Heart Touching Story : सफर में छूटा प्यार

Heart Touching Story. शाम धीरेधीरे अपने आंचल को फैलाती जा रही थी. आसमान में धूप की हलकी पड़ती किरणें जैसे किसी बिछड़ते रिश्ते की आखिरी चमक बन कर ठहर गई थीं.

रेलवे स्टेशन पर हलचल थी, आवाजें थीं, चाय वालों की पुकार थी, कुलियों की भागदौड़ थी, लेकिन इस शोर के बीच भी अर्जुन के भीतर एक ऐसा सन्नाटा था, जिसे कोई सुन नहीं सकता था.

प्लेटफार्म नंबर 3 पर खड़ी ट्रेन जैसे केवल यात्रियों को नहीं, बल्कि यादों को भी अपने साथ ले जाने के लिए तैयार थी. अर्जुन हाथ में टिकट लिए खड़ा था, लेकिन उस की उंगलियां हलकेहलके कांप रही थीं.

वह बारबार भीड़ में झांकता, जैसे किसी खोई हुई चीज को ढूंढ़ रहा हो. उस की आंखों में एक बेचैनी थी… वह बेचैनी जो केवल उस इनसान के आने से खत्म हो सकती थी, जिस के बिना उस की दुनिया अधूरी थी. और फिर वह दिखी. नैना.

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हलके गुलाबी सूट में, खुले बालों के बीच उस का चेहरा वैसा ही था… मासूम, शांत, लेकिन आज उस में एक गहरा दर्द भी छिपा हुआ था. वह धीरेधीरे उस की ओर बढ़ रही थी, जैसे हर कदम उसे अर्जुन से नहीं, बल्कि खुद से दूर कर रहा हो.

दोनों आमनेसामने थे, लेकिन शब्द कहीं खो गए थे. उन के बीच केवल खामोशी थी और वह खामोशी ही सब से ज्यादा बोल रही थी.

‘‘तुम आ गई…’’ अर्जुन ने जैसे अपने ही भीतर से आवाज निकालते हुए कहा.

नैना ने हलका सा सिर हिलाया, ‘‘नहीं आती तो शायद जिंदगीभर खुद को माफ नहीं कर पाती,’’ उस की आवाज में एक कंपन था, जो सीधे अर्जुन के दिल तक उतर गया.

कुछ पल दोनों चुप रहे, फिर नैना ने धीरे से पूछा, ‘‘सच में जा रहे हो?’’  यह सवाल नहीं था, एक शिकायत थी. एक उम्मीद थी कि शायद वह कह दे, ‘‘नहीं.’’

अर्जुन ने उस की आंखों में देखा. वह जानता था कि यह जवाब उस के अपने दिल को भी तोड़ देगा, लेकिन सच से भागना अब मुमकिन नहीं था.

‘‘हां, जाना पड़ेगा.’’ नैना की आंखों में आंसू भर आए, ‘‘इतनी आसानी से?’’ ‘‘आसानी से?’’ अर्जुन की आवाज अचानक भारी हो गई, ‘‘अगर यह आसान होता, तो मैं यहां खड़ा नहीं होता नैना. मैं तो कब का चला गया होता.’’

नैना ने नजरें झुका लीं, ‘‘तो फिर क्यों जा रहे हो? क्यों नहीं रुक जाते?’’

यह सवाल सीधा था, लेकिन उस का जवाब बहुत पेचीदा. अर्जुन ने गहरी सांस ली, ‘‘क्योंकि कभीकभी जिंदगी में हम जो चाहते हैं, वह नहीं कर पाते. हमें वह करना पड़ता है, जो जरूरी होता है.’’

‘‘और हमारा प्यार?’’ नैना ने तुरंत पूछा. अर्जुन कुछ पल चुप रहा, फिर उस ने धीमे से कहा, ‘‘प्यार कभी जरूरी नहीं होता नैना, प्यार बस होता है.’’

यह सुन कर नैना की आंखों से आंसू बह निकले, ‘‘अगर प्यार बस होता है तो फिर उसे छोड़ कर कैसे जा सकते हो?’’ अर्जुन ने उस की ओर देखा. उस की आंखों में दर्द था, लेकिन साथ ही एक मजबूरी भी.

‘‘मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जा रहा, मैं बस इस शहर को छोड़ कर जा रहा हूं.’’ ‘‘और मैं?’’ नैना की आवाज टूट गई, ‘‘मैं भी तो इसी शहर में हूं.’’

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था. उस ने बस इतना कहा, ‘‘तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी यहां,’’ उस ने अपने दिल पर हाथ रखा. नैना हलकी सी मुसकराई… एक दर्दभरी मुसकान. ‘‘दिल में रह कर क्या होगा अर्जुन? जिंदगी को तो साथ जिया जाता है.’’

यह बात अर्जुन के दिल में तीर की तरह चुभ गई. उसे याद आया… वह पहली मुलाकात. कालेज का वह पहला दिन जब नैना लाइब्रेरी के कोने में बैठी थी और वह अनजाने में उसी टेबल पर जा कर बैठ गया था.

‘‘यह सीट खाली है?’’ अर्जुन ने पूछा था. नैना ने बिना ऊपर देखे कहा था, ‘‘अब नहीं है.’’

और उस एक जवाब ने उस की जिंदगी बदल दी थी. धीरेधीरे बातें शुरू हुईं, दोस्ती हुई और फिर वही दोस्ती कब प्यार में बदल गई, यह दोनों को पता ही नहीं चला. वे साथ चलते थे, साथ हंसते थे, छोटीछोटी बातों पर झगड़ते थे और फिर एकदूसरे को मनाते भी थे.

नैना अकसर कहती, ‘‘अगर कभी तुम मुझ से दूर गए न, तो मैं एक पल भी जी नहीं पाऊंगी.’’ और अर्जुन हंस कर कहता, ‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगा. मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा.’’

लेकिन आज वही अर्जुन जा रहा था. वादा टूट रहा था और उस के साथ एक सपना भी. ट्रेन की सीटी ने उन्हें वर्तमान में लौटा दिया. समय जैसे हाथ से फिसल रहा था.

अर्जुन ने बैग उठाया. उस के कदम भारी हो गए थे पर जाना जरूरी था. वह एक अति पिछड़े घर का गरीब लड़का और नैना साधारण आमदनी वाले ब्राह्मण परिवार की लड़की. दोनों को जल्दी एहसास हो गया था कि यह मिलन न जाने कितने दिन का है.

अर्जुन ने हाथपैर मारे तो कई हजार किलोमीटर दूर एक जगह नौकरी किसी ने दिलाई. शहर में तो उसे सही नजर से भी कम ही लोग देखते थे.

नैना ने अचानक उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मत जाओ.’’

उस एक वाक्य में इतनी ताकत थी कि अर्जुन का दिल एक पल के लिए सच में रुक गया. उस ने नैना की ओर देखा. उस की आंखों में विनती थी, डर था और सब से ज्यादा… प्यार था.

‘‘अगर तुम कहो तो मैं नहीं जाऊंगा,’’ अर्जुन ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा.

नैना चौंक गई. यह वही पल था जब वह चाहती थी कि वह रुक जाए, लेकिन वह यह भी जानती थी कि उस के रुकने की कीमत बहुत बड़ी होगी.

नैना ने धीरेधीरे अपना हाथ छोड़ दिया, ‘‘नहीं जाओ,’’ उस की आवाज कांप रही थी, ‘‘मैं तुम्हें रोक कर तुम्हारे सपनों को नहीं तोड़ सकती.’’

अर्जुन की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘और हमारे सपने?’’ उस ने पूछा. नैना ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘कुछ सपने पूरे होने के लिए नहीं होते. कुछ सपने बस महसूस करने के लिए होते हैं.’’

अर्जुन अब और कुछ नहीं कह पाया. वह ट्रेन में चढ़ गया. खिड़की के पास खड़ा हो कर वह नैना को देख रहा था. नैना वहीं खड़ी थी, जैसे समय ने उसे जकड़ लिया हो.

ट्रेन धीरेधीरे चलने लगी. नैना दौड़ी. उस ने हाथ बढ़ाया, ‘‘अर्जुन…’’ उस की आवाज इस बार बाहर आ गई.

अर्जुन ने भी हाथ बढ़ाया, लेकिन उन के बीच की दूरी हर पल बढ़ती जा रही थी. कुछ ही क्षणों में हाथ हवा में रह गए.

और फिर ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ गई. नैना वहीं रुक गई. उस की सांसें तेज थीं, आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे. वह धीरेधीरे उसी बैंच पर बैठ गई, जहां वे कभी साथ बैठा करते थे. उस ने अपनी आंखें बंद कीं और अर्जुन की आवाज उस के कानों में गूंजने लगी, ‘‘मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा.’’

उस ने धीमे से खुद से कहा, ‘‘झूठ,’’ लेकिन उसी पल उस के होंठों पर एक हलकी मुसकान भी आ गई, क्योंकि वह जानती थी, वह झूठ नहीं था. बस अधूरा सच था.

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उस रात स्टेशन की भीड़ खत्म हो गई. रोशनी धीमी पड़ गई, लेकिन नैना वहीं बैठी रही. उस के भीतर एक सफर शुरू हो चुका था. एक ऐसा सफर जिस में कोई मंजिल नहीं थी, सिर्फ यादें थीं.

और उन यादों में एक प्यार था, जो सफर में छूट गया था, लेकिन दिल से कभी नहीं उतरा.

कहते हैं, समय हर घाव भर देता है, लेकिन कुछ घाव ऐसे होते हैं, जिन्हें समय केवल ढकता है, मिटाता नहीं.

अर्जुन और नैना की जिंदगी में भी समय बीतता रहा… दिन महीनों में, महीने सालों में बदलते गए, लेकिन जो उस एक शाम प्लेटफार्म नंबर 3 पर छूट गया था, वह वहीं का वहीं ठहरा रहा.

नैना अब शहर के एक छोटे से स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी. उस के चेहरे पर एक शांत मुसकान रहती थी, लेकिन उस की आंखों में एक गहराई थी… एक ऐसा खालीपन, जिसे कोई बच्चा, कोई साथी, कोई रिश्तेदार भर नहीं पाता था.

वह बच्चों को कहानियां सुनाती थी… राजकुमार और राजकुमारी की, अधूरी प्रेम कहानियों की, बिछड़ते लोगों की. और हर कहानी के आखिर में उस की आवाज थोड़ी धीमी हो जाती.

एक दिन एक बच्चे ने पूछ लिया, ‘‘मैम, क्या सच में प्यार कभी अधूरा रह जाता है?’’

नैना कुछ पल के लिए चुप रह गई, फिर उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘हां, कभीकभी प्यार पूरा हो कर भी अधूरा रह जाता है.’’

बच्चे समझ नहीं पाए, लेकिन उस की आंखों की नमी ने उस जवाब को और गहरा बना दिया. स्कूल से लौटते समय वह अकसर उसी रास्ते से गुजरती, जहां कभी वह और अर्जुन साथ चला करते थे. हर मोड़, हर पेड़, हर चाय की दुकान… सब उसे उस की याद दिलाते.

वह चाहती तो उन रास्तों को बदल सकती थी, लेकिन उस ने नहीं बदला, क्योंकि वह जानती थी, यादों से भागने से वे खत्म नहीं होतीं, वे और गहरी हो जाती हैं.

उधर अर्जुन, वह अब एक बड़े शहर में एक बड़ी कंपनी में काम कर रहा था. उस के पास सबकुछ था… अच्छी नौकरी, एक घर, नाम, पहचान लेकिन रात को जब वह अपने कमरे में अकेला होता, तो उस की सारी उपलब्धियां उस के सामने छोटी पड़ जातीं.

उस के कमरे की एक दीवार पर एक छोटी सी तसवीर लगी थी, नैना की. वह फोटो कालेज के दिनों की थी… जब नैना हंस रही थी, बेफिक्र, खुश और अर्जुन उस तसवीर को घंटों देखता रहता.

‘‘तुम अभी भी वैसे ही हंसती हो क्या?’’ वह अकसर खुद से पूछता.

लेकिन जवाब में केवल खामोशी मिलती. कई बार उस ने कोशिश की आगे बढ़ने की, किसी और को अपनी जिंदगी में लाने की, लेकिन हर बार उसे लगता, जैसे वह किसी और के साथ नहीं, बल्कि अपने ही दिल के साथ धोखा कर रहा हो.

उस ने खुद को काम में डुबो दिया. दिनरात, बस काम, लेकिन जब भी वह थक कर रुकता, तो उस की यादें फिर उसे उसी प्लेटफार्म पर ले जातीं, जहां उस ने अपना सबकुछ छोड़ दिया था. उस ने नैना के पास लौटने का सपना देखना छोड़ दिया था, क्योंकि कई साल बीत गए थे उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में.

एक दिन, अचानक उसे उसी शहर में एक प्रोजैक्ट के सिलसिले में जाना पड़ा. वही शहर जहां उस की मुहब्बत अब भी सांस ले रही थी.

ट्रेन से उतरते ही उस का दिल तेजी से धड़कने लगा. हर चीज जानीपहचानी थी, लेकिन अब उस में एक अजनबीपन भी था. उस ने खुद को रोकने की कोशिश की, ‘‘नहीं, वहां नहीं जाना चाहिए.’’

लेकिन दिल दिल कहां मानता है? उस के कदम खुद ब खुद उसी दिशा में बढ़ने लगे. प्लेटफार्म नंबर 3. वह जगह, जहां से उस की जिंदगी 2 हिस्सों में बंट गई थी, पहले और बाद में.

वह धीरेधीरे उस बैंच की ओर बढ़ा, वही बैंच जहां नैना आखिरी बार बैठी थी. उस ने हाथ बढ़ा कर उस बैंच को छुआ, जैसे वह उस पल को फिर से महसूस करना चाहता हो.

‘‘तुम अभी भी यहां आते हो?’’ अचानक पीछे से आई आवाज ने जैसे उस की धड़कनें रोक दीं.

वह आवाज, जिसे वह हजारों आवाजों में भी पहचान सकता था. अर्जुन ने धीरेधीरे पीछे मुड़ कर देखा… नैना. समय जैसे थम गया. वह वहीं खड़ी थी, सालों बाद भी वैसी ही. बस, उस की आंखों में अब और गहराई थी और शायद थोड़ा और दर्द भी.

‘‘नैना,’’ अर्जुन के होंठों से बस इतना ही निकल पाया. दोनों कुछ पल तक बस एकदूसरे को देखते रहे, जैसे सालों की दूरी उन की आंखों के रास्ते पिघल रही हो.

‘‘तुम बदल गए हो,’’ नैना ने धीमे से कहा. अर्जुन हलका सा मुसकराया, ‘‘तुम नहीं बदली.’’

‘‘बदली हूं,’’ नैना ने धीरे से कहा, ‘‘पहले थोड़ा कम रोती थी.’’ दोनों हलका सा हंसे, लेकिन उस हंसी में भी दर्द था. कुछ देर दोनों चुप रहे. फिर अर्जुन ने हिम्मत जुटाई, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘ठीक हूं.’’ नैना ने वही पुराना जवाब दिया. अर्जुन ने सिर हिलाया, ‘‘झूठ बोल रही हो.’’

नैना ने उस की आंखों में देखा, ‘‘तुम भी.’’ दोनों फिर मुसकरा दिए. एक ऐसी मुसकान, जो केवल वही समझ  सकते थे.

अर्जुन ने धीरे से पूछा, ‘‘शादी?’’ नैना ने उस की बात पूरी होने से पहले ही सिर हिला दिया, ‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों?’’ अर्जुन की आवाज में हलकी सी उम्मीद थी.

नैना ने गहरी सांस ली, ‘‘क्योंकि मैं ने किसी और को उस जगह बैठाने की कोशिश ही नहीं की, वह जगह अब भी तुम्हारी है.’’

अर्जुन की आंखें भर आईं, ‘‘मैं ने भी नहीं,’’ उस ने धीरे से कहा. नैना ने उस की ओर देखा, ‘‘क्यों?’’

अर्जुन ने हलकी सी मुसकान दी, ‘‘क्योंकि मुझे  कभी लगा ही नहीं कि तुम गई हो.’’

यह सुन कर नैना की आंखों से आंसू बह निकले. वह कुछ पल तक कुछ नहीं बोल पाई, फिर उस ने धीमे से कहा, ‘‘तो फिर हम इतने साल अलग क्यों रहे?’’

यह सवाल बहुत गहरा था. अर्जुन ने आसमान की ओर देखा, ‘‘शायद क्योंकि हमें समझना था कि प्यार केवल साथ रहने का नाम नहीं है. प्यार किसी के बिना भी उसे महसूस करने का नाम है.’’

नैना ने सिर झुका लिया. ‘‘मैं ने हर दिन तुम्हें महसूस किया है. अब मेरे मांबाप नहीं रहे. मैं हूं और तुम्हारे बोल.’’

उस ने धीमे से कहा, ‘‘हर सुबह, हर शाम, हर रात.’’ अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया, ‘‘मैं ने भी.’’

दोनों के बीच की दूरी अब बहुत कम रह गई थी, लेकिन उन के दिलों की दूरी तो कभी थी ही नहीं. ट्रेन की सीटी फिर गूंजी. दोनों ने एकसाथ उस ओर देखा.

नैना ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘फिर से सफर?’’ अर्जुन ने उस की ओर देखा और कहा, ‘‘हां, लेकिन इस बार मैं अकेला नहीं जाऊंगा.’’

नैना चौंकी, ‘‘मतलब?’’ अर्जुन ने धीरे से उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘इस बार मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा, अगर तुम चलो तो.’’

नैना की सांसें तेज हो गईं, ‘‘इतने साल, इतने फासले, क्या सबकुछ फिर से शुरू हो सकता है?’’

अर्जुन ने उस की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘प्यार कभी खत्म नहीं हुआ.’’

‘‘तो फिर उसे फिर से शुरू करने की जरूरत ही क्या है?’’ नैना रो पड़ी. उस ने अर्जुन को कस कर पकड़ लिया, जैसे वह उसे फिर कभी खोना नहीं चाहती.

‘‘मैं थक गई हूं,’’ उस ने सिसकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे बिना जीतेजीते.’’ अर्जुन ने उस के सिर पर हाथ रखा, ‘‘अब और नहीं. अब हम साथ चलेंगे.’’

ट्रेन खड़ी थी, लेकिन इस बार कोई जल्दी नहीं थी. इस बार कोई छूट नहीं रहा था.

नैना ने धीरे से कहा, ‘‘शायद कुछ सफर ऐसे होते हैं, जो अधूरे रह कर ही पूरे हो जाते हैं.’’

अर्जुन ने मुसकरा कर कहा, ‘‘और कुछ प्यार जो छूट कर भी कभी छूटते नहीं.’’

दोनों साथ खड़े थे, हाथों में हाथ लिए. इस बार, सफर शुरू हुआ था, लेकिन कोई पीछे नहीं छूटा था. छूटा था तो वह लिजलिजा सामाजिक ढांचा जिस ने 2 धड़कते दिलों को मिलने नहीं दिया था.

-डा. गोपालदास नायक

Hindi Love Story : आंसू छलक आए

Hindi Love Story. ‘‘देखो विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें अपने पिता से रजामंदी लेनी पड़गी…’’ प्रेमशंकर ने समझाते हुए कहा, ‘‘शादी में उन की रजामंदी होना बहुत जरूरी है.’’

‘‘मगर अंकल, वे इस की इजाजत नहीं देंगे,’’ विनोद ने इनकार करते हुए कहा. ‘‘क्यों नहीं देंगे इजाजत?’’ प्रेमशंकर ने सवाल पूछा, ‘‘क्या तुम उन्हें समझाओगे नहीं?’’

‘‘मैं अपने पिता की आदतों को अच्छी तरह से जानता हूं. वे कभी नहीं समझेंगे और हमारी इस शादी के लिए इजाजत भी नहीं देंगे…’’ एक बार फिर इनकार करते हुए विनोद बोला, ‘‘आप उन्हें समझा दें, तो अच्छा रहेगा.’’

‘‘मेरे समझाने से क्या वे मान जाएंगे?’’ प्रेमशंकर ने पूछा. ‘‘हां अंकल, वे मान जाएंगे,’’ यह कह कर विनोद ने गेंद उन के पाले में फेंक दी.

विनोद प्रेमशंकर के मकान में किराएदार था. उसे अभी बैंक में लगे 2 साल हुए थे. इन 2 सालों में विनोद ने किराए के मामले में उन्हें कभी दिक्कत नहीं पहुंचाई थी. एक तरह से उन के घरेलू संबंध हो गए थे.

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विनोद के बैंक में ही कल्पना काम करती थी. उसे भी बैंक में लगे तकरीबन 2 साल हुए थे. उम्र में वे दोनों बराबर के थे. दोनों कुंआरे थे. दोनों में कब प्यार पनपा, पता ही नहीं चला.

वे एकदूसरे के कमरे में घंटों बैठे रहते थे. दोनों ही तकरीबन 2 हजार किलोमीटर दूर से इस शहर में नौकरी करने आए थे.

कभीकभी कल्पना की मां जरूर उस के पास रहने आ जाती थीं. तब कल्पना मां से कोई बहाना कर के विनोद के कमरे में आती थी. प्रेमशंकर यह सब जानते थे.

जब कल्पना घंटों विनोद के कमरे में बैठी रहती, तब प्रेमशंकर को लगा कि उन दोनों में प्यार की खिचड़ी पक रही है.

एक दिन मौका देख कर उन्होंने विनोद से खुल कर बात की. नतीजा यही निकला कि विनोद के पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे, क्योंकि वह ऊंची जाति का था, जबकि कल्पना निचली जाति की थी.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘ठीक है विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो तुम्हें अपने मातापिता को भरोसे में लेना होगा.’’

मगर विनोद इनकार करते हुए बोला, ‘‘अंकल, वे इस शादी के लिए कभी इजाजत नहीं देंगे.’’

तब प्रेमशंकर ने कहा था, ‘‘आखिर वे भी तो इनसान हैं, कोई जानवर नहीं. तुम उन्हें बुलाओ. अगर वे नहीं आएंगे, तो मैं चलूंगा तुम्हारे साथ उन को समझाने…’’

इस तरह प्रेमशंकर बिचौलिया बनने को राजी हो गए.

विनोद के बुलाने पर पिता अरुण आ गए. साथ में उन की पत्नी मनोरमा भी थीं. प्रेमशंकर ने उन्हें अपने घर में इज्जत से बिठाया.

अरुण बोले, ‘‘बताइए प्रेमशंकर साहब, हमें किसलिए बुलाया है?’’ ‘‘अरुण साहब, आप को खास वजह से ही यहां बुलाया है.’’

‘‘खास वजह… मैं समझा नहीं…’’ अरुण बोले, ‘‘जो कुछ कहना है, साफसाफ कहें.’’ ‘‘ठीक है, पर इस के लिए आप को दिल थोड़ा मजबूत करना होगा.’’

‘‘मजबूत से मतलब?’’ अरुण ने हैरान हो कर पूछा. ‘‘मतलब यह कि आप ने विनोद की शादी के बारे में क्या सोचा है?’’

‘‘उस के लिए मैं ने एक लड़की देख ली है प्रेमशंकरजी. अब विनोद की हां चाहिए और उस की हां के लिए मैं यहां आया हूं,’’ यह कह कर अरुण ने प्रेमशंकर को अजीब सी निगाह से देखा.

‘‘अगर मैं कहूं कि विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है, तो…’’ ‘‘क्या कहा, विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है?’’

‘‘जी हां अरुण साहब, अब आप का क्या विचार है?’’ ‘‘कौन है वह लड़की?’’ अरुण ने पूछा.

‘‘उस के साथ बैंक में ही काम करती है. उस का नाम कल्पना है. आप इस पर क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘मतलब, विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है?’’ ‘‘हां,’’ इतना कह कर प्रेमशंकर ने अरुण के दिल में हलचल पैदा कर दी.

‘‘वह किस जाति की है? क्या समाज है उस का?’’ अरुण जरा गुस्से से बोले. ‘‘वह निचली जाति की है,’’ प्रेमशंकर ने बिना किसी लागलपेट के कहा.

‘‘क्या कहा, वह एक दलित घर से है? मैं यह शादी कभी नहीं होने दूंगा…’’ अरुण ने गुस्से में साफ मना कर दिया, फिर आगे बोले, ‘‘अरे प्रेमशंकरजी, शादीब्याह अपनी ही बिरादरी में होते हैं.’’

‘‘हांहां, होते हैं अरुणजी, मगर आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं, वह जमाना गुजर गया. यह 21वीं सदी है.’’

‘‘हां, मैं भी जानता हूं. मुझे समझाने की कोशिश न करें.’’ ‘‘जब आप इतना जानते हैं, तब इस शादी के लिए मना क्यों कर रहे हैं?’’

‘‘मैं अपने बेटे की गैरबिरादरी में शादी करा कर बिरादरी पर दाग नहीं लगाना चाहता. मैं यह शादी हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

प्रेमशंकर मुसकराते हुए बोले, ‘‘तो आप विनोद की शादी अपनी ही बिरादरी में करना चाहते हैं?’’

‘‘हां, क्या आप को शक है?’’ ‘‘आप विनोद से तो पूछ लीजिए.’’ ‘‘पूछना क्या है? वह मेरा बेटा है. मेरा कहना वह टाल नहीं सकता.’’

‘‘अपने बेटे पर इतना भरोसा है, तो पूछ लीजिए उस से कि वह आप की पसंद की लड़की से शादी करेगा या अपनी पसंद की लड़की से,’’ कह कर प्रेमशंकर ने भीतर की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘विनोद, यहां आ जाओ.’’

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भीतर बैठे विनोद और कल्पना इसी इंतजार में थे. वे दोनों बाहर आ गए. अरुण कल्पना को देखते रह गए.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘पूछ लो अपने बेटे से… यह वह कल्पना है, जिस से यह शादी करना चाहता है.’’

‘‘क्यों विनोद, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’’ विनोद के पापा अरुण बोले. ‘‘जो कुछ सुन रहे हैं, सच सुन रहे हैं पापा,’’ विनोद ने कहा.

‘‘तुम इस कल्पना से शादी नहीं कर सकते,’’ अरुण ने कहा. ‘‘पापा, मैं शादी करूंगा, तो इस से ही,’’ विनोद बोला.

‘‘मैं तुम्हारी शादी इस लड़की से हरगिज नहीं होने दूंगा.’’ ‘‘मैं शादी करूंगा, तो सिर्फ कल्पना से ही.’’

‘‘ऐसा क्या है, जो तुम इस की रट लगाए हुए हो?’’ ‘‘कल्पना मेरा प्यार है.’’

‘‘प्यार… 2-4 मुलाकातों को तुम प्यार समझ बैठे हो?’’ चिल्ला कर अरुण बोले, ‘‘कान खोल कर सुन लो विनोद, तुम्हारी शादी वहीं होगी, जहां हम चाहेंगे.’’

‘‘पापा सच कर रहे हैं विनोद…’’ मां मनोरमा बीच में ही बात काटते हुए बोलीं, ‘‘यह लड़की हमारी जातबिरादरी की भी नहीं है. इस से शादी कर के हम समाज में अपनी नाक नहीं कटा सकते हैं, इसलिए इस के साथ शादी करने का इरादा छोड़ दे.’’

‘‘मां, मेरे इरादों को कोई बदल नहीं सकता है. शादी करूंगा तो कल्पना से ही, किसी दूसरी लड़की से नहीं.’’

अपना फैसला सुना कर विनोद कल्पना को ले कर घर से बाहर चला गया.

पलभर के सन्नाटे के बाद प्रेमशंकर बोले, ‘‘अब क्या सोचा है अरुण साहब? अब भी आप इस शादी से इनकार करते हैं?’’

‘‘यह सब आप लोगों की रची हुई साजिश है. आप ने ही मेरे बेटे को बरगलाया है, इसलिए आप उस का ही पक्ष ले रहे हैं,’’ कह कर अरुण ने अपनी बात पूरी की.

‘‘अरुण साहब सोचो, विनोद कोई दूध पीता बच्चा नहीं है…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘आप उसे डराधमका कर अपने वश में कर लेंगे, यह भी मुमकिन नहीं है. वह नौकरी करता है, अपने पैरों पर खड़ा है. वह अपना भलाबुरा समझता है.

‘‘वह मेरे यहां किराएदार बन कर जरूर रह रहा है, मगर मैं उस को पूरी तरह समझ चुका हूं कि वह समझदार है. वैसे, वह आप की भावनाओं को भी समझता है. मगर वह शादी करेगा, तो कल्पना से ही. इस के पहले मैं भी यह सब बातें उसे समझा चुका हूं, इसलिए आप उसे समझदार समझें.’’

‘‘क्या खाक समझदार है भाई साहब…’’ मनोरमा झल्ला कर बोलीं, ‘‘वह उस लड़की को अपने साथ ले गया है. कहीं वह गलत कदम न उठा ले. सुनो जी, उस की शादी वहीं करो, जहां हम चाहते हैं.’’ Hindi Love Story

‘‘भाभीजी, विनोद ऐसावैसा लड़का नहीं है, जो गलत कदम उठा ले…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘अरुण साहब, अगर आप उस पर दबाव डाल कर शादी कर भी देंगे, तब वह बहू के साथ वैसा बरताव नहीं करेगा, जो आप चाहेंगे. दिनरात उन में कलह मचेगी और आपस में मनमुटाव होगा.

‘‘अगर आप उन की मरजी से शादी नहीं करोगे, तब वे कोर्ट में ही शादी कर सकते हैं, क्योंकि कोर्ट उन्हीं का पक्ष लेगा. इसलिए आप सोचिए मत. मेरा कहना मानिए, इन की शादी आप आगे रह कर करें और पिता की जिम्मेदारी से छुटकारा पा जाएं.’’

‘‘मगर इस शादी से समाज में हमारी कितनी किरकिरी होगी, यह आप ने सोचा है?’’ एक बार फिर अरुण अपनी बात रखते हुए बोले.

‘‘समाज तो दोनों हाथों में लड्डू रखता है. थोड़े दिनों तक समाज ताना दे कर चुप हो जाएगा. इस बात पर जितना विचार कर के गहराई में उतरेंगे, उतनी ही तकलीफ उठाएंगे.

‘‘आप अपनी हठ छोड़ दें. इस के बावजूद भी आप अपनी जिद पर अड़े हो, तो विनोद की शादी अपनी देखी लड़की से कर दो. मैं इस मामले में आप से कुछ नहीं बोलूंगा,’’ प्रेमशंकर के ये शब्द सुन कर अरुण के सारे गरम तेवर ठंडे पड़ गए.

वे थोड़ी देर बाद बोले, ‘‘ठीक है प्रेमशंकरजी, मैं अपनी हठ छोड़ता हूं. विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है, तो इस के लिए मैं तैयार हूं.’’

‘‘ओह, शुक्रिया अरुण साहब,’’ कह कर प्रेमशंकर की आंखों में खुशी के आंसू छलछला आए. Hindi Love Story

Hindi Romantic Fiction : अंधेरा

Hindi Romantic Fiction. दिनेश सोच में डूबा बुदबुदा पड़ा, ‘इतनी आसानी से मैं सबकुछ खत्म नहीं होने दूंगा. 2 दिन में लोन मिलने से रहा, पर कुछ तो करना पड़ेगा. लेकिन क्या कर सकता हूं मैं? एक ही सूरत है कि कोई मुझे 60 हजार रुपए उधार दे दे. पर कोई क्यों देगा?’

ठीक उसी समय दिनेश को याद आया कि गोयल साहब ने एक दिन उस से अपनी बेटी माधुरी को ट्यूशन पढ़ाने के लिए कहा था. दिनेश ने सोच कर बताने के लिए कहा था.

दिनेश ने सोचा कि गोयल साहब को अपनी परेशानी बता कर देखते हैं. उसे लगा कि बैंक में ऊंचे पद पर काम करने वाले गोयल साहब के लिए 60 हजार रुपए की मदद कोई बड़ी बात नहीं होगी.

दिनेश उठा और सीधे गोयल साहब के घर के लिए चल पड़ा. सुबह के 9 बजे थे. गोयल साहब लौन में बैठे चाय पी रहे थे. उन्हें देखते ही दिनेश ने अदब से कहा, ‘‘नमस्ते सर, क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’ ‘‘क्यों नहीं, आओ बेटे.’’

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‘‘अंकल, मैं बहुत बड़ी परेशानी में फंस गया हूं,’’ इतना कह कर दिनेश ने गोयल साहब को सारी बात सचसच बता दी. ‘‘यह तो बहुत गलत हुआ. बताओ, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं?’’ गोयल साहब ने दिनेश की तरफ हमदर्दी भरी नजरों से देख कर कहा.

‘‘सर, आप मुझे 60 हजार रुपए उधार दे दें तो…’’ दिनेश ने अपना कहा वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

‘‘बेटा, यह एक बड़ी रकम है, लेकिन तुम्हारी जरूरत से बड़ी नहीं. मैं तुम्हें 60 हजार रुपए दे दूंगा, पर मैं चाहूंगा कि तुम माधुरी को ट्यूशन पढ़ाओ. बीएससी फर्स्ट ईयर में उस के नंबर बहुत खराब आए हैं और एक सब्जैक्ट में तो बैक पेपर भी है.’’

गोयल साहब ने रुक कर फिर आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं अपनी दोनों बेटियों को पढ़ाई में बहुत आगे तक देखना चाहता हूं. ‘‘मेरा कोई बेटा नहीं है, इसलिए बेटे की कमी उन्हीं से पूरी करना चाहता हूं. उन का कैरियर संवारने के लिए तुम्हें अपनी पूरी ताकत  झोंकनी होगी. मेरे हिसाब से तुम मेरी बात अच्छी तरह समझ रहे हो…’’

दिनेश ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘जी, मैं माधुरी से मिलना चाहूंगा. कहां है वह?’’ गोयल साहब थोड़ी तेज आवाज में बोले, ‘‘प्रिया बेटी, दीदी को नीचे भेजो.’’ थोड़ी देर में माधुरी नीचे आई, ‘‘जी पापा.’’ ‘‘बेटी, आप दिनेश हैं, जो पास ही में ममफोर्डगंज में रहते हैं. आप ने बीएससी 80 फीसदी नंबरों से पास किया है.

‘‘आज से आप की पढ़ाई की जिम्मेदारी इन की होगी. आप इन की हर बात मानेंगी. अब से ये आप के गार्जियन हैं. अच्छा बेटा, तुम आपस में बात करो, मैं अभी आया.’’ ‘‘क्या नाम है आप का?’’ ‘‘माधुरी गोयल.’’ ‘‘माधुरी नाम बड़ा लंबा है. मैं आप को मधु बुलाऊंगा.’’  ‘‘जी.’’ ‘‘घर में कौनकौन हैं?’’

‘‘पापा, मम्मी, मैं और मेरी छोटी बहिन प्रिया,’’ माधुरी, जो एक मासूम चेहरे की खूबसूरत लड़की थी, ने अब की बार थोड़ा आराम से जवाब दिया.

‘‘बीएससी में क्याक्या सबजैक्ट्स हैं?’’ ‘‘मैथ्स, फिजिक्स और कैमिस्ट्री.’’ ‘‘कितने नंबर आए सभी में?’’ ‘‘फिजिक्स में 42, कैमिस्ट्री में 45…’’ ‘‘और मैथ्स में?’’ ‘‘17… बैक पेपर है.’’ ‘‘अच्छा, तो हम सब से पहले पढ़ाई मैथ्स से शुरू करेंगे.’’ ‘‘जी, ठीक है.’’

‘‘सर, मैं और मेरी सहेलियां दोपहर को फिल्म देखने जा रही हैं.’’ ‘‘ठीक है, मैं शाम को 7 बजे आऊंगा.’’ ‘‘जी, सर.’’ उसी समय गोयल साहब वहां पहुंचे और पूछा, ‘‘क्यों, हो गया इंटरव्यू?’’ ‘‘जी, अंकल.’’ ‘‘जाओ बेटी.’’ ‘‘जी पापा,’’ कह कर माधुरी वहां से चली गई.

गोयल साहब ने एक पैकेट दिनेश की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जाओ बेटा, पहले जा कर एमबीए में अपना एडमिशन कराओ.’’ ‘‘थैंक यू अंकल,’’ दिनेश एहसानमंद हो कर बोला. ‘‘सिर्फ थैंक यू कहने से कुछ नहीं होगा… तुम्हें मेरी बात तो याद है न?’’ ‘‘जी, वादा रहा. माधुरी अच्छे नंबर लाएगी.’’ ‘‘अच्छा, मुझे बैंक जाना है.’’ ‘‘जी अंकल, नमस्ते,’’ कह कर दिनेश वहां से रुखसत हुआ..

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दिनेश ने अपना एमबीए में एडमिशन करवा लिया. रामदीन का परिवार काफी खुश था.

दिनेश साढ़े 6 बजे गोयल साहब के घर के लिए निकल गया. घर पहुंचने पर मिसेज गोयल दिनेश को चाय दे गईं.

‘‘मधु…’’ ‘‘सर, मैं 10 मिनट में आई,’’ माधुरी ने शायद बाथरूम के अंदर से कहा.

10 मिनट बाद वह दिनेश के सामने कुरसी पर बैठी थी. ‘‘कितने बज रहे हैं?’’

‘‘सर, 7 बज कर 10 मिनट.’’ ‘‘मधु, यह मेरी पहली और आखिरी वार्निंग है. 7 बजे का मतलब 7 बजे. समझीं?’’

‘‘माफ कर दीजिए सर,’’ माधुरी मुंह बनाते हुए बोली.

दिनेश माधुरी को 1-2 दिन पढ़ाने में ही जान गया कि उस का मन पढ़ाई में कतई नहीं लगता, इसलिए वह पढ़ना भी नहीं चाहती है.

दिनेश फिर भी उसे पढ़ाने में लगा रहा. मधु को अपनी लापरवाही की वजह से अकसर डांट पड़ती थी. धीरेधीरे ही सही, मधु में कुछ सुधार आ रहा था.

दिनेश मधु को पढ़ाने में 2-3 घंटे रोज लगा ही देता और देखते ही देखते एक महीना गुजर गया. दिनेश आजकल काफी परेशान रहता था. उस की परेशानी की वजह थी, कालेज में चल रही रैगिंग.

दिनेश अपने दोस्त अजीत से कह रहा था, ‘‘परेशान कर के रख दिया है. पढ़ाई नहीं करने देते हैं. मेरे 2-3 घंटे गोयल साहब के यहां निकल जाते हैं, उस के बाद घर का काम. खुद के कई काम और इन अमीरजादों को रैगिंग की पड़ी है.’’

अजीत दबी आवाज में बोला, ‘‘अबे यार, जो करवाते हैं, उसे करता चल, नहीं तो ये हाथ भी उठा सकते हैं.’’  ‘‘मैं किसी से नहीं डरता. अब मैं परेशान हो चुका हूं. अगर आज कुछ हुआ, तो ठीक नहीं होगा,’’ दिनेश की आवाज में भरोसा था.

‘‘हैलो, इधर आओ चिकनो,’’ ठीक उसी समय एक सीनियर ने हाथ दे कर बुलाया. अजीत चुपचाप उस सीनियर की तरफ बढ़ गया, जबकि दिनेश वहीं चुपचाप खड़ा रहा.

यह सब देख कर वह सीनियर ताव में आ गया. उस ने कुछ और सीनियर लड़कों को आवाज दी और वे सब दिनेश की ओर बढ़े. ‘‘क्यों हीरो, क्या दिक्कत है?’’ उन में से एक ने पूछा.

‘‘कोई दिक्कत नहीं है. मेरी क्लास का टाइम हो गया है और मैं वहीं जा रहा हूं,’’ दिनेश सामान्य हो कर बोला. ‘‘बहुत अकड़ है. यहां पढ़ाई करनी है कि नहीं?’’ दूसरे लड़के ने पूछा.

‘‘क्यों, क्या यह तुम्हारे बाप का कालेज है? मैं तुम सब की शिकायत प्रिंसिपल से करूंगा,’’ दिनेश ने जवाब दिया.

ठीक उसी समय बगल से एक लड़की गुजरी. एक सीनियर ने उसे टोका, ‘‘हैलो मैडम, विश करने के लिए आप की मम्मी घर से आएंगी क्या?’’ ‘‘नो सर,’’ लड़की घबराते हुए बोली.

‘‘ऐसा कर, तू इस लड़के को किस कर,’’ एक सीनियर ने शरारत से कहा. दिनेश और वह लड़की आंखें चौड़ी कर के उस सीनियर की तरफ देखने लगे.

ठीक उसी समय वहां एक सीनियर लड़की भी आ गई और बोली, ‘‘क्यों अंजलि, तुम्हें जो बोला गया है, वह सम झ में नहीं आया?’’ सीनियर लड़की पहले ही रैगिंग के दौरान अंजलि का परिचय अच्छी तरह से ले चुकी थी.

अंजलि धीरेधीरे दिनेश की ओर बढ़ने लगी और सभी लड़के ताली बजाते हुए जोश बढ़ाने के लिए चिल्लाने लगे.

अंजलि दिनेश के पास पहुंची. उस की आंखों में आंसू भरे थे. दिनेश का चेहरा गुस्से से तमतमा गया. उस ने अंजलि का हाथ पकड़ा और बोला, ‘‘आप चलो मेरे साथ.’’

वे दोनों एक तरफ बढ़ने लगे. ठीक उसी समय एक सीनियर ने उस का कौलर पकड़ना चाहा कि दिनेश ने उस के चेहरे पर एक जबरदस्त घूसा मारा. वह सीनियर बिलबिलाता हुआ पीछे हटा. तालियोें का शोर बंद हो गया. दूसरे लड़कों में से एक ने एक घूंसा दिनेश के चेहरे पर दे दिया. दिनेश की नाक से खून बहने लगा.

दिनेश ने नाक से आते खून को देखा और अंजलि का हाथ छोड़ कर टूट पड़ा उन पर. सभी उस का गुस्सा देख कर घबरा गए और पीछे हट गए.

दिनेश अंजलि को ले कर भीड़ से अलग चला गया और कुछ दूर जाने के बाद वह अंजलि का हाथ छोड़ता हुआ बोला, ‘‘माफ कीजिए, मेरी वजह से आप को परेशानी हुई. दरअसल, मु झे परेशान करने के लिए उन्होंने आप को वहां बुलाया था.’’

‘‘पर, आप को तो चोट लगी है. चलिए, कुछ फर्स्ट एड ले लीजिए.’’ ‘‘नहीं, ठीक है, मैं अभी क्लास जाना पसंद करूंगा,’’ कह कर दिनेश क्लासरूम की तरफ बढ़ा और अंजलि भी क्लास के लिए दिनेश के पीछे हो ली.

अंजलि दिनेश से काफी प्रभावित थी. शायद रैगिंग वाली घटना को ले कर. दिनेश बहुत ही सीधासादा लड़का था. उस का कालेज आना, अपनी पढ़ाई करना, अपने काम से काम रखना, ये सभी बातें अंजलि को बहुत अच्छी लगती थीं. वह मन ही मन दिनेश से प्यार करने लगी थी, पर दिनेश से कहने की हिम्मत उस में न थी.

स्मिता कालेज से लौट रही थी. अचानक उसे एक लड़का सिगरेट पीता हुआ अपनी ओर बढ़ता दिखाई दिया. स्मिता को उस का चेहरा जानापहचाना सा लगा. याद आते ही स्मिता की आंखें फटी की फटी रह गईं. यह तो वही लड़का था, जिस ने आज से लगभग 45 दिन पहले उस के घर पर चोरी की थी.

स्मिता को यह नहीं सम झ आ रहा कि वह आखिर उस की तरफ ही क्यों आ रहा है. अगले कुछ पलों में  वह स्मिता के ठीक सामने खड़ा था. स्मिता के कदम रुक गए. राजू ने उस के चेहरे को ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘देख, शोर मचाने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘अब शोर मचाने से क्या फायदा? जब मैं तुम्हें पकड़वा सकती थी, तब शोर नहीं मचाया, तो अब क्यों…, वैसे भी क्या काम है तुम को?’’ स्मिता ने पूछा.

‘‘मु झे तुम से कुछ बात करनी है. माना कि मैं एक अच्छा लड़का नहीं हूं. चोरी करना बुरी बात है. पर उस रात तुम से की गई छोटी सी बातचीत मु झ पर बहुत असर कर गई. उस दिन घर लौटने के बाद से मैं काफी परेशान हूं. अगर तुम्हारी बात मु झे इतना परेशान कर सकती है, तो तुम्हारी दोस्ती मु झे अच्छा आदमी जरूर बना सकती है…’’

स्मिता ने बात बीच में काटी, ‘‘क्या बकवास कर रहे हो? चलो, हटो. मु झे घर जाने के लिए देर हो रही है.’’

राजू ने कहा, ‘‘देखिए, कई लोगों ने मु झ से यह गंदा काम छोड़ने के लिए कहा और मेरी चोरीचकारी छुड़वाने की कोशिश भी की, पर मु झ पर कोई असर नहीं हुआ, इसलिए आप प्लीज एक बार मेरी बात मान लें. मैं आप को कभी परेशान नहीं करूंगा.’’

स्मिता को शरारत सू झी. उस ने राजू की ओर देखा और कहा, ‘‘ठीक है, मु झे आप की दोस्ती मंजूर है. मेरा नाम स्मिता है. आप का नाम क्या है?’’ यह सुन कर राजू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने फौरन जवाब दिया, ‘‘मेरा नाम राजू है. वैसे घर वालों ने मेरा नाम राजेश कुमार रखा था.’’

स्मिता ने घड़ी की ओर देख कर कहा, ‘‘अब मु झे चलना चाहिए. देर हो रही है.’’ राजू बहुत खुश था. वह बोला, ‘‘हां, आप जाइए. बाद में आप से मुलाकात होगी.’’ ‘‘जरूर,’’ इतना कह कर स्मिता चली गई.

दिनेश को आज बुखार था. शायद सर्दी का असर था. फिर भी वह अपने नियमित समय के मुताबिक माधुरी के घर पहुंच गया. ‘‘सर, कल आप ने जो प्रौब्लम दिए, उन में से 2 सुल झ नहीं पाए.’’

ठीक उसी समय दिनेश को एक जबरदस्त छींक आई. माधुरी ने देखा कि उस का चेहरा लाल है और वह काफी सुस्त लग रहा है. ‘‘सर, लगता है, आप की तबीयत ठीक नहीं है?’’ ‘‘नहीं, मेरी तबीयत ठीक है.’’

माधुरी ने हिम्मत कर के अपना हाथ दिनेश के गाल पर रख दिया. यह देख दिनेश हड़बड़ा गया. मधु उस से पहले ही बोल पड़ी, ‘‘सर, वाकई आप की तबीयत ठीक नहीं है. आज आप घर जाइए और आराम कीजिए.’’

‘‘नहीं मधु, बताओ कौन सी प्रौब्लम…’’ माधुरी उस की बात को बीच में काटते हुए बोली, ‘‘सर, आप जो भी पढ़ने के लिए कहेंगे, मैं पढ़ूंगी, पर आप आराम कीजिए.’’

‘‘देखो मधु, तुम…’’ ‘‘सर प्लीज, आज मेरी बात मान लीजिए.’’

दिनेश ने माधुरी के चेहरे की तरफ देखा. वह बहुत उम्मीद भरी निगाहों से देख रही थी. दिनेश कुछ सोच कर बोला, ‘‘ठीक है मधु, पर तुम पढ़ाई करना.’’ ‘‘जी सर, थैंक्यू सर, छुट्टी, छुट्टी…’’

दिनेश माधुरी की बचकानी बातों पर मुसकराता हुआ चला गया. दिनेश जैसे ही कालेज पहुंचा, अंजलि सीधे उस के पास चली आई, ‘‘आप कल आए नहीं.’’ ‘‘ओ अंजलि, कल मेरी तबीयत खराब थी.’’

‘‘अभी कैसी है?’’ ‘‘ठीक है,’’ दिनेश क्लासरूम की तरफ बढ़ता हुआ बोला.

अंजलि डरतेडरते बोली, ‘‘दिनेश, एक बात बोलूं, मना तो नहीं करोगे?’’ ‘‘पहले बताओ तो, फिर देखते हैं,’’ अंजलि को डरता हुआ देख दिनेश ने हंस कर कहा. ‘‘मैं आज आप को अपनी बर्थडे पार्टी पर बुलाना चाहती हूं.’’

‘‘हैप्पी बर्थडे. देखो अंजलि, मैं न तो कभी पार्टी वगैरह में गया हूं और न जाना चाहता हूं. यह सब मेरी औकात के बाहर है,’’ दिनेश संकोच के भाव में बोला.

‘‘प्लीज, प्जीज, प्लीज…’’ ‘‘ठीक है, पर मैं आप के घर आऊंगा कैसे?’’

‘‘आप आज मधु को पढ़ाने तो जाएंगे ही, मैं वहीं से आप को पिकअप कर लूंगी,’’ अंजलि काफी खुश होते हुए बोली. ‘‘स्मिताजी, नमस्ते,’’ यह आवाज सुन कर स्मिता चौंक गई. सामने राजू खड़ा था.

‘‘हाय राजू, कैसे हो?’’ ‘‘कल आप जल्दी में थीं, इसलिए आप से कुछ बात नहीं हो पाई,’’ राजू ने मुसकराते हुए आगे कहा, ‘‘अगर आप के पास कुछ समय हो, तो चलिए उस बाग में बैठते हैं.’’

‘‘ठीक है, चलिए,’’ स्मिता ने कुछ रुक कर कहा. बाग की ओर बढ़ते हुए राजू ने कहा, ‘‘अपने बारे में कुछ बताइए, जैसे परिवार में कौनकौन हैं, आप कोे क्याक्या पसंद है वगैरह.’’

स्मिता ने राजू को अपने बारे में सबकुछ बता दिया, सिर्फ उन बातों पर परदा डाल दिया, जिन का जिक्र उस ने शायद किसी से नहीं किया था. स्मिता ने तकरीबन एक घंटा राजू के साथ बिताया और जैसे ही वह चलने को हुई, राजू ने उस के हाथ में एक पैकेट पकड़ा दिया.

‘‘यह क्या है राजू?’’ ‘‘अब इस का कोई मतलब नहीं है, पर क्या बताऊं… इस पैकेट में आप के घर से चुराए हुए 60 हजार रुपए, अंगूठी और घड़ी है. इसे आप वापस ले लीजिए प्लीज,’’ राजू बोल रहा था और स्मिता हैरान सी खड़ी थी.

राजू ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘देखिए, आप मेरे लिए सब से अजीज हैं. मां, बाप, भाई, बहिन कोई नहीं है मेरी जिंदगी में. आज मैं अपने अजीज दोस्त के सामने उस की दोस्ती की सौगंध खा कर कहता हूं कि मैं आज के बाद से कभी चोरी नहीं करूंगा,’’ कहते हुए वह भावुक हो गया.

कहीं उस का भावुक होना स्मिता पकड़ न ले, इसलिए वह दौड़ते हुए एक और भाग गया. स्मिता उसे देखती रह गई.

दिनेश तय समय पर मधु के घर पहुंचा. उस ने उस दिन बाकी दिनों से अच्छी पढ़ाई की थी. दिनेश खुश हो गया और बोला, ‘‘वैरी गुड मधु, वैरी गुड. लगता है, बाकी दिनों की तुलना में तुम ने आज अच्छी पढ़ाई की है.’’

‘‘सर, आखिर आप से प्रौमिस किया था, पढ़ना तो पड़ेगा ही, मधु अपना वादा कभी नहीं तोड़ती,’’ मधु ने एक प्यारी सी मुसकान के साथ कहा.

दिनेश उसे एकटक देखता ही रह गया. फिर जैसे ही उसे याद आया कि वह अपलक मधु को देख रहा है, तो वह  झेंप गया. उस ने तुरंत खामोशी को भंग किया, ‘‘गुड, वादा पूरा करना अच्छी बात है. कल से हम फिजिक्स भी पढ़ना शुरू करेंगे,’’ दिनेश ने थोड़ा रुक कर आगे कहा, ‘‘आप के पापा को आप से जितनी उम्मीदें हैं, मु झे उस से कहीं ज्यादा है.’’ मधु कुछ न बोली, क्योंकि वह पढ़ाई करने में मशगूल हो गई थी.

दिनेश सोच रहा था, ‘शुरू में यह लड़की कितनी लापरवाह थी. पढ़ाईलिखाई में भी ध्यान नहीं था. लेकिन पिछले 50 दिनों में गजब का बदलाव आ चुका है. कितनी अल्हड़ लड़की है यह, पर अपने फर्ज के हाथों मजबूर दिनेश ने कभी उसे लड़की की नजर से नहीं देखा. पर वाकई वह एक बेहतरीन घरेलू लड़की थी.’

ठीक उसी समय मधु ने दिनेश से कुछ पूछा और दिनेश की सोच का तार टूटा. तकरीबन एक घंटे बाद जब रात के करीब साढ़े 8 बज रहे थे कि दरवाजे पर किसी गाड़ी का हौर्न बजा. मधु ने लपक कर खिड़की खोली और गाड़ी की तरफ देखा.

‘‘कोई लड़की लगती है सर.’’ ‘‘अंजलि होगी.’’ ‘‘यह अंजलि कौन है सर?’’ ‘‘मेरी क्लासमेट है.’’ ‘‘पर यह यहां…’’ ‘‘इस की बर्थडे पार्टी पर इस के घर जाना है…’’

‘‘बहुत खास दोस्त है क्या?’’ मधु की आवाज में चिंता थी. ‘‘खास का तो पता नहीं, दोस्त जरूर है.’’

‘‘पैसे वाली लगती है सर, संभल कर रहना…’’ ‘‘बहुत चिंता है तुम्हें…’’

‘‘सो तो है सर, पर आप खाली हाथ हो,’’ मधु ने मजाकिया लहजे में कहा. ‘‘मैं कुछ सम झा नहीं…’’ दिनेश ने सवालिया निगाहों से देखा.

‘‘अरे, बर्थर्ड गर्ल के लिए कोई गिफ्ट नहीं ले जाओगे?’’ ‘‘ओह, पर मेरे पास तो कुछ नहीं है,’’ दिनेश का इतना कहना था कि मधु भीतर कमरे में गई और हाथ में एक किताब ले आई और बोली, ‘‘सर, इस के पन्नों पर दोस्ती की खूबियां लिखी हैं, ये आप अंजलि को गिफ्ट कीजिएगा. मैं इसे पैक करती हूं.’’

‘‘नहीं, मैं ये तुम से नहीं ले सकता.’’ ‘‘क्या सर, चलिए ट्यूशन फीस सम झ कर रख लीजिए,’’ मधु ने शरारत भरे लहजे में कहा. दोनों हंसने लगे और दिनेश वह गिफ्ट ले कर बाहर निकला.

अंजलि कार का दरवाजा खोल कर बड़े अदब से बोली, ‘‘चीफ गेस्ट का हार्दिक अभिनंदन है.’’ दोनों मुसकराते हुए गाड़ी में बैठ गए. अंजलि बड़े आराम से ड्राइव कर रही थी. तकरीबन आधे घंटे बाद ही दिनेश एक महलनुमा घर में पहुंचा.

घर देख कर दिनेश की आंखें चुधियां गईं. दिनेश चुपचाप ही रहा. उस शानदार घर को देख कर उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दीं.

अंजलि ने गाड़ी रोकी, दूसरी तरफ जा कर दिनेश की ओर का दरवाजा खोलते हुए बोली, ‘‘आइए.’’ ‘‘जी, चलिए.’’

घर में एक बड़े से हौल में पार्टी पूरे शबाब पर थी. अंजलि को देखते ही वहां मौजूद तमाम लोगों ने तालियों से उस का अभिनंदन किया. ठीक उसी समय एक शानदार लिबास में अधेड़ जोड़ा उस लड़की के पास आया. रोबीली मूंछों वाले एक शख्स ने कहा, ‘‘वैलकम बर्थडे गर्ल.’’ अंजलि खुश हो कर बोली, ‘‘पापा, ये दिनेश हैं, जिन के बारे में मैं ने आप को बताया था.’’

‘‘आप से मिल कर अच्छा लगा जैंटलमैन. अंजलि हमेशा आप के बारे में बातचीत करती रहती है. मैं इस प्यारी लड़की का पापा कोमल सिंह और ये मेरी बीवी गुलाबी देवी हैं,’’ कह कर अंजलि के पापा ने दिनेश की तरफ हाथ बढ़ाया, पर दिनेश ने  झुक कर उन के पैर छू लिए. दोनों हैरान हो कर दिनेश की तरफ देखने लगे.

अपनी ओर देखता पा कर दिनेश ने कहा, ‘‘अंकल, दोस्त के मांबाप भी अपने मांबाप की तरह हुए. अब उन से हाथ मिलाना मु झे सही नहीं लगता.’’

अंजलि के मातापिता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे. हालांकि पार्टी का माहौल दिनेश के लिए असहज हो रहा था, पर वह खुद को सामान्य किए हुए था. दरअसल, इन बड़े लोगों के बीच में दिनेश खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था.

अजंलि की नजरें सिर्फ दिनेश पर ही थीं. अंजलि के मातापिता भी इस बात पर गौर कर रहे थे. पार्टी में तमाम रस्में पूरी की गईं. केक काटा गया, केक काटने के बाद अंजली ने पहले एक बड़ा सा टुकड़ा उठा कर अपने मम्मीपापा को खिलाया, फिर उस की निगाहें दिनेश को खोजने लगीं, जो इन मौर्डन लोगों के पीछे एक कोने में खड़ा था.

अंजलि भीड़ को चीरते हुए दिनेश के सामने खड़ी हो गई और बोली, ‘‘दिनेश मुंह खोलो.’’

‘‘नहीं, ठीक है… पहले अपने खास मेहमानों को…’’ ‘‘नहींनहीं, मुंह खोलो प्लीज.’’

‘‘उन्हें बुरा लग सकता है…’’ दिनेश धीरे से बोला. ‘‘मेरी बला से.’’

दिनेश ने अंजलि के हाथों में केक के टुकड़े का एक बड़ा सा हिस्सा खा लिया.

‘‘थोड़ा सा बचा है… चलेगा क्या?’’ ‘‘चलेगा नहीं दौड़ेगा. प्लीज खिलाओ,’’ अंजलि ने कहा, तो दिनेश ने केक का बचा हिस्सा अंजलि को खिलाया. ‘‘थैंक्यू.’’ ‘‘हैप्पी बर्थडे.’’ ‘‘दिनेश, थैंक्यू फौर जौइनिंग दि पार्टी.’’

‘‘तुम्हें बड़े शानदार गिफ्ट मिले हैं, मैं ने सोचा कि मेरा गिफ्ट, जो बहुत छोटा है, मेरे दोस्त को मिले इन बड़े तोहफों के बीच खो न जाए, दिस इज फौर यू,’’ कह कर दिनेश ने मधु का दिया हुआ तोहफा अंजलि की तरफ बढ़ाया. अंजलि ने उसे लपक कर ले लिया.

‘‘अंजलि, अब मु झे जाने की इजाजत दो,’’ दिनेश ने कहा. ‘‘नहीं, आप को आज यहीं रुकना होगा,’’ तब तक वहां पहुंच चुकी अंजलि की मम्मी ने कहा. ‘‘नहीं आंटी, मैं घर बता कर नहीं आया.’’

‘‘ठीक है, ड्राइवर आप को छोड़ देगा,’’ अब बोलने की बारी अंजलि के पापा की थी. ‘‘नहीं पापा, मैं ड्रौप कर दूंगी.’’

‘‘पर आप का बर्थडे है. अभी आप कैसे जा सकती हैं?’’ दिनेश ने तपाक से जवाब दिया. ‘‘बात तो सही है बेटी,’’ अंजलि के पापा ने कहा. ‘‘अंकल, मैं चला जाऊंगा.’’

‘‘राम सिंह, साहब को घर तक छोड़ आओ,’’ अंजलि के पापा की यह बात सही थी. दिनेश को अभी घर जाने के लिए कोई साधन न मिलता. अंजलि के मम्मीपापा के पैर छू कर दिनेश वहां से चला गया.

दिनेश के जाने के फौरन बाद अंजलि ने दिनेश का गिफ्ट खोल कर देखा. एकएक कर के उस ने फ्रैंडशिप के सारे स्लोगन पढ़ डाले. उस के चेहरे पर मुसकान तैर रही थी. उस के होंठ बुदबुदा उठे, ‘‘आई लव यू जान.’’ और उस ने उस डायरी को चूम लिया. अंजलि की मां दूर खड़ी यह सब देख रही थीं और मुसकरा रही थीं.

स्मिता ने भैया के कमरे की खिड़की के पास राजू के दिए उस पैकेट को रख दिया और साथ में एक लैटर जो उस ने खुद लिखा था, रख दिया. स्मिता ने उसी रात की तरह खिड़की को भी खोल दिया.

रात के तकरीबन एक बजे दिनेश अंजलि के यहां से आया और अपने कमरे में दाखिल हुआ. उस की मां प्रमिला देवी ने कहा, ‘‘बेटा, हाथमुंह धो ले, खाना ला रही हूं.’’

‘‘मां, थोड़ा सा ही खाना देना. मैं ने खाना खा रखा है. पर तेरे हाथ न खाऊं, तो पचता ही नहीं है.’’ ‘‘कहीं, खाना खा कर आया है क्या?’’

‘‘जी मां, एक दोस्त का जन्मदिन था,’’ कहने के साथ ही दिनेश ने अपने कमरे की लाइट जलाई. खिड़की खुली देख कर वह उसे बंद करने के लिए बढ़ा कि उस के पैर से कुछ टकराया. ‘यह कैसा पैकेट है,’ सोचते हुए जब उस ने पैकेट खोला, तो मारे हैरानी के उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. घर का सारा चोरी हुआ सामान पैकेट में उन 60 हजार रुपयों के साथ था.

दिनेश ने आवाज दी, ‘‘मांपापा इधर आओ. कमाल हो गया.’’ ‘‘क्या हुआ बेटा?’’ प्रमिला देवी ने पूछा.

‘‘अरे मां, आओ तो सही, स्मिता को भी ले आओ.’’ ‘‘क्या हुआ भैया?’’ ‘‘देखो, चोर ने हमारा सारा सामान वापस कर दिया है. और हां, एक चिट्ठी भी है,’’ दिनेश हड़बड़ाते हुए बोला. ‘‘क्या लिखा है इस में?’’ यह रामदीन की आवाज थी.

‘‘पापा, लिखा है कि मैं एक पेशेवर चोर हूं, पर कुछ वजह से मैं अपने पुश्तैनी धंधे से संन्यास ले रहा हूं. अब सारा चोरी किया माल तो वापस नहीं कर सकता, पर कुछ लोगों को तो कर ही सकता हूं और उन कुछ लोगोें में से एक आप भी हैं. मु झे माफ कर दीजिएगा और मेरे अच्छा आदमी बनने और उस पर खरा उतरने के लिए दुआ कीजिएगा. एक शराफत भरी जिंदगी की तलाश में… आप का, शुभचिंतक चोर.’’

‘‘अरे वाह, यह तो बड़ा फिल्मी स्टाइल हो गया,’’ स्मिता हंस पड़ी. ‘‘चलो, कुछ भी हो बेटी, जिस खिड़की से मेरा सारा सामान गया था, उसी से वापस आ गया,’’ रामदीन ने राहत की सांस ली.

‘‘चलो, सब आराम करो. जो हुआ अच्छा हुआ. बेटा, तू खाना खा ले.’’ ‘‘ला मां, आज तो गले तक खाऊंगा,’’ दिनेश ने मजाक किया.

दिनेश खाना खा रहा था कि तभी उस के दिमाग में पापा का कहा आखिरी वाक्य याद आया, ‘चलो, जिस खिड़की से सामान गया था, उसी से वापस आ गया.’

दिनेश ने दिमाग पर जोर डाला कि जब से इस खिड़की से चोरी हुई थी, सभी लोग इसे बंद रखते थे. यह खिड़की सिर्फ अंदर से ही बंद हो सकती थी. आज सुबह भी यह खिड़की अंदर से बंद थी.

दिनेश को भरोसा हो गया कि खिड़की घर मेें से ही किसी ने खोली है. पर किस ने? उस ने लपक कर चिट्ठी उठा ली, जो कथित रूप से चोर ने लिखी थी. वह उस पर लिखी लिखावट को पहचानने लगा, पर वह किसी से मेल नहीं खा रही थी. किसी ने बड़ी सम झदारी से लिखा था. फिर दिनेश ने गौर किया कि पैन की स्याही हर 2-3 शब्दों के बाद वह थोड़ी गाढ़ी हो जाती है. दिनेश खाने को एक तरफ रख उठ खड़ा हुआ. सभी लोग सो रहे थे. उस ने पापा की जेब से उस का पैन निकला, कागज पर कुछ लाइनें लिखीं, पर इस में वह बात नहीं थी. फिर वह दबे पांव स्मिता के कमरे में गया. उस के पढ़ने वाली टेबिल पर एक पैन रखा था, दिनेश ने उस से भी कागज पर लिखना शुरू किया. उस की आंखें फैलती चली गईं.

‘स्मिता, पर क्यों…’ उस ने कमरे में सो रही स्मिता की ओर देखा. दिनेश ने स्मिता के कंधे को  झक झोर कर जगाया और बोला, ‘‘स्मिता, बाहर गलियारे में आओ.’’

‘‘क्या हुआ भैया?’’ स्मिता ने डरते हुए पूछा. ‘‘बाहर चलो…’’ दिनेश ने आदेश भरी आवाज में कहा.

स्मिता ने दिनेश की तरफ देखा और उस के पीछे हो ली, घर के बाकी सदस्य सो रहे थे. स्मिता ने देखा कि दिनेश उसे खा जाने वाली नजरों से देख रहा था.

दिनेश ने स्मिता से पूछा, ‘‘तुम्हारे पास यह पैकेट कहां से आया?’’ ‘‘जी, कौन सा पैकेट?’’ ‘‘अभी खींच कर एक थप्पड़ दूंगा. सचसच बताओ…’’

स्मिता ने हिचकिचाते हुए सारी बातें बता दीं, पर इस बार भी उस ने अपनी बुराइयों पर परदा डाल दिया. दिनेश उस की कहानी से संतुष्ट नहीं हो पाया था.

गोयल साहब ने देखा कि दिनेश आ रहा है. ‘‘आओ दिनेश, आज इतनी सुबहसुबह कैसे?’’ ‘‘सर, आप से मिलने आया था.’’ ‘‘हां, बोलो.’’ ‘‘सर, ये आप के 60 हजार रुपए. वो चोर बहुत ईमानदार निकला. उसी ने लौटाए हैं.’’ ‘‘क्या…’’

‘‘हां सर, मैं भी हैरान हूं,’’ दिनेश ने मुसकराते हुए कहा. ‘‘प्रिया बेटी, जरा चाय वगैरह ले आना.’’ ‘‘नहीं सर…’’ दिनेश ने मना किया.

प्रिया रसोई की तरफ जा रही थी. उस ने देखा कि मधु टकटकी बांधें खिड़की की ओट से दिनेश को ही देख कर रही है. वह तकरीबन सम्मोहित सी थी.

प्रिया कुछ देर यों ही मधु को देखती रही और फिर मुसकराते हुए रसोई की ओर बढ़ गई.

प्रिया जब चाय दे रही थी, तब उस ने भी दिनेश को गौर से देखा. तकरीबन 6 फुट लंबाई वाला दिनेश एक अच्छी शख्सियत का मालिक था. वह किसी तरह का नशा भी नहीं करता था. मेहनतकश और शराफत में भी कोई उस का सानी नहीं था. दीदी की पसंद पर नाज कर के प्रिया मुसकरा उठी. दिनेश के जाने के लिए उठने पर प्रिया फौरन दीदी के पास पहुंच गई.

‘‘हैलो दीदी, क्या नैनमटक्का हो रहा है,’’ प्रिया ने मजाक करते हुए कहा. ‘‘नहीं तो, कुछ भी नहीं…’’ मधु, जो दिनेश को जाते हुए देख रही थी, हड़बड़ा कर बोली.

‘‘बहुत पसंद करती हो दिनेशजी को… क्यों?’’ ‘‘मारूंगी तुम्हें अभी…’’ मधु शरमाते हुए बोली.

‘‘अच्छा, मैं ने सोचा कि तुम्हारा कोई चक्कर है,’’ प्रिया ने चुटकी ली. ‘‘क्या बकती है…’’ मधु ने तपाक से कहा.

‘‘अच्छा, मैं बकती हूं, यानी तुम्हें दिनेश से कोई मतलब नहीं. ठीक है, फिर मेरा रास्ता साफ है,’’ प्रिया ने कुटिल मुसकान के साथ कहा. ‘‘क्या मतलब है तेरा…’’ मधु ने प्रिया की तरफ देखा.

‘‘देखो दीदी, मैं भी 17 साल की हो गई हूं और दिनेश मु झे बहुत अच्छे लगते हैं. सोचती हूं कि उन्हें आई लव यू बोल ही दूं,’’ प्रिया ने बड़ी शराफत से कहा. ‘‘मैं तेरी नाक तोड़ दूंगी,’’ मधु ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा.

‘‘तो आप भी दिनेश से प्यार करती हैं?’’ प्रिया ने तुनकते हुए पूछा. ‘‘मैं भी से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ मधु ने थोड़ा चकित हो कर पूछा. ‘‘मतलब यह कि अव्वल तो मैं उन से प्यार करती हूं और मेरे बाद तुम…’’ प्रिया अपनी दीदी का दिल टटोल रही थी.

‘‘तुम उन के लिए क्या कर सकती हो?’’ अब की बार मधु ने प्रिया पर सवाल का वार किया. ‘‘जो वे बोलेंगे,’’ प्रिया ने नाटक किया.

‘‘और, मैं उन के लिए अपनी जान भी दे सकती हूं,’’ प्रिया को चुप होना लाजिमी था. मधु ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं उन से बहुत प्यार करती हूं और वे सिर्फ मेरे हैं. देखना, ग्रेजुएशन पूरी होते ही मैं उन से शादी करूंगी.’’

प्रिया मुसकरा कर बोली, ‘‘मेरी दुआएं आप के साथ हैं.’’ मधु भी प्यार भरी नजरों से प्रिया की तरफ देख कर मुसकरा रही थी, जो थोड़ी देर पहले तक प्रिया के नाटक को सच सम झ चुकी थी.

दिनेश कालेज में घुसा ही था कि एक लड़की ने उसे देख कर पूछा, ‘‘दिनेश, अंजलि को देखा है क्या?’’

‘‘नहीं, पर आप मु झ से क्यों पूछ रही हैं?’’ ‘‘लो, अब उस के बैस्ट फ्रैंड से नहीं पूछूंगी, तो किस से पूछूंगी.’’

दिनेश बैस्ट फ्रैंड शब्द सुन कर थोड़ा हैरान सा रह गया. ठीक उसी समय सामने से अंजलि आती दिखाई दी. दिनेश ने फौरन उस लड़की से मुखातिब हो कर कहा, ‘‘लीजिए, आप अंजलि को ढूंढ़ रही थीं, वह देखो सामने से आ रही है.’’

‘‘पर मैं चलती हूं. अभी वह आप से मिलने आ रही है,’’ उस लड़की ने शरारत भरे लहजे में कहा.

‘‘हाय दिनेश, गुड मौर्निंग,’’ अंजलि, जो अब तक उस के पास आ चुकी थी, मुसकरा कर बोली.

‘‘गुड मौर्निंग.’’ ‘‘अरे रेखा, कैसी हो?’’ ‘‘अच्छी हूं, आप लोग बात कीजिए, मैं बाद में मिलती हूं,’’ इतना कह कर रेखा वहां से चल पड़ी.

‘‘रेखा को कब से जानते हो?’’ अंजलि ने दिनेश से पूछा. ‘‘हम लोग बचपन से अच्छे फ्रैंड हैं,’’ दिनेश ने उसी अंदाज में जवाब दिया.

‘‘तुम ने कभी पहले नहीं बताया,’’ अंजलि थोड़ा निराश हो कर बोली. ‘‘आप ने कभी पूछा ही नहीं.’’

अंजलि को उदास होता देख दिनेश उसे सम झाते हुए बोला, ‘‘अरे यार, मैं उस को पिछले 5 मिनट से ही जानता हूं. तुम मेरी सब से अच्छी दोस्त हो और इतनी आसानी से कोई तुम्हारी जगह नहीं ले सकता.’’

‘‘अच्छा… हां, तुम्हारा गिफ्ट बहुत प्यारा था,’’ अंजलि काफी खुश हो कर बोली. ‘‘चलिए, इस गरीब का तोहफा आप को पसंद तो आया,’’ यों ही बात करते हुए दोनों क्लासरूम की तरफ बढ़े.

स्मिता ने आज एक फैसला लिया था. राजू उसे अच्छा लगा था और शायद राजू के लिए वह खुद को सुधारना चाहती थी. इसी सिलसिले में उस ने आज अमित को डांटा था और सारे संबंध खत्म करने के लिए कहा, तो अमित, जो थोड़ा डरपोक था, उस की बात मान गया. पर वह स्मिता के ऊपर आखिरी बार संबंध बनाने के लिए दबाव बना रहा था. यही सब सोचते हुए वह चली जा रही थी कि अचानक राजू आ गया.

‘‘कैसी हो स्मिता?’’ ‘‘अच्छी हूं.’’ ‘‘पर चेहरे से काफी परेशान दिख रही हो?’’ ‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है,’’ स्मिता ने अपनी परेशानी छिपाते हुए कहा.

‘‘आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं,’’ राजू ने स्मिता का हाथ पकड़ते हुए कहा. ‘‘कहां ले जा रहे हो?’’

‘‘आओ तो सही,’’ राजू ने बात को बीच में ही काटा. राजू बाग के बाहर एक नई चमचमाती कार के पास पहुंचा. ‘‘यह क्या है?’’

‘‘यह मेरी गाड़ी है. वैसे तो यह मैं ने अपने चोरी के रुपयों से ही खरीदी है, पर अब इस से जो कमाई आएगी, वह पूरी तरह से मेरी मेहनत की होगी.’’

स्मिता मंत्रमुग्ध सी देख रही थी. राजू ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘और अब तुम्हें एक कदम भी पैदल नहीं चलने दूंगा. कल से तुम्हें कालेज ले जाने और वापस ले जाने की जिम्मेदारी मेरी.’’

यह सुन कर स्मिता की आंखों में आंसू भर आए. स्मिता को भावुक होता देख राजू ने बात बदली और उसे गाड़ी में बिठाया. वह गाड़ी चला कर आगे बढ़ा. रास्ते में उस ने अपने बारे में काफीकुछ बताया. मांबाप उस की जिंदगी में नहीं थे. पेट के लिए और गलत संगत में पड़ कर वह एक माहिर चोर बन गया. उस ने स्मिता को उस के घर से थोड़ी दूर छोड़ दिया.

समय बीतता चला गया. तकरीबन 6 महीने और बीत गए. दिनेश, मधु और अंजलि की पढ़ाई अच्छी चल रही थी. मधु और दिनेश के बीच आकर्षण बढ़ता जा रहा था. दिनेश एक टीचर की मर्यादा का पालन करने में मधु से आज तक कुछ न कह पाया. कुछ यही हाल मधु का था. वह अपने दिल की बात कहने के लिए मौके का इंतजार कर रही थी. अंजलि तो दिनेश के लिए लगभग पागल सी थी. कालेज और कालेज के बाहर भी दोनों फ्री टाइम साथ में गुजारते थे. इधर, स्मिता और राजू दोनों मन ही मन एकदूसरे को प्यार करते थे.

आज का दिन बड़ा खास था. आज दिनेश, अंजलि और मधु का रिजल्ट आ रहा था. अंजलि दिनेश के घर आई.

‘‘अरे तुम…’’ दिनेश चौंकते हुए बोला. ‘‘मैं ने सोचा कि क्यों न हम रिजल्ट साथ में देखते हैं,’’ अंजलि ने जवाब दिया और बड़ी अदब से अंजलि ने प्रमिला और रामदीन के पैर छुए और स्मिता की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘हाय स्मिता, कैसी हो?’’

‘‘कमाल है, आप मेरा नाम भी जानती हैं.’’ ‘‘जी, मैं आप के परिवार के बारे में बहुतकुछ जानती हूं, मैं आप के भैया की बहुत अच्छी दोस्त हूं.’’

‘‘मु झे पूरा भरोसा है कि आप लोगों के नंबर बहुत अच्छे आएंगे,’’ स्मिता उन का उत्साह बढ़ाते हुए बोली. ‘‘अंकलजी, हम पास के ही किसी इंटरनैट से रिजल्ट देख कर आते हैं,’’ अंजलि ने रामदीन की ओर देख कर कहा.

‘‘हां बेटी,’’ रामदीन ने सहमति में सिर हिलाया. दिनेश और अंजलि कार में बैठ कर पास के साइबर कैफे की ओर रवाना हो गए. दोनों एक ही कंप्यूटर पर बैठे हुए थे. दिनेश ने फटाफट कालेज के रिजल्ट की साइट खोली और उस में पहले अंजलि का रोल नंबर डाला.

‘‘अरे, पहले तुम अपना रिजल्ट देखो.’’ ‘‘नो मैडम, लेडीज फर्स्ट.’’

अंजलि ने 70 फीसदी अंकों के साथ इम्तिहान पास किया था. अब बारी दिनेश के नंबरों की थी. उस के नंबरों को देखते ही दोनों उछल पड़े. दिनेश के 87 फीसदी अंक आया थे, और उस ने पूरे कालेज में टौप भी किया. कालेज के पिछले 15 सालों का रिकार्ड भी दिनेश के नंबरों के साथ टूट गया.

अंजलि ने मारे खुशी के दिनेश के दोनों गालों पर चुम्मा ले लिया. दिनेश यह देख हड़बड़ा गया. अंजलि को भी फौरन खयाल आया कि उस ने यह क्या कर दिया. ‘‘सौरी…’’ ‘‘नो प्रौबलम. चलो, एक खास रिजल्ट और देखना है… मधु का.’’

‘‘आज तो उस का भी रिजल्ट आ रहा है. मु झे मालूम ही नहीं था. आप ने उस के लिए भी बहुत मेहनत की है. एक तरह से यह आप का भी रिजल्ट होगा.’’ ‘‘बिलकुल सही कहा तुम ने.’’

मधु के नंबर स्क्रीन पर थे. फर्स्ट ईयर के मैथ के बैक पेपर में 65 फीसदी सेकंड ईयर वर्ष के मैथ में 60 फीसदी, फिजिक्स में 61 फीसदी और कैमिस्ट्री में 61 फीसदी.

‘‘मजा आ गया. अब से एक साल पहले अगर कोई टीचर मधु से मिलता, तो ऐसे नंबरों की भविष्यवाणी कभी नहीं कर सकता था. हमें अभी मधु के घर चलना होगा,’’ दिनेश ने कुरसी छोड़ते हुए कहा.

‘‘चलिए,’’ अंजलि और दिनेश अगले 10 मिनट में मधु के घर पर थे. गोयल साहब बाहर ही खड़े थे. लग रहा था कि जैसे उन्हें दिनेश का ही इंतजार था. अंजलि और दिनेश के नमस्ते का जवाब दे कर वे फौरन दिनेश से लिपट गए, ‘‘वाह बेटा, तुम ने कमाल कर दिया. मु झे नाज है तुम पर,’’ गोयल साहब खुश हो गए.

‘‘अंकल, यह कमाल मेरा नहीं, बल्कि मधु का है. मधु कहां है अंकल?’’ दिनेश ने बड़प्पन दिखाते हुए पूछा. ‘‘अंदर है, जाओ मिल लो. बेटी आप भी जाइए,’’ गोयल साहब अंजलि की ओर मुखातिब हो कर बोले. ‘‘नहीं अंकल, मैं यहीं ठीक हूं.’’

दिनेश अंदर चला गया. आसमान में घटाएं घिरी हुई थीं, उसी समय बादलों में कालापन और बढ़ गया. धीमीधीमी हवा बह रही थी. मौसम का तापमान नीचे गिर रहा था. लगता था, बादल कुछ ही देर में  झमा झम बरसेंगे. दिनेश ने मधु को देखा. वह अलग सी लग रही थी, बहुत खुश और बहुत प्यारी.

‘‘गुड, वैलडन, तुम ने कमाल कर दिया.’’ ‘‘सर, यह सब आप की मेहनत से हुआ है. मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘चलो, जो भी हो, लेकिन फाइनल ईयर में मु झे और भी अच्छे नंबर चाहिए.’’ ‘‘मिलेंग सर, आप को पार्टी देनी होगी.’’

‘‘वह क्यों?’’ ‘‘यह लीजिए, जनाब, आप इतने अच्छे नंबर लाए हैं कि इतिहास रच दिया है, इसलिए पार्टी चाहिए,’’ मधु ने नखरा दिखाते हुए घूरती नजरों से देखा.

‘‘जब कहोगी, तब मिलेगी,’’ तभी बाहर जोर की बिजली चमकी और बारिश शुरू हो गई. बारिश तेज थी. बारिश की बूंदों को आंगन में देखते ही मधु की आंखें चमक उठीं.

‘‘चलिए, आइए, बारिश में भीगते हैं,’’ मधु ने चंचलता से कहा. ‘‘नहीं, मैं नहीं…’’ दिनेश का कहना था कि मधु बारिश में भीगने जा चुकी थी और आंगन के बीच में खड़ी हो कर खुद को बारिश के पानी से भिगो रही थी.

अपना चेहरा आसमान की ओर कर के उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. बड़ी मासूम सी लगती थी वह. धीरेधीरे उस का सारा शरीर भीग रहा था और कपड़े भीग कर उस के शरीर के आकार को स्पष्ट कर रहे थे. बड़ी मोहनी सी लग रही थी वह और दिनेश जाने किन खयालों में खोया हुआ उसे टकटकी बांध कर देखे जा रहा था.

मधु की नजर भी दिनेश के चेहरे पर पड़ी. दिनेश को अपनी ओर देखता देख वह भी दिनेश की आंखों में खो गई. दोनों के दिलों में प्यार का सैलाब उमड़ रहा था, पर न जाने कौन सी ताकत थी, जो उन्हें रोके हुए थी.

मधु ने अपने दोनों हाथ फैलाए और दिनेश को पानी में आने का न्यौता दिया. दिनेश सुधबुध खोया सा भीगने के लिए पानी में पहुंच गया. कुछ ही देर में वह भी पानी में भीग चुका था और मधु के सामने खड़ा था.

मधु एक कदम आगे बढ़ी और बिना देरी किए दिनेश के होंठों को चूम लिया. दिनेश का सम्मोहन  झटके के साथ टूट गया. उसे लगा, जैसे उस के होंठों पर किसी ने सुलगते अंगारे रख दिए हों. मधु बड़ी मासुमियत से घुटनों पर बैठ गई.

‘‘दिनेश, मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकती हूं. क्या तुम मु झ से प्यार करते हो?’’ ‘‘मैं भी आप को बहुत पसंद करता हूं, पर आप हमारे रिश्ते को जानती हैं.’’ यह सुन कर मधु की आंखों में आंसू भर गए.

‘‘देखो, मैं इंतजार करूंगी और कुछ भी चोरीछिपे नहीं करूंगी. क्या तुम मेरा इंतजार करोगे?’’ इतना कह कर वह दिनेश की तरफ आशा भरी नजरों से देखने लगी.

दिनेश कुछ देर शांत रहा, फिर उस के मुंह से बोल फूट पड़े, ‘‘मैं तब तक तुम्हारा इंतजार कर सकता हूं, जब तक या तो तुम न मिल जाओ या तुम खुद न मना करो,’’ दिनेश जब आखिरी शब्द कह रहा था, उसी समय प्रिया वहां आ गई.

‘‘अरे, आग तो दोनों तरफ बराबर लगी हुई है.’’ ‘‘वो… वो…’’ दिनेश  झेंप गया. ‘‘दीदी, तुम ने मेरा पत्ता काट दिया,’’ प्रिया ने मजाक किया. ‘‘हां, तेरा पत्ता कट गया,’’ कहने के साथ ही मधु हंस पड़ी.

‘‘चलो, अब दोनों भीगते ही रहोगे या अंदर भी आओगे,’’ प्रिया ने कहा. ‘‘नहीं, अभी मत जाना. थोड़ी देर मेरे सामने यों ही खड़े रहो,’’ मधु की आवाज में मादकता थी. ‘‘अरे बाबा, अब आ भी जाओ. पापा आ जाएंगे,’’ प्रिया ने सम झदारी दिखाई.

दिनेश बारिश से हटते हुए बोला, ‘‘देखो मधु, मैं ने तुम्हारी जिम्मेदारी ली है. आप के पापा को आप से बहुत उम्मीदें हैं और मु झ पर बहुत भरोसा है. मैं उसे तोड़ नहीं सकता…’’

मधु बीच में बोली, ‘‘मैं सम झी नहीं.’’ प्रिया इन बातों को ध्यान से सुन रही थी.

‘‘जब तक आप की ग्रेजुएशन पूरी नहीं हो जाती, मैं तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारा टीचर और तुम मेरे लिए सिर्फ स्टूडैंट हो,’’ दिनेश गंभीर हो कर बोला.

‘‘ठीक है, पर उस के बाद तो आप पापा से बात करेंगे न?’’ मधु ने प्यार से पूछा. ‘‘हां, जरूर बात करूंगा,’’ दिनेश ने आश्वासन दिया. ‘‘कसम से.’’ ‘‘हां, कसम से.’’ ‘‘हैलो लैलामजनूं, अब चलो भी,’’ प्रिया ने फिर मस्ती की.

बारिश के धीमे होते ही स्मिता मिठाई लाने के लिए घर से निकल पड़ी. रामदीन को भरोसा था कि दिनेश शानदार नंबर लाएगा, इसलिए बिना रिजल्ट देखे ही उस ने स्मिता को मिठाई लाने के लिए भेज दिया.

स्मिता घर से थोड़ी दूर ही गई थी कि एक कार आ कर बगल में रुकी. बिजली की फुरती से राजू ड्राइविंग सीट से उतर कर दूसरी तरफ का दरवाजा खोल कर बोला, ‘‘स्मिताजी, बैठिए. बताइए, आप को कहां जाना है?’’

स्मिता को देखते ही राजू खुश हो जाता था. मौसम ऐसा था कि स्मिता का दिल भी राजू से लिपटने को कर रहा था. पर हाय रे मजबूरी, जिस को इतना चाहती थी, उस से प्यार का इजहार भी नहीं कर सकती.

‘‘कहां खो गईं? बैठिए न,’’ राजू ने स्मिता की सोच के तार को तोड़ते हुए कहा. ‘‘सौरी,’’ कह कर स्मिता गाड़ी में बैठ गई.

स्मिता 4 किलो लड्डू ले कर वापस आई और राजू की गाड़ी में बैठ कर वापस चल दी. राजू चोरीचोरी स्मिता को निहार रहा था. स्मिता का भी कुछ यही हाल था. एक बार अचानक दोनों की नजरें टकरा गईं और दोनों सकपका गए. आगे स्मिता ने ध्यान दिया कि राजू चोरी से उसे देख तो रहा था. घर से कुछ ही दूर स्मिता गाड़ी से उतर गई. राजू देर तक उसे मुसकराते हुए देखता रहा और फिर वापस चल दिया.

स्मिता आगे बढ़ी तो उसे सरोज दिखा. वह घबरा गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो राजू जा चुका था. सरोज उसी की तरफ आ रहा था.

‘‘क्या मजाक है,’’ सरोज ने कहा. ‘‘तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो?’’ स्मिता गुस्से में बोली.

‘‘देख, ज्यादा सतीसावित्री बनने की कोशिश मत कर.’’ ‘‘देखो, प्लीज मु झे परेशान मत करो.’’

‘‘मैं अमित से मिला था. उस के पास तुम्हारे कुछ फोटो भी हैं.’’ ‘‘क्या…?’’

‘‘वह तो डरपोक है, पर मैं जरूर तुम्हें फंसा दूंगा.’’ ‘‘क्या बकवास करते हो?’’

‘‘बकवास नहीं, सच बोल रहा हूं,’’ सरोज की आंखों में चमक थी. स्मिता कुछ बोल नहीं पाई. सरोज ने मौके को ताड़ा और आगे कहा, ‘‘देखो, तुम्हें फोटो और नेगेटिव दोनों मिल जाएंगे, बस एक बार…’’ ‘‘नहीं,’’ स्मिता सहमी सी बोली.

‘‘आज मौसम बहुत सुहावना है. हलकीहलकी बारिश भी है. बाग वाली  झाड़ी में आ जाओ. मैं और अमित वहीं पर तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. तुम अगर नहीं आई तो तुम्हारा क्या होगा, यह तुम अच्छी तरह जानती हो,’’ इतना कह कर सरोज चलता बना. स्मिता भी धीमेधीमे कदमों से घर की तरफ बढ़ी.

मधु के घर से निकल कर अंजलि और दिनेश घर जाने के लिए चल पड़े. रास्ते में अंजलि ने गाड़ी दूसरी तरफ मोड़ दी. दिनेश बोल पड़ा, ‘‘क्या हुआ… इधर कहां?’’

‘‘सामने वाले बाग में…’’ ‘‘क्यों?’’ दिनेश थोड़ा सोच कर बोला. ‘‘मौसम कितना सुहावना है. पार्क में बहुत अच्छा लगेगा,’’ अंजलि बोली.

‘‘अरे यार, बारिश हो रही है,’’ दिनेश ने कहा. ‘‘तुम भी तो पूरा भीगे हुए हो. मु झे भी थोड़ा भीगना है.’’

‘‘सभी एकजैसी हैं…’’ दिनेश मधु के बारे में सोचते हुए बोला. ‘‘क्या कहा?’’ अंजलि सम झ नहीं पाई.

‘‘कुछ नहीं,’’ तब तक कार पार्क के सामने खड़ी थी. पार्क के अंदर पहुंच कर अंजलि ने बैठने की जगह खोजते हुए कहा, ‘‘चलो, उस पत्थर पर बैठते हैं.’’ ‘‘चलो.’’

अंजलि आज इस रिम िझम बारिश में अपने प्यार का इजहार करना चाहती थी, पर वह डर रही थी. फिर भी वह बड़ी हिम्मत कर के बोली, ‘‘दिनेश, मु झे तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘बोलो, म झे तो ठंड लग रही है.’’ ‘‘आई लव यू.’’ ‘‘क्या…’’ दिनेश का दिमाग चकरा गया. ‘‘मैं तुम से प्यार करती हूं.’’ दिनेश चुप रहा, अंजलि फिर बोली, ‘‘तुम मेरी बात सुन रहे हो कि नहीं?’’

‘‘सुन रहा हूं.’’ ‘‘तो जवाब दो कि तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो?’’ ‘‘मैं तुम से प्यार नहीं करता.’’ ‘‘तुम ऐसे नहीं कह सकते,’’ अंजलि की आवाज डूबने लगी.

‘‘मैं मधु से प्यार करता हूं. वह भी मु झ से प्यार करती है. पढ़ाई खत्म होने के बाद हम शादी कर लेंगे. मैं और आप सिर्फ अच्छे दोस्त रह सकते हैं,’’ दिनेश एक सांस में ही सारी बात कह गया.

अंजलि के सारे सपने टूट गए, फिर भी कुछ सोच कर वह बोली, ‘‘ठीक है, तुम मु झ से प्यार नहीं करते, मैं तुम से प्यार करती हूं और करती रहूंगी. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी. अपनी जिंदगी को इस हद तक खाली कर दूंगी कि तुम इस खालीपन को भरने जरूर आओगे,’’ इतना कहने के साथ ही उस की आवाज बैठ गई. दोनों के बीच गहरी खामोशी छा गई.

सरोज के पिता शर्माजी और पड़ोस के गुप्ताजी शायद इस मौसम का मजा लेने के लिए बाग में आने वाले तीसरे और चौथे शख्स थे. उसी बाग में गुमसुम दिनेश और अंजलि भी बैठे थे. शर्माजी और गुप्ताजी इधरउधर की बातें करते हुए बाग के किनारेकिनारे चले जा रहे थे. चलतेचलते शर्माजी ने  झाडि़यों पर नजर डाल कर कहा, ‘‘लगता है, उधर कोई जानवर है.’’

‘‘सांप भी हो सकता है,’’ गुप्ताजी ने कहा. ‘‘मु झे तो कुत्ता वगैरह लगता है,’’ शर्माजी बोले.

‘‘आप की सोच गलत है… वह सांप ही होगा.’’ ‘‘क्या बात करते हैं…’’ शर्माजी की आवाज में जिद का भाव था.

‘‘लगी शर्त…’’ गुप्ताजी ताव में आ गए. ‘‘लगी… लेकिन धीरेधीरे पैर दबा कर आएं, नहीं तो कुत्ता भाग भी सकता है,’’ शर्माजी ने सलाह दी.

और दोनों दबे पांव  झाड़ी के उस तरफ चल पड़े, जिधर हलचल थी. वहां पहुंचते ही शर्माजी के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं. गुप्ताजी ने शर्म से आंखें नींचे कर लीं. इन  झाडि़यों के पीछे शर्माजी ने देखा कि उन का लड़का सरोज, पड़ोस का लड़का अमित और रामदीन की बेटी स्मिता थे. सरोज और अमित की हालत भी खराब हो गई. स्मिता सूखे पत्ते की तरह कांप रही थी. उन्होंने जल्दीजल्दी कपड़े समेटे.

शर्माजी गुस्से के मारे थरथर कांप रहे थे. उन्होेंन सरोज को कौलर पकड़ कर  झाड़ी से बाहर निकाला और बेतहाशा मारना शुरू किया. शुरू में तो सरोज चुपचाप बरदाश्त करता रहा, पर बाद में जब ज्यादा चोट लगने लगी, तो उस ने रोना शुरू कर दिया.

दिनेश और अंजलि, जो खामोशी के आगोश में थे, रोने की आवाज सुन कर तुरंत उस तरफ दौड़ पड़े.

दिनेश को वहां पहुंचता देख शर्माजी आगबबूला हो गए और सरोज को छोड़ वे दिनेश से मुखातिब हुए, ‘‘अपनी घटिया बहिन को काबू में रख…’’

दिनेश ने शर्मा का कालर पकड़ लिया, ‘‘क्या बोला…’’ ‘‘बदजात महल्ले के लड़कों के साथ रंगरलियां मनाती फिरती है.’’

दिनेश को मामला कुछकुछ सम झ में आ रहा था. उस ने स्मिता की ओर देखा. वह चुप थी और उस की आंखों से आंसू गिर रहे थे.

‘‘हां पापा, यह रोज गंदेगंदे इशारे करती थी. मु झ से भी गलती हो गई,’’ सरोज ने भी मौके का फायदा उठाया.

दिनेश को जितना सम झ में आया, उस के आने वाले अंजाम से डर गया. वह घिघियाते हुए बोला, ‘‘देखिए, यह बहिन है मेरी. इस की जिंदगी खराब हो जाएगी. प्लीज, मेरी आप से प्रार्थना…’’

शर्माजी ने बात को बीच में काटते हुए कहा, ‘‘नहीं, तुम ने अभी मेरा कौलर पकड़ा था न, अब तमाशा देख,’’ इतना कहते ही वह सरोज को घसीटते हुए कालोनी की तरफ बढ़ा.

अंजलि ने बड़ी मुश्किल से सहारा दे कर दिनेश और स्मिता को कार में बिठाया और उस ने भी रामदीन के घर का रुख किया.

वही हुआ, जिस का डर था. शर्माजी ने अपने लड़के को बेकुसूर साबित करने के लिए पूरी कालोनी के सामने चीखचीख कर स्मिता को बदलचन साबित कर दिया.

अंजलि, स्मिता और दिनेश चुपचाप खड़े हो कर तमाशा देख रहे थे. कुछ मिनटों में कुछ लोगों ने स्मिता की ओर देख कर थूक भी दिया.

बारिश थम चुकी थी, धूप भी खिल कर निकल आई थी. रामदीन का पूरा परिवार गुमसुम बैठा था. धीरेधीरे सारी भीड़ छंट गई. सभी के जाने के बाद रामदीन घर के अंदर जा कर मिठाई के वे पैकेट ले आया, जो कुछ घंटे पहले स्मिता ले कर आई थी.

रामदीन अंजलि की ओर देख कर बोला ‘‘बेटी, अरे नहीं, अब तो मैं किसी को बेटी कहने के लायक भी नहीं बचा हूं.’’

‘‘जी अंकल, कहिए…’’ ‘‘अंजलि, मिठाई के ये डब्बे घर जाते समय रास्ते में कहीं फेंक देना?’’ ‘‘पर अंकल…’’

‘‘बहुत देर हो गई है, तुम घर जाओ,’’ कह कर रामदीन ने मिठाई के डब्बे अंजलि को पकड़ा दिए. अंजलि को कुछ सम झ में नहीं आया और वह वहां से चली गई.

रामदीन ने स्मिता की तरफ देखा, जिस की आंखें रोतेरोते सूज गई थीं. रामदीन बोला, ‘‘देखो स्मिता, मैं जो कह रहा हूं, उसे ध्यान से सुनना,’’ स्मिता समेत सभी का ध्यान रामदीन की ओर गया.

रामदीन ने कहना शुरू किया, ‘‘तुम मेरे घर से निकल जाओ, तुम कहां जाओगी, क्या करोगी, इस से मु झे कोई मतलब नहीं है. बेहतर यह होगा कि तुम जा कर किसी कोठे पर बैठ जाओ.’’ ‘‘पापा…’’ दिनेश के दिल में टीस सी उठी.

‘‘कोई बीच में नहीं बोलेगा. हां, तो मैं कह रहा था कि तुम्हारा कोठे पर बैठना अच्छा रहेगा, क्योंकि इस से तुम्हारा पेट भी पल जाएगा. पर ऐसा करने से पहले तू यह शहर छोड़ देना. हम सब का प्यार पा कर तू ने घर की इज्जत खूब बढ़ाई है, अब इसे में और बरकत मत देना.

‘‘एक और रास्ता है, खुदखुशी कर लेना. पर वह तेरे बस की बात नहीं है. सब से अहम बात, तेरे घर से जाने के बाद मेरा दिल कभी पसीजेगा, यह उम्मीद छोड़ देना. इस परिवार का कोई सदस्य अगर तुम से मिलने या ढूंढ़ने की कोशिश करेगा, तो मेरा मरा मुंह देखेगा. अगले 10 मिनट तक कोई कुछ नहीं बोलेगा.’’

रामदीन स्मिता के पास गया. पहले उस के सिर पर प्यार भरा हाथ फेरा, फिर अगले ही पल उस ने स्मिता की कलाई पकड़ी और उसे तकरीबन घसीटते हुए दरवाजे पर ले गया.

स्मिता के चेहरे पर दर्द के ऐसे भाव थे कि कोई भी रो पड़ता. स्मिता घर की चौखट को पकड़ कर कुछ यों संघर्ष कर रही थी, जैसे कह रही थी कि मु झे माफ कर दो. मु झे अपने से अलग मत करो. पर रामदीन एक बेरहम इनसान की तरह उसे धक्का देने में कामयाब रहा, स्मिता के हाथ से दरवाजे की पकड़ छूट गई, और वह दूर जा कर गिरी. रामदीन के घर का दरवाजा स्मिता के लिए हमेशाहमेशा के लिए बंद हो गया.

लुटीपिटी स्मिता न जाने किधर जा रही थी, उसे खुद नहीं मालूम. आखिर पापा ने शहर छोड़ने के लिए कहा था.

दिनेश घर से बाहर निकला, तो रामदीन ने खास हिदायत दी कि वह स्मिता को खोजने की कोशिश न करे. दिनेश काफी परेशान था. उसे लगा कि शायद मधु से मिलने पर उसे थोड़ी राहत मिलेगी. वह गोयल साहब के घर पहुंचा. गोयल साहब बाहर ही मिल गए.

‘‘यहीं रुको,’’ गोयल साहब बोले. ‘‘जी, मैं कुछ सम झा नहीं,’’ दिनेश ने कहा.

‘‘मैं अभी आया.’’ थोड़ी देर बाद गोयल साहब वापस आए और कुछ रुपए दिनेश की तरफ बढ़ाए.

‘‘यह क्या है सर?’’ ‘‘ये 55 सौ रुपए हैं, तुम ने माधुरी का 11 महीने पढ़ाया था, उस की फीस.’’

‘‘पर सर, इस की क्या जरूरत…’’ ‘‘जरूरत है, अब तुम जा सकते हो.’’

‘‘सर, मैं अभी से मधु को फाइनल ईयर के लिए…’’ ‘‘पर, अब तुम्हें यहां आने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘पर क्यों?’’ ‘‘देखो, मैं 2 बेटियों का बाप हूं, तुम्हारे यहां आने से वे बदनाम हो जाएंगी.’’

‘‘यह क्या तमाशा है,’’ अब की बार दिनेश की आवाज में गुस्सा था. ‘‘देखो, मु झे सबकुछ पता चल चुका है. तमाशा तुम कर रहे हो.’’

‘‘सर, मैं मधु से प्यार करता हूं. आप ऐसा नहीं कर सकते,’’ दिनेश का इतना बोलना था कि गोयल साहब ने उसे एक थप्पड़ रसीद कर दिया. मधु, जो अब तक परदे के पीछे खड़ी हो कर सबकुछ सुन रही थी, वह गुस्से में दनदनाते हुए बाहर निकली, ‘‘पापा, यह क्या बात हुई?’’

‘‘मधु तुम अंदर जाओ.’’ ‘‘पापा, मैं दिनेश से प्यार करती हूं.’’

अब की बार का थप्पड़ माधुरी को लगा था, जो इस के साथ ही सहम गई थी. दिनेश भावुक हो गया और बोला, ‘‘मधु या तो मेरे पास चले आना या मना कर देना, अपने वाले के मुताबिक मैं इंतजार करूंगा. और हां, फाइनल ईयर में शानदार रिजल्ट चाहिए मु झे,’’ दिनेश ने गोयल साब की ओर देख कहा, ‘‘सर, आप की वजह से मेरा एडमिशन हो पाया था, मैं ने इस एहसान को उतारने के लिए जीजान से मेहनत की, पर आज आप ने रहीसही कसर पूरी कर दी.’’

‘‘गेट आउट,’’ गोयल की आवाज में रोब था. दिनेश निराश सा वापस जा रहा था. सहारे की तलाश में दिनेश यहां आया था और खुद रुसवा हो कर जा रहा था.

स्मिता बेहोश हो कर गिर पड़ी. पिछले 6 घंटों से वह लगातार चल रही थी. शाम को राजू को सारी घटना एक पान वाले से पता चली थी. वह स्मिता को ढूंढ़ने चल दिया. स्मिता बेहोश पड़ी थी और 3-4 लोग उसे घेरे सोच रहे थे कि इस का क्या किया जाए, अस्पताल ले जाना जरूरी है, पर यह जिम्मेदारी उठाए कौन. तभी वहां राजू पहुंच गया.

स्मिता की हालत देख कर राजू की आंखें भर आईं. उस का इलाज करा कर वह उसे अपने घर ले आया. थोड़ी देर बाद स्मिता को होश आया.

‘‘राजू…’’ ‘‘हां, चुपचाप लेटी रहो, उठने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘मैं कहां हूं?’’ स्मिता ने घर को देख कर कहा. ‘‘यह मेरा घर है… यह हमारा घर है…’’

‘‘नहीं राजू, मैं इस घर में रहने लायक…’’ ‘‘चुप, अब जरा भी बोली, तो जीभ काट लूंगा,’’ राजू ने स्मिता को हंसाने की कोशिश की.

‘‘मैं तुम्हें अपने बारे में सबकुछ बताना चाहती हूं,’’ स्मिता ने राजू की तरफ देखते हुए कहा. ‘‘अभी नहीं, बाद में.’’

‘‘नहीं राजू, अभी सुनो.’’ स्मिता ने अपनी जिंदगी के एकएक पन्ने राजू के सामने खोल कर रख दिए.

‘‘मु झ इस शहर से बाहर जाना है,’’ स्मिता की कहानी का आखिरी वाक्य था.

‘‘ठीक है, कल मैं बैंक में जो थोड़ाबहुत पैसा जमा है, निकाल लेता हूं.’’ ‘‘किसलिए?’’ स्मिता ने टोका.

‘‘अरे यार, उस के बाद कुछ सामान बेचना होगा, और सब हिसाबकिताब भी रफादफा करना होगा,’’ ठीक उसी समय स्मिता ने राजू की बात काटी, ‘‘शहर मु झे छोड़ कर जाना है, तुम्हें नहीं.’’

‘‘बनारस में मेरे कुछ जानने वाले हैं. वहां जिंदगी आराम से कट जाएगी. अगर कल निकलना है तो, काम अभी से शुरू करना होगा.’’ स्मिता इस बार थोड़ा गुस्से में बोली, ‘‘तुम क्यों महात्मा बनने की कोशिश कर रहे हो, तुम ने मेरी जान बचाई….शुक्रिया, अब जाने दो.’’

‘‘अब तुम मेरे साथ ही रहोगी,’’ राजू बोला. ‘‘क्यों?’’ स्मिता बोली.

‘‘क्योंकि मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम से शादी करना चाहता हूं. तुम्हें कोई तकलीफ नहीं दे सकता हूं,’’ राजू हिचकिचाते हुए बोला.

‘‘राजू, तुम मेरे बारे में सबकुछ जानते हो, मैं तुम्हारे लायक…’’ ‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो या नहीं?’’ राजू ने स्मिता का सिर अपनी गोद में रखते हुए पूछा.

‘‘मैं तुम्हारी जिंदगी नरक नहीं बनाना चाहती,’’ स्मिता की आवाज सिसक रही थी. ‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो कि नहीं?’’ राजू ने अपना सवाल फिर से दोहराया. ‘‘बाद में… तुम्हें…’’ पर स्मिता बोल नहीं पाई.

‘‘तुम मु झ से प्यार करती हो…’’ राजू ने इतना कहा ही था कि स्मिता राजू से लिपटते हुए बोली, ‘‘मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं. अपनी जान से भी ज्यादा चाहती हूं तुम्हें.’’

‘‘देखो, जो बीत गया वो बीत गया. मैं चोर था या तुम से कुछ गलतियां हुईं. हम एक शराफत और मेहनत की जिंदगी शुरू करेंगे. भागना क्यों है, मुकाबला करेंगे. आओ, मेरी गोद में सिर रख कर सो जाओ. कल सुबह बनारस जाने की तैयारी भी तो करनी है.’’

एक साल बीत गया. इस बीच रामदीन और प्रमिला दोनों पूरी तरह से स्मिता को भूल गए थे और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में लगे थे. आज फिर रिजल्ट आया, पर इस बार दिनेश ने कोई रिकार्ड वगैरह ब्रेक नहीं किया, पर अभी भी उस के नंबर सब से ज्यादा थे.

दिनेश का यह साल गुमसुम सा निकल गया. वह अपनेआप में खोया रहने वाला एक लड़का बन गया था. अंजलि और मधु दोनों उस की जिंदगी में नहीं थीं. मन बेचारा मानता ही नहीं था. दिनेश ने कई बार गोयल साहब को सम झाने की कोशिश की, पर बदले में जिल्लत के सिवाय कुछ नहीं मिला. अब मधु भी काफी कमजोर दिखाई देती थी.

स्मिता खुश थी. वह एक आदर्श बीवी की भूमिका बखूबी निभा रही थी. बनारस आने के 2 दिनों बाद ही राजू और स्मिता एकदूसरे के हो गए थे. स्मिता के दिमाग में बस यही चलता रहता कि कैसे वह राजू के लिए अच्छा कर सकती है.

यही हाल राजू का था. वह स्मिता को दुनिया की तमाम खुशियां देना चाहता था. अब उस के पास 2 गाडि़यां थीं. एक गाड़ी वह खुद चलाता था, दूसरी गाड़ी उस ने भाड़े पर दे रखी थी.

सरोज और अमित ने सारे उलटेसीधे काम बंद कर दिए थे, वैसे अभी भी शर्मा और रामदीन में बोलचाल नहीं थी.

मधु ने कई बार अपने पापा को सम झाने की कोशिश की, पर कोई असर नहीं पड़ा. मधु को गोयल साहब से काफी खरीखोटी सुननी पड़ती थी. मधु हमेशा मायूस रहती थी, प्रिया भी उस की हालत देख कर रो पड़ती थी. इस बार मधु सभी सबजैक्टों में फेल थी.

अंजलि की जितनी तारीफ की जाए, कम है. उस ने पिछले एक साल में एक सच्चे दोस्त का फर्ज अच्छी तरह से निभाया. दिनेश को जब सब से ज्यादा किसी की जरूरत थी, तब अंजलि उस के साथ थी. उस ने अपने असफल प्यार के बारे में अपने मम्मीपापा को सबकुछ बता रखा था.

आज फिर अंजलि ने गाड़ी का रुख उसी बाग की ओर कर दिया. दिनेश ने पूछा, ‘‘उधर क्यों जा रही हो?’’

‘‘मु झे तुम से कुछ बात करनी है,’’ अंजलि ने कहा. ‘‘ठीक है, चलो.’’

दरअसल, अब दिनेश का अंजलि के प्रति रवैया बहुत बदल गया था. उसे मालूम था कि आज की तारीख में अगर कोई उस की रगरग से वाकिफ है, तो वह अंजलि ही है.

‘‘बैठो, यह वही पत्थर है.’’ ‘‘पहचान रहा हूं.’’

‘‘मैं आज फिर वही फरियाद ले कर आई हूं, दिनेश. मैं कम से कम तुम्हारी जिंदगी में इतनी अहमियत तो जरूर रखती हूं कि मेरे बिना…’’ अंजलि की बातों का सिलसिला दिनेश ने तोड़ा.

‘‘मैं जानता हूं अंजलि. तुम कहती हो कि मेरे बिना फर्क नहीं पड़ेगा, तुम्हारे बगैर शायद मैं आगे की जिंदगी भी न काट पाऊं, पर…’’ दिनेश के सामने मधु का चेहरा घूमने लगा.

‘‘मैं तुम्हारा प्यार नहीं छीनना चाहती, पर अगर यह वाकई सच्चा प्यार था, तो उस ने तुम्हें रुसवा होने के लिए क्यों छोड़ दिया? उसे तुम्हारे पास आना था, फिर देखते, कैसे लड़ते दुनिया से तुम. मैं देती तुम्हारा साथ.’’

‘‘पर सिर्फ वही एक वजह नहीं है. अंजलि, मैं और तुम ठीक उसी तरह से हैं, जैसे  झोंपड़ी और महल. इस का फर्क एक खाई की तरह है, जिस को मैं पाट नहीं पाऊंगा.’’

‘‘अपने दिल से पूछ कर देखो कि इन पिछले 2 सालों में तुम ने कभी महसूस किया हो हमारे बीच में एक खाई है?’’ अंजलि की बात सुन कर दिनेश वाकई लाजवाब हो चुका था.

‘‘आई लव यू दिनेश, तुम ने बहुत रुसवाई देखी है. मु झे रुसवा मत करना.’’

दिनेश कुछ देर चुप रहा, चेहरे पर कई भाव आए और गए. फिर दोनों हाथ फैला कर बोले, ‘‘मेरी होने वाली बीवी मु झ से इतनी दूर क्यों है?’’

कुछ दिनों में ही अंजलि और दिनेश की शादी तय हो गई. शादी की सारी तैयारियां हो गई थीं.

आज शाम को ही दिनेश और अंजलि की शादी थी. दिन के तकरीबन एक बजे अंजलि अपने पापा के पास गई.

‘‘पापा, एक बहुत ही जरूरी काम है. मु झे बाहर जाना है.’’ ‘‘कहां बेटी? तेरी शादी है आज,’’ अंजलि के पापा कोमल सिंह ने सम झाते हुए कहा.

‘‘पापा प्लीज.’’ ‘‘ठीक है, संभाल कर. जल्दी आना.’’ ‘‘जी, पापा.’’

अंजलि ने काफी पूछताछ करने के बाद पता कर लिया था कि स्मिता और राजू बनारस में रहते हैं. बनारस में उन का पता भी राजू के दोस्त से चल गया था. उस दोस्त ने ही बताया था कि दोनों ने शादी कर ली है और स्मिता पेट से है.

अंजलि चाहती थी कि स्मिता को उस के परिवार का प्यार वापस किया जाए. क्योंकि यह दिनेश की सब से बड़ी इच्छा थी, पर वह पिता को दिए वादे की वजह से मजबूर था. अंजलि बनारस के लिए निकल चुकी थी.

राजू टैक्सी स्टैंड पर अपनी गाड़ी मैं बैठा था. उसी समय एक लड़की सब से नजरें छुपाती उस की कार का दरवाजा खोल कर पीछे बैठ गई. वह मधु थी. गोयल साहब ने अपना ट्रांसफर बनारस करवा लिया था. आज मधु और प्रिया में काफी बहस हुई थी. देखते ही देखते मधु के दिमाग में चल रहे कई दिनों की लड़ाई ने एक फैसले का रूप ले लिया. मधु घर से भाग गई.

‘‘भैया, इलाहाबाद चलना है.’’ ‘‘पर मैडम, लेट हो सकता है. आप दूसरी टैक्सी देख लें. मेरी बीवी इंतजार कर रही होगी.’’

‘‘प्लीज, अब ज्यादा देर मत कीजिए. वैसे भी मैं ने बहुत देर कर दी है,’’ मधु की परेशानी देखने लायक थी.

‘‘मैडम, लगता है, दिल का मामला है.’’ ‘‘जी.’’

‘‘चलिए,’’ कहते ही राजू ने कार गियर में डाल दी. तकरीबन आधा घंटा बीत गया. गाड़ी सरपट दौड़ रही थी. तभी राजू का मोबाइल बज उठा. मोबाइल पर मधु राजू की बातें सुन रही थी.

‘‘अरे जान, क्या हुआ?’’ ‘‘भाभी, मैं सम झा नहीं…’’

‘‘अच्छाअच्छा, पर वहां कोई तमाशा हो गया, तो…’’ ‘‘नहीं, मैं तुम्हारे खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुन सकता.’’

‘‘अरे, उन को तुम्हारी परवाह होती तो… लो, अब तुम्हारी भाभी से क्या बात करूं.’’

‘‘नमस्ते भाभी.’’ ‘‘पर आप…’’ ‘‘ठीक है, आप हमारी मुमताज को ले कर आइए. मैं तो इलाहाबाद ही जा रहा हूं. वैसे मु झे आना कहां है?’’ ‘‘क्वीन इनक्लेव, ग्रीन स्ट्रीट, रामबाग,’’ राजू ने पता दोहराया.

दोपहर के 4 बजने वाले थे. राजू मधु की ओर देख कर बोला, ‘‘मैं आप से आधा ही किराया लूंगा, क्योंकि मेरी बीवी भी इलाहाबाद जा रही है.’’

मधु ने थोड़ी रुचि ली, ‘‘इलाहाबाद में आप की बीवी का क्या है?’’ राजू ने बताया, ‘‘मायका.’’ मधु हंस दी, ‘‘तो साहब ससुराल जा रहे हैं.’’ राजू बोला, ‘‘साले साहब की शादी है.’’ ‘‘लगता है, शादी एकाएक तय हुई है?’’ ‘‘नहीं मैडम, न्यौता एकाएक मिला है,’’ दोनों हंसने लगे.

राजू के पूछने पर मधु ने जो पता बताया, उस को सुन कर राजू के होश उड़ गए. ‘‘ये तो रामदीन साहब के घर का पता है?’’ ‘‘हां, पर आप को कैसे मालूम…’’ मधु ने थोड़ा चकित हो कर पूछा. ‘‘वही तो मेरी ससुराल है.’’

‘‘आप स्मिता के पति हैं?’’ अब चौंकाने की बारी राजू की थी. ‘‘आप स्मिता को कैसे जानती हैं?’’‘‘मैं मधु…’’ तभी मधु ने देखा कि दिनेश का घर सजा हुआ है.

‘‘यह क्या हो रहा है?’’ मधु ने राजू से पूछा. ‘‘मेरे साले दिनेश की शादी है.’’ ‘‘क्या…’’ मधु की आंखों के सामने अंधेरा छा गया, ‘‘दिनेश की शादी किस से हो रही है?’’ ‘‘अंजलि से…’’

मधु की आंखों से आंसू बह रहे थे, ‘‘मु झे… एक मिनट, कागज का टुकड़ा होगा क्या?’’

राजू ने कागज का टुकड़ा मधु की तरफ बढ़ा दिया. मधु ने उस कागज पर कुछ लिखा और राजू को देते हुए बोली, ‘‘यह दिनेश को दे देना.’’

इतना कह कर वह दरवाजा खोल कर एक तरफ बढ़ गई. राजू की हिम्मत भी नहीं हुई कि उस से अपना भाड़ा मांग ले. राजू अपलक मधु को देखता रहा, जो अपने आंसू पोंछते हुए आगे जा रही थी.

मधु के जाने के बाद राजू ने गाड़ी अंजलि के घर की तरफ मोड़ दी. स्मिता और अंजलि घर के बाहर ही राजू का इंतजार करते मिले.

अंजलि के खास मेहमान होने की वजह से सभी लोग उन से बड़े अदब से पेश आ रहे थे. राजू के लिए यह सब एक सपने जैसा था.

थोड़ी देर में बारात आ गई. दिनेश एक खास तौर से तैयार किए हौल में बैठा था कि एक वेटर बड़ी संजीदगी से पास आ कर बोला, ‘‘साहब, आप को और आप के मम्मीपापा को दुलहन ने ऊपर बुलाया है. बहुत जरूरी काम है.’’ ‘‘ठीक है, आप चलिए, हम आते हैं.’’

रामदीन ने एकबारगी सोचा कि भला अंजलि ने अभी क्यों बुलाया है. पर अंजलि इतनी प्यारी थी कि किसी को कुछ सोचने की जरूरत ही नहीं थी. ऊपर कमरे में अंजलि सब का इंतजार कर रही थी, साथ में उस के मम्मीपापा भी थे.

‘‘हां बेटी, किसलिए बुलाया?’’ रामदीन ने सवाल किया. ‘‘पापा, मुझे आप को किसी से मिलाना था,’’ अंजलि ने प्यार से कहा. ‘‘किस से?’’ दिनेश ने अंजलि की ओर देखते हुए कहा. ‘‘अपने जीजाजी और बहिन से,’’ अंजलि ने दरवाजे की ओर रुख कर के कहा, ‘‘आप लोग प्लीज आइए.’’

स्मिता और राजू ने जैसे ही कदम रखा, रामदीन के पूरे परिवार के होश उड़ गए. दिनेश का दिल किया कि जा कर स्मिता से उस का हालचाल पूछे. प्रमिला देवी तो बस अपनी बेटी से लिपट जाना चाहती थीं, पर सभी जड़वत खड़े रहे.

‘‘पापा…’’ इतना कह कर स्मिता की आंखों से आंसू गिरने लगे. राजू ने स्मिता के दोनों कंधों पर हाथ रख कर सम झाते हुए कहा, ‘‘अरे पगली, रोती क्यों है, आज तेरे सारे अपने तेरे साथ हैं, तु झे तो खुश होना चाहिए.’’

प्रमिला देवी के सब्र का बांध टूट गया और जा कर बेटी से लिपट गईं. दोनों फफक कर खूब रोईं. प्रमिला स्मिता का हाथ पकड़ कर एक तरफ जाने लगीं. उन्होंने स्मिता का पेट देखा और पूछा, ‘‘कितने महीने का है?’’

‘‘एक महीने.’’ ‘‘अरे, वाह, मैं मामा बनने वाला हूं,’’ दिनेश जोश में बोला. ‘‘अबे, नाना मैं बन रहा हूं, क्यों बेटा’’ रामदीन ने स्मिता की ओर देख कर कहा.

रामदीन की यह बात सुन कर सभी का खुश होना लाजिमी था. उस ने हाथ फैला कर बेटी को बुलाया. अगले ही पल स्मिता रामदीन के पास थी.

‘‘मु झे माफ कर दीजिए पापा.’’‘‘मु झे माफ कर दो बेटी, बहुत तकलीफ दी है मैं ने तुम्हें…’’ रामदीन का गला भर आया.

मौका देख कर राजू दिनेश के पास गया, ‘‘यह किसी मधु ने दी है, बहुत तकलीफ में है बेचारी.’’

‘‘क्या…’’ दिनेश ने तुरंत वह चिट्ठी ली और पढ़ने लगा.

‘दिनेश, तुम ने  झूठ बोला था. न मैं ने तुम्हें मना किया था और न ही तुम्हारे पास आई थी, फिर भी तुम ने इंतजार खत्म कर दिया. मैं अब भी तुम से उतना ही प्यार करती हूं, जितना पहले करती थी. आज मैं अपना सबकुछ छोड़ कर तुम्हारे पास आई थी, लेकिन तुम मुझ से बहुत दूर जा चुके हो. अब तक तुम लोगों ने स्मिता को स्वीकार कर लिया होगा. थोड़ी देर में तुम्हारी शादी हो जाएगी. आज का यह अंधेरा तुम्हारे और अंजलि के परिवार या स्मिता के लिए दिन के उजाले से भी ज्यादा रोशन होगा. लेकिन जानेमन, हमारी जिंदगी तो पूरी काली रात बन गई. अब मैं घर नहीं जाऊंगी. तुम से मु झे 2 वादे चाहिए. एक तो तुम मु झे ढूंढ़ने की कोशिश नहीं करोगे. दूसरा, अगर तुम्हारी जिंदगी में बेटी आती है, तो उस का नाम मधु रखना. अपने पिछले वाले कल की तरह इन को मत तोड़ना. अंजलि को मेरी दुआएं देना, जाओ वह तुम्हारा इंतजार कर रही होगी.

तुम्हारी मधु.’

चारों तरफ हंसीखुशी के माहौल से दिनेश भागना चाहता है पर वाकई उस के लिए आज अंधेरे के मायने बदल गए थे.  Hindi Romantic Fiction

-मिथिलेश कुमार सिंह

Story in Hindi: मेरी स्वीट मिट्ठी – कैसे हुई मिट्ठी से मेरी शादी

Story in Hindi. मेरे नाना रिटायरमैंट के बाद सपरिवार कोलकाता में बस गए थे. उन का कोलकाता के बाहर बसी एक नामचीन डैवलपर की टाउनशिप में बड़ा सा फ्लैट था.

मेरी नानी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की थीं. वे अच्छीखासी पढ़ीलिखी थीं. वे महिला कालेज में प्रिंसिपल के पद पर थीं. नाना ने उन की इच्छा के मुताबिक कोलकाता में बसने का फैसला लिया था.

मैं अपनी मम्मी के साथ दुर्गा पूजा में कोलकाता गया था. मैं ने रांची से एमबीए की पढ़ाई की थी. कैंपस से ही मेरा एक मल्टीनैशनल कंपनी में सैलेक्शन हो चुका था. औफर लैटर मिलने में अभी थोड़ी देरी थी.

मिट्ठी से मेरी मुलाकात कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान हुई. कौंप्लैक्स के मेन गेट पर वह सिक्योरिटी गार्डों से उलझ गई थी.

शाम के समय पास की झुग्गी बस्ती से कुछ बच्चियां दुर्गा पूजा देखने आई थीं. चिथड़ों में लिपटी बच्चियों को सिक्योरिटी गार्ड ने रोक दिया था.

टाउनशिप के बनने के दौरान मजदूरों ने वहां सालों अपना पसीना बहाया था. ये उन्हीं की बच्चियां थीं.

मिट्ठी वहां अकसर जाती थी. वह उन की चहेती दीदी थी. वह बच्चों के टीकाकरण में मदद करती थी. स्कूलों में उन को दाखिला दिलाती थी. बच्चियों को पूजा पंडाल तक ले जाने और प्रसाद दिलाने में मिट्ठी को तमाम विरोध का सामना करना पड़ा था.

मिट्ठी विजयादशमी के दिन भी दिखाई दी थी. लाल बौर्डर की साड़ी में वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. मिट्ठी मुझे भा गई थी.

मम्मी जल्दी मेरे फेरे कराना चाहती थीं. उन्होंने रांची शहर के कई रिश्ते भी देखे थे. नानी से सलाहमशवरा करनेके लिए मम्मी मुझे कोलकाता ले कर आई थीं.

‘‘अमोल खुद अपना ‘जीवनसाथी’ चुनेगा… मेरा पोता अपने लिए बैस्ट साथी चुनेगा… एकदम हीरा…’’ नानी मेरी अपनी पसंद की बहू के हक में थीं.

‘‘गोरीचिट्टी, देशी मेम बहू बनेगी…’’ मम्मी की यही सोच थी. सुंदर, सुशील, घर के कामों में माहिर बहू उन की पसंद थी.

‘‘भाभी, हमारी बहू तो फर्राटेदार अंगरेजी में बतियाने वाली सांवलीसलोनी और स्मार्ट होगी…’’ छोटी मामी ने भी अपनी पसंद जताई थी.

‘‘मुझे मिट्ठी पसंद है…’’ मैं ने छोटी मामी को अपनी पसंद बताई.

मिट्ठी कौंप्लैक्स में ही रहती थी. मेरी मम्मी समेत परिवार के सभी लोग मिट्ठी की हरकतों से अनजान नहीं थे.

‘‘कौंप्लैक्स में मिट्ठी की इमेज ज्यादा अच्छी नहीं है. वह तेजतर्रार है… अमीरजादों के साथ आवारागर्दी करती है… मोटरसाइकिल से स्टंट करती है… बेहद बिंदास है… शौर्ट्स पहन कर घूमती है…’’ छोटी मामी ने मुझे जानकारी दी.

‘‘मुझे बोल्ड लड़कियां पसंद हैं…’’

‘‘उम्र में भी बड़ी है…’’

मैं ने उम्र की बात को भी नकार दिया.

‘‘मिट्ठी कैंपस के लड़कों के साथ टैनिस… क्रिकेट… बास्केटबाल खेलती है… मौडलिंग करती है… कंडोम की मौडलिंग… उस के मम्मीपापा ने कितनी आजादी दे रखी है…’’ मेरी बात से छोटी मामी शायद नाराज हो गई थीं.

‘‘मैं क्या सुन रही हूं…? मेरी रजामंदी बिलकुल नहीं है… नहीं… मैं मिट्ठी को बहू नहीं बना सकती…’’ मम्मी बेहद नाराज थीं. उन्होंने मुझ से दूरी बना ली थी.

मैं मिट्ठी को अपना मान चुका था. शीतयुद्ध का अंत हुआ. नानी को भनक लगी. उन्होंने सब को अपने कमरे में बुलाया. सब की बातों को बड़े ही ध्यान से सुना.

‘‘अमोल ने जिद पकड़ ली है… बदनाम लड़की से रिश्ता करने पर तुले हैं…’’ छोटी मामी ने नानी को बताया.

‘‘यह बदनाम लड़की कौन है…? कहां की है…?’’ नानी ने सवाल किया.

‘‘अपने कौंप्लैक्स की ही है… अपनी मिट्ठी… आवारागर्दी, गुंडागर्दी करती है… पूजा के पंडाल में हंगामा भी किया था… आप ने सुना होगा…’’ छोटी मामी ने मिट्ठी की खूबियों का बखान किया.

‘‘मिट्ठी तो अच्छी बच्ची है… कई बार मंदिर में मिली है… मेरे पैर छुए हैं… मैं ने आशीर्वाद दिया है… वह बदनाम कैसे हो सकती है,’’ नानी छोटी मामी से सहमत नहीं थीं.

‘‘क्या अच्छे परिवार की बच्चियां पराए जवान लड़कों के साथ क्रिकेट… बास्केटबाल और टैनिस खेलती हैं? कंडोम की मौडलिंग करती हैं? छोटे कपड़े पहनती हैं? मुंहफट और बेशर्म होती हैं?’’ मम्मी ने एकसाथ कई बातें बताईं और सवाल उठाए.

‘‘मैं ने अपने लैवल पर इन बातों की पड़ताल की है… जानकारियां इकट्ठी की हैं… मैं मिट्ठी से मिला हूं. वह मर्दऔरत के समान हक की बात करती है… वह एक समाजसेविका है… उसे कई मर्द दोस्तों का भी साथ मिला है… सब मिल कर काम करते हैं… ऐक्टिव रहने के लिए फिटनैस जरूरी है…

‘‘सामाजिक कामों के लिए रुपएपैसों की जरूरत पड़ती है. कंडोम की मौडलिंग में कोई बुराई नहीं है… बढ़ती आबादी को कंडोम से ही रोका जा सकता है… इन पैसों से बस्ती के गरीब बच्चों के स्कूल की फीस दी जा सकती है…

‘‘मिट्ठी बोल्ड है… गलतसही की पहचान और परख उसे है… वह अपने काम में जुटी है… जानती है कि वह गलत रास्ते पर नहीं है… फुजूल की कानाफूसी और बदनामी की उसे कोई परवाह नहीं है. सब बकवास है…’’ मैं ने नानी की अदालत में मिट्ठी का पक्ष रखा.

‘‘मेरे पोते ने बैस्ट लड़की को चुना है. मिट्ठी ही मेरी बहू बनेगी…’’ नानी ने सहज भाव से अपना फैसला सुनाया. मुझे गले से लगाया… रिश्ते के लिए खुद पहल करने की बात कही.

Romantic Story : वे सूखे पत्ते

Romantic Story. आज से 15 साल पहले की बात है. मैं 11वीं जमात में पढ़ता था. वह लड़की हमारी क्लास में नईनई आई थी. उस के पैर में कुछ लचक थी. शायद कुछ चोट लगी हो, इसलिए वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी. उस ने 10वीं क्लास में पूरे उदयपुर में टौप किया था और मैं ने अपने स्कूल में.

दिखने में तो वह बला की खूबसूरत थी. मगर कहते हैं न कि चांद में भी दाग होता है, बिलकुल ऐसे ही उस के पैर की वह चोट उस चांद से हुस्न का दाग बन गई थी.

उस ने पहले दिन से ही क्लास के मनचले लड़कों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना दिया था. उस की सादगी की चर्चा हर जबान पर थी.

शुरुआत के चंद महीनों में ही क्लास के आधे से ज्यादा लड़के उसे प्रपोज कर चुके थे. सब को उस के हुस्न से मतलब था, उस से नहीं.

हम लड़कों की सोच गिरी हुई होती है. लड़की को इस्तेमाल करने की चीज सम?ाते हैं. इस्तेमाल किया और फेंक दिया. मगर सबकुछ जानते हुए भी उस ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया. न ही नाराजगी से और न ही खुशी से.

और एक मैं था, जो अभी तक उस का नाम भी नहीं जानता था. सच कहूं, तो मैं ने कभी कोशिश भी नहीं की थी. नाम जान कर करना भी क्या था, जब दोनों की दुनिया और रास्ते ही अलग थे.

हर कोई उसे अलगअलग नाम से पुकारता था, इसलिए कभी सुनने में भी नहीं आया उस का असली नाम.

मैं ने उस की आंखें देखी थीं. कुछ बोलती थीं उस की आंखें, मगर क्या बोलती थीं, यह जानने के लिए कभी सोचा ही नहीं. मेरे लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी थी. अनाथ था न मैं. अपना सबकुछ खुद ही देखना था. अपना भविष्य खुद बनाना था.

जिस उम्र में लड़के तरहतरह के शौक पूरे करने में लगे होते हैं, उस उम्र में मैं खुद को एक सांचे में ढालने चला था. भला हो उस गैरसरकारी संस्था का, जो मुझे इस स्कूल में पढ़ा रही थी.

कुछ दिनों के बाद इम्तिहान हो गए. उस लड़की ने क्लास में फिर से टौप कर दिया. मेरी सालों से चली आ रही क्लास में पहली पोजीशन की हुकूमत को उस ने खत्म कर दिया था.

हमारे क्लास टीचर क्लास में आए और बोले, ‘‘सरोज, तुम ने 96 फीसदी नंबर ला कर क्लास में टौप किया है.’’

मुझे धक्का लगा कि मैं पीछे कैसे रह गया. मैं इतनी मेहनत से तो पढ़ा था. टीचर दोबारा बोले, ‘‘राघव, तुम्हारे  95.8 फीसदी नंबर आए हैं. तुम दूसरे नंबर पर हो.’’

इस पर मुझे राहत सी मिली कि बस थोड़ा सा फर्क है. मगर फर्क क्यों है, इस का जवाब मुझे  खुद को देना था. यह जवाब मैं कहां से लाता?

मैं पूरी क्लास में यही सोचता रहा. सब लड़के खुश थे. जो फेल थे वे भी, क्योंकि उन्हें उस का असली नाम पता लग गया था.

क्लास खत्म होने पर मैं उस से मिला और बधाई दी. वह इस की हकदार भी थी, इसलिए उस ने भी मुझे  बधाई दी.

यह हमारी पहली मुलाकात थी. इस के बाद आगे के दिनों में धीरेधीरे बातें होने लगीं, मगर जबान से नहीं, बस इशारों से. दूर से देख कर हाथ हिला देना, मगर सामने होने पर चुपचाप निकल जाना, यह हमारे लिए बहुत आम हो गया था.

फाइनल इम्तिहान आने वाले थे. हमारी बातें अब शुरू होने लगी थीं. मगर मैं ने कभी सरोज के बारे में जानने की कोशिश नहीं की, बस हालचाल पूछ लिया करता था.

फिर एक दिन वह बोली, ‘‘इम्तिहान के बाद मिलना.’’

मगर कहां मिलना, यह नहीं बताया. मैं कुछ देर सोचता ही रहा कि कहां और क्यों? क्यों का जवाब तो यह था कि हम दोस्त थे, मगर कहां का जवाब मुझे नहीं मिल रहा था. क्या मेरे घर में? मगर मैं तो अनाथ आश्रम में रहता हूं. तो क्या फिर उस के घर में? मगर उस का घर तो मुझे पता ही नहीं. तो कहां? फिर उसी ने बताया कि स्कूल के पास वाले बाग में मिलना. मेरे अंदर के सवालों का तूफान थाम दिया था उस के इस जवाब ने.

इम्तिहान खत्म हुए. हम मिले, हम फिर मिले, हम बारबार मिले. एक अजीब सी, मगर बहुत प्यारी सी धुन लग गई थी दोनों को एकदूसरे के साथ की. फिर एक दिन मैं ने उसे बताया कि मैं अनाथ हूं, तो जवाब मिला कि वह भी अनाथ है.

मेरी तो यह जान कर जैसे सांसें ही थम गई थीं कि इतनी प्यारी लड़की  के मांबाप नहीं हैं.

बला की खूबसूरत लड़की इस नोच खाने वाले समाज में अपना वजूद बनाए हुए थी. समझ आ गया था मुझे  कि उस की आंखें क्या बोलती थीं और क्यों वह इतनी नरम मिजाज थी.

मुझे  आज उन सवालों के जवाब भी मिल गए थे, जिन सवालों को मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने बड़ी हसरत से उस से पूछा, ‘‘क्या अब तक तुम्हारा कभी कोई दोस्त रहा है?’’

वह हथेली भर के सूखे पत्ते ले आई और बोली, ‘‘ये हैं मेरे दोस्त.’’

मुझे  कुछ समझ  नहीं आ रहा था कि सरोज क्या बोल रही है. मैं हंस भी नहीं सकता था, क्योंकि उस के चेहरे पर हंसी  नहीं दिख रही थी.

‘‘सरोज, मैं कुछ समझा नहीं?’’ मैं ने बहुत जिज्ञासा से पूछा.

जब उस की आंखें सबकुछ बोलती ही थीं, तो क्यों आज मैं उस की जबान का बोला हुआ शब्द समझ नहीं पा रहा था. वह चाह रही थी कि उस का यह दोस्त उस की आंखें पढ़ कर जान जाए कि क्यों ये सूखे पत्ते उस के दोस्त थे. मगर उस ने नहीं बताया और मैं ने भी मान लिया कि शायद दुनिया में कहीं उस का भरोसा टूटा होगा, इसलिए वह ऐसी बातें करती है.

हमारी बातों के सिलसिले अब काफी बढ़ गए थे और हम धीरेधीरे बहुत करीब आ गए थे. एक लगाव था, एक अधूरापन था, जो साथ रह कर ही पूरा होता था. मैं जानना चाहता था उस का और उस के सूखे पत्तों का रिश्ता. मैं इतना करीब तो था उस के, मगर उस के दोस्त अब भी सूखे पत्ते ही थे.

फिर एक दिन मेरे मन में यह सवाल उठा कि स्कूल से पढ़ाई खत्म होने के बाद हम कैसे मिलेंगे? मगर यह सवाल मैं उस से सुनना चाहता था और यह भी जानता था कि वह नहीं पूछेगी, क्योंकि उसे मुझ से ज्यादा उन सूखे पत्तों से जो लगाव था.

स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई. उस से मिले हुए काफी दिन गुजर गए. अकेलापन महसूस होने लगा था और यह अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था. सरोज लौट गई थी अपनी दुनिया में, अपने उन सूखे पत्तों के पास या फिर कहीं और.

फिर एक दिन मैं ने स्कूल जा कर पता किया. कितना बेवकूफ था मैं. इतना वक्त साथ रहे, मगर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह रहती कहां थी. मैं अपने टीचर के पास गया और सरोज का पता पूछा.

टीचर बोले, ‘‘राघव, पता तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर सरोज तुम्हारे लिए एक चिट्ठी छोड़ गई है.’’

मैं बहुत खुश हुआ, मगर न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे उस चिट्ठी को खोलने में. जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझ अनाथ को चिट्ठी लिखी थी.

टीचर बोले, ‘‘अरे, यह क्या? जो राघव हमेशा पढ़ने में अव्वल रहा, आज उस के हाथ इस मामूली सी चिट्ठी को लेने में कांप क्यों रहे हैं?’’

‘‘पता नहीं, सर. मगर यह मामूली नहीं है,’’ इतना कह कर मैं वहां से बहुत तेजी से भाग निकला. और क्या भागा यह मैं भी नहीं जानता. शायद मुझ में हिम्मत नहीं थी उस वक्त का सामना करने की.

मैं बहुत भागा और न जाने क्यों मेरे कदम उस बाग की ओर बढ़ते चले गए, जहां हम अकसर मिलते थे.

मेरी सांसें बहुत तेज चल रही थीं. थकने की वजह से नहीं, डर की वजह से. और डर था उसे खो देने का. डर था मुझे  कि यह चिट्ठी पढ़ते ही मैं उसे खो दूंगा. या उस का मेरे लिए पहला और आखिरी खत था. क्या करूं, कुछ समझ  ही नहीं आ रहा था. अभी पढ़ूं कि नहीं.

मन में हजारों बुरे खयाल आ रहे थे. सांसें भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं. फिर सोचा, ‘शायद उस ने इस में अपना नया पता लिखा हो.’

बहुत हिम्मत कर के मैं ने वह खत खोल ही दिया और वह कुछ यों था:

‘प्यारे दोस्त राघव,

‘मैं जानती हूं कि यह खत पढ़ने से पहले तुम ने हजार बार सोचा होगा. तुम्हारे हाथ कांपे होंगे, धड़कनों का शोर कुछ ज्यादा हो गया होगा. मन में हजारों तरह के खयाल आ रहे होंगे और उन में सब से बड़ा सवाल यह होगा कि मेरे दोस्त सूखे पत्ते ही क्यों?

‘राघव, मैं ने तुम्हें कभी नहीं बताया, पर अब बताती हूं. मैं अपने मातापिता की एकलौती लड़की थी. जिस घर में मैं पैदा हुई, वहां लड़की का पैदा होना जुर्म माना जाता था. जब मैं 4 साल की थी, तब मेरे पिता ने मुझे छत से नीचे फेंक दिया था. मैं आंगन में रखे उन सूखे पत्तों के ढेर पर गिरी थी, जिसे कुछ देर पहले मेरी मां ने जमा किया था. तब मैं तो बच गई, मगर मेरा पैर टूट गया था.

‘पिताजी की ऐसी गिरी हुई हरकत देख कर मां ने वहीं पर रखी कुल्हाड़ी से उन की जान ले ली. उन्होंने मुझे  बहुत प्यार से गले लगाया, खूब रोईं. मैं भी रो रही थी. फिर मां ने मुझे  छोड़ा और घर बंद कर के खुद को आग लगा ली. मां भी मर गईं और मैं छोटी सी लड़की 4 साल की उम्र में ही अनाथ हो गई.

‘किसी रिश्तेदार ने मेरी जिम्मेदारी नहीं ली. जिस उम्र में औलाद को उस की मां के सहारे की सब से ज्यादा जरूरत होती है, वह सहारा मुझ  से छिन गया था. मां के आंचल में खेलने की उम्र में मुझे अनाथालय वाले ले गए.

‘वहां जब मैं गई, तो हर बार बस अपना गिरना याद आता था. उस वक्त मुझे बचाने वोल वे सूखे पत्ते ही थे, जिन से मैं ने कभी बात तक नहीं की थी. उन बेजबानों ने मुझे  एक नई जिंदगी दे दी थी. मेरा पैर हमेशा के लिए खराब हो गया था.

‘मैं आज भी हर रोज जब सड़कों पर गिरे सूखे पत्ते देखती हूं, तो मुझे वही ढेर याद आता है. मैं उन का कुछ इसी तरह एहसान मानती हूं कि जब मेरा अपना पिता मेरा अपना नहीं हो सका, तब इन गैर और बेजबान पत्तों ने मुझे सहारा दिया.

‘मुझे  जब भी इस बेहया दुनिया से डर लगता है, मैं अकसर इन्हें खत लिखती हूं. मैं इन का एक ढेर बनाती हूं, फिर एक हवा का झोका आता है और उस ढेर के सब पत्तों को मेरे चारों ओर फैला कर कहता है कि भरोसा रखना सरोज… ये सूखे पत्ते हमेशा तेरे साथ हैं… हमेशा.

‘मैं जानती हूं राघव कि तुम यह खत अभी उसी बाग में बैठ कर पढ़ रहे हो, और तुम्हारी आंखें भीग गई हैं. मुझे माफ कर देना तुम्हें चुपचाप छोड़ कर जाने के लिए. मगर महसूस कर के देखना… मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, इन सूखे पत्तों की तरह.

‘तुम्हारी सरोज.’

मेरी आंखें सच में भर आई थीं. एक आह निकल गई थी मेरे दिल से. आज समझ आ गया था कि क्यों हैं ये सूखे पत्ते उस के दोस्त… कितना जानती थी वह मुझे .. उसे पता था कि मैं यह खत उस बाग में ही पढ़ूंगा. अब समझ आया कि क्यों मेरे पैर भागतेभागते मुझे  इस बाग में ले आए थे.

मैं सरोज के दोस्तों को ले कर बनाए हुए ढेर में सरोज की दुनिया को बड़े गौर से देख रहा था कि न जाने कहां से अचानक एक हवा का झोका आया, जिस ने उन पत्तों को मेरे चारों ओर फैला दिया और मुझे सच में एहसास होने लगा कि सरोज मेरे बहुत करीब है… बहुत ही करीब…

Story in Hindi : लहूलुहान लव लैटर

Story in Hindi. आदिल अपनी बीवी महविश को दिलोजान से चाहता था. एक दिन महविश ने उस से अजीब सी डिमांड रख दी कि उसे किसी का लव लैटर पढ़ना है. आदिल ने बड़ी मेहनत से लव लैटर लिखा, पर महविश को पसंद नहीं आया. आगे क्या हुआ?

आ दिल जब अपने कमरे में पहुंचा, तो उस की बीवी सो चुकी थी. उस ने धीरे से कबर्ड खोला, अपना कोट उतारा और कबर्ड के एक हैंगर में टांग दिया. फिर बहुत ही आहिस्ता से कबर्ड को पुश कर दिया. ‘खट…’ की आवाज पूरे कमरे में गूंज गई.

सुर्ख जोड़े में दुलहन की तरह सजी आदिल की बीवी चौंक कर उठ बैठी. बिलकुल उसी तरह जैसे वह एक साल पहले शादी की पहली रात उठ कर बैठी थी.

आदिल को शादी की पहली रात का पूरा मंजर याद आ गया. वह अपनी बीवी के पास पहुंचा. उस की बीवी सिमट कर लजाने लगी. घूंघट उस के सिर से गायब था. उस ने अपने सिर पर घूंघट का पल्लू डालने की कोशिश की.

आदिल ने मना कर दिया, ‘‘नहीं, ऐसे ही ठीक है,’’ उस के हाथ में उस की बीवी का हाथ आ गया. नरम और नाजुक हाथ, ‘‘ऐसे ही ठीक है. बिना बदली का चांद. बेवजह घूंघट उठाने की जहमत करनी पड़ती.’’

‘‘मैं सो गई थी.’’ ‘‘मैं जानता हूं. सफर की थकान है.’’ आदिल की बीवी महविश ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की. ‘‘अब तो यह हाथ जिंदगीभर नहीं छोडं़ूगा, कहीं भागने नहीं दूंगा.’’

महविश शरमा गई. आदिल ने उस के शरमाए हुए वजूद को अपने आगोश में ले लिया.

‘‘कहीं भी भागने नहीं दूंगा,’’ कहते हुए आदिल ने करीब की मेज पर रखा हुआ मिठाई का डब्बा उठाया, उसे खोला. काजू बर्फी का एक पीस उठा कर खिलाने लगा. फिर महविश ने भी उसे खिलाया.

‘‘कौन दूर भागना चाहेगा आप से… कोई बेवकूफ ही होगी, जो आप की मुहब्बत को ठुकराएगी, आप से दूर जाएगी,’’ महविश बोली.

‘‘फिर भी मेरे प्यार में कहीं कोई कमी रही हो तो मु?ो बता दीजिए. ऐसी कोई चीज जो मैं आप को नहीं दे पाया हूं, मु?ो बताइए,’’ आदिल ने बच्चे की तरह जिद की.

महविश ने आदिल के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, ‘‘एक ख्वाहिश है मेरी, कहीं दिल में दबी हुई.’’ ‘‘कैसी ख्वाहिश?’’

‘‘मैं ने अपनी जिंदगी में कभी भी कोई लव लैटर नहीं पढ़ा है, पढ़ा क्या देखा तक नहीं है. मु?ो कहीं से लव लैटर ला दीजिए. किसी का लव लैटर, किसी को लिखा हुआ. मैं लव लैटर पढ़ना चाहती हूं. देखना चाहती हूं कि लव लैटर कैसा होता है,’’ महविश ने धीरे से कहा. आदिल हड़बड़ा कर उठ बैठा, ‘‘यह कैसी ख्वाहिश है…’’

आदिल यादों से बाहर आ गया. उस की नजर दीवार घड़ी पर पड़ी. रात के तकरीबन 3 बज रहे थे. उस ने एक नजर अपनी बीवी पर डाली. वह बेसुध पड़ी सो रही थी. बहुत ही खूबसूरत लग रही थी.

आदिल कमरे से निकाल कर बालकनी पर आ गया. घर के सामने गार्डन में शाम के प्रोग्राम की निशानियां अब भी बाकी थीं. एक तरफ स्टेज बना था. एक बड़ी सी मेज पड़ी थी. वही मेज जिस पर मैरिज एनिवर्सरी का केक काटा गया था.

केक कटते ही सब ने ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’ बोला था. ‘मुबारकबाद’ बोल कर गिफ्ट पैक भी दिए थे.

आदिल ने सभी के सामने महविश के गले में डायमंड का नेकलेस भी पहनाया था. फिर ‘भटाभट’ गुब्बारे फूटने लगे थे. मेज पर फटे हुए गुब्बारे अब भी नजर आ रहे थे. कुछेक गुब्बारे टैंट की सीलिंग और साइड के परदों पर अब भी चिपके हुए लटक रहे थे. गार्डन के दाएं और बाएं साइड में टेबल और कुरसियों के इर्दगिर्द डिस्पोजल गिलास और पत्तल पड़े हुए थे. स्टेज के साइड में छोटा सा डीजे सिस्टम भी था, जिस पर कुछ जिस्म थिरके भी थे.

आदिल अंदर अपने स्टडी रूम में आ गया. उस ने मेज के नीचे से कुरसी अपनी तरफ खींची. कुरसी पर बैठ गया. लव लैटर लिखने के लिए कागज और कलम उठाया.

‘कैसे लिखूं… कहां से शुरुआत करूं…’ आदिल सोच में पड़ गया. इस मोबाइल फोन ने तो खत लिखना ही भुला दिया. रोजाना सैकड़ो मैसेज लिखते हैं हम… सोशल मीडिया पर, मगर खत लिखना हम भूल गए.

पर कुछ तो लिखना पड़ेगा. आखिर आदिल की प्यारी बीवी महविश को लव लैटर जो पढ़ना है. कुछ सोच कर आदिल ने लिखा :

जानेमन… जाने तमन्ना… जाने अदा.

तु?ो जैसा है सोचा पाया वही

सूरज की किरनों सा इक चेहरा

देखा है तुम सा मैं ने नहीं…

जानेमन, तुम बहुत खूबसूरत हो. इतनी खूबसूरत कि मेरे पास अल्फाज नहीं हैं… मैं कैसे बयान करूं… तुम्हारे गाल गुलाब से हैं. आंखें बहुत ही नशीली और लब संतरे के दो फांक. तुम न मिलती, तो मैं अधूराअधूरा सा लगता. आई लव यू वैरी मच.

तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा

आदिल

चलो हो गया. लिख गया खत. आदिल ने राहत की सांस ली. वह अपने कमरे में लौट आया. महविश अब भी सो रही थी. आदिल ने खत को फोल्ड कर के उस के तकिए के नीचे रख दिया.

सुबह हो गई. आदिल रोजाना की तरह समय पर अपने कालेज पहुंचा. तभी उस के स्टाफ ने आ कर उसे घेर लिया.

‘‘यह बात ठीक नहीं है सर,’’ कंप्यूटर टीचर अजीत वर्मा ने कहा.

‘क्या बात ठीक नहीं है?’ कई और टीचर एकसाथ बोल पड़े.

‘‘कल सर की मैरिज एनिवर्सरी थी… बड़ी धूमधाम से.’’

‘‘नहीं, ऐसे ही छोटीमोटी रस्म मना ली थी केक मंगा कर,’’ आदिल बोला.

‘‘आप ?ाठ बोल रहे हैं सर. यह देखिए मेरे पास सुबूत हैं,’’ अजीत फेसबुक की पोस्ट दिखाने लगा. अजीत रोज ही सोशल साइट पर जा कर चैक कर लेता था. देख लेता था कि कौन कहां है और क्या कर रहा है. आज किस का बर्थडे है. किस की मैरिज एनिवर्सरी.

आदिल ने सिर्फ एक फोटो पोस्ट किया था. अपने घर के गार्डन में डैकोरेट किए गए स्टेज का, जिस पर बड़ेबड़े अल्फाज में लिखा था ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’.

‘‘यह तो गलत बात है आदिल साहब. आप को यहां भी पार्टी देनी पड़ेगी,’’ एक सीनियर टीचर ने कहा.

‘‘ठीक है सर मिल जाएगी, लंच टाइम में,’’ आदिल बोला.

लंच टाइम में आदिल को खत के बारे में याद आया. पता नहीं महविश ने खत पढ़ा है या नहीं, पढ़ा होता तो अब तक उस का फोन आ जाता. शायद खत पर उसकी नजर ही न पड़ी हो. शायद उसे फुरसत ही न मिली हो. कल का सबकुछ बिखरा हुआ पड़ा था. उसे गार्डन भी साफ करवाना पड़ा होगा. टैंट का सामान भी भिजवाना पड़ा होगा.

हालांकि, घरबाहर का सारा काम आदिल का छोटा भाई कामरान ही करता है, लेकिन महविश को भी तो देखना ही पड़ता है. घर पर काम वाली भी आती है, मगर उस के पीछेपीछे भी तो दौड़ना पड़ता है.

आदिल ने फोन मिलाया. पूरी घंटी गई. फोन नहीं उठा. उस ने दोबारा मिलाया.

उधर से फोन आदिल की बहन आलिया ने उठाया, ‘‘भैया मैं हूं आलिया… भाभी छत पर हैं. कपड़े धूप में डाल रही हैं…  मोबाइल अभी देती हूं.’’

आलिया मोबाइल फोन ले कर छत पर पहुंची, ‘‘भाभी, भैया का फोन.’’

‘‘हैलो जी, कैसे हैं आप?’’ आलिया बालटी से कपड़े निकालनिकाल कर छत पर बंधे हुए तार पर फैलने लगी. छत पर नरम धूप फैली हुई थी, जो बहुत भली लग रही थी.

‘‘ठीक हूं,’’ आदिल बोला. ‘‘आप को थकान लग रही होगी…’’ ‘‘थोड़ीबहुत. ज्यादा नहीं. अच्छा, तुम्हें कुछ मिला?’’ आदिल ने पूछा. ‘‘क्या?’’ महविश ने पूछा. ‘‘कुछ भी,’’ आदिल ने कहा. ‘‘कल मु?ो बहुतकुछ मिला था. लोगों से गिफ्ट पैक, आप से डायमंड का नेकलेस.’’ ‘‘इस के अलावा… आज कुछ नहीं मिला… तकिए के नीचे?’’

‘‘अच्छा… वह खत. हां, मिला. आप ने लिखा था? लव लैटर ऐसे तो नहीं होते होंगे. सपाट सीधेसादे. न जज्बात, न एहसास… मु?ो असली लव लैटर चाहिए, नकली नहीं. एक महबूब का, उस की महबूबा के नाम या महबूबा का उस के महबूब के नाम. मियांबीवी का भी चलेगा, लेकिन उस में प्यार हो, मुहब्बत हो, जज्बात हों, एहसास हो.’’

महविश बात करतेकरते नीचे उतर आई. उधर आलिया जब कपड़े फैला चुकी, तो वह रैलिंग के पास पहुंची. बाएं साइड वाले घर के गार्डन में एक लड़की खड़ी थी. सजीधजी. मुसकराती हुई.

गली के मोड़ से एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया. दुबलापतला. हाथ में कलावा पहने. छोटेछोटे बालों में एक मोटी सी चोटी. माथे पर तिलक. वह लड़का उस लड़की के घर के गेट के बहुत पास से गुजरा. लड़की से कुछ बोला. क्या बोला? आलिया को सुनाई नहीं पड़ा. लड़की हंस दी. लड़का मुसकराता हुआ गली में आगे बढ़ गया.

शाम को आदिल ने महविश से कहा, ‘‘यार, मैं ने बड़ी मेहनत से वह लव लैटर लिखा था. दिमाग पर कितना जोर डाला था, तब कहीं जा कर अल्फाज कागज  पर उतरे थे. और तुम ने मेरा लव लैटर रिजैक्ट कर दिया.’’

‘‘आप ने खत लिखने में बेशक मेहनत की होगी, लेकिन वह सिर्फ लैटर था, लव लैटर नहीं. उस में मुहब्बत नदारद थी.’’

‘‘अच्छा महविश, यह बताइए कि यह लव लैटर वाली ख्वाहिश तुम्हारे दिल में कब पैदा हुई और कैसे?’’

महविश मुसकराई, ‘‘बचपन की बात है. मैं जमात 4 या 5 में पढ़ रही थी. मेरे क्लास में एक लड़का था. जैसे बहुत से लड़केलड़कियां साथ पढ़ते हैं, वह भी पढ़ता था. जैसे सब साथ में खेलतेकूदते हैं, बोलते हैं, लड़ते?ागड़ते हैं. वह भी साथ में खेलता था,  बोलता था. बचपना था. नासम?ा थी मैं. शायद वह नासम?ा नहीं था. शायद वह नादान था. पता नहीं क्या था वह. किस का बेटा था, मैं नहीं जानती.’’ आदिल के चेहरे पर कई भाव आ

रहे थे, जा रहे थे. महविश उस के चेहरे को देख कर शांत हो गई, ‘‘आप कुछ उलटासीधा तो नहीं सोचने लगे. ऐसीवैसी कोई बात नहीं थी. आप गलतफहमी मत पाल लेना.’’

‘‘मैं इतने छोटे दिल का भी नहीं हूं. आगे बताइए. कहानी इंटरस्टिंग लग रही है.’’

‘‘मिस्टर, यह कहानी नहीं है, बल्कि हकीकत है. सुनिए, एक दिन सुबहसवेरे पहले ही घंटे में मेरे स्कूल के हैडमास्टर साहब उस लड़के को बेतहाशा पीटने लगे. वह चिल्ला रहा था. आखिरकार किसी तरह वह लड़का स्कूल से भाग पड़ा था.

‘‘हैडमास्टर साहब के कहने पर कई लड़कों ने उस का पीछा भी किया था, पर वह लड़का पकड़ में नहीं आया. अरहर के खेतों से होता हुआ वह अपने गांव निकल गया था.

‘‘कहते हैं कि वह लड़का अपनी मौसी के यहां पढ़ने के लिए आया था और मौसी के घर में ही रहता था.’’

‘‘लेकिन हैडमास्टर साहब ने उसे इतनी बेदर्दी से मारा क्यों? क्या गलती थी उस की?’’ आदिल के मुंह से अचानक  निकला.

‘‘उस लड़के ने एक लव लैटर लिखा था और वह लव लैटर हैडमास्टर साहब के हाथ लग गया था.’’

‘‘लेकिन वह लव लैटर किस लड़की के नाम था?’’ आदिल ने जिज्ञासु हो कर पूछा.

‘‘मेरे नाम था वह लव लैटर. मु?ो यह बात बहुत बाद में पता चली. तब जब मैं प्राइमरी स्कूल पास कर के जूनियर में आ गई थी.’’ यह सुन कर आदिल अवाक रह गया. बात आईगई हो गई.

आलिया ने छत से देखा कि आज वह लड़का अपनी बाइक से आ रहा था. गली के उसी मोड़ से. बनाठना. वह लड़का पड़ोस के घर के गार्डन में ?ांकता हुआ है या यों कहें कि खुद को उस लड़की को दिखाता हुआ गुजरा. लड़की तैयार खड़ी थी. मुसकराई.  लड़का भी मुसकराया. लड़का बाइक की स्पीड बढ़ा कर तेजी से गली से ओ?ाल हो गया.

थोड़ी देर बाद वह लड़की भी अपने घर से बाहर निकली. बुरके में. सड़क पर आई. एक आटोरिकशा पकड़ा. आटोरिकशा उसी दिशा में चल दिया, जिधर वह लड़का गया था.

आदिल के कालेज में सालाना इम्तिहान शुरू हो चुके थे. आज अंगरेजी का पेपर था. तकरीबन एक घंटा हो चुका था. एक घंटे के पूरा होने पर एक घंटी बजी.

‘‘चलिए सर, राउंड पर चलते हैं,’’ आदिल के एक साथी टीचर अजीत वर्मा ने कहा.

आदिल, अजीत वर्मा और अमित राठौर तीनों राउंड पर चल दिए. उन्होंने रूम नंबर एक से शुरुआत की. वे छात्रों के पास जाते और पेपर उठा कर देखते कि कहीं कोई निशान तो नहीं लगा है. कोई जवाब तो नहीं लिखा है. कौपियां भी उलटपुलट कर देखते. जिस छात्र पर शक होता उस की तलाशी भी लेते. ऐसा  ही करते हुए जब वे रूम नंबर 3 में पहुंचे, तो आदिल को एक लड़के पर शक हुआ, ‘‘स्टैंडअप.’’

लड़का खड़ा हो गया. आदिल ने उस की शर्ट की तलाशी ली. उस की पैंट की दोनों जेबों की तलाशी ली. कुछ भी नहीं निकला. उस की बैल्ट के हुक में भी देखा. वहां भी कुछ नहीं था.

आदिल का शक गलत निकला. उस छात्र के पास नकल नहीं थी. आदिल ने उस लड़के पास वाले लड़के को इशारा किया. वह उठ खड़ा हुआ.

‘‘कुछ नहीं है सर, मैं नकल नहीं लाता हूं,’’ वह लड़का बोला.

आदिल ने उस लड़के की दोनों जब में हाथ डाला. कुछ नहीं मिला. फिर बैक पौकेट में देखा. एक पर्स था, जिस में 100-100 और 200-200 रुपए के कई नोट थे.

‘‘इतने रुपए क्यों ले कर आते हो? 9वीं जमात में पढ़ते हो, कहां खर्च करते हो इतने पैसे? और यह क्या है… रुपयों के बीच में यह परची कैसी है?’’

‘‘सर, यह नकल नहीं है. सर, यह परची मु?ो वापस कर दीजिए… प्लीज सर.’’

‘‘नकल ले कर आते हो, इतना सम?ाने पर भी.’’ ‘‘नहीं सर, यह नकल नहीं है.’’ ‘‘फिर क्या है?’’ आदिल ने पूछा.

लड़के ने सिर झुका लिया. आदिल ने पर्स लड़के को वापस कर दिया.

आदिल की नजर कागज पर लिखी इबारत पर पड़ी. लिखा था, ‘मेरी जान दीपाली…’

‘यह तो लव लैटर है…’ आदिल ने मन ही मन सोचा. उस की आंखों में ऐसी चमक दौड़ गई जैसे कि उस के हाथ कोई खजाना लग गया हो. ‘‘बैठ जाओ,’’ आदिल ने उस लड़के से कहा और परची अपने हाथ में दबा ली. आदिल के दोनों साथी टीचर उस के पास दौड़ आए. एक ने पूछा, ‘‘क्या निकला? लव लैटर है क्या?’’

‘‘लव लैटर नहीं है, न ही नकल सामग्री है. ऐसे ही फालतू की शायरी लिखी है.’’

शाम को आदिल अपने घर बहुत खुशखुश पहुंचा. महविश गार्डन में ही मिल गई आदिल का इंतजार करते हुए.

आदिल को देखते ही महविश भांप गई कि आज कुछ खास बात हुई है.

‘‘क्या बात है, आज आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं? प्रमोशन हो गया क्या?’’

‘‘इधर तो आइए… अभी दिखाता हूं… आप भी खुश हो जाएंगी,’’ आदिल ने बाइक खड़ी करते हुए कहा. फिर दोनों साथसाथ घर के अंदर आ गए.

आदिल ने शर्ट की जेब से लैटर निकाल कर महविश के हाथ पर रख दिया और कहा, ‘‘यह रही आप की ख्वाहिश.’’

महविश ने खत को अनफोल्ड किया. खत सुर्ख रोशनाई से लिखा हुआ था :

मेरी जान दीपाली,

फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुसकान है.

रंग तेरा देख के, रूप तेरा देख के, कुदरत भी हैरान है.

आई लव यू. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरे नंबर पर काल करना.  क्या तुम भी लव मी? तुम्हारा दीवाना.

महविश जैसेजैसे खत पढ़ती गई, वैसेवैसे उस के चेहरे पर चमक फैलती गई. ऐसी चमक आदिल ने पहले कभी नहीं देखी थी. आदिल उसे खुश देख कर बहुत खुश हुआ.

‘‘हां , यह है लव लैटर… ऐसे होते होंगे लव लैटर… लफ्ज भले ही ठीक से नहीं लिखे हैं, लेकिन जज्बात और एहसास कितने क्लियर हैं. कहां मिला आप को?’’

आदिल महविश के खिले चेहरे को अपलक देख रहा था, चौंक पड़ा और बोला, ‘‘कालेज में एक छात्र के पास.’’

अगले दिन आलिया शाम के समय अपने गार्डन में बैठी पढ रही थी. एकदम से बगल वाले घर से जोरजोर की आवाजें आने लगीं. लड़ाईझगड़े की आवाजें.

‘‘इस पर नजर रखिए अम्मी, यह नाक कटवाएगी. बदतमीज हो गई है यह.’’

‘‘अम्मी, सुहेल से कहिए, मुंह बंद कर ले अपना… चिल्लाए नहीं.’’

‘‘चिल्लाऊंगा… खूब चिल्लाऊंगा. तू बदतमीज हो गई है, बेहया हो गई है. रातदिन मोबाइल पर लगी रहती है, इधरउधर घूमती फिरती है.’’

‘‘क्यों गला फाड़ रहा है? क्या किया है मेरी बेटी ने?’’ अम्मी की आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘अम्मी, इसी से पूछिए कि यह कल कहां गई थी?’’

‘‘बेटी, सच बता कि तू किस के साथ घूमती फिरती है. महल्ले में तु?ो ले कर दबी जबान से बातें हो रही हैं.’’

‘‘अम्मी, मेरे साथ पढ़ता है वह लड़का.’’

इसी बीच मौका पा कर सुहेल ने उस लड़की के हाथ से मोबाइल फोन छीन लिया, ‘‘यह देखिए अम्मी, उस लड़के के साथ इस के कैसेकैसे फोटो और वीडियो हैं… देखिए.’’

अम्मी ने देखा, तो उन के होश उड़ गए, ‘‘हायहाय… तौबातौबा… यह सब क्या है… तेरे अब्बू जानेंगे, तो कयामत बरपा हो जाएगी… तेरी पढ़ाईलिखाई बंद हो जाएगी.’’

तभी अब्बू आ गए, ‘‘क्या हो रहा है? कैसा हंगामा है?’’

सुहेल अब्बू के पास दौड़ गया, ‘‘अब्बू, यह देखिए… आप की परी क्या गुल खिला रही है… यह देखिए.’’

अब्बू ने देखा कि उन की लाडली कलावा, तिलक और चोटी वाले के साथ. उन के होश उड़ गए. सोचने लगे कि परवरिश में कहां कमी रह गई. वे ‘धड़ाम’ से सोफे में धंस गए.

तकरीबन एक हफ्ते बाद की बात है. शाम को महविश अपने गार्डन में पौधों को पानी दे रही थी. हर छोटेबड़े पौधे के पास जाजा कर. पानी पा कर पौधे तरोताजा नजर आने लगते. फूलों की मुसकराहट और बढ़ जाती.

पानी देतेदेते जब महविश कौर्नर वाले पौट के पास पहुंची, तो उसे घास पर कागज की एक गेंद सी दिखाई पड़ी.

महविश ने उठा कर देखा. एक पत्थर पर कागज को लपेट कर गेंद बना दिया गया था… दूर फेंकने के लिए.

महविश ने कागज को सीधा कर के देखा. कागज एक खत था. खत भी साधारण नहीं, बल्कि लव लैटर.

लिखा था :

मेरी प्यारी आलिया,

इधर एक हफ्ते से मैं बहुत परेशान हूं. रातदिन चैन नहीं पड़ता. मेरी तुम से बात नहीं हो पा रही है. मिलनाजुलना, तुम्हें देखना तो दूर की बात. उस दिन तुम्हारे भाई ने तुम्हारे घर पर बड़ा तांडव मचाया. इसी बीच तुम्हारे पिताजी भी आ गए. उन्हें मेरे और तुम्हारे बारे में सबकुछ पता चल गया… कहां तक छिपता. आज नहीं तो कल पता चल ही जाता.

उसी दिन से तुम पर पाबंदी लगा दी गई. तुम्हारा कोचिंग जाना बंद कर दिया गया. तुम्हारा मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया गया.  तुम से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है, इसलिए मजबूर हो कर मैं चिट्ठी लिख रहा हूं.

तुम जानती हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. तुम्हारे लिए मैं अपना धर्म बदल सकता हूं. इसलाम धर्म अपना सकता हूं. प्लीज, अपने अम्मीअब्बू को सम?ाओ… मनाओ… तुम नहीं मिली, तो मैं जान दे दूंगा.

तुम्हारा आशीष.

खत पढ़ कर महविश का वजूद कांप गया. उस के मुंह से चीख निकल गई. जोरदार डरावनी चीख. ऐसे जैसे कि सामने जहरीला सांप देख लिया हो.

‘‘आलिया…’’ महविश चिल्लाई. आलिया किचन में थी. सब्जी काट रही थी. छुरी रख कर भागती हुई आई, ‘‘क्या हुआ भाभी?’’

महविश बुत बनी खड़ी थी. ‘‘क्या हुआ भाभी?’’ आलिया ने पूछा. महविश ने उस के हाथों में लैटर थमा दिया, ‘‘यह क्या है आलिया?’’

आलिया ने लैटर हाथ में लिया. पहली ही लाइन पढ़ कर वह चकरा गई, ‘‘मेरी प्यारी आलिया… भाभी यह मेरा नहीं है…  मतलब किसी ने मेरे लिए नहीं लिखा है. आलिया एक दूसरी लड़की भी है, जो इस बाजू वाले घर में रहती है.’’

यह सुन कर महविश के चेहरे पर मुसकान दौड़ गई, ‘‘हां, जानती हूं, पर है तो यह लव लैटर है.’’ ‘‘हां भाभी, लव लैटर ही है,’’ आलिया पसीनेपसीने हो गई थी.

‘‘कितना जज्बाती लेटर है यह,’’ महविश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने अपनी जिंदगी में यह दूसरा लव लैटर देखा था. उस ने आलिया के हाथों से लव लैटर ले कर दोबारा पढ़ना चाहा.

इसी बीच न जाने कहां से कामरान आ गया. उस ने ?ापटा मार कर वह कागज छीन लिया.

‘‘अच्छा, तो यह सब चल रहा है,’’ कामरान ने जल्दीजल्दी पूरा खत पढ़ डाला. खत पढ़ कर वह आगबबूला हो गया. गुस्से से कांपने लगा, ‘‘तुम इसीलिए यहां रह रही हो. तुम्हें शर्म नहीं आती. आजकल महल्ले में हर तरफ आलियाआलिया ही हो रहा है. आज सुबूत मेरे हाथ लगा है. पहले बोलता, तो कोई मानता ही नहीं. सब मुझे सनकी समझते है न…’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है कामरान,’’ महविश ने कहा. आलिया ने भी सफाई दी, ‘‘कामरान, तुम्हें गलतफहमी हुई है. यह लड़की मैं नहीं हूं. यह लड़की दूसरी है. इस पास वाले घर में रहती है.’’

कामरान पर मानो गुस्से का भूत सवार हो गया था, ‘‘तुम यही सब करती रहती हो. गांव में भी तुम्हारे पास लव लैटर मिला था, इसीलिए अब्बा ने तुम्हें यहां शहर में भेज दिया था. तुम भैया का नाम बदनाम करना चाहती हो. भैया की कितनी इज्जत है… लोग क्या कहेंगे?’’

‘‘कामरान, ऐसा कुछ नहीं है,’’ महविश ने समझाना चाहा.

‘‘भाभी, आप नहीं जानतीं… आजकल क्या चल रहा है… हिंदू लड़के मुसलिम लड़कियों को… इस के जैसी बेवकूफ लड़कियों को भगवा ट्रैप में फंसाते हैं… भगा ले जाते हैं… एक मुहिम चला रखी है. उन लड़कों को मकान मिलता है, दुकान भी और नकद पैसा भी. वे लड़के मुसलिम लड़कियों को हिंदू धर्म में दाखिल कर लेते हैं… जहन्नुमी बना देते हैं.

‘‘दूसरी तरफ, अगर मुसलिम लड़का और हिंदू लड़की शादी करना चाहते हैं, तो नहीं कर पाते. मौब लिंचिंग हो जाती है. कचहरी हो या थाना… कहीं भी… यह सब हो रहा है भाभी… और आज अपने घर में भी…’’

‘‘अपने घर में ऐसा नहीं है. यह खत इस बाजू वाले घर की लड़की के लिए है, उस का नाम भी आलिया है.’’

तभी कामरान के हाथ में एक डंडा आ गया. उस ने आलिया पर जोरदार वार कर दिया. आलिया चीख पड़ी. वह चिल्लाती हुई भागी. कामरान ने एक और डंडा मार दिया. आलिया गिर पड़ी और बोली, ‘‘भाभी, बचाओ… समझाओ इसे.’’

‘‘कामरान, रुकोरुको… मारना मत,’’ महविश ने मौका पा कर उस के हाथों से डंडा छीन लिया, ‘‘कामरान, पागल मत बनो…  बात को समझ.’’

उधर आलिया किसी तरह उठी. वह लंगड़ाती हुई भाग पड़ी. कामरान भी उस की तरफ दौड़ पड़ा. आलिया ने अपनी चाल तेज की. करीब ही किचन था. वह किचन में घुस गई. अंदर से दरवाजा बंद करने लगी. तब तक कामरान भी पहुंच चुका था. उस ने जोर से धक्का मारा. दरवाजा खुल गया.

सब्जी के पास छुरी अब भी पड़ी हुई थी. तेज धारदार छुरी. छुरी कामरान के हाथ में आ गई. उस ने आव देखा न ताव छुरी सीधे आलिया के पेट में भोंक दी. एक तेज बहुत तेज खून का फव्वारा फूटा, जो कामरान की आस्तीन के अंदर से होता हुआ, उस की भुजा पर चढ़ गया. आलिया की चीख पूरे घर में गूंज गई. साथ ही साथ महविश की भी.

Love Story Hindi: जूही के मंडवे तले

Love Story Hindi. मन में दुख के घनघोर बादल उमड़घुमड़ कर मेरे सारे वजूद को अपनी लपेट में ले लेते हैं. नींद मेरी आंखों से कोसों दूर है. हर रात मेरे साथ ऐसा ही होता है.

उफ, यह रात क्यों मेरे घावों को कुरेदती है? दिन के उजाले में जब घाव कुछ भरने लगते हैं, तो काली रात उसे हरा कर देती है.

मैं क्या करूं? कैसे आसिफ से कहूं कि रात आते ही मेरे घाव हरे हो जाते हैं. और… और उन घावों में इतनी सड़न होती है कि मेरा दम घुटने लगता है. मुझे खुद ही नफरत होने लगती है. मन करता है कि खुद को अभी, इसी समय खत्म कर डालूं.

मेरे दिलोदिमाग में एक हलचल सी मच जाती?है, पर मैं चाह कर भी खुद को नहीं मिटा पाती. वैसे, मैं मरने से नहीं डरती… लेकिन क्या करूं मुझे जीना पड़ रहा है. अपने लिए नहीं, अपने मासूम फारान और अपनी नन्ही सी बेटी के लिए. और… और अरसलान के लिए.

मैं चाह कर भी अरसलान से कुछ नहीं कह पाती? ‘क्या मैं बेवफा हूं?’ यह सवाल मेरा दिल मुझ से करता.

‘नहीं, हरगिज नहीं. मैं बेवफा नहीं हूं. फिर मैं…’ अरसलान को सबकुछ क्यों नहीं बता देती?

काश, मैं अपने अंदर इतना हौसला पैदा कर पाती कि अरसलान के सीने में सिर छिपा कर उन से सबकुछ बता दूं, ताकि मेरे सीने पर रखा बोझ कुछ हलका हो जाए. मैं चैन की सांस ले सकूं.

अरसलान मुझे बहुत प्यार करते हैं. मैं उन की बीवी हूं. वे जरूर मुझे माफ कर देंगे. और फिर इस में मेरा कुसूर ही क्या?है? मैं ने जानबूझ कर तो कोई गुनाह किया नहीं. तो क्या अरसलान मुझे माफ कर देंगे? क्या सबकुछ जानने के बाद भी वे मुझे पहले सा प्यार देंगे? क्या वे फारान को…

हां, फारान मेरा मंझला बेटा है, पर सिर्फ मेरा ही, अरसलान का नहीं. नहीं, मैं अरसलान से कुछ भी नहीं कहूंगी. वे मर्द हैं… और मर्द… कभी यह बरदाश्त नहीं कर सकता कि उस की पत्नी के साथ…

मैं क्या करूं?

बीते समय के जंगल से गुजरने लगो, तो काफी घनी झाडि़यां मिलती हैं. फिर भी रास्ता बनता चला जाता है. एक के बाद एक सिलसिलेवार कडि़यां मिलती चली जाती हैं. रास्ते खुले नजर आने लगते हैं.

सचमुच बीता समय कितना खूबसूरत होता है. यही समय तो इनसान की सब से बड़ी कमजोरी और सचाई है. ऐसे समय की खुशनुमा बातें जिंदगी की सब से खूबसूरत चीज होती हैं, जबकि बुरा समय सीने में दफन रह कर भी हर पल चुटकियां लेता रहता?है.

मैं हर रात को अपना बीता समय दोहराती हूं, याद रखने के लिए या भूल जाने के लिए. मुझे हर पल अपने बीते समय की एकएक बात याद आती रहती?है. अगर न याद करूं, तो शायद जिंदा ही न रह सकूं. इन का एकएक पल मेरी सांसों की तरह मेरे अंदर महफूज है, जो हर वक्त मुझे तड़पाता है, रुलाता है, जलाता है और पलपल मुझे एहसास दिलाता है कि मैं एक बेदाग औरत नहीं हूं. मेरे अंदर कुछ टूट कर बिखर जाता है. एक हूक सी उठती?है.

काश, मेरी जिंदगी में वे मनहूस पल आए ही नहीं होते. मेरी इज्जत दागदार नहीं हुई होती. आज सबकुछ होते हुए भी मेरे पास कुछ नहीं है, क्योंकि मैं अपनी इज्जत लुटा चुकी हूं.

अगर औरत के पास इज्जत नहीं तो कुछ भी नहीं. मैं ने उस कमजोर समय में औरत के बेदागपन को दागदार कर दिया. मेरे दागदार समय को कोई नहीं जानता, सिवा मेरे और उस के, जो अब दुनिया में नहीं है, इसलिए मेरा बीता समय मेरे पास अमानत के रूप में दिलोदिमाग में दफन है.

आज मैं इस बोझ को अपने दिलोदिमाग से उतार फेंकना चाहती हूं. आसिफ, जो कभी मेरी जिंदगी था, के बगैर मेरा जीना मुश्किल था. मैं और आसिफ इतने आगे बढ़ चुके थे कि पलटना बहुत मुश्किल था.

हमारे बीच न दौलत की दीवार खड़ी थी, न जातबिरादरी की और न ऊंचनीच की. हम मुहब्बत से बहुत खुश थे. जिंदगी बहुत मजे में कट रही थी. हम ने मिल कर ढेर सारे सपने संजोए थे.

उन दिनों जिंदगी काफी खूबसूरत लगती थी. मैं और आसिफ उस रैस्टोरैंट के बरामदे में लगे जूही के मंडवे तले घंटों बातें किया करते थे, वादे करते, कसमें खाते, साथसाथ जीने और मरने की बातें करते.

एक दिन अब्बू ने मेरी शादी अरसलान से तय कर दी. उन दिनों आसिफ फौज की ट्रेनिंग पर गया हुआ था. मैं बुजदिल लड़की तब कुछ बोल नहीं सकी. मैं ने उसे मोबाइल पर फोन करने की कोशिश भी की, पर पता चला कि वह उस इलाके में है, जहां नैटवर्क भी नहीं चलता और सिर्फ सैटेलाइट फोन से सेना वाले काम करते हैं.

मैं विरोध कैसे करती. जब तक आसिफ साथ न हो, मैं कैसे अब्बूअम्मां के सामने झोली फैला सकती थी. छिपछिप कर रोती रही. अपनी बरबादी का दुख मनाती रही. बस, एक उम्मीद थी कि शायद आसिफ ही आ कर कुछ करे. मैं ने आसिफ के पास चिट्ठी भी लिख दी.

आसिफ का जवाब 2-3 महीने बाद आया, ‘मुहब्बत की आखिरी मंजिल शादी नहीं होती. मुहब्बत का मजा तो एकदूसरे को खोने में है, पाने में नहीं. हम ने एकदूसरे को चाहा जरूर है, मगर जरूरी नहीं कि जिस चीज को इनसान चाहे, वह उसे मिल ही जाए.

‘तुम सबकुछ भूल जाओ. समझ लेना कि हम ने गुडि़यागुड्डे का खेल खेला था. तुम जानती हो कि तुम्हारे पिता कितने जिद्दी हैं. वह अपनी इज्जत पर आंच नहीं आने देंगे, बल्कि बेटी को इज्जत के लिए कुरबान कर देंगे.

‘यही समय की जरूरत है. कुछ भी सोचना या चिंता करना बेकार है. समय बहुत गुजर चुका है. तुम्हारे पिता अरसलान के बाप को जबान दे चुके हैं. मुझे भूल जाओ, इसी में तुम्हारी भलाई है.’

मैं रोती रही. मेरे आंसू पोंछने वाला कोई नहीं था. एक दिन मेरे सपनों का जनाजा डोली के रूप में निकला. मैं ने भी हालात से समझौता कर लिया. यहां तक कि मैं एक बच्चे की मां बन गई. मैं अपने बेटे शायान के प्यार में धीरेधीरे अपने बीते समय को भूल बैठी.

अरसलान ने मुझे इतना प्यार दिया कि कभीकभी मुझे अपने ऊपर गुस्सा आता कि मैं कैसी बीवी हूं. इतना अच्छा पति प्यार करने वाला मिला?है. उस पर भी मैं उसे याद करती हूं, जिस ने ‘गुडि़यागुड्डे का खेल’ कह कर मेरी भावनाओं को करारी चोट पहुंचाई?है.

मैं सचमुच अपने घर, अपने शौहर और शायान में ऐसी खोई कि फिर पलट कर कभी उस रैस्टोरैंट को नहीं देखा, जहां जूही लगी थी.

वक्त अपनी रफ्तार से दौड़ता रहा. अरसलान दफ्तर के काम से दौरे पर जाने वाले थे. मैं भी बहुत दिनों से नैहर नहीं गई थी. अरसलान मुझे मेरे मायके छोड़ कर दौरे पर चले गए. मैं बहुत दिनों

बाद अपने अब्बू के घर आई थी. यहां मुझे आसिफ के साथ गुजारे गए समय की याद आने लगती, तो मैं परेशान हो उठती.

तभी आसिफ वापस भी आ गया. वह फौजी वरदी में बहुत शानदार लग रहा था. उसे देखते ही मेरे मन में कड़वाहट भर आई. मैं हर समय उस से दूर रहने की कोशिश करती. मगर, मैं उस से जितना दूर भागती, वह मेरे उतना ही करीब रहने की कोशिश करता. बारबार ह्वाट्सएप पर मैसेज भेजता, ‘एक बार तो मिल लो.’

एक दिन उसे मुझ से बातचीत करने का मौका मिल ही गया. मैं बाद में उसी जूही के मंडवे तले बैठी थी. शायान सो चुका था. अम्मी भी सोई हुई थीं. पिताजी मुकदमे की पेशी के सिलसिले में 2 दिनों के लिए बाहर गए हुए थे.

शाम के 7 बजने वाले थे. अंदर कमरे में उमस थी. मैं चुपके से रैस्टोरैंट में चली गई. वहां जूही के पेड़ के नीचे बैठ गई. उस पर बेशुमार सफेदसफेद फूल खिले हुए थे, जिन की खुशबू आसपास फैली हुई थी. अजीब सा माहौल था. कुछ पुरानी यादें, कुछ फूलों की भीनीभीनी खुशबू. इन सब ने मेरे अंदर एक हलचल सी मचा दी थी.

हवा ठहरठहर कर चल रही थी. जब हवा चलती, तो फूल जमीन पर बिखर जाते. जमीन जूही के फूलों से भरी पड़ी थी. मैं ने मुट्ठीभर फूलों की पंखुडि़यां उठा कर अपनी गोद में रख लीं, तभी अचानक आसिफ मेरे बिलकुल नजदीक आ कर खड़ा हो गया. उसे देखते ही मैं संभल कर बैठ गई.

‘‘मुझे मालूम था कि तुम यहीं होगी. नाराज हो क्या?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो फिर मुझ से कतराती क्यों हो? मेरे मैसेजों पर रिप्लाई क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘आसिफ, अब मेरी शादी हो चुकी है. अब तुम से मेरा क्या वास्ता?’’

‘‘कहीं प्यार के पल भी भुलाए जा सकते हैं? उन्हें भुलाना इतना आसान नहीं होता.’’

‘‘नहीं आसिफ, मैं ने अपने बीते समय को बिलकुल भुला दिया है. मैं अपनी दुनिया में बहुत खुश हूं. मैं एक वफादार बीवी हूं. मेरे पति ने मुझे सबकुछ दिया है. मैं ने सच्चे दिल से अपने पति को स्वीकार कर लिया है. मैं ने सबकुछ पीछे छोड़ दिया है आसिफ.’’

‘‘राहेला, मैं तुम्हारा कुसूरवार हूं, पर मैं ने अपने दिल पर पत्थर रख कर तुम्हारे पिता की इज्जत के लिए कहा था, क्योंकि मैं उन्हें खूब जानता हूं. आखिर वे हैं मेरे चाचा ही न. उन से यह कहने की हिम्मत मुझ में नहीं थी कि मैं राहेला को अपनाना चाहता हूं.

‘‘मैं बुजदिल था राहेला. आज मुझे अपनी हार महसूस हो रही है. यह चुप्पी मेरा दम घोंटती है. मेरे अंदर कुछ टूट कर बिखर जाता है. अब मेरी हिम्मत जवाब दे गई है.

‘‘तुम ही बताओ, पानी नहीं मिल पाने के चलते सूख गईं जड़ों को उखड़ने में समय नहीं लगता है? मुझे माफ कर दो राहेला. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं.

‘‘राहेला, इतनी बेरुखी मैं बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा. वैसे भी एक फौजी की जिंदगी का क्या भरोसा? अगली बार मोरचे पर से लौट पाऊंगा भी या शहीद हो जाऊंगा, कुछ मालूम नहीं. अगर तुम ने मुझे माफ नहीं किया, तो मैं बहुत शर्मिंदा होऊंगा.’’

आसिफ मेरे नजदीक बैठ कर जूही की टूटी पंखुडि़यों से खेल रहा था. उस के चेहरे पर अजीब सी उदासी छाई हुई थी. वह मेरे इतने करीब बैठा था कि मेरा दिल धकधक करने लगा.

‘‘राहेला, मुझे माफ नहीं करोगी?’’ उस की आवाज में दुनिया का दर्द समाया हुआ था.

उस ने मेरा हाथ थाम लिया. मैं अरसलान को भूल गई. बेटे शायान को भी भूल बैठी. आसिफ मेरे बालों में धीरेधीरे अपनी उंगलियां फेर रहा था. उस की गरम सांसें मुझे पिघलाए दे रही थीं. जूही के मंडवे तले हम दुनिया से बेखबर बैठे थे.

‘‘राहेला,’’ उस ने मुझे धीरे से पुकारा. उस की आवाज मुझे बहुत दूर से आती महसूस हुई.

‘‘हां,’’ मैं ने भी धीरे से कहा.

‘‘मैं अगर मर गया तो…?’’ उस ने बात अधूरी छोड़ दी.

मैं खामोश रही. हम दोनों पर शैतान हावी हो चुका था.

आसिफ ने मुझे अपनी बांहों के घेरे में कैद कर लिया. मैं छटपटाई, क्योंकि हम ने पहले कभी ऐसी हरकत नहीं की थी. हमारी मुहब्बत बेदाग थी.

रात हो गई थी. रैस्टोरैंट का मालिक भी जा चुका था. उस ने हमें देखा ही नहीं.

उसी जूही के मंडवे तले हम कहां से कहां निकल गए… हकीकत से दूर भावनाओं की दुनिया में हम बहते चले गए. जूही के फूलों की चादर हमारी बिछावन बनी थी. जब भावनाओं का बुखार उतरा, तो मैं घबरा गई. मुझे उन बिखरे फूलों की पंखुडि़यों की चादर औरत की इज्जत का कफन लगने लगी. मैं अपनी नजरों में गिर गई. मुझे खुद से नफरत हो गई. फिर मैं ने आसिफ का सामना नहीं किया. अरसलान के आने से पहले ही मैं पिता के साथ लखनऊ चली गई.

उस नाजुक समय में मुझ से अनजाने में जो गलती हुई थी, उसे मैं अपने दिल में तो छिपाए रही, पर मेरा मन घुटता रहता. हर समय मैं अपनी उस गलती की आग में जलती रहती.

अरसलान करीब 15 रोज बाद लौटे. कुछ दिनों के बाद मुझे अपने अंदर एक पौधे के पनपने का एहसास हुआ. मैं घबरा उठी. ओह, यह कैसी सजा मुझे मिली है. मैं 2 महीने तक अरसलान से यह बात छिपाए रही, फिर जब मेरा जी मिचलाने लगा, तो घर में मेरी बूढ़ी सास की आंखों में चमक आ गई. मुझे ले कर ननद डाक्टर के पास गई.

डाक्टर ने नए मेहमान के आने की सूचना दे दी. सभी खुश थे. मेरी सास को बच्चों से बेहद प्यार था. वे चाहती थीं कि उन के बहुत सारे पोते हों. वक्त आने पर मैं ने अपने दूसरे बेटे फारान को जन्म दिया.

फारान अरसलान की आंखों का तारा है. आसिफ एक आतंकवादी मुठभेड़ में शहीद हो चुका है. वह जातेजाते अपनी निशानी दे गया और साथ में मुझे शर्मिंदा भी कर गया.

मैं सोचती हूं कि अरसलान को अपना गुनाह बता कर कुछ बोझ हलका कर लूं… पर, क्या फिर अरसलान मुझे पहले जैसा प्यार देंगे? क्या वह मुझ से नफरत नहीं करने लगेंगे?

शायद करेंगे… मैं औरत हूं न, इसी लिए. मेरा गुनाह माफ नहीं किया जाएगा. समय कितना आगे निकल गया और मैं कितनी पीछे रह गई. अपनी गलतियों से मेरे बीते समय के साथ.

मैं हकीकत हूं या सपना? मैं सिर्फ औरत हूं, सिर्फ औरत. जिस की जिंदगी सिर्फ प्याज के समान है, जो कुतरतेकुतरते खत्म हो जाती है. जिन की आंखें गीली लकडि़यां सुलगाने के बहाने गीली होती रहती हैं.

मैं सोचती हूं, क्या बता दूं? नहीं, क्योंकि मैं एक औरत हूं.

हम जिंदगी के किसी भी मैदान में चाहे कितनी ही बड़ी जीत हासिल कर लें, फिर भी कभी कोई बदलाव नहीं ला सकते.

शायद मेरी जिंदगी में घुटन ही घुटन है, जो मेरी जिंदगी के साथ ही खत्म होगी. हर मोड़ पर, हर दोराहे पर औरतपन की दीवार हमारे आगे सीना तान कर खड़ी है. तो क्या मैं मौत को अपने गले लगा लूं? नहीं.

मैं ने एक नजर अपने तीनों बच्चों पर डाली, जो बेखबर सोए हुए हैं.

मेरी नजरें अरसलान पर जा टिकी हैं. वे सोते में भी मुसकरा रहे हैं. यह मेरा घर है. खुशियों, मुहब्बतों, उमंगों, चाहतों से भरपूर. इस नगरी में मासूम मुहब्बतें बिखरी पड़ी हैं. मुझे खुद ही सब सहना होगा, मुसकरा कर, हंस कर, खुशीखुशी. यह बात मेरा दिल खुशियों से भरे इस घर को देख कर कह रहा है.

लेखक : सबीहा

Romantic Story : हमेशा रंग लाती है कुरबानी

Romantic Story. इंटरनैट का दौर अभी शुरू ही हुआ था. चैटिंग के जरीए मेरी मुलाकात गडि़या के एंड्रूज कालेज की एक लड़की शुभा से हुई. उसी समय मेरी नौकरी साउदर्न एवेन्यू के एक मारुति शोरूम में सेल्स एग्जीक्यूटिव के तौर पर लग चुकी थी. जिंदगी नईनई खुशियों से भर रही थी. एक तरफ कैरियर की शुरुआत, दूसरी तरफ शुभा जैसी दोस्त का साथ.

समय के साथ हमारी दोस्ती गहरी होती गई. तभी एक दिन शुभा ने बताया कि उस की सहेली नैना को मेरी मदद की जरूरत है. बिना ज्यादा सोचे मैं ने उस की मदद कर दी. शायद वहीं से मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया.

कुछ समय बाद नैना मुझ से मिलने गरियाहाट आई. एक कौफी शौप में हमारी पहली मुलाकात हुई. उस ने ‘थैंक यू’ कहा, लेकिन उस की आंखों में जो भाव थे, वे शब्दों से कहीं ज्यादा गहरे थे.

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बातचीत के दौरान नैना ने अपने संघर्षों के बारे में बताया.पिता के न रहने के बाद मां के साथ मामा के घर रहना, मां की सरकारी नौकरी से घर चलना और खुद के बड़े सपने.

नैना की सादगी, उस की आंखों का दर्द और उस के भीतर का जुनून, सबकुछ मुझे  छू गया. धीरेधीरे हमारी बातचीत बढ़ी और कब यह रिश्ता दोस्ती से आगे बढ़ गया, पता ही नहीं चला.

वक्त बीता, कालेज खत्म हुआ और नैना ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी में स्नातकोत्तर में दाखिला लिया. मैं ने उसे अपनी मां से भी मिलवाया. लेकिन शायद यहीं से मेरी जिंदगी की सब से बड़ी भूल शुरू हुई. मैं अपने परिवार और अपने प्यार के बीच बैलेंस नहीं बना पाया.

नैना मीडिया में कैरियर बनाना चाहती थी. एक दिन मैं ने उसे एक बड़े मीडिया हाउस की वैकेंसी के बारे में बताया. उस ने आवेदन किया और उस की नौकरी लग गई. 6 महीने में उसे प्रमोशन भी मिला.

लेकिन इसी बीच नैना के घर में शादी की बात चलने लगी. एक दिन उस ने मुझ से कहा, ‘‘हमें अब शादी कर लेनी चाहिए.’’ मैं उसे समझाता रहा कि मैं घर वालों को मना लूंगा. मैं चाहता था कि हम सब साथ रहें, लेकिन हालात मेरे बस में नहीं थे.

एक दिन नैना ने कहा कि हम भाग कर शादी कर लें. मैं फिर भी परिवार को साथ रखने की जिद में अड़ा रहा. तभी मेरे दोस्त संजीव, जो जमशेदपुर में काम करता था, अचानक आया. उस ने कहा, ‘‘तुम दोनों यहां आ जाओ, नई जिंदगी शुरू करो.’’

इस बार हम ने फैसला कर लिया. हम ने शाम 5 बजे बसअड्डे पर मिलने का तय किया. मैं पहुंच गया लेकिन नैना नहीं आई. मैं ने फोन किया. कोई और उठा रहा था. उस ने कहा, ‘‘एक बस हादसा हुआ है आप तुरंत म्युनिसिपल अस्पताल पहुंचिए.’’ अस्पताल पहुंचा तो देखा कि नैना अपनी आखिरी सांसें गिन रही थी. उस दिन के बाद मैं उस से कभी नहीं मिल पाया.

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सरिता

 

समय बीतता गया. जिंदगी आगे बढ़ी. मुझे  सन्मार्ग हिंदी अखबार में नौकरी मिली, फिर आईएचएम कोलकाता में हिंदी अफसर बनने का मौका मिला. बाद में अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया और गूगल से जेआरएफ फंड भी मिला.

मेरा नाम इंडिया बुक औफ रिकौर्ड्स और वर्ल्ड रिकौर्ड्स यूनिवर्सिटी में दर्ज हुआ.

लेकिन यह सारी कामयाबियां अधूरी हैं, क्योंकि यह सब मैं उसे कभी बता नहीं पाया. अगर उसे पता होता तो शायद वह सब से ज्यादा खुश होती.

आज कई साल बीत चुके हैं. दाढ़ी में सफेदी आ गई है, लेकिन उस की यादें आज भी ताजा हैं. उस की मासूमियत, उस का भोलापन, उस की नाराजगी कुछ रिश्ते अधूरे रह कर भी जिंदगी भर पूरे लगते हैं. Romantic Story

लेखक : सप्तर्षि विश्वास

Hindi Story: पिघलता सावन

Hindi Story: डो बैल की आवाज सुन कर अमन ने दरवाजा खोला.
‘‘अरे, मंजरी तुम? यहां कैसे अचानक?’’
‘‘अंदर नहीं आने दोगे क्या? सारे सवालों के जवाब यहीं चौखट पर चाहिए?’’
‘‘अरे, नही. आओ, अंदर आओ,’’ अमन ने पानी का गिलास पकड़ाते हुए पूछा, ‘‘यहां कैसे?’’
‘‘तुम एक्सपैक्ट नहीं कर रहे थे मुझे’’
‘‘यों अचानक कैसे कर सकता हूंतुम्हीं बताओ?’’
अभी उन्होंने बात शुरू ही की थी कि अचानक मौसम पलटने लगा. सुरमई घटाओं के साए यहांवहां दौड़ने लगे, हवा ने भी ठंडक से दोस्ती कर ली और बादल भी अपनी धीमी आवाज में ताल छेड़ने लगे. सावन का महीना, कब धूप कब बारिशवैसे भी दिल्ली का अपना कोई मौसम तो है नहीं. आसपास के मौसम में रंग जाता है और बिखर भी जाता है.
‘‘लगता है कि बारिश होगी…’’ अमन ने मंजरी के हाथ से गिलास वापस लेते हुए कहा.
‘‘हां, लगता तो है.’’
‘‘इस से तो तुम्हें वापसी में परेशानी हो सकती है.’’
‘‘तो क्या मैं यहां नहीं रुक सकती?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘फैसला तुम्हारा ही था, रुकने का,’’ अमन ने मंजरी की बु? सी आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें जाना क्यों है? क्यों जाना चाहती हो अपना भरापूरा, बसाबसाया घर छोड़ कर
‘‘सबकुछ तो है तुम्हारे पास. एक बड़ा घर, बैंक बैलेंस, 2 खूबसूरत बच्चे, एक अच्छी नौकरी वाला सच्चा पति और उस पर तुम्हारी इतनी अच्छी जौब. मु? से ज्यादा ही कमाती हो, फिर संतुष्ट क्यों नहीं हो तुम?’’
‘‘हां, मैं संतुष्ट नहीं हूं तुम से.’’
‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ अमन
ने पूछा
‘‘यही कि तुम मु? संतुष्ट नहीं कर पाते हो.’’
अमन पर जैसे बिजली गिरी. कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर अपने अंदर की सारी ताकत जमा करता हुआ वह बोला, ‘‘देखो, मैं एक आम इनसान हूं, कोई सुपरमैन नहीं.’’
‘‘पर मु? सुपरमैन ही चाहिए…’’ मंजरी ने अमन के चेहरे पर नजर गड़ाए हुए कहा, ‘‘जो मु? शारीरिक रूप से संतुष्ट कर सके, चरम सुख का अहसास
करा सके.’’
‘‘वाहियात किस्म की मैगजीन पढ़ कर दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा.’’
‘‘छोड़ो, मैं तुम से किसी बहस में उल?ाना नहीं चाहती.’’
‘‘अगर मु? में कुछ कमी होती तो हमारे ये 2 बच्चे कैसे हो गए?’’
‘‘बच्चे तो हिजड़ों के भी हो जाते हैं,’’ मंजरी की यह बात सुन कर अमन भीतर ही भीतर गुस्से से तमतमाने लगा. उस का दिल चाहा कि 2 थप्पड़ में सारा चरम सुख पानी की तरह बहा दे, लेकिन उस ने खुद पर बड़ी मुश्किल से
कंट्रोल पाते हुए कहा, ‘‘देखो, अभी तुम बहकी हुई हो, सोचसम? कर सही फैसला लो.’’
‘‘अच्छी तरह सोच समझकर लिया है मैं ने यह फैसला. वैसे भी तुम्हारे साथ बहुत समय गंवा दिया है मैं ने. मैं तुम से तुम्हारी दौलत और जायदाद मैं से कोई हिस्सा नहीं मांग रही हूं और ही तुम्हें कोर्टकचहरी में फंसाना चाहती हूं. मैं बस तुम से आजाद हो कर अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बिताना चाहती हूंबिंदास.’’
‘‘चलो, मैं मान लेता हूं कि तुम्हें चरम सुख नहीं दे पाता हूं, मगर ऐसा
प्ले बौय टाइप का आदमी तुम्हें
मिलेगा कैसे और कहां?’’ अमन ने चिंतित आवाज में कहा.
मंजरी मुसकराती हुई अपना बैग उठा कर दरवाजे से बाहर निकल गई.
‘‘हां, फैसला तो मेरा ही था. बच्चे कहां हैं? आज तो संडे है, घर पर ही होना चाहिए,’’ मंजरी ने इधरउधर नजर दौड़ाते हुए कहा.
‘‘बच्चे याद हैं तुम्हें?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.
‘‘ताना दे रहे हो?’’
‘‘तुम जो चाहे सम?. तुम्हारा अपना दिमाग है और अपनी सोच.’’
‘‘जन्म तो मैं ने ही दिया था.’’
‘‘काश, जाते समय यह सोच लेती. खैर, छोड़ो मैं भी किन बातों में उल? गयाकौफी पियोगी?’’ अमन ने पूछा.
‘‘तुम ने बच्चों से क्या कहा? उन की मां कहां गई?’’
‘‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं दिल्ली शिफ्ट हो गया हूं?’’ अमन
ने कुरेदा.
‘‘तुम सरकारी नौकर हो, आसानी से पता मिल गया. बच्चों से क्या कहा तुम ने? और बच्चे हैं कहां?’’
‘‘इन सब बातों में क्यों उल? रही हो तुम? वैसे, तुम आई क्यों हो?’’
‘‘बताते क्यों नहींबच्चे कहां हैं?’’
‘‘जैसे मेरा पता किया, बच्चों का भी पता कर लेती…’’
‘‘मतलब तुम नहीं बताओगे?’’
‘‘क्या तुम भी बच्चों की रट
लगा रही होतुम ने कल रात कोई
सामाजिक उपन्यास पढ़ लिया क्या पोर्न मैगजीन की जगह?’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
बादलों की तेज गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी और बारिश होने लगी. अभी बारिश थोड़ी हलकी ही थी,
लेकिन शोर बहुत था पानी काजो पानी कभीकभी गंदगी अपने साथ बहा ले जाता है और ले भी आता है.
बाहर लौन में पानी के ऊपर गंदगी जमा होने लगी. साथ ही बारिश धीरेधीरे तेज होने लगी, लेकिन अब शोर कुछ कम हो गया था.
मंजरी कुछ बोली, बस आंखें बंद किए सोफे से सिर टिकाए रही.
अमन ने उठ कर कौफी बनाई, साथ ही कुछ स्नैक्स भी टेबल पर ला कर रखते हुए बोला, ‘‘कौफी पियो.’’
‘‘तुम तो मेहमान सम? कर खातिरदारी कर रहे हो…’’ मंजरी ने अमन की आंखों में ?ांकते हुए कहा.
‘‘लेकिन मेहमानों से लोग खुश
होते हैं.’’
‘‘पर मेरे आने से तुम खुश नहीं हो.’’
‘‘सच तो यह है कि कोई अहसास ही नहीं हो रहा है.’’
‘‘अगर मैं आती तो?’’
‘‘तो कुछ नहींअब आई हो तो भी कुछ नहींकुछ जिंदा नहीं है.’’
‘‘ठीक कहा तुम ने. हम मर ही तो जाते हैं ख्वाहिशों में घिर कर…’’
‘‘तुम्हारे चरम सुख का अहसास कैसा रहा और अनुभव भी?’’
‘‘कुछ दिन तो अच्छा लगता है, फिर हम थकने लगते हैं.’’
‘‘तो अभी अच्छा लगता है या थक गई हो?’’
‘‘तुम्हें क्या लगता है?’’
‘‘थकावट तुम पर ज्यादा भारी पड़ गई है शायद.’’
‘‘तुम पहले से भी ज्यादा सम?ादार हो गए हो.’’
बारिश अब मूसलाधार हो गई है.
घर के आंगन में थोड़ा पानी ठहरने लगा है. बाहर की सड़कें डूब गई हैं. सारा कूड़ाकचरा पानी पर तैरने लगा है. बारिश के दिनों में दिल्ली बद से बदतर हो
जाती है.
‘‘तुम यहां कहां ठहरी हुई हो? वैसे, मु? पूछना तो नहीं चाहिए था,’’ अमन ने चुप्पी तोड़ी.
‘‘क्या जाने के लिए कह रहे हो?’’
‘‘सम?ादार तो तुम भी बहुत हो,’’ कहते हुए अमन ने खिड़कियों के परदे हटा दिए और कांच वाले पल्ले खोल दिए. अब ड्राइंगरूम में कुछ ताजा हवा आने लगी.
‘‘अभी तो शाम होने में समय है,
जब बरसात रुक जाए तो चली जाना,’’ अमन बोला.
‘‘सैक्स में भी यही होता हैपानी खत्म सैक्स खत्म. बरसात हवस एकजैसे ही हैं, जब तक बरसात कायम है तब तक मौसम सुहाना रहता है, उस के बाद उमस. सैक्स में आकर्षण तो है, पर हमेशा के लिए नहीं.’’
‘‘हमेशा के लिए तो कुछ भी नहीं होता मंजरी.’’
‘‘प्यारहोता है हमेशा के लिए.’’
‘‘अब तुम 40 की हो गई हो. जब
28 की थी तो चरम सुख के लिए भटकी, अब प्यार के लिए? तुम ने जिंदगी को जरूरतों के हिसाब से जीने की कोशिश की, पर जिंदगी आपसी तालमेल और सहयोग से भी जी जा सकती थी,’’ अमन ने कहा.
‘‘उपदेश दे रहे हो?’’
‘‘जब उपदेश देना चाहता था, तब तुम ने सुना नहीं. अब क्या फायदा इन प्रवचनों का?’’
‘‘भूल सुधारी भी जा सकती है और राह से भटका इनसान सही राह पर भी सकता है.’’
‘‘बिलकुल, अगर वह भूल हो तो.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो ? मैं पछतावा करूं?’’ मंजरी थोड़ी तेज आवाज में अमन से बोली.
‘‘नहीं. मैं क्यों चाहूंगा? मेरा इस
से क्या सरोकार?’’ अमन ने कहा.
‘‘सरोकार होता तो तुम वह करते जो मैं कहती थी.’’
‘‘मतलबजोश बढ़ाने वाली
दवा? जो तुम मैगजीन में पढ़ कर सजैस्ट करती थी…’’
‘‘पर तुम एक बार कोशिश कर के तो देखते.’’
‘‘मैं जैसा था खुद से सैटिस्फाई था और हूं भी. तुम भी अब सैटिस्फाई
तो होगी? 12 साल से चरम सुख लेने
के बाद?’’
कमरे में खामोशी छा गई. सिर्फ बारिश की आवाज अपने सुरीले अंदाज में आलाप ले रही थी. हवा में थोड़ी और ठंडक बढ़ गई थी और थोड़ा अंधेरा भी बढ़ गया था. ऐसा लगता था सावन आज अपने पूरे जोबन पर है.
‘‘तुम मु? माफ नहीं कर सकते?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘शायद तुम जानती हो कि मैं इस तरह नहीं सोचता. अंधेरा बढ़ रहा है और बारिश भी. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहेगा. बारिश भी रुकेगी और अंधेरा भी छंटेगा. बस, थोड़ा सा समय लगेगा,’’ अमन ने कहा.
‘‘मगर, इस चक्कर में कहीं ज्यादा देर हो जाए?’’
‘‘तुम फिक्र मत करो, मु? खाना बनाना आता है. आज मेरे हाथ का बना खाना खा कर जाना,’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘मैं ने खाने की बात नहीं की. और यह क्या तुम ने जाने की रट सी लगाई हुई है?’’
‘‘तो फिर…’’ अमन बोला.
‘‘मैं कहीं नहीं जाने वाली.’’
‘‘इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी मंजरी.’’
‘‘इस बार भी मेरी ही चलेगी. मैं यहां  तुम्हारे पास मरने आई हूं. मेरा हक है अपने घर में मरना. मैं अभी भी तुम्हारी पत्नी हूं.’’
‘‘कहना क्या चाहती हो?’’
‘‘2 महीने हैं मेरे पास, वे तुम्हारे साथ  बिताना चाहती हूं. यूटरस में कैंसर पड़ गया है.’’
‘‘यूटरस तो निकाला जा सकता है.’’
‘‘तो तुम मु? जिंदा देखना चाहते हो?’’ मंजरी पहली बार खिलखिला
कर हंसी और हंसती ही रही बड़ी देर तक, फिर अचानक मंजरी की हंसी
रुक गई.
अमन ने मंजरी की तरफ देखा. वह एक ओर को लुढ़की हुई थी.
अमन लपक कर उस तक पहुंचा. मंजरी को सीधा कर लिटाया. उस
ने चैक किया, सांसें चल रही थीं.
उस ने जल्दी से पानी के छींटे मुंह
पर मारे.
कुछ ही देर के बाद मंजरी को होश गया. वह थकी हुई आवाज में
बोली, ‘‘लास्ट स्टेज. यूटरस निकलवा चुकी हूं. आपरेशन हो चुका है, पर
कैंसर बाकी हिस्से में फैल चुका है. सिर्फ 2 महीने…’’
बारिश आहिस्ताआहिस्ता कम होने लगी. काली घटाएं छटने लगीं और  अंधेरा भी कम होने लगा था. सड़क का पानी अपने साथ गंदगी बहा कर ले गया. घर का आंगन भी बरसात के पानी से धुल कर चमकने लगा था.
‘‘अब कहो तो मैं चली जाऊं?’’ मंजरी ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘नहीं. इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी,’’ मौसम की नमी अब अमन की आंखों में थी.
मौसम बिलकुल साफ था.      

लेखक – अहमद मुख्तार

Hindi Story: कलम का जादूगर

Hindi Story. ‘‘को आदमी अपनी गाड़ी के सामने गया है,’’ अपने पति मोहन की यह बात सुन कर किसी अनहोनी के डर से गीता का कलेजा कांप उठा.


अभी नीचे उतरने के लिए गाड़ी का दरवाजा खोला ही था कि उस आदमी का चेहरा देख कर गीता चौंक गई. उस ने ?ाट से हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया. वह कोई और नहीं, बल्कि गीता का सालों का खोया हुआ प्यार अजय था, लेकिन गाड़ी की टक्कर से उसे चोट नहीं आई आई थी.
‘‘सर, आप ठीक तो हैं ?’’ मोहन ने ?ाट गाड़ी से नीचे उतर कर अजय को संभालते हुए पूछा.
गीता और मोहन अपने एकलौते बेटे को लेने के लिए दिल्ली के रेलवे स्टेशन जा रहे थे, तभी यह हादसा हुआ था.


‘‘हां, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ अजय ने कहा. ‘‘लेकिन सर, आप यहां कैसे? मोहन ने पूछा.‘‘सर, आज ही मेरी बेटी लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी कर के घर वापस आई थी. उस के यहां घूमने की जिद के चलते मैं यहां था,’’ अजय ने बताया. ‘‘लेकिन आप की बेटी इस समय आप के साथ नहीं है?’’ मोहन ने पूछा. ‘‘वह कुछ खरीदारी करने गई थी, आती ही होगी,’’ जवाब में अजय ठहाका मार कर हंस पड़ा, तो गीता भी उस के साथ मुसकरा उठी. काफी अरसे बाद वे दोनों साथ हंस रहे थे, लेकिन अजय को इस बात की जानकारी नहीं थी.


देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जमा होने लगी. सब की आंखें अजय पर टिकी हुई थीं. लेकिन गीता की समझ में कुछ नहीं रहा था. तभी उस भीड़ को चीरती हुई एक बेहद खूबसूरत गाड़ी कर रुकी. उस गाड़ी के सामने गीता की गाड़ी फीकी लग रही थी. उस गाड़ी की ड्राइविंग सीट से एक लड़की उतरी और अजय को देखते हुए बोली, ‘‘पापा, आप यहां क्या कर रहे हैं? सब ठीक तो है ? यहां इतनी भीड़ क्यों जमा है?’’ ‘‘कुछ नहीं बेटाबस ऐसे ही’’ अजय ने कहा. ‘‘तो फिर घर चलें हम?’’ वह लड़की बोली.


‘‘चलता हूं,’’ अजय ने वहां जमा भीड़ की तरफ हाथ जोड़ते हुए कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया. उस के बैठते ही गाड़ी सड़क पर दौड़ने लगी. जब अजय की गाड़ी दूर निकल गई और गीता को यह यकीन हो गया कि अब वह भीड़ की तरफ मुड़ कर देखेगा, तो भी उसे नहीं पहचान पाएगा, लिहाजा वह गाड़ी से नीचे उतर गई. ‘‘कौन था यह आदमी?’’ गीता ने अनजान बनते हुए मोहन से पूछा. ‘‘जादूगर,’’ मोहन ने कहा.


‘‘जादूगर?’’ गीता ने मोहन का यह शब्द बड़े ही जबरदस्त अंदाज में दोहराया. ‘‘हां, कलम का जादूगर. दुनियाभर में इस के लिखे उपन्यास खूब बिकते हैं. फुरसत के पलों में मैं भी इस के उपन्यास बड़े ही चाव से पढ़ता हूं,’’ मोहन ने गीता को बताया. उस समय रात के 2 बज रहे थे, लेकिन गीता की आंखों से नींद कोसों दूर गायब थी. आज उसे रहरह कर पुरानी यादें ताजा हो रही थीं.


गीता अजय की सादगी पर मरमिटी थी. वे दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे और प्यार भी करते थे. लेकिन उन दोनों के प्यार को गीता के भैया की नजर लग गई थी.गीता के भैया नहीं चाहते थे कि वह एक गरीब लड़के से प्यार करे, क्योंकि गीता एक अमीर परिवार से थी, इसलिए उस के भैया की नजर में अजय गरीब होने के साथसाथ एक गंवार और जाहिल लड़का भी था. लेकिन प्यार तो प्यार होता है. एक दिन गीता के भैया ने उन दोनों को एकसाथ देख लिया.

उसी दिन भैया ने गीता की शादी अपने दोस्त के बेटे के साथ तय कर दी. भैया, मैं यह शादी नहीं कर सकती,’ गीता ने कहा. क्यों? क्या बुराई है इस रिश्ते में?’ भैया ने पूछा. कुछ नहीं भैया. बुराई तो आप की बहन में है जो किसी से बेपनाह मुहब्बत कर बैठी है.’ किस से? उस अनपढ़, जाहिल, गंवार लड़के से, जिस के पास कोई ठिकाना नहीं है?’ हां भैया.

आप की यह बहन उस के बगैर जिंदा नहीं रह सकती, इसलिए आप मेरा प्यार मेरी झोली  में अपनी तरफ से भीख समझ कर डाल दीजिए,’ यह कहते हुए गीता ने अपना आंचल भाई के आगे फैलाया ही था कि भाई ने गीता के गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया. थप्पड़ इतना जोरदार था कि गीताधड़ामसे फर्श पर गिर गई. गीता को इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी. आज अपने मांबाप की बहुत कमी खल रही थी कि तभी अजय की आवाज उस के कानों में गूंजी.


देख लीजिए भैया. अजय आज अपने प्यार को छिनते देख कर आप के पास चला आया है.’ मैं इस की हिम्मत का कद्र करता हूं, लेकिन आज यह मेरे हाथों से जिंदा बच कर नहीं जाएगा,’ कहते हुए भैया दीवार पर टंगी हुई म्यान से तलवार खींच कर दरवाजे की तरफ बढ़ गए. नहीं भैया, आप ऐसा नहीं करेंगे. आप जहां चाहेंगे, मैं वहीं शादी करने के लिए तैयार हूं,’ जब गीता ने यह कहा, तो भैया के बढ़ते कदम रुक गए.


तो जा कर उस से कह दो कि तुम इस शादी से खुश हो. साथ ही यह भी बोल देना कि आज के बाद वह
यहां आसपास भी दिखाई दे,’ भैया ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा. अजय गली में खड़ा था. गीता के बाहर आते ही उस ने गीता का हाथ कस कर पकड़ कर कहा, ‘यह मैं क्या सुन रहा हूं…’ तुम ने ठीक सुना है…’ गीता की आवाज कड़क थी, ‘आखिर जिस से मेरी शादी हो रही है, उस के पास सबकुछ है. तुम्हारे पास क्या है?’


क्या तुम ने इसलिए मुझसे से प्यार किया था कि आज मेरी हैसियत का मजाक उड़ा सको?’ गीता ने कुछ नहीं सुना और घर के भीतर चली गई. देखते ही देखते जाने कैसे 25 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला और अजय की याद दिल के कोने में ही दब गई. लेकिन उस की याद गीता में एक टीस पैदा कर देती थी. ‘‘गीता सुबह हो गई, तुम कहां खोई हो?’’ मोहन के कहने पर वह वर्तमान में आई.


‘‘अभी थोड़ी देर में उठती हूं,’’ कह कर गीता ने मोहन से पीछा छुड़ाया. थोड़ी देर में मोहन नहाने के लिए बाथरूम में चले गए. अब मोहन से क्या कहती गीता कि वह कभी अजय से दिलोजान से मुहब्बत करती थी. उस दिन के बाद जब भी वह उस के लिखे गए उपन्यास को पढ़ती है, तो उसे अजय से हुई आखिरी मुलाकात याद जाती है.


गीता रोते हुए अजय से बोल रही थी, ‘अजय, आज मुझे इस बात की उतनी तकलीफ नहीं है कि कल सवेरे हम दोनों एकदूसरे से हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे, जितना मुझे इस बात की तकलीफ है कि मेरे भैया तुम्हें एक अनपढ़, जाहिल, गंवार से ज्यादा कुछ नहीं समझाते हैं, क्योंकि तुम गरीब हो. इसे हमदर्दी मत समझना पर तुम्हें तुम्हारी गरीबी से नजात दिलाने के लिए मैं तुम्हारे लिए एक कलम लाई हूं.

जिस तरह तुम ने मेरे बगैर जीना नहीं सीखा है, उसी तरह तुम इस कलम से सीख लेना और अच्छा लिखना.तुम अपना चेहरा तभी  मुझे दिखाना जब तुम एक कलम का जादूगर बन चुके होगे,’ इतना कह कर अजय की जेब में कलम रख दी और गीता अपने घर की तरफ बढ़ गई. पुलिस से उगाही करने वालों पर लगा मकोका

दिल्ली में पुलिस वालों कोब्लैकमेलकर वसूली करने वाले गैंग को दबोच कर उस पर महाराष्ट्र कंट्रोल औफ और्गैनाइज्ड क्राइम एक्ट लगा दिया गया. क्राइम ब्रांच की एंटी रौबरी एंड स्नैचिंग सैल ने इस मामले में केस दर्ज किया और गिरोह के सरगना राजकुमार उर्फ राजू मीणा को गिरफ्तार कर लिया. उसे दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में पेश किया, जहां से 7 दिन की रिमांड मिली.

पुलिस अफसरों ने बताया कि यह उगाही गैंग दिल्ली नौर्थईस्ट जिले में साल 2018 से सक्रिय था, जो ज्यादातर ट्रैफिक पुलिस वालों को टारगेट करता था. ट्रैफिक स्टाफ से कथिततौर पररिश्वतलेते हुए का वीडियो होने का दावा किया जाता था. इस के बाद वे एक लाख से ले कर 5 लाख रुपए तक मांगते थे. पैसा नहीं देने पर गैंग मैंबर आला अफसरों के साथसाथ सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर कैरियर बरबाद करने की धमकी देते थे. कई पुलिस वाले इस गिरोह के जाल में फंसे, जिन्होंने मोटी रकम दे कर अपना पीछा छुड़ाया.  Hindi Story

लेखक – आनंद कुमार नायक

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