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Short Story : जमुनिया

Short Story. गहरी काली रात थी. हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. जमुनिया ने जैसे ही किवाड़ बंद करना चाहा, किसी की दस्तक हुई.

‘‘कौन?’’ उस ने जोर से पुकारा. ‘‘मैं हूं जमुनिया… मैं प्रधान,’’ आवाज आई.

उस ने दरवाजा खोल दिया. प्रधान देवीशंकर सामने थे. बोले, ‘‘कल ब्लाक पर मीटिंग है. इंदिरा आवास के जरूरतमंदों की सूची देनी है, इसलिए चला आया. तेरी भी छानीछप्पर है. सोचा, तुझे भी इंदिरा आवास की जरूरत होगी.’’

‘‘आइए… बैठिए,’’ जमुनिया ने बेमन से चारपाई झाड़ते हुए कहा. उस का दिल धकधक कर रहा था. सोच रही थी, ‘इतनी रात गए इस ने कुछ ऐसावैसा किया, तो मैं अकेली क्या करूंगी?’

उस के मन में कबूतरी की कहानी कौंध गई, जिसे विधवा पेंशन दिलाने के नाम पर इस ने चूस डाला था. उस ने तय किया कि घर आई इस बला को किसी तरह मीठीमीठी बातों से टरका देने में ही भलाई है.

वह जमीन पर बैठने को हुई, तो देवीशंकर ने चारपाई पर अपने बगल में बैठने को कहा, ‘‘यहां बैठ जमुनिया, यहां… जमीन पर क्या…’’

वह जमीन पर ही बैठ गई. बोली, ‘‘हां, चारपाई पर कैसे बैठूं. अब क्या काकादादा के बराबर ही बैठना रह गया है.’’

‘‘ओहो जमुनिया,’’ देवीशंकर मुसकराते हुए बोले, ‘‘ये सब पुराने जमाने की घिसीपिटी बातें हैं. तू तो नए जमाने की है. आ बैठ यहां… आ… आ.’’

‘‘नहीं प्रधानजी, मैं यहीं ठीक हूं,’’ कहते हुए वह जमीन पर ही बैठ गई.

देवीशंकर के चेहरे पर अचानक हमदर्दी के रंग तैर उठे, ‘‘जमुनिया, जब भी तुझे देखता हूं, तो तरस आता है. इतनी कम उम्र में तेरा पति मर गया. अच्छा जमुनिया, यह बता, तेरा घर गांव के बिलकुल किनारे है. तुझे अकेले रहते डर तो लगता होगा?’’

‘‘किस का डर?’’ जमुनिया ने पूछा.

‘‘दुनिया बहुत खराब है जमुनिया. अकेली औरत के लिए तो और खराब. लफंगों की भरमार है. न जाने कब, कौन अपनी हवस मिटाने यहां…’’ देवीशंकर कहतेकहते रुक गए.

जमुनिया पहले तो कुछ सकपकाई, फिर हिम्मत कर के बोली, ‘‘मैं चीर कर खा नहीं जाऊंगी उसे. किस की हिम्मत है, जो मेरे घर में घुसे.’’

यह सुन कर देवीशंकर बुरी तरह हिल उठे, मानो कहने के लिए कुछ सूझ ही नहीं रहा था. देर तक चुप्पी छाई रही.

यह चुप्पी जमुनिया ने ही तोड़ी, ‘‘तो प्रधानजी, इंदिरा आवास योजना से मेरा मकान बनवा दो.’’

‘‘हां,’’ वह ऐसे चौंके, जैसे किसी गहरी सोच से बाहर आए हों, ‘‘बिलकुल, बिलकुल, लेकिन…’’

‘‘लेकिन, क्या प्रधानजी?’’ ‘‘मेरा मतलब है…’’ कहतेकहते फिर अटक से गए देवीशंकर.

‘‘तू बुरा मान जाएगी,’’ वह बुदबुदाए. वह बोली, ‘‘कहो प्रधानजी, दिल खोल कर कहो. जमुनिया से क्यों हिचकते हो? मैं गैर हूं क्या?’’

‘‘तो कहूं.’ ‘‘हां, शौक से कहो. मैं आखिर आप की बेटी जैसी हूं,’’ उस ने कहा.

देवीशंकर का मन एकदम से कसैला हो गया. बोला, ‘‘ठीक है जमुनिया, तुम मेरी बेटी की उम्र की हो. पर भई, मेरा मतलब है, पूरी दुनिया को बेटी बनाने से काम कैसे चलेगा?’’

‘‘मैं समझी नहीं,’’ वह घबरा उठी.

देवीशंकर ने समझाया, ‘‘जमुनिया, तू तो जानती ही है, तेरी चाची सूखे आम की गुठली हो गई हैं, बिलकुल बदमजा, बदरंग और रसहीन. समझ, मेरी जिंदगी ही बदमजा हो गई. बहुत दुखी रहता हूं, तू चाहे तो…’’

‘‘मतलब?’’ जमुनिया ने पूछा. ‘‘तू मुझे उबार ले जमुनिया,’’ देवीशंकर के चेहरे पर गुजारिश थी.

जमुनिया हंसी, तो हंसती ही गई. देवीशंकर ने उठ कर उस के कंधे पर हाथ रखा, ‘‘क्या बात है जमुनिया?’’

वह किसी तरह अपनी हंसी पर काबू पाते हुए बोली, ‘‘मैं तो समझती थी कि मेरी जिंदगी उजाड़ हो गई. मैं बहुत खुश हूं प्रधानजी. सच मानो, मैं पति की मौत के बाद बहुत तरसी हूं. मेरी किस्मत है कि आप मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं.

‘‘मैं आप को खुश करने के लिए तैयार हूं, पर एक मुश्किल है.’’ ‘‘क्या?’’ वह जमीन पर उस की बगल में बैठ कर धीरेधीरे उस की पीठ पर हाथ फेरने लगे.

जमुनिया इठलाती हुई बोली, ‘‘तुम भी बिलकुल बुद्धू हो प्रधानजी. पति है नहीं, कोई बात न बनी, तो नाहक बदनामी होगी. तुम अभी सड़क वाले तिराहे पर चले जाओ. मेडिकल स्टोर अभी खुला होगा. कंडोम ले आओ.’’

देवीशंकर के पैरों में पंख लग गए. वह तेजी से निकल कर तिराहे की ओर मेडिकल स्टोर भागे.

कुछ ही देर में वह लौट आए. दरवाजा ठेल कर भीतर घुसे, तो घुप्प अंधेरा था. वह टटोलते हुए आंगन में पहुंचे और धीरे से पुकारा, ‘‘जमुनिया… जमुनिया.’’

उन्हें लगा, आंगन के एक कोने से चूडि़यों के खनकने की आवाज आई है. वह उसी ओर तेजी से बढ़े. फुसफुसाते हुए वह बोले, ‘‘मैं कंडोम ले आया जमुनिया, यह है… यह.’’

‘तड़ाक’ एक जोरदार तमाचा उन के गाल पर आ पड़ा. फिर एक कड़क आवाज गूंजी, ‘‘तो कंडोम लाए हो तुम. इस बुढ़ापे में यही करते हो. आज देखो, तुम्हारा क्या हाल करती हूं.’’

देवीशंकर को काटो तो खून नहीं. यह तो उन की बीवी देवकी थी. देवकी की चीख सुन कर पासपड़ोस के तमाम लोग जमा हो गए.

जमुनिया कोने में खड़ी देवीशंकर की बदनीयती पर बड़बड़ा रही थी. हर कोई देवीशंकर को कोस रहा था.

देवकी ने पीटतेपीटते देवीशंकर को निढाल कर दिया. वह लहरा कर जमीन पर गिरे, फिर बेहोश हो गए. वहीं खड़े मास्टरजी बोले, ‘‘अरे, कोई इस के मुंह पर पानी छिड़के.’’

देवकी भभक उठी, ‘‘इस पापी को मर जाने दो मास्टर चाचा. ऐसे मरद के होने से तो विधवा होना अच्छा.’’

जमुनिया गुस्से में बोली, ‘‘मैं थूक देती हूं इस के मुंह पर. होश में आ जाएगा.’’ उस ने सचमुच देवीशंकर के मुंह पर थूक दिया.

-मुन्नू लाल

Social Story in Hindi : सती

Social Story in Hindi. कभीकभी जिंदगी का डर भी आदमी को मरने के लिए मजबूर कर देता है. कभी मरने के बाद अमर होने की चाह से भी आदमी मरने को तैयार हो जाता है. कभीकभी आदमी को जीने से बेहतर मरना अच्छा लगता है. जब जिंदगी मौत से बदतर हो जाए, तो आदमी मरना पसंद करता है. इसे खुदकुशी कह सकते हैं.

भविष्य का डर, समाज की परंपराएं, कुरीतियां या सोच, जो भी कह लो, हमारे गांव में अगर किसी विधवा बूढ़ी औरत जब यह सब करती है या उसे जब जबरदस्ती झुलसती आग में जिंदा झोंक दिया जाए, तो उसे कत्ल या खुदकुशी नहीं कहते, बल्कि उसे कहते हैं सती होना.

पति के रहते ही जब वह बहूबेटों को फूटी आंख नहीं सुहा रही थी, तो बाद में तो वे दानेदाने को तरस जाएंगे. कितना बेइज्जत होना पड़ेगा, जराजरा सी बात पर. कभी खाने के लिए, कभी बीमारी के लिए.

जो जायदाद थी, वह उस के पति और उस ने अपनी बढ़ती उम्र को देखते ही बच्चों के नाम बराबरबराबर बांट दी थी, ताकि बाद में बच्चों में बंटवारे को ले कर आपस में झगड़ा न हो, इसलिए आज रामवती की आंखों के सामने उस के पति की लाश धूधू कर जल रही थी और किसी की आंख से दो आंसू भी न टपके.

रामवती का सोचना था कि उस की उम्र 80 साल है और कितना जिएगी… 5-10 साल. क्या करेगी जी कर. सिर घुटा कर, सफेद साड़ी में, एक कमरे में पड़े रहो रूखीसूखी खा कर. बहुएं सुनती नहीं, लड़कों को फुरसत नहीं. नातीपोते अपने खेलने और पढ़ने में मसरूफ हैं. उस बुढि़या की किसी को जरूरत नहीं.

फिर अपने खुद के रोज के काम से ले कर रात तक बिना सहारे के कुछ कर नहीं सकती. वैसे भी आंखों से दिखता नहीं, कानों से सुनाई पड़ता नहीं. हाथपैर में कंपन, चलनेफिरने को लाचार. अब तो लाठी के सहारे भी नहीं. फिर बुढ़ापे की बीमारी. नींद है कि आती नहीं.

इस से अच्छा है कि अभी थोड़ा कष्ट सह ले. आज जो लोग नाकमुंह सिकोड़ रहे हैं, कल वे माता कह कर मरने के बाद पूजा करेंगे. खानदान का नाम भी रह जाएगा. फिर जितना जीना था, जी चुके. अब ऐसे जीने से तो अच्छा है सारे झंझटों से छुटकारा. हमेशा के लिए नाम का नाम, घर तो घर, गांवभर में पूजा होगी.

बस, रामवती पति की चिता की ओर यह कह कर बढ़ गई कि वह सती होगी. सब खुश. थोड़ी देर रामवती चीखी, फिर पति के साथ राख हो गया उस का जिस्म. अब रामवती का मंदिर बन चुका है गांव में.

किसी की चालाकी भरा काम अगर भविष्य में मिसाल बन जाए, तो बाद के लोगों को इस से परेशानी होती है. कुछ फायदा भी उठाते हैं, कुछ नुकसान भी.

चमेली अपनी बूढ़ी सास की सेवा भी करती और मजदूरी भी. सास हमेशा अपनी बहू को सती रामवती की कहानी सुनाती और उसे इस बात की सलाह भी देती कि पति के बाद जीना बेकार है. अकेली औरत का जीना दूभर होता है.

हां, वैसे चमेली की सास के पति यानी चमेली के ससुर को मरे अरसा हो गया था, लेकिन सास सती क्यों नहीं हुई, इस का जवाब भी सास यह कह कर देती कि घीसू पैदा हो गया था, तो उसे सहारा मिल गया था.

घीसू शहर में जा कर बस गया था. उस ने वहां दूसरी शादी भी कर ली थी. उसे चमेली से और चमेली को भी उस से वैसे कोई लगाव न था और यह घीसू जानता था कि गांव में छोटी जात की औरतों के साथ क्याक्या होता रहता है, इसलिए भी वह साल में एकाध बार ही आता. कुछ पैसे टिकाता और काम के बहाने शहर चला जाता.

चमेली को मालूम था कि उस का आदमी दूसरी शादी कर चुका है, लेकिन उस ने खिलाफत नहीं की. उसे मालूम भी नहीं था कि खिलाफत कैसे की जाती है. वह तो केवल यह जानती थी कि औरत और फिर छोटी जात की औरत बड़े लोगों की रखैल है, वेश्या है. जब जिस का जी चाहे, जहां भी मिले, अपनी गरमी बुझाए और चलता बने. सास भी समझती थी कि उस की बहू के साथ वह सबकुछ होता होगा, जो उस के साथ होता रहा था.

गांव के जमींदार हों या ठाकुर साहब या फिर उन के जवान लड़के गांव की गरीब व छोटी जात की औरतों को भेड़बकरी की तरह समझते थे. चमेली को तो कई बार मजदूरी करते समय खेत में सब के सामने उठा कर पटका, नंगा किया, बलात्कार किया और वैसा ही छोड़ कर चलते बने.

दारोगा के पास गई, तो उन्होंने कोई कार्यवाही करने के बजाय उसे हवालात में लिटा कर अपनी जिस्म की आग बुझाई और डांटडपट कर चलता किया.

चमेली इस बात के लिए दिमागी रूप से तैयार रहती थी कि मजदूरी के लिए निकलते वक्त कोई भी ठाकुर, ब्राह्मण या पुलिस वाला उसे नंगा कर के अपनी आग बुझा सकता है.

सुना है, सरकार ने निचली जात वालों के लिए अलग नियमकानून बनाए, पढ़ाई का बंदोबस्त किया. अब तो गांव में भी फोन, मोबाइल, टीवी बहुत सी चीजें आ गई हैं. विज्ञान ने अपने पैर पसार लिए हैं. मीडिया वाले भी अपनी खोजी निगाह रखते हैं.

इस के बावजूद बड़ा और बड़ा हुआ है, गरीब और ज्यादा गरीब. फिर पढ़नेलिखने के लिए समय तो चाहिए. काम कर के दो वक्त की रोटी जुटाना तो मुश्किल होता है, पेट देखें कि पढ़ाई.

चमेली का कोई नहीं था, इसलिए वह अपनी सास के साथ उसी के खपरैल वाले कच्चे मकान में रहती थी. वैसे चमेली को अपने पति से कोई उम्मीद नहीं थी. चमेली जो कमा कर लाती, उस से वह खुद भी खाती और सास को भी खिलाती.

सास को चमेली का ही सहारा था और चमेली को सास का. कम से कम इतना सहारा तो था कि सास का झोंपड़ा उस का भी था, इसलिए सासबहू साथ में मिलजुल कर रहते थे.

गांव में स्कूल था. सो, गांव के मास्टर की जानकारी भरी बातें सुनने के अलावा वह गांव की पंचायत में कभीकभी टीवी भी देख लेती. अब कुछ तो दिमाग पर चोट पड़ती ही है.

हुआ यह कि चमेली को बच्चा ठहर गया. उस ने जमींदार को कहा कि इसे स्वीकारो या गिरवाओ, क्योंकि घीसू का तो है नहीं. हो गया, तो बच्चे और उस को पापी ही कहा जाएगा.

जमींदार के बाद उस ने यही बात दारोगा से भी कही और उस बनिए से भी, जो अपने शरीर की भूख मिटाने और चमेली व उस की सास के लिए नमक, तेल, अनाज यानी चमेली के पेट की भूख मिटाने के लिए अकसर उस के साथ सोया करता था.

गांव में जमींदार, बनिया और दारोगा में अच्छी जमती थी. आपस में चमेली को ले कर बात भी हुई. चमेली दबी जबान में धमकी भी दे गई थी. गांव के ये ऊंचे पापी नहीं चाहते थे कि उन के घरों में यह सब पता चले.

सो, पहले तो उन्होंने चमेली को गांव के ही एक कंपाउंडर को दिखाया. उस ने कहा कि अब यह बच्चा गिराया नहीं जा सकता, पहले आना था. डाक्टर साहब तो गांव के अस्पताल में महीने में एकाध बार ही आते थे. कंपाउंडर से पूछा भी तो उस ने कह दिया था डाक्टर भी मना कर देगा.

वैसे डाक्टर शहर के अपने नर्सिंग होम में यह काम रोज ही करता था, तगड़ी फीस ले कर. लेकिन 1-2 महीने का पेट होता तो बात और थी. अब तो 4 महीने हो गए हैं, कुछ नहीं हो सकता.

फिर क्या करें, सभी सोच रहे थे. क्या चमेली को मरवा दिया जाए? तभी खबर मिली कि चमेली के पति घीसू ने शहर में खुदकुशी कर ली है, क्योंकि उस की शहरी बीवी उसे छोड़ कर किसी और के साथ भाग गई. घीसू की लाश को गांव लाया गया.

फिर क्या था, गांव के पंडे को बुलाया गया और उस पर दबाव डाला गया कि वह गांव में पड़ रहे सूखे से बचने के लिए फौरन ऐलान करे कि अगर कोई औरत सती हो जाए तो…

पंडा पहले तो तैयार नहीं हुआ, फिर जब उसे यह याद दिलाया गया कि उसे मंदिर का पंडा, रहने को घर और अनाजपानी कहां से मिलता है, तो पंडे को अपनी रोजीरोटी छिनती नजर आई. उसे तैयार होना पड़ा. गांव में खासकर हरिजन बस्ती में, जहां चमेली रहती, इस का प्रचारप्रसार हुआ.

मजदूर तबका, अपढ़, कुरीतियों का शिकार, फिर न मानने पर गांव से हुक्कापानी बंद होने का डर. फिर पानी का गिरना भी जरूरी है, पंडा झूठ तो नहीं कहेगा. सती होना तो फख्र की बात है.

चमेली समझ गई कि अपने पाप छिपाने के लिए उसे बलि का बकरा बनाया जा रहा है. उस के आदमी की लाश सामने पड़ी थी. घीसू की मां का रोरो कर बुरा हाल था. लाश फूंकने के खर्चे के लिए उसे जमींदार के सामने हाथपैर जोड़ने पड़े. उन्होंने समझाया कि चमेली का सती होना जरूरी है.

यह सुन कर पहले तो सास घबरा गई. उस ने मना कर दिया. फिर उस के बुढ़ापे के लिए जब जमींदार ने दोनों वक्त की मुफ्त रोटी के इंतजाम की बात की, तो वह तैयार हो गई.

गांव के हरिजन बस्ती के कुछ लोग जो तैयार नहीं थे, उन्हें यह कह कर समझाया गया कि उन की जात में पहली बार किसी का मंदिर बनेगा. उन्हें भी बराबर का हक होगा, सती मंदिर में पूजा का, प्रवेश का. वे अपने हाथों से चमेली के सती मंदिर में पूजापाठ कर सकेंगे.

वैसे तो उन्हें गांव के मंदिर में घुसना मना था, लेकिन उन की जात के लिए फख्र की बात होगी. फिर हुक्कापानी बंद. काम बंद. रोटीपानी बंद का डर भी.

चमेली को तरहतरह से समझाया गया, डराया गया. उस ने खिलाफत की, तो उसी के जात के लोगों ने उसे यह कह कर बदचलन कहा कि पेट में गांवभर का पाप, चरित्रहीन, कुलटा. एक अच्छा मौका मिल रहा है, फिर भी नाटक कर रही है. अपनी नहीं, तो अपनी जातबिरादरी की सोच. फिर घीसू की अंतिम क्रिया भी तो करनी है. कहां से आएगा पैसा? कौन करेगा? बड़े लोग ही न?

तय समय पर घीसू को श्मशान घाट ले जाया गया. चमेली, जिस को घीसू के मरने का बहुत ज्यादा दुख नहीं था, फिर भी उस की चिता पर उस को जिंदा जलना पड़ रहा था.

घीसू की चिता को आग दी गई. चमेली को सजायासंवारा गया, नई साड़ी पहनाई गई, फूलों की माला पहनाई और तिलक लगा कर ऐसे तैयार किया गया, जैसे बलि से पहले बकरे को.

गांव के हरिजन बस्ती के ही 4 लठैत चिता के चारों ओर खड़े थे. अगर ऐन वक्त पर चमेली खिलाफत करे, तो उसे डंडों से मार कर चिता से बाहर तब तक नहीं निकलने दिया जाए, जब तक कि वह जल नहीं जाती.

गांव के लोग तमाशा देखने के लिए इकट्ठा हो चुके थे. वे चमेली माता की जयजयकार कर रहे थे. चमेली भी सोच रही थी कि जीतेजी तो भेड़बकरियों की तरह हांकते रहे, चलो, मरने पर ही कुछ इज्जत मिले. धूधू कर जलती हुई आग में जब चमेली को चढ़ाया गया, तो वह चीख पड़ी.

आग की लपटों में घिरी थी चमेली. उस की चीख गांव वालों की जयजयकार में दब गई. जब भी वह जलती चिता से बाहर आने की कोशिश करती, चारों लठैत डंडों से मारने लगते. धीरेधीरे चमेली भी घीसू के साथसाथ राख हो गई.

कौन कहता है कि चमेली की हत्या की गई. न रामवती ने आत्महत्या की थी और न चमेली की हत्या हुई. दोनों ही सती हुईं. अब मीडिया से भला क्या छिपा है. इलैक्ट्रौनिक मीडिया के कैमरे ने सारा नजारा अपने कैमरे में कैद कर लिया.

जनप्रतिनिधि से भी पूछा गया कि इस बारे में उन का क्या कहना है? आरोपियों के खिलाफ पुलिस क्या कार्यवाही कर रही है?

इस पर जनप्रतिनिधि ने यह कहा कि कुसूरवारों को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन अहम बात यह है कि लोगों को पढ़ालिखा और समझदार बना कर अंधविश्वास को मिटाना है. कैमरे में सारे सुबूत थे. इस के बावजूद कार्यवाही करने को कहा गया.

कार्यवाही के नाम पर गांव वालों से पूछताछ हुई. उन 4 लठैतों और चमेली की सास की गिरफ्तारी हुई. 2-4 दिनों बाद मामला ठंडा पड़ गया.

अंधविश्वास को मिटाने की बात कहने वाले जनप्रतिनिधि ने चमेली सती मंदिर की नींव रखी. हरिजन वोट भी उन के और ऊंचे तबके से माली चुनावी मदद भी. फिर बरसात भी हुई. सती होने के चलते बारिश हुई. गांव वालों के मन में यह बात घर कर गई कि सती होने की वजह से ही यह बारिश हुई.Social Story in Hindi

Story : कमला

Story. मेरी बीवी की बीमारी की वजह से हमें घर के रोज के कामों मसलन, झाड़ू, पोंछा, बरतन वगैरह के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था. छोटा शहर होने की वजह से काम करने वाली बाई भी आसानी से नहीं मिल पा रही थी. हम ने भी बाई ढूंढ़ने के लिए काफी लोगों को कह रखा था.

एक दिन अचानक मेरे घर 2 लड़कियां आईं, जिन में एक बदसूरत और दूसरी कदकाठी में लंबी, छरहरे बदन की 22-23 साल की एक लड़की थी.

मैं ने सोचा कि बदसूरत लड़की काम वाली बाई होगी, पर इस के उलट दूसरी लड़की, जो कपड़ों व जिस्मानी बनावट वगैरह से किसी भी तरह से बाई नहीं लग रही थी, वह बोली, ‘‘मेरा नाम कमला है. मैं झाड़ू, पोंछा, बरतन वगैरह का काम करना चाहती हूं.’’

अमूमन काम करने वाली बाइयां विधवा, पतियों द्वारा छोड़ी गईं या बहुत गरीब होती हैं, तो मैं ने सवाल किया, ‘‘बेटी, तुम यह काम क्यों करना चाहती हो? क्या तुम्हारा पति काम नहीं करता?’’

कमला ने जवाब में कहा, ‘‘मेरी शादी 15 साल की उम्र में ही कर दी थी. मेरे 3 बच्चे हैं. 2 बेटे और एक बेटी.

‘‘हमारे घर की गाड़ी ठीकठाक चल रही थी कि एक दिन हमारे पड़ोस की झोंपड़ी में आग लग गई. मेरे पति रामलाल आग बुझाने के लिए झोंपड़ी के अंदर चले गए. पीछे से आग बुझाने के लिए किसी ने पानी डाल दिया.

‘‘चूल्हे पर तेल चढ़ा हुआ था. तेल उछलने की वजह से उन के दोनों हाथ जल गए. इस वजह से अब वे काम नहीं कर सकते.

‘‘पहले वे सिलाई का काम कर के 100-200 रुपए कमा लेते थे, पर अब घर में बैठे हैं. मेरे 2 देवर हैं. सासससुर बूढ़े हैं. गांव में मंदिर की पूजा से थोड़ीबहुत कमाई हो जाती है, पर उस से गुजरबसर मुश्किल से हो पाती है.

‘‘5-6 महीने तक बिना काम के रहने से ऊपर कर्ज चढ़ना शुरू हो गया है. घर में छोटीछोटी चीजों के लिए भी पैसे नहीं हैं. सो, मैं ने सोचा कि क्यों न मैं घरों में झाड़ूपोंछा कर के परिवार को कुछ राहत दिलाऊं. कम से कम दूसरों से मांगना तो नहीं पड़ेगा.’’

कमला की बातें सुन कर उस के प्रति मेरी हमदर्दी बढ़ गई. मैं ने उसे 6 सौ रुपए महीने पर रख लिया और उस से कहा, ‘‘आज से तू मेरी बेटी जैसी है. बेखौफ हो कर यहां काम कर.’’

हम उस के काम से खुश थे और राहत महसूस करने लगे थे. तनख्वाह के अलावा उसे हम बची हुई सागसब्जी भी दे देते थे.

धीरेधीरे हम कमला की खूबियों से परिचित होने लगे थे. वह ईमानदार थी. कभी वह हमारी किसी चीज या रुपएपैसे को हाथ नहीं लगाती थी. गिरे हुए रुपयों या चिल्लर को उठा कर हमें संभलवा देती थी.

एक दिन कमला काम करने नहीं आई. अगले दिन उस ने बताया, ‘‘रात को पड़ोसिन के घर कोई रसिकमिजाज शख्स रुका हुआ था. सुबह मैं बाहर निकली, तो एक हट्टाकट्टा नौजवान उस पड़ोसिन के घर से निकला और उस ने मुझ पर फब्तियां कसीं.

‘‘जब मैं ने मना किया, तो उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया. मुझे बहुत बुरा लगा और मैं ने दूसरा हाथ उलटा कर के उस के मुंह पर दे मारा, तो उस के नाक से खून बहने लगा.

‘‘उस ने थाने में रिपोर्ट लिखवाई कि इस ने मुझे मारा है. मैं ने भी उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई कि इस ने मेरी इज्जत लूटने की कोशिश की.’’

मैं ने यह सुन कर उसे शाबाशी दी और कहा, ‘‘अपने पास एक चाकू छिपा कर रखो. जब कभी कोई तुम्हारी इज्जत पर हाथ डाले, तो इस चाकू से अपनी हिफाजत करना.’’

कमला को मेरी बात जंच गई और उस दिन से वह अपने साथ हमेशा एक चाकू छिपा कर रखने लगी. फिर कुछ महीनों के बाद पता चला कि जिस शख्स ने उस के साथ बदसुलूकी की थी, वह मर गया है और अदालत से केस खारिज हो गया है.

कमला के यहां कोई न कोई पारिवारिक परेशानी बनी रहती है. कभी सास बीमार होती है, तो कभी ससुर की सेहत ठीक नहीं होती. माली तंगी के चलते कर्जा हो जाता है, फिर उसे चुकाने में मुश्किलें खड़ी होतीं.

एक बार कमला की बेटी ने अपनी नाक में इमली का बीज फंसा लिया. वह उसे ले कर एक डाक्टर के पास गई, पर जब उस से नहीं निकला, तो दूसरे डाक्टर के पास गई. वह भी बीज नहीं निकाल पाया, तो उसे जोधपुर ले जाना पड़ा.

आनेजाने का किराया व डाक्टर की फीस और दवाओं का खर्च मिला कर उसे 11 सौ रुपए का कर्जदार होना पड़ा.

जिस तरह चींटी के लिए पानी का थोड़ा सा रेला भी पार करना मुश्किल होता है, उसी तरह कमला के लिए यह कर्ज चुकाना भी मुश्किल लग रहा था.

मायके में भी कोई खास आमदनी नहीं थी, वरना वहां से भी मदद मिलती.

वैसे, कमला लेना भी नहीं चाहती थी, क्योंकि उस के मातापिता भाभी की वजह से पहले से दुखी थे. भाई की शादी के समय बतलाया नहीं गया और एक पागल लड़की से धोखे से उस की शादी करा दी गई. बाद में पता चला, तो बेचारा सिर पीट कर रह गया.

माली तंगी से परेशान हो कर कमला ने शादियों में पूरियां बेलने के लिए जाना शुरू कर दिया. दिन के 10-11 बजे से रात के 12 बजे तक पूरियां बेलने का काम चलता था. सौ रुपए रोज के हिसाब से मजदूरी मिलती थी.

महीने में 15-20 दिन काम पर जाने से माली हालत में सुधार होने लगा, पर झाड़ूपोंछा के अलावा पूरियां बेलने के काम से बेचारी कमला थक जाती थी, फिर भी मेहनत की कमाई थी, इसलिए उसे खुशी थी.

मेरे यहां झाड़ूपोंछा, बरतन का काम करने के बाद उस के पास दूसरे घरों में भी झाड़ूपोंछा करने के प्रस्ताव आने लगे, पर कोई पैसे कम देना चाहता था, तो किसी का टाइम सूट नहीं कर रहा था.

एक बार एक सरकारी अफसर के यहां झाड़ूपोंछा करने और उस के छोटे बच्चे को रखने का प्रस्ताव आया. वह एक हजार रुपया महीना और एक वक्त का खाना देने को तैयार था. सुबह केवल 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक काम करना था.

कमला ने मुझ से पूछा, ‘‘क्या मैं यह काम करूं?’’ मैं ने कहा, ‘‘बेटी, तुम्हारी इच्छा है, तो जरूर करो. अगर मेरा काम तुम से न हो सके, तो छोड़ सकती हो. तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है.’’

कमला ने कहा, ‘‘आप का काम तो मैं छोड़ूंगी नहीं. पर हां, जल्दी निबटा कर चली जाऊंगी.’’ कमला उस अफसर के यहां काम पर जाने लगी. अफसर की बीवी कमला का खयाल रखती थी. झाड़ूपोंछा लगा कर कमला बच्चे को खिलाती थी, तब तक अफसर की बीवी खाना बना लेती थी. कमला खाना खा कर दोपहर 12 बजे घर लौट आती थी.

एक दिन कमला हमेशा की तरह उस अफसर के घर गई, तो देखा कि उस की बीवी और बच्चा घर पर नहीं है. पूछने पर उस अफसर ने बताया, ‘‘मेरे ससुरजी की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए रात को ही उन्हें ट्रेन से भेज दिया है.’’

कमला कमरे में पोंछा लगाने जा रही थी कि वह अफसर कमरे में आया और कमला से मीठीमीठी बातें करने लगा.

बात करतेकरते वह कमला का हाथ पकड़ने की कोशिश करने लगा. कमला ने जोर का धक्का दे कर उसे नीचे गिरा दिया और खुद उस से दूर चली गई.

कमला ने फौरन चाकू निकालते हुए कहा, ‘‘मेरे नजदीक आए, तो तुम्हारी आंतें निकाल दूंगी. मैं कोई ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं. अभी थाने जा कर तुम्हारे खिलाफ रिपोर्ट लिखवाती हूं.’’

यह सुन कर वह अफसर कमला से दया की भीख मांगने लगा, ‘‘रिपोर्ट मत करना, नहीं तो मेरी नौकरी चली जाएगी. ‘‘मेरी बीवी भी मुझे छोड़ कर चली जाएगी. मैं दोबारा ऐसी गलती नहीं करूंगा.’’

कमला कठोर जरूर थी, पर दयालु भी थी. सो, उस ने उसे माफ कर दिया.

मैं ने कमला से सवाल किया, ‘‘तुम ने उसे माफ क्यों कर दिया?’’ उस ने कहा, ‘‘आप ही तो कहा करते हैं कि क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात.’’

कमला ने इतने कष्ट उठाए, फिर भी उस ने लक्ष्मण रेखा को पार नहीं किया. आज भी वह मेरे घर झाड़ूपोंछा करने आती है. मैं उस की खूबियों और मेहनत का कायल हूं. Story

-मांगीलाल सेवक

बुरके वाली

Hindi Kahani

पहले बांझ होने और शौहर की मौत के बाद मनहूस का कलंक सहने वाली सायरा ने कुछ ऐसा किया कि…

ईदू की मौत को आज 2 साल पूरे हो गए थे. इस बीच सायरा ने जिस तरह एक बेवा की जिंदगी गुजारी, वह अपनेआप में मिसाल थी.

सायरा ने कभी घर वालों को शिकायत का मौका नहीं दिया, मगर गरीब घरों में समाज और मजहब का कुछ ज्यादा ही खयाल रखा जाता है. खासतौर पर औरतों को गुलाम बना कर रखने में बारबार धर्म को जंजीरों के सहारे जकड़ने की कोशिश की जाती है.

इद्दत के 3 महीने, 10 दिन पूरे होने के बाद भी सायरा ने अपनेआप को एक कैदी समझ कर जिंदगी गुजारी थी. घर के कामकाज के बाद वह अपने छोटे से कमरे में आ कर ईदू की यादों में खो जाती.

शादीशुदा जिंदगी का एक साल कब शुरू हुआ और कब खत्म हो गया, इस को याद करने में बहुत समय नहीं लगता था, लेकिन सायरा के पास पुरानी यादों को दोहराने के अलावा कोई दूसरा काम भी तो नहीं था.

12वीं जमात तक पढ़ी सायरा के लिए जब हाईस्कूल फेल ईदू का रिश्ता आया था, तो वह बहुत देर तक रोती रही थी. हर लड़की की तरह उस ने भी कुछ सपने संजोए थे. बहुत शानदार नहीं, तो छोटीमोटी नौकरी करने वाले दूल्हे की तमन्ना कर के उस ने कोई गुनाह नहीं किया था.

चौक में एक पान की दुकान के मालिक ईदू को जब अपना सरताज बना लेने को उस के अब्बू ने कहा, तो उस ने अब्बू के चेहरे पर फैली बेबसी को बहुत गौर से देखा था. सायरा ने बस इतना कहा था, ‘जो आप की मरजी.’

वह यह तक न कह सकी कि आप एक ऐसे लड़के से मेरी शादी कर रहे हैं, जो अपने नाम की हिफाजत भी न कर सका. अदनान से वह ईदू बना दिया गया और खिलाफत तक न की. सायरा ने इतना जरूर देखा कि कमरे से बाहर जाते समय उस के अब्बू अपनी भीगी आंखों को पोंछ रहे थे.

रहमत हुसैन तहसील में क्लर्क थे. ऊपर वाले ने दौलत के बदले में औलाद की नेमत से उन्हें मालामाल किया था. 2 बेटों और 4 लड़कियों के अलावा बूढ़े मांबाप की जिम्मेदारी भी रहमत मियां के सिर पर थी.

हर गरीब की तरह रहमत मियां की आमदनी कम और खर्च ज्यादा था. इसी परेशानी को जब भी उन्होंने बीवी के साथ बांटने की कोशिश की, एक बच्चे का इजाफा होता गया. अब ऐसे सूरतेहाल में लड़कियों के लिए अच्छा रिश्ता तलाश करने की उन की बिसात नहीं थी.

सायरा घर की सब से बड़ी औलाद थी. वह मांबाप के बोझ को अगर बांट नहीं सकती थी, तो कम से कम हलका तो कर सकती थी. यही सब सोच कर सायरा ईदू की दुलहन बन कर अपने घर से रुखसत हो गई.

सायरा ने तालीम तो 12वीं जमात तक हासिल की थी, लेकिन जिंदगी को बहुत करीब से देखा था. अपने घर की परेशानियों को जहां उस ने महसूस किया था, वहीं बहुत सारे बच्चों को एक संगीन मसला समझा था, इसलिए उस ने तय कर लिया था कि वह बच्चे पैदा करने में जल्दी नहीं करेगी.

पढ़ीलिखी खूबसूरत बीवी पा कर जहां ईदू फूला नहीं समाता था, वहीं सायरा की खिदमत और खूबी ने घर के बाकी लोगों को भी उस का दीवाना बना रखा था. लेकिन कम पढ़ेलिखे घर में एक साल बाद भी बहू का पैर भारी न होना इतना बड़ा गुनाह होता है, जिस को माफ करने को कोई तैयार नहीं होता.

वही बहू जो कल तक परिवार में सब की आंखों की ठंडक थी, अब कांटा बन कर चुभने लगी.

अम्मी तो उठतेबैठते गोद सूनी होने का ताना देतीं, तो देवर लड्डन मियां भाभी से फूहड़ मजाक करने का मौका न छोड़ते.

‘भैया में अगर कुछ कमी है, तो मेरी सेवाएं ले लिया कीजिए,’ यह कह कर लड्डन मियां आंखों से ही सायरा के कपड़े उतारने की कोशिश करते और सायरा शर्म से पानीपानी हो जाती.

सायरा को शर्माते देख पूरा घर कहकहों से डूब जाता. अब्बू मियां भी इस तरह के मजाक पर बेटे को मना करने के बजाय हंसने वालों में शामिल रहते. शायद उन की नजर भी बहू के जिस्म पर ही लगी थी.

ईदू ने एक बार सायरा से कहा कि हम लोगों की शादी को अब बहुत दिन हो गए हैं. एक बच्चा हो जाए, तो कोई परेशानी नहीं है.

इस के जवाब में सायरा ने ईदू के गले में बांहें डालते हुए बड़ी खूबसूरती से कहा था, ‘क्या आप चाहते हैं कि हमारा बच्चा भी आप की तरह पान की दुकान पर बैठे? इतना पैसा कमाने लगिए कि हम अपने बच्चे की अच्छी तरह परवरिश कर के उस को आला तालीम दिला सकें.

‘जिस दिन हालात ठीक हो गए, उसी दिन एहतियात बंद. आप पूरी तरह आजाद होंगे,’ यह कह कर सायरा ने कमरे की बत्ती बुझा दी.

इस रात के बाद सायरा की जिंदगी की बत्ती भी गुल हो गई. दुकान जाते समय ईदू को एक कार ने टक्कर मार दी. एक बच्चे का बाप बनने की तमन्ना लिए वह इस दुनिया से रुखसत हो गया.

ईदू की मौत के बाद सायरा की जिंदगी में अंधेरा छा गया. ईदू जैसा भी था, उस का शौहर था. वह भी ईदू को दिलोजान से चाहती थी.

ईदू और सायरा के मिजाज में जमीनआसमान का फर्क था, लेकिन सायरा ने हमेशा एक अच्छी बीवी का फर्ज निभाने में कभी कमी नहीं की.

ईदू की मौत के बाद अपने ससुराल में ही वह पराई हो गई. एक साल में बच्चा न होने पर उस पर बांझ होने का इलजाम पहले ही लगाया जा चुका था. ईदू की मौत के बाद मनहूसियत का कलंक भी उस के माथे जड़ दिया गया.

सायरा को मनहूसियत की सजा देने के लिए एक बार देवर लड्डन मियां ने आधी रात में उस के कमरे में घुसने की कोशिश की थी, जिस की शिकायत उस ने अब्बू और अम्मी से की, लेकिन यही सुनने को मिला कि अगर जवानी नहीं कट रही है, तो जा कर किसी कोठे पर बैठ जा या कुएं में कूद पड़. घर के मर्दों को क्यों बदनाम कर रही है. नौजवान बहू की दूसरी शादी कर के उस की जरूरतों को पूरा करने का फर्ज निभाने के बजाय उसी के किरदार को दागदार कर दिया गया.

अपने ही घर में अब सायरा की इज्जत को खतरा बढ़ने लगा था. अपनी आबरू बचाने के लिए उसी को कोई रास्ता निकालना था और यह उस समय तक मुमकिन नहीं था, जब तक वह अपनी मेहनत से दो पैसे न कमाने लगती.

2 साल से खूंटी पर टंगी ईदू की दुकान की चाबी जैसे ही उस ने उतारी, पूरे घर में भूचाल आ गया. अब्बू ने पूछा, ‘‘कहां जा रही हो?’’

‘‘आज से मैं दुकान पर बैठूंगी,’’ सायरा की आवाज इतनी ठोस थी कि थोड़ी देर तक अब्बू कुछ बोल न सके.

‘‘तुम होश में तो हो. औरत जात बीच बाजार में पान की दुकान पर बैठेगी.’’

‘‘क्यों, इस में क्या बुराई है? औरत खोली में बैठ कर अपना जिस्म बेच सकती है, होटलों में नंगी हो कर नाच सकती है, शराबखाने में मर्दों को शराब परोस सकती है और अपने ही घर में अपने देवर से इज्जत बचा सकती है, तो अपने मियां की दुकान पर बैठ कर पान क्यों नहीं बेच सकती?’’ सायरा का लहजा अब भी सख्त था. लेकिन आंखों को नीची रख कर उस ने अपनी बात पूरी की.

पहली बार बाजार वालों ने किसी बुरके वाली को पान बेचते देखा, तो दुकान पर भीड़ लग गई. हर उम्र के मर्दों में पान खाने का शौक बढ़ गया. कुछ ये समझ कर आने लगे कि ये पान की दुकान तो एक बहाना है, इस के पीछे कुछ और धंधा है. लेकिन उन की उम्मीदों पर बराबर पानी पड़ता गया, जब कई महीने बाद भी बुरके वाली के पान बनाने वाले हाथों और बुरके से झांकती हुई आंखों के अलावा कुछ देख न सके.

ईदू के अब्बू ने खुद मायूस हो कर महल्ले के मौलवी साहब को सायरा को समझाने के लिए मैदान में उतारा, लेकिन मौलवी साहब की जबान भी सायरा ने यह कह कर बंद कर दी, ‘‘एक बेवा के खर्च की जिम्मेदारी ससुराल वालों पर होती है. अगर वे लोग अपनी जिम्मेदारी संभालने में नाकाम हैं, तो औरत क्या करे? औरत को मेहनत कर के अपना पेट भर लेने पर अगर पाबंदी हो, तो मुझे बता दीजिए, मैं पान की दुकान पर बैठना बंद कर दूंगी.’’

सायरा के इस जवाब के बाद मौलवी साहब ने कुछ कहना बंद कर दिया.

एक दिन वह भी आया, जब सायरा की कमाई से घर का खर्च चलने लगा. ईदू के छोटे भाई लड्डन मियां नकारा ही रह गए और अब्बू की पेंशन इतनी कम थी कि इस से घर का खर्च चलना मुश्किल हो गया था. वही सायरा, जिस को घर वाले कोठे पर बैठने और कुएं में कूद जाने की सलाह दे रहे थे, आज पूरे घर पर उसी का राज था. छोटी ननद की शादी और सासससुर के हज का सारा खर्च सायरा ने ही उठाया.

सायरा अब खुद मुख्तार थी. कुछ भी करने को उसे आजादी थी. कई बार उस का दिल चाहा कि जिंदगी गुजारने के लिए किसी का हाथ थाम ले, लेकिन यह सोच कर उस ने अकेले जिंदगी गुजारने का फैसला कर लिया कि मर्दों के दिल से यह बात निकल जाए कि बगैर मर्द के अकेली औरत जिंदगी नहीं गुजार सकती.  Hindi Kahani

Hindi Story : आरती

8  साल की आरती, जो पिछले 2 महीनों से एक घर में बच्चा संभालने वाली आया की नौकरी कर रही थी, आज सवेरे से ही बहुत खुश थी. आज महीने की पहली तारीख थी और उस की मां उस से मिलने के लिए आने वाली थीं.

दोपहर को काफी इंतजार के बाद मां आईं. उसी समय मालकिन को किसी जरूरी काम से बाहर जाना था. अब तो आरती की खुशी का कोई ठिकाना न था.

मां के आने के बाद तेजतर्रार मालकिन ने घर से निकलते समय कठोर आवाज में उसे कई हिदायतें दीं और दरवाजे से बाहर निकलने से पहले आरती की मां को कोई ऐसी जरूरी चीज दी, जिस को मां ने फौरन अपने ब्लाउज में रख लिया.

बच्चे को आरती ने झूले में सुला दिया. मां आरती को गौर से देखने लगीं. उस के बदन पर अब अच्छे कपड़े थे. वह साफसुथरी दिख रही थी. बालों में तेल लगा था और उस की सलीके से चोटी बनी हुई थी.

मां ने आरती के सिर पर हाथ फेरा और बोलीं, ‘‘लगता है, तू यहां बड़े मजे में है आरती?’’ ‘‘अम्मां, मुझे यहां से ले चलो,’’ कहते हुए वह अपनी मां से लिपट गई.

‘‘अरे, यह तू क्या कह रही है?’’ ‘‘अम्मां, मैं यहां काम नहीं करूंगी. तुम मुझे अभी अपने साथ ले चलो.’’

‘‘अरे छोरी, पागल हो गई है क्या? यहां कितने सुख में है तू… उस गंदी झोंपड़ी में क्या रखा है तेरे लिए?

‘‘मैं महीनेभर दूसरों के घरों में बरतन मांजती हूं, झाड़ूपोंछा करती हूं, तब कहीं जा कर दो वक्त की रोटी जुटा पाती हूं. 4 भाईबहिनों के बीच फटे कपड़ों और रूखीसूखी रोटियों के अलावा तुझे उस झोंपड़ी में और क्या मिलेगा?

‘‘तेरा शराबी बाप तुम भाईबहिनों को बिना बात पीटता है सो अलग. इस घर में तो तुझे पहनने को कपड़े और खाने को रोटी भी मिलती है. कुछ पैसे भी मिल जाते हैं, जिन से मेरी बड़ी मदद हो जाती है. और तू कह रही है कि तुझे घर जाना है. तू इस सुख की जिंदगी को छोड़ कर उस नरक में क्यों लौटना चाहती है?’’

‘‘अम्मां, मैं फटे कपड़े पहन लूंगी, रूखीसूखी रोटियां खा लूंगी, बापू की मार भी सह लूंगी, पर यहां नहीं रहूंगी. नरक हमारी गंदी झोंपड़ी में नहीं है अम्मां, बल्कि वह तो इस खूबसूरत मकान में है.’’

‘‘तू क्या बक रही है? साफसाफ बता, क्या बात है?’’ ‘‘अम्मां, मुझ से कोई गलती हो जाती है, तो मेम साहब मुझे खूब पीटती हैं. मुझे मारपीट कर भी जब उन का गुस्सा नहीं उतरता, तो वे पूरे दिन खाने को कुछ नहीं देतीं.

‘‘कल की बात बताऊं. उन का बच्चा इतना मोटा और भारी है अम्मां, वह मुझ से गोद में उठाते नहीं बनता. कल सुबह वह मेरे हाथों से छूट कर नीचे गिर पड़ा. इस से उस के माथे पर चोट लग गई और थोड़ा सा खून भी निकल आया. इस बात पर मेम साहब ने मुझे इतना मारा कि अम्मां…’’

यह कहते हुए आरती रोने लगी और बोली, ‘‘अम्मां, मैं यहां नहीं रहूंगी. मेम साहब मेरी जराजरा सी गलतियों पर मुझे गालियां देती हैं, थप्पड़ मारती हैं.’’

‘‘अच्छा, मैं तेरी मालकिन से बात करूंगी. अब वे तुझे नहीं पीटेंगी.’’ ‘‘अम्मां, वे तुम्हारी बात कभी नहीं मानेंगी. मुझे यहां बहुत काम करना पड़ता है. रात में जब मेम साहब का बच्चा रोने लगता है, तो वे मुझे जगा देती हैं और खुद सो जाती हैं. मैं रातरात भर सो नहीं पाती.’’

‘‘क्यों, दिन में तब बच्चा सोता होगा, तब तू क्यों नहीं सो जाती?’’ ‘‘तब घर के दूसरे काम मुझे करने पड़ते हैं. मेम साहब के साथ मुझे रसोई में काम करना पड़ता है और मुझे उन के कपड़े भी इस्त्री करने पड़ते हैं. एक दिन इस्त्री करते समय मैं सो गई और मेम साहब की नई साड़ी मुझ से जल गई, तो उन्होंने मुझे इतनी जोर से धक्का मारा कि मेरा सिर कुरसी के किनारे पर जा लगा और मेरे माथे से खून निकल आया.’’

‘‘फिर क्या हुआ?’’ ‘‘फिर साहब तुरंत मुझे उठा कर अस्पताल ले गए. डाक्टर ने 2 टांके लगाए. मुझे बहुत दर्द हुआ अम्मां और बहुत दिनों तक मुझे अपने माथे पर पट्टी बांधनी पड़ी.’’

‘‘तो फिर तेरे साहब ने मेम साहब को डांटा नहीं? वे तो बड़े दयालु हैं.’’ ‘‘हां अम्मां, उन्होंने खूब डांटा था, पर मेम साहब पूरी चुड़ैल हैं. वे उन की एक भी बात नहीं मानतीं, उलटे उन पर रोब झाड़ती हैं. पर अम्मां, तुम साहब को दयालु मत समझना, वे बहुत अजीब हैं.’’

‘‘कैसे?’’ ‘‘अम्मां, जब मेम साहब नहीं होतीं, तो साहब मुझे जबरन अपनी गोद में बिठा लेते हैं. मुझे बड़ा अजीब लगता है. वे मुझे सब जगह छूछू कर देखते हैं.’’

‘‘अपनी मेम साहब को क्यों नहीं बताया तू ने?’’ डरी हुई आवाज में मां ने पूछा. ‘‘एक दिन मेम साहब ने खुद ही देख लिया था. तब उन्होंने मुझे एक थप्पड़ मारा और उस दिन के बाद से रोज शाम को जब साहब घर लौटते हैं, तो मेम साहब मुझे बच्चा घुमाने के लिए घर से बाहर भेज देती हैं.’’

‘‘यह तो ठीक किया तेरी मेम साहब ने. देख छोरी, तू अपने साहब से जरा दूर ही रहा कर. अब… अब और कैसे मैं तुझे समझाऊं. कुछ समझने की अभी तेरी उम्र नहीं है. तू बस अपने साहब से दूर रहा कर. जब वे घर में हों, तो तू इधरउधर हो जाया कर. उन के सामने मत पड़ा कर.’’

‘‘मुझे घर ले चलो अम्मां. मैं तुम्हारी हर बात माना करूंगी और स्कूल से लौटने के बाद शाम को तुम्हारे साथ बरतन मांजने भी चला करूंगी और मैं किसी भी चीज के लिए जिद नहीं करूंगी.’’

‘‘हां, ले चलूंगी कभी.’’ ‘‘कभी नहीं अम्मां, अभी. अभी ले चलो मुझे यहां से. जैसे ही मेम साहब आएंगी, हम चलेंगे यहां से और फिर कभी लौट कर नहीं आएंगे…’’

थोड़ा रुक कर वह बोली, ‘‘चाय ले आऊं अम्मां? साथ में पकौड़े भी…’’  ‘‘कौन बनाएगा? तुझे तो ये काम करने नहीं आते.’’

‘‘अब, ये काम मुझे करने आने लगे हैं अम्मां. मेम साहब ने सिखाया है. जब उन का बच्चा सो जाता है, तो वे मुझे एक मिनट को भी बैठने नहीं देतीं, कुछ न कुछ काम करवाती रहती हैं.’’

‘‘अच्छा, जब तू इतनी अच्छीअच्छी चीजें बनाती है, तो खाती भी खूब होगी?’’ ‘‘नहीं अम्मां, सुबहसवेरे एक कप चाय मिलती है, फिर नाश्ते में वे मुझे रात की बची हुई रोटियां और सब्जी देती हैं. दोपहर में गिन कर 3 रोटियां और एक कटोरी सब्जी देती हैं और रात को फिर 3 रोटियां और एक कटोरी दाल देती हैं.

‘‘वे कहती हैं कि तुझे कई सालों तक हमारे यहां नौकरी करनी है. ज्यादा रोटियां खाएगी, तो बदन पर जवानी जल्दी चढ़ आएगी.

‘‘जवानी चढ़ने से क्या होता है अम्मां?’’ पकौड़े तलते हुए आरती ने पूछा. ‘‘कुछ नहीं. तू छोड़ इन बातों को.’’

आरती ने चाय का कप मां के हाथों में देते हुए कहा, ‘‘मालूम है अम्मां, जब मेम साहब किसी काम से घर से बाहर चली जाती हैं, तो मैं इसी तरह चाय और पकौड़े बनाती हूं और पेट भर कर खाती हूं. मेम साहब के लौटने से पहले जूठे बरतन धो देती हूं.

‘‘और पता है अम्मां, जब मेहमान घर में आते हैं, तो उन के नाश्ते के लिए बढि़याबढि़या चीजें प्लेटों में सजाई जाती हैं. बरफी, आइसक्रीम, आलू भुजिया, कोल्ड ड्रिंक्स और अनोखी खुशबुओं वाली नमकीन, जिन्हें बस देखते ही भूख लगने लगे. तुम ने तो इतनी बढि़याबढि़या चीजों को छू कर भी नहीं देखा होगा, मैं तो खाती भी हूं.

‘‘पता है, मैं क्या करती हूं. जब मेम साहब मेहमानों के साथ बैठी होती हैं और मुझे नाश्ते की जूठी प्लेटें उठा कर ले जाने को बुलाती हैं, तो मैं उन प्लेटों को रसोई में ले आती हूं और उन में जो कुछ भी बचा होता है, वह सब मैं जल्दीजल्दी खा जाती हूं.’’

‘‘आरती, घर चलने की जिद मत कर बेटी. यहां कम से कम तेरा पेट तो भर रहा है. पैसे भी मिल रहे हैं, जिन से तेरे भाईबहिनों का पेट पालने में मुझे बड़ी मदद मिल जाती है, वरना तेरा शराबी बाप तो घर चलाने को एक पैसा तक नहीं देता. वह जितना कमाता है, सब शराब में उड़ा देता है और कभीकभी तो मारपीट कर मेरी मेहनत की कमाई भी छीन लेता है.

‘‘तेरी मेम साहब जो रुपए देती हैं, उन से मैं आटा, तेल और सब्जी वगैरह खरीद कर ले जाती हूं. बेटी, तेरे काम करने से मुझे बड़ी मदद मिल रही है. जब से तू काम पर लगी है, एक भी दिन तेरे भाईबहिन भूखे नहीं सोए. अपनी अम्मां की मजबूरी को समझने की कोशिश कर मेरी प्यारी बेटी.’’

मां ने पल्लू के छोर से अपने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘और रही बात तेरी मेम साहब के बुरे बरताव की, तो मैं आज तेरी मेम साहब से सख्ती से कह दूंगी कि वे तुझे मारेपीटे नहीं, वरना मैं तुझे यहां से ले जाऊंगी.

‘‘तू देखना, मेरी बात सुन कर तेरी मेम साहब का बरताव जरूर सुधर जाएगा. अरे, आजकल इतनी सस्ती और अच्छी आया मिलती ही कहां हैं? मैं ने तो मजबूरी में तुझे इतने कम पैसों में यहां काम पर लगा दिया, वरना…’’

‘‘नहीं अम्मां, तुम मेम साहब से कुछ मत कहना, वरना तुम्हारे जाने के बाद वे मुझे बहुत पीटेंगी. तुम तो मुझे यहां से ले चलो बस. तुम्हें पता नहीं है कि मैं यहां कैसीकैसी तकलीफें सहती हूं. जरा देख अम्मां…’’ आरती ने अपनी चोटी खोल कर अपना सिर दिखाया, ‘‘देखो अम्मां, यह क्या है…’’

आरती के सिर में कई जगह पर घाव दिख रहे थे और जगहजगह से बाल झड़ चुके थे. ‘‘अरे आरती, यह क्या हुआ? तेरे सिर में ये घाव कैसे हो गए?’’

यह सुन कर आरती सिसकने लगी और बोली, ‘‘अम्मां, मेरे सिर में जुएं थीं, जो कभीकभी मेम साहब के बच्चे के ऊपर भी गिर जाते थे, इसीलिए एक दिन मेम साहब ने फिनाइल की गोलियां पीस कर मेरे बालों में भर दीं. मुझे सिर में जलन होती रही, पर उन्होंने शाम तक मुझे बाल नहीं धोने दिए. वे कहती थीं कि इस से मेरे सिर की जुएं मर जाएंगी.

‘‘शाम को जब मैं ने बाल धोए, तब तक सिर में कई घाव हो चुके थे और मेरे बाल भी खूब झड़ गए.’’ मां ने आरती को गले से लगा लिया.

शाम हो गई. मेम साहब लौट कर घर आ गईं. आरती अपनी मां को छोड़ने दरवाजे तक आई.

‘‘अम्मां, तुम मुझे जल्दी ही यहां से ले जाना. कई दिनों से मैं स्कूल भी नहीं गई हूं. मेरी सब सहेलियां पढ़ाई में मुझ से आगे निकल गई होंगी.

‘‘अब भी अगर मैं स्कूल नहीं जा पाई, तो पढ़ाई में सब से पीछे रह जाऊंगी. यहां तो मैं बिलकुल भी नहीं पढ़ पाती हूं. मुझे यहां से जल्दी घर ले जाना अम्मां, वरना इस साल मैं फेल हो जाऊंगी.’’

आरती को दिलासा दे कर उस की मां चली गईं. रास्ते में मां ने अपने ब्लाउज में से रुपए निकाल कर गिने. आरती की मालकिन ने अगले 4 महीने तक की तनख्वाह का ऐडवांस पैसा दे दिया था. Hindi Story

-इंदिरा दांगी

Orchestra Girls : रंग मंच के पीछे सिसकती हसरतें 

मंच की चकाचौंध में डांस करती और्कैस्ट्रा गर्ल्स (Orchestra Girls) की जिंदगी में तमाम तरह के अंधेरे होते हैं.

क्या होती है इन की हसरतों की कीमत?

और्कैस्ट्रा गर्ल्स शादीब्याह, धार्मिक आयोजनों या मेलों में भीड़ के सामने डांस करती हैं. वे आमतौर पर हिंदी या भोजपुरी गीतों पर डांस करती हैं. इन कार्यक्रमों का मुख्य केंद्र बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, दिल्ली और आसपास के राज्यों में है. गांवदेहात से ले कर बड़े शहरों के पंडालों तक, इन की मांग हर जगह है.

सामाजिक बैकग्राउंड

इन लड़कियों की बैकग्राउंड बेहद साधारण और गरीब परिवारों से जुड़ी होती है. अकसर इन के पिता मजदूर, रिकशा चालक, खेतिहर या बेरोजगार होते हैं. कई मामलों में परिवारों की माली हालत इतनी खराब होती है कि पढ़ाई बीच में छूट जाती है और पेट भरने के लिए इन लड़कियों को मजबूरी में मंच पर आना पड़ता है.

किसी की मां घरेलू नौकरानी है, किसी का भाई मजदूरी करता है, तो किसी की शादी की जिम्मेदारियां सिर पर हैं. जातीय लैवल पर देखें तो पिछड़ी, अनुसूचित जाति, अति पिछड़ी जाति की लड़कियां ज्यादा तादाद में आती हैं, पर यह पूरी तरह वर्गीय विभाजन नहीं है, कभीकभी मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियां भी अपनी आजादी, प्रेम संबंध या पारिवारिक झगड़ों के चलते इस प्रोफैशन में आती हैं.

दलालों का जाल

ज्यादातर लड़कियां और्कैस्ट्रा में खुद पहल कर के नहीं जातीं. दलाल, दोस्त या जानपहचान का कोई शख्स गरीब और मजबूर लड़कियों को अच्छी जिंदगी और पैसे का लालच दिखा कर या धोखे से ले जाता है. कभीकभी खुद आपदा या पारिवारिक मौत के हालात में लड़कियां मजबूर हो कर इस पेशे की तरफ आती हैं.

दलाल या और्कैस्ट्रा संचालक पहले ट्रेनिंग कैंप में इन लड़कियों को ढीला डांस, चालढाल, मेकअप, दर्शकों के साथ बरताव, गानों को चुनना वगैरह सीखा देता है, फिर इन्हें छोटे मेलों, बरातों या उत्सवों में परफौर्म करने का मौका मिलता है.

डांस की ट्रेनिंग और आर्ट

आज डांसर्स को किसी प्रोफैशनल एकेडमी में नहीं, बल्कि औन जौब ट्रेनिंग दी जाती है. संचालकों के खुद के पुराने डांसर्स या कोरियोग्राफर होते हैं, जो नए लड़कियों को स्टेज प्रजैंस, एक्सप्रैशन और वायरल हो सकने वाले स्टैप्स सिखाते हैं.

गानों का चुनाव भोजपुरी, हिंदी और पंजाबी के लोकप्रिय, दर्शकों को रोमांचित करने वाले गानों से होता है. लड़कियों को शौर्ट ड्रैस, भारी मेकअप, ब्राइट रंग, और कभीकभी लोकल डांडिया जैसे कार्यक्रमों की थीम के मुताबिक तैयार किया जाता है.

कितना पैसा मिलता है

और्कैस्ट्रा गर्ल्स को मिलने वाली इनकम में बहुत झोल है. आमतौर पर एक शो के लिए इन्हें 1,500 से 5,000 रुपए प्रति रात या प्रति प्रोग्राम दिए जाते हैं. पंजाब, दिल्ली व महानगरों के आयोजनों में यह रकम 10,000 से 25,000 भी हो सकती है, लेकिन यह सिर्फ नामी डांसर्स के लिए है. ज्यादार पैसा बुकिंग करवाने वाले संचालक, मैनेजर, संगीतकार और साउंडलाइट वालों के जरीए कटकट कर ही इन तक पहुंचता है.

कई बार लड़कियों को टिप भी मिलती है. दर्शक स्टेज पर पैसे उड़ाते हैं, लेकिन असल में इसे बुकिंग पार्टी या संचालक ले लेता है, कुछ हिस्सा लड़की को मिलता है. महीने के 20-25 शो भी मिल जाएं तो अच्छी कमाई हो सकती है, वरना इस धंधे में भूखे मरने की नौबत आ जाती है.

कहां जाती है कमाई

कमाए गए पैसों का इस्तेमाल भी मजबूरी और जिम्मेदारियों के हिसाब से होता है. ज्यादातर और्कैस्ट्रा गर्ल्स इन पैसों से :

* घर का किराया या पारिवारिक खर्च उठाती हैं.

* भाईबहनों की पढ़ाईलिखाई पर खर्च करती हैं.

* मांबाप का इलाज भी इन्हीं के पैसों से होता है.

* छोटे भाईबहन की शादी में उन के दानदहेज का खर्च शामिल रहता है.

* अपने परिवार और बच्चों पर इंवैस्ट करती हैं.

कुछ लड़कियां अपना बड़ा घर या साड़ीजेवर, मोबाइल, गहने और ब्रांडेड कपड़े पर भी खर्च करती हैं, लेकिन ज्यादातर लड़कियों के रोजमर्रा के खर्चे भी पूरे नहीं हो पाते हैं. इन का बैंक बैलेंस बहुत ही कम और भविष्य असुरक्षित रहता है.

समाज की नजर और चुनौतियां

इन लड़कियों के काम को समाज इज्जत की निगाह से नहीं देखता. कई बार इन्हें स्टेज पर छेड़खानी, हंगामा या हिंसा का शिकार होना पड़ता है. परिवारों को भी आसपड़ोस की जलालत और बदनामी झेलनी पड़ती है. इस के बावजूद, मजबूरी के चलते इन लड़कियों के सामने कोई और रास्ता खुला नहीं रहता.

समाज के लिए मनोरंजन का साधन बनी ये लड़कियां भारी डिप्रैशन, सामाजिक अकेलापन और सिक्योरिटी की चिंता में जिंदगी बिता देती हैं.

बदलाव की उम्मीद और भविष्य

कुछ और्कैस्ट्रा गर्ल्स शादी के बाद इस पेशे को छोड़ देती हैं या दूसरी नौकरी ढूंढ़ती हैं. कई लड़कियां अपने बच्चों को इस पेशे से दूर रखने की कोशिश करती हैं, उन्हें पढ़ाती हैं, ताकि उन का भविष्य ज्यादा महफूज हो सके. कुछ नामी डांसर आगे जा कर खुद का और्कैस्ट्रा ग्रुप शुरू कर लेती हैं या डांस सिखाने का काम करती हैं.

ये ‘नई तवायफें’ मतलब और्कैस्ट्रा गर्ल्स, समाज के उजले मंच पर रंगबिरंगे भेष में नाचतीझूमती जरूर दिखती हैं, पर परदे के पीछे उन की जिंदगी कड़ी हकीकतों, मजबूरियों और जद्दोजेहद से भरी रहती है.

इन की असल मायूसी, इन का दर्द, इन के सपने शायद ही कभी समाज समझ  पाए. जरूरत है कि इन्हें सिर्फ मनोरंजन या अफसोस की चीज समझने के बजाय, एक इनसान और मेहनतकश इनसान के तौर पर देखा जाए. Orchestra Girls

Hindi Story : फैमिली, फ्रौड और फैंटेसी

Hindi Story. पूर्णिमा एक कामयाब बिजनैसवुमन थी, पर उस का पति उस के गोलमटोल शरीर का सरेआम मजाक उड़ाता था. फिर एक डेटिंग ऐप पर पूर्णिमा की मुलाकात शोएब से हुई जो औरतों की जिस्मानी भूख शांत करता था. आगे क्या हुआ?

किसी दार्शनिक ने बहुत सही कहा है कि औरतों को कामयाबी पाने के लिए मर्दों की तुलना में ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है.

पूर्णिमा की जिंदगी बाहर से जितनी चमकदार थी, भीतर से उतनी ही खोखली और अंधेरी हो चुकी थी. एक बहुत ही कामयाब और होशियार बिजनैसवुमन, मार्केटिंग कंपनी की हैड होने के नाते वह बोर्डरूम में बड़ेबड़े फैसले लेती थी, लेकिन घर में उस का सामना विक्रम की कड़वाहट और अनदेखी से होता था.

विक्रम का रूखा बरताव केवल पूर्णिमा की उदासी की वजह नहीं था, बल्कि वह पूर्णिमा के आत्मविश्वास को धीरेधीरे खत्म कर रहा था.

विक्रम पूर्णिमा को ‘बौडी शेम’ का अहसास कराता था. उसे अपनी हाईप्रोफाइल पत्नी पसंद नहीं थी, वजह यह कि उस का गोलमटोल और भारी शरीर.

विक्रम को अपनी पत्नी अच्छी नहीं लगती थी, क्योंकि वह किसी फिल्म हीरोइन की तरह छरहरी और सैक्सी नहीं थी. उस से पसीने की बदबू आती थी, उसे सलीके से बनसंवर कर रहना नहीं आता था, वह पति की सेवा नहीं करती थी, उसे एक कप चाय बनानी नहीं आती थी वगैरहवगैरह.

पूर्णिमा हर जोरजुल्म सहती रही,  लोकलाज के डर से उस ने तलाक लेने की भी कोशिश नहीं की.

विक्रम की एक छोटी सी सरकारी नौकरी पूर्णिमा के मल्टीनैशनल कंपनी के हैड की तगड़ी सैलरी के आगे एक फूटी कौड़ी के जैसे थी, फिर भी उसे पूर्णिमा को अपने साथ किसी सामाजिक समारोह में ले जाने में शर्म महसूस होती थी.

विक्रम पूर्णिमा की चचेरी बहन रिद्धि से प्रभावित था. एक सिंपल ग्रेजुएट, घरेलू लेकिन कायदे की लड़की. वह उसे गिफ्ट देता रहता था, वे दोनों फोन पर बतियाते रहते थे और शायद मिलते भी हों.

पूर्णिमा ये सभी बातें नजरअंदाज करती रहती थी लेकिन एक दिन पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा.

दीवाली की उस रात, जब पूरा घर दीयों की रोशनी से जगमगा रहा था, पूर्णिमा की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिस ने उसे अंदर तक तोड़ दिया. पूर्णिमा ने रंगे हाथों दोनों को एक कमरे में देख लिया.

रिद्धि बिस्तर पर लेटी हुई थी, जांघें फैलाए, और विक्रम उस के ऊपर सवार था. दोनों की सांसें तेज थीं और विक्रम के हाथ उस के कूल्हों को कस कर पकड़े हुए थे.

नीचे पूरा घर दीवाली की पूजा की तैयारी कर रहा था और ऊपर दोनों एक बंद कमरे में क्या कर रहे थे? विक्रम ने बहाना बना दिया कि उसे पता नहीं था कि रिद्धि बाथरूम में नहा रही है. पूर्णिमा ने भी ऐसे जाहिर किया कि उसे उन के ?ाठ पर विश्वास हो गया है कि ऐसा ही है.

उस दिन पूर्णिमा पूरी तरह टूट गई. वह दिनोंदिन और ज्यादा डिप्रैशन में आने लगी. उस ने बहुत ज्यादा शराब और सिगरेट पीना शुरू कर दिया. उस का ब्लड प्रैशर और शुगर गड़बड़ होना शुरू हो गया.

किसी हमदर्द ने डेटिंग ऐप्स का सु?ाव दिया, तो पूर्णिमा भी किसी सच्चे और हमदर्द साथी की तलाश में डेटिंग ऐप स्क्रौल करने लगी.

कौफी शौप में एक मीटिंग के बाद पूर्णिमा को शोएब पसंद आ गया था. उसी दिन वह एक होटल के कमरे में एक जिस्म दो जान हुए. शोएब दिल से उस के शरीर की तारीफ करते हुए चूम रहा था, सहला रहा था.

पहली बार पूर्णिमा को ‘बौडी शेम’ की जगह अपने शरीर की खूबसूरती का अहसास हो रहा था. अपनी जिंदगी में वह मुश्किल से चौथी बार किसी मर्द से शारीरिक सुख हासिल कर रही थी और यह पल उस की जिंदगी के यादगार लमहे बन गए थे.

शोएब, जो असल में एक मेल एस्कौर्ट था. असंतुष्ट औरतों को शारीरिक संतुष्टि देना उस का पेशा था. उस ने ट्रेनिंग ली थी कि कैसे शरीर के हर उभार की तारीफ करनी है, कैसे धीरेधीरे प्रेम जगाना है.

शोएब ने मजबूरी में यह धंधा जौइन किया था लेकिन अब एक कामयाब और अमीर औरत से शादी कर के वह अपनी गृहस्थी बसाना चाहता था, इसीलिए उस ने पूर्णिमा का हर तरीके से शिकार किया था. हर दिन मैसेज, फोन करना, तारीफें…. ‘तेरे बिना मेरा दिन अधूरा है’, ‘तेरा जिस्म मुझे पागल कर देता है’.

इन बातों को सुन कर पूर्णिमा पिघल जाती थी. पहले वे महीने में एक बार मिले थे, अब हर हफ्ते. वह शोएब के बताए रंग और डिजाइन के कपड़े पहनती… टाइट ब्लाउज जो उस के उभारों को उभारते, स्कर्ट जो उस की मोटी जांघों को दिखाती.

शोएब पूर्णिमा को हर जगह ले जाता और हर जगह मजे लेता. कभी हंसते हुए पूर्णिमा कहती, ‘‘तुम तो पेड़पौधों में भी हवस जगा सकते हो,’’ तो शोएब लहराते हुए भद्दी हंसी हंसता, फिर उस के शरीर को अपनी बांहों में भर लेता.

एक शाम कार में शोएब ने पूर्णिमा को पीछे की सीट पर लिटाया. स्कर्ट ऊपर की, पैंटी नीचे. पूर्णिमा ने मुंह दबाया ताकि बाहर आवाज न जाए.

यह सब पूर्णिमा के लिए बिलकुल नया अनुभव था. पहली बार, उसे अपने शरीर को ले कर किसी तरह की शर्मिंदगी का अहसास नहीं हुआ. सालों बाद वह खुद को किसी के करीब महसूस कर रही थी.

लेकिन पूर्णिमा इस बात से बेखबर थी कि शोएब की इस नजदीकी के पीछे एक सोचीसमझी योजना थी. शोएब, जो जिंदगी की मुश्किलों से जूझ रहा था, एक शानदार जिंदगी की तलाश में था. पूर्णिमा भी धीरेधीरे उस के जाल में उलझती चली गई.

3 महीने के समय में पूर्णिमा ने महसूस किया कि वह शोएब को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना चाहती है. जब शोएब ने अपनी पैसे की तंगी, बीमार मां और बेरोजगारी का जिक्र किया, तो पूर्णिमा ने बिना किसी झिझक उस की मदद करने का फैसला किया.

पूर्णिमा ने शोएब को अपनी कंपनी में पर्सनल असिस्टैंट की नौकरी दिलवा दी और उस के रहने के लिए एक फ्लैट का डाउन पेमेंट भी किया.

शोएब को कंपनी में पर्सनल असिस्टैंट का पद मिले अभी 2 ही महीने हुए थे, और पूर्णिमा की जिंदगी एक अलग ही रफ्तार पकड़ चुकी थी. कौरपोरेट वर्ल्ड में पूर्णिमा का रोब पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया था और उस के पीछे की वजह थी उस का नया आत्मविश्वास. लेकिन जिस बुनियाद पर यह रिश्ता टिका था, उस की दरारें अब धीरेधीरे सतह पर आने लगी थीं.

शोएब अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा था. औफिस में वह एक अनुशासित और पेशेवर कर्मचारी की तरह रहता, लेकिन बंद कमरों में और वीकैंड्स पर वह पूर्णिमा को पूरी तरह अपने काबू में रखता.

पूर्णिमा को लगता था कि शोएब उस से बेपनाह प्यार करता है, लेकिन शोएब के दिलोदिमाग में गणित की सीधीसपाट कैलकुलेशन चल रही थी.

शोएब ने पूर्णिमा के दिए हुए फ्लैट का इंटीरियर अपनी पसंद से करवाया, लग्जरी गाडि़यों के सपने देखे और धीरेधीरे कंपनी के अंदरूनी मामलों में अपनी दखलअंदाजी बढ़ानी शुरू कर दी.

दूसरी तरफ, विक्रम की जिंदगी में सब कुछ सही नहीं चल रहा था. पूर्णिमा का घर पर न के बराबर रहना, उस का बदलता पहनावा और उस की बेफिक्री विक्रम को खटकने लगी थी. जिस पत्नी को वह ताने दिया करता था, वही पत्नी अब उस की तरफ देखती तक नहीं थी.

विक्रम का अहंकार आहत होने लगा. उस ने पूर्णिमा का पीछा करना शुरू किया और जल्द ही उसे पता चल गया कि पूर्णिमा की जिंदगी में कोई नया शख्स आ चुका है और वह कोई और नहीं, बल्कि उस की ही कंपनी का पीए शोएब है.

एक शाम, जब पूर्णिमा औफिस के देर तक चले काम के बाद शोएब के साथ अपने नए अपार्टमैंट में समय बिता रही थी, विक्रम वहां अचानक पहुंच गया. उस ने पूर्णिमा पर कुलटा का आरोप लगाते हुए जोरजोर से चिल्लाना शुरू कर दिया.

विक्रम को लगा था कि पूर्णिमा हमेशा की तरह डर जाएगी, समाज का दुहाई दे कर रोने लगेगी या माफी मांगेगी.

लेकिन इस बार पूर्णिमा का रूप बदला हुआ था. उस ने शांति से अपने पर्स से कुछ कागजात निकाले. वे तसवीरें और सुबूत थे, जो उस ने दीवाली वाली रात के बाद विक्रम और रिद्धि के खिलाफ एक प्राइवेट डिटैक्टिव से जमा करवाए थे.

पूर्णिमा ने एक ठंडी मुसकान के साथ विक्रम की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘जिस कांच के घर में तुम सालों से रह रहे थे विक्रम, उस की छत बहुत पहले गिर चुकी है. कोर्ट में जब ये दस्तावेज जाएंगे, तो तुम्हारी सरकारी नौकरी और बचीखुची इज्जत दोनों नीलाम हो जाएंगी. चुपचाप तलाक के कागजों पर दस्तखत करो और मेरी जिंदगी से निकल जाओ.’’

विक्रम बदहवास हो कर वहां से चला गया. उस रात पूर्णिमा को लगा कि उस ने अपनी जिंदगी की सब से बड़ी जंग जीत ली है. उस ने शोएब को गले लगाया, यह सोच कर कि शोएब ही उस का असली सहारा है. लेकिन कहानी में असली मोड़ आना अभी बाकी था.

विक्रम से पीछा छूटने के कुछ ही हफ्तों बाद, पूर्णिमा को अपनी कंपनी के अकाउंट्स में कुछ बड़ी गड़बडि़यों का पता चला. कंपनी के एक बड़े क्लाइंट का फंड एक अनजान अकाउंट में ट्रांसफर किया जा रहा था. जब पूर्णिमा ने गहराई से छानबीन की, तो डिजिटल फुटप्रिंट्स सीधे शोएब के सिस्टम तक पहुंचे.

पूर्णिमा का दिल बैठ गया. उस ने जिस इनसान को अपना हमदर्द, अपना प्रेमी और अपना रक्षक समझा  था, वह केवल उस के पैसे और रुतबे का इस्तेमाल कर रहा था. शोएब की मां की बीमारी, बहन की शादी… सब एक रची हुई पटकथा का हिस्सा थे.

शोएब का मकसद कभी पूर्णिमा से शादी कर के बसना नहीं था, बल्कि उसे भावनात्मक रूप से इतना निर्भर बना देना था कि वह कंपनी का एक बड़ा हिस्सा उस के नाम कर दे.

शोएब की चोरी पकड़ने के बाद पूर्णिमा ने उसे, उसी कैंडललाइट डिनर पर बुलाया जहां वे पहली बार मिले थे. शोएब को लग रहा था कि पूर्णिमा उसे कंपनी में पार्टनर बनाने की घोषणा करने वाली है.

शोएब ने कहा, ‘‘आज काले रंग का लैस वाला सैट पहनना, और कोई अंदर वाला नहीं.’’

खाना खत्म होने के बाद, होटल के सुइट में शोएब ने पूर्णिमा को जी भर कर भोगा. उसे पूरा सुख दिया. काम खत्म होने के बाद पूर्णिमा ने टेबल पर 2 लिफाफे रखे.

‘‘पहला लिफाफा तुम्हारे रैजिग्नेशन लैटर और फ्लैट के कैंसिलेशन पेपर्स का है…’’ पूर्णिमा ने बहुत शांत आवाज में कहा, ‘‘और दूसरा लिफाफा उस पुलिस शिकायत की कौपी है, जो पैसे की धोखाधड़ी के जुर्म में तुम्हारे खिलाफ तैयार है.’’

शोएब का चेहरा फक पड़ गया. उस की सारी ट्रेनिंग, उस का आकर्षण और उस की चालाकियां पूर्णिमा के इस रूप के आगे धरी की धरी रह गईं. उस ने सफाई देने और पूर्णिमा को फिर से अपने प्यार के जाल में फंसाने की कोशिश की, लेकिन पूर्णिमा अब वह कमजोर औरत नहीं थी जो किसी के भी झूठे आकर्षण में आ जाए.

‘‘तुम ने मुझे शरीर की खूबसूरती का अहसास कराया, उस के लिए शुक्रिया, लेकिन तुम ने मुझे यह भी सिखाया कि मेरी असली ताकत किसी मर्द के दिए प्यार में नहीं, बल्कि मेरे अपने आत्मसम्मान में है.’’

पूर्णिमा ने शोएब को कंपनी से बेदखल कर दिया और विक्रम से कानूनी तौर पर अलग हो गई.

कुछ महीने बाद पूर्णिमा ने अपनी कंपनी का विस्तार एक नए शहर में किया. अब वह शराब या सिगरेट के सहारे नहीं जीती थी, न ही उसे अपना अकेलापन बांटने के लिए किसी ऐप या किसी मर्द की जरूरत थी. वह अपनी शर्तों पर जी रही थी…

एक ऐसी औरत के रूप में जिस ने टूटने से इनकार कर दिया था और अपनी जिंदगी की खुद मालिक बनी थी. Hindi Story

Social Taboos: धर्म की बेडि़या,देह की आजादी

Social Taboos. सब से पहले औरत को चुप कराया गया, फिर उसे ढका गया, और फिर इस पूरी कैद को मर्यादा का नाम दे दिया गया. यह काम किसी एक युग या किसी एक समुदाय ने नहीं किया. हर धर्म ने, हर पंथ ने और हर परंपरा ने अपने अपने ढंग से यही किया.

जरा धर्मग्रंथों और रीतिरिवाजों की सूची उठा कर देखिए. सिर पर क्या हो, चेहरे पर क्या हो, पल्लू कितना लंबा हो, आंखें कितनी झुकी हों, आवाज कितनी धीमी हो, किस के सामने जाना है और किस के सामने नहीं, कब बाहर निकलना है और कब नहीं.

मर्द के लिए ऐसी लंबी फेहरिस्त कहीं नहीं मिलती. उस के कपड़े सुविधा के लिए हैं, औरत के कपड़े निगरानी के लिए. घूंघट हो, बुरका हो, हिजाब हो या ननों का परदा, सब का सार एक ही है कि औरत का शरीर खतरा है और उसे छिपा कर रखना ही उस का धर्म है.

सवाल यह है कि खतरा किस के लिए है? औरत के लिए नहीं, उस मर्द की कमजोरी के लिए, जो अपनी नजर और अपनी नीयत संभाल नहीं सकता. मगर सजा औरत को मिलती है, कैद औरत की होती है, और सफाई भी औरत से ही मांगी जाती है.

इन नियमों को बनाने वाले कौन थे. उन के नाम गिन लीजिए. धर्मगुरु, पुजारी, मौलवी, पादरी, पंडित, महंत. मंच पर मर्द, आसन पर मर्द, फैसले की कुरसी पर मर्द. औरत को सिर्फ यह सुनने का हक मिला कि उसे क्या करना है.

जिन किताबों में उस की जिंदगी की हर सांस का हिसाब लिखा गया, उन्हें लिखने की बैठक में वह कभी बुलाई ही नहीं गई. जो फैसला आप की गैरमौजूदगी में लिखा जाए और आप पर थोप दिया जाए, उसे कानून कहते हैं या कैद, यह खुद सोचिए.

मर्द ने धर्म को इतनी कस कर क्यों पकड़ा, इस का जवाब बहुत सीधा है. दुनिया में मर्द चाहे जितना छोटा हो, चाहे बाजार में उस की कोई हैसियत न हो, दफ्तर में उस की कोई सुनता न हो, घर लौट कर कम से कम एक इनसान तो उसे मिल जाए, जो उस के आगे झुके. पत्नी, बहन या बेटी. धर्म ने यह इंतजाम पक्का कर दिया.

आस्था और परंपरा का नाम ले कर कही गई बात पर सवाल उठाना पाप कहलाता है, इसलिए औरत की गुलामी को पवित्रता का चोला पहना दिया गया. पति के नाम का व्रत, पति की उम्र का उपवास, पति के नाम का सिंदूर, पति के नाम की चूडि़यां. मर्द के लिए उस की पत्नी के नाम का कोई व्रत नहीं, कोई चिह्न नहीं, कोई शर्त नहीं. यह बराबरी का रिश्ता नहीं, मालिकाने की रस्म है.

इसी बैकग्राउंड में देखिए कि जब कोई लड़की अपनी मरजी का पहनती है, तो वह क्या कर रही होती है. वह केवल कपड़ा नहीं बदल रही होती. वह धर्म से कह रही होती है कि मेरी देह पर तुम्हारी मुहर अब नहीं चलेगी. वह मर्द को जता रही होती है कि बुद्धि और बल में वह उस से कम नहीं है, इसलिए उसे किसी संरक्षक की जरूरत नहीं.

और जो लोग इस पर सब से ज्यादा चीखते हैं, उन का डर देखिए. बाहर खुले समाज में जब अपनी मरजी से जीती, पहनती और दिखती औरतें सामने आती हैं, तो मर्द केवल उन्हें नहीं देखता. वह अपने घर की ओर देखता है. उसे घबराहट होती है कि कहीं उस की गुलाम जैसी पत्नी, बहन या बेटी भी यह देख कर सवाल न पूछने लगे, विद्रोह न कर बैठे, बराबरी न मांगने लगे.

बेझिझक लड़की उसे भीतर की खामोश औरत का आईना दिखाती है, और आईना देखना हर किसी को पसंद नहीं आता. इसीलिए संस्कृति की दुहाई, संस्कारों का रोना और नैतिकता के भाषण सब से ज्यादा इसी मोड़ पर सुनाई देते हैं. यह चिंता औरत की इज्जत की नहीं, अपने हुक्म की है.

यहां एक ईमानदार बात भी कहनी जरूरी है. बौडी डिस्प्ले के पीछे हर बार विद्रोह ही नहीं होता. कुछ लड़कियां ऐसी हैं, जिन का चेहरा सुंदर है, कद लंबा है, काया छरहरी है और जो गोरी हों या सांवली, त्वचा या शरीर का कोई हिस्सा न दिखाएं तब भी आकर्षक लगती हैं. उन्हें ध्यान खींचने के लिए कुछ उघाड़ने की जरूरत नहीं पड़ती.

ऐसी लड़कियों के बीच टिकने और उनसे मुकाबला करने के लिए बहुत सी लड़कियां ‘माई बौडी, माई चौइस’ का सहारा लेती हैं. मुकाबले की यह वजह भी उतनी ही जायज है, जितनी बगावत की, क्योंकि इसे गलत ठहराने का हक भी उसी पहरेदार को नहीं है, जिस ने सदियों तक औरत को सिर्फ देह समझा.

इसलिए सवाल यह नहीं है कि लड़की ने कितना पहना और कितना नहीं. सवाल यह है कि तय करने वाला कौन है. जिस दिन औरत यह मान लेती है कि उस का शरीर उस का अपना है, उसी दिन धार्मिक गुलामी की सब से मजबूत कड़ी टूट जाती है.

यही वजह है कि धर्म की दुकानें सब से पहले औरत के कपड़ों पर फतवे जारी करती हैं, क्योंकि जिस दिन औरत अपने शरीर की मालिक हो गई, उस दिन उन की सत्ता की जड़ हिल जाएगी. इसलिए हर लड़की को पूरा हक है कि वह मर्द और धर्म की खींची हर रेखा को तोड़े. यही रास्ता उसे उस गुलामी से छुटकारा दिला सकता है, जो परंपरा के नाम पर उस के गले में डाली गई थी.

हां, एक सावधानी फिर भी जरूरी है. अगर देह का प्रदर्शन लाइक्स, व्यूज और बाजार की मांग का गुलाम हो जाए, तो वह आजादी नहीं रहती, बस पुराने पहरेदार की जगह नया पहरेदार आ जाता है. पहले धर्म कहता था क्या ढको, अब बाजार कहता है क्या दिखाओ.

असली आजादी तब है, जब लड़की को ढकने का भी उतना ही हक हो जितना दिखाने का, और दोनों में से किसी भी चुनाव पर उसे किसी को सफाई न देनी पड़े. वह दिन आएगा, जब औरत के कपड़ों पर बहस नहीं होगी.  Social Taboos

Story in Hindi : एहसास

Story in Hindi. आधी रात गए मजदूरों के बीच बैठ कर कमली अपना दुखड़ा आनंद को सुना रही थी कि किस तरह ठेकेदार राम सिंह के बेटे रंजीत और उस के साथियों ने उस के साथ मुंह काला किया.

कमली बैठी आंसू बहा रही थी और आनंद उसे समझा रहा था, ‘‘कमली, तुम चिंता मत करो. तुम्हारी इज्जत के साथ खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा. उन्हें उन के किए की सजा मैं जरूर दिलवा कर रहूंगा. सभी लोग मेरे साथ चलो.’’

आनंद मजदूरों को साथ ले कर ठेकेदार राम सिंह की हवेली पर चला गया. वहां पहुंच कर सारे मजदूर जोरजोर से नारा लगाने लगे, ‘जुल्म और अत्याचार हम नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे… पापियो, बाहर आओ, बाहर आओ, बाहर आओ… राम सिंह मुरदाबाद, मुरदाबाद, मुरदाबाद…’

शोरशराबा सुन कर ठेकेदार राम सिंह हवेली से बाहर निकला और चीख कर बोला, ‘‘क्या हुआ, जो आधी रात को तुम लोग इतना चीखचिल्ला रहे हो?’’

आनंद शांत लहजे में बोला, ‘‘राम सिंहजी, आप के बेटे रंजीत और उस के साथियों ने कमली की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया है. क्या इन मजदूरों की बहूबेटियों की इज्जत नहीं होती? आप अपने बेटे को बुलाइए. कमली पर हुए जुल्म के लिए आप इन मजदूरों से माफी मांगिए, वरना कल से सारे मजदूर हड़ताल पर चले जाएंगे.’’

ठेकेदार राम सिंह गुस्सा होते हुए बोला, ‘‘मेरे टुकड़ों पर पलने वाले आनंद, तुम इन मजदूरों के लिए मुझ से लड़ने आए हो? तुम्हें पढ़ालिखा कर मैं ने ही बड़ा किया और तुम मेरे खिलाफ आवाज उठाने लगे? तुम्हारी औकात ही क्या है? थोड़ा पढ़लिख क्या गए, खुद को मजदूरों का नेता समझने लगे?

‘‘मजदूरों की जिन बहूबेटियों की इज्जत की तुम बात कर रहे हो, वे पैसों की खातिर दूसरों को अपना जिस्म बेचती हैं और यह कमली कब से सतीसावित्री बन गई? क्या मुझे पता नहीं कि पैसों के लिए कमली किसी के भी साथ रात गुजारने के लिए तैयार हो जाती है?

‘‘अगर मेरे बेटे ने इस के साथ थोड़ी जोरजबरदस्ती कर भी ली, तो कौन सा गुनाह कर दिया?

‘‘बड़े आए हैं इंसाफ मांगने. जाओ और इस धंधेवाली कमली को भी अपने साथ ले जाओ.’’

यह सुन कर कमली गुस्से से कांप उठी और उस ने राम सिंह के चेहरे पर थूक दिया. मजदूर भी जोरजोर से चिल्लाने लगे, ‘हम जोरजुल्म नहीं सहेंगे. हम कल से काम नहीं करेंगे. अपराधियों को सजा दो.’

आनंद ने किसी तरह मजदूरों को शांत किया और ठेकेदार राम सिंह से बोला, ‘‘मैं आप से लड़ने नहीं आया. मैं तो कमली के लिए इंसाफ मांगने आया हूं. आप इन मेहनतकश मजदूरों की बहूबेटियों पर गलत लांछन लगा रहे हैं. जैसे आप की बहूबेटियों की इज्जत है, वैसे ही इन मजदूरों की बहूबेटियों की भी इज्जत है. मैं रंजीत और उस के दोस्तों को सजा दिलवाए बगैर चैन से नहीं बैठूंगा.

‘‘आप का मेरे ऊपर कोई एहसान नहीं है. मैं आप का गुलाम नहीं हूं, जो गलत काम के लिए आप का साथ दूं.

‘‘बचपन से आप मुझ से गुलामों की काम कराते रहे, पर आप के जुल्म को अब दूसरे मजदूर नहीं सहेंगे. कल से कोई काम नहीं करेगा,’’ यह कह कर आनंद मजदूरों को ले कर चला गया.

आनंद के मातापिता ठेकेदार राम सिंह के यहां काम करते थे. बचपन में ही उस के मातापिता की मौत हो गई थी. तब से वह ठेकेदार राम सिंह के ही घर पर रहने लगा और उन की तीमारदारी करने लगा.

ठेकेदार राम सिंह आनंद पर खूब जुल्म करता. उस के जोरजुल्म से तंग आ कर वह मजदूरों का नेता बन गया था.

आनंद कमली के बारे में सोचता हुआ घर जा रहा था कि सड़क किनारे बने बगीचे में किसी औरत व मर्द के बीच खुसुरफुसुर की आवाज सुन कर वह चौंक गया.

वह सोचने लगा कि आधी रात को इस वीरान बगीचे में कौन बातें कर रहा है. वह आवाज पहचानने की कोशिश करता हुआ जब थोड़ा नजदीक गया, तो देख कर दंग रह गया. वह औरत कोई और नहीं, बल्कि ठेकेदार राम सिंह की बहू कल्पना थी. उस के साथ मजदूर बुद्धन का बेटा अभय था.

आनंद ध्यान से उन दोनों की बातें सुनने लगा. अभय कल्पना को समझा रहा था, ‘‘नहीं, कल्पना नहीं, तुम वापस अपनी हवेली चली जाओ. अगर तुम्हारे घर वालों को यह सब मालूम हो गया, तो वह मुझे और मेरे घर वालों को मार डालेंगे. तुम्हारा पति रंजीत तुम्हें ढूंढ़ रहा होगा. तुम मेरा कहा मानो और वापस अपनी हवेली लौट जाओ.

‘‘कल्पना, तुम्हें आखिर किस चीज की कमी है. तुम्हारे पास धनदौलत और ऐशोआराम की सारी सुविधाएं मौजूद हैं. हम गरीबों के पास है ही क्या? मेरे पास सिवाय दुख के कुछ नहीं मिलेगा. तुम बेकार में हम लोगों का जीना हराम करवा दोगी. तुम जिद न करो. मैं अपने परिवार की सुखशांति नहीं छीनना चाहता.’’

इतने में आनंद उन दोनों के सामने आ कर खड़ा हो गया. उसे देख अभय और कल्पना सकपका गए.

अभय हड़बड़ा कर बोला, ‘‘आनंद भैया, मैं…मैं कल्पना को भगा कर नहीं लाया.’’

‘‘मैं समझ रहा हूं अभय. इस में तुम्हारी कोई गलती नहीं है,’’ फिर कल्पना की ओर देखते हुए आनंद बोला, ‘‘कल्पना, तुम इसे क्यों बेकार में फंसा रही हो?’’

कल्पना सिसकती हुई बोली, ‘‘नहीं, मैं अब उस घर में नहीं रह सकती. वहां मेरा दम घुटता है.

‘‘रंजीत अपने दोस्तों के साथ दिनभर शराब पीता है और पराई औरतों के साथ रातें रंगीन करता है. बापबेटे दोनों ऐयाश हैं, शराब और शबाब में डूबे रहते हैं. मैं बिस्तर पर पड़ी करवटें बदलती रहती हूं. वह घर मेरे लिए नरक है आनंद बाबू.’’

आनंद मन ही मन सोचने लगा, ‘ठेकेदार राम सिंह से बदला लेने का यह अच्छा मौका है. वह मजदूरों की बहूबेटियों की इज्जत पर हाथ डालता है, आज खुद उस की बहू उस के घर की इज्जत नीलाम करने को तैयार है.

‘राम सिंह मजदूरों की बहूबेटियों को धंधेवाली कहता है, आज उस की बहू एक मजदूर के बेटे के साथ घर छोड़ कर भागने को तैयार है,’ लेकिन उस ने खुद को ऐसा करने से रोक लिया और अपना इरादा बदल लिया.

वह कल्पना से बोला, ‘‘आप घबराइए नहीं. आइए, मेरे साथ चलिए, मैं आप को घर तक छोड़ दूंगा. मैं रंजीत को समझाऊंगा कि वह आप को न सताए.’’

लेकिन कल्पना किसी भी कीमत पर हवेली जाने को तैयार नहीं थी. वह बोली, ‘‘आप नहीं जानते कि वे कितने गिरे हुए हैं. आप के रहते तो वे मुझे कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन आप के जाने के बाद वे मुझ पर तरहतरह के जुल्म करेंगे.’’

आनंद बोला, ‘‘अगर आप घर नहीं गईं, तो कल अभय के परिवार के ऊपर कहर टूट जाएगा. यह बेचारा बेमौत मारा जाएगा. आप मेरा कहा मानिए और मेरे साथ हवेली चलिए. किसी को भी पता नहीं चलेगा.’’

‘‘मैं ने बहाना ढूंढ़ लिया है. मैं आप के ससुर और पति को समझा दूंगा. इस तरह आप का कुछ बिगड़ेगा भी नहीं और अभय भी आप के परिवार वालों के कहर से बच जाएगा.’’

आनंद के काफी समझानेबुझाने के बाद कल्पना घर लौटने को तैयार हो गई.

इधर हवेली में ठेकेदार राम सिंह और उस का बेटा रंजीत कल्पना को घर में न पा कर काफी परेशान थे. उन लोगों ने गुपचुप तरीके से कल्पना की खोजबीन भी करवाई थी, ताकि लोग यह न समझ सकें कि उन की बहू घर से भाग गई है.

काफी खोजने के बाद भी कल्पना का कहीं पता न चल पाया था. इतने में रात के अंधेरे में उन लोगों ने जब 2 लोगों को हवेली की ओर आते देखा, तो बापबेटा दोनों ही बाहर की ओर दौड़े. पास आने पर देखा, तो दोनों दंग रह गए. आनंद के साथ राम सिंह की बहू कल्पना थी.

राम सिंह बोला, ‘‘बहू, तुम कहां चली गई थीं? हम लोगों ने तुम्हें कहांकहां नहीं ढूंढ़ा…’’

तभी आनंद बोल उठा, ‘‘यह आप लोगों के जुल्म से तंग आ कर खुदकुशी करने जा रही थी. वह तो मैं रास्ते में मिल गया. काफी समझाबुझा कर मैं इसे वापस लाया हूं.’’

राम सिंह ने थोड़े नरम लहजे में कहा, ‘‘आनंद, अगर आज तुम नहीं होते, तो न जाने कैसा अनर्थ हो जाता. मेरी सारी इज्जत मिट्टी में मिल जाती. मैं तुम्हारा यह एहसान जिंदगीभर नहीं भूल सकता. आनंद, तुम इस राज को राज ही रहने दो, वरना मैं कहीं का नहीं रहूंगा.’’

‘‘यह सिर्फ आप की बहू की इज्जत का सवाल नहीं है, बल्कि यह सारी औरत जाति की इज्जत का सवाल है.

‘‘आज का मर्द कितना लालची हो गया है कि वह अपने अपमान का बदला किसी की बहूबेटी की इज्जत से लेता है. मैं आप को आगाह करता हूं कि अगर इस घटना के लिए आप ने अपनी बहू को सताया, तो मैं चुप नहीं बैठूंगा.’’

आनंद की बातें सुन कर राम सिंह बोला, ‘‘आनंद, आज तुम ने मेरी आंखें खोल दीं. मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है. आज से मैं किसी को नहीं सताऊंगा. अब किसी मजदूर की बहूबेटी पर जोरजुल्म नहीं होगा.’’

‘‘कमली के साथ जो कुछ हुआ, उस के लिए मैं काफी शर्मिंदा हूं. अब कमली की खोई इज्जत वापस तो नहीं आ सकती, फिर भी मैं मजदूरों के सामने माफी मांगने को तैयार हूं. इस अपराध के लिए तुम लोग मुझे जो सजा देना चाहो, दे सकते हो. तुम लोग अपनी कल की हड़ताल वापस ले लो.’’

वहीं पिता के पास ही खड़ा रंजीत सिर झुकाए पछतावे के आंसू बहा रहा था. उसे अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था.

‘‘अब आप अपने घर की इज्जत को संभालिए,’’ आनंद इतना कह कर हवेली से बाहर निकल गया. Story in Hindi

-पुष्पेश कुमार पुष्प

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