ने इन की जानकारी में आए बिना इस चित्र में इन के चेहरे के विशेष भावों को पकड़ने की कोशिश की थी.’’

‘‘2 दिन पहले अंजलि दीदी का यह चित्र यहां देख कर मैं चौंकी थी. मैं ने भाई साहब को दीदी के बारे में बताया, तो इन्होंने दीदी से मिलने की इच्छा जाहिर की. तभी मैं ने 2 दिन पहले तुम्हें फोन किया था, शिखा,’’ कविता के इस स्पष्टीकरण को सुन कर अंजलि को पूरी बात सम झ में आ गई थी.

कुछ दिनों बाद कविता उसे बाजार में मिली और अपने घर चाय पिलाने ले गई. अपने बेटे की चौथी सालगिरह की पार्टी में भी उस ने अंजलि को बुलाया. इन दोनों अवसरों पर उस की नीरज से खूब बातें हुईं.

इन 2 मुलाकातों के बाद नीरज उसे पार्क में कई बार मिला था. अंजलि वहां अपने भतीजों व भतीजी के साथ शाम को औफिस से आने के बाद अकसर जाती थी. वहीं नीरज ने उस का मोबाइल नंबर भी ले लिया था. अब वे फोन पर भी बातें कर लेते थे.

फिर कविता और शिखा ने एक दिन उस के सामने नीरज के साथ शादी करने की

चर्चा छेड़ी, तो उस ने उन दोनों को डांट दिया, ‘‘मु झे शादी करनी होती तो 10 साल पहले कर लेती. इस  झं झट में अब फंसने का मेरा रत्ती भर इरादा नहीं है. मेरे सामने ऐसी चर्चा फिर कभी मत करना,’’ उन्हें यों डपटने के बाद वह अपने कमरे में चली आई थी.

उस दिन के बाद अंजलि ने नीरज के साथ मिलना और बातें करना बिलकुल कम कर दिया. उस ने पार्क में जाना भी छोड़ दिया. फोन पर भी व्यस्तता का  झूठा बहाना बना कर जल्दी फोन काट देती.

उस की अनिच्छा को नजरअंदाज करते हुए उस के दोनों छोटे भाई और भाभियां अकसर नीरज की चर्चा छेड़ देते. उस से हर कोई कविता के घर या पार्क में मिल चुका था. सभी उसे हंसमुख और सीधासादा इंसान मानते थे. उन के मुंह से निकले प्रशंसा के शब्द यह साफ दर्शाते कि उन सब को नीरज पसंद है.

अंजलि की कई बार की नाराजगी उन की इस इच्छा को जड़ से समाप्त करने में असफल रही थी. किसी को यह बात नहीं जंची थी कि अंजलि ने नीरज से बातें करना कम कर दिया है.

उन के द्वारा रविवार को नीरज को लंच पर आमंत्रित करने के बाद ही इस बात की सूचना अंजलि को पिछली रात को मिली थी.

कुछ देर बाद जब अंजलि चाय की ट्रे ले कर ड्राइंगरूम में दाखिल हुई, तो वहां बहुत शोर मचा था. नीरज ने तीनों बच्चों के पैंसिल स्कैच बड़े मनोरंजक ढंग से बनाए थे. नन्हे राहुल की उन्होंने बड़ीबड़ी मूंछें बना दी थीं. महक को पंखों वाली परी बना दिया था और मयंक के चेहरे के साथ शेर का धड़ जोड़ा था.

इन तीनों बच्चों ने बड़ी मुश्किल से नीरज को चाय पीने दी. वे उस के साथ अभी और खेलना चाहते थे.

‘‘बिलकुल मेरी पसंद की चाय बनाई है तुम ने, अंजलि. चायपत्ती तेज और चीनी व दूध कम. थैंक्यू,’’ पहला घूंट भरते ही नीरज ने अंजलि को

धन्यवाद दिया.

‘‘कविता ने एक बार दीदी को बताया था कि आप कैसी चाय पीते

हैं. दीदी ने उस के कहे को याद रखा और आप की मनपसंद चाय बना दी,’’ शिखा की इस बात को सुन कर अंजलि पहले शरमाई और फिर बेचैनी से भर उठी.

‘‘चाय मेरी कमजोरी है. एक वक्त था

जब मैं दिन भर में 10-12 कप चाय पी लेता था,’’ नीरज ने हलकेफुलके अंदाज में बात

आगे बढ़ाई.

‘‘आप जो भी तसवीर बनाते हैं, उस में चेहरे के भाव बड़ी खूबी से उभारते हैं,’’ शिखा ने उस की तारीफ की.

‘‘इतनी अच्छी तसवीरें भी नहीं बनाता हूं मैं.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रहे हैं?’’

‘‘क्योंकि मेरी बनाई तसवीरें इतनी ही ज्यादा शानदार होतीं तो खूब बिकतीं. अपने चित्रों के बल पर मैं हर महीने कठिनाई से 5-7 हजार कमा पाता हूं. मेरा अपना गुजारा मुश्किल से चलता है. इसीलिए आज तक घर बसाने की हिम्मत नहीं कर पाया.’’

‘‘शादी करने के बारे में क्या सोचते हैं अब आप?’’ अरुण ने सवाल उठाया तो नीरज सब की दिलचस्पी का केंद्र बन गया.

‘‘जीवनसाथी की जरूरत तो हर उम्र के इंसान को महसूस होती ही है, अरुण. अगर मु झ जैसे बेढंगे कलाकार के लिए कोई लड़की होगी, तो किसी दिन मेरी शादी भी हो जाएगी,’’ हंसी भरे अंदाज में ऐसा जवाब दे कर नीरज ने खाली कप मेज पर रखा और फिर से बच्चों के साथ खेल में लग गया.

नीरज वहां से करीब 5 बजे शाम को गया. तीनों बच्चे उस के ऐसे प्रशंसक बन गए थे कि उसे जाने ही नहीं देना चाहते थे. बड़ों ने भी उसे बड़े प्रेम और आदरसम्मान से विदाई दी थी.

उस के जाते ही अंजलि बिना किसी से कुछ कहेसुने अपने कमरे में चली आई. अचानक उस का मन रोने को करने लगा, पर आंसू थे कि पलकें भिगोने के लिए बाहर आ ही नहीं रहे थे.

करीब 15 मिनट बाद अंजलि के दोनों छोटे भाई और भाभियां उस से मिलने कमरे में आ गए. उन के गंभीर चेहरे देखते ही अंजलि उन के आने का मकसद सम झ गई और किसी के बोलने से पहले ही भड़क उठी, ‘‘मैं बिलकुल शादी नहीं करूंगी. इस टौपिक पर चर्चा छेड़ कर कोई मेरा दिमाग खराब करने की कतई कोशिश न करे.’’

अजय उस के सामने घुटने मोड़ कर फर्श पर बैठ गया और उस का दूसरा हाथ

प्यार से पकड़ कर भावुक स्वर में बोला, ‘‘दीदी, 12 साल पहले पापा के असमय गुजर जाने के बाद आप ही हमारा मजबूत सहारा बनी थीं. आप ने अपनी खुशियों और सुखसुविधाओं को नजरअंदाज कर हमें काबिल बनाया… हमारे घर बसाए. हम आप का वह कर्ज कभी नहीं चुका पाएंगे.’’

‘‘पागल, मेरे कर्तव्यों को कर्ज क्यों सम झ रहा है? आज तुम दोनों को खुश और सुखी देख कर मु झे बहुत गर्व होता है,’’  झुक कर अजय का सिर चूमते हुए अंजलि बोली.

अरुण ने भरे गले से बातचीत को आगे बढ़ाया, ‘‘दीदी, आप के आशीर्वाद से आज हम इतने समर्थ हो गए हैं कि आप की जिंदगी में

भी खुशियां और सुख भर सकें. अब हमारी

बारी है और आप प्लीज इस मौके को हम दोनों से मत छीनो.’’

‘‘भैया, मु झ पर शादी करने का दबाव न बनाओ. मेरे मन में अब शादी करने की इच्छा नहीं उठती. बिलकुल नए माहौल में एक नए इंसान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का खयाल ही मन को डराता है,’’ अंजलि ने कांपती आवाज में अपना भय पहली बार सब को बता दिया.

‘‘लेकिन…’’

‘‘दीदी, नीरजजी बड़े सीधे, सच्चे और नेकदिल इंसान हैं. उन जैसा सम झदार जीवनसाथी आप को बहुत सुखी रखेगा… बहुत प्यार देगा,’’ अरुण ने अंजलि को शादी के विरोध में कुछ बोलने ही नहीं दिया.

‘‘मैं तो तुम सब के साथ ही बहुत सुखी हूं. मु झे शादी के  झं झट में नहीं पड़ना है,’’ अंजलि

रो पड़ी.

‘‘दीदी, हम आप की विवाहित जिंदगी में  झं झट पैदा ही नहीं होने देंगे,’’ उस की बड़ी भाभी मंजु ने उस का हौसला बढ़ाया, ‘‘हमारे होते किसी तरह की कमी या अभाव आप दोनों को कभी महसूस नहीं होगा.’’

‘‘मैं जानता हूं कि नीरजजी अपने बलबूते पर अभी मकान नहीं बना सकते हैं. इसलिए हम ने फैसला किया है कि अपना नया फ्लैट हम तुम दोनों के नाम कर देंगे,’’ अरुण की इस घोषणा को सुन कर अंजलि चौंक पड़ी.

अजय ने अपने मन की बात बताई, ‘‘भैया से उपहार में मिले फ्लैट को सुखसुविधा की हर चीज से भरने की जिम्मेदारी मैं खुशखुशी उठाऊंगा. जो चीज घर में है, वह आप के फ्लैट में भी होगी, यह मेरा वादा है.’’

‘‘आप के लिए सारी ज्वैलरी मैं अपनी तरफ से तैयार कराऊंगी,’’ मंजु ने अपने मन की इच्छा जाहिर की.

‘‘आप के नए कपड़े, परदे, फ्लैट का नया रंगरोगन और मोटरसाइकिल भी हम देंगे आप को उपहार में. आप बस हां कर दो दीदी,’’ आंसू बहा रही शिखा ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की तो अंजलि ने खड़े हो कर उसे गले से लगा लिया.

‘‘दीदी ‘हां’ कह दो,’’ अंजलि जिस की तरफ भी देखती, वही हाथ जोड़ कर यह प्रार्थना दोहरा देता.

‘‘ठीक है, लेकिन शादी में इतना कुछ मु झे नहीं चाहिए. तुम दोनों कोई करोड़पति नहीं हो, जो इतना कुछ मु झे देने की कोशिश करो,’’ अंतत: बड़ी धीमी आवाज में अंजलि ने अपनी स्वीकृति दे दी.

‘‘हुर्रा,’’ वे चारों छोटे बच्चों की तरह खुशी से उछल पड़े.

अंजलि के दिलोदिमाग पर बना तनाव का बो झ अचानक हट गया और उसे अपनी जिंदगी भरीभरी और खुशहाल प्रतीत होने लगी.

 

बड़बोला: कैसे हुई विपुल की बहन की शादी- भाग 2

‘‘सर, मुझे लगता है कि अनुभव लेने के लिए विपुल नौकरी कर रहा है. साल दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर वह अपने व्यापार में पिता का हाथ बटाएगा.’’

‘‘मेरा अनुभव यह कहता है कि अमीर घराने के बच्चे कभी नौकरी नहीं करते हैं, पढ़ाई के बाद अपने घर के व्यापार में जुट जाते हैं. आई.ए.एस. की नौकरी या मैनेजमेंट डिगरी के बाद किसी मैनेजर के पद पर नौकरी तो समझ में आती है, लेकिन एक क्लर्क की नौकरी कोई बड़ा व्यापारी अपने बच्चों से नहीं करवाता है.’’

‘‘आप के कहने में वजन है, सर,’’ महेश बोला, ‘‘लेकिन हमें इस से क्या मतलब, अपन तो दावत का मजा लेते हैं.’’

महेश के जाने के बाद मेरी नजर रिसेप्शन पर गई तो देखा, विपुल श्वेता और सुषमा के साथ हंसहंस कर अपनी दी हुई पार्टी के मजे ले रहा था. मैं सोचने लगा कि कहीं यह दावत लड़कियों को प्रभावित करने के लिए तो नहीं कर रहा.

एक दिन आफिस से घर जाते हुए सामान खरीदने के लिए बाजार गया. शाम के समय बाजार में बहुत भीड़ रहती है, बाजार में सामान खरीदते समय मुझे एहसास हुआ कि विपुल श्वेता के साथ हंसता हुआ हाथ में हाथ डाले टहल रहा था. दोनों एकदूसरे से चिपके हुए अपने में मस्त दुनिया से बेखबर मुझे भी नहीं देख सके. 2 हंसों का जोड़ा पे्र्रम की गहराई में उतर चुका था. युवा प्रेमी को डिस्टर्ब करना मैं ने उचित नहीं समझा. मैं सामान खरीद कर घर आ गया.

घर आ कर मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि विपुल कब नवगांव जाता होगा और कैसे टाइम मैनेज करता होगा. आफिस में विपुल और श्वेता की नजदीकियां अधिक बढ़ने लगीं. चाय ब्रेक में दोनों एकसाथ चाय पीते नजर आते और लंच टाइम में एकसाथ खाना खाते. काम के बीच में विपुल झट से किसी न किसी बहाने श्वेता से चंद बातें कर आता. धीरेधीरे विपुल और श्वेता का प्रेम परवान चढ़ गया. आफिस में सब की जबान पर सिर्फ विपुल और श्वेता के प्रेम प्रसंग के चर्चे थे.

एक दिन लंच में मैं आराम कर रहा था. महेश केबिन में आ कर सामने कुरसी खींच कर बैठ गया.

‘‘सर, आप ने नई खबर सुनी?’’

‘‘मुझे पुरानी की खबर नहीं, तुम नई की बात कर रहे हो. तुम्हारी शक्ल से लगता है कि कोई सनसनीखेज खबर है.’’

‘‘सर, आप के लिए सनसनी होगी. आप आफिस आते हैं, काम कर के चले जाते हैं. आप को दीनदुनिया की कोई खबर नहीं होती है. हम तो परदा उठने की फिराक में कब से टकटकी लगाए बैठे हैं.’’

‘‘लेखकों की तरह भूमिका मत बांधो, महेश, सीधे बात पर आओ.’’

‘‘सीधी बात यह है सर कि विपुल और श्वेता का प्रेम एकदम परवान चढ़ चुका है. बस, अब तो शहनाई बजने की देरी है. सर, आप को मालूम नहीं, विपुल आजकल नवगांव न जा कर श्वेता के घर पर ही रह रहा है. हफ्ते में 1 या 2 दिन ही नवगांव जाता है. अंदर की खबर बताता हूं कि शादी की घोषणा होते ही श्वेता नौकरी छोड़ देगी. इतने अमीर घर जा रही है. नौकरी की क्या जरूरत है, सर.’’

‘‘क्या श्वेता के घर वाले एतराज नहीं करते? शादी से पहले घर आनाजाना तो आजकल आम बात है, लेकिन रात को सोना क्या वाकई हो सकता है? कहीं तुम लंबी तो नहीं छोड़ रहे हो?’’

‘‘कसम लंगोट वाले की, एकदम सच बोल रहा हूं.’’

‘कसम लंगोट वाले की,’ यह महेश का तकिया कलाम था. मैं समझ गया कि बात में कुछ सचाई तो है, ‘‘महेश, लगता है आजकल हम लोग आफिस में काम कम और इधरउधर की बातों में अधिक ध्यान दे रहे हैं,’’ मैं ने बात पलटते हुए कहा.

‘‘सर, आप ऐसी बातें मुझ से नहीं कर सकते हैं. आप को मालूम है कि सारा काम समाप्त करने के बाद ही मैं आप से गपशप करता हूं,’’ महेश मेरी बात का बुरा मान गया.

‘‘महेश, मैं तुम्हारी बात नहीं कर रहा हूं. मैं विपुल की सोच रहा हूं कि आजकल जब देखो, वह श्वेता के इर्दगिर्द ही मंडराता नजर आता है. अपना काम कब करता है?’’ मैं ने कुछ हैरान हो कर पूछा.

महेश हंसते हुए बोला, ‘‘सर, आप इस बात की फिक्र मत कीजिए. उस का काम जब तक समाप्त नहीं हो जाता, उसे शाम को घर जाने नहीं देता हूं, श्वेता के प्यार से उस के काम की रफ्तार गोली की तरह हो गई है. शाम तक सारा काम निबटा देता है.’’

चूंकि आफिस के काम में मुझे कोई शिकायत नहीं मिली, इसलिए विपुल और श्वेता के आपसी रिश्तों में मैं ने विशेष महत्त्व देना छोड़ दिया. दिन बीतते गए और विपुल और श्वेता के प्रेमप्रसंग के किस्से कुछ और अधिक सुनाई देने लगे. एक दिन लंच टाइम में मैं कौफी पी रहा था. तभी विपुल और महेश ने केबिन में प्रवेश किया.

‘‘सर, बधाई हो, विपुल की बहन की शादी है. आप का निमंत्रणपत्र,’’ महेश ने शादी का कार्ड मुझे दिया.

‘‘विपुल, बहुतबहुत बधाई हो,’’ मैं ने विपुल से हाथ मिलाते हुए कहा.

‘‘सर, सूखी बधाई से काम नहीं चलेगा. शादी में आप को अवश्य आ कर रौनक करनी है,’’ विपुल ने आग्रह किया.

‘‘जरूर शादी में रौनक करेंगे,’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.

शादी से 1 दिन पहले महेश ने लंच समय में कहा, ‘‘सर, कल विपुल की बहन की शादी है, पूरा स्टाफ शादी में जाएगा, कल लंच के बाद आफिस की छुट्टी. आप ने भी चलना है, कोई बहाना नहीं चलेगा.’’

‘‘देखो, महेश, शादी नवगांव में है, रात को वापस आने में देर हो सकती है, वहां से आने के लिए कोई सवारी भी नहीं मिलेगी,’’ मैं ने आशंका जताई.

‘‘सर, इस की चिंता आप मत कीजिए, वापसी का सारा प्रबंध विपुल ने कर दिया है. नवगांव के सब से अमीर परिवार में विवाह बहुत ही भव्य तरीके से हो रहा है, इसीलिए तो सारा स्टाफ जा रहा है. वहां पहुंचते ही एक चमचमाती कार हमारे और सिर्फ हमारे लिए होगी. हम उसी कार से वापस आएंगे. इसलिए आप बिलकुल चिंता न कीजिए,’’ महेश ने बहुत आराम से कहा, ‘‘ऐसी शादी देखने का मौका जीवन में केवल एक बार मिलता है, पूरे नवगांव में कारपेट बिछे होंगे, एक पुरानी हवेली में शादी का भव्य समारोह होगा.’’

विवरण सुन कर मैं ने हामी भर दी. मना किस तरह करता, आखिर इतनी भव्य शादी हम जैसे मध्यम वर्ग के लोगों को नसीब से ही देखने का मौका मिलेगा.

Raksha Bandhan: कड़वा फल- भाग 2

सुख देने व मनोरंजन करने वाली आदतों को बदलना और छोड़ना आसान नहीं होता. मम्मीपापा ने शुरू में कुछ कोशिश की, पर घूमनेफिरने की आदतें बदलने में दोनों ही नाकाम रहे.

उन्हें घर से बाहर घूमने जाने का कोई न कोई बहाना मिल ही जाता. कभी बोरियत व तनाव दूर करने तो कभी खुशी का मौका होने के कारण वे बाहर निकल ही जाते.

मैं उन के साथ नहीं जाता, पर चिढ़ और कुढ़न के कारण मुझ से पीछे पढ़ाई भी नहीं होती. मन की शिकायतें उसे पढ़ाई में एकाग्र नहीं होने देतीं.

चढ़ाई मुश्किल होती है, ढलान पर लुढ़कना आसान. वे दोनों नहीं बदले, तो मेरा संकल्प कमजोर पड़ता गया. मैं ने भी धीरेधीरे उन के साथ हर जगह आनाजाना शुरू कर दिया.

इस कारण मुझे वक्तबेवक्त मम्मीपापा की डांट व लैक्चर सुनने को मिलते. उन की फटकार से बचने के लिए मैं उन के सामने किताब खोले रहता. वे समझते कि मैं कड़ी मेहनत कर रहा हूं, पर आधे से ज्यादा समय मेरा ध्यान पढ़ने में नहीं होता.

अपनी लापरवाही के परिणामस्वरूप मैं पढ़ाई में पिछड़ने लगा. टैस्टों में नंबर कम आने पर मम्मीपापा से खूब डांट पड़ी.

‘‘अपनी लापरवाही की वजह से कल को अगर तुम डाक्टर नहीं बन पाए, तो हमें दोष मत देना. अपना जीवन संवारने की जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी है, क्योंकि अब तुम बड़े हो गए हो,’’ मारे गुस्से के मम्मी का चेहरा लाल हो गया था.

यही वह समय था जब अपने मम्मीपापा के प्रति मेरे मन में शिकायत के भाव जनमे.

‘मेरे उज्ज्वल भविष्य की खातिर मम्मीपापा अपने शौक व आदतों को कुछ समय के लिए बदल क्यों नहीं रहे हैं? सुखसुविधाओं की वस्तुएं जुटा देने से ही क्या उन के कर्तव्य पूरे हो जाएंगे? मेरे मनोभावों को समझ मेरे साथ दोस्ताना व प्यार भरा वक्त गुजारने का महत्त्व उन्हें क्यों नहीं समझ आता?’ मन में उठते ऐसे सवालों के कारण मैं रातदिन परेशान रहने लगा.

तब तक क्रैडिट कार्ड का जमाना आ गया. यह सुविधा मम्मीपापा के लिए वरदान साबित हुई. जेब में रुपए न होने पर भी वे मौजमस्ती की जिंदगी जी सकते थे.

उन की दिनचर्या व उन के व्यवहार के कारण मेरे मन में नकारात्मक ऊर्जा पैदा होती. उन से कुछ कहनासुनना बेकार जाता और घर में ख्वाहमख्वाह का तनाव अलग पैदा होता.

मैं सचमुच डाक्टर बनना चाहता था. मैं ने इस नकारात्मक ऊर्जा का उपयोग पढ़नेलिखने के लिए करना आरंभ किया. मम्मीपापा के साथ ढंग से बातें किए हुए कईकई दिन गुजर जाते. मन के रोष व शिकायतों को भुलाने के लिए मैं रात को देर तक पढ़ता. मुझे बहुत थक जाने पर ही नींद आती वरना तो मम्मीपापा के प्रति गलत ढंग के विचार मन में घूमते रह कर सोने न देते.

मेरी 12वीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षाओं के दौरान भी मम्मीपापा ने अपने घूमनेफिरने में खास कटौती नहीं की. वे मेरे पास होते भी, तो मुझे उन से खास सहारा या बल नहीं मिलता, क्योंकि मैं ने उन से अपने दिल की बातें कहना छोड़ दिया था.

बोर्ड की परीक्षाओं के बाद मैं ने कंपीटीशन की तैयारी शुरू की. अपनी आंतरिक बेचैनी को भुला कर मैं ने काफी मेहनत की.

बोर्ड की परीक्षा में मुझे 78% अंक प्राप्त हुए, लेकिन किसी भी सरकारी मैडिकल कालेज के लिए हुए कंपीटीशन की मैरिट लिस्ट में मेरा नाम नहीं आया.

मेरी निराशा रात को आंसू बन कर बहती. मम्मीपापा की निराशा कुछ दिनों के लिए उदासी के रूप में और बाद में कलेजा छलनी करने वाले वाक्यों के रूप में प्रकट हुई.

मेरा डाक्टर बनने का सपना अब प्राइवेट मैडिकल कालेज ही पूरा कर सकते थे. उन में प्रवेश पाने को डोनेशन व तगड़ी फीस की जरूरत थी. करीब 15-20 लाख रुपए से कम में डाक्टरी के कोर्स में प्रवेश लेना संभव न था.

हमारे रहनसहन का ऊंचा स्तर देख कर कोई भी यही अंदाजा लगाता कि मेरी उच्च शिक्षा पर 15-20 लाख रुपए खर्च करने की हैसियत मेरे मम्मीपापा जरूर रखते होंगे, पर यह सचाई नहीं थी. तभी मैं ने निराश और दुखी अंदाज में मम्मीपापा के सामने प्राइवेट मैडिकल कालेज में प्रवेश लेने की अपनी इच्छा जाहिर की.

पहले तो उन दोनों ने मेरे नकारापन के लिए मुझे खूब जलीकटी बातें सुनाईं. फिर गुस्सा शांत हो जाने के बाद उन्होंने जरूरत की राशि का इंतजाम करने के बारे में सोचविचार आरंभ किया. इस सिलसिले में पापा पहले अपने बैंक मैनेजर से मिले.

‘‘मिस्टर राजीव, मैं आप की सहायता करना चाहता हूं, पर नियमों के कारण मेरे हाथ बंधे हैं,’’ मैनेजर की प्रतिक्रिया बड़ी रूखी थी, ‘‘अपनी जीवन बीमा पालिसी पर आप ने पहले ही हम से लोन ले रखा है. किसी जमीनजायदाद के कागज आप के पास होते, तो हम उस के आधार पर लोन दे देते. आप को अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए बहुत पहले से कुछ प्लानिंग करनी चाहिए थी. मुझे अफसोस है, मैं आप की कोई सहायता नहीं कर सकूंगा.’’

क्लब में पापा के दोस्त राजेंद्र उन के ब्रिज पार्टनर भी हैं. काफी लंबाचौड़ा व्यवसाय है उन का. पापा ने उन से भी रुपयों का इंतजाम करने की प्रार्थना की, पर बात नहीं बनी.

राजेंद्र साहब के बेटे अरुण से मुझे उन के इनकार का कारण पता चला.

वह रात : क्या था उस रात का राज – भाग 2

‘‘लेकिन, पिछले गांव में वह भी जवाब दे गई और बारिश भी अचानक तेज हो गई. अब तो आगे जंगल पड़ता है और बारिश में जोकटी (चीड़ की तेल वाली लकड़ी, जिसे पहाड़ के लोग मशाल बना कर रात में भी सफर कर लेते हैं) भी नहीं जल सकती. जंगल में बाघभालू का डर लग रहा है,’’ बात तो रामू ही कर रहा था, जो हमारी गली का चौकीदार था. बाकी के 2 लोग चुपचाप खड़े थे.

‘‘हम तुम्हें कहां रखेंगे, हमारे तो सारे कमरे सेबों से भरे पड़े हैं. हमारे अपने लिए भी जगह मुश्किल हो गई है. गांव में कहीं दूसरे घर में चले जाओ,’’ हरीश बोला.

‘‘ठीक है साहब, आप तो जानपहचान के हो. जब आप ही घर में जगह नहीं दे सकते, तो और कौन देगा?’’ रामू बहुत ही उदास हो कर कहने लगा, ‘‘अगर हो सके, तो एक टौर्च दे दीजिए. रामपुर में मैं आप के घर में दे दूंगा. कुछ तो आसरा हो जाएगा.’’

‘‘हां…हां, टौर्च ले जाओ. मैं लाता हूं,’’ कह कर हरीश भीतर गया, तो चाची भी उस के पीछेपीछे चली आईं.

दरवाजे के पास ही उन्होंने हरीश को जाते देख लिया, ‘‘क्यों रे, इतना बड़ा हो गया, पर इनसानियत नाम की कोई चीज तेरे पास है या नहीं? देख नहीं रहा, वे बेचारे किस तरह सर्दी से ठिठुर रहे हैं. गरीब क्या इनसान नहीं होते?’’

‘‘तुम भी न मां. बेमतलब दया की मूर्ति मत बना करो. अरे, ये थर्ड क्लास लोग चोरउच्चके भी तो होते हैं. इधर पापा घर में नहीं हैं और उधर तुम इन्हें घर में घुसाने की बात कर रही हो. कुछ उलटासीधा हो गया, तो मुझे मत कहना.’’

‘‘ये लोग कोई भी हों, इनसान तो हैं न. घर आए को शरण देनी है. ये मेहमान हैं और कहीं नहीं जाएंगे.

‘‘बाहर के बरामदे में एक चारपाई पड़ी है, उसे उठा लाओ और इन्हें दे दो. मैं कुछ कपड़े निकाल देती हूं,’’ कह कर चाची अपने कमरे में चली गईं और बड़ा बक्सा खोल कर कुछ पुराने कंबल और 2 दरियां निकाल कर बाहर ले आईं.

हरीश को न चाहते हुए भी मां की बात माननी पड़ी, क्योंकि वह जानता था कि अगर चारपाई नहीं लाई गई, तो वे खुद जा कर ले आएंगी. इतने अंधेरे में कहीं गिरगिरा गईं, तो फिर सभी को ?ोलना पड़ेगा.

चारपाई बरामदे में पटक कर ‘तुम्हारे मन में जो आए करो’ कहता हुआ हरीश पैर पटकता हुआ वहां से चला गया.

‘‘मुन्नी, पिछवाड़े से अंगीठी और थोड़ी सी लकड़ी उठा लाओ. देखो तो बेचारे सर्दी से कैसे ठिठुर रहे हैं,’’ बाहर खड़े तीनों के कानों में भी सारी बातचीत जा रही थी. उन्हें कुछ हौसला हुआ

और वे बारिश से बचने के लिए बरामदे में आ गए.

नीचे के कमरों में सचमुच सेब भरे पड़े थे और वहां ताले भी लगा दिए गए थे. एक कमरे में बिना छंटाई किए सेबों का ढेर लगा हुआ था, जो आज ही मजदूरों ने बाग से तोड़े थे. दूसरे कमरे में छंटे हुए सेब थे.

एक कमरे में सेबों से भरी पेटियां थीं, जो चाचा का फोन आने के बाद दिल्ली भेजी जाएंगी, पर बाहर का बरामदा तो खाली था. हां, वहां सेब भरने के बाद बचा कूड़ाकचरा जरूर पड़ा था.

चाची ने आवाज लगाई, ‘‘रामू.’’

‘‘जी, मांजी,’’ रामू, जो अपना कुरता उतार कर निचोड़ रहा था, झट बाहर आ गया. चाची ने कंबल और दरियां ऊपर से फेंक दीं, ‘‘मैं चारपाई देती हूं, पर तुम

3 जने उस एक चारपाई पर कैसे सो सकोगे?’’

‘‘नहीं मांजी, चारपाई रहने दीजिए. यहां पर बहुत सारा चिलारू (चीड़ की सूखी पत्तियां, जो सेब की पेटियों में लगाई जाती हैं) पड़ा है, इस को बिछा लेंगे. आप परेशान न हों. सुबह होते ही हम चले जाएंगे.’’

पर चाची ने चारपाई नीचे लटका ही दी, जिसे उन्होंने नीचे ला कर बाहर बरामदे में खड़ी कर के सर्दी से बचने के लिए दीवार बना लिया. रामू के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. वह बराबर सर्दी से कांप रहा था.

तनु और मैं जलाने लायक लकड़ी, माचिस और अंगीठी उन्हें दे आए. उन्होंने हमारे लौटने का भी इंतजार नहीं किया. किसी भूखे भेडि़ए की तरह उस अंगीठी पर टूट पड़े और कुछ चिलारू जला कर उन्होंने आग सुलगा ली.

अब तक उन्होंने अपने कपड़े भी निचोड़ लिए थे और उन्हें बरामदे में खड़ी चारपाई पर फैला दिए.

हम जब तक लौट कर कमरे के अंदर आए, तब तक तो चाची खर्राटे भर रही थीं. पर मेरी नींद उड़ चुकी थी.

शायद तनु को भी नींद नहीं आ रही थी. उस ने उठ कर पानी पीया, तो मुझे भी याद आया कि मैं भी पानी पी ही लूं. हम दोनों बात करना चाह रही थीं, लेकिन चाची के जाग जाने का डर था.

Raksha bandhan: अब हमारी बारी है-भाइयों ने बनाया बहन को सफल – भाग 2

‘‘बिलकुल मेरी पसंद की चाय बनाई है तुम ने, अंजलि. चायपत्ती तेज और चीनी व दूध कम. थैंक्यू,’’ पहला घूंट भरते ही नीरज ने अंजलि को

धन्यवाद दिया.

‘‘कविता ने एक बार दीदी को बताया था कि आप कैसी चाय पीते

हैं. दीदी ने उस के कहे को याद रखा और आप की मनपसंद चाय बना दी,’’ शिखा की इस बात को सुन कर अंजलि पहले शरमाई और फिर बेचैनी से भर उठी.

‘‘चाय मेरी कमजोरी है. एक वक्त था

जब मैं दिन भर में 10-12 कप चाय पी लेता था,’’ नीरज ने हलकेफुलके अंदाज में बात

आगे बढ़ाई.

‘‘आप जो भी तसवीर बनाते हैं, उस में चेहरे के भाव बड़ी खूबी से उभारते हैं,’’ शिखा ने उस की तारीफ की.

‘‘इतनी अच्छी तसवीरें भी नहीं बनाता हूं मैं.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रहे हैं?’’

‘‘क्योंकि मेरी बनाई तसवीरें इतनी ही ज्यादा शानदार होतीं तो खूब बिकतीं. अपने चित्रों के बल पर मैं हर महीने कठिनाई से 5-7 हजार कमा पाता हूं. मेरा अपना गुजारा मुश्किल से चलता है. इसीलिए आज तक घर बसाने की हिम्मत नहीं कर पाया.’’

‘‘शादी करने के बारे में क्या सोचते हैं अब आप?’’ अरुण ने सवाल उठाया तो नीरज सब की दिलचस्पी का केंद्र बन गया.

‘‘जीवनसाथी की जरूरत तो हर उम्र के इंसान को महसूस होती ही है, अरुण. अगर मु झ जैसे बेढंगे कलाकार के लिए कोई लड़की होगी, तो किसी दिन मेरी शादी भी हो जाएगी,’’ हंसी भरे अंदाज में ऐसा जवाब दे कर नीरज ने खाली कप मेज पर रखा और फिर से बच्चों के साथ खेल में लग गया.

नीरज वहां से करीब 5 बजे शाम को गया. तीनों बच्चे उस के ऐसे प्रशंसक बन गए थे कि उसे जाने ही नहीं देना चाहते थे. बड़ों ने भी उसे बड़े प्रेम और आदरसम्मान से विदाई दी थी.

उस के जाते ही अंजलि बिना किसी से कुछ कहेसुने अपने कमरे में चली आई. अचानक उस का मन रोने को करने लगा, पर आंसू थे कि पलकें भिगोने के लिए बाहर आ ही नहीं रहे थे.

करीब 15 मिनट बाद अंजलि के दोनों छोटे भाई और भाभियां उस से मिलने कमरे में आ गए. उन के गंभीर चेहरे देखते ही अंजलि उन के आने का मकसद सम झ गई और किसी के बोलने से पहले ही भड़क उठी, ‘‘मैं बिलकुल शादी नहीं करूंगी. इस टौपिक पर चर्चा छेड़ कर कोई मेरा दिमाग खराब करने की कतई कोशिश न करे.’’

अजय उस के सामने घुटने मोड़ कर फर्श पर बैठ गया और उस का दूसरा हाथ

प्यार से पकड़ कर भावुक स्वर में बोला, ‘‘दीदी, 12 साल पहले पापा के असमय गुजर जाने के बाद आप ही हमारा मजबूत सहारा बनी थीं. आप ने अपनी खुशियों और सुखसुविधाओं को नजरअंदाज कर हमें काबिल बनाया… हमारे घर बसाए. हम आप का वह कर्ज कभी नहीं चुका पाएंगे.’’

‘‘पागल, मेरे कर्तव्यों को कर्ज क्यों सम झ रहा है? आज तुम दोनों को खुश और सुखी देख कर मु झे बहुत गर्व होता है,’’  झुक कर अजय का सिर चूमते हुए अंजलि बोली.

अरुण ने भरे गले से बातचीत को आगे बढ़ाया, ‘‘दीदी, आप के आशीर्वाद से आज हम इतने समर्थ हो गए हैं कि आप की जिंदगी में

भी खुशियां और सुख भर सकें. अब हमारी

बारी है और आप प्लीज इस मौके को हम दोनों से मत छीनो.’’

‘‘भैया, मु झ पर शादी करने का दबाव न बनाओ. मेरे मन में अब शादी करने की इच्छा नहीं उठती. बिलकुल नए माहौल में एक नए इंसान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का खयाल ही मन को डराता है,’’ अंजलि ने कांपती आवाज में अपना भय पहली बार सब को बता दिया.

‘‘लेकिन…’’

‘‘दीदी, नीरजजी बड़े सीधे, सच्चे और नेकदिल इंसान हैं. उन जैसा सम झदार जीवनसाथी आप को बहुत सुखी रखेगा… बहुत प्यार देगा,’’ अरुण ने अंजलि को शादी के विरोध में कुछ बोलने ही नहीं दिया.

‘‘मैं तो तुम सब के साथ ही बहुत सुखी हूं. मु झे शादी के  झं झट में नहीं पड़ना है,’’ अंजलि

रो पड़ी.

‘‘दीदी, हम आप की विवाहित जिंदगी में  झं झट पैदा ही नहीं होने देंगे,’’ उस की बड़ी भाभी मंजु ने उस का हौसला बढ़ाया, ‘‘हमारे होते किसी तरह की कमी या अभाव आप दोनों को कभी महसूस नहीं होगा.’’

‘‘मैं जानता हूं कि नीरजजी अपने बलबूते पर अभी मकान नहीं बना सकते हैं. इसलिए हम ने फैसला किया है कि अपना नया फ्लैट हम तुम दोनों के नाम कर देंगे,’’ अरुण की इस घोषणा को सुन कर अंजलि चौंक पड़ी.

अजय ने अपने मन की बात बताई, ‘‘भैया से उपहार में मिले फ्लैट को सुखसुविधा की हर चीज से भरने की जिम्मेदारी मैं खुशखुशी उठाऊंगा. जो चीज घर में है, वह आप के फ्लैट में भी होगी, यह मेरा वादा है.’’

‘‘आप के लिए सारी ज्वैलरी मैं अपनी तरफ से तैयार कराऊंगी,’’ मंजु ने अपने मन की इच्छा जाहिर की.

‘‘आप के नए कपड़े, परदे, फ्लैट का नया रंगरोगन और मोटरसाइकिल भी हम देंगे आप को उपहार में. आप बस हां कर दो दीदी,’’ आंसू बहा रही शिखा ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की तो अंजलि ने खड़े हो कर उसे गले से लगा लिया.

‘‘दीदी ‘हां’ कह दो,’’ अंजलि जिस की तरफ भी देखती, वही हाथ जोड़ कर यह प्रार्थना दोहरा देता.

‘‘ठीक है, लेकिन शादी में इतना कुछ मु झे नहीं चाहिए. तुम दोनों कोई करोड़पति नहीं हो, जो इतना कुछ मु झे देने की कोशिश करो,’’ अंतत: बड़ी धीमी आवाज में अंजलि ने अपनी स्वीकृति दे दी.

‘‘हुर्रा,’’ वे चारों छोटे बच्चों की तरह खुशी से उछल पड़े.

अंजलि के दिलोदिमाग पर बना तनाव का बो झ अचानक हट गया और उसे अपनी जिंदगी भरीभरी और खुशहाल प्रतीत होने लगी.उसदिन पहली बार नीरज उन के घर सब के साथ लंच लेने आ रहा था. अंजलि के दोनों छोटे भाई और उन की पत्नियां सुबह से ही उस की शानदार आवभगत करने की तैयारी में जुटे हुए थे. उस के दोनों भतीजे और भतीजी बढि़या कपड़ों से सजधज कर बड़ी आतुरता से नीरज के पहुंचने का इंतजार कर रहे थे.

अंजलि की ढंग से तैयार होने में उस की छोटी भाभी शिखा ने काफी सहायता की थी. और दिनों की तुलना में वह ज्यादा आकर्षक और स्मार्ट नजर आ रही थी. लेकिन यह बात उस के मन की चिंता और बेचैनी को कम करने में असफल रही.

‘‘तुम सब 35 साल की उम्र में मु झ पर शादी करने का दबाव क्यों बना रहे हो? क्या मैं तुम सब पर बो झ बन गई हूं? मु झे जबरदस्ती धक्का क्यों देना चाहते हो?’’ ऐसी बातें कह कर अंजलि अपने भैयाभाभियों से पिछले हफ्ते में कई बार  झगड़ी पर उन्होंने उस के हर विरोध को हंसी में उड़ा दिया था.

कुछ देर बाद अंजलि से 2 साल छोटे उस के भाई अरुण ने कमरे में आ कर सूचना दी, ‘‘दीदी, नीरजजी आ गए हैं.’’

अंजलि ड्राइंगरूम में जाने को नहीं उठी, तो अरुण ने बड़े प्यार से बाजू पकड़ कर उसे खड़ा किया और फिर भावुक लहजे में बोला, ‘‘दीदी, मन में कोई टैंशन मत रखो. आप की मरजी के खिलाफ हम कुछ नहीं करेंगे.’’

उन दोनों का सच: क्या पति के धोखे का बदला ले पाई गौरा

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