Story in Hindi
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ये लो संभालो अपना माल’’ कहते हुए पुलिस वाले ने सिबली को अन्ना की तरफ धकेल दिया, अन्ना और पुलिस इंस्पेक्टर एकदूसरे की तरफ देख कर मुसकराने लगे. ‘‘क्या इनाम चाहिए तुम्हें इंस्पेक्टर?’’ अन्ना ने पूछा. ‘‘बस इस माल को एक बार चखवा दो तो मजा आ जाए.’’ ‘‘तुम ने कुछ ज्यादा ही मांग लिया इंस्पेक्टर रमेश… अभी तो इसे और वीआईपी लोगों के पास जाना है उस के बाद ही जा कर तुम लोगों को नंबर आएगा,’’ एक भद्दी सी हंसी हंसते हुए अन्ना ने कहा. सिबली को एक कमरे में बंद कर दिया गया और शाम को अन्ना के गुर्गों ने सिबली को खूब मारा और रस्सी में बांध कर डाल दिया. ‘‘आगे से कभी भागने की कोशिश भी करी तो अंजाम ठीक नहीं होगा,’’ एक गुर्गे ने कहा सिबली के आसपास छोटी उम्र की लड़कियां भी थी. उन के खानेपीने का ध्यान रखने के लिए अन्ना के गुर्गे थे जो जबरदस्ती सभी लड़कियों को खाना खिलाते पर सिबली का मन खानेपीने में न लगता, पर सिबली का मन तो आजादी चाहता था इस दलदल से निकलना चाहती थी वह, सिबली लगातार इस कैद से निकलने के बारे में सोचती पर अन्ना के गुर्गों की कैद से निकलना संभव नहीं था.
एक दिन सिबली को अहसास हुआ कि वहां पर उस की जैसी और लड़कियां भी हैं, उन की देखभाल और उन पर निगरानी रखने के लिए विशाखा नाम की एक भद्दी सी दिखने वाली महिला भी है जिसे संस्था की सेक्रेटरी के नाम से जाना जाता?है लड़कियों को जिस्मफरोशी के लिए वहां रखा हुआ?है और बारीबारी उन्हें भी ग्राहकों के पास भेजा जाता है .सिबली कई बार सोचती कि इन लड़कियों से बात करी जाए पर गुर्गों की तैनाती में ऐसा नहीं हो सका. कुछ दिन तो ‘सीप के मोती’ में कोई बड़ी हलचल नहीं हुई .फिर एक दिन अचानक से अन्ना और उस के गुर्गों की गतिविधि तेज हो गई, अन्ना ने आ कर कहा. ‘‘कल यहां हमारे शहर के बड़े उद्योगपति ‘महाराजजी’ आ रहे हैं, विदेश तक उन की दवाइयों और अन्य उत्पादों का बिजनेस फैला हुआ है वे हमारी संस्था का रखरखाव देखेंगे ,याद रहे तुम सब के चेहरे पर खुशी और चमक दिखनी चाहिए और सब को साफसुथरे रूप में रहना होगा, वे महाराजजी बोलते कम हैं अधिकतर मौन में ही रहते है इसलिए उन्हें शिकायत का कोई मौका नहीं मिलना चाहिए… समझ गई न सब ‘‘अन्ना ने सब की तरफ देखते हुए कहा. ‘सीप के मोती’ की सफाई करी जाने लगी और सभी लड़कियों को साफसुथरे कपड़े भी दिए गए वैसे अन्ना दलाल तो था पर कुछ मामलों में उस के काम करने का अंदाज बिलकुल अलग था, वह अपने चंगुल में फसी लड़कियों से धंधा कराता पर उन की कई बातों का ध्यान भी रखता था मसलन उन के शरीर की साफसफाई, उन के खाने पीने का इंतजाम और उन का शरीर सही शेप में होना चाहिए भले ही ऐसा करने के पीछे उसे अपना धंधा सही तरीके से चलाने की नीति थी.
अगले दिन कमरों के बाहर फूलों से सजावट करी गई और रूम फ्रेशनर किया गया, आज ‘सीप के मोती’ को तो पहचानना मुश्किल हो रहा था. दोपहर में महाराजजी का आना हुआ, वे धोती और कुरता पहने हुए थे, उन का चेहरा भी उन के गंजे सिर की चमचमा रहा था, उन के साथ में उन के बौडीगार्ड भी थे, महाराजजी लड़कियों को देख कर मुसकरा रहे थे, और अपने हाथ से हर किसी को एक बंद लिफाफे में कुछ पैसे भेंट के तौर पर दे रहे थे. महाराजजी सिबली के पास पहुंचे, मुसकराती नजरों से उन्होंने उस की आंखों में झांका और फिर अन्ना की तरफ देखा, अन्ना उन का इशारा समझ गया था. कुछ देर बाद महाराजजी सब का अभिवादन कर के चले गए, अन्ना सीधा सिबली के पास आया और बोला. ‘‘सुन… महाराजजी ने अपनी सेवा के लिए तुझे चुना है… समझ गई न… अब अच्छे से तैयार हो जा …अगर महाराजजी को खुश कर दिया तो ढेर सारे पैसे मिलेंगे.’’ खुश हो रहा था अन्ना. सिबली ने अपने दुर्भाग्य को किसी हद तक स्वीकार भी कर लिया था भले ही उस के मन में अब भी यहां से मुक्ति पाने की आशा जीवित थी इसलिए वह भारी मन से तैयार होने लगी. शाम ढल चुकी थी, बीस लड़कियों के बीच में से महाराजजी ने सिबली को अपनी सेवा के लिए पसंद किया था, अन्ना खुद ही गाड़ी चला कर सिबली को महाराजजी की कोठी पर छोड़ आया था.
सिबली कमरे में चुपचाप बैठी हुई थी, कुछ देर बाद महाराजजी कमरे में आए, आज तो उन का पूरा रूप ही बदला हुआ था इस समय वे धोती कुरता की बजाय एक महंगे गाउन में नजर आ रहे थे, महाराजजी सिबली को गहरे जा रहे थे. ‘‘मैं तुम्हें कुछ नहीं करूंगा… लेकिन मैं बहुत थका हुआ हूं… बस तुम पूरी रात मुझ से चिपक कर लेटोगी तो मेरी थमान अपने आप दूर हो जाएगी,’’ महाराजजी ने कहा और झटके से अपना गाउन नीचे गिरा हुआ. महाराजजी ने अपने नंगे बदन पर महिलाओं के अंत: वस्त्र पहने हुए थे वे किसी महिला की तरह ही बरताव लगे और सिबली को सीने से लगा लिया. ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम मेरे साथ शराब पियो,’’ एक गिलास सिबली के होंठों से सटाते हुए महाराजजी ने कहा. अभी उन का गिलास पूरा भर भी नहीं पाया था कि उन का मोबाइल बज उठा. ‘‘कितनी बार कहा कि जब मैं आराम कर रहा हूं तो मुझे डिस्टर्ब मत किया करो.’’ ‘‘पर हमारे कारखाने पर एक मीडिया कर्मी ने स्टिंग आपरेशन किया है. जहां उस ने हमारी बिजनेस की आड़ में होने वाले नशीली दवाइयों का धंधा का पर्दाफाश कर दिया है और अब मीडिया वाले आप के घर के बाहर पहुंच चुके हैं.’’ सेक्रेटरी घबराया हुआ बोले जा रहा था. ‘‘ओह… सारे मूड का सत्यानाश कर दिया’’ ये कह कर महाराजजी अपने कपड़े पहन कर बाहर की ओर भागे. सिबली ने भी बाहर देखा, वहां अफरातफरी मची हुई थी, मीडिया वालों ने चारों तरफ से घेर रखा था, उसे लगने लगा था कि उस के पास अच्छा मौका है भागने का, वह नीचे की ओर भागी, महाराजजी अपने आप को संयत रख कर मीडिया वालों को शांत करने में लगा हुआ था. इस अफरातफरी का पूरा फायदा सिबली ने उठाया और सब की नजर से बचती हुई बाहर आ गई बहुत दिन बाद एक ताजी हवा के झोंके ने उस के बदन को छुआ था, वह तेजी से कदम बढ़ा रही थी उसे लगा कि अब वे अन्ना के चंगुल से आजाद हो गई है .पर उस का ये ख्याल गलत साबित हुआ क्योंकि अन्ना ठीक सिबली के सामने खड़ा हुआ था.
‘‘आज तू ने फिर भागने की कोशिश की तू ने कैसे सोच लिया कि मैं तुझ को अकेला छोड़ कर चला जाऊंगा अब इस का नतीजा तुझे भुगतना पड़ेगा,’’ अन्ना ने सिबली को पकड़ कर अपनी गाड़ी में बिठाया और गाड़ी थाने की ओर बढ़ा दी और अपने कान से फोन पर बात करने लगा. ‘‘इंस्पेक्टर साहब… मैं अपने साथ माल ले कर थाने के बाहर खड़ा हूं बाहर आ कर गाड़ी में ही अपनी प्यासबुझा लो फिर मत कहना कि अन्ना ने अपना वादा नहीं निभाया.’’ ‘‘इंस्पेक्टर सिबली को गाड़ी के अंदर रौंद रहा था सिबली के आंसू लगातार आंखों से झर रहे थे और अन्ना बाहर खड़ा हुआ मुसकराए जा रहा था, जब इंस्पेक्टर रमेश के अंदर का तूफान थमा तो अन्ना ने गाड़ी स्टार्ट करी और सिबली को ले कर संकरी गलियों वाली जगह पहुंचा और घसीटता हुआ एक मकान में ले गया कमरे में बैठी हुई एक औरत के पास सिबली को धकेलते हुए बोला. ‘‘अब इस को ले… एकदम नया आइटम है पर मेरे किसी काम का नहीं… वीआईपी लोगों ने इसे चख लिया है और वैसे भी साली ने नाक में दम कर रखा है और मुझे इस की कीमत दे दे.’’ उस औरत ने अन्ना को पैसे दिए और अन्ना वहां से चला गया. कई साल निकल गए पर सिबली यहां से न निकल सकी. चाय खत्म हो चुकी थी, मुमताज भी उठ कर जा चुकी थी. बाहर सड़कों पर कर्फ्यू में ढील दे दी गई है, लोग सड़कों पर आवाजाही कर रहे हैं और कोठे पर भी ग्राहक आने लगे हैं और इन आतेजाते लोगों के साथ सिबली की इस दुनिया के चंगुल से आजाद होने की सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं. अन्ना अक्सर ही यहां आता है किसी न किसी लड़की को साथ में ले कर…, हर एक आती हुई लड़की में सिबली अपनी झलक देखती है पर कुछ कर नहीं पाती सिर्फ आंसू बहा कर रह जाती है, उस की आंखों से आंसू ऐसे झरते है जैसे मोती झर रहे हो… ‘सीप के मोती.’
सिसक पड़ी थी सिबली. अन्ना की हरकतें बढ़ती गईं. वह सिबली के बदन से कपड़े उतारने लगा. सिबली रो पड़ी और अपने सीने को ढकने की कोशिश की, पर अन्ना ने बेदर्दी से उस के हाथों को मरोड़ते हुए उस के सीने को खोल दिया. सिबली ने बहुत विरोध किया, पर एक ताकतवर मर्द के सामने उस की एक न चली. अन्ना सिबली के नंगे बदन को गिद्ध जैसी आंखों से घूर रहा था. सिबली रोए जा रही थी. अचानक से अन्ना उस से दूर हट गया और अपने मोबाइल के कैमरे से सिबली के नंगे शरीर के फोटो लेने लगा. कभी आगे से तो कभी पीछे से, कभी सीने के फोटो उतारता, तो कभी उस की पीठ की. अन्ना ने सिबली के फोटो उतार कर उस से कपड़े पहनने को कहा और खुद एक कोने में बैठ कर वे तसवीरें किसी को ह्वाट्सएप पर भेज दीं और जवाब का इंतजार करने लगा. सिबली भी एक कोने में दुबक गई थी.
कुछ देर बाद अन्ना का मोबाइल बज उठा. ‘‘जी सर, बताइए… माल पसंद आ गया न?’’ शायद उधर से बात करने वाले ने माल की क्वालिटी पसंद कर ली थी, तभी अन्ना खुश हो गया था. ‘‘सुन… साहब को तेरा जिस्म पसंद आ गया है. मैं तुझे उन के पास ले जाने के लिए आधे घंटे में आऊंगा, तब तक तू अच्छी तरह से रगड़ कर नहा ले और ये नए कपड़े पहन लेना… याद रख… अगर तू ने साहब को खुश कर दिया, तो हम मालामाल हो जाएंगे,’’ अन्ना की आंखों में एक चमक थी. शहर में सत्ताधारी बड़े नेता, जो अपने पद, इज्जत और पहचान के चलते बाहर की औरतों से सैक्स करने के लिए कोठों पर नहीं जा सकते थे, उन के लिए ही अन्ना एक जादू के जिन्न की तरह काम करता था. अन्ना नाम का यह आदमी गरीब, अनाथ और पिछड़े तबके की औरतों के लिए ‘सीप के मोती’ नामक एक स्वयंसेवी संस्था चलाता था, पर असलियत कुछ और ही थी. अन्ना का काम था कसबों और गांवों से मजदूर, पिछड़ी और गरीब लड़कियां ला कर इन नेताओं के जिस्म की जरूरत पूरी करना. वह लड़कियां लाता और मोबाइल से उन के नंगी फोटो नेताओं को भेजता और पसंद आने पर बताए गए पते पर लड़कियों को पहुंचाता था. अन्ना लड़कियों की दलाली करता था. उस ने सिबली के साथ भी वही किया. वह सिबली को ले कर शहर से थोड़ा बाहर बने एक मकान में गया.
सफेद कुरतापाजामा पहने एक नेता सोफे में धंसा हुआ शराब की चुसकियां ले रहा था. उस ने सिबली की पीठ पर हाथ फेरा. ‘‘अरे, घबराओ नहीं… हम लड़कियों की भलाई के लिए काम करने वाले नेता हैं. हम तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती नहीं करेंगे… हमारा स्वाद कुछ दूसरा ही है,’’ एक जहरीली मुसकराहट नेता के चेहरे पर थिरक उठी थी. उस कमरे में सिबली और उस सत्ताधारी नेता के अलावा और कोई भी नहीं था. नेता ने शराब का एक घूंट अपने मुंह में भरा और सिबली के सीने पर उगल दिया और फिर अपनी जीभ निकाल कर कुत्ते की तरह चाटने लगा. सिबली ने अपनी मुट्ठियां गुस्से से भींच लीं. वह नेता के चंगुल से चाह कर भी आजाद नहीं हो पा रही थी, पर अचानक नेता ने सिबली को पलट कर एक सोफे पर टिका दिया और उस के हाथपैर बांध दिए. ‘‘देख लड़की, मैं तेरे जिस्म को हाथ तक न लगाऊंगा, बस तू अपने मुंह से सैक्सी आवाज निकालती रह, जैसी अंगरेजी फिल्मों में निकालते हैं,’’ इतना कहने के साथ नेता ने सिबली की सलवार को नीचे खींच दिया और उस के नंगे कूल्हों पर अपनी बैल्ट से एक के बाद एक प्रहार करने शुरू कर दिए. नेता सिबली से हर प्रहार के बाद वासनात्मक आवाज की उम्मीद कर रहा था, पर सिबली कोई वेश्या तो थी नहीं, जो ऐसा करती. वह 16 साल की लड़की उस के हर प्रहार पर रोने लगी. उस का रोना नेता को बुरा लग रहा था. सि‘‘साली… तू ऐसे नहीं मानेगी… मैं तो सोच रहा था कि तेरा बलात्कार न करूं पर तू ऐसे नहीं मानेगी,’’ नेता ने सिबली के बंधनों को आजाद तो कर दिया पर उस के कोमल शरीर को अपने भारी भरकम शरीर के नीचे दबा दिया और उस के शरीर में समा गया और उसे तब तक दबाए रखा जब तक उस नेता को यौन संतुष्टि नहीं मिल गई. नेता एक ओर लुढ़क गया था, कुछ देर बाद वह उठा और शराब के कई जाम अपनी हलक के नीचे उड़ेल लिए और कुछ देर बाद गहरी नींद में सोने लगा.
सिबली को जब होश आया तो पौ फटने को थी, उस ने देखा नेता बेसुध पड़ा हुआ है और बाहर उस के गुर्गे भी नहीं है, उसे मानो इसी द्रश्य की प्रतीक्षा थी, सिबली ने जल्दी से कपड़े पहने और दरवाजा खोला और सीधे किसी तीर की तरह सड़क पर भागने लगी. सिबली कितना पैदल चली, कितना दौड़ी उस का उसे अहसास भी नहीं था वह तो बस किसी मदद की तलाश में थी, सामने से पुलिस की पेट्रोलिंग जीप दिखाई दी तो सिबली के प्राण जाग उठे वह पूरी ताकत से उसे रुकने का इशारा करने लगी. ‘‘मुझे बचा लीजिए साहब… मुझे बचा लीजिए,’’’’ चीक पड़ी थी सिबली. ‘‘क्या हुआ… क्यों चीख रही है तू’’ इंस्पेक्टर ने पूछा. सिबली एक ही सांस में सब बताती चली गई. और पुलिस द्वारा दोषी का नाम पूछे जाने पर सिबली ने अन्ना का नाम बताया. ‘‘अन्ना की ये हिम्मत… बारबार समझाए जाने पर भी वे हरकत से बाज नहीं आता,’’ ये कह कर पुलिस ने सिबली को अपने साथ बिठा लिया और अन्ना के अड्डे की तरफ जीप बढ़ा दी. कुछ देर बाद जीप अन्ना के अड्डे के सामने थी, इंस्पेक्टर अपने साथ सिबली को ले कर अंदर गया. ‘‘तुम घबराओ नहीं… हम अभी अन्ना को सबक सिखाते हैं,’’ इंस्पेक्टर ने कहा. पुलिस वाले अन्ना के सामने खड़े थे. ‘‘सुना है तुम गरीबों को सताते हो और आजकल नेताओं को लड़कियां सप्लाई करने लगे हो’’ इंस्पेक्टर अन्ना से बोला, उस की इस बात पर अन्ना घबरा सा गया. ‘‘अपने आप को जिस्मों का दलाल कहते हो तुम्हारा धंधा यहां से ले कर अरब देशों तक फैला हुआ है पर एक लड़की तो तुम से संभाली नहीं जाती.
‘‘सारी बात शुरू से बता. कुछ छिपाने की जरूरत नहीं वरना हम कुछ नहीं कर पाएंगे. जिसे तू प्यार बोल रही है वह सिर्फ धोखा था तेरे साथ, तेरे शरीर के साथ, बेवकूफ लड़की.’’
दीपा सुबकते हुए बोली, ’’राहुल घर के सामने ही रहता है. मैं उस से प्यार करती हूं. हम लोग कई महीनों से मिल रहे थे पर राहुल मुझे भाव ही नहीं देता था. उस पर कई और लड़कियां मरती हैं और वे सब चटखारे लेले कर बताती थीं कि राहुल उन के लिए कैसे मरता है. बहुत जलन होती थी मुझे. मैं उस से अकेले में मिलने की जिद करती थी कि सिर्फ एक बार मिल लो.’’
‘‘लेकिन छोटा शहर होने की वजह से मैं उस से खुलेआम मिलने से बचती थी. वही, वह कहता था, ‘मिल तो लूं पर अकेले में. कैंटीन में मिलना कोई मिलना थोड़े ही होता है.’
‘‘एकदिन मम्मीपापा किसी काम से शहर से बाहर जा रहे थे तो मौके का फायदा उठा कर मैं ने राहुल को घर आ कर मिलने को कह दिया, क्योंकि मुझे मालूम था कि वे लोग रात तक ही वापस आ पाएंगे. घर में सिर्फ दादी थी और बाबा तो शाम तक अपने औफिस में रहेंगे. दादी घुटनों की वजह से सीढि़यां भी नहीं चढ़ सकतीं तो इस से अच्छा मौका नहीं मिलेगा.
‘‘आप को भी मालूम होगा कि हमारे घर के 2 दरवाजे हैं, बस, क्या था, मैं ने पीछे वाला दरवाजा खोल दिया. उस दरवाजे के खुलते ही छत पर बने कमरे में सीधा पहुंचा जा सकता है और ऐसा ही हुआ. मौके का फायदा उठा कर राहुल कमरे में था. और मैं ने दादी से कहा, ‘अम्मा मैं ऊपर कमरे में काम कर रही हूं. अगर मुझ से कोई काम हो तो आवाज लगा देना.’
‘‘इस पर उन्होंने कहा, ‘कैसा काम कर रही है, आज?’ तो मैं ने कहा, ‘अलमारी काफी उलटपुलट हो रही है. आज उसी को ठीक करूंगी.’
‘‘सबकुछ मेरी सोच के अनुसार चल रहा था. मुझे अच्छी तरह मालूम था कि अभी 3 घंटे तक कोई नौकर भी नहीं आने वाला. जब मैं कमरे में गई तो अंदर से कमरा बंद कर लिया और राहुल की तरफ देख कर मुसकराई.
‘‘मुझे यकीन था कि राहुल खुश होगा. फिर भी पूछ बैठी, ‘अब तो खुश हो न? चलो, आज तुम्हारी सारी शिकायत दूर हो गई होगी. हमेशा मेरे प्यार पर उंगली उठाते थे.’ अब खुद ही सोचो, क्या ऐसी कोई जगह है. यहां हम दोनों आराम से बैठ कर एकदो घंटे बात कर सकते हैं. खैर, आज इतनी मुश्किल से मौका मिला है तो आराम से जीभर कर बातें करते हैं.’’
‘‘नहीं, मैं खुश नहीं हूं. मैं क्या सिर्फ बात करने के लिए इतना जोखिम उठा कर आया हूं. बातें तो हम फोन पर भी कर लेते हैं. तुम तो अब भी मुझ से दूर हो.’’ मुझे बहुत कुठा…औरतों के साथ तो वह जम कर…था.
‘‘मैं ने कहा, ‘फिर क्या चाहते हो?’
‘‘राहुल बोला, ‘देखो, मैं तुम्हारे लिए एक उपहार लाया हूं, इसे अभी पहन कर दिखाओ.’
‘‘मैं ने चौंक कर वह पैकेट लिया और खोल कर देखा. उस में एक गाउन था. उस ने कहा, ‘इसे पहनो.’
‘पर…र…?’ मैं ने अचकचाते हुए कहा.
‘‘‘परवर कुछ नहीं. मना मत करना,’ उस ने मुझ पर जोर डाला. ‘अगर कोई आ गया तो…’ मैं ने डरते हुए कहा तो उस ने कहा, ‘तुम को मालूम है, ऐसा कुछ नहीं होने वाला. अगर मेरा मन नहीं रख सकती हो, तो मैं चला जाता हूं. लेकिन फिर कभी मुझ से कोई बात या मिलने की कोशिश मत करना,’ वह गुस्से में बोला.
‘‘मैं किसी भी हालत में उसे नाराज नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैं ने उस की बात मान ली. और जैसे ही मैं ने नाइटी पहनी.’’ बोलतेबोलते दीपा चुप हो गई और पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी.
‘‘आगे बता क्या हुआ? चुप क्यों हो गई? बताते हुए शर्म आ रही है पर तब यह सब करते हुए शर्म नहीं आई?’’ मीता ने कहा.
पर दीपा नीची निगाह किए बैठी रही.
‘‘आगे बता रही है या तेरे पापा को बुलाऊं? अगर वे आए तो आज कुछ अनहोनी घट सकती है,’’ मीता ने डांटते हुए कहा.
पापा का नाम सुनते ही दीपा जोरजोर से रोने लगी. वह जानती थी कि आज उस के पापा के सिर पर खून सवार है. ‘‘बता रही हूं.’’ सुबकते हुए बोली, ‘‘जैसे ही मैं ने नाइटी पहनी, तो राहुल ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया.
‘‘मैं ने घबरा कर उस को धकेला और कहा, ‘यह क्या कर रहे हो? यह सही नहीं है.’ इस पर उस ने कहा, ‘सही नहीं है, तुम कह रही हो? क्या इस तरह से बुलाना सही है? देखो, आज मुझे मत रोको. अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो.’
‘‘‘तो क्या?’
‘‘‘देखो, मैं यह जहर खा लूंगा’, और यह कहते हुए उस ने जेब से एक पुडि़या निकाल कर इशारा किया. मैं डर गई कि कहीं यहीं इसे कुछ हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. और फिर उस ने वह सब किया, जो कहा था. उस की बातों में आ कर मैं अपनी सारी सीमाएं लांघ चुकी थी. पर कहीं न कहीं मन में तसल्ली थी कि अब राहुल को मुझ से कोई शिकायत नहीं रही. पहले की तरह फिर पूछा, ‘राहुल अब तो खुश हो न?’
‘‘‘नहीं, अभी मन नहीं भरा. यह एक सपना सा लग रहा है. कुछ यादें भी तो होनी चाहिए’, उस ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘यादें, कैसी यादें’, मैं ने सवालिया नजर डाली. ‘अरे, वही कि जब चाहूं तुम्हें देख सकूं,’ उस से राहुल ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘पता नही क्यों अपना सबकुछ लुट जाने के बाद भी, मैं मूर्ख उस की चालाकी को प्यार समझ रही थी. मैं ने उस की यह ख्वाहिश भी पूरी कर देनी चाही और पूछा, ‘वह कैसे?’
‘‘‘ऐसे,’ कहते हुए उस ने अपनी अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर झट से मेरी एक फोटो ले ली. फिर, ‘मजा नहीं आ रहा,’ कहते कहते, एकदम से मेरा गाउन उतार फेंका और कुछ तसवीरें जल्दजल्दी खींच लीं.
‘‘यह सब इतना अचानक से हुआ कि मैं उस की चाल नहीं समझ पाई. समय भी हो गया था और मम्मीपापा के आने से पहले सबकुछ पहले जैसा ठीक भी करना था. कुछ देर बाद राहुल वापस चला गया और मैं नीचे आ गई. किसी को कुछ नहीं पता लगा.
सिबली अपने कमरे में एक छोटी सी खिड़की से बाहर देख रही थी. ऐसी छोटी खिड़की जो पूरी तरह शीशे से बंद थी और उस से बाहर की ओर तो देखा जा सकता था, पर बाहर से अंदर की ओर नहीं देखा जा सकता था. वैसे भी बाहर देखने जैसा कुछ भी नहीं था. एक सन्नाटा सा छाया हुआ था. अंधेरे और सन्नाटे को पुलिस की गाड़ी का सायरन तेजी से चीर देता, क्योंकि आज शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था. सिबली के मन में थोड़ी खुशी भी थी. न जाने कितने दिनों के बाद उस के थके हुए शरीर को आराम मिलेगा, नहीं तो रोजाना 30-35 ग्राहक तो निबटाने ही पड़ते हैं.
मुमताज सिबली के लिए चाय बना कर लाई. सिबली ने मुसकरा कर शुक्रिया कहा और वे दोनों वहीं बैठ कर चाय पीने लगीं. ‘‘ऐ… सिबली… आजकल ये फिल्म वाले हम वेश्याओं की जिंदगी पर बहुत फिल्में बनाने लगे हैं,’’ खुश होते हुए मुमताज ने कहा. ‘‘बहुत कम फिल्मों में ही हमारी सचाई को दिखाया जाता है… बाकी फिल्मों में जैसा वे लोग हमारे बारे में दिखाते हैं न, असल जिंदगी में वैसा नहीं होता…’’ सिबली ने कहा. ‘‘अरे, वह सब छोड़… भला हमारी असली जिंदगी में फिल्में देखने के लिए समय कहां… यह मुआ कर्फ्यू हटे तो अपना कामधंधा जोर पकड़े तो मजा आए,’’ मुमताज ने कहा. ‘‘पर… मैं तो सोच रही थी कि कुछ और दिन यह कर्फ्यू लगा रहे तो इन दुखती रगों को थोड़ा आराम मिल जाता,’’ सिबली ने मुमताज से कहा. ‘‘पगला गई हो क्या… अगर कर्फ्यू लगा रहेगा तो हमारे पास ग्राहक नहीं आएंगे और अगर ग्राहक नहीं आएंगे, तो क्या खाएंगे हम? और तू क्या सोच रही है कि अन्ना हम लोगों को मुफ्त में बिठा कर खाना खिलाएगा,’’ मुमताज ने कहा. अन्ना का नाम सुनते ही सिबली का मुंह मानो कसैला सा हो गया. उस की आंखों में नफरत के भाव आ गए. सिबली अन्ना से बहुत नफरत करती थी. यही तो वह आदमी था, जो सिबली के इस हाल के लिए जिम्मेदार था. वैसे पूरी तरह से तो अन्ना भी जिम्मेदार नहीं था, सिबली की जिंदगी में कई ऐसे वाकिए थे, जो उस को यहां तक लाने की वजह बने. एक छोटे से कसबे में सिबली का घर था. घर में उस के मांबाप के अलावा उस के साथ 2 बहनें और रहती थीं. 3 बहनों में 16 साल की सिबली सब से बड़ी थी. सिबली का बाप एक हलवाई की दुकान पर मजदूरी करता था और मजदूरी से मिले हुए ज्यादातर पैसे वह शराब पीने में उड़ा देता था. इसलिए घर का खर्चा बामुश्किल ही चल पाता था.
कभीकभी तो सब को खाना खिलाने के बाद अम्मां और सिबली के लिए तो खाने के लिए कुछ भी नहीं बचता था. सिर्फ पानी पी कर ही सोना पड़ जाता था दोनों को. कसबे में कमला नाम की एक औरत रहती थी. वह हर समय पान का बीड़ा मुंह में दबाए रहती थी. कमला का शरीर लंबा तो था ही, साथ ही थोड़ा थुलथुला सा भी हो गया, जिस के चलते एक औरत होने के नाते उस का डीलडौल बहुत बड़ा लगने लगा था. कमला अकसर कसबे के मर्द लोगों से ही बात करती थी. कसबे में आनेजाने वाले सभी छोटेबड़े नेता भी कमला से ही मिलते थे और उस के घर पर ही चायपानी भी करते थे. शायद वह कोई चुनाव भी लड़ना चाहती थी. पिछले कई दिनों से कमला जब भी सिबली को देखती, तो उसे ऐसे घूरती जैसे उस के उभरते अंगों को टटोल रही हो. कमला वही रुक कर सिबली से कुछ बात भी करने की कोशिश करती, पर पता नहीं क्यों कमला को देख कर सिबली की त्योरियां चढ़ जातीं और वह कमला के पास न आती. उस दिन तो कमला सिबली के घर ही आ गई और बापू से पता नहीं क्या गुपचुप बात करने लगी. उस की बातों से सिबली का बापू पहले तो कुछ नाराज होता सा दिखा, पर फिर थोड़ा धीमा हो कर बात करने लगा. उस दिन के बाद से तो कमला हर दूसरे दिन सिबली के घर आती और उस के बापू के आने तक रुकती. इस बीच वह सिबली से अनेक तरह के सवाल किया करती. ज्यादातर तो उस के जवाब सिबली को पता ही नहीं होते थे. सिबली की मां भी कमला की लल्लोचप्पो में लगी रहती.
कमला ने यही कोई 20 दिन सिबली के घर के चक्कर लगाए. एक दिन सिबली के बापू उस से कहने लगे, ‘‘कमलाजी की लड़की शहर में नौकरी भी करती है और पढ़ाई भी… इसलिए हम लोग और कमलाजी भी चाहते हैं कि तू शहर जा कर नौकरी कर ले, तो हम लोगों के घर का खर्चा भी ठीक से चल जाएगा. और रही नौकरी और ठहरने की बात, तो वे सब इंतजाम कमलाजी खुद ही करा देंगी.’’ सिबली ने कभी सोचा भी नहीं था कि उस के अम्मां और बापू उस को किसी के हाथों बेच भी सकते हैं, पर यहां तो उस के मांबाप ने गरीबी के चलते और पैसों के लालच में अपनी ही बेटी को कमला के हाथों बेच दिया था. उसी दिन शाम की बस में कमला के साथ में सिबली को एक बैग में कपड़े दे कर बिठा दिया गया. कमला ने खिड़की से पीछे देखा तो उस के बापू के चेहरे पर खुशी और दुख दोनों ही भाव थे. कमला उसे ले कर ‘सीप के मोती’ नामक एक जगह पर पहुंची और अंदर आ कर कमला ने उसे एक कमरे में बिठा दिया और खुद बाहर से कुंडी चढ़ा कर चली गई.
थोड़ी देर बाद ही वहां पर एक लंबाचौड़ा और काला सा आदमी आया. यही अन्ना था. उस के साथ 2-3 गुरगे भी थे, जो उसे बातबात में बहुत इज्जत के साथ अन्नाजीअन्नाजी कह रहे थे. अन्ना सिबली को खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था. वह उस के पास आया और सिबली के सीने को मसलने लगा. सिसक पड़ी थी सिबली. अन्ना की हरकतें बढ़ती गईं. वह सिबली के बदन से कपड़े उतारने लगा. सिबली रो पड़ी और अपने सीने को ढकने की कोशिश की, पर अन्ना ने बेदर्दी से उस के हाथों को मरोड़ते हुए उस के सीने को खोल दिया.
सुबहसुबह रमेश की साली मीता का फोन आया. रमेश ने फोन पर जैसे ही ‘हैलो’ कहा तो उस की आवाज सुनते ही मीता झट से बोली, ‘‘जीजाजी, आप फौरन घर आ जाइए. बहुत जरूरी बात करनी है.’’
रमेश ने कारण जानना चाहा पर तब तक फोन कट चुका था. मीता का घर उन के घर से 15-20 कदम की दूरी पर ही था. रमेश को आज अपनी साली की आवाज कुछ घबराई हुई सी लगी. अनहोनी की आशंका से वे किसी से बिना कुछ बोले फौरन उस के घर पहुंच गए. जब वे उस के घर पहुंचे, तो देखा उन दोनों पतिपत्नी के अलावा मीता का देवर भी बैठा हुआ था. रमेश के घर में दाखिल होते ही मीता ने घर का दरवाजा बंद कर दिया. यह स्थिति उन के लिए बड़ी अजीब सी थी. रमेश ने सवालिया नजरों से सब की तरफ देखा और बोले, ‘‘क्या बात है? ऐसी क्या बात हो गई जो इतनी सुबहसुबह बुलाया?’’
मीता कुछ कहती, उस से पहले ही उस के पति ने अपना मोबाइल रमेश के आगे रख दिया और बोला, ‘‘जरा यह तो देखिए.’’
इस पर चिढ़ते हुए रमेश ने कहा, ‘‘यह क्या बेहूदा मजाक है? क्या वीडियो देखने के लिए बुलाया है?’’
मीता बोली, ‘‘नाराज न होएं. आप एक बार देखिए तो सही, आप को सब समझ आ जाएगा.’’
जैसे ही रमेश ने वह वीडियो देखा उस का पूरा जिस्म गुस्से से कांपने लगा और वह ज्यादा देर वहां रुक नहीं सका. बाहर आते ही रमेश ने दामिनी (सलेहज) को फोन लगाया.
दामिनी की आवाज सुनते ही रमेश की आवाज भर्रा गई, ‘‘तुम सही थी. मैं एक अच्छा पिता नहीं बन पाया. ननद तो तुम्हारी इस लायक थी ही नहीं. जिन बातों पर एक मां को गौर करना चाहिए था, पर तुम ने एक पल में ही गौर कर लिया. तुम ने तो मुझे होशियार भी किया और हम सबकुछ नहीं समझे. यहीं नहीं, दीपा पर अंधा विश्वास किया. मुझे अफसोस है कि मैं ने उस दिन तुम्हें इतने कड़वे शब्द कहे.’’
‘‘अरे जीजाजी, आप यह क्या बोले जा रहे हैं? मैं ने आप की किसी बात का बुरा नहीं माना था. अब आप बात बताएंगे या यों ही बेतुकी बातें करते रहेंगे. आखिर हुआ क्या है?’’
रमेश ने पूरी बात बताई और कहा, ‘‘अब आप ही बताओ मैं क्या करूं? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा.’’ और रमेश की आवाज भर्रा गई.
‘‘आप परेशान मत होइए. जो होना था हो गया. अब यह सोचने की जरूरत है कि आगे क्या करना है? ऐसा करिए आप सब से पहले घर पहुंचिए और दीपा को स्कूल जाने से रोकिए.’’
‘‘पर इस से क्या होगा?’’
‘‘क्यों नहीं होगा? आप ही बताओ, इस एकडेढ़ साल में आप ने क्या किसी भी दिन दीपा को कहते हुए सुना कि वह स्कूल नहीं जाना चाहती? चाहे घर में कितना ही जरूरी काम था या तबीयत खराब हुई, लेकिन वह स्कूल गई. मतलब कोई न कोई रहस्य तो है. स्कूल जाने का कुछ तो संबंध हैं इस बात से. वैसे भी यदि आप सीधासीदा सवाल करेंगे तो वह आप को कुछ नहीं बताएगी. देखना आप, स्कूल न जाने की बात से वह बिफर जाएगी और फिर आप से जाने की जिद करेगी. तब मौका होगा उस से सही सवाल करने का.’’
‘‘क्या आप मेरा साथ दोगी? आप आ सकती हो उस से बात करने के लिए?’’ रमेश ने पूछा.
‘‘नहीं, मेरे आने से कोई फायदा नहीं. दीदी को भी आप जानते हैं. उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा. इस बात के लिए मेरा बीच में पड़ना सही नहीं होगा. आप मीता को ही बुला लीजिए.’’
घर जा कर रमेश ने मीता को फोन कर के घर बुला लिया और दीपा को स्कूल जाने से रोका,’’ आज तुम स्कूल नहीं जाओगी.’’
लेकिन उम्मीद के मुताबिक दीपा स्कूल जाने की जिद करने लगी,’’ आज मेरा प्रैक्टिकल है. आज तो जाना जरूरी है.’’
इस पर रमेश ने कहा,’’ वह मैं तुम्हारे स्कूल में जा कर बात कर लूंगा.’’
‘‘नहीं पापा, मैं रुक नहीं सकती आज, इट्स अर्जेंट.’’
‘‘एक बार में सुनाई नहीं देता क्या? कह दिया ना नहीं जाना.’’ पर दीपा बारबार जिद करती रही. इस बात पर रमेश को गुस्सा आ गया और उन्होंने दीपा के गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया. हालांकि? दीपा पर हाथ उठा कर वे मन ही मन दुखी हुए, क्योंकि उन्होंने आज तक दीपा पर हाथ नहीं उठाया था. वह उन की लाड़ली बेटी थी.
तब तक मीता अपने पति के साथ वहां पहुंच गई और स्थिति को संभालने के लिए दीपा को उस के कमरे में ले कर चली गई. वह दीपा से बोली, ‘‘यह सब क्या चल रहा है, दीपा? सचसच बता, क्या है यह सब फोटोज, यह एमएमएस?’’
दीपा उन फोटोज और एमएमएस को देख कर चौंक गई, ‘‘ये…य…यह सब क…क…ब …कै…से?’’ शब्द उस के गले में ही अटकने लगे. उसे खुद नहीं पता था इस एमएमएस के बारे में, वह घबरा कर रोने लगी.
इस पर मीता उस की पीठ सहलाती हुई बोली, ‘‘देख, सब बात खुल कर बता. जो हो गया सो हो गया. अगर अब भी नहीं समझी तो बहुत देर हो जाएगी. हां, यह तू ने सही नहीं किया. एक बार भी नहीं खयाल आया तुझे अपने बूढ़े अम्माबाबा का? यह कदम उठाने से पहले एक बार तो सोचा होता कि तेरे पापा को तुझ से कितना प्यार है. उन के विश्वास का खून कर दिया तू ने. तेरी इस करतूत की सजा पता है तेरे भाईबहनों को भुगतनी पड़ेगी. तेरा क्या गया?’’
अब दीपा पूरी तरह से टूट चुकी थी. ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं ने जो भी किया, अपने प्यार के लिए, उस को पाने के लिए किया. मुझे नहीं मालूम यह एमएमएस कैसे बना? किस ने बनाया?’’
‘‘सारी बात शुरू से बता. कुछ छिपाने की जरूरत नहीं वरना हम कुछ नहीं कर पाएंगे. जिसे तू प्यार बोल रही है वह सिर्फ धोखा था तेरे साथ, तेरे शरीर के साथ, बेवकूफ लड़की.’’
अब दीपा पूरी तरह से टूट चुकी थी. ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं ने जो भी किया, अपने प्यार के लिए, उस को पाने के लिए किया. मुझे नहीं मालूम यह एमएमएस कैसे बना? किस ने बनाया?’’
थाने के करीब आते ही उस की चाल में धीमापन आ गया. तेजतेज चलने से मेवा का कसा हुआ ब्लाउज पसीने से तरबतर हो कर गोलाइयों से चिपक गया था. सामने गेट पर बड़ीबड़ी मूंछों वाला संतरी खड़ा था. उस की कामुक नजरें मेवा के बदन से चिपके ब्लाउज पर फिसल रही थीं. उस ने सुलगती बीड़ी का गहरा कश भरा और धीरेधीरे चलता हुआ डरीसहमी मेवा के करीब आ गया. यह देख मेवा घबरा गई. उस की काली चमकती आंखों में दहशत भर उठी थी. उस ने कई जवान औरतों से सुना भी था कि पुलिस वाले बहुत बदमाश होते हैं. फिर भी डरते हुए वह थाने तक आ गई थी.
पुलिस वाले की प्यासी नजरें उस की गदराई जवानी पर फिसल रही थीं.
‘‘यहां क्यों आई है. मुझे बता.’’ वह वहीं चुपचाप खड़ी रही.
‘‘अरे, बोलती क्यों नहीं? गूंगी है क्या?’’ सामने खड़े पुलिस वाले ने कड़कती आवाज में पूछा, ‘‘किसी ने तंग किया है तुझ को? बता मुझे.’’
‘‘थानेदार साहब, ऐसा नहीं है,’’ मेवा ने कांपती आवाज में कहा.
‘‘फिर रास्ते में अकेली देख कर किसी ने पकड़ लिया होगा? तू डर मत, मुझे साफसाफ बता दे. एक घंटे बाद मेरी ड्यूटी खत्म हो रही है.’’
‘‘ऐसी बात नहीं है थानेदारजी, मैं तो दूसरी फरियाद ले कर आई हूं जी,’’ मेवा सहज आवाज में बोली.
पुलिस वाला अभी जाल फेंक ही रहा था कि अंदर से असली थानेदार राम सिंह जीप स्टार्ट कर के निकला. थानेदार राम सिंह जीप रोकते हुए बोला, ‘‘अरे नफे सिंह, यह लड़की कौन है?’’
‘‘साहबजी, यह… यह…’’ पहरे पर खड़ा संतरी कुछ बोलता, उस से पहले ही मेवा ने कहा, ‘‘साहबजी, मैं हरिया की घरवाली हूं. उसे पुलिस ने पकड़ रखा है. हुजूर, मेरे हरिया को छोड़ दो. वह बेकुसूर है.’’
‘‘ओह… तुम चरसगांजा और नकली नोटों की सप्लाई करने वाले हरिया की जोरू हो.’’
‘‘हां साहब… हां,’’ कहते हुए मेवा की आंखों में चमक उभरी.
थानेदार ने देखा कि मेवा के गोलगोल उभारों पर जवानी हिलोरें ले रही थी.
‘‘चल, अपनी झोंपड़ी की तलाशी लेने दे. जरूर तुम ने माल छिपा रखा होगा. चल बैठ गाड़ी में,’’ थानेदार ने रोब जमाया. ‘‘साहबजी… अगर झोंपड़ी से कुछ नहीं मिला, तो मेरे हरिया को छोड़ देंगे?’’ मेवा ने हाथ जोड़ते हुए पूछा.
‘‘हां, छोड़ देंगे…’’ थानेदार ने कहा, तो मेवा गाड़ी में बैठ गई.
संतरी ने मन ही मन थानेदार को भद्दी सी गाली दी. थानेदार राम सिंह ने अगले चौराहे पर ड्राइवर को उतार दिया. फिर वह अकेला ही मेवा को ले कर झोंपड़पट्टी की ओर चल दिया.दोपहरी में सभी अपनीअपनी झोंपड़ी में आराम कर रहे थे. एक मामूली सी झोंपड़ी के सामने जीप रुकी. थानेदार ने उतर कर सारी झोंपड़ी की तलाशी ली. वहां उसे कोई भी गलत चीज नहीं मिली. मेवा सोच रही थी कि अब थानेदार उस के हरिया को छोड़ देगा. वह हाथ जोड़ कर फरियाद करने लगी.
‘‘हां… हां, जरूर आ जाएगा,’’ कहते हुए राम सिंह आगे बढ़ा. थोड़ी देर बाद थानेदार अपने कपड़े दुरुस्त करता हुआ झोंपड़ी से बाहर आया, जीप स्टार्ट की और चला गया.मेवा बेचारी लुट गई थी, मगर करती भी क्या. उस की अपनी मजबूरी थी.
उस की बूढ़ी मां बीमार थी. घर में कोई इलाज कराने वाला नहीं था. उस का बड़ा भाई जहरीली शराब पीने से मर गया था. छोटा भाई नशीली चीजें बेचने के जुर्म में जेल में था. घर में कमाई करने वाला कोई नहीं था. हरिया ने उसे बीवी बनाने के एवज में मां के इलाज की जिम्मेदारी ली थी. मेवा ने जिंदगी से समझौता कर लिया था. मेवा ने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की थी कि असल में हरिया क्या काम करता है. अब उस ने सोच लिया था कि हरिया एक बार घर लौट आए, तो उसे गलत काम करने से रोकेगी.
आज जोकुछ हुआ, मेवा उसे एक बुरा सपना समझ कर भूलना चाहती थी. मेवा भूखीप्यासी पति को छुड़ाने के लिए मारीमारी फिर रही थी. उस ने हाथ जोड़े, पैर पकड़े, फिर भी थानेदार ने उसे मजबूर कर दिया था.
मेवा अगली सुबह तड़के ही थाने के गेट पर पहुंच गई. उस समय पहरे पर दूसरा संतरी खड़ा था. मेवा ने महसूस किया कि उस की भी कामुक निगाहें उस के उभारों पर फिसल रही हैं. लेकिन वह बेपरवाह हो कर आगे बढ़ी. उस ने तो बड़े थानेदार से बात कर रखी थी. कल उस की झोंपड़ी में कैसे मिमिया रहा था…
‘‘अरे… रे… कौन है तू… अंदर कहां भागी जा रही है?’’ संतरी गुर्राते हुए आगे लपका. तब तक मेवा भाग कर थानेदार के दफ्तर तक पहुंच गई थी.
दफ्तर के बाहर शोर सुन कर थानेदार बाहर आ गया. वह मेवा को पहचान तो गया था, फिर भी अनजान बनते हुए दहाड़ा, ‘‘अरे धूल सिंह, यह औरत कौन है? इसे बाहर निकालो.’’
मेवा ने थानेदार की दहाड़ की तरफ ध्यान नहीं दिया. वह गिड़गिड़ाते हुए फरियाद करने लगी, ‘‘साहबजी, मेरे हरिया को छोड़ दो… 2 दिन से घर में चूल्हा नहीं जला. मां बीमार है. हमारा दूसरा कोई सहारा नहीं है. मुझ पर दया करो साहबजी. कल आप ने कहा भी था…’’ मेवा थानेदार के पैरों में झुक गई.
‘‘अरे भई… यहां शोर न करो… यह थाना है… मैं कोशिश कर के देखता हूं. मेरे ऊपर भी अफसर हैं,’’ थानेदार राम सिंह कहते हुए दफ्तर में घुसा, तभी फोन की घंटी घनघना उठी.
‘हैलो थानेदार राम सिंह…’
‘‘बोल रहा हूं सर… क्या हरिया को सीबीआई के हवाले कर दूं… कोई खास बात सर?’’ थानेदार ने पूछा.
वह तो हरिया के बारे में बात करना चाहता था, मगर यहां तो पासा ही पलट गया था.
‘‘राम सिंह, सीबीआई से सूचना मिली है कि हरिया माफिया सरगना इब्राहिम के गैंग से ताल्लुक रखता है. हरिया को छुड़ाने के लिए थाने पर हमला भी हो सकता है. तुम्हारे पास जवान भी कम हैं, इसलिए फौरन हरिया को थाने से निकाल लाओ,’’ दूसरी तरफ से सख्त आदेश था.
‘‘ठीक है सर,’’ कहते हुए राम सिंह तेजी से दफ्तर से बाहर निकला, तो मेवा एक बार फिर से गिड़गिड़ा उठी. शायद उसे पूरी उम्मीद थी कि उस का हरिया छूट जाएगा.फोन पर बातचीत के दौरान उस ने बारबार हरिया के नाम का जिक्र सुना था. साथ ही, कल उस ने साहब को खुश भी किया था.
‘‘अरे धूल सिंह, इसे धक्के मार कर गेट से बाहर निकाल दे. हम इस के बाप के नौकर थोड़े ही हैं. पहले तो अंडरवर्ल्ड के लिए काम करते हैं, फिर हाथपैर जोड़ते हैं,’’ राम सिंह ने सामने खड़े सिपाही से कहा.
‘‘नफे सिंह, जीप स्टार्ट करो… हरिया को सैंट्रल जेल ले जाना है. यह तो हमें भी मरवाएगा,’’ कहते हुए राम सिंह 3 जवानों के साथ हवालात की तरफ बढ़ गया.
रोतीचिल्लाती मेवा को पहरेदार ने गेट से बाहर धकिया दिया. उस ने मेवा को एकाध थप्पड़ मार कर चेतावनी दी, ‘‘अगर ज्यादा हंगामा करेगी, तो हरिया को उम्रकैद हो जाएगी. अगर चुपचाप चली जाएगी, तो 4-5 दिन बाद हरिया अपनेआप घर आ जाएगा. तुझे यहां आने की जरूरत नहीं.’’
बेचारी मेवा लुटीपिटी रोतेसिसकते हुए गेट से बाहर निकाल दी गई थी. पुलिस मददगार के बजाय दुश्मन बन गई थी. हरिया ने भी उसे धोखा दिया था. अगर उसे अपराध करना था, तो मेवा को जिंदगी के सपने दिखाने और उस की बीमार मां की जिम्मेदारी लेने की क्या जरूरत थी?
मेवा को थानेदार और हरिया में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा था. दोनों ने उसे धोखा दिया था. दोनों ने उस की जवानी को लूटा और गुम हो गए.
मालती के पास आमदनी का कोई और जरीया नहीं था. मांबेटी की कमाई से 5 लोगों का पेट भरता था. क्या करे वह? पूजा का काम करना छुड़वा दे, तो आमदनी आधी रह जाएगी. एक अकेली औरत की कमाई से किस तरह 5 पेट पल सकते थे?
मालती अच्छी तरह जानती थी कि वह अपनी बेटी की जवानी को किसी तरह भी इनसानी भेडि़यों के जबड़ों से नहीं बचा सकती थी. न घर में, न बाहर… फिर भी उस ने पूजा को समझाते हुए कहा, ‘‘बेटी, अगर तू मेरी बात समझ सकती है तो ठीक से सुन… हम गरीब लोग हैं, हमारे जिस्म को भोगने के लिए यह अमीर लोग हमेशा घात लगाए रहते हैं. इस के लिए वे तमाम तरह के लालच देते हैं. हम लालच में आ कर फंस जाते हैं और उन को अपना बदन सौंप देते हैं.
‘‘गरीबी हमारी मजबूरी है तो लालच हमारा शाप. इस की वजह से हम दुख और तकलीफें उठाते हैं.
‘‘हम गरीबों के पास इज्जत के नाम पर कुछ नहीं होता. अगर मैं तुझे काम पर न भेजूं और घर पर ही रखूं तब भी तो खतरा टल नहीं सकता. चाल में भी तो आवाराटपोरी लड़के घूमते रहते हैं.
‘‘अमीरों से तो मैं तुझे बचा लूंगी. पर इस खोली में रह कर इन गली के आवारा कुत्तों से तू नहीं बच पाएगी. खतरा सब जगह है. बता, तुझे दुनिया की गंदी नजरों से बचाने के लिए मैं क्या करूं?’’ और वह जोर से रोने लगी.
पूजा ने अपने आंसुओं को पोंछ लिया और मां का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘मां, तुम चिंता मत करो. अब मैं किसी की बातों में नहीं आऊंगी. किसी का दिया हुआ कुछ नहीं लूंगी. केवल अपने काम से काम रखूंगी.
‘‘हां, कल से मैं कांबले के घर काम करने नहीं जाऊंगी. कोई और घर पकड़ लूंगी.’’
‘‘देख, हमारे पास कुछ नहीं है, पर समझदारी ही हमारी तकलीफों को कुछ हद तक कम कर सकती है. अब तू सयानी हो रही है. मेरी बात समझ गई है. मुझे यकीन है कि अब तू किसी के बहकावे में नहीं आएगी.’’
पूजा ने मन ही मन सोचा, ‘हां, मैं अब समझदार हो गई हूं.’
मालती अच्छी तरह जानती थी कि ये केवल दिलासा देने वाली बातें थीं और पूजा भी इतना तो जानती थी कि अभी तो वह जवानी की तरफ कदम बढ़ा रही थी. पता नहीं, आगे क्या होगा? बरसात का पानी और लड़की की जवानी कब बहक जाए और कब किधर से किधर निकल जाए, किसी को पता नहीं चलता.
पूजा अभी छोटी थी. जवानी तक आतेआते न जाने कितने रास्तों से उसे गुजरना पड़ेगा… ऐसे रास्तों से जहां बाढ़ का पानी भरा हुआ है और वह अपनी पूरी होशियारी और सावधानी के साथ भी न जाने कब किस गड्ढे में गिर जाए.
वे दोनों ही जानती थीं कि जो वे सोच रही थीं, वही सच नहीं था या जैसा वे चाह रही हैं, उसी के मुताबिक जिंदगी चलती रहेगी, ऐसा भी नहीं होने वाला था.
दिन बीतते रहे. मालती अपनी बेटी की तरफ से होशियार थी, उस की एकएक हरकत पर नजर रखती. उन दोनों के बीच में बात करने का सिलसिला कम था, पर बिना बोले ही वे दोनों एकदूसरे की भावनाओं को जानने और समझने की कोशिश करतीं.
पर जैसेजैसे बेटी बड़ी हो रही थी, वह और ज्यादा समझदार होती जा रही थी. अब वह बड़े सलीके से रहने लगी थी और उसे अपने भावों को छिपाना भी आ गया था.
इधर काफी दिनों से पूजा के रंगढंग में काफी बदलाव आ गया था. वह अपने बननेसंवरने में ज्यादा ध्यान देती, पर इस के साथ ही उस में एक अजीब गंभीरता भी आ गई थी. ऐसा लगता था, जैसे वह किन्हीं विचारों में खोई रहती हो. घर के काम में मन नहीं लगता था.
मालती ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘बेटी, मुझे डर लग रहा है. कहीं तेरे साथ कुछ हो तो नहीं गया?’’
पूजा जैसे सोते हुए चौंक गई हो, ‘‘क्या… क्या… नहीं तो…’’
‘‘मतलब, कुछ न कुछ तो है,’’ उस ने बेटी के सिर पर हाथ रख कर कहा.
पूजा के मुंह से बोल न फूटे. उस ने अपना सिर झुका लिया. मालती समझ गई, ‘‘अब कुछ बताने की जरूरत नहीं है. मैं सब समझ गई हूं, पर एक बात तू बता, जिस से तू प्यार करती है, वह तेरे साथ शादी करेगा?’’
पूजा की आंखों में एक अनजाना सा डर तैर गया. उस ने फटी आंखों से अपनी मां को देखा. मालती उस की आंखों में फैले डर को देख कर खुद सहम गई. उसे लगा, कहीं न कहीं कोई बड़ी गड़बड़ है.
डरतेडरते मालती ने पूछा, ‘‘कहीं तू पेट से तो नहीं है?’’
पूजा ने ऐसे सिर हिलाया, जैसे जबरदस्ती कोई पकड़ कर उस का सिर हिला रहा हो. अब आगे कहने के लिए क्या बचा था.
मालती ने अपना माथा पीट लिया. न वह चीख सकती थी, न रो सकती थी, न बेटी को मार सकती थी. उस की बेबसी ऐसी थी, जिसे वह किसी से कह भी नहीं सकती थी.
जो मालती नहीं चाहती थी, वही हुआ. उस की जिंदगी में जो हो चुका था उसी से बेटी को आगाह किया था. ध्यान रखती थी कि बेटी नरक में न गिर जाए. बेटी ने भी उसे भरोसा दिया था कि वह कोई गलत कदम नहीं उठाएगी, पर जवानी की आग को दबा कर रख पाना शायद उस के लिए मुमकिन नहीं था.
मरी हुई आवाज में उस ने बस इतना ही पूछा, ‘‘किस का है यह पाप…?’’
पूजा ने पहले तो नहीं बताया, जैसा कि आमतौर पर लड़कियों के साथ होता है. जवानी में किए गए पाप को वे छिपा नहीं पातीं, पर अपने प्रेमी का नाम छिपाने की कोशिश जरूर करती हैं. हालांकि इस में भी वे कामयाब नहीं होती हैं, मांबाप किसी न किसी तरीके से पूछ ही लेते हैं.
पूजा ने जब उस का नाम बताया, तो मालती को यकीन नहीं हुआ. उस ने चीख कर पूछा, ‘‘तू तो कह रही थी कि कांबले के यहां काम छोड़ देगी?’’
‘‘मां, मैं ने तुम से झूठ बोला था. मैं ने उस के यहां काम करना नहीं छोड़ा था. मैं उस की मीठीमीठी और प्यारी बातों में पूरी तरह भटक गई थी. मैं किसी और घर में भी काम नहीं करती थी, केवल उसी के घर जाती थी.
‘‘वह मुझे खूब पैसे देता था, जो मैं तुम्हें ला कर देती थी कि मैं दूसरे घरों में काम कर के ला रही हूं, ताकि तुम्हें शक न हो.’’
‘‘फिर तू सारा दिन उस के साथ रहती थी?’’
पूजा ने ‘हां’ में सिर हिला दिया. ‘‘मरी, हैजा हो आए, तू जवानी की आग बुझाने के लिए इतना गिर गई. अरे, मेरी बात समझ जाती और तू उस के यहां काम छोड़ कर दूसरों के घरों में काम करती रहती, तो शायद किसी को ऐसा मौका नहीं मिलता कि कोई तेरे बदन से खिलवाड़ कर के तुझे लूट ले जाता. काम में मन लगा रहता है, तो इस काम की तरफ लड़की का ध्यान कम जाता है. पर तू तो बड़ी शातिर निकली… मुझ से ही झूठ बोल गई.’’
पूजा अपनी मां के पैरों पर गिर पड़ी और सिसकसिसक कर रोने लगी, ‘‘मां, मैं तुम्हारी गुनाहगार हूं, मुझे माफ कर दो. एक बार, बस एक बार… मुझे इस पाप से बचा लो.’’
मालती गुस्से में बोली, ‘‘जा न उसी के पास, वह कुछ न कुछ करेगा. उस को ले कर डाक्टर के पास जा और अपने पेट के पाप को गिरवा कर आ…’’
‘‘मां, उस ने मना कर दिया है. उस ने कहा है कि वह पैसे दे देगा, पर डाक्टर के पास नहीं जाएगा. समाज में उस की इज्जत है, कहीं किसी को पता चल गया तो क्या होगा, इस बात से वह डरता है.’’
‘‘वाह री इज्जत… एक कुंआरी लड़की की इज्जत से खेलते हुए इन की इज्जत कहां चली जाती है? मैं क्या करूं, कहां मर जाऊं, कुछ समझ में नहीं आता,’’ मालती बोली.
मालती ने गुस्से और नफरत के बावजूद भी पूजा को परे नहीं किया, उसे दुत्कारा नहीं. बस, गले से लगा लिया और रोने लगी. पूजा भी रोती जा रही थी.
दोनों के दर्द को समझने वाला वहां कोई नहीं था… उन्हें खुद ही हालात से निबटना था और उस के नतीजों को झेलना था.
मन थोड़ा शांत हुआ, तो मालती उठी और कपड़ेलत्ते व दूसरा जरूरी सामान समेट कर फटेपुराने बैग में भरने लगी. बेटी ने उसे हैरानी से देखा. मां ने उस की तरफ देखे बिना कहा, ‘‘तू भी तैयार हो जा और बच्चों को तैयार कर ले. गांव चलना है. यहां तो तेरा कुछ हो नहीं सकता. इस पाप से छुटकारा पाना है. इस के बाद गांव में रह कर ही किसी लड़के से तेरा ब्याह कर देंगे.’’
मालती काम से लौटी थी… थकीमांदी. कुछ देर लेट कर आराम करने का मन कर रहा था, पर उस की जिंदगी में आराम नाम का शब्द नहीं था. छोटा वाला बेटा भूखाप्यासा था. वह 2 साल का हो गया था, पर अभी तक उस का दूध पीता था.
मालती के खोली में घुसते ही वह उस के पैरों से लिपट गया. उस ने उसे अपनी गोद में उठा कर खड़ेखड़े ही छाती से लगा लिया. फिर बैठ कर वह उसे दूध पिलाने लगी थी.
सुबह मालती उसे खोली में छोड़ कर जाती थी. अपने 2 बड़े भाइयों के साथ खोली के अंदर या बाहर खेलता रहता था. तब भाइयों के साथ खेल में मस्त रहने से न तो उसे भूख लगती थी, न मां की याद आती थी.
दोपहर के बाद जब मालती काम से थकीमांदी घर लौटती, तो छोटे को अचानक ही भूख लग जाती थी और वह भी अपनी भूखप्यास की परवाह किए बिना या किसी और काम को हाथ लगाए बेटे को अपनी छाती का दूध पिलाने लगती थी.
तभी मालती की बड़ी लड़की पूजा काम से लौट कर घर आई. पूजा सहमते कदमों से खोली के अंदर घुसी थी. मां ने तब भी ध्यान नहीं दिया था. पूजा जैसे कोई चोरी कर रही थी. खोली के एक किनारे गई और हाथ में पकड़ी पोटली को कोने में रखी अलमारी के पीछे छिपा दिया.
मां ने छोटू को अपनी छाती से अलग किया और उठने को हुई, तभी उस की नजर बेटी की तरफ उठी और उसे ने पूजा को अलमारी के पीछे थैली रखते हुए देख लिया.
मालती ने सहज भाव से पूछा, ‘‘क्या छिपा रही है तू वहां?’’
पूजा चौंक गई और असहज आवाज में बोली, ‘‘कुछ नहीं मां.’’
मालती को लगा कि कुछ तो गड़बड़ है वरना पूजा इस तरह क्यों घबराती.
मालती अपनी बेटी के पास गई और उस की आंखों में आंखें डाल कर बोली, ‘‘क्या है? तू इतनी घबराई हुई क्यों है? और यहां क्या छिपाया है?’’
‘‘कुछ नहीं मां, कुछ नहीं…’’ पूजा की घबराहट और ज्यादा तेज हो गई. वह अलमारी से सट कर इस तरह खड़ी हो गई कि मालती पीछे न देख सके.
मालती ने जोर से पकड़ कर उसे परे धकेला और तेजी से अलमारी के पीछे रखी पोटली उठा ली.
हड़बड़ाहट में मालती ने पोटली को खोला. पोटली का सामान अंदर से सांप की तरह फन काढ़े उसे डरा रहे थे… ब्रा, पैंटी, लिपस्टिक, क्रीम, पाउडर और तेल की शीशी…
मालती ने फिर अचकचा कर अपनी बेटी पूजा को गौर से देखा… उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. उस की बेटी जवान तो नहीं हुई थी, पर जवानी की दहलीज पर कदम रखने के लिए बेचैन हो रही थी.
मालती का दिल बेचैन हो गया. गरीबी में एक और मुसीबत… बेटी की जवानी सचमुच मांबाप के लिए एक मुसीबत बन कर ही आती है खासकर उस गरीब की बेटी की, जिस का बाप जिंदा न हो. मालती की सांसें कुछ ठीक हुईं, तो बेटी से पूछा, ‘‘किस ने दिया यह सामान तुझे?’’
मां की आवाज में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक हताशा और बेचारगी भरी हुई थी.
पूजा को अपनी मां के ऊपर तरस आ गया. वह बहुत छोटी थी और अभी इतनी बड़ी या जवान नहीं हुई थी कि दुनिया की सारी तकलीफों के बारे में जान सके. फिर भी वह इतना समझ गई थी कि उस ने कुछ गलत किया था, जिस के चलते मां को इस तरह रोना पड़ रहा था. वह भी रोने लगी और मां के पास बैठ गई.
बेटी की रुलाई पर मालती थोड़ा संभली और उस ने अपने ममता भरे हाथ बेटी के सिर पर रख दिए.
दोनों का दर्द एक था, दोनों ही औरतें थीं और औरतों का दुख साझा होता है. भले ही, दोनों आपस में मांबेटी थीं, पर वे दोनों एकदूसरे के दर्द से न केवल वाकिफ थीं, बल्कि उसे महसूस भी कर रही थीं.
पूजा की सिसकियां कुछ थमीं, तो उस ने बताया, ‘‘मां, मैं ले नहीं रही थी, पर उस ने मुझे जबरदस्ती दिया.’’
‘‘किस ने…?’’ मालती ने बेचैनी से पूछा.
‘‘गोकुल सोसाइटी के 401 नंबर वाले साहब ने…’’
‘‘कांबले ने?’’ मालती ने हैरानी से पूछा.
‘‘हां… मां, वह मुझ से रोज गंदीगंदी बातें करता है. मैं कुछ नहीं बोलती तो मुझे पकड़ कर चूम लेता है,’’ पूजा जैसे अपनी सफाई दे रही थी.
मालती ने गौर से पूजा को देखा. वह दुबलेपतले बदन की सांवले रंग की लड़की थी, कुल जमा 13 साल की… बदन में ऐसे अभी कोई उभार नहीं आए थे कि किसी मर्द की नजरें उस पर गड़ जाएं.
हाय रे जमाना… छोटीछोटी बच्चियां भी मर्दों की नजरों से महफूज नहीं हैं. पलक झपकते ही उन की हैवानियत और हवस की भूख का शिकार हो जाती हैं.
मालती को अपने दिन याद आ गए… बहुत कड़वे दिन. वह भी तब कितनी छोटी और भोली थी. उस के इसी भोलेपन का फायदा तो एक मर्द ने उठाया था और वह समझ नहीं पाई थी कि वह लुट रही थी, प्यार के नाम पर… पर प्यार कहां था वह… वह तो वासना का एक गंदा खेल था.
इस खेल में मालती अपनी पूरी मासूमियत के साथ शामिल हो गई थी. नासमझ उम्र का वह ऐसा खेल था, जिस में एक मर्द उस के अधपके बदन को लूट रहा था और वह समझ रही थी कि वह मर्दऔरत का प्यार था.