Story in Hindi: मेरी स्वीट मिट्ठी – कैसे हुई मिट्ठी से मेरी शादी

Story in Hindi. मेरे नाना रिटायरमैंट के बाद सपरिवार कोलकाता में बस गए थे. उन का कोलकाता के बाहर बसी एक नामचीन डैवलपर की टाउनशिप में बड़ा सा फ्लैट था.

मेरी नानी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की थीं. वे अच्छीखासी पढ़ीलिखी थीं. वे महिला कालेज में प्रिंसिपल के पद पर थीं. नाना ने उन की इच्छा के मुताबिक कोलकाता में बसने का फैसला लिया था.

मैं अपनी मम्मी के साथ दुर्गा पूजा में कोलकाता गया था. मैं ने रांची से एमबीए की पढ़ाई की थी. कैंपस से ही मेरा एक मल्टीनैशनल कंपनी में सैलेक्शन हो चुका था. औफर लैटर मिलने में अभी थोड़ी देरी थी.

मिट्ठी से मेरी मुलाकात कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान हुई. कौंप्लैक्स के मेन गेट पर वह सिक्योरिटी गार्डों से उलझ गई थी.

शाम के समय पास की झुग्गी बस्ती से कुछ बच्चियां दुर्गा पूजा देखने आई थीं. चिथड़ों में लिपटी बच्चियों को सिक्योरिटी गार्ड ने रोक दिया था.

टाउनशिप के बनने के दौरान मजदूरों ने वहां सालों अपना पसीना बहाया था. ये उन्हीं की बच्चियां थीं.

मिट्ठी वहां अकसर जाती थी. वह उन की चहेती दीदी थी. वह बच्चों के टीकाकरण में मदद करती थी. स्कूलों में उन को दाखिला दिलाती थी. बच्चियों को पूजा पंडाल तक ले जाने और प्रसाद दिलाने में मिट्ठी को तमाम विरोध का सामना करना पड़ा था.

मिट्ठी विजयादशमी के दिन भी दिखाई दी थी. लाल बौर्डर की साड़ी में वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. मिट्ठी मुझे भा गई थी.

मम्मी जल्दी मेरे फेरे कराना चाहती थीं. उन्होंने रांची शहर के कई रिश्ते भी देखे थे. नानी से सलाहमशवरा करनेके लिए मम्मी मुझे कोलकाता ले कर आई थीं.

‘‘अमोल खुद अपना ‘जीवनसाथी’ चुनेगा… मेरा पोता अपने लिए बैस्ट साथी चुनेगा… एकदम हीरा…’’ नानी मेरी अपनी पसंद की बहू के हक में थीं.

‘‘गोरीचिट्टी, देशी मेम बहू बनेगी…’’ मम्मी की यही सोच थी. सुंदर, सुशील, घर के कामों में माहिर बहू उन की पसंद थी.

‘‘भाभी, हमारी बहू तो फर्राटेदार अंगरेजी में बतियाने वाली सांवलीसलोनी और स्मार्ट होगी…’’ छोटी मामी ने भी अपनी पसंद जताई थी.

‘‘मुझे मिट्ठी पसंद है…’’ मैं ने छोटी मामी को अपनी पसंद बताई.

मिट्ठी कौंप्लैक्स में ही रहती थी. मेरी मम्मी समेत परिवार के सभी लोग मिट्ठी की हरकतों से अनजान नहीं थे.

‘‘कौंप्लैक्स में मिट्ठी की इमेज ज्यादा अच्छी नहीं है. वह तेजतर्रार है… अमीरजादों के साथ आवारागर्दी करती है… मोटरसाइकिल से स्टंट करती है… बेहद बिंदास है… शौर्ट्स पहन कर घूमती है…’’ छोटी मामी ने मुझे जानकारी दी.

‘‘मुझे बोल्ड लड़कियां पसंद हैं…’’

‘‘उम्र में भी बड़ी है…’’

मैं ने उम्र की बात को भी नकार दिया.

‘‘मिट्ठी कैंपस के लड़कों के साथ टैनिस… क्रिकेट… बास्केटबाल खेलती है… मौडलिंग करती है… कंडोम की मौडलिंग… उस के मम्मीपापा ने कितनी आजादी दे रखी है…’’ मेरी बात से छोटी मामी शायद नाराज हो गई थीं.

‘‘मैं क्या सुन रही हूं…? मेरी रजामंदी बिलकुल नहीं है… नहीं… मैं मिट्ठी को बहू नहीं बना सकती…’’ मम्मी बेहद नाराज थीं. उन्होंने मुझ से दूरी बना ली थी.

मैं मिट्ठी को अपना मान चुका था. शीतयुद्ध का अंत हुआ. नानी को भनक लगी. उन्होंने सब को अपने कमरे में बुलाया. सब की बातों को बड़े ही ध्यान से सुना.

‘‘अमोल ने जिद पकड़ ली है… बदनाम लड़की से रिश्ता करने पर तुले हैं…’’ छोटी मामी ने नानी को बताया.

‘‘यह बदनाम लड़की कौन है…? कहां की है…?’’ नानी ने सवाल किया.

‘‘अपने कौंप्लैक्स की ही है… अपनी मिट्ठी… आवारागर्दी, गुंडागर्दी करती है… पूजा के पंडाल में हंगामा भी किया था… आप ने सुना होगा…’’ छोटी मामी ने मिट्ठी की खूबियों का बखान किया.

‘‘मिट्ठी तो अच्छी बच्ची है… कई बार मंदिर में मिली है… मेरे पैर छुए हैं… मैं ने आशीर्वाद दिया है… वह बदनाम कैसे हो सकती है,’’ नानी छोटी मामी से सहमत नहीं थीं.

‘‘क्या अच्छे परिवार की बच्चियां पराए जवान लड़कों के साथ क्रिकेट… बास्केटबाल और टैनिस खेलती हैं? कंडोम की मौडलिंग करती हैं? छोटे कपड़े पहनती हैं? मुंहफट और बेशर्म होती हैं?’’ मम्मी ने एकसाथ कई बातें बताईं और सवाल उठाए.

‘‘मैं ने अपने लैवल पर इन बातों की पड़ताल की है… जानकारियां इकट्ठी की हैं… मैं मिट्ठी से मिला हूं. वह मर्दऔरत के समान हक की बात करती है… वह एक समाजसेविका है… उसे कई मर्द दोस्तों का भी साथ मिला है… सब मिल कर काम करते हैं… ऐक्टिव रहने के लिए फिटनैस जरूरी है…

‘‘सामाजिक कामों के लिए रुपएपैसों की जरूरत पड़ती है. कंडोम की मौडलिंग में कोई बुराई नहीं है… बढ़ती आबादी को कंडोम से ही रोका जा सकता है… इन पैसों से बस्ती के गरीब बच्चों के स्कूल की फीस दी जा सकती है…

‘‘मिट्ठी बोल्ड है… गलतसही की पहचान और परख उसे है… वह अपने काम में जुटी है… जानती है कि वह गलत रास्ते पर नहीं है… फुजूल की कानाफूसी और बदनामी की उसे कोई परवाह नहीं है. सब बकवास है…’’ मैं ने नानी की अदालत में मिट्ठी का पक्ष रखा.

‘‘मेरे पोते ने बैस्ट लड़की को चुना है. मिट्ठी ही मेरी बहू बनेगी…’’ नानी ने सहज भाव से अपना फैसला सुनाया. मुझे गले से लगाया… रिश्ते के लिए खुद पहल करने की बात कही.

Romantic Story : वे सूखे पत्ते

Romantic Story. आज से 15 साल पहले की बात है. मैं 11वीं जमात में पढ़ता था. वह लड़की हमारी क्लास में नईनई आई थी. उस के पैर में कुछ लचक थी. शायद कुछ चोट लगी हो, इसलिए वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी. उस ने 10वीं क्लास में पूरे उदयपुर में टौप किया था और मैं ने अपने स्कूल में.

दिखने में तो वह बला की खूबसूरत थी. मगर कहते हैं न कि चांद में भी दाग होता है, बिलकुल ऐसे ही उस के पैर की वह चोट उस चांद से हुस्न का दाग बन गई थी.

उस ने पहले दिन से ही क्लास के मनचले लड़कों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना दिया था. उस की सादगी की चर्चा हर जबान पर थी.

शुरुआत के चंद महीनों में ही क्लास के आधे से ज्यादा लड़के उसे प्रपोज कर चुके थे. सब को उस के हुस्न से मतलब था, उस से नहीं.

हम लड़कों की सोच गिरी हुई होती है. लड़की को इस्तेमाल करने की चीज सम?ाते हैं. इस्तेमाल किया और फेंक दिया. मगर सबकुछ जानते हुए भी उस ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया. न ही नाराजगी से और न ही खुशी से.

और एक मैं था, जो अभी तक उस का नाम भी नहीं जानता था. सच कहूं, तो मैं ने कभी कोशिश भी नहीं की थी. नाम जान कर करना भी क्या था, जब दोनों की दुनिया और रास्ते ही अलग थे.

हर कोई उसे अलगअलग नाम से पुकारता था, इसलिए कभी सुनने में भी नहीं आया उस का असली नाम.

मैं ने उस की आंखें देखी थीं. कुछ बोलती थीं उस की आंखें, मगर क्या बोलती थीं, यह जानने के लिए कभी सोचा ही नहीं. मेरे लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी थी. अनाथ था न मैं. अपना सबकुछ खुद ही देखना था. अपना भविष्य खुद बनाना था.

जिस उम्र में लड़के तरहतरह के शौक पूरे करने में लगे होते हैं, उस उम्र में मैं खुद को एक सांचे में ढालने चला था. भला हो उस गैरसरकारी संस्था का, जो मुझे इस स्कूल में पढ़ा रही थी.

कुछ दिनों के बाद इम्तिहान हो गए. उस लड़की ने क्लास में फिर से टौप कर दिया. मेरी सालों से चली आ रही क्लास में पहली पोजीशन की हुकूमत को उस ने खत्म कर दिया था.

हमारे क्लास टीचर क्लास में आए और बोले, ‘‘सरोज, तुम ने 96 फीसदी नंबर ला कर क्लास में टौप किया है.’’

मुझे धक्का लगा कि मैं पीछे कैसे रह गया. मैं इतनी मेहनत से तो पढ़ा था. टीचर दोबारा बोले, ‘‘राघव, तुम्हारे  95.8 फीसदी नंबर आए हैं. तुम दूसरे नंबर पर हो.’’

इस पर मुझे राहत सी मिली कि बस थोड़ा सा फर्क है. मगर फर्क क्यों है, इस का जवाब मुझे  खुद को देना था. यह जवाब मैं कहां से लाता?

मैं पूरी क्लास में यही सोचता रहा. सब लड़के खुश थे. जो फेल थे वे भी, क्योंकि उन्हें उस का असली नाम पता लग गया था.

क्लास खत्म होने पर मैं उस से मिला और बधाई दी. वह इस की हकदार भी थी, इसलिए उस ने भी मुझे  बधाई दी.

यह हमारी पहली मुलाकात थी. इस के बाद आगे के दिनों में धीरेधीरे बातें होने लगीं, मगर जबान से नहीं, बस इशारों से. दूर से देख कर हाथ हिला देना, मगर सामने होने पर चुपचाप निकल जाना, यह हमारे लिए बहुत आम हो गया था.

फाइनल इम्तिहान आने वाले थे. हमारी बातें अब शुरू होने लगी थीं. मगर मैं ने कभी सरोज के बारे में जानने की कोशिश नहीं की, बस हालचाल पूछ लिया करता था.

फिर एक दिन वह बोली, ‘‘इम्तिहान के बाद मिलना.’’

मगर कहां मिलना, यह नहीं बताया. मैं कुछ देर सोचता ही रहा कि कहां और क्यों? क्यों का जवाब तो यह था कि हम दोस्त थे, मगर कहां का जवाब मुझे नहीं मिल रहा था. क्या मेरे घर में? मगर मैं तो अनाथ आश्रम में रहता हूं. तो क्या फिर उस के घर में? मगर उस का घर तो मुझे पता ही नहीं. तो कहां? फिर उसी ने बताया कि स्कूल के पास वाले बाग में मिलना. मेरे अंदर के सवालों का तूफान थाम दिया था उस के इस जवाब ने.

इम्तिहान खत्म हुए. हम मिले, हम फिर मिले, हम बारबार मिले. एक अजीब सी, मगर बहुत प्यारी सी धुन लग गई थी दोनों को एकदूसरे के साथ की. फिर एक दिन मैं ने उसे बताया कि मैं अनाथ हूं, तो जवाब मिला कि वह भी अनाथ है.

मेरी तो यह जान कर जैसे सांसें ही थम गई थीं कि इतनी प्यारी लड़की  के मांबाप नहीं हैं.

बला की खूबसूरत लड़की इस नोच खाने वाले समाज में अपना वजूद बनाए हुए थी. समझ आ गया था मुझे  कि उस की आंखें क्या बोलती थीं और क्यों वह इतनी नरम मिजाज थी.

मुझे  आज उन सवालों के जवाब भी मिल गए थे, जिन सवालों को मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने बड़ी हसरत से उस से पूछा, ‘‘क्या अब तक तुम्हारा कभी कोई दोस्त रहा है?’’

वह हथेली भर के सूखे पत्ते ले आई और बोली, ‘‘ये हैं मेरे दोस्त.’’

मुझे  कुछ समझ  नहीं आ रहा था कि सरोज क्या बोल रही है. मैं हंस भी नहीं सकता था, क्योंकि उस के चेहरे पर हंसी  नहीं दिख रही थी.

‘‘सरोज, मैं कुछ समझा नहीं?’’ मैं ने बहुत जिज्ञासा से पूछा.

जब उस की आंखें सबकुछ बोलती ही थीं, तो क्यों आज मैं उस की जबान का बोला हुआ शब्द समझ नहीं पा रहा था. वह चाह रही थी कि उस का यह दोस्त उस की आंखें पढ़ कर जान जाए कि क्यों ये सूखे पत्ते उस के दोस्त थे. मगर उस ने नहीं बताया और मैं ने भी मान लिया कि शायद दुनिया में कहीं उस का भरोसा टूटा होगा, इसलिए वह ऐसी बातें करती है.

हमारी बातों के सिलसिले अब काफी बढ़ गए थे और हम धीरेधीरे बहुत करीब आ गए थे. एक लगाव था, एक अधूरापन था, जो साथ रह कर ही पूरा होता था. मैं जानना चाहता था उस का और उस के सूखे पत्तों का रिश्ता. मैं इतना करीब तो था उस के, मगर उस के दोस्त अब भी सूखे पत्ते ही थे.

फिर एक दिन मेरे मन में यह सवाल उठा कि स्कूल से पढ़ाई खत्म होने के बाद हम कैसे मिलेंगे? मगर यह सवाल मैं उस से सुनना चाहता था और यह भी जानता था कि वह नहीं पूछेगी, क्योंकि उसे मुझ से ज्यादा उन सूखे पत्तों से जो लगाव था.

स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई. उस से मिले हुए काफी दिन गुजर गए. अकेलापन महसूस होने लगा था और यह अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था. सरोज लौट गई थी अपनी दुनिया में, अपने उन सूखे पत्तों के पास या फिर कहीं और.

फिर एक दिन मैं ने स्कूल जा कर पता किया. कितना बेवकूफ था मैं. इतना वक्त साथ रहे, मगर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह रहती कहां थी. मैं अपने टीचर के पास गया और सरोज का पता पूछा.

टीचर बोले, ‘‘राघव, पता तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर सरोज तुम्हारे लिए एक चिट्ठी छोड़ गई है.’’

मैं बहुत खुश हुआ, मगर न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे उस चिट्ठी को खोलने में. जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझ अनाथ को चिट्ठी लिखी थी.

टीचर बोले, ‘‘अरे, यह क्या? जो राघव हमेशा पढ़ने में अव्वल रहा, आज उस के हाथ इस मामूली सी चिट्ठी को लेने में कांप क्यों रहे हैं?’’

‘‘पता नहीं, सर. मगर यह मामूली नहीं है,’’ इतना कह कर मैं वहां से बहुत तेजी से भाग निकला. और क्या भागा यह मैं भी नहीं जानता. शायद मुझ में हिम्मत नहीं थी उस वक्त का सामना करने की.

मैं बहुत भागा और न जाने क्यों मेरे कदम उस बाग की ओर बढ़ते चले गए, जहां हम अकसर मिलते थे.

मेरी सांसें बहुत तेज चल रही थीं. थकने की वजह से नहीं, डर की वजह से. और डर था उसे खो देने का. डर था मुझे  कि यह चिट्ठी पढ़ते ही मैं उसे खो दूंगा. या उस का मेरे लिए पहला और आखिरी खत था. क्या करूं, कुछ समझ  ही नहीं आ रहा था. अभी पढ़ूं कि नहीं.

मन में हजारों बुरे खयाल आ रहे थे. सांसें भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं. फिर सोचा, ‘शायद उस ने इस में अपना नया पता लिखा हो.’

बहुत हिम्मत कर के मैं ने वह खत खोल ही दिया और वह कुछ यों था:

‘प्यारे दोस्त राघव,

‘मैं जानती हूं कि यह खत पढ़ने से पहले तुम ने हजार बार सोचा होगा. तुम्हारे हाथ कांपे होंगे, धड़कनों का शोर कुछ ज्यादा हो गया होगा. मन में हजारों तरह के खयाल आ रहे होंगे और उन में सब से बड़ा सवाल यह होगा कि मेरे दोस्त सूखे पत्ते ही क्यों?

‘राघव, मैं ने तुम्हें कभी नहीं बताया, पर अब बताती हूं. मैं अपने मातापिता की एकलौती लड़की थी. जिस घर में मैं पैदा हुई, वहां लड़की का पैदा होना जुर्म माना जाता था. जब मैं 4 साल की थी, तब मेरे पिता ने मुझे छत से नीचे फेंक दिया था. मैं आंगन में रखे उन सूखे पत्तों के ढेर पर गिरी थी, जिसे कुछ देर पहले मेरी मां ने जमा किया था. तब मैं तो बच गई, मगर मेरा पैर टूट गया था.

‘पिताजी की ऐसी गिरी हुई हरकत देख कर मां ने वहीं पर रखी कुल्हाड़ी से उन की जान ले ली. उन्होंने मुझे  बहुत प्यार से गले लगाया, खूब रोईं. मैं भी रो रही थी. फिर मां ने मुझे  छोड़ा और घर बंद कर के खुद को आग लगा ली. मां भी मर गईं और मैं छोटी सी लड़की 4 साल की उम्र में ही अनाथ हो गई.

‘किसी रिश्तेदार ने मेरी जिम्मेदारी नहीं ली. जिस उम्र में औलाद को उस की मां के सहारे की सब से ज्यादा जरूरत होती है, वह सहारा मुझ  से छिन गया था. मां के आंचल में खेलने की उम्र में मुझे अनाथालय वाले ले गए.

‘वहां जब मैं गई, तो हर बार बस अपना गिरना याद आता था. उस वक्त मुझे बचाने वोल वे सूखे पत्ते ही थे, जिन से मैं ने कभी बात तक नहीं की थी. उन बेजबानों ने मुझे  एक नई जिंदगी दे दी थी. मेरा पैर हमेशा के लिए खराब हो गया था.

‘मैं आज भी हर रोज जब सड़कों पर गिरे सूखे पत्ते देखती हूं, तो मुझे वही ढेर याद आता है. मैं उन का कुछ इसी तरह एहसान मानती हूं कि जब मेरा अपना पिता मेरा अपना नहीं हो सका, तब इन गैर और बेजबान पत्तों ने मुझे सहारा दिया.

‘मुझे  जब भी इस बेहया दुनिया से डर लगता है, मैं अकसर इन्हें खत लिखती हूं. मैं इन का एक ढेर बनाती हूं, फिर एक हवा का झोका आता है और उस ढेर के सब पत्तों को मेरे चारों ओर फैला कर कहता है कि भरोसा रखना सरोज… ये सूखे पत्ते हमेशा तेरे साथ हैं… हमेशा.

‘मैं जानती हूं राघव कि तुम यह खत अभी उसी बाग में बैठ कर पढ़ रहे हो, और तुम्हारी आंखें भीग गई हैं. मुझे माफ कर देना तुम्हें चुपचाप छोड़ कर जाने के लिए. मगर महसूस कर के देखना… मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, इन सूखे पत्तों की तरह.

‘तुम्हारी सरोज.’

मेरी आंखें सच में भर आई थीं. एक आह निकल गई थी मेरे दिल से. आज समझ आ गया था कि क्यों हैं ये सूखे पत्ते उस के दोस्त… कितना जानती थी वह मुझे .. उसे पता था कि मैं यह खत उस बाग में ही पढ़ूंगा. अब समझ आया कि क्यों मेरे पैर भागतेभागते मुझे  इस बाग में ले आए थे.

मैं सरोज के दोस्तों को ले कर बनाए हुए ढेर में सरोज की दुनिया को बड़े गौर से देख रहा था कि न जाने कहां से अचानक एक हवा का झोका आया, जिस ने उन पत्तों को मेरे चारों ओर फैला दिया और मुझे सच में एहसास होने लगा कि सरोज मेरे बहुत करीब है… बहुत ही करीब…

Story in Hindi : लहूलुहान लव लैटर

Story in Hindi. आदिल अपनी बीवी महविश को दिलोजान से चाहता था. एक दिन महविश ने उस से अजीब सी डिमांड रख दी कि उसे किसी का लव लैटर पढ़ना है. आदिल ने बड़ी मेहनत से लव लैटर लिखा, पर महविश को पसंद नहीं आया. आगे क्या हुआ?

आ दिल जब अपने कमरे में पहुंचा, तो उस की बीवी सो चुकी थी. उस ने धीरे से कबर्ड खोला, अपना कोट उतारा और कबर्ड के एक हैंगर में टांग दिया. फिर बहुत ही आहिस्ता से कबर्ड को पुश कर दिया. ‘खट…’ की आवाज पूरे कमरे में गूंज गई.

सुर्ख जोड़े में दुलहन की तरह सजी आदिल की बीवी चौंक कर उठ बैठी. बिलकुल उसी तरह जैसे वह एक साल पहले शादी की पहली रात उठ कर बैठी थी.

आदिल को शादी की पहली रात का पूरा मंजर याद आ गया. वह अपनी बीवी के पास पहुंचा. उस की बीवी सिमट कर लजाने लगी. घूंघट उस के सिर से गायब था. उस ने अपने सिर पर घूंघट का पल्लू डालने की कोशिश की.

आदिल ने मना कर दिया, ‘‘नहीं, ऐसे ही ठीक है,’’ उस के हाथ में उस की बीवी का हाथ आ गया. नरम और नाजुक हाथ, ‘‘ऐसे ही ठीक है. बिना बदली का चांद. बेवजह घूंघट उठाने की जहमत करनी पड़ती.’’

‘‘मैं सो गई थी.’’ ‘‘मैं जानता हूं. सफर की थकान है.’’ आदिल की बीवी महविश ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की. ‘‘अब तो यह हाथ जिंदगीभर नहीं छोडं़ूगा, कहीं भागने नहीं दूंगा.’’

महविश शरमा गई. आदिल ने उस के शरमाए हुए वजूद को अपने आगोश में ले लिया.

‘‘कहीं भी भागने नहीं दूंगा,’’ कहते हुए आदिल ने करीब की मेज पर रखा हुआ मिठाई का डब्बा उठाया, उसे खोला. काजू बर्फी का एक पीस उठा कर खिलाने लगा. फिर महविश ने भी उसे खिलाया.

‘‘कौन दूर भागना चाहेगा आप से… कोई बेवकूफ ही होगी, जो आप की मुहब्बत को ठुकराएगी, आप से दूर जाएगी,’’ महविश बोली.

‘‘फिर भी मेरे प्यार में कहीं कोई कमी रही हो तो मु?ो बता दीजिए. ऐसी कोई चीज जो मैं आप को नहीं दे पाया हूं, मु?ो बताइए,’’ आदिल ने बच्चे की तरह जिद की.

महविश ने आदिल के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, ‘‘एक ख्वाहिश है मेरी, कहीं दिल में दबी हुई.’’ ‘‘कैसी ख्वाहिश?’’

‘‘मैं ने अपनी जिंदगी में कभी भी कोई लव लैटर नहीं पढ़ा है, पढ़ा क्या देखा तक नहीं है. मु?ो कहीं से लव लैटर ला दीजिए. किसी का लव लैटर, किसी को लिखा हुआ. मैं लव लैटर पढ़ना चाहती हूं. देखना चाहती हूं कि लव लैटर कैसा होता है,’’ महविश ने धीरे से कहा. आदिल हड़बड़ा कर उठ बैठा, ‘‘यह कैसी ख्वाहिश है…’’

आदिल यादों से बाहर आ गया. उस की नजर दीवार घड़ी पर पड़ी. रात के तकरीबन 3 बज रहे थे. उस ने एक नजर अपनी बीवी पर डाली. वह बेसुध पड़ी सो रही थी. बहुत ही खूबसूरत लग रही थी.

आदिल कमरे से निकाल कर बालकनी पर आ गया. घर के सामने गार्डन में शाम के प्रोग्राम की निशानियां अब भी बाकी थीं. एक तरफ स्टेज बना था. एक बड़ी सी मेज पड़ी थी. वही मेज जिस पर मैरिज एनिवर्सरी का केक काटा गया था.

केक कटते ही सब ने ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’ बोला था. ‘मुबारकबाद’ बोल कर गिफ्ट पैक भी दिए थे.

आदिल ने सभी के सामने महविश के गले में डायमंड का नेकलेस भी पहनाया था. फिर ‘भटाभट’ गुब्बारे फूटने लगे थे. मेज पर फटे हुए गुब्बारे अब भी नजर आ रहे थे. कुछेक गुब्बारे टैंट की सीलिंग और साइड के परदों पर अब भी चिपके हुए लटक रहे थे. गार्डन के दाएं और बाएं साइड में टेबल और कुरसियों के इर्दगिर्द डिस्पोजल गिलास और पत्तल पड़े हुए थे. स्टेज के साइड में छोटा सा डीजे सिस्टम भी था, जिस पर कुछ जिस्म थिरके भी थे.

आदिल अंदर अपने स्टडी रूम में आ गया. उस ने मेज के नीचे से कुरसी अपनी तरफ खींची. कुरसी पर बैठ गया. लव लैटर लिखने के लिए कागज और कलम उठाया.

‘कैसे लिखूं… कहां से शुरुआत करूं…’ आदिल सोच में पड़ गया. इस मोबाइल फोन ने तो खत लिखना ही भुला दिया. रोजाना सैकड़ो मैसेज लिखते हैं हम… सोशल मीडिया पर, मगर खत लिखना हम भूल गए.

पर कुछ तो लिखना पड़ेगा. आखिर आदिल की प्यारी बीवी महविश को लव लैटर जो पढ़ना है. कुछ सोच कर आदिल ने लिखा :

जानेमन… जाने तमन्ना… जाने अदा.

तु?ो जैसा है सोचा पाया वही

सूरज की किरनों सा इक चेहरा

देखा है तुम सा मैं ने नहीं…

जानेमन, तुम बहुत खूबसूरत हो. इतनी खूबसूरत कि मेरे पास अल्फाज नहीं हैं… मैं कैसे बयान करूं… तुम्हारे गाल गुलाब से हैं. आंखें बहुत ही नशीली और लब संतरे के दो फांक. तुम न मिलती, तो मैं अधूराअधूरा सा लगता. आई लव यू वैरी मच.

तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा

आदिल

चलो हो गया. लिख गया खत. आदिल ने राहत की सांस ली. वह अपने कमरे में लौट आया. महविश अब भी सो रही थी. आदिल ने खत को फोल्ड कर के उस के तकिए के नीचे रख दिया.

सुबह हो गई. आदिल रोजाना की तरह समय पर अपने कालेज पहुंचा. तभी उस के स्टाफ ने आ कर उसे घेर लिया.

‘‘यह बात ठीक नहीं है सर,’’ कंप्यूटर टीचर अजीत वर्मा ने कहा.

‘क्या बात ठीक नहीं है?’ कई और टीचर एकसाथ बोल पड़े.

‘‘कल सर की मैरिज एनिवर्सरी थी… बड़ी धूमधाम से.’’

‘‘नहीं, ऐसे ही छोटीमोटी रस्म मना ली थी केक मंगा कर,’’ आदिल बोला.

‘‘आप ?ाठ बोल रहे हैं सर. यह देखिए मेरे पास सुबूत हैं,’’ अजीत फेसबुक की पोस्ट दिखाने लगा. अजीत रोज ही सोशल साइट पर जा कर चैक कर लेता था. देख लेता था कि कौन कहां है और क्या कर रहा है. आज किस का बर्थडे है. किस की मैरिज एनिवर्सरी.

आदिल ने सिर्फ एक फोटो पोस्ट किया था. अपने घर के गार्डन में डैकोरेट किए गए स्टेज का, जिस पर बड़ेबड़े अल्फाज में लिखा था ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’.

‘‘यह तो गलत बात है आदिल साहब. आप को यहां भी पार्टी देनी पड़ेगी,’’ एक सीनियर टीचर ने कहा.

‘‘ठीक है सर मिल जाएगी, लंच टाइम में,’’ आदिल बोला.

लंच टाइम में आदिल को खत के बारे में याद आया. पता नहीं महविश ने खत पढ़ा है या नहीं, पढ़ा होता तो अब तक उस का फोन आ जाता. शायद खत पर उसकी नजर ही न पड़ी हो. शायद उसे फुरसत ही न मिली हो. कल का सबकुछ बिखरा हुआ पड़ा था. उसे गार्डन भी साफ करवाना पड़ा होगा. टैंट का सामान भी भिजवाना पड़ा होगा.

हालांकि, घरबाहर का सारा काम आदिल का छोटा भाई कामरान ही करता है, लेकिन महविश को भी तो देखना ही पड़ता है. घर पर काम वाली भी आती है, मगर उस के पीछेपीछे भी तो दौड़ना पड़ता है.

आदिल ने फोन मिलाया. पूरी घंटी गई. फोन नहीं उठा. उस ने दोबारा मिलाया.

उधर से फोन आदिल की बहन आलिया ने उठाया, ‘‘भैया मैं हूं आलिया… भाभी छत पर हैं. कपड़े धूप में डाल रही हैं…  मोबाइल अभी देती हूं.’’

आलिया मोबाइल फोन ले कर छत पर पहुंची, ‘‘भाभी, भैया का फोन.’’

‘‘हैलो जी, कैसे हैं आप?’’ आलिया बालटी से कपड़े निकालनिकाल कर छत पर बंधे हुए तार पर फैलने लगी. छत पर नरम धूप फैली हुई थी, जो बहुत भली लग रही थी.

‘‘ठीक हूं,’’ आदिल बोला. ‘‘आप को थकान लग रही होगी…’’ ‘‘थोड़ीबहुत. ज्यादा नहीं. अच्छा, तुम्हें कुछ मिला?’’ आदिल ने पूछा. ‘‘क्या?’’ महविश ने पूछा. ‘‘कुछ भी,’’ आदिल ने कहा. ‘‘कल मु?ो बहुतकुछ मिला था. लोगों से गिफ्ट पैक, आप से डायमंड का नेकलेस.’’ ‘‘इस के अलावा… आज कुछ नहीं मिला… तकिए के नीचे?’’

‘‘अच्छा… वह खत. हां, मिला. आप ने लिखा था? लव लैटर ऐसे तो नहीं होते होंगे. सपाट सीधेसादे. न जज्बात, न एहसास… मु?ो असली लव लैटर चाहिए, नकली नहीं. एक महबूब का, उस की महबूबा के नाम या महबूबा का उस के महबूब के नाम. मियांबीवी का भी चलेगा, लेकिन उस में प्यार हो, मुहब्बत हो, जज्बात हों, एहसास हो.’’

महविश बात करतेकरते नीचे उतर आई. उधर आलिया जब कपड़े फैला चुकी, तो वह रैलिंग के पास पहुंची. बाएं साइड वाले घर के गार्डन में एक लड़की खड़ी थी. सजीधजी. मुसकराती हुई.

गली के मोड़ से एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया. दुबलापतला. हाथ में कलावा पहने. छोटेछोटे बालों में एक मोटी सी चोटी. माथे पर तिलक. वह लड़का उस लड़की के घर के गेट के बहुत पास से गुजरा. लड़की से कुछ बोला. क्या बोला? आलिया को सुनाई नहीं पड़ा. लड़की हंस दी. लड़का मुसकराता हुआ गली में आगे बढ़ गया.

शाम को आदिल ने महविश से कहा, ‘‘यार, मैं ने बड़ी मेहनत से वह लव लैटर लिखा था. दिमाग पर कितना जोर डाला था, तब कहीं जा कर अल्फाज कागज  पर उतरे थे. और तुम ने मेरा लव लैटर रिजैक्ट कर दिया.’’

‘‘आप ने खत लिखने में बेशक मेहनत की होगी, लेकिन वह सिर्फ लैटर था, लव लैटर नहीं. उस में मुहब्बत नदारद थी.’’

‘‘अच्छा महविश, यह बताइए कि यह लव लैटर वाली ख्वाहिश तुम्हारे दिल में कब पैदा हुई और कैसे?’’

महविश मुसकराई, ‘‘बचपन की बात है. मैं जमात 4 या 5 में पढ़ रही थी. मेरे क्लास में एक लड़का था. जैसे बहुत से लड़केलड़कियां साथ पढ़ते हैं, वह भी पढ़ता था. जैसे सब साथ में खेलतेकूदते हैं, बोलते हैं, लड़ते?ागड़ते हैं. वह भी साथ में खेलता था,  बोलता था. बचपना था. नासम?ा थी मैं. शायद वह नासम?ा नहीं था. शायद वह नादान था. पता नहीं क्या था वह. किस का बेटा था, मैं नहीं जानती.’’ आदिल के चेहरे पर कई भाव आ

रहे थे, जा रहे थे. महविश उस के चेहरे को देख कर शांत हो गई, ‘‘आप कुछ उलटासीधा तो नहीं सोचने लगे. ऐसीवैसी कोई बात नहीं थी. आप गलतफहमी मत पाल लेना.’’

‘‘मैं इतने छोटे दिल का भी नहीं हूं. आगे बताइए. कहानी इंटरस्टिंग लग रही है.’’

‘‘मिस्टर, यह कहानी नहीं है, बल्कि हकीकत है. सुनिए, एक दिन सुबहसवेरे पहले ही घंटे में मेरे स्कूल के हैडमास्टर साहब उस लड़के को बेतहाशा पीटने लगे. वह चिल्ला रहा था. आखिरकार किसी तरह वह लड़का स्कूल से भाग पड़ा था.

‘‘हैडमास्टर साहब के कहने पर कई लड़कों ने उस का पीछा भी किया था, पर वह लड़का पकड़ में नहीं आया. अरहर के खेतों से होता हुआ वह अपने गांव निकल गया था.

‘‘कहते हैं कि वह लड़का अपनी मौसी के यहां पढ़ने के लिए आया था और मौसी के घर में ही रहता था.’’

‘‘लेकिन हैडमास्टर साहब ने उसे इतनी बेदर्दी से मारा क्यों? क्या गलती थी उस की?’’ आदिल के मुंह से अचानक  निकला.

‘‘उस लड़के ने एक लव लैटर लिखा था और वह लव लैटर हैडमास्टर साहब के हाथ लग गया था.’’

‘‘लेकिन वह लव लैटर किस लड़की के नाम था?’’ आदिल ने जिज्ञासु हो कर पूछा.

‘‘मेरे नाम था वह लव लैटर. मु?ो यह बात बहुत बाद में पता चली. तब जब मैं प्राइमरी स्कूल पास कर के जूनियर में आ गई थी.’’ यह सुन कर आदिल अवाक रह गया. बात आईगई हो गई.

आलिया ने छत से देखा कि आज वह लड़का अपनी बाइक से आ रहा था. गली के उसी मोड़ से. बनाठना. वह लड़का पड़ोस के घर के गार्डन में ?ांकता हुआ है या यों कहें कि खुद को उस लड़की को दिखाता हुआ गुजरा. लड़की तैयार खड़ी थी. मुसकराई.  लड़का भी मुसकराया. लड़का बाइक की स्पीड बढ़ा कर तेजी से गली से ओ?ाल हो गया.

थोड़ी देर बाद वह लड़की भी अपने घर से बाहर निकली. बुरके में. सड़क पर आई. एक आटोरिकशा पकड़ा. आटोरिकशा उसी दिशा में चल दिया, जिधर वह लड़का गया था.

आदिल के कालेज में सालाना इम्तिहान शुरू हो चुके थे. आज अंगरेजी का पेपर था. तकरीबन एक घंटा हो चुका था. एक घंटे के पूरा होने पर एक घंटी बजी.

‘‘चलिए सर, राउंड पर चलते हैं,’’ आदिल के एक साथी टीचर अजीत वर्मा ने कहा.

आदिल, अजीत वर्मा और अमित राठौर तीनों राउंड पर चल दिए. उन्होंने रूम नंबर एक से शुरुआत की. वे छात्रों के पास जाते और पेपर उठा कर देखते कि कहीं कोई निशान तो नहीं लगा है. कोई जवाब तो नहीं लिखा है. कौपियां भी उलटपुलट कर देखते. जिस छात्र पर शक होता उस की तलाशी भी लेते. ऐसा  ही करते हुए जब वे रूम नंबर 3 में पहुंचे, तो आदिल को एक लड़के पर शक हुआ, ‘‘स्टैंडअप.’’

लड़का खड़ा हो गया. आदिल ने उस की शर्ट की तलाशी ली. उस की पैंट की दोनों जेबों की तलाशी ली. कुछ भी नहीं निकला. उस की बैल्ट के हुक में भी देखा. वहां भी कुछ नहीं था.

आदिल का शक गलत निकला. उस छात्र के पास नकल नहीं थी. आदिल ने उस लड़के पास वाले लड़के को इशारा किया. वह उठ खड़ा हुआ.

‘‘कुछ नहीं है सर, मैं नकल नहीं लाता हूं,’’ वह लड़का बोला.

आदिल ने उस लड़के की दोनों जब में हाथ डाला. कुछ नहीं मिला. फिर बैक पौकेट में देखा. एक पर्स था, जिस में 100-100 और 200-200 रुपए के कई नोट थे.

‘‘इतने रुपए क्यों ले कर आते हो? 9वीं जमात में पढ़ते हो, कहां खर्च करते हो इतने पैसे? और यह क्या है… रुपयों के बीच में यह परची कैसी है?’’

‘‘सर, यह नकल नहीं है. सर, यह परची मु?ो वापस कर दीजिए… प्लीज सर.’’

‘‘नकल ले कर आते हो, इतना सम?ाने पर भी.’’ ‘‘नहीं सर, यह नकल नहीं है.’’ ‘‘फिर क्या है?’’ आदिल ने पूछा.

लड़के ने सिर झुका लिया. आदिल ने पर्स लड़के को वापस कर दिया.

आदिल की नजर कागज पर लिखी इबारत पर पड़ी. लिखा था, ‘मेरी जान दीपाली…’

‘यह तो लव लैटर है…’ आदिल ने मन ही मन सोचा. उस की आंखों में ऐसी चमक दौड़ गई जैसे कि उस के हाथ कोई खजाना लग गया हो. ‘‘बैठ जाओ,’’ आदिल ने उस लड़के से कहा और परची अपने हाथ में दबा ली. आदिल के दोनों साथी टीचर उस के पास दौड़ आए. एक ने पूछा, ‘‘क्या निकला? लव लैटर है क्या?’’

‘‘लव लैटर नहीं है, न ही नकल सामग्री है. ऐसे ही फालतू की शायरी लिखी है.’’

शाम को आदिल अपने घर बहुत खुशखुश पहुंचा. महविश गार्डन में ही मिल गई आदिल का इंतजार करते हुए.

आदिल को देखते ही महविश भांप गई कि आज कुछ खास बात हुई है.

‘‘क्या बात है, आज आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं? प्रमोशन हो गया क्या?’’

‘‘इधर तो आइए… अभी दिखाता हूं… आप भी खुश हो जाएंगी,’’ आदिल ने बाइक खड़ी करते हुए कहा. फिर दोनों साथसाथ घर के अंदर आ गए.

आदिल ने शर्ट की जेब से लैटर निकाल कर महविश के हाथ पर रख दिया और कहा, ‘‘यह रही आप की ख्वाहिश.’’

महविश ने खत को अनफोल्ड किया. खत सुर्ख रोशनाई से लिखा हुआ था :

मेरी जान दीपाली,

फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुसकान है.

रंग तेरा देख के, रूप तेरा देख के, कुदरत भी हैरान है.

आई लव यू. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरे नंबर पर काल करना.  क्या तुम भी लव मी? तुम्हारा दीवाना.

महविश जैसेजैसे खत पढ़ती गई, वैसेवैसे उस के चेहरे पर चमक फैलती गई. ऐसी चमक आदिल ने पहले कभी नहीं देखी थी. आदिल उसे खुश देख कर बहुत खुश हुआ.

‘‘हां , यह है लव लैटर… ऐसे होते होंगे लव लैटर… लफ्ज भले ही ठीक से नहीं लिखे हैं, लेकिन जज्बात और एहसास कितने क्लियर हैं. कहां मिला आप को?’’

आदिल महविश के खिले चेहरे को अपलक देख रहा था, चौंक पड़ा और बोला, ‘‘कालेज में एक छात्र के पास.’’

अगले दिन आलिया शाम के समय अपने गार्डन में बैठी पढ रही थी. एकदम से बगल वाले घर से जोरजोर की आवाजें आने लगीं. लड़ाईझगड़े की आवाजें.

‘‘इस पर नजर रखिए अम्मी, यह नाक कटवाएगी. बदतमीज हो गई है यह.’’

‘‘अम्मी, सुहेल से कहिए, मुंह बंद कर ले अपना… चिल्लाए नहीं.’’

‘‘चिल्लाऊंगा… खूब चिल्लाऊंगा. तू बदतमीज हो गई है, बेहया हो गई है. रातदिन मोबाइल पर लगी रहती है, इधरउधर घूमती फिरती है.’’

‘‘क्यों गला फाड़ रहा है? क्या किया है मेरी बेटी ने?’’ अम्मी की आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘अम्मी, इसी से पूछिए कि यह कल कहां गई थी?’’

‘‘बेटी, सच बता कि तू किस के साथ घूमती फिरती है. महल्ले में तु?ो ले कर दबी जबान से बातें हो रही हैं.’’

‘‘अम्मी, मेरे साथ पढ़ता है वह लड़का.’’

इसी बीच मौका पा कर सुहेल ने उस लड़की के हाथ से मोबाइल फोन छीन लिया, ‘‘यह देखिए अम्मी, उस लड़के के साथ इस के कैसेकैसे फोटो और वीडियो हैं… देखिए.’’

अम्मी ने देखा, तो उन के होश उड़ गए, ‘‘हायहाय… तौबातौबा… यह सब क्या है… तेरे अब्बू जानेंगे, तो कयामत बरपा हो जाएगी… तेरी पढ़ाईलिखाई बंद हो जाएगी.’’

तभी अब्बू आ गए, ‘‘क्या हो रहा है? कैसा हंगामा है?’’

सुहेल अब्बू के पास दौड़ गया, ‘‘अब्बू, यह देखिए… आप की परी क्या गुल खिला रही है… यह देखिए.’’

अब्बू ने देखा कि उन की लाडली कलावा, तिलक और चोटी वाले के साथ. उन के होश उड़ गए. सोचने लगे कि परवरिश में कहां कमी रह गई. वे ‘धड़ाम’ से सोफे में धंस गए.

तकरीबन एक हफ्ते बाद की बात है. शाम को महविश अपने गार्डन में पौधों को पानी दे रही थी. हर छोटेबड़े पौधे के पास जाजा कर. पानी पा कर पौधे तरोताजा नजर आने लगते. फूलों की मुसकराहट और बढ़ जाती.

पानी देतेदेते जब महविश कौर्नर वाले पौट के पास पहुंची, तो उसे घास पर कागज की एक गेंद सी दिखाई पड़ी.

महविश ने उठा कर देखा. एक पत्थर पर कागज को लपेट कर गेंद बना दिया गया था… दूर फेंकने के लिए.

महविश ने कागज को सीधा कर के देखा. कागज एक खत था. खत भी साधारण नहीं, बल्कि लव लैटर.

लिखा था :

मेरी प्यारी आलिया,

इधर एक हफ्ते से मैं बहुत परेशान हूं. रातदिन चैन नहीं पड़ता. मेरी तुम से बात नहीं हो पा रही है. मिलनाजुलना, तुम्हें देखना तो दूर की बात. उस दिन तुम्हारे भाई ने तुम्हारे घर पर बड़ा तांडव मचाया. इसी बीच तुम्हारे पिताजी भी आ गए. उन्हें मेरे और तुम्हारे बारे में सबकुछ पता चल गया… कहां तक छिपता. आज नहीं तो कल पता चल ही जाता.

उसी दिन से तुम पर पाबंदी लगा दी गई. तुम्हारा कोचिंग जाना बंद कर दिया गया. तुम्हारा मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया गया.  तुम से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है, इसलिए मजबूर हो कर मैं चिट्ठी लिख रहा हूं.

तुम जानती हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. तुम्हारे लिए मैं अपना धर्म बदल सकता हूं. इसलाम धर्म अपना सकता हूं. प्लीज, अपने अम्मीअब्बू को सम?ाओ… मनाओ… तुम नहीं मिली, तो मैं जान दे दूंगा.

तुम्हारा आशीष.

खत पढ़ कर महविश का वजूद कांप गया. उस के मुंह से चीख निकल गई. जोरदार डरावनी चीख. ऐसे जैसे कि सामने जहरीला सांप देख लिया हो.

‘‘आलिया…’’ महविश चिल्लाई. आलिया किचन में थी. सब्जी काट रही थी. छुरी रख कर भागती हुई आई, ‘‘क्या हुआ भाभी?’’

महविश बुत बनी खड़ी थी. ‘‘क्या हुआ भाभी?’’ आलिया ने पूछा. महविश ने उस के हाथों में लैटर थमा दिया, ‘‘यह क्या है आलिया?’’

आलिया ने लैटर हाथ में लिया. पहली ही लाइन पढ़ कर वह चकरा गई, ‘‘मेरी प्यारी आलिया… भाभी यह मेरा नहीं है…  मतलब किसी ने मेरे लिए नहीं लिखा है. आलिया एक दूसरी लड़की भी है, जो इस बाजू वाले घर में रहती है.’’

यह सुन कर महविश के चेहरे पर मुसकान दौड़ गई, ‘‘हां, जानती हूं, पर है तो यह लव लैटर है.’’ ‘‘हां भाभी, लव लैटर ही है,’’ आलिया पसीनेपसीने हो गई थी.

‘‘कितना जज्बाती लेटर है यह,’’ महविश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने अपनी जिंदगी में यह दूसरा लव लैटर देखा था. उस ने आलिया के हाथों से लव लैटर ले कर दोबारा पढ़ना चाहा.

इसी बीच न जाने कहां से कामरान आ गया. उस ने ?ापटा मार कर वह कागज छीन लिया.

‘‘अच्छा, तो यह सब चल रहा है,’’ कामरान ने जल्दीजल्दी पूरा खत पढ़ डाला. खत पढ़ कर वह आगबबूला हो गया. गुस्से से कांपने लगा, ‘‘तुम इसीलिए यहां रह रही हो. तुम्हें शर्म नहीं आती. आजकल महल्ले में हर तरफ आलियाआलिया ही हो रहा है. आज सुबूत मेरे हाथ लगा है. पहले बोलता, तो कोई मानता ही नहीं. सब मुझे सनकी समझते है न…’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है कामरान,’’ महविश ने कहा. आलिया ने भी सफाई दी, ‘‘कामरान, तुम्हें गलतफहमी हुई है. यह लड़की मैं नहीं हूं. यह लड़की दूसरी है. इस पास वाले घर में रहती है.’’

कामरान पर मानो गुस्से का भूत सवार हो गया था, ‘‘तुम यही सब करती रहती हो. गांव में भी तुम्हारे पास लव लैटर मिला था, इसीलिए अब्बा ने तुम्हें यहां शहर में भेज दिया था. तुम भैया का नाम बदनाम करना चाहती हो. भैया की कितनी इज्जत है… लोग क्या कहेंगे?’’

‘‘कामरान, ऐसा कुछ नहीं है,’’ महविश ने समझाना चाहा.

‘‘भाभी, आप नहीं जानतीं… आजकल क्या चल रहा है… हिंदू लड़के मुसलिम लड़कियों को… इस के जैसी बेवकूफ लड़कियों को भगवा ट्रैप में फंसाते हैं… भगा ले जाते हैं… एक मुहिम चला रखी है. उन लड़कों को मकान मिलता है, दुकान भी और नकद पैसा भी. वे लड़के मुसलिम लड़कियों को हिंदू धर्म में दाखिल कर लेते हैं… जहन्नुमी बना देते हैं.

‘‘दूसरी तरफ, अगर मुसलिम लड़का और हिंदू लड़की शादी करना चाहते हैं, तो नहीं कर पाते. मौब लिंचिंग हो जाती है. कचहरी हो या थाना… कहीं भी… यह सब हो रहा है भाभी… और आज अपने घर में भी…’’

‘‘अपने घर में ऐसा नहीं है. यह खत इस बाजू वाले घर की लड़की के लिए है, उस का नाम भी आलिया है.’’

तभी कामरान के हाथ में एक डंडा आ गया. उस ने आलिया पर जोरदार वार कर दिया. आलिया चीख पड़ी. वह चिल्लाती हुई भागी. कामरान ने एक और डंडा मार दिया. आलिया गिर पड़ी और बोली, ‘‘भाभी, बचाओ… समझाओ इसे.’’

‘‘कामरान, रुकोरुको… मारना मत,’’ महविश ने मौका पा कर उस के हाथों से डंडा छीन लिया, ‘‘कामरान, पागल मत बनो…  बात को समझ.’’

उधर आलिया किसी तरह उठी. वह लंगड़ाती हुई भाग पड़ी. कामरान भी उस की तरफ दौड़ पड़ा. आलिया ने अपनी चाल तेज की. करीब ही किचन था. वह किचन में घुस गई. अंदर से दरवाजा बंद करने लगी. तब तक कामरान भी पहुंच चुका था. उस ने जोर से धक्का मारा. दरवाजा खुल गया.

सब्जी के पास छुरी अब भी पड़ी हुई थी. तेज धारदार छुरी. छुरी कामरान के हाथ में आ गई. उस ने आव देखा न ताव छुरी सीधे आलिया के पेट में भोंक दी. एक तेज बहुत तेज खून का फव्वारा फूटा, जो कामरान की आस्तीन के अंदर से होता हुआ, उस की भुजा पर चढ़ गया. आलिया की चीख पूरे घर में गूंज गई. साथ ही साथ महविश की भी.

Love Story Hindi: जूही के मंडवे तले

Love Story Hindi. मन में दुख के घनघोर बादल उमड़घुमड़ कर मेरे सारे वजूद को अपनी लपेट में ले लेते हैं. नींद मेरी आंखों से कोसों दूर है. हर रात मेरे साथ ऐसा ही होता है.

उफ, यह रात क्यों मेरे घावों को कुरेदती है? दिन के उजाले में जब घाव कुछ भरने लगते हैं, तो काली रात उसे हरा कर देती है.

मैं क्या करूं? कैसे आसिफ से कहूं कि रात आते ही मेरे घाव हरे हो जाते हैं. और… और उन घावों में इतनी सड़न होती है कि मेरा दम घुटने लगता है. मुझे खुद ही नफरत होने लगती है. मन करता है कि खुद को अभी, इसी समय खत्म कर डालूं.

मेरे दिलोदिमाग में एक हलचल सी मच जाती?है, पर मैं चाह कर भी खुद को नहीं मिटा पाती. वैसे, मैं मरने से नहीं डरती… लेकिन क्या करूं मुझे जीना पड़ रहा है. अपने लिए नहीं, अपने मासूम फारान और अपनी नन्ही सी बेटी के लिए. और… और अरसलान के लिए.

मैं चाह कर भी अरसलान से कुछ नहीं कह पाती? ‘क्या मैं बेवफा हूं?’ यह सवाल मेरा दिल मुझ से करता.

‘नहीं, हरगिज नहीं. मैं बेवफा नहीं हूं. फिर मैं…’ अरसलान को सबकुछ क्यों नहीं बता देती?

काश, मैं अपने अंदर इतना हौसला पैदा कर पाती कि अरसलान के सीने में सिर छिपा कर उन से सबकुछ बता दूं, ताकि मेरे सीने पर रखा बोझ कुछ हलका हो जाए. मैं चैन की सांस ले सकूं.

अरसलान मुझे बहुत प्यार करते हैं. मैं उन की बीवी हूं. वे जरूर मुझे माफ कर देंगे. और फिर इस में मेरा कुसूर ही क्या?है? मैं ने जानबूझ कर तो कोई गुनाह किया नहीं. तो क्या अरसलान मुझे माफ कर देंगे? क्या सबकुछ जानने के बाद भी वे मुझे पहले सा प्यार देंगे? क्या वे फारान को…

हां, फारान मेरा मंझला बेटा है, पर सिर्फ मेरा ही, अरसलान का नहीं. नहीं, मैं अरसलान से कुछ भी नहीं कहूंगी. वे मर्द हैं… और मर्द… कभी यह बरदाश्त नहीं कर सकता कि उस की पत्नी के साथ…

मैं क्या करूं?

बीते समय के जंगल से गुजरने लगो, तो काफी घनी झाडि़यां मिलती हैं. फिर भी रास्ता बनता चला जाता है. एक के बाद एक सिलसिलेवार कडि़यां मिलती चली जाती हैं. रास्ते खुले नजर आने लगते हैं.

सचमुच बीता समय कितना खूबसूरत होता है. यही समय तो इनसान की सब से बड़ी कमजोरी और सचाई है. ऐसे समय की खुशनुमा बातें जिंदगी की सब से खूबसूरत चीज होती हैं, जबकि बुरा समय सीने में दफन रह कर भी हर पल चुटकियां लेता रहता?है.

मैं हर रात को अपना बीता समय दोहराती हूं, याद रखने के लिए या भूल जाने के लिए. मुझे हर पल अपने बीते समय की एकएक बात याद आती रहती?है. अगर न याद करूं, तो शायद जिंदा ही न रह सकूं. इन का एकएक पल मेरी सांसों की तरह मेरे अंदर महफूज है, जो हर वक्त मुझे तड़पाता है, रुलाता है, जलाता है और पलपल मुझे एहसास दिलाता है कि मैं एक बेदाग औरत नहीं हूं. मेरे अंदर कुछ टूट कर बिखर जाता है. एक हूक सी उठती?है.

काश, मेरी जिंदगी में वे मनहूस पल आए ही नहीं होते. मेरी इज्जत दागदार नहीं हुई होती. आज सबकुछ होते हुए भी मेरे पास कुछ नहीं है, क्योंकि मैं अपनी इज्जत लुटा चुकी हूं.

अगर औरत के पास इज्जत नहीं तो कुछ भी नहीं. मैं ने उस कमजोर समय में औरत के बेदागपन को दागदार कर दिया. मेरे दागदार समय को कोई नहीं जानता, सिवा मेरे और उस के, जो अब दुनिया में नहीं है, इसलिए मेरा बीता समय मेरे पास अमानत के रूप में दिलोदिमाग में दफन है.

आज मैं इस बोझ को अपने दिलोदिमाग से उतार फेंकना चाहती हूं. आसिफ, जो कभी मेरी जिंदगी था, के बगैर मेरा जीना मुश्किल था. मैं और आसिफ इतने आगे बढ़ चुके थे कि पलटना बहुत मुश्किल था.

हमारे बीच न दौलत की दीवार खड़ी थी, न जातबिरादरी की और न ऊंचनीच की. हम मुहब्बत से बहुत खुश थे. जिंदगी बहुत मजे में कट रही थी. हम ने मिल कर ढेर सारे सपने संजोए थे.

उन दिनों जिंदगी काफी खूबसूरत लगती थी. मैं और आसिफ उस रैस्टोरैंट के बरामदे में लगे जूही के मंडवे तले घंटों बातें किया करते थे, वादे करते, कसमें खाते, साथसाथ जीने और मरने की बातें करते.

एक दिन अब्बू ने मेरी शादी अरसलान से तय कर दी. उन दिनों आसिफ फौज की ट्रेनिंग पर गया हुआ था. मैं बुजदिल लड़की तब कुछ बोल नहीं सकी. मैं ने उसे मोबाइल पर फोन करने की कोशिश भी की, पर पता चला कि वह उस इलाके में है, जहां नैटवर्क भी नहीं चलता और सिर्फ सैटेलाइट फोन से सेना वाले काम करते हैं.

मैं विरोध कैसे करती. जब तक आसिफ साथ न हो, मैं कैसे अब्बूअम्मां के सामने झोली फैला सकती थी. छिपछिप कर रोती रही. अपनी बरबादी का दुख मनाती रही. बस, एक उम्मीद थी कि शायद आसिफ ही आ कर कुछ करे. मैं ने आसिफ के पास चिट्ठी भी लिख दी.

आसिफ का जवाब 2-3 महीने बाद आया, ‘मुहब्बत की आखिरी मंजिल शादी नहीं होती. मुहब्बत का मजा तो एकदूसरे को खोने में है, पाने में नहीं. हम ने एकदूसरे को चाहा जरूर है, मगर जरूरी नहीं कि जिस चीज को इनसान चाहे, वह उसे मिल ही जाए.

‘तुम सबकुछ भूल जाओ. समझ लेना कि हम ने गुडि़यागुड्डे का खेल खेला था. तुम जानती हो कि तुम्हारे पिता कितने जिद्दी हैं. वह अपनी इज्जत पर आंच नहीं आने देंगे, बल्कि बेटी को इज्जत के लिए कुरबान कर देंगे.

‘यही समय की जरूरत है. कुछ भी सोचना या चिंता करना बेकार है. समय बहुत गुजर चुका है. तुम्हारे पिता अरसलान के बाप को जबान दे चुके हैं. मुझे भूल जाओ, इसी में तुम्हारी भलाई है.’

मैं रोती रही. मेरे आंसू पोंछने वाला कोई नहीं था. एक दिन मेरे सपनों का जनाजा डोली के रूप में निकला. मैं ने भी हालात से समझौता कर लिया. यहां तक कि मैं एक बच्चे की मां बन गई. मैं अपने बेटे शायान के प्यार में धीरेधीरे अपने बीते समय को भूल बैठी.

अरसलान ने मुझे इतना प्यार दिया कि कभीकभी मुझे अपने ऊपर गुस्सा आता कि मैं कैसी बीवी हूं. इतना अच्छा पति प्यार करने वाला मिला?है. उस पर भी मैं उसे याद करती हूं, जिस ने ‘गुडि़यागुड्डे का खेल’ कह कर मेरी भावनाओं को करारी चोट पहुंचाई?है.

मैं सचमुच अपने घर, अपने शौहर और शायान में ऐसी खोई कि फिर पलट कर कभी उस रैस्टोरैंट को नहीं देखा, जहां जूही लगी थी.

वक्त अपनी रफ्तार से दौड़ता रहा. अरसलान दफ्तर के काम से दौरे पर जाने वाले थे. मैं भी बहुत दिनों से नैहर नहीं गई थी. अरसलान मुझे मेरे मायके छोड़ कर दौरे पर चले गए. मैं बहुत दिनों

बाद अपने अब्बू के घर आई थी. यहां मुझे आसिफ के साथ गुजारे गए समय की याद आने लगती, तो मैं परेशान हो उठती.

तभी आसिफ वापस भी आ गया. वह फौजी वरदी में बहुत शानदार लग रहा था. उसे देखते ही मेरे मन में कड़वाहट भर आई. मैं हर समय उस से दूर रहने की कोशिश करती. मगर, मैं उस से जितना दूर भागती, वह मेरे उतना ही करीब रहने की कोशिश करता. बारबार ह्वाट्सएप पर मैसेज भेजता, ‘एक बार तो मिल लो.’

एक दिन उसे मुझ से बातचीत करने का मौका मिल ही गया. मैं बाद में उसी जूही के मंडवे तले बैठी थी. शायान सो चुका था. अम्मी भी सोई हुई थीं. पिताजी मुकदमे की पेशी के सिलसिले में 2 दिनों के लिए बाहर गए हुए थे.

शाम के 7 बजने वाले थे. अंदर कमरे में उमस थी. मैं चुपके से रैस्टोरैंट में चली गई. वहां जूही के पेड़ के नीचे बैठ गई. उस पर बेशुमार सफेदसफेद फूल खिले हुए थे, जिन की खुशबू आसपास फैली हुई थी. अजीब सा माहौल था. कुछ पुरानी यादें, कुछ फूलों की भीनीभीनी खुशबू. इन सब ने मेरे अंदर एक हलचल सी मचा दी थी.

हवा ठहरठहर कर चल रही थी. जब हवा चलती, तो फूल जमीन पर बिखर जाते. जमीन जूही के फूलों से भरी पड़ी थी. मैं ने मुट्ठीभर फूलों की पंखुडि़यां उठा कर अपनी गोद में रख लीं, तभी अचानक आसिफ मेरे बिलकुल नजदीक आ कर खड़ा हो गया. उसे देखते ही मैं संभल कर बैठ गई.

‘‘मुझे मालूम था कि तुम यहीं होगी. नाराज हो क्या?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो फिर मुझ से कतराती क्यों हो? मेरे मैसेजों पर रिप्लाई क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘आसिफ, अब मेरी शादी हो चुकी है. अब तुम से मेरा क्या वास्ता?’’

‘‘कहीं प्यार के पल भी भुलाए जा सकते हैं? उन्हें भुलाना इतना आसान नहीं होता.’’

‘‘नहीं आसिफ, मैं ने अपने बीते समय को बिलकुल भुला दिया है. मैं अपनी दुनिया में बहुत खुश हूं. मैं एक वफादार बीवी हूं. मेरे पति ने मुझे सबकुछ दिया है. मैं ने सच्चे दिल से अपने पति को स्वीकार कर लिया है. मैं ने सबकुछ पीछे छोड़ दिया है आसिफ.’’

‘‘राहेला, मैं तुम्हारा कुसूरवार हूं, पर मैं ने अपने दिल पर पत्थर रख कर तुम्हारे पिता की इज्जत के लिए कहा था, क्योंकि मैं उन्हें खूब जानता हूं. आखिर वे हैं मेरे चाचा ही न. उन से यह कहने की हिम्मत मुझ में नहीं थी कि मैं राहेला को अपनाना चाहता हूं.

‘‘मैं बुजदिल था राहेला. आज मुझे अपनी हार महसूस हो रही है. यह चुप्पी मेरा दम घोंटती है. मेरे अंदर कुछ टूट कर बिखर जाता है. अब मेरी हिम्मत जवाब दे गई है.

‘‘तुम ही बताओ, पानी नहीं मिल पाने के चलते सूख गईं जड़ों को उखड़ने में समय नहीं लगता है? मुझे माफ कर दो राहेला. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं.

‘‘राहेला, इतनी बेरुखी मैं बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा. वैसे भी एक फौजी की जिंदगी का क्या भरोसा? अगली बार मोरचे पर से लौट पाऊंगा भी या शहीद हो जाऊंगा, कुछ मालूम नहीं. अगर तुम ने मुझे माफ नहीं किया, तो मैं बहुत शर्मिंदा होऊंगा.’’

आसिफ मेरे नजदीक बैठ कर जूही की टूटी पंखुडि़यों से खेल रहा था. उस के चेहरे पर अजीब सी उदासी छाई हुई थी. वह मेरे इतने करीब बैठा था कि मेरा दिल धकधक करने लगा.

‘‘राहेला, मुझे माफ नहीं करोगी?’’ उस की आवाज में दुनिया का दर्द समाया हुआ था.

उस ने मेरा हाथ थाम लिया. मैं अरसलान को भूल गई. बेटे शायान को भी भूल बैठी. आसिफ मेरे बालों में धीरेधीरे अपनी उंगलियां फेर रहा था. उस की गरम सांसें मुझे पिघलाए दे रही थीं. जूही के मंडवे तले हम दुनिया से बेखबर बैठे थे.

‘‘राहेला,’’ उस ने मुझे धीरे से पुकारा. उस की आवाज मुझे बहुत दूर से आती महसूस हुई.

‘‘हां,’’ मैं ने भी धीरे से कहा.

‘‘मैं अगर मर गया तो…?’’ उस ने बात अधूरी छोड़ दी.

मैं खामोश रही. हम दोनों पर शैतान हावी हो चुका था.

आसिफ ने मुझे अपनी बांहों के घेरे में कैद कर लिया. मैं छटपटाई, क्योंकि हम ने पहले कभी ऐसी हरकत नहीं की थी. हमारी मुहब्बत बेदाग थी.

रात हो गई थी. रैस्टोरैंट का मालिक भी जा चुका था. उस ने हमें देखा ही नहीं.

उसी जूही के मंडवे तले हम कहां से कहां निकल गए… हकीकत से दूर भावनाओं की दुनिया में हम बहते चले गए. जूही के फूलों की चादर हमारी बिछावन बनी थी. जब भावनाओं का बुखार उतरा, तो मैं घबरा गई. मुझे उन बिखरे फूलों की पंखुडि़यों की चादर औरत की इज्जत का कफन लगने लगी. मैं अपनी नजरों में गिर गई. मुझे खुद से नफरत हो गई. फिर मैं ने आसिफ का सामना नहीं किया. अरसलान के आने से पहले ही मैं पिता के साथ लखनऊ चली गई.

उस नाजुक समय में मुझ से अनजाने में जो गलती हुई थी, उसे मैं अपने दिल में तो छिपाए रही, पर मेरा मन घुटता रहता. हर समय मैं अपनी उस गलती की आग में जलती रहती.

अरसलान करीब 15 रोज बाद लौटे. कुछ दिनों के बाद मुझे अपने अंदर एक पौधे के पनपने का एहसास हुआ. मैं घबरा उठी. ओह, यह कैसी सजा मुझे मिली है. मैं 2 महीने तक अरसलान से यह बात छिपाए रही, फिर जब मेरा जी मिचलाने लगा, तो घर में मेरी बूढ़ी सास की आंखों में चमक आ गई. मुझे ले कर ननद डाक्टर के पास गई.

डाक्टर ने नए मेहमान के आने की सूचना दे दी. सभी खुश थे. मेरी सास को बच्चों से बेहद प्यार था. वे चाहती थीं कि उन के बहुत सारे पोते हों. वक्त आने पर मैं ने अपने दूसरे बेटे फारान को जन्म दिया.

फारान अरसलान की आंखों का तारा है. आसिफ एक आतंकवादी मुठभेड़ में शहीद हो चुका है. वह जातेजाते अपनी निशानी दे गया और साथ में मुझे शर्मिंदा भी कर गया.

मैं सोचती हूं कि अरसलान को अपना गुनाह बता कर कुछ बोझ हलका कर लूं… पर, क्या फिर अरसलान मुझे पहले जैसा प्यार देंगे? क्या वह मुझ से नफरत नहीं करने लगेंगे?

शायद करेंगे… मैं औरत हूं न, इसी लिए. मेरा गुनाह माफ नहीं किया जाएगा. समय कितना आगे निकल गया और मैं कितनी पीछे रह गई. अपनी गलतियों से मेरे बीते समय के साथ.

मैं हकीकत हूं या सपना? मैं सिर्फ औरत हूं, सिर्फ औरत. जिस की जिंदगी सिर्फ प्याज के समान है, जो कुतरतेकुतरते खत्म हो जाती है. जिन की आंखें गीली लकडि़यां सुलगाने के बहाने गीली होती रहती हैं.

मैं सोचती हूं, क्या बता दूं? नहीं, क्योंकि मैं एक औरत हूं.

हम जिंदगी के किसी भी मैदान में चाहे कितनी ही बड़ी जीत हासिल कर लें, फिर भी कभी कोई बदलाव नहीं ला सकते.

शायद मेरी जिंदगी में घुटन ही घुटन है, जो मेरी जिंदगी के साथ ही खत्म होगी. हर मोड़ पर, हर दोराहे पर औरतपन की दीवार हमारे आगे सीना तान कर खड़ी है. तो क्या मैं मौत को अपने गले लगा लूं? नहीं.

मैं ने एक नजर अपने तीनों बच्चों पर डाली, जो बेखबर सोए हुए हैं.

मेरी नजरें अरसलान पर जा टिकी हैं. वे सोते में भी मुसकरा रहे हैं. यह मेरा घर है. खुशियों, मुहब्बतों, उमंगों, चाहतों से भरपूर. इस नगरी में मासूम मुहब्बतें बिखरी पड़ी हैं. मुझे खुद ही सब सहना होगा, मुसकरा कर, हंस कर, खुशीखुशी. यह बात मेरा दिल खुशियों से भरे इस घर को देख कर कह रहा है.

लेखक : सबीहा

Romantic Story : हमेशा रंग लाती है कुरबानी

Romantic Story. इंटरनैट का दौर अभी शुरू ही हुआ था. चैटिंग के जरीए मेरी मुलाकात गडि़या के एंड्रूज कालेज की एक लड़की शुभा से हुई. उसी समय मेरी नौकरी साउदर्न एवेन्यू के एक मारुति शोरूम में सेल्स एग्जीक्यूटिव के तौर पर लग चुकी थी. जिंदगी नईनई खुशियों से भर रही थी. एक तरफ कैरियर की शुरुआत, दूसरी तरफ शुभा जैसी दोस्त का साथ.

समय के साथ हमारी दोस्ती गहरी होती गई. तभी एक दिन शुभा ने बताया कि उस की सहेली नैना को मेरी मदद की जरूरत है. बिना ज्यादा सोचे मैं ने उस की मदद कर दी. शायद वहीं से मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया.

कुछ समय बाद नैना मुझ से मिलने गरियाहाट आई. एक कौफी शौप में हमारी पहली मुलाकात हुई. उस ने ‘थैंक यू’ कहा, लेकिन उस की आंखों में जो भाव थे, वे शब्दों से कहीं ज्यादा गहरे थे.

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बातचीत के दौरान नैना ने अपने संघर्षों के बारे में बताया.पिता के न रहने के बाद मां के साथ मामा के घर रहना, मां की सरकारी नौकरी से घर चलना और खुद के बड़े सपने.

नैना की सादगी, उस की आंखों का दर्द और उस के भीतर का जुनून, सबकुछ मुझे  छू गया. धीरेधीरे हमारी बातचीत बढ़ी और कब यह रिश्ता दोस्ती से आगे बढ़ गया, पता ही नहीं चला.

वक्त बीता, कालेज खत्म हुआ और नैना ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी में स्नातकोत्तर में दाखिला लिया. मैं ने उसे अपनी मां से भी मिलवाया. लेकिन शायद यहीं से मेरी जिंदगी की सब से बड़ी भूल शुरू हुई. मैं अपने परिवार और अपने प्यार के बीच बैलेंस नहीं बना पाया.

नैना मीडिया में कैरियर बनाना चाहती थी. एक दिन मैं ने उसे एक बड़े मीडिया हाउस की वैकेंसी के बारे में बताया. उस ने आवेदन किया और उस की नौकरी लग गई. 6 महीने में उसे प्रमोशन भी मिला.

लेकिन इसी बीच नैना के घर में शादी की बात चलने लगी. एक दिन उस ने मुझ से कहा, ‘‘हमें अब शादी कर लेनी चाहिए.’’ मैं उसे समझाता रहा कि मैं घर वालों को मना लूंगा. मैं चाहता था कि हम सब साथ रहें, लेकिन हालात मेरे बस में नहीं थे.

एक दिन नैना ने कहा कि हम भाग कर शादी कर लें. मैं फिर भी परिवार को साथ रखने की जिद में अड़ा रहा. तभी मेरे दोस्त संजीव, जो जमशेदपुर में काम करता था, अचानक आया. उस ने कहा, ‘‘तुम दोनों यहां आ जाओ, नई जिंदगी शुरू करो.’’

इस बार हम ने फैसला कर लिया. हम ने शाम 5 बजे बसअड्डे पर मिलने का तय किया. मैं पहुंच गया लेकिन नैना नहीं आई. मैं ने फोन किया. कोई और उठा रहा था. उस ने कहा, ‘‘एक बस हादसा हुआ है आप तुरंत म्युनिसिपल अस्पताल पहुंचिए.’’ अस्पताल पहुंचा तो देखा कि नैना अपनी आखिरी सांसें गिन रही थी. उस दिन के बाद मैं उस से कभी नहीं मिल पाया.

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समय बीतता गया. जिंदगी आगे बढ़ी. मुझे  सन्मार्ग हिंदी अखबार में नौकरी मिली, फिर आईएचएम कोलकाता में हिंदी अफसर बनने का मौका मिला. बाद में अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया और गूगल से जेआरएफ फंड भी मिला.

मेरा नाम इंडिया बुक औफ रिकौर्ड्स और वर्ल्ड रिकौर्ड्स यूनिवर्सिटी में दर्ज हुआ.

लेकिन यह सारी कामयाबियां अधूरी हैं, क्योंकि यह सब मैं उसे कभी बता नहीं पाया. अगर उसे पता होता तो शायद वह सब से ज्यादा खुश होती.

आज कई साल बीत चुके हैं. दाढ़ी में सफेदी आ गई है, लेकिन उस की यादें आज भी ताजा हैं. उस की मासूमियत, उस का भोलापन, उस की नाराजगी कुछ रिश्ते अधूरे रह कर भी जिंदगी भर पूरे लगते हैं. Romantic Story

लेखक : सप्तर्षि विश्वास

Hindi Story: पिघलता सावन

Hindi Story: डो बैल की आवाज सुन कर अमन ने दरवाजा खोला.
‘‘अरे, मंजरी तुम? यहां कैसे अचानक?’’
‘‘अंदर नहीं आने दोगे क्या? सारे सवालों के जवाब यहीं चौखट पर चाहिए?’’
‘‘अरे, नही. आओ, अंदर आओ,’’ अमन ने पानी का गिलास पकड़ाते हुए पूछा, ‘‘यहां कैसे?’’
‘‘तुम एक्सपैक्ट नहीं कर रहे थे मुझे’’
‘‘यों अचानक कैसे कर सकता हूंतुम्हीं बताओ?’’
अभी उन्होंने बात शुरू ही की थी कि अचानक मौसम पलटने लगा. सुरमई घटाओं के साए यहांवहां दौड़ने लगे, हवा ने भी ठंडक से दोस्ती कर ली और बादल भी अपनी धीमी आवाज में ताल छेड़ने लगे. सावन का महीना, कब धूप कब बारिशवैसे भी दिल्ली का अपना कोई मौसम तो है नहीं. आसपास के मौसम में रंग जाता है और बिखर भी जाता है.
‘‘लगता है कि बारिश होगी…’’ अमन ने मंजरी के हाथ से गिलास वापस लेते हुए कहा.
‘‘हां, लगता तो है.’’
‘‘इस से तो तुम्हें वापसी में परेशानी हो सकती है.’’
‘‘तो क्या मैं यहां नहीं रुक सकती?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘फैसला तुम्हारा ही था, रुकने का,’’ अमन ने मंजरी की बु? सी आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें जाना क्यों है? क्यों जाना चाहती हो अपना भरापूरा, बसाबसाया घर छोड़ कर
‘‘सबकुछ तो है तुम्हारे पास. एक बड़ा घर, बैंक बैलेंस, 2 खूबसूरत बच्चे, एक अच्छी नौकरी वाला सच्चा पति और उस पर तुम्हारी इतनी अच्छी जौब. मु? से ज्यादा ही कमाती हो, फिर संतुष्ट क्यों नहीं हो तुम?’’
‘‘हां, मैं संतुष्ट नहीं हूं तुम से.’’
‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ अमन
ने पूछा
‘‘यही कि तुम मु? संतुष्ट नहीं कर पाते हो.’’
अमन पर जैसे बिजली गिरी. कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर अपने अंदर की सारी ताकत जमा करता हुआ वह बोला, ‘‘देखो, मैं एक आम इनसान हूं, कोई सुपरमैन नहीं.’’
‘‘पर मु? सुपरमैन ही चाहिए…’’ मंजरी ने अमन के चेहरे पर नजर गड़ाए हुए कहा, ‘‘जो मु? शारीरिक रूप से संतुष्ट कर सके, चरम सुख का अहसास
करा सके.’’
‘‘वाहियात किस्म की मैगजीन पढ़ कर दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा.’’
‘‘छोड़ो, मैं तुम से किसी बहस में उल?ाना नहीं चाहती.’’
‘‘अगर मु? में कुछ कमी होती तो हमारे ये 2 बच्चे कैसे हो गए?’’
‘‘बच्चे तो हिजड़ों के भी हो जाते हैं,’’ मंजरी की यह बात सुन कर अमन भीतर ही भीतर गुस्से से तमतमाने लगा. उस का दिल चाहा कि 2 थप्पड़ में सारा चरम सुख पानी की तरह बहा दे, लेकिन उस ने खुद पर बड़ी मुश्किल से
कंट्रोल पाते हुए कहा, ‘‘देखो, अभी तुम बहकी हुई हो, सोचसम? कर सही फैसला लो.’’
‘‘अच्छी तरह सोच समझकर लिया है मैं ने यह फैसला. वैसे भी तुम्हारे साथ बहुत समय गंवा दिया है मैं ने. मैं तुम से तुम्हारी दौलत और जायदाद मैं से कोई हिस्सा नहीं मांग रही हूं और ही तुम्हें कोर्टकचहरी में फंसाना चाहती हूं. मैं बस तुम से आजाद हो कर अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बिताना चाहती हूंबिंदास.’’
‘‘चलो, मैं मान लेता हूं कि तुम्हें चरम सुख नहीं दे पाता हूं, मगर ऐसा
प्ले बौय टाइप का आदमी तुम्हें
मिलेगा कैसे और कहां?’’ अमन ने चिंतित आवाज में कहा.
मंजरी मुसकराती हुई अपना बैग उठा कर दरवाजे से बाहर निकल गई.
‘‘हां, फैसला तो मेरा ही था. बच्चे कहां हैं? आज तो संडे है, घर पर ही होना चाहिए,’’ मंजरी ने इधरउधर नजर दौड़ाते हुए कहा.
‘‘बच्चे याद हैं तुम्हें?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.
‘‘ताना दे रहे हो?’’
‘‘तुम जो चाहे सम?. तुम्हारा अपना दिमाग है और अपनी सोच.’’
‘‘जन्म तो मैं ने ही दिया था.’’
‘‘काश, जाते समय यह सोच लेती. खैर, छोड़ो मैं भी किन बातों में उल? गयाकौफी पियोगी?’’ अमन ने पूछा.
‘‘तुम ने बच्चों से क्या कहा? उन की मां कहां गई?’’
‘‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं दिल्ली शिफ्ट हो गया हूं?’’ अमन
ने कुरेदा.
‘‘तुम सरकारी नौकर हो, आसानी से पता मिल गया. बच्चों से क्या कहा तुम ने? और बच्चे हैं कहां?’’
‘‘इन सब बातों में क्यों उल? रही हो तुम? वैसे, तुम आई क्यों हो?’’
‘‘बताते क्यों नहींबच्चे कहां हैं?’’
‘‘जैसे मेरा पता किया, बच्चों का भी पता कर लेती…’’
‘‘मतलब तुम नहीं बताओगे?’’
‘‘क्या तुम भी बच्चों की रट
लगा रही होतुम ने कल रात कोई
सामाजिक उपन्यास पढ़ लिया क्या पोर्न मैगजीन की जगह?’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
बादलों की तेज गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी और बारिश होने लगी. अभी बारिश थोड़ी हलकी ही थी,
लेकिन शोर बहुत था पानी काजो पानी कभीकभी गंदगी अपने साथ बहा ले जाता है और ले भी आता है.
बाहर लौन में पानी के ऊपर गंदगी जमा होने लगी. साथ ही बारिश धीरेधीरे तेज होने लगी, लेकिन अब शोर कुछ कम हो गया था.
मंजरी कुछ बोली, बस आंखें बंद किए सोफे से सिर टिकाए रही.
अमन ने उठ कर कौफी बनाई, साथ ही कुछ स्नैक्स भी टेबल पर ला कर रखते हुए बोला, ‘‘कौफी पियो.’’
‘‘तुम तो मेहमान सम? कर खातिरदारी कर रहे हो…’’ मंजरी ने अमन की आंखों में ?ांकते हुए कहा.
‘‘लेकिन मेहमानों से लोग खुश
होते हैं.’’
‘‘पर मेरे आने से तुम खुश नहीं हो.’’
‘‘सच तो यह है कि कोई अहसास ही नहीं हो रहा है.’’
‘‘अगर मैं आती तो?’’
‘‘तो कुछ नहींअब आई हो तो भी कुछ नहींकुछ जिंदा नहीं है.’’
‘‘ठीक कहा तुम ने. हम मर ही तो जाते हैं ख्वाहिशों में घिर कर…’’
‘‘तुम्हारे चरम सुख का अहसास कैसा रहा और अनुभव भी?’’
‘‘कुछ दिन तो अच्छा लगता है, फिर हम थकने लगते हैं.’’
‘‘तो अभी अच्छा लगता है या थक गई हो?’’
‘‘तुम्हें क्या लगता है?’’
‘‘थकावट तुम पर ज्यादा भारी पड़ गई है शायद.’’
‘‘तुम पहले से भी ज्यादा सम?ादार हो गए हो.’’
बारिश अब मूसलाधार हो गई है.
घर के आंगन में थोड़ा पानी ठहरने लगा है. बाहर की सड़कें डूब गई हैं. सारा कूड़ाकचरा पानी पर तैरने लगा है. बारिश के दिनों में दिल्ली बद से बदतर हो
जाती है.
‘‘तुम यहां कहां ठहरी हुई हो? वैसे, मु? पूछना तो नहीं चाहिए था,’’ अमन ने चुप्पी तोड़ी.
‘‘क्या जाने के लिए कह रहे हो?’’
‘‘सम?ादार तो तुम भी बहुत हो,’’ कहते हुए अमन ने खिड़कियों के परदे हटा दिए और कांच वाले पल्ले खोल दिए. अब ड्राइंगरूम में कुछ ताजा हवा आने लगी.
‘‘अभी तो शाम होने में समय है,
जब बरसात रुक जाए तो चली जाना,’’ अमन बोला.
‘‘सैक्स में भी यही होता हैपानी खत्म सैक्स खत्म. बरसात हवस एकजैसे ही हैं, जब तक बरसात कायम है तब तक मौसम सुहाना रहता है, उस के बाद उमस. सैक्स में आकर्षण तो है, पर हमेशा के लिए नहीं.’’
‘‘हमेशा के लिए तो कुछ भी नहीं होता मंजरी.’’
‘‘प्यारहोता है हमेशा के लिए.’’
‘‘अब तुम 40 की हो गई हो. जब
28 की थी तो चरम सुख के लिए भटकी, अब प्यार के लिए? तुम ने जिंदगी को जरूरतों के हिसाब से जीने की कोशिश की, पर जिंदगी आपसी तालमेल और सहयोग से भी जी जा सकती थी,’’ अमन ने कहा.
‘‘उपदेश दे रहे हो?’’
‘‘जब उपदेश देना चाहता था, तब तुम ने सुना नहीं. अब क्या फायदा इन प्रवचनों का?’’
‘‘भूल सुधारी भी जा सकती है और राह से भटका इनसान सही राह पर भी सकता है.’’
‘‘बिलकुल, अगर वह भूल हो तो.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो ? मैं पछतावा करूं?’’ मंजरी थोड़ी तेज आवाज में अमन से बोली.
‘‘नहीं. मैं क्यों चाहूंगा? मेरा इस
से क्या सरोकार?’’ अमन ने कहा.
‘‘सरोकार होता तो तुम वह करते जो मैं कहती थी.’’
‘‘मतलबजोश बढ़ाने वाली
दवा? जो तुम मैगजीन में पढ़ कर सजैस्ट करती थी…’’
‘‘पर तुम एक बार कोशिश कर के तो देखते.’’
‘‘मैं जैसा था खुद से सैटिस्फाई था और हूं भी. तुम भी अब सैटिस्फाई
तो होगी? 12 साल से चरम सुख लेने
के बाद?’’
कमरे में खामोशी छा गई. सिर्फ बारिश की आवाज अपने सुरीले अंदाज में आलाप ले रही थी. हवा में थोड़ी और ठंडक बढ़ गई थी और थोड़ा अंधेरा भी बढ़ गया था. ऐसा लगता था सावन आज अपने पूरे जोबन पर है.
‘‘तुम मु? माफ नहीं कर सकते?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘शायद तुम जानती हो कि मैं इस तरह नहीं सोचता. अंधेरा बढ़ रहा है और बारिश भी. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहेगा. बारिश भी रुकेगी और अंधेरा भी छंटेगा. बस, थोड़ा सा समय लगेगा,’’ अमन ने कहा.
‘‘मगर, इस चक्कर में कहीं ज्यादा देर हो जाए?’’
‘‘तुम फिक्र मत करो, मु? खाना बनाना आता है. आज मेरे हाथ का बना खाना खा कर जाना,’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘मैं ने खाने की बात नहीं की. और यह क्या तुम ने जाने की रट सी लगाई हुई है?’’
‘‘तो फिर…’’ अमन बोला.
‘‘मैं कहीं नहीं जाने वाली.’’
‘‘इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी मंजरी.’’
‘‘इस बार भी मेरी ही चलेगी. मैं यहां  तुम्हारे पास मरने आई हूं. मेरा हक है अपने घर में मरना. मैं अभी भी तुम्हारी पत्नी हूं.’’
‘‘कहना क्या चाहती हो?’’
‘‘2 महीने हैं मेरे पास, वे तुम्हारे साथ  बिताना चाहती हूं. यूटरस में कैंसर पड़ गया है.’’
‘‘यूटरस तो निकाला जा सकता है.’’
‘‘तो तुम मु? जिंदा देखना चाहते हो?’’ मंजरी पहली बार खिलखिला
कर हंसी और हंसती ही रही बड़ी देर तक, फिर अचानक मंजरी की हंसी
रुक गई.
अमन ने मंजरी की तरफ देखा. वह एक ओर को लुढ़की हुई थी.
अमन लपक कर उस तक पहुंचा. मंजरी को सीधा कर लिटाया. उस
ने चैक किया, सांसें चल रही थीं.
उस ने जल्दी से पानी के छींटे मुंह
पर मारे.
कुछ ही देर के बाद मंजरी को होश गया. वह थकी हुई आवाज में
बोली, ‘‘लास्ट स्टेज. यूटरस निकलवा चुकी हूं. आपरेशन हो चुका है, पर
कैंसर बाकी हिस्से में फैल चुका है. सिर्फ 2 महीने…’’
बारिश आहिस्ताआहिस्ता कम होने लगी. काली घटाएं छटने लगीं और  अंधेरा भी कम होने लगा था. सड़क का पानी अपने साथ गंदगी बहा कर ले गया. घर का आंगन भी बरसात के पानी से धुल कर चमकने लगा था.
‘‘अब कहो तो मैं चली जाऊं?’’ मंजरी ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘नहीं. इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी,’’ मौसम की नमी अब अमन की आंखों में थी.
मौसम बिलकुल साफ था.      

लेखक – अहमद मुख्तार

Hindi Story: कलम का जादूगर

Hindi Story. ‘‘को आदमी अपनी गाड़ी के सामने गया है,’’ अपने पति मोहन की यह बात सुन कर किसी अनहोनी के डर से गीता का कलेजा कांप उठा.


अभी नीचे उतरने के लिए गाड़ी का दरवाजा खोला ही था कि उस आदमी का चेहरा देख कर गीता चौंक गई. उस ने ?ाट से हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया. वह कोई और नहीं, बल्कि गीता का सालों का खोया हुआ प्यार अजय था, लेकिन गाड़ी की टक्कर से उसे चोट नहीं आई आई थी.
‘‘सर, आप ठीक तो हैं ?’’ मोहन ने ?ाट गाड़ी से नीचे उतर कर अजय को संभालते हुए पूछा.
गीता और मोहन अपने एकलौते बेटे को लेने के लिए दिल्ली के रेलवे स्टेशन जा रहे थे, तभी यह हादसा हुआ था.


‘‘हां, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ अजय ने कहा. ‘‘लेकिन सर, आप यहां कैसे? मोहन ने पूछा.‘‘सर, आज ही मेरी बेटी लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी कर के घर वापस आई थी. उस के यहां घूमने की जिद के चलते मैं यहां था,’’ अजय ने बताया. ‘‘लेकिन आप की बेटी इस समय आप के साथ नहीं है?’’ मोहन ने पूछा. ‘‘वह कुछ खरीदारी करने गई थी, आती ही होगी,’’ जवाब में अजय ठहाका मार कर हंस पड़ा, तो गीता भी उस के साथ मुसकरा उठी. काफी अरसे बाद वे दोनों साथ हंस रहे थे, लेकिन अजय को इस बात की जानकारी नहीं थी.


देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जमा होने लगी. सब की आंखें अजय पर टिकी हुई थीं. लेकिन गीता की समझ में कुछ नहीं रहा था. तभी उस भीड़ को चीरती हुई एक बेहद खूबसूरत गाड़ी कर रुकी. उस गाड़ी के सामने गीता की गाड़ी फीकी लग रही थी. उस गाड़ी की ड्राइविंग सीट से एक लड़की उतरी और अजय को देखते हुए बोली, ‘‘पापा, आप यहां क्या कर रहे हैं? सब ठीक तो है ? यहां इतनी भीड़ क्यों जमा है?’’ ‘‘कुछ नहीं बेटाबस ऐसे ही’’ अजय ने कहा. ‘‘तो फिर घर चलें हम?’’ वह लड़की बोली.


‘‘चलता हूं,’’ अजय ने वहां जमा भीड़ की तरफ हाथ जोड़ते हुए कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया. उस के बैठते ही गाड़ी सड़क पर दौड़ने लगी. जब अजय की गाड़ी दूर निकल गई और गीता को यह यकीन हो गया कि अब वह भीड़ की तरफ मुड़ कर देखेगा, तो भी उसे नहीं पहचान पाएगा, लिहाजा वह गाड़ी से नीचे उतर गई. ‘‘कौन था यह आदमी?’’ गीता ने अनजान बनते हुए मोहन से पूछा. ‘‘जादूगर,’’ मोहन ने कहा.


‘‘जादूगर?’’ गीता ने मोहन का यह शब्द बड़े ही जबरदस्त अंदाज में दोहराया. ‘‘हां, कलम का जादूगर. दुनियाभर में इस के लिखे उपन्यास खूब बिकते हैं. फुरसत के पलों में मैं भी इस के उपन्यास बड़े ही चाव से पढ़ता हूं,’’ मोहन ने गीता को बताया. उस समय रात के 2 बज रहे थे, लेकिन गीता की आंखों से नींद कोसों दूर गायब थी. आज उसे रहरह कर पुरानी यादें ताजा हो रही थीं.


गीता अजय की सादगी पर मरमिटी थी. वे दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे और प्यार भी करते थे. लेकिन उन दोनों के प्यार को गीता के भैया की नजर लग गई थी.गीता के भैया नहीं चाहते थे कि वह एक गरीब लड़के से प्यार करे, क्योंकि गीता एक अमीर परिवार से थी, इसलिए उस के भैया की नजर में अजय गरीब होने के साथसाथ एक गंवार और जाहिल लड़का भी था. लेकिन प्यार तो प्यार होता है. एक दिन गीता के भैया ने उन दोनों को एकसाथ देख लिया.

उसी दिन भैया ने गीता की शादी अपने दोस्त के बेटे के साथ तय कर दी. भैया, मैं यह शादी नहीं कर सकती,’ गीता ने कहा. क्यों? क्या बुराई है इस रिश्ते में?’ भैया ने पूछा. कुछ नहीं भैया. बुराई तो आप की बहन में है जो किसी से बेपनाह मुहब्बत कर बैठी है.’ किस से? उस अनपढ़, जाहिल, गंवार लड़के से, जिस के पास कोई ठिकाना नहीं है?’ हां भैया.

आप की यह बहन उस के बगैर जिंदा नहीं रह सकती, इसलिए आप मेरा प्यार मेरी झोली  में अपनी तरफ से भीख समझ कर डाल दीजिए,’ यह कहते हुए गीता ने अपना आंचल भाई के आगे फैलाया ही था कि भाई ने गीता के गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया. थप्पड़ इतना जोरदार था कि गीताधड़ामसे फर्श पर गिर गई. गीता को इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी. आज अपने मांबाप की बहुत कमी खल रही थी कि तभी अजय की आवाज उस के कानों में गूंजी.


देख लीजिए भैया. अजय आज अपने प्यार को छिनते देख कर आप के पास चला आया है.’ मैं इस की हिम्मत का कद्र करता हूं, लेकिन आज यह मेरे हाथों से जिंदा बच कर नहीं जाएगा,’ कहते हुए भैया दीवार पर टंगी हुई म्यान से तलवार खींच कर दरवाजे की तरफ बढ़ गए. नहीं भैया, आप ऐसा नहीं करेंगे. आप जहां चाहेंगे, मैं वहीं शादी करने के लिए तैयार हूं,’ जब गीता ने यह कहा, तो भैया के बढ़ते कदम रुक गए.


तो जा कर उस से कह दो कि तुम इस शादी से खुश हो. साथ ही यह भी बोल देना कि आज के बाद वह
यहां आसपास भी दिखाई दे,’ भैया ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा. अजय गली में खड़ा था. गीता के बाहर आते ही उस ने गीता का हाथ कस कर पकड़ कर कहा, ‘यह मैं क्या सुन रहा हूं…’ तुम ने ठीक सुना है…’ गीता की आवाज कड़क थी, ‘आखिर जिस से मेरी शादी हो रही है, उस के पास सबकुछ है. तुम्हारे पास क्या है?’


क्या तुम ने इसलिए मुझसे से प्यार किया था कि आज मेरी हैसियत का मजाक उड़ा सको?’ गीता ने कुछ नहीं सुना और घर के भीतर चली गई. देखते ही देखते जाने कैसे 25 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला और अजय की याद दिल के कोने में ही दब गई. लेकिन उस की याद गीता में एक टीस पैदा कर देती थी. ‘‘गीता सुबह हो गई, तुम कहां खोई हो?’’ मोहन के कहने पर वह वर्तमान में आई.


‘‘अभी थोड़ी देर में उठती हूं,’’ कह कर गीता ने मोहन से पीछा छुड़ाया. थोड़ी देर में मोहन नहाने के लिए बाथरूम में चले गए. अब मोहन से क्या कहती गीता कि वह कभी अजय से दिलोजान से मुहब्बत करती थी. उस दिन के बाद जब भी वह उस के लिखे गए उपन्यास को पढ़ती है, तो उसे अजय से हुई आखिरी मुलाकात याद जाती है.


गीता रोते हुए अजय से बोल रही थी, ‘अजय, आज मुझे इस बात की उतनी तकलीफ नहीं है कि कल सवेरे हम दोनों एकदूसरे से हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे, जितना मुझे इस बात की तकलीफ है कि मेरे भैया तुम्हें एक अनपढ़, जाहिल, गंवार से ज्यादा कुछ नहीं समझाते हैं, क्योंकि तुम गरीब हो. इसे हमदर्दी मत समझना पर तुम्हें तुम्हारी गरीबी से नजात दिलाने के लिए मैं तुम्हारे लिए एक कलम लाई हूं.

जिस तरह तुम ने मेरे बगैर जीना नहीं सीखा है, उसी तरह तुम इस कलम से सीख लेना और अच्छा लिखना.तुम अपना चेहरा तभी  मुझे दिखाना जब तुम एक कलम का जादूगर बन चुके होगे,’ इतना कह कर अजय की जेब में कलम रख दी और गीता अपने घर की तरफ बढ़ गई. पुलिस से उगाही करने वालों पर लगा मकोका

दिल्ली में पुलिस वालों कोब्लैकमेलकर वसूली करने वाले गैंग को दबोच कर उस पर महाराष्ट्र कंट्रोल औफ और्गैनाइज्ड क्राइम एक्ट लगा दिया गया. क्राइम ब्रांच की एंटी रौबरी एंड स्नैचिंग सैल ने इस मामले में केस दर्ज किया और गिरोह के सरगना राजकुमार उर्फ राजू मीणा को गिरफ्तार कर लिया. उसे दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में पेश किया, जहां से 7 दिन की रिमांड मिली.

पुलिस अफसरों ने बताया कि यह उगाही गैंग दिल्ली नौर्थईस्ट जिले में साल 2018 से सक्रिय था, जो ज्यादातर ट्रैफिक पुलिस वालों को टारगेट करता था. ट्रैफिक स्टाफ से कथिततौर पररिश्वतलेते हुए का वीडियो होने का दावा किया जाता था. इस के बाद वे एक लाख से ले कर 5 लाख रुपए तक मांगते थे. पैसा नहीं देने पर गैंग मैंबर आला अफसरों के साथसाथ सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर कैरियर बरबाद करने की धमकी देते थे. कई पुलिस वाले इस गिरोह के जाल में फंसे, जिन्होंने मोटी रकम दे कर अपना पीछा छुड़ाया.  Hindi Story

लेखक – आनंद कुमार नायक

घरवाले मेरी लव मैरिज नहीं कर रहे हैं इसलिए मैं भाग रही हूं, क्या मेरा निर्णय सही है?

सवाल
मेरी उम्र 18 साल है, मुझे अपने कालेज के एक लड़के से प्यार हो गया है. वह भी मुझ से बहुत प्यार करता है और शादी भी करना चाहता है. यहां तक कि उस ने अपने घर में भी इस बारे में जिक्र किया है. लेकिन दोनों की फैमिली वाले मानने को तैयार नहीं हैं. लेकिन मैं उस के बिना नहीं रह सकती, चाहे मुझे घर से भागना ही क्यों न पड़े. बताएं कि क्या मेरा निर्णय सही है?

जवाब
देखिए अभी आप की उम्र पढ़ाई लिखाई व लोगों को जाननेसमझने की है क्योंकि अभी न ही आप और न ही वह युवक इतना मैच्योर हुआ है कि आप शादी जैसे जिम्मेदारीभरे रिश्ते में बंध जाएं. आप के परिवार वाले आप के हितैषी हैं तभी तो वे इस रिश्ते के लिए अभी इनकार कर रहे हैं ताकि आप को बाद में पछताना न पड़े. आप दोनों मिल कर परिवार वालों को समझाएं कि हम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं लेकिन कैरियर बनने के बाद.

इस से वे भी आप को जरूर समझेंगे और इस रिश्ते को समय आने पर स्वीकार भी करेंगे. और आप भूल कर भी घर से भागने की बात मन से निकाल दीजिए वरना बाद में पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा क्योंकि जल्दबाजी में कुछ नहीं रखा. आप ही सोचिए जब आर्थिकरूप से आप दोनों सशक्त होंगे तो आप को जिंदगी जीने का अलग ही आनंद आएगा वरना पैसों की कमी के कारण आप जीवनभर इस निर्णय पर पछताएंगी ही.

लवोलौजी : प्यार और Romance की क्लास

Sex News in Hindi: एक ओर जहां दुनिया को कामसूत्र (Kamasutra) जैसा कामशास्त्र ग्रंथ देने वाले भारत में वर्तमान में प्यार करने वालों पर पाबंदी लगाने के प्रयास शुरू हो गए हैं, वहीं न्यूयौर्क यूनिवर्सिटी (Newyork University) में प्यार की क्लास लगाई जा रही है और यह क्लास एक अंडरग्रैजुएट कोर्स (Undergraduate Course) के अंतर्गत होती है. डाक्टर मेगन पाई प्यार की इस क्लास का संचालन करती हैं. डाक्टर मेगन ने ही प्यार के इस कोर्स को तैयार किया है. आप को जान कर हैरानी होगी कि कोर्स शुरू होने के साथसाथ बेहद लोकप्रिय भी हो रहा है और सिर्फ पिछले 2 साल में ही इस कोर्स में छात्रों की संख्या तीनगुना हो गई है.

प्यार की इस क्लास का नाम लव ऐक्चुअली रखा गया है जिस में पहला सैमेस्टर मुख्य रूप से लोगों के प्यार के साथ कैसे अनुभव रहे हैं, इस के आधार पर होता है. कोर्स 2 डायरैक्शन में आगे बढ़ता है, हौरिजैंटल और वर्टिकल. हौरिजैंटल ट्रैजेक्ट्री में जहां कोर्स आप की पूरी लाइफ के दौरान होने वाले अलगअलग तरह के प्यार के रिश्तों पर बात करता है वहीं वर्टिकल ट्रैजेक्ट्री स्टूडैंट से शुरू हो कर फैमिली लव के बारे में बात करता है. कोर्स न्यूयौर्क यूनिवर्सिटी के चाइल्ड ऐंड ऐडोलोसैंट मैंटल हैल्थ स्टडी डिपार्टमैंट के तहत चलाया जाता है. इस डिपार्टमैंट के तहत इस तरह के और भी कई कोर्स चलाए जाते हैं, जिन में हैप्पीनैस और स्लीप से जुड़े कोर्स भी शामिल हैं.

प्यार के अलगअलग प्रकारों के बारे में  मेगन का कहना है कि इस कोर्स के अंतर्गत हम मातापिता और नवजात के प्यार, दोस्ती, खुद से प्यार, अपने पैशन के प्रति प्यार, मैटर और स्टूडैंट के बीच प्यार के बारे में बात करते हैं.

प्यार की इस क्लास का एक बड़ा हिस्सा स्टूडैंट्स को विस्तार से बताता  है कि आखिर लव यानी प्यार का आइडिया क्या है और इस कौंसैप्ट के अंदर क्या छिपा है. यहां रोमांटिक लव को भी समय दिया जाता है.

प्यार और रोमांस की एक ऐसी ही अन्य क्लास चीन की तियानजिन यूनिवर्सिटी में भी लगती है जहां बाकायदा थ्योरी के साथ रोमांस की प्रैक्टिकल तकनीक भी बताई जाती है. थ्योरी इन लव ऐंड डेटिंग नाम से चलने वाले इस कोर्स का मकसद स्टूडैंट्स को रिलेशनशिप में स्ट्रौंग करना है. इस यूनिवर्सिटी में विषय कोई और नहीं सिर्फ और सिर्फ प्यार और रोमांस का होता है. यहां युवकों को पर्सनैलिटी अपग्रेड, युवतियों से बात करने का तरीका, रोमांस करने और क्लास में स्टूडैंट्स को अपोजिट रोमांस को अपनी तरफ आकर्षित करने और अपोजिट सैक्स के साथ कम्युनिकेशन बिल्ड करने के तरीके भी बताए जाते हैं.

प्यार और रोमांस की इस क्लास में यह भी सिखाया जाता है कि प्रपोजल ठुकराए जाने पर किस तरह का व्यवहार किया जाए. साथ ही रोमांटिक रिलेशनशिप से जुड़ी कुछ लीगल प्रौब्लम्स के बारे में जानकारी दी जाती है.

प्यार और रोमांस के इस कोर्स में इंसान को दूसरों से प्यार करने से पहले खुद से प्यार करना भी सिखाया जाता है. हिंसा और नफरत के इस दौर में प्यार पर आधारित इस क्लास की दरअसल पूरे विश्व को जरूरत है.

मैं तलाकशुदा हूं और खुद से 4 साल छोटे लड़के से प्यार करती हूं, क्या ऐसा करना ठीक है?

सवाल
मैं तलाकशुदा हूं. मेरे 3 बच्चे हैं. मैं 4 साल छोटे लड़के से प्यार करती हूं. हम दोनों ने चुपके से शादी की. अब वह मुझ से दूरदूर भागने लगा है जिस की वजह से मैं बहुत परेशान रहती हूं. मेरा दिल करता है कि आत्महत्या कर लूं मगर बच्चों के लिए जी रही हूं. मेरे पास जो कुछ था, जमीनजायदाद, पैसा, सबकुछ मैं उस को दे चुकी हूं. अब वह मुझ से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहा है. जबकि मैं उस से बहुत प्यार करती हूं. अब वह किसी और से शादी करने वाला है. दिनोंदिन मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है.

जवाब
आत्महत्या समस्या का समाधान नहीं. यह सच है कि आप की समस्या की वजह स्वयं आप हैं, पर इस समस्या से निकलने और आगे बढ़ने का मार्ग भी आप को ही ढूंढ़ना पड़ेगा. सब से पहले तो यह समझ लीजिए कि प्रेम अंधा होता है. इस अंधे प्रेम में ही आप यह नहीं देख सकीं कि वह युवक आप से क्या चाहता है.

अब तक आप ने अपने दिल की बहुत सुन ली. अब आप को अपने बच्चों के बारे में सोच कर फैसले लेने चाहिए. उस लड़के का खयाल पूरी तरह से अपने दिल से निकाल दीजिए. आप ने उस लड़के से चुपके से शादी की थी तो जाहिर है कि आप उस पर किसी तरह का हक नहीं जता सकतीं. शुरुआत में ही कुछ भी देते समय आप को लिखित कागजी कार्यवाही करनी चाहिए थी. पर चूंकि आप ने ऐसा नहीं किया, तो अब अच्छा यही होगा कि उसे पूरी तरह भूल कर सिर्फ अपने बच्चों के लिए जीने का प्रयास करें और नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करें.

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अच्छी बात नहीं सैक्स में नानुकुर

आज यह लगातार चौथी रात थी जब सुरभि बिस्तर पर आने के बाद तकरीबन घंटाभर अपने मायके वालों से ले कर दोस्तों तक फोन पर लगी रही थी. टैलीविजन देख रहा उस का मर्द विवेक उस से बीचबीच में जोकुछ भी कहता, उस का वह ‘हांहूं’ में जवाब देती जाती. यही करतेकरते उसे खर्राटे आने लगे. विवेक ने मन मसोस कर टैलीविजन बंद किया और बगल में लेट गया.

आधी रात को जब विवेक की आंख खुली तो उस ने अपने में कड़ापन पाया. उसे सैक्स की तलब हो रही थी. उस ने सुरभि को जगाना चाहा लेकिन उस ने अपना रोज का ‘सोने दो न…’ वाला डायलौग बोल दिया.

झल्ला कर विवेक को आज भी खुद से ही काम चलाना पड़ा और वह नाराज मूड लिए ही सो गया.

इस तरह की हालत केवल विवेक की ही नहीं है बल्कि हर दूसरे घर में मर्दों को अपनी औरतों की यह ‘न’ झेलनी पड़ती है.

औरतों की सैक्स को ले कर नानुकर या इस के बल पर अपने मर्द को ब्लैकमेल करने की यह आदत अकसर अच्छेखासे रिश्ते को खराब कर देती है. ऐसा करना खुद औरतों को भी कई तरह से नुकसान पहुंचाता है.

बारबार सैक्स के लिए मना करने से औरत के साथी को लगने लगता है कि शायद उस में कोई कमी है जिस के चलते ही औरत को उस के साथ सैक्स करने में मजा नहीं आ रहा है. इस से जिंदगी के प्रति उस की चाहत कम हो सकती है.

अगर सैक्स के दौरान सचमुच औरत को अपने साथी की कोई बात खटके तो वह उसे सीधे शब्दों में बताए ताकि उस का हल निकाला जा सके.

लगाव कम होना

अपने साथी से लगातार सैक्स संबंध न बनाना या बहुत कम यानी महीने में 1-2 बार बनाना मर्दऔरत दोनों के रिश्ते में कड़वाहट घोल सकता है. सैक्स के दौरान मर्दऔरत जितने घुलतेमिलते जाते हैं, वैसा किसी और मौके पर होना अकसर मुश्किल होता है.

नए रिश्ते बनाना बुरा नहीं है लेकिन बारबार नएनए रिश्ते बनाना न आसान होता है और न ही अच्छा, इसलिए अगर औरत को अपना रिश्ता प्यारा है तो वह उसे और मजबूत करने पर ध्यान दे.

जिस तरह कोई गायक रियाज करना छोड़ दे तो वह गाना भी भूलने लगता है, उसी तरह सैक्स कम करने से सैक्स की चाहत में भी कमी आनी शुरू हो जाती है. वैसे, सैक्स करने से नीचे खून का दौरा सही रहता?है, पेशाब पर जोर बढ़ता है.

शक को जन्म देना

जी हां, औरत की रोजरोज की यह नानुकर उसे इस तरह की समस्या से भी दोचार करा सकती है खासकर अगर वह कामकाजी औरत है. फिर वह चाहे जो भी बहाने बना ले, अपने साथी को बिस्तर पर समय न देना उस के मन में यह शक पैदा करेगा कि उस की औरत की जिस्मानी जरूरतें कहीं और से पूरी हो रही हैं. मर्द का इस बात का गुस्सा दूसरे मौकों पर निकलने लगेगा जो घर में कलह की वजह बनेगा.

न करें ये गलतियां

कई औरतों को अकसर अपना बदन एक हथियार जैसा लगने लगता है. सासससुर, ननद वगैरह से नोकझोंक की हालत में वे अपने पति को सैक्स के नाम पर धमकाना शुरू कर देती हैं. साथी अगर बौयफ्रैंड है तो मामला खर्च, औफिस जैसे मसलों पर टिक जाता है.

औरत को यह समझना होगा कि सैक्स केवल मर्द की गरज नहीं है, बल्कि औरत को भी सैक्स की उतनी ही जरूरत होती है. अगर ऐसा नहीं होता तो ‘पति के अंग में तनाव कम होता है’ जैसे मुद्दों पर घर नहीं टूटते. सैक्स को ले कर ब्लैकमेल करने की आदत औरत को एक दिन किसी लायक नहीं छोड़ती है.

बिना वजह ‘न’ कहना

ऐसा हो सकता है कि किसी दिन या कुछ दिनों तक औरत सैक्स के लिए तैयार न हो, पर इस की सही वजह होनी चाहिए. ‘थकी हुई हूं’ जैसी बातें हमेशा अच्छी नहीं लगतीं. औरत का साथी भी उसी की ही तरह थका हुआ होता है. इस के अलावा एक कामयाब सैक्स औरत की थकान भी उतारेगा, इस को भी समझें.

प्यार भरी छेड़छाड़ तक तो ठीक है लेकिन औरत का साथी अगर उस से सैक्स करने के लिए चिरौरी कर रहा है, तो यह सोच कर मजे लेना शुरू न करें. इस का भारी खमियाजा भी भुगतना पड़ सकता है. लिहाजा, सैक्स करने का मजा लें और अपनी जिंदगी को खुशहाल बनाएं.

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