Funny Hindi Story : एक अनार सौ बीमार

Funny Hindi Story. खातेपीते खुशहाल घरों की सुंदर, स्लिम, स्मार्ट और पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखने की कूवत वाली भरीपूरी स्त्रियां स्कूटर या कार चलाना सीखें, इस से अच्छी बात नहीं हो सकती. अपनी श्रीमती की 2 दर्जन से ऊपर कच्चीपक्की सुंदर, सलोनी और चुस्तचालाक सहेलियों को स्कूटर, कायनी और कार सिखाने का श्रेय इस महाबदौलत को जाता है. सब तरफ स्कूटर सीखने की धुन सवार थी और हम में भी अजीब सी सनक थी कि घरबाहर सबकुछ भुला कर चुलबुली व हसीन अप्सराओं को स्कूटर सिखाते रहो, बस.

हमारा तो सिद्धांत था कि न जाने किस भेस में मिल जाएं भगवान. एक लेडी अगर स्कूटर सीखने में दक्ष हो गई तो 2 दिन पहले ही किसी दूसरी जगह से संदेश आ जाता और हम अपना फटीचर सा स्कूटर उठा कर सुबहसुबह उधर लपक लेते. अंधे को और चाहिए भी क्या-2 आंखें. हुस्न का जादू हमारे चारों ओर बिखरा रहता और हमारी आंखें तृप्त रहतीं. जानकार लोग अच्छी तरह जानतेसमझते हैं कि स्कूटर सीखना और सिखाना बहुत मेहनत, लगन और सब्र के काम हैं. सीखने वाली अगर नादान, फक्कड़ और अल्हड़ स्त्री हो तो मामला और भी पेचीदा व जिम्मेदारीवाला हो जाता है.

जरा सी घबराहट, हड़बड़ी या जल्दबाजी सीखने वाली की टांगें या बाहें तुड़वा सकती है. बड़ी सावधानी से हर दिशा में कदम बढ़ाया जाता है. हम 1-2 हफ्ते तक सीखने वाली की तरफ मंदमंद मुसकराहट फेंकते हैं. उस की सुंदरता की तारीफ में ऊंचेऊंचे जुमले फेंकते हैं, जैसे परसों तुम्हारा पीकौक ब्लूसूट गजब ढा रहा था या तुम्हारी नाक पर छोटा सा डायमंड का कोका बहुत जंच रहा है. हैरानी तो हमें तब होती जब वह स्त्री हमारे तारीफ के अनुरूप ही कपड़े व गहने पहनने लगती. और भी कई तरह के टैस्ट हम उन पर करते तब जा कर इश्क में कुछ निखार आता. अब और क्याक्या बताएं. इतने पतले पापड़ बेलबेल कर हमारी कमर टूट जाती मगर कई चुस्त व चंट लेडी ‘थैंक्यू, भाईसाहब’ कह कर ये जा और वो जा, निकल लेती. बहुत बार तो अंधे के पैरों तले बटेर खुद ही आ गिरता और कई बार पहाड़ खोद डालते पर मरा हुआ चूहा भी हाथ न लगता. माया महाठगनि हम जानि.

स्त्रियों में भेड़चाल बहुत होती है. जहां 4 सहेलियां जुड़ीं, वहीं यह प्रश्न उछलता था, ‘अरे मोना, तूने तो कमाल कर दिया. मैं ने सुना कि कल मेघा की किट्टी पार्टी में तू अकेली कायनी चला कर इतनी दूर से आई. तुम्हारे तो पंख लग गए. कोई रोकनेटोकने वाला नहीं. तेरा तो अच्छा सोशल सर्कल बन जाएगा. हम तो ज्यादातर घर में बैठी कुढ़ती रहती हैं. स्कूटर व कायनी तो हमारे घर में भी खड़े हैं मगर कोई चलाना सिखाए तब न? हम तो पति के मुहताज हो कर 2-4 जगह चली भी जाएं तो क्या खाक मजा आता है. तेरी तो समय ही पलट गया. सच्ची बता, तूने कायनी चलाना कब सीखा, किस ने सिखाया, लाइसैंस कहां से बनवाया?’

उत्तर मिलता, ‘अरे, वो हैं न स्वीटी के हस्बैंड, उन की जानपहचान बहुत है. मेरा ड्राइविंग लाइसैंस भी घर बैठे ही बन गया. बहुत प्यार से स्कूटर चलाना सिखाते हैं. हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा. हैं भी बड़े स्मार्ट और समझदार.’ उन सुस्तीभरे सस्ते दिनों में अपने पास एक पुराना सा खटारा स्कूटर था और मन में ढेर सारी बेईमानी व बेशर्मी थी. अपना एक सूत्रीय आदर्श वाक्य था-फालतू का कोई लोचा नहीं. प्यारमुहब्बत के बदनाम पचड़े में हम नहीं पड़ते थे. स्त्री अगर स्कूटर सीखने के दौरान देहस्पर्श के सुख से हमें महरूम न करे तो समझ लो हमारी गुरुदक्षिणा वसूल हो गई. और अगर कोई सडि़यल जलकुकड़ी बातबात पर विरोध व्यक्त करे तो फिर सारी उम्मीदें अगले उम्मीदवार पर रखनी पड़ती हैं.

हमारी श्रीमती ताने देदे कर थक गई, ‘बच्चों के स्कूल की रिपोर्ट देखी है कभी आप ने. मर कर पास होते हैं. मैं सब जानती हूं कि आजकल आप क्याक्या और कहांकहां गुल खिला रहे हैं. घर के काम को छोड़ कर मेरी सहेलियों को स्कूटर सिखाने के बहाने गुलछर्रे उड़ाते फिरते हैं आप. कितनी शर्म आती है मुझे जब लोग ताना देते हैं कि तुम्हारे पति को कोई और कामधंधा नहीं है आजकल. जब देखो गांधी ग्राउंड या नेहरू पार्क में लोगों की पत्नियों को स्कूटर सिखा रहे होते हैं. प्यार अंधा होता है मगर पड़ोसी तो अंधे नहीं होते.’

सबकुछ चुपचाप सहना पड़ता है. प्यार के मामले में कितनी भी गोपनीयता रख लो मगर इश्क और मुश्क कहां छिपते हैं. अब ओखली में सिर दे ही दिया हो तो फिर मूसलों से क्या डरना. उन दिनों नारीमुक्ति आंदोलन अपने चरम पर था. स्त्रीमुक्ति का सब से प्रभावशाली प्रतीक था- स्कूटर. अर्थात घर की चारदीवारी से विद्रोह. स्कूटर सीखने की अदम्य इच्छा रखने वाली नवयौवना का सब से अधिक विरोध उस का पति तथा विशेषरूप से उस की सास करती थी. उन्हें डर था कि स्कूटर सीखा नहीं कि बंद पिंजरे की चिडि़या आजाद हो जाएगी. काबू में नहीं रहेगी. जाएगी कहीं और आ कर बताएगी कि मंदिर गई थी.

जब भी कोई सुकुमारी स्कूटर सीखने की जिद करती तो उसे एक ही रटारटाया उत्तर मिलता था, ‘क्या करोगी इस उम्र में स्कूटर सीख कर? तुम को कौन सा दफ्तर, स्कूल या कचहरी जाना है. वैसे भी तुम्हारे बेटे बबलू को तो चलाना आता ही है. वही ले जाएगा तुम्हें बाजार. फिर तुम्हें स्कूटर सिखाएगा कौन? मालूम है लाइसैंस बनवाने में कितने झंझट हैं. पहले 6 महीने तक कच्चा बनवाओ और फिर डीसी दफ्तर में जा कर पुलिस वालों को टैस्ट दो. बबलू तो ट्यूशन के चक्कर में इधरउधर भटकता है और तुम्हारे पति सुरेश को तो दुकान से ही फुरसत नहीं है. फिर तुम्हें स्कूटर चलाना सिखाएगा कौन?’ पूरे महल्ले में एकमात्र मैं ही ऐसा नायक था जिस के पास इस कौन का उत्तर था और बड़ा संतोषजनक उत्तर था. मैं कोई कमउम्र का लंपट भी नहीं था कि लोगों को बेवजह शक हो. अच्छाखासा इज्जतदार और अधेड़ पक्की हुई उम्र का संजीदा आदमी था मैं. स्त्रियों की राय तो मैं नहीं जानता मगर आसपास और जानपहचान के आदमी मुझे औसतन अच्छी नजर से देखते थे. इसलिए स्त्रियों के मामले में मेरी साख अच्छी थी.

मुझे न तो दफ्तर जाना होता था और न किसी दुकान पर. मांबाप की अच्छीखासी जायदाद थी जहां से अच्छा किराया आ जाता था. इधर मैं ने समय पर ज्योतिष विज्ञान में डिगरी प्राप्त कर ली थी. अच्छे मोटे ग्राहक चंगुल में फंस जाते थे. अपनी व्यस्त दिनचर्या में से स्कूटर सिखाने के लिए समय हम निकाल ही लेते थे.

सिखाने वाला एक था और सीखनेवालियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही थी. एक अनार और सौ बीमार वाली अजीब अटपटी स्थिति थी. फिर भी हम खुश थे. अभी एक शोख हसीना को स्कूटर चलाना सिखा रहे होते तो दूसरी जगह से किसी मित्र या परिचित का फोन आ जाता, ‘यार, मेरी पत्नी कई दिनों से मेरे पीछे पड़ी है. मैं ने उस से वादा किया है कि नया कायनी ले कर दूंगा. तुम्हारे पास वक्त है, स्कूटर चलाना सिखा दो उसे. लाइसैंस भी बनवा देना. खर्चा मैं दे दूंगा. तुम्हें तो पता ही है कि मैं तो टूर पर रहता हूं.’ नारीमुक्ति की इतनी तेज आंधी चल रही थी कि सुबह हम सुनीता को स्कूटर चलाना सिखाते, दोपहर को संगीता को और शाम को अनीता के पहलूनशीं होते. किसी सुपरस्टार हीरो की तरह 3-3 शिफ्टों में काम मिल रहा था हमें. हमारी तो पांचों उंगलियां घी में थीं. दुनिया के सभी गमों से बेखबर हमें बस एक ही धुन थी कि शहर की सभी चुलबुली व तेजतर्रार स्त्रियां स्कूटर चलाना सीख जाएं तथा अपनी गुलामी की जंजीरें हम से खुलवा लें.

इन दिनों हम कार चलाना सिखा रहे हैं. जिनजिन प्यारी सखियों ने हम से स्कूटर चलाना सीखा था वही अब कार चलाना भी सीख रही हैं. कल जब नारीमुक्ति आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा तब उस में हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा. हमारे कंपीटिशन में 3-4 ड्राइविंग स्कूल हैं मगर हम में और उन में जमीनआसमान का अंतर है. हम मुफ्त में सिखाते हैं और बड़े प्यार व लगन से सिखाते हैं. सारे महल्ले में सब से खटारा कार हमारे पास है. नौसिखिए को नई कार से सीखने कौन देता है भला. हमारा कलेजा और जिगर देखिए- कार हमारी, वक्त हमारा और पैट्रोल भी हमारा. जनून की हद है यह. Funny Hindi Story

Hindi Story : उलटा दांव

Hindi Story. डाक्टर अशोक का अपना नर्सिंगहोम था. वे शहर के दिल की बीमारी के जानेमाने डाक्टर थे. वे 32 साल के हो गए थे, पर अभी तक उन्होंने शादी नहीं की थी और न ही वे इस बंधन में बंधना चाहते थे. वे काफी रंगीनमिजाज थे. उन के कई औरतों से नाजायज संबंध थे.

डाक्टर अशोक अपने नर्सिंगहोम में भी खूबसूरत जवान नर्सें रखते थे और किसी न किसी बहाने उन्हें अपने जाल में फांस कर उन से नाजायज संबंध बना लेते थे. जो भी लड़की उन के जाल में फंस जाती, तो उसे तभी उन के चंगुल से छुटकारा मिलता, जब खुद डाक्टर का मन उस से भर जाता था.

लतिका नई नर्स थी. उसे नर्सिंगहोम में आए हुए 4-5 दिन ही बीते थे कि डाक्टर अशोक ने उसे अपनी लच्छेदार बातों में फंसाना शुरू कर दिया.

दरअसल, लतिका ने इस से पहले किसी भी नर्सिंगहोम में काम नहीं किया था और न ही वह अपने काम के बारे में कुछ जानती थी. उसे तो डाक्टर साहब ने उस की गदराई जवानी और खूबसूरती के चलते अपने यहां अच्छी तनख्वाह पर रख लिया था. वह बहुत दिनों से टेस्ट बदलने की फिराक में थे. पुरानी नर्सें अब उन के लिए बासी हो गई थीं.

लतिका जब नर्स की सफेद स्कर्ट और शर्ट पहन कर आती, तो गजब की सैक्सी लगती थी.

एक हफ्ते बाद डाक्टर अशोक ने लतिका की नाइट ड्यूटी लगा दी. वह रात में उसे अपने चैंबर में बुला कर मीठीमीठी बातें करते थे. ऐसी बातें सुन कर लतिका शरमा जाती और केवल हां या नहीं में जवाब देती. डाक्टर अशोक उस की हिचक दूर करना चाहते थे. वे हर लड़की के साथ ऐसा ही करते थे.

एक दिन लतिका को ड्यूटीरूम में बैठेबैठे नींद आ रही थी. अचानक डाक्टर अशोक वहां आ पहुंचे. उसे ऊंघता देख कर उन्होंने कहा, ‘‘हैलो लतिका.’’

‘‘यस डाक्टर,’’ लतिका एकदम से आंखें मलती हुई हड़बड़ा कर उठ बैठी. उसे अपने ऊंघने पर शर्म आ रही थी कि डाक्टर अशोक क्या सोच रहे होंगे? पर वह कर भी क्या सकती थी? नींद पर किस का बस है? वैसे भी इस समय रात के 12 बज रहे थे.

लतिका को हैरानी हो रही थी कि इस समय डाक्टर साहब क्यों राउंड पर आए हैं? सब मरीजों की दवाएं तो वह पहले ही समय पर खिला चुकी थी. कोई गंभीर मरीज भी इस समय नर्सिंगहोम में भरती नहीं था.

‘‘लगता है, तुम्हें नींद आ रही है?’’ डाक्टर अशोक ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘सौरी सर,’’ लतिका ने किसी तरह कहा.

‘‘कोई बात नहीं… हो जाता है. रात की ड्यूटी करना बहुत मुश्किल काम है. आप ऐसा क्यों नहीं करतीं कि नींद और बोरियत से बचने के लिए कोई रोमांटिक मैगजीन या उपन्यास पढ़ा करें?’’

‘‘जी सर, पर रोमांटिक ही क्यों? जासूसी क्यों नहीं?’’ लतिका ने पूछा.

‘‘यह उम्र रोमांस करने की है. रोमांटिक उपन्यास पढ़ने से मन भी रोमांटिक होने लगता है. किसी को प्यार करने को जी चाहने लगता है,’’ डाक्टर अशोक ने कहा.

लतिका शरमाई सी खड़ी रह गई. वह कुछ कह न सकी.

‘‘क्या आप का कोई बौयफ्रैंड है?’’ डाक्टर अशोक ने अचानक पूछा.

‘‘नहीं सर, कोई नहीं है,’’ लतिका अचकचा कर बोली.

‘‘यह कैसे हो सकता है कि आप जैसी खूबसूरत और स्मार्ट लड़की का कोई बौयफ्रैंड न हो?’’

‘‘सच मानिए सर, कोई नहीं है,’’ अब लतिका भी मुसकराई.

‘‘तो कोई बात नहीं. अगर आप बुरा न मानें, तो मैं आप का बौयफ्रैंड बन जाऊं?’’ डाक्टर अशोक ने जाल फेंका.

‘‘आप भी सर, कैसी बातें कर रहे हैं?’’ लतिका ने शरमा कर कहा.

‘‘क्यों, क्या मैं आप को पसंद नहीं? आप खूबसूरत हैं, तो मैं भी हैंडसम हूं,’’ डाक्टर अशोक ने हंसते हुए कहा.

‘‘जी हां सर, इस में क्या शक है?’’ लतिका झेंपते हुए बोली. इस से पहले किसी ने भी उस से ऐसी रोमांटिक बातें नहीं की थीं. उस के दिल में एक अजीब सी गुदगुदी होने लगी. डाक्टर अशोक उसे बेहद जिंदादिल आदमी लगे.

‘‘कम औन माई डियर लतिका, हम लोग अपने इस नए संबंध को ऐंजौय करते हैं,’’ डाक्टर अशोक ने उस की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कुछ रोमांटिक अंदाज में कहा.

‘‘मतलब?’’ पूछते हुए लतिका खुद में ही सिकुड़ गई.

‘‘अरे भई, अब तुम हमारी गर्लफ्रैंड हो. गर्लफ्रैंड को कौफी पिलाना चाहिए या नहीं?’’ डाक्टर अशोक का रोमांटिक मूड बरकरार था.

लतिका मुसकराई. वह सोच रही थी कि कितनी आसानी से डाक्टर ने उसे अपनी गर्लफ्रैंड बना लिया है. अब इस खुशी में कौफी पिलाना चाहते हैं. उसे क्या करना चाहिए? वैसे, इस समय कौफी पीने में हर्ज क्या है? वह कौफी पीने के लिए तैयार हो गई. इस के सिवा और कोई चारा भी नहीं था.

डाक्टर अशोक उसे अपने केबिन में ले गए. वहां कौफी बनाने का सारा इंतजाम था. उन्होंने केबिन में पहुंच कर वहां लगा टैलीविजन चालू कर दिया और लतिका को कुरसी पर बैठा कर खुद कौफी बनाने लगे.

‘‘लाइए सर, मैं कौफी बनाती हूं,’’ लतिका ने कहा.

‘‘नो माई डार्लिंग, आज तो तुम मेरे हाथ की बनी कौफी पी कर देखो,’’ डाक्टर अशोक ने बड़ी अदा से उसे टाल दिया.

लतिका उन की इस अदा पर मुसकराई और सोफे पर बैठी टैलीविजन पर फिल्म देखने लगी.

कुछ ही देर में डाक्टर अशोक ने इलैक्ट्रिक केतली में 2 कप कौफी तैयार कर ली.

‘‘यह लो डार्लिंग, बताओ कौफी कैसी बनी है?’’ एक कप कौफी और तले हुए काजू लतिका की तरफ बढ़ाते हुए डाक्टर अशोक ने पूछा.

लतिका को समझ  नहीं आ रहा था कि आज डाक्टर अशोक उस पर इतने मेहरबान क्यों हैं?

कौफी अच्छी बनी थी. लतिका ने कौफी पीते हुए डाक्टर अशोक की तारीफ की, तो वे मुसकराए. दोनों फिल्म देखते हुए कौफी पीने लगे. फिल्म बहुत रोमांटिक थी. हीरोहीरोइन के प्यार के संबंध दिखाए जा रहे थे. दोनों के दिलों में कुछकुछ होने लगा.

उस कौफी में ऐसा न जाने क्या मिला था कि लतिका अपने होशोहवास खोने लगी. शायद डाक्टर अशोक ने उस में कोई नशीली दवा मिला दी थी.

लतिका को नींद सी आने लगी. उसी समय डाक्टर अशोक ने उसे लपक कर अपनी बांहों में भर लिया. वह उन की बांहों में कसमसाने लगी, पर जल्दी ही अपने होश खो बैठी.

लतिका को जब होश आया, उस समय सुबह के 5 बज रहे थे. वह हड़बड़ा कर उठी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. अपनी ऐसी हालत देख कर वह हैरान रह गई.

डाक्टर अशोक ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा था. उस की इज्जत तारतार कर के रख दी थी. अपनी ऐसी हालत देख कर उस की आंखों से आंसू निकल आए.

लतिका किसी तरह उठी. अपने कपड़े ठीक किए और केबिन से बाहर निकल कर मरीजों को सुबह की दवाएं देने लगी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि वह डाक्टर अशोक को उस की इस हरकत के लिए सबक सिखा कर ही रहेगी. वह ऐसी लड़की नहीं थी कि हालात से समझौता कर के घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर हो जाए.

लतिका ने बहुत सोचसमझ  कर एक योजना बनाई और उस में एक और नर्स मुक्ता को भी शामिल कर लिया.

लतिका ने पता लगा लिया था कि इस नर्सिंगहोम में काम करने वाली मुक्ता भी डाक्टर अशोक के हाथों छली गई थी और उस से बदला लेने के लिए बेताब थी.

दूसरी ओर डाक्टर अशोक अपनी कामयाबी पर बहुत खुश थे. जब कई दिनों तक लतिका ने इस बारे में कोई शिकायत नहीं की, तो उन्होंने समझा  लिया कि वह चालू लड़की है और इस तरह के संबंधों से उसे कोई एतराज नहीं है.

एक दिन रात को राउंड लेते समय लतिका ने बड़ी अदा से मुसकराते हुए डाक्टर अशोक से कहा, ‘‘कौफी पिलाए तो बहुत दिन हो गए हैं डाक्टर साहब. अपनी गर्लफ्रैंड को क्या इतनी जल्दी भूल गए?’’

‘‘नहीं…नहीं… ऐसी कोई बात नहीं है डार्लिंग. मैं तो समझा था कि कहीं तुम उस दिन की बात का बुरा तो नहीं मान गई हो?’’ डाक्टर अशोक ने बड़ी बेताबी से कहा

‘‘बुरा तो मान गई थी डाक्टर. प्यार करने के लिए भला नशे की गोली देने की क्या जरूरत थी? खुद तो पूरा मजा ले लिया, मैं प्यासी की प्यासी ही रह गई,’’ आंखों में शरारत भर कर लतिका ने कहा.

‘‘ओह, तो आज जी भर कर प्यार कर लेना डार्लिंग. बंदा आप की सेवा में हाजिर है,’’ डाक्टर अशोक खुश होते हुए बोले.

रात को तकरीबन 12 बजे लतिका ने मुक्ता से गुपचुप कुछ सलाहमशवरा किया, फिर वह डाक्टर अशोक के केबिन में दाखिल हुई. वह बहुत बेसब्री से उसी का इंतजार कर रहे थे.

‘‘आओ डार्लिंग, बहुत देर लगा दी,’’ उसे देख कर वह मुसकराए.

‘‘इंतजार में ही तो मजा है. अब फिक्र मत करो. सारी रात ही अपनी है,’’ बड़ी अदा से आंखें मटकाते हुए लतिका बोली.

डाक्टर अशोक उसे अपनी बांहों में लेने को बेचैन हो उठे, लेकिन उस ने उन्हें झटक दिया.

‘‘जरा रुकिए, पहले एक कप कौफी हो जाए, तो जरा शरीर में ताजगी आए. थकान से मेरा अंगअंग टूट रहा है. आप मुझ से बहुत काम लेते हैं डाक्टर. आप बहुत जालिम हैं. पहले जरा मूड बनने दीजिए,’’ वह नखरे दिखाते हुए डाक्टर की बांहों में आने से बचते हुए बोली. फिर वह बड़ी अदा से अपने कूल्हे मटकाती हुई इलैक्ट्रिक केतली में कौफी बनाने चली गई.

उस की ऐसी अदाएं देख कर डाक्टर अशोक उसे पाने को बेचैन हो उठे थे. वे टैलीविजन में आती हुई रोमांटिक फिल्म देखने में मशगूल हो गए.

कौफी पीने के बाद डाक्टर अशोक को अपना सिर घूमता हुआ सा महसूस हुआ. अभी वे कुछ समझ  पाते कि बेहोश हो कर अपने केबिन में बिछे बैड पर ढह गए.

इस के 2 दिन बाद जब डाक्टर अशोक अपने केबिन में बैठे मरीज देख रहे थे, उसी समय लतिका उन के पास आई. उस ने उन्हें एक लिफाफा दे कर उसे देख लेने को कहा.

डाक्टर अशोक ने लिफाफा खोल कर देखा. उस में कुछ फोटो थे. उन फोटो को देख कर उन की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उन फोटो में वे एकदम नंगे थे और लतिका भी साथ थी. ये फोटो उस रात को कौफी में नशे की गोलियां मिला कर मुक्ता की मदद से खींचे गए थे.

डाक्टर अशोक ने हड़बड़ाहट में सब को केबिन से बाहर निकाला. उन का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया था.

‘‘आखिर तुम चाहती क्या हो?’’ डाक्टर ने सहमे अंदाज में लतिका से पूछा.

‘‘अपनी बेइज्जती का बदला लेना है,’’ लतिका ने कहा.

‘‘तुम जितनी चाहो, उतनी दौलत ले लो, लेकिन ये फोटो और इन के नैगेटिव मुझे दे दो,’’ डाक्टर अशोक ने उसे रुपयों का लालच देते हुए कहा.

‘‘डाक्टर अशोक, तुम ने क्या मुझे ऐसीवैसी लड़की समझ  रखा है? तुम ने क्या समझ  था कि तुम धोखे से मेरे जिस्म से खिलवाड़ कर लोगे और मैं चुप रह जाऊंगी या आंखों में आंसू भर कर तुम्हारे सामने गिड़गिड़ाऊंगी?

‘‘नहीं… मैं इतनी कमजोर नहीं हूं. केवल 10 साल की उम्र में मैं ने अपने पिता को खो दिया था. तब से मैं जिंदगी में आने वाली तमाम मुश्किलों का सामना अकेली कर रही हूं,’’ लतिका ने गुस्से से कहा.

‘‘तो तुम करोगी क्या? इस से तो तुम्हारी ही बदनामी होगी? इस से अच्छा है कि तुम रुपए ले लो, नहीं तो फिर तुम्हारे पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा. मैं ने तुम जैसी लड़कियां बहुत देखी हैं,’’ एक बार फिर उसे झांसे में लेने की कोशिश करते हुए डाक्टर अशोक ने धमकाया.

‘‘नहीं, मैं तुम को इतनी आसानी से नहीं छोड़ूंगी. होने दो बदनामी. मैं तो लुट ही चुकी हूं. मैं अब अपनी बदनामी से डरने वाली नहीं हूं. लेकिन कल जब ये फोटो सभी अखबारों में छपेंगे, तो तुम कहीं के नहीं रहोगे डाक्टर.

‘‘लोग तुम्हारे नाम पर थूकेंगे. यह दौलत और शोहरत एक ही दिन में तुम से छिन जाएगी. बलात्कार करने के जुर्म में तुम्हें जेल अलग से होगी. मैं ही नहीं, कई दूसरी लड़कियां भी तुम्हारे खिलाफ बयान देंगी.’’

इतना सुनते ही डाक्टर अशोक घबरा गए. उन्हें अपने पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आई. उन की बोलती बंद हो गई.

वे गिड़गिड़ाते हुए बोले, ‘‘मुझे  माफ कर दो. मुझ  से बहुत बड़ी गलती हो गई है. प्लीज, ऐसा मत करो, नहीं तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा. मेरी डाक्टरी की डिगरी तक छिन जाएगी.’’

‘‘मैं ऐसा ही करूंगी. मैं तुम्हें दरदर का भिखारी बना कर छोड़ूंगी, ताकि तुम किसी औरत की तरफ गलत निगाह से देखने की कभी हिम्मत भी न कर सको,’’ लतिका ने उन्हें धमकी दी. वह उन्हें गिड़गिड़ाता देख कर बहुत खुश थी. यही तो वह चाहती थी.

‘‘मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं. तुम जो भी कहोगी, मैं मानने को तैयार हूं, लेकिन मेरी बदनामी मत करो,’’ उस के पैरों पर झकते हुए डाक्टर अशोक बोले.

‘‘तुम ने मेरी इज्जत लूटी है, इसलिए अब मुझे  समाज में अपनी बीवी का दर्जा देना पड़ेगा. तुम्हें मंजूर है?’’ लतिका ने कहा.

कुछ देर तक डाक्टर अशोक सोचते रहे, फिर बोले, ‘‘ठीक है लतिका, मैं तुम से शादी करूंगा.’’

‘‘देखो, अपनी बात से मुकरना मत. तुम्हारी सारी बातें अब मेरे इस मोबाइल में टेप हो चुकी हैं,’’ अपना मोबाइल दिखाते हुए लतिका बोली.

डाक्टर अशोक अब पूरी तरह से अपनी हार मान चुके थे. अब उन के सामने लतिका को बीवी बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था.  Hindi Story

Inspirational Story in Hindi : जीत

Inspirational Story in Hindi. अखबार में आई उस खबर को सपना ने 10 बार बड़ी लगन और चाव से पढ़ा. खबर का एकएक शब्द उसे जबानी याद हो गया था. वह खबर पढ़ कर खयालों में खो गई थी.

शहर की एक मशहूर कंपनी की तरफ से उस कंपीटिशन का आयोजन किया गया था. यह कंपनी औरतों और जवान लड़कियों के अंदरूनी कपड़े बनाती थी. हर साइज की ब्रा और पैंटी बनाने में वह कंपनी माहिर थी और उस का शहर में बड़ा नाम और रसूख था.

16 साल से 20 साल तक की 31 लड़कियां उस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं. विजेता को कंपनी की तरफ से एक महीने के लिए पैरिस की मुफ्त सैर और 5 लाख रुपए का नकद इनाम दिया जाने वाला था. हर खूबसूरत लड़की के लिए यह सुनहरा मौका था.

सपना शहर के जानेमाने उद्योगपति की एकलौती औलाद थी. वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही घमंडी और जिद्दी भी. दुनिया का हर सपना पैसे की ताकत से पूरा हो सकता है, यह उस की सोच थी. वह हर हालत में इस शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ बन कर कंपीटिशन जीतने का मन ही मन फैसला कर चुकी थी.

सपना अपनी जिंदगी के 18 साल पार कर चुकी थी. कंपीटिशन के लिए केवल एक महीना बाकी था. इस एक महीने के अंदर उसे हर उस काम को अंजाम देना था, जो उस की जीत के लिए सहायक हो सके.

सपना जीजान से इस के लिए मेहनत कर रही थी. अपने दिमाग में उस ने इस बारे में कुछ योजनाएं और चालें सोची थीं. उन पर अमल कर के वह अपना रास्ता तय करना चाहती थी.

सब से पहले उस ने अपने खास आदमी लगा कर उस कंपीटिशन के लिए कौन और कितने ज्यूरी तय किए गए हैं, उन के बारे में मालूम करने का काम किया था. उसे मिली जानकारी के तहत 3 ज्यूरी बनाए गए थे. उन का फैसला अहम माना जाने वाला था.

60 साला मदनलाल पटेल भी ज्यूरी मेंबर था. वह शहर का माना हुआ बिल्डर था. अच्छी सेहत और रंगीनमिजाज उस के स्वभाव की खासीयत थी.

एक दिन मौका पा कर सपना उस से मिलने उस के दफ्तर पहुंची. उस समय शाम के 6 बज रहे थे और दफ्तर का स्टाफ जा चुका था.

मदनलाल अपने केबिन में कुछ खास फाइलें देख रहा था. सपना ने उसे मिलने का वही समय तय किया. सपना ने उसे अपनी पहचान और उस से मिलने की खास वजह साफ बताई थी.

सपना की खूबसूरती और हिम्मत देख कर मदनलाल प्रभावित हुआ था, मगर ऊपरी तौर पर बनावटी गंभीरता अपने चेहरे पर ला कर वह अपनी सधी, मगर शांत आवाज में कहने लगा, ‘‘सपना, कंपीटिशन के नियम मालूम हो जाने पर भी तुम ने मुझ से मिलने और मुझ पर अपना दबाव डालने की भूल की है. इस के लिए मेरी शिकायत पर तुम्हें कंपीटिशन से बाहर भी जाना पड़ सकता है.’’

‘‘पटेल साहब, कानून और नियम आदमी ही बनाता है और उसे तोड़ने वाला भी आदमी ही होता है. यह कानून तोड़ना आप के लिए फायदेमंद और बहुतकुछ देखने का मौका भी साबित होगा, यह मेरा दावा है.’’

‘‘मेरी समझ में यह बात नहीं बैठ रही है कि कानून तोड़ने के बाद मुझे क्या फायदा होने वाला है. अगर तुम इस बात को जरा सलीके से और साफसाफ कहोगी, तो मैं समझ सकता हूं.’’

‘‘पटेल साहब, आप को तो मालूम ही है कि कंपनी वालों ने यह कंपीटिशन अपना माल ज्यादा से ज्यादा लोगों को बेचने के लिए कराया है. कंपनी जो ब्रा और पैंटी बनाती है, वह कंपीटिशन में भाग लेने वाली लड़की के जिस्म पर कितनी जंचती है और उस का देखने वालों पर क्या असर पड़ता है, यह मैं आप को यहीं दिखा सकती हूं.’’

सपना की इस खुली दावत को नकारना मदनलाल जैसे रंगीनमिजाज आदमी के लिए बहुत मुश्किल था.

अपनी आवाज को काबू में करते हुए वह सपना की तरफ देख कर बड़ी सहज आवाज में बोला, ‘‘सपना, तुम्हारे इस खूबसूरत बदन पर कंपनी की ब्रा और पैंटी कैसी लगती है, यह मैं जरूर देखूंगा, मगर इस केबिन में नहीं.

‘‘साथ वाला केबिन मेरा आराम का कमरा है. वहां चल कर हम आराम से एकदूसरे की चाहत अच्छी तरह पूरी कर सकते हैं.’’

सपना ने हंसते हुए अपना रुख कमरे की तरफ किया. अगले ही पल में वे दोनों कमरे में थे. सपना ने बिना समय गंवाए बदन से अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए. मदनलाल उस के बदन को बडे़ चाव से देख रहा था. देखते ही देखते सपना पूरी तरह कपड़ों से बाहर थी. उस का संगमरमर जैसा बदन और उस की मादक अदाएं देख कर मदनलाल पूरी तरह से बेकाबू हुआ जा रहा था.

सपना ने अपनी बांहों का घेरा मदनलाल के बदन पर कसते हुए अपने होंठ उस के होंठों पर रखे थे. मदनलाल के बदन पर से भी देखते ही देखते एकएक कपड़ा दूर होता गया.

सपना मदनलाल के बदन के विभिन्न अंगों को अपने हाथ से सहलाती और होंठों से चूमती रही. उस की मादक हरकतों से वह पूरी तरह बहक गया था.

सपना के बदन को अपना बनाने के लिए वह मरा जा रहा था. सपना उस की बेकाबू हरकतों को देख कर मन ही मन मुसकराती रही.

देखते ही देखते वह दौर भी आया, जब मदनलाल के सब्र का पैमाना छलकने को हुआ. मगर सपना उस पर पूरी तरह हावी हो कर उस की हर हरकत को बड़ी चतुराई से नाकाम करती रही.

बेचारा मदनलाल कब निढाल हो कर लंबीलंबी सांसें भरने लगा, यह उसे भी पता नहीं लगा. आधे घंटे के बाद वह दोनों फ्रेश हो कर बाहर आए. मदनलाल उसे छोड़ने के लिए खुद उस की कार तक आया था. सपना एक बाजी जीत चुकी थी.

2 दिनों के बाद सपना दूसरे ज्यूरी मेंबर इंद्रजीत वर्मा के घर पर थी. रात के 8 बजे थे और इंद्रजीत रोज की तरह आज भी शराब में धुत्त बैठा था. बंगले में वह आज अकेला था. उस की बीवी और बच्चे किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गए हुए थे.

सपना ने यह मौका अपने मिशन के लिए ठीक समझा था. इंद्रजीत को उस ने अपनी रसीली बातों और कामुक अदाओं से इस तरह जकड़ कर रख दिया कि बेचारा इंद्रजीत उस के जिस्म को चूमनेचाटने और मसलने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर सका. अपनी सांसों पर काबू रख पाना उस के लिए बड़ा मुश्किल काम था.

तीसरा ज्यूरी मेंबर अमरनाथ गुप्ता सपना की समझ से ज्यादा चालाक और शातिर खिलाड़ी साबित हुआ था, मगर सपना ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं.

अमरनाथ गुप्ता की बीवी को मरे हुए 10 साल हो गए थे और वह अपनी रातें मनपसंद क्लबों में खूबसूरत औरतों के साथ गुजार कर अपना शौक पूरा करता था.

सपना की लाख कोशिशों के बावजूद वह उस पर इस तरह हावी हुआ था कि उसे अपनी इज्जत बचाना बड़ा मुश्किल लगने लगा था.

अमरनाथ पर आजमाया हुआ हर दांव सपना ने बड़ी चतुराई से नाकाम किया था. सपना के सामने एक पल वह भी आया, जिस समय खुद उसे महसूस होने लगा कि वह अपनी बाजी हारने वाली है, तब पूरी तरह सावधान हो कर उस ने अमरनाथ को अपने बदन से अलग कर दिया था. बेचारा अमरनाथ खुद ही निढाल हो गया था.

इस तरह सपना ने अपने रूप और मायाजाल से उन तीनों ज्यूरी मेंबरों को इस कदर अपना दीवाना बनाया था कि उन तीनों की नजरों में सपना ही इस शहर की एकमात्र ‘ब्यूटी क्वीन’ थी.

सपना के सिर पर ‘ब्यूटी क्वीन’

का ताज पहनाने के लिए वे तीनों बेताब हुए जा रहे थे. अब सपना का सपना सच होने में ज्यादा देर नहीं थी.

देखते ही देखते वह दिन भी आ गया, जिस का इंतजार सपना और दूसरी लड़कियों और ज्यूरी मेंबरों को था. कंपीटिशन का विरोध करने के लिए शहर के ‘नारी संगठन’ कार्यक्रम में अड़चनें पैदा न करें, इस के लिए संयोजक ने कंपीटिशन के उद्घाटन की जिम्मेदारी शहर के पुलिस कमिश्नर के हाथों में सौंपी थी. इस वजह से वहां पुलिस का पूरा बंदोबस्त था.

शहर के एक शानदार थिएटर में यह कंपीटिशन होने वाला था. लोग बेताबी से कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. पूरा हाल लोगों से भरा पड़ा था. कार्यक्रम की पूरी तैयारी हो चुकी थी. 10 खूबसूरत लड़कियां इस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं.

3 ज्यूरी मेंबर अपनी सीट पर बैठे थे. देखते ही देखते स्टेज का मखमली खूबसूरत परदा ऊपर गया. लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई. कंपीटिशन के एंकर ने स्टेज संभाल लिया.

सब से पहले 10 लड़कियों ने अपना परिचय लोगों को दिया. दूसरे राउंड में अपने तन पर आकर्षक कपड़े पहन उन्होंने अपनी जवानी और खूबसूरती का जलवा दिखाया. उन के कपड़ों से उन की जवानी और उन के खूबसूरत जिस्म का हर एक अंग जगमगाती रोशनी में लोगों की नींद उड़ा रहा था. सब की आंखों में उन जवान लड़कियों के प्रति तारीफ और वासना तैरती नजर आ रही थी. उन की मादक अदाओं पर लोग तालियां और सीटियां बजा रहे थे और उन्हें उत्साहित कर रहे थे.

आखिरी राउंड शुरू हुआ. हर लड़की कंपनी द्वारा बनाई गई ब्रा और पैंटी पहन कर अपनी मस्तानी चाल से लोगों के दिलों में हलचल मचा रही थी. उन कपड़ों में हर लड़की सैक्सी लग रही थी… लोग रहरह कर अपनी जगह खड़े हो कर उन की तारीफ कर रहे थे.

आखिर में आयोजक द्वारा निकाले गए नामों का ऐलान होने की सूचना दी गई. इस का जोरशोर से स्वागत हुआ.

अगले 5 मिनट में आयोजक द्वारा निकाले गए नाम बताए गए. सपना शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ चुनी गई थी. उस के सिर पर ताज पहनाया गया और उसे 5 लाख रुपए का चैक और पैरिस घूमने का टिकट दिया गया. लोगों ने तालियां बजा कर उस का स्वगात किया.

सपना मन ही मन मुसकराती हुई लोगों का अभिनंदन स्वीकार करती बड़ी शान से स्टेज पर खड़ी रही थी.  Inspirational Story in Hindi

— माधव ना. रानडे

 

Motivational Story : उस का गणित

Motivational Story. मनोज हर दिन जिस मिनी बस में बैठता था, उसी जगह से लक्ष्मी भी बस में बैठती थी. आमतौर पर वे एक ही बस में बैठा करते थे, मगर कभीकभार दूसरी में भी बैठ जाते थे.

उन दिनों उन के बस स्टौप से सिविल लाइंस तक का किराया 4 रुपए लगता था, मगर लक्ष्मी कंडक्टर को 3 रुपए ही थमाती थी. इस बात को ले कर उस की रोज कंडक्टर से बहस होती थी, मगर उस ने एक रुपया कम देने का जैसे नियम बना ही लिया था.

कभीकभार कोई बदतमीज कंडक्टर मिलता, तो लक्ष्मी को बस से उतार देता था. वह पैदल आ जाती थी, पर एक रुपया नहीं देती थी.

लक्ष्मी मनोज के ही महकमे के किसी दूसरे सैक्शन में चपरासी थी. एक साल पहले ही अपने पति की जगह पर उस की नौकरी लगी थी.

लक्ष्मी का पति शंकर मनोज के महकमे में ड्राइवर था. सालभर पहले वह एक हादसे में गुजर गया था.

लक्ष्मी की उम्र महज 25 साल थी, मगर उस के 3 बच्चे थे. 2 लड़के और एक लड़की.

एक दिन मनोज पूछ ही बैठा, ‘‘लक्ष्मी, तुम रोज एक रुपए के लिए कंडक्टर से झगड़ती हो. क्या करोगी इस तरह एकएक रुपया बचा कर?’’

‘‘अपनी बेटी की शादी करूंगी.’’ ‘‘एक रुपए में शादी करोगी?’’ मनोज हैरान था.

‘‘बाबूजी, यों देखने में यह एक रुपया लगता है, मगर रोजाना आनेजाने के बचते हैं 2 रुपए. महीने के हुए 60 रुपए और सालभर के 730 रुपए.  10 साल के 7 हजार, 3 सौ. 20 साल के 14 हजार, 6 सौ.

‘‘5 सौ रुपए इकट्ठे होते ही मैं किसान विकास पत्र खरीद लेती हूं. साढ़े 8 साल बाद उस के दोगुने पैसे हो जाते हैं. 20 साल बाद शादी करूंगी, तब तक 40-50 हजार रुपए तो हो ही जाएंगे.’’

मनोज उस का गणित जान कर हैरान था. उस ने तो इस तरह कभी सोचा ही नहीं था. भले ही गलत तरीके से सही, मगर पैसा तो बच ही रहा था.

लक्ष्मी को खूबसूरत कहा जा सकता था. कई मनचले बाबू और चपरासी उसे पाने को तैयार रहते, मगर वह किसी को भाव नहीं देती थी.

लक्ष्मी का पति शराब पीने का आदी था. दिनभर नशे में रहता था. यही शराब उसे ले डूबी थी. जब वह मरा, तो घर में गरीबी का आलम था और कर्ज देने वालों की लाइन.

अगर लक्ष्मी को नौकरी नहीं मिलती, तो उस के मासूम बच्चों का भूखा मर जाना तय था.

पैसे की तंगी और जिंदगी की जद्दोजेहद ने लक्ष्मी को इतनी सी उम्र में ही कम खर्चीली और समझदार बना दिया था.

एक दिन लक्ष्मी ने न जाने कहां से सुन लिया कि 10वीं जमात पास करने के बाद वह क्लर्क बन सकती है. बस, वह पड़ गई मनोज के पीछे, ‘‘बाबूजी, मुझे कैसे भी कर के 10वीं पास करनी है. आप मुझे पढ़ालिखा कर 10वीं पास करा दो.’’

वह हर रोज शाम या सुबह होते ही मनोज के घर आ जाती और उस की पत्नी या बेटाबेटी में से जो भी मिलता, उसी से पढ़ने लग जाती. कभीकभार मनोज को भी उसे झेलना पड़ता था.

मनोज के बेटाबेटी लक्ष्मी को देखते ही इधरउधर छिप जाते, मगर वह उन्हें ढूंढ़ निकालती थी. वह 8वीं जमात तक तो पहले ही पढ़ी हुई थी, पढ़नेलिखने में भी ठीकठाक थी. लिहाजा, उस ने गिरतेपड़ते 2-3 सालों में 10वीं पास कर ही ली.

कुछ साल बाद मनोज रिटायर हो गया. तब तक लक्ष्मी को लोवर डिविजनल क्लर्क के रूप में नौकरी मिल गई थी. उस ने किसी कालोनी में खुद का मकान ले लिया था. धीरेधीरे पूरे 20 साल गुजर गए.

एक दिन लक्ष्मी अचानक मनोज के घर आ धमकी. उस ने मनोज और उस की पत्नी के पैर छुए. वह उसे पहचान ही नहीं पाया था. वह पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई थी. उस का शरीर भी भराभरा सा लगने लगा था.

लक्ष्मी ने चहकते हुए बताया, ‘‘बाबूजी, मैं ने अपनी बेटी की शादी कर दी है. दामादजी बैंक में बाबू हैं. बेटी बहुत खुश है.

‘‘मेरे बड़े बेटे राजू को सरकारी नौकरी मिल गई है. छोटा बेटा महेश अभी पढ़ रहा है. वह पढ़ने में बहुत तेज है. देरसवेर उसे भी नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘क्या तुम अब भी कंडक्टर को एक रुपया कम देती हो लक्ष्मी?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘नहीं बाबूजी, अब पूरे पैसे देती हूं…’’ लक्ष्मी ने हंसते हुए बताया, ‘‘अब तो कंडक्टर भी बस से नहीं उतारता, बल्कि मैडम कह कर बुलाता है.’’

थोड़ी देर के बाद लक्ष्मी चली गई, मगर मनोज का मन बहुत देर तक इस हिम्मती औरत को शाबाशी देने का होता रहा. Motivational Story

Society : रिश्तों में मिठास घर बने खास

Society: हमारे समाज में कुछ फैसले ऐसे लिए गए हैं जिन पर कभी बहस नहीं हुई, फिर भी वे सौ फीसदी सच मान लिए गए हैं.उन्हीं में से एक है ‘घर बनाती भी औरत है और और घर बिगाड़ती भी वही है.’

परिवार में सुख, संस्कार और रिश्तों में मिठास हो तो कहा जाता है कि ‘बहू बहुत अच्छी मिली है’. लेकिन घर में तनाव या टूट होते ही आरोप सब से पहले उसी पर आता है, मानो घर किसी एक इनसान द्वारा चलने वाला सिस्टम हो.

यह केवल समाज द्वारा पहले से बना ली गई राय नहीं, बल्कि वह सोच है जिस ने औरत के बलिदान को फर्ज और उस के दर्द को किस्मत मान लिया है. सवाल यह नहीं है कि औरत का रोल खास है या नहीं… वह यकीनन है, बल्कि यह है कि क्या वह अकेली जिम्मेदार है?

अगर घर बनाना सामूहिक कामयाबी है, तो उस का बिगड़ना भी सामूहिक नाकामी है. फिर हर बार कठघरे में केवल औरत ही क्यों? यह सवाल परिवार के भविष्य से जुड़ा है.

घर एक सिस्टम है, कोई इनसान नहीं

हम अकसर घर को चार दीवारों और छत का नाम मान लेते हैं, जबकि वह भावनाओं, संघर्षों और रिश्तों से बना एक जीताजागता सिस्टम है. वहां भावनाएं, उम्मीदें, सम  झौते और रिश्ते सभी रहते हैं.

इस में माता, पिता, बच्चे और बुजुर्ग सभी का रोल समान रूप से खास होता है. फिर भी यह सोच बना ली गई है कि घर की कामयाबी का क्रेडिट पूरे परिवार को मिलेगा, लेकिन उस की नाकामी का ठीकरा केवल औरत के सिर पर फोड़ा जाएगा.

क्या कोई खेत केवल बारिश से लहलहाता है? क्या कोई पेड़ केवल जड़ों से खड़ा रहता है? क्या कोई नदी केवल एक स्रोत से बहती है? जब हर कुदरती चीज सामूहिक योगदान से बनती है, तो परिवार जैसी जरूरी संस्था की जिम्मेदारी एक ही इनसान पर कैसे डाली जा सकती है?

लक्ष्मी बना कर बोझ क्यों

भारतीय समाज ने औरत को इज्जत देने के लिए उसे देवी, लक्ष्मी और अन्नपूर्णा कहा, लेकिन यह इज्जत कई बार बोझ बन गई. देवी बना देने से उस के इनसान होने का हक सिमट गया.

उस के थकने, रोने, गलती करने और अपनी इच्छाएं रखने की गुंजाइश कम हो गई. उस से उम्मीद की गई कि वह हर हालात में मुसकराए, सब को जोड़े रखे और खुद को सब से आखिर में रखे.

दुख की बात यह है कि जिस इज्जत के कारण औरत को ऊंचा स्थान दिया गया, उसी पर इतनी जिम्मेदारी डाल दी गई कि वह दबने लगी, और जब वह थक गई तो कहा गया कि ‘घर संभाल नहीं पाई’.

सब से ज्यादा कमी तब निकाली जाती है, जब औरत अपनी औलाद को समाज के मुताबिक परवरिश देने में नाकाम रहती है. अगर वह अपने बच्चों को रूढि़वादी रस्मों से दूर रखती है, तो भी कठघरे में खड़ी कर दी जाती है.

नए रोल, पुराने बोझ

आज की औरत केवल रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि वह डाक्टर, इंजीनियर, टीचर, अफसर और कारोबारी बन कर परिवार की माली रीढ़ भी बन रही है, फिर भी जिम्मेदारियां उस के साथ समान रूप से सा  झा नहीं की गई हैं. दफ्तर से लौटने के बाद भी रसोई, बच्चों की पढ़ाई, रिश्तेदारियों का निभाना और बुजुर्गों की देखभाल ज्यादातर उसी पर बनी रहती है.

समाज ने उस के कंधों पर नई जिम्मेदारियां जोड़ दीं, लेकिन पुराने बो  झ कम नहीं किए. यह सिस्टम उसे मजबूत नहीं बनाता, बल्कि धीरेधीरे भीतर से थका देता है. और जब यह थकान या असंतोष सामने आता है, तो उसे ‘औरत का स्वभाव’ कह कर नजरअंदाज कर दिया जाता है.

समस्या औरत नहीं, सोच है

दरअसल, समस्या औरत या मर्द नहीं, बल्कि सोच है, जो घर की जिम्मेदारी औरत पर और हक मर्द पर मान लेती है, और त्याग को केवल औरत का गुण सम  झती है. यही सोच मर्द की गैरहाजिरी को मजबूरी और औरत की थकान को कमजोरी मानती है.

घर आपसी मतभेद या पैसे के संकट से नहीं टूटते, बल्कि तब टूटते हैं जब बातचीत और इज्जत खत्म हो जाती है और लोग हालात से लड़ने के बजाय एकदूसरे से लड़ने लगते हैं, इसलिए किसी घर को बचाना है तो सब से पहले सोच बदलनी होगी.

साझेदारी से मजबूत परिवार

मजबूत परिवार की पहचान विवादों का न होना नहीं, बल्कि उन का मिल कर हल निकालना है. जहां पति सम  झे कि परिवार केवल संसाधनों से नहीं चलता, पत्नी महसूस करे कि उस के संघर्षों को सम  झा जा रहा है, बच्चे जिम्मेदारियां सीखें और बुजुर्ग अनुभव साझा करें, दबाव नहीं.

परिवार तब मजबूत होता है जब हर सदस्य खुद को सहभागी माने, बो  झ नहीं. इज्जत बड़े उपहारों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के बरताव… एक धन्यवाद, एक माफी, इमोशनल बातचीत और एकदूसरे की थकान को सम  झने से आता है. यही छोटी कोशिशें बड़ी मुसीबतों को भी कम कर देती हैं.

उंगली नहीं, आईना उठाओ

जब भी कोई घर टूटे, समाज को अपनी पुरानी आदत बदलनी होगी. हर बार औरत को कुसूरवार ठहराने से न घर बचते हैं, न रिश्ते. घर टूटने के कारण गहरे हैं जैसे अहंकार, संवाद की कमी, असमान जिम्मेदारियां और इज्जत की कमी.

औरत घर की धुरी हो सकती है, पर वह अकेला पहिया नहीं है. परिवार एक रथ है जिसे सभी मिल कर चलाते हैं. एक पहिया टूट जाए तो रथ नहीं चलता, लेकिन अगर बाकी पहिए भी अपनी जिम्मेदारी भूल जाएं तो फिर कुसूर केवल एक पहिए का नहीं होता.

अब समय आ गया है कि औरत को देवी नहीं, इनसान मान कर सा  झेदारी दी जाए. घर एक के बलिदान से नहीं, सब के सहयोग से बनता है और उस के बिगड़ने का कुसूर भी किसी एक पर नहीं डाला जा सकता. समाज जब यह सच स्वीकार करेगा, तभी परिवार ज्यादा मजबूत बनेंगे.

ऐसा होने के बाद घरों में आपसी बातों के कठघरे नहीं बनेंगे, बल्कि संवाद होंगे. आरोप नहीं लगेंगे, बल्कि सहभागिता होगी. तब सम  झ आएगा कि घर बनाने वाली केवल औरत नहीं, बल्कि वह सोच है जो ‘मैं’ से ऊपर उठ कर ‘हम’ में विश्वास करती है. Society

-कृति आरके जैन

Caste Discrimination : भेद बनावटी,स्मार्टनैस जरूरी

Caste Discrimination. साल 2016 से पहले टीना डाबी नाम की लड़की को कोई नहीं जानता था. वे एक दलित परिवार से ताल्लुक रखती थीं. पढ़ने में बहुत होशियार थीं. उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और 2015 की अपनी पहली ही कोशिश में आल इंडिया टौप किया और ट्रेनिंग के बाद साल 2016 के बैच की आईएएस अफसर बनीं.

यहां टीना डाबी का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि भारत में आज भी जाति का सांप नौजवान पीढ़ी खासकर लड़कियों को डंसने के लिए हमेशा तैयार रहता है. उन्हें ताना दिया जाता है चूंकि वे निचली जाति की हैं तो उन्हें पढ़लिख कर क्या हासिल होगा? घर वाले ही सवाल खड़ा कर देते हैं कि ‘तेरा क्या कालेज जा कर पढ़ने का काम?’, ‘अगर कमाने लगेगी तो तेरे नखरे बढ़ जाएंगे’, ‘हमारी बिरादरी में शादी नहीं हो पाएगी’. कहने का मतलब है कि उन के सपनों की उड़ान के पर काट दिए जाते हैं.

पर क्या जाति का हमारे दिलोदिमाग पर हावी होना इतना जरूरी है कि हम इस की बुनियाद पर किए गए फर्क को ही हकीकत मान लें और अपनी पूरी जिंदगी को बरबाद कर दें?

बिलकुल नहीं, क्योंकि जाति इनसान की काबिलीयत तय नहीं करती, बल्कि उस का काम और सोच तय करती है. टीना डाबी इस बात का सब से शानदार उदाहरण हैं.

अब सवाल उठता है कि जाति का यह भेद बनावटी क्यों है? जवाब, क्योंकि पैदा होते ही कोई ऊंचानीचा नहीं होता. पढ़ाई, हुनर, मेहनत, बरताव… यही इनसान की असली पहचान है. आज डाक्टर, इंजीनियर, टीचर, बिजनैसमैन हर जाति में हैं, तो फिर भेद का लौजिक ही खत्म हो जाता है.

लेकिन जब हम समाज को खंगालते हैं, तो यही महसूस होता है कि हर समुदाय की लड़कियां जाति के नाम पर दबा दी जाती हैं या फिर उन में बचपन से ही यह भर दिया जाता है कि बाहर जा कर अपनी जाति की लड़कियों में उठबैठ करो, विधर्मी लड़की से तो उचित दूरी बनाए रखो.

यहां उन के वजूद को कुंद किया जाता है, क्योंकि समाज के ठेकेदारों को पता है कि लड़कियां अपने वजूद से जाति का भेद मिटा सकती हैं.

ऐसे दिखाएं अपनी स्मार्टनैस

सब से पहले खुद को इतना काबिल बनाओ कि जाति पूछने की जरूरत ही न पड़े. पढ़ाई के साथसाथ स्किल में टौप करो. जब आप का रिजल्ट बोलेगा तो लोग जाति नहीं पूछेंगे. उदाहरण के लिए कोई लड़की ब्यूटी पार्लर चला रही है. वह अपने काम में माहिर है, तो कोई उस की जाति नहीं पूछेगा, बल्कि ‘मैडम’ कह कर इज्जत देगा.

पढ़ाई कर के शादी करो और बच्चे पैदा कर के उन्हें पालते रहो की सोच से बाहर निकलो. इस के बजाय कोई प्रोफैशन जैसे डाक्टर, इंजीनियर वकील, टीचर आदि को चुनो. अगर बिजनैस की समझ है तो कारोबारी महिला बनो. याद रखिए कि आज का आप का काम ही कल की सब से बड़ी कामयाबी है, जो आप को बराबरी का एहसास कराता है.

दोस्ती और टीमवर्क से दीवार तोड़ो

जाति का बंधन तोड़ने के लिए स्कूलकालेज, कोचिंग में सब के साथ बैठो, प्रोजैक्ट करो, खाना शेयर करो. खुद को किसी से कम मत समझो.

जब लड़कियां साथ में आगे बढ़ेंगी तो ‘तुमहम’ वाली सोच अपनेआप खत्म होगी. इस से उन का दायरा बढ़ेगा और दायरा बढ़ने से उन का आत्मसम्मान भी ऊंचा होगा.

बात और भाषा से दूरी मिटेगी

दिक्कत तब ज्यादा होती है जब कोई कहता है कि वह तो ‘फलां जाति की है’. ऐसा कहने के बजाय ‘वह बहुत स्मार्ट है’, ‘अच्छा गाती है’, ‘कोडिंग जानती है’ जैसी हौसला बढ़ाने वाली बातें बोलो. मजाक में भी जाति वाले ताने मत दो, क्योंकि छोटीछोटी बात से ही सोच बदलती है.

रोल मौडल बनो

जब कोई लड़की अपनी मेहनत से नौकरी या बिजनैस कर के परिवार का नाम रोशन करती है, तो पूरे महल्ले की सोच बदलती है. और जब वह कुछ बन जाती है तो उस का भी फर्ज बनता है कि वह बड़ों की इज्जत करे, पर गलत रीतिरिवाज के नाम पर भेदभाव कभी न सहे.

कानून साथ है

संविधान सब को बराबर मानता है. पढ़ाई, नौकरी, मंदिर, दुकान सब जगह बराबरी का हक है. सब से बड़ी स्मार्टनैस क्या है? यही कि ‘मैं लड़की हूं, मैं काबिल हूं’ सोच के साथ जीना.

जब लड़कियां काबिल बनेंगी तो न उन की जाति पूछी जाएगी, न लिंग. सिर्फ काम देखा जाएगा.

याद रखिए, पैदा सब नंगे होते हैं, बिना किसी भेदभाव के, जाति का टैग तो बाद में लगाया जाता है. पर काबिलीयत अपने दम पर कमाई जाती है, तभी तो एक दलित की बेटी जब आईएएस बनती है, तो वह ‘मैडम’ कहलाती है.  Caste Discrimination

Girls Empowerment: लड़कियां स्किल सीखें,  मैन्युल समझें 

Girls Empowerment. ‘मस्तमस्त गर्ल’ के खिताब से नवाज दी गई मशहूर हीरोइन रवीना टंडन एक वीडियो में अपनी कार खुद ठीक करती हुई दिखाई दी थीं, क्योंकि अकसर फिल्मों में हीरोइन की गाड़ी सुनसान रास्ते में बंद हो जाती है, तो वह मदद के लिए हैरानपरेशान इधरउधर ताकती नजर आती है. फिर कहानी की मांग के मुताबिक कहीं से हीरो आ टपकता है और कार का बोनट खोल मिनटों में उसे ठीक कर देता है. यहीं से शुरू हो जाती है उन की लव स्टोरी.

कभीकभार कहानी की मांग के मुताबिक ही विलेन भी ऐसे मौके पर आ धमकता है और हीरोइन की इज्जत लूटने की कोशिश करने का अपना रोल निभाता है.

वीडियो से परे महंगी और लग्जरी कारों की शौकीन रवीना टंडन ने एक इंटरव्यू में बताया भी था कि उन्हें न केवल कार का टायर बदलना आता है, बल्कि दूसरे छोटेमोटे काम मसलन इंजन औयल चैक करना, लाइटें बदल लेना और फ्यूज ठीक करना भी आता है.

बकौल रवीना, वे जब भी लौन्ग ड्राइव पर जाती हैं तो टूल बौक्स अपने साथ रखती हैं. शूटिंग पर जो हीरोइनें खुद कार चला कर जाती हैं, रवीना टंडन उन में से एक हैं, इसलिए फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें ‘स्टीयरिंग गर्ल’ भी कहा जाता है. उन के मुताबिक हर लड़की को अपनी गाड़ी के बारे में बेसिक जानकारी होनी चाहिए.

 कोई भी लड़की रवीना टंडन जैसी हीरोइन भले ही न बन पाए, लेकिन इतनी स्मार्ट तो बन ही सकती है कि अपनी गाडी की छोटीमोटी रिपेयरिंग खुद कर सके, जिस से मेकैनिक की मोहताजी न रहे और कुछ पैसों की बचत भी हो सके. इस से भी ज्यादा अहम बात यह कि खुद का आत्मविश्वास इस से बढ़ता है.

आजकल शहरों में पढ़ने वाली या नौकरीपेशा लड़कियां स्कूटी का इस्तेमाल ज्यादा करती हैं जिस में अकसर ऐसी छोटीमोटी खराबियां आती हैं जिन के बारे में लड़कियों को कोई जानकारी नहीं होती कि उन्हें कैसे ठीक करें.

भोपाल के एमपी नगर जोन 2 इलाके में छोटा सा गैराज चलाने वाले सलीम बताते हैं कि उन के पास आने वाले ग्राहकों में 10 में से 6 लड़कियां होती हैं जो स्कूटी बंद हो जाने पर उसे घसीटते और हांफते हुए लाती हैं, जबकि उन की स्कूटी में ऐसा मामूली नुक्स होता है, जिसे वे खुद भी ठीक कर सकती हैं.

सलीम के मुताबिक पंचर के अलावा स्कूटी में जो खराबियां आती हैं, वे हैं स्पार्क प्लग में कचरा जमा होना, फ्यूज का जल जाना और बल्ब फ्यूज हो जाना. ये काम लड़कियां खुद भी कर सकती हैं.

जरूरी है मैन्युल समझना

बात अकेले स्कूटी की नहीं है, बल्कि हर उस छोटीबड़ी मशीन की है जिसे लड़कियां आमतौर पर इस्तेमाल करती हैं, मसलन वाशिंग मशीन, मिक्सर ग्राइंडर, इस्तरी, लैपटौप या डैस्क टौप, बिजली से चलने वाले दूसरे उपकरण जैसे राइस कुकर, चाय बनाने वाली इलैक्ट्रिक केतली, हेयर ड्रायर सहित मोबाइल चार्जर और वाटर फिल्टर जग वगैरह.

इन में से हरेक मशीन के साथ एक मैन्युल बुक जरूर आती है, जिस में मशीन के इस्तेमाल करने के तरीकों के साथसाथ रखरखाव की भी जानकारी होती है. कौन सा पार्ट कहां लगा हुआ है, इस की जानकारी भी मैन्युल में दी जाती है, लेकिन 90 फीसदी से भी ज्यादा लोग इसे नहीं पढ़ते, इसलिए मशीन के खराब हो जाने पर मेकैनिक या टैक्निशियन के मोहताज हो जाते हैं. अगर इसे पढ़ और समझ लिया जाए तो कई खराबियां हो ही नहीं पाती हैं और कई को लड़कियां खुद ठीक कर सकती हैं.

अगर स्कूटी इस्तेमाल करने वाली लड़की को यह मालूम हो कि ज्यादातर स्कूटी में फ्यूज सीट के नीचे बैटरी के पास लगा होता है और स्पार्क प्लग इंजन के सिलैंडर हैड में लगा होता है, जो रबड़ कैप में लिपटा उस के किनारे पर साफसाफ दिखता है तो वे इन खामियों को आसानी से सुधार सकती हैं.

इसी तरह हरेक मशीन की अपनी बनावट होती है जो मैन्युल में दी जाती है. इन्हें जानसमझ कर ठीक कर लेने के लिए बस पेंचकस और पाने के सैट की जरूरत होती है, जो गाड़ी खरीदी के साथ मिलते हैं. अगर न मिलते हों तो खुद भी खरीदे जा सकते हैं.

ऐसे बढ़ती है स्किल

जब किसी मशीन या किसी और औजार के बारे में बेसिक जानकारियां हासिल कर ली जाती हैं तो स्किल अपनेआप बढ़ने लगती है. इस के लिए शुरुआत घर से ही की जा सकती है जब बारिश में या किसी और वजह के चलते घर की बिजली का फ्यूज उड़ जाता है. तो उसे जोड़ने कोई खास टैक्निक की जरूरत नहीं पड़ती. बस फ्यूज को निकाल कर उस का जला हुआ तार बदलना पड़ता है. एहतियात के तौर पर मेन स्विच बंद कर देना चाहिए, जिस से करंट न लगे.

आमतौर पर घरों में ऐसे काम लड़के या मर्द करते हैं लड़कियां नहीं, जबकि वे हरेक फील्ड में लड़कों को टक्कर दे रही हैं. लेकिन पढ़ाई से या लड़कों की आजादी की बराबरी कर लेने न तो आत्मविश्वास आता और न ही स्किल बढ़ती. इस के लिए जरूरी है कि जानकारियां बढ़ाई जाएं, टैक्नोलौजी सीखी जाए और अपना समय व मेहनत बेकार के कामों में बरबाद न की जाए.

खेतीकिसानी के दौर में औरतें खेतों में मर्दों से ज्यादा मेहनत करती थीं. आज भी खेतखलिहानों में ज्यादा मेहनत के काम मसलन बोआई, कटाई, निराईगुड़ाई वगैरह वही करती हैं, लेकिन इस का क्रेडिट उन्हें नहीं मिलता. वजह यह है कि उन्हें हमेशा से स्किल वाले कामों से मर्दों ने दूर रखा.

आज की लड़की भी कम मेहनती नहीं जो खुद का वजन खुद ढोती है, अस्पतालों में मरीज को उठा कर स्ट्रैचर पर लिटाती है, घरगृहस्थी के सारे कामकाज करती है, मौल और शोरूम में हर तरह की नौकरी करती है, लेकिन कहीं वह स्मार्ट न बन जाए और स्किल न सीखने लगे, इसलिए उसे यहां वहां के कामों में उलझा  दिया जाता है.

बड़े पैमाने पर लड़कियां धर्म की गुलाम और मोहरा बन कर रह गई हैं. घरगृहस्थी और खेतीकिसानी से कामों से बचे समय में वे कलश यात्राओं में सिर पर कलश रखे भूखीप्यासी नंगे पैर मीलों चलती नजर आती हैं. घरों में पूजापाठ की जिम्मेदारी भी उन्हीं के सिर पर लाद दी गई है जिस से उन का ध्यान स्किल बढ़ाने वाले कामों पर न जाए.

स्मार्टनैस का सीधा सा मतलब यह है कि लड़कियां स्किल वाले काम करें, अच्छी किताबें और पत्रिकाएं पढ़ें, हरदम नया कुछ सीखें और छोटेमोटे कामों के लिए लड़कों की मोहताज न रहें. Girls Empowerment

Modern Women : लड़कियां स्मार्ट बनें गुलाम नहीं

Modern Women. आज के समय सोशल मीडिया विचारों की गुलामी की नई तकनीक बन गया है और लड़कियों के दिमाग को हाईजैक करने पर तुला है. यही वजह है कि हर धर्म लड़कियों को गुलाम बनाए रखना चाहता है. धर्म ने तो औरतों की आजादी, फैसले और खुशियों पर पाबंदी लगा रखी थी.

धर्म ने सदियों तक लड़कियों को घरों में कैद रखने का इंतजाम किया, उन की जबान पर ताले लगाए और उन की खुशियों की चाबी मर्दों के हाथों में थमाए रखी. संविधान ने यही चाबी मर्दों से छीन कर औरतों के हाथों में थमाई और उन के लिए पढ़ाईलिखाई, नौकरी और आजादी का रास्ता बनाया, लेकिन आज लड़कियां उसी धार्मिक दलदल में फंसती जा रही हैं, इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या सिर्फ इकोनौमिकली स्ट्रौंग हो जाना ही स्मार्ट होना है?

स्नेहा को कुछ दिनों से सिर में दर्द रहता था. इस की वजह से वह औफिस में ठीक से काम नहीं कर पा रही थी. सुबह मैडिकल स्टोर से सिर दर्द की दवा लेती और औफिस के लिए निकल पड़ती, लेकिन सिरदर्द में उसे कोई आराम नहीं मिल रहा था.

स्नेहा हौस्पिटल नहीं जाना चाहती थी. उसे लगा कि बस सिरदर्द ही तो है, कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा. लेकिन उस का सिर दर्द बढ़ता गया.

एक दिन स्नेहा के सिरदर्द की बात उस की सीनियर रेणुका को पता चली तो उस ने झट से स्नेहा को सलाह देते हुए कहा, ‘‘स्नेहा, तुम्हें नजर लग गई है. तुम तुरंत खाटू श्याम चली जाओ. वहां भगवान के दर्शन भी कर लेना और पुजारी से नजर भी उतरवा लेना.

‘‘मुझे नजर लग गई थी, तो मैं ने भी ऐसा ही किया था और बिलकुल ठीक हो गई. मैं खाटू श्याम में नजर उतारने वाले पुजारी के तुम्हें कुछ वीडियोज भेजती हूं.’’

स्नेहा औफिस से घर आई और रेणुका के भेजे वीडियोज देखने लगी. एक वीडियो के बाद दूसरा और फिर न जाने कितने घंटे वह इसी तरह के वीडियो देखती रही.

स्नेहा पहले नजर लगने जैसे अंधविश्वास पर भरोसा नहीं करती थी और पूजापाठ भी कम ही करती थी, लेकिन रेणुका से बातचीत के बाद और उस के भेजे गए वीडियोज के एल्गोरिदम में फंसने के बाद से तो उसे पक्का यकीन हो गया कि उसे किसी की बुरी नजर लग गई है.

औफिस से 2 दिन की छुट्टी ले कर स्नेहा सीधे खाटू श्याम गई. वहां से पुजारी के बारे में मालूम कर उन से मिली और अपनी समस्या बताई. कुल 10,000 रुपए में झाड़फूंक के जरीए पुजारी ने उस की नजर उतारी. सिरदर्द में उसे कुछ आराम मिला और वह रेणुका का शुक्रिया अदा करते हुए गुड़गांव लौट आई.

आने जाने में कुल 3 दिन लगे और पूरी यात्रा में जेब से कुल 25,000 रुपए खर्च हुए. पर कुछ दिनों बाद सिरदर्द फिर से असर करने लगा. इस बार पहले से ज्यादा तेज था. उस ने देर नहीं की और सीधे हौस्पिटल चली गई. न्यूरोलौजी के कई टैस्ट हुए, फिर उसे साइकेट्रिक डिपार्टमैंट में भेज दिया गया जहां स्नेहा की काउंसलिंग हुई और डाक्टर ने उसे 3 महीने की दवा दी. इसी दवा से धीरेधीरे उस का सिरदर्द खत्म हुआ.

यह कहानी सिर्फ स्नेहा की नहीं है. आजकल की ज्यादातर लड़कियां जो जौब में हैं, वे अंधविश्वासों में आकंठ डूबी हुईं हैं. सिर्फ महंगे कपड़े पहनना, सोशल मीडिया पर लाखों फौलोअर्स बना लेना या अच्छी नौकरी पा लेना ही स्मार्ट होना नहीं है. जो लड़कियां अपने हकों को जानती हैं, सही और गलत में फर्क करने की समझ  रखती हैं, वैज्ञानिक सोच के साथ चलती हैं और अपने साथ दूसरी लड़कियों को भी आगे बढ़ाने की कोशिश करती हैं सही माने में केवल यही लड़कियां स्मार्ट कही जा सकती हैं. बाकी वे लड़कियां जो ऊंचे पदों पर हैं या अच्छी सैलरी पा रही हैं, अगर अपनी कमाई का एक फीसदी भी पाखंडवाद पर खर्च करती हैं तो उन्हें बेवकूफ ही कहा जाएगा.

नए दौर की गुलामी का शिकार होती लड़कियां

आज की लड़कियां अपनी मां, दादी और परदादी की तुलना में कहीं ज्यादा पढ़ीलिखी हैं. वे नौकरी करती हैं, अपने फैसले खुद लेती हैं, अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपनी पहचान बना रही हैं लेकिन क्या सच में आज की मौडर्न लड़कियां आजाद हैं या वे धीरेधीरे एक नई तरह की गुलामी में फंसती जा रही हैं?

यह नई गुलामी बेडि़यों की नहीं है. यह गुलामी मोबाइल की स्क्रीन, रीलों, लाइक्स, फौलोअर्स और एल्गोरिदम की है. सदियों तक औरतों को धर्म, परंपरा और पैट्रिआर्की ने कंट्रोल किया. क्या पहनना है, कहां जाना है, किस से बात करनी है और कैसे जीना है यह भी मर्दों ने तय किया. आज हालात बदले हैं. संविधान ने बराबरी का अधिकार दिया, शिक्षा ने आत्मविश्वास दिया और नौकरी ने आर्थिक आजादी दी, लेकिन गुलामी लौट रही है, इस बार यह सोशल मीडिया की शक्ल में है.

सोशल मीडिया ने एक नया जाल बिछा दिया है. पहले समाज तय करता था कि औरत कैसी दिखनी चाहिए. आज यही काम सोशल मीडिया कर रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब आदेश किसी पुजारी, मौलवी या परिवार से नहीं आते, बल्कि स्क्रीन पर चल रहे एल्गोरिदम से आता है.

सोशल मीडिया का मकसद आप को ज्ञान देना तो कतई नहीं है. मकसद है कि आप जितनी देर हो सके, स्क्रीन से चिपके रहें. जितना ज्यादा समय बिताएंगे, उतना ज्यादा पैसा बड़ी टैक कंपनियां कमाएंगी, इसलिए एल्गोरिदम वही चीजें दिखाता है जो आप का ध्यान खींच लें, आप को गुस्सा दिलाएं, डराएं, तुलना करवाएं या आप को बारबार मोबाइल उठाने पर मजबूर करें.

खूबसूरती का दबाव, दिखावा, झूठी सफलता, महंगे कपड़े, महंगा मेकअप, लग्जरी लाइफ और दूसरों से तुलना सोशल मीडिया पर बस यही खेल चल रहा है. धीरेधीरे इनसान अपनी असली जिंदगी से ज्यादा दूसरों की नकली जिंदगी में जीने लगता है. बारबार मिलने वाले छोटेछोटे डिजिटल इनाम, जैसे लाइक और नोटिफिकेशन, दिमाग में डोपामिन पैदा करते हैं, जिस से बारबार मोबाइल देखने की लत पैदा होती है. यही लत सब से खतरनाक है.

इस लत का सब से बड़ा नुकसान यह है कि सोशल मीडिया सोचने की ताकत छीन लेता है. रील 30 सैकंड की होती है लेकिन किसी अच्छे विचार को सम?ाने में कई घंटे लगते हैं. एक रील आप को सिर्फ अगली रील देखने की आदत डालती है. किताबें सब्र सिखाती हैं लेकिन सोशल मीडिया की लत बेचैनी पैदा करती है. किताबें तर्क करना सिखाती हैं, सोशल मीडिया बिना सोचे प्रतिक्रिया देना सिखाता है. किताबें आजाद बनाती हैं और सोशल मीडिया भीड़ का हिस्सा बना देता है.

लड़कियां यह भूल जाती हैं कि इतिहास के हर बड़े बदलाव के पीछे सोशल मीडिया नहीं बल्कि किताबें थीं. सावित्रीबाई फुले ने पढ़ाई को हथियार बनाया. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने हजारों किताबें पढ़ीं. पेरियार ने अंधविश्वास और जाति व्यवस्था को चुनौती देने के लिए तर्क और अध्ययन का रास्ता चुना. भगत सिंह जेल में भी किताबें पढ़ते रहे. वैज्ञानिक सोच रखने वाले लोगों ने हमेशा किताबों को अपना साथी बनाया. उन्होंने रीलें नहीं देखीं. विचार पढ़े और दुनिया को विचार दिए.

स्मार्ट होने का मतलब केवल रोजगार नहीं

स्मार्ट होने का मतलब केवल नौकरी करना या अपनी कमाई पर निर्भर होना नहीं है. लड़कियों के लिए स्मार्ट होने का मतलब अपनी बुद्धि से फैसले लेना है. किसी धर्म, किसी परंपरा, किसी नेता, किसी इन्फ्लुएंसर और किसी एल्गोरिदम का पिछलग्गू बनने वाली लड़कियां इकोनौमिकली कितनी भी स्ट्रौंग क्यों न हों वे असल में गुलाम ही हैं. अगर एक लड़की अपने हर फैसले से पहले किसी सोशल मीडिया गुरु या किसी इन्फ्लुएंसर का मुंह ताकने लगे तो यह मानसिक गुलामी ही है.

असली आजादी विचारों से शुरू होती है. किसी बात को सिर्फ इसलिए मान लिया कि सब मानते हैं यही गुलामी की पहली सीढ़ी है. यहीं से भेड़चाल शुरू होती है. हर बात पर सवाल करना, सुबूत मांगना और तर्क से सोचना यह वैज्ञानिक रास्ता है और यही आजादी की पहली सीढ़ी भी है. कोई अफवाह फैलती है और लाखों लोग बिना जांच किए

उसे सच मान लेते हैं. कोई अंधविश्वास वायरल होता है और करोड़ों लोग उसे सा?ा कर देते हैं. कोई नफरत फैलाने वाला वीडियो आता है और लोग बिना सोचे उसे शेयर कर देते हैं.

किताबें अलग रास्ता दिखाती हैं. एक अच्छी किताब धीमेधीमे ही सही लेकिन सोचने पर मजबूर करती है. वह आप को अलगअलग विचारों से मिलाती है. वह आप के भीतर सवाल पैदा करती है. वह आप को यह सिखाती है कि किसी भी बात को अंतिम सच मत मानो. लोकतंत्र और विज्ञान इसी सिद्धांत पर काम करते हैं. लड़कियों की मुक्ति का रास्ता डैमोक्रेसी और साइंस ही देते हैं, धर्म नहीं. धर्म तो भेड़चाल पर चलता है जहां तर्क की नहीं आस्था की जरूरत होती है.

आत्मनिर्भर लड़की की सब से बड़ी ताकत उस की तनख्वाह नहीं, उस का स्वतंत्र दिमाग़ होता है. अगर कमाई अपनी है लेकिन सोच किसी एल्गोरिदम से निकला है तो यह गुलामी ही है. इस का मतलब यह नहीं कि सोशल मीडिया पूरी तरह छोड़ दिया जाए. यह सीखने, काम करने, जानकारी पाने और लोगों

से जुड़ने का उपयोगी साधन जरूर है लेकिन साधन और मालिक में फर्क होना चाहिए. मोबाइल आप का औजार रहे, आप का मालिक नहीं.

हर लड़की अगर रोजाना सिर्फ एक घंटा सोशल मीडिया कम कर के किताबों को दे दे तो एक साल में वह कई किताबें पढ़ सकती है.

इतिहास, विज्ञान, संविधान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, स्त्री अधिकार, दर्शन और साहित्य ये सब मिल कर ऐसा दिमाग़ तैयार करते हैं, जिसे कोई भी आसानी से गुमराह नहीं कर सकता.

याद रखिए, समाज हमेशा उस औरत से डरता है जो अपने दिमाग से चलती है, सवाल पूछती है और भेड़चाल का हिस्सा नहीं होती. ऐसी आजाद लड़कियों से धर्म, पितृसत्ता, राजनीति और एल्गोरिदम को भी खतरा होता है, इसलिए आज इन सब के निशाने पर औरतें ही हैं.

जो लड़की किताबें पढ़ती है, पत्रिकाओं से दोस्ती रखती है वह सिर्फ नौकरी नहीं करती बल्कि वह सोचती भी है और जो सोचती है, वही समाज बदलती है. असली मेकअप चेहरे पर नहीं, दिमाग में होता है.

असली फैशन महंगे कपड़े नहीं, स्वतंत्र विचार होते हैं. असली सुंदरता लाइक्स में नहीं, तर्क करने की क्षमता में है और असली स्मार्ट वे लड़कियां हैं जिन्हें धर्म हो या एलगोरिदम बरगला नहीं सकता, इसलिए अगर सचमुच स्मार्ट बनना है तो मोबाइल की स्क्रीन से थोड़ा बाहर निकलना होगा और किताबों की दुनिया में कदम बढ़ाना होगा, क्योंकि सोशल मीडिया आप को कस्टमर बनाता है, जबकि किताबें आप को नागरिक बनाती हैं. सोशल मीडिया आप को भीड़ में शामिल करता है, जबकि किताबें आप को अपना रास्ता चुनना सिखाती हैं.

जिस दिन लड़कियां सही माने में अपने दिमाग को आजाद कर लेंगी उस दिन उन की सोच को कोई धर्म, कोई परंपरा, कोई पितृसत्ता और कोई एल्गोरिदम फिर कभी कैद नहीं कर पाएगा.

लड़कियों का संघर्ष काफी बड़ा है

आज देश की करोड़ों लड़कियां पहले से कहीं ज्यादा पढ़ रही हैं, लेकिन पढ़ाई और सम?ादारी हमेशा एक जैसी चीज नहीं होती. अगर कोई लड़की इंजीनियर या डाक्टर बन जाए लेकिन जाति, अंधविश्वास, पितृसत्ता और धार्मिक भेदभाव को बिना सवाल किए मानती रहे तो उस की शिक्षा समाज के लिए एक डिजास्टर ही साबित होगी.

भारत का संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है. अनुच्छेद 14 सभी को कानून के सामने बराबरी देता है. अनुच्छेद 15 धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है. अनुच्छेद 21 सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है लेकिन सदियों तक महिलाओं की जिंदगी संविधान से नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक परंपराओं से तय होती रही. लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखा गया, बाल विवाह कराया गया, औरतों को सिर्फ ‘पति की सेवा’ तक सीमित कर दिया गया और विधवाओं को समाज से अलग कर दिया गया.

भारत में आज भी महिलाओं के हालात पूरी तरह बराबरी के नहीं हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे ताजा आंकड़ों के अनुसार लगभग 23 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हो जाती है. महिला श्रम भागीदारी दर पुरुषों से काफी कम है. यही वजह है कि वर्ल्ड इकोनौमिक्स फोरम की ग्लोबल जैंडर गैप रिपोर्ट 2025 में भारत जैंडर इक्वालिटी के मामले में दुनिया के निचले देशों में शामिल रहा. इस का मतलब साफ है कि सिर्फ कानून बन जाने से बराबरी नहीं आती उस के लिए सामाजिक सोच बदलनी भी जरूरी है.

बाल विवाह से शिक्षा रुकती है, स्वास्थ्य बिगड़ता है और घरेलू हिंसा बढ़ती है. 2022 में 6,516 दहेज मौतें दर्ज हुईं. हर साल स्पाउसल वायलैंस का शिकार 22 से 30 फीसदी महिलाएं होती हैं. ये सब परंपरागत अंधविश्वास और धार्मिक रिवाजों का नतीजा हैं. डैमोक्रेसी ने औरत को इनसान सम?ा और संविधान ने बराबरी का मसौदा तैयार किया इसलिए आज की लड़कियों का पहला कर्तव्य तो धर्म के नाम पर थोपी गई सीमाओं को चुनौती देना ही होना चाहिए तभी असली आजादी आएगी.

शिक्षा महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाती है और फैसले लेने की ताकत देती है. किताबें अंधविश्वास तोड़ती हैं जबकि सोशल मीडिया सतही, गलत जानकारी और तुलना का जाल बुनता है. एएसईआर की रिपोर्ट कहती है कि 76 फीसदी लड़कियां सोशल मीडिया पर हैं और लड़कियां ज्यादा समय फालतू की गतिविधियों में बिताती हैं.

परंपराओं को तोड़े बिना आजादी मुमकिन नहीं

कोई भी परंपरा अगर इनसान की आजादी, बराबरी और सम्मान छीनती है तो उस पर सवाल उठाना जरूरी है. सती प्रथा, बाल विवाह, देवदासी प्रथा, परदा प्रथा और विधवाओं के साथ भेदभाव जैसी कई परंपराओं को इसलिए खत्म किया गया क्योंकि वे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ थीं. अगर समाज ने सिर्फ परंपरा है कह कर इन्हें बचाए रखा होता तो आज भी करोड़ों औरतों की जिंदगी गुलामी के दलदल में फंसी होती.

किसी भी विचार को सिर्फ इसलिए सही नहीं माना जा सकता क्योंकि वह किसी धर्मग्रंथ में लिखा है. हर विचार की कसौटी तर्क, विज्ञान, मानवता और समानता होनी चाहिए. अगर कोई धार्मिक नियम औरत के कपड़े, पढ़ाई, नौकरी, प्रेम, शादी या उस के निजी फैसलों के खिलाफ खड़ा नजर आता है तो ऐसे नियम को कूड़ेदान में फेंकना सब से जरूरी काम है.

इनसान का सम्मान और उस का अधिकार किसी भी धर्म या परंपरा से बड़ा होना चाहिए. औरतों को भी वही अधिकार, वही अवसर और वही सम्मान मिलना चाहिए जो पुरुषों को मिलता है. इस का मतलब है कि लड़की को यह अधिकार हो कि वह अपनी पढ़ाई, कैरियर, शादी, मातृत्व और जीवन के फैसले खुद ले सके. उस के सपनों का फैसला परिवार, समाज या धर्म नहीं, बल्कि वह खुद करे.

आज जरूरत सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की नहीं है. जरूरत मानसिक रूप से स्वतंत्र बनने की है. अगर कोई लड़की लाखों रुपए कमाती है लेकिन स्नेहा और रेणुका की तरह बाबा, ज्योतिष, जाति, पाखंड या अंधविश्वास के नाम पर अपनी गाढ़ी कमाई का एक रुपया भी लुटाती है तो उस की यह आर्थिक आजादी किसी काम की नहीं. लड़कियों की असली आजादी तब होगी जब उस के फैसले सुबूत, तर्क और अपनी सम?ा के आधार पर लिए जाएं.

शिक्षित लड़की सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं बदलती, बल्कि पूरे समाज को बदल सकती है. अगर एक लड़की अपने गांव या महल्ले की दूसरी लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है, उन्हें कानून की जानकारी देती है, बाल विवाह और दहेज का विरोध करती है, अंधविश्वास के खिलाफ आवाज उठाती है और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में मदद करती है तो असल में वह समाज में सब से बड़ी क्रांति ला रही होती है.

यह जरूरी नहीं कि हर लड़की ऐसी क्रांति का हिस्सा बने और अपनी सैलरी समाज पर खर्च करे लेकिन सब से जरूरी बात यह है कि कोई लड़की अपनी मेहनत की कमाई अंधविश्वास के नाम पर धार्मिक गिरोहों को मजबूत करने में न लगाए.

आप का जिस्म, आप का फैसला और आप की सैलरी पर सिर्फ आप की मरजी होनी चाहिए. यही असली स्मार्टनैस है. यही असली आजादी है और यही एक आधुनिक, वैज्ञानिक और बराबरी वाले भारत की नींव भी है. सदियों से परंपराएं और धर्म औरतों को दबाए रखते आए हैं.

पिता की संपत्ति, पति की सेवा और पुत्र की इच्छा ये सब बातें धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी रहीं. विधवा दहन, बाल विवाह, दहेज, बहुविवाह जैसी कुरीतियां धर्म के नाम पर ही चलती रहीं.

धर्मग्रंथों की पुरुष प्रधान व्यवस्था औरतों को कमतर साबित करती रही. आज संविधान ने इन पुरानी मान्यताओं को सिरे से खारिज कर औरतों को आजादी और सम्मान से जीने का नया रास्ता दिया.

आज की लड़की को देवी बनने की जरूरत नहीं है. उसे इनसान बन कर जीने का अधिकार चाहिए. उसे पूजा नहीं, बराबरी चाहिए. उसे कैद नहीं, आजादी चाहिए. उसे संस्कार के नाम पर चुप रहने की सीख नहीं, सवाल पूछने की आजादी चाहिए.

भारत का भविष्य तभी बदलेगा जब लड़कियां सिर्फ डिगरी नहीं, वैज्ञानिक सोच भी हासिल करेंगी. जब वे संविधान को अपना सब से बड़ा सहारा मानेंगी. जब वे सोशल मीडिया की चमक से ज्यादा किताबों की रोशनी पर भरोसा करेंगी और जब वे सिर्फ खुद आगे नहीं बढ़ेंगी, बल्कि दूसरी लड़कियों का हाथ पकड़ कर उन्हें भी गरीबी, भेदभाव और अंधविश्वास के अंधेरे से बाहर निकालेंगी.

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