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Bihar : प्रशांत किशोर की जीत

Bihar. जन सुराज पार्टी के अध्यक्ष प्रशांत किशोर ने पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में शानदार जीत हासिल की. उन्हें 64,151 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 44,827 और राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 14,273 वोट मिले थे. इस तरह 19,234 वोटों के अंतर से प्रशांत किशोर जीत गए.

सीनियर पत्रकार पुष्यमित्र के मुताबिक, ‘‘महज 8-9 महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 98,151 वोट मिले थे और राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 46,308 वोट. तब जन सुराज के उम्मीदवार केसी सिंह को सिर्फ 7,690 वोट आए थे. मगर अब माहौल बदल चुका है.

पिछले चुनाव से मुकाबला करें तो भाजपा ने इस चुनाव में लगभग 54,000 वोट गंवाए और राजद ने 30,000 यानी भाजपा का नुकसान बड़ा है. बड़ी संख्या में भाजपा समर्थक जन सुराज की तरफ शिफ्ट हुए हैं. यही भाजपा के लिए खतरे की घंटी है.’’

सच तो यह है कि दिल्ली के जंतरमंतर से ले कर बांकीपुर तक जो जेनजी आंदोलन हुआ है, वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी ही है. अब तक भाजपा का विरोध दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक किया करते थे. मगर अब उन का विरोध सवर्ण और शहरी मध्यमवर्गीय लोग कर रहे हैं, जो उन के कोर वोटर हैं.

पुष्यमित्र के मुताबिक, ‘‘अंधभक्ति से बिदकने के कई कारण गिने जा सकते हैं. सब से बड़ी बात बिहार में देखें तो सब से बड़ी वजह सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना है, जिस से एक बड़ा वर्ग नाराज है.

‘‘पार्टी का पहला मुख्यमंत्री उन्हें ऐसा नहीं चाहिए था, जिस पर अपराध के दाग हों. जिस की बातचीत में वह दबंगई हो और जिसे राजद के दौर में उन्होंने भोगा है. उन्हें बारबार पार्टी विद डिफरैंस की घुट्टी पिलाई गई थी.

‘‘दूसरी वजह, जमीनी कार्यकर्ताओं के नाम पर डमी लोगों को आगे बढ़ाना और नीरज कुमार सिन्हा जैसे उम्मीदवार को थोपना. इसे बांकीपुर की जनता अपना अपमान सम झ रही थी.

‘‘कायस्थ भाजपा के साथ बताए जाते हैं, मगर कायस्थों में भी इस फैसले को ले कर कम गुस्सा नहीं था. नीट आंदोलन का मसला तो सब पर हावी था ही. मध्यम वर्ग को लगने लगा था कि सरकार उन के बच्चों की पढ़ाई और कैरियर को ले कर गंभीर नहीं है.

‘‘इस में आप यूजीसी के मसले को जोड़ दें, भरत तिवारी प्रकरण को जोड़ दें, नीट छात्रा की संदिग्ध हत्या के मामले को जोड़ दें, राम मंदिर चंदा चोरी को जोड़ दें. ये तमाम ऐसे मामले हैं, जिन के कारण भाजपा का कोर वोटर ठगा महसूस कर रहा है. उस के अंदर गुस्सा है.’’

जाहिर सी बात है कि इस गुस्से को इस बार प्रशांत किशोर ने बखूबी भुनाया और वे आगे भी भुनाएंगे. अगर ऐसा ही माहौल बना रहा तो जल्द ही प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज बिहार की राजनीति में खाली हो रहे जद (यू) और राजद के स्पेस को भरने में जुट जाएगी.

कांग्रेस ऐसी पार्टी है, जिस का सब से आसानी से जन सुराज से सम झौता हो सकता है. अगर प्रशांत किशोर कुछ बुनियादी वैचारिक मसले पर साथ देने को तैयार हों तो वामदल भी उन के साथ आ सकते हैं.

मगर ध्यान से देखें तो यह जीत इतनी आसान नहीं थी. जहां भाजपा और जद (यू) के सैकड़ों विधायकों के अलावा अनेक केंद्रीय मंत्री और बड़े नेता इस उपचुनाव के पीछे लगे हों, इस जीत को अप्रत्याशित तो नहीं कहा जा सकता.

बांकीपुर भाजपा का सब से सुरक्षित और पारंपरिक गढ़ के रूप में मशहूर रहा है. लेकिन जब प्रशांत किशोर ने इस क्षेत्र से परचा भरा, तो यहां की लड़ाई दिलचस्प बन गई. भाजपा ने इसे इज्जत का सवाल बना कर अपनी सारी ताकत यहां  झोंक दी. आखिर वह ऐसा करने को मजबूर थे. नीतिन नवीन और सम्राट चौधरी की इज्जत भी दांव पर थी, क्योंकि उन के कार्यकाल में एक विधानसभा सीट का उपचुनाव हो रहा था.

सवाल यह है कि पटना जिले के बांकीपुर विधान सभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर जीत गए, तो हारा कौन? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव?

भाजपा के अहं के चलते उस ने हार का स्वाद चखा. सत्ता पक्ष को सम झना होगा कि अब भारतीय मतदाताओं में जागरूकता बढ़ी है. अब पहले की तरह परिवार तंत्र चल नहीं सकता. मतदाता नेताओं को कसौटी पर कसने लगे हैं.

बिहार में भी परिवारतंत्र को ठेस लगी है और अनेक नेता सत्ता से बेदखल हुए हैं. ऐसे में इस फार्मूले को बहुत भरोसे का नहीं माना जा सकता. अब अंधभक्ति वाले दिन गुजरे दिनों की बात होने लगी है. ठीक है कि जनता नेतापुत्रों का सम्मान करती है, मगर वह उसे राजा या सर्वेसर्वा मानने को तैयार नहीं. वह काम भी देख रही होती है. अब मतदाताओं को उम्मीदवारों की नीयत भांपते देर नहीं लगती है, जिस से नेतापुत्रों की नियति भी बदल जाती है.

सीनियर पत्रकार अनूप नारायण सिंह कहते हैं, ‘‘जिन को लगता था कि किसी को भी मैदान में उतार देंगे तो चुनाव जीत जाएंगे, यह भ्रम टूटा है. भाई लोकतंत्र है, यह बात सम िझए. जनता किसी की नहीं है. जो आप को कुरसी पर बैठ सकता है, वह आप को कुरसी से उतार भी सकता है. शुरुआत बांकीपुर से हुई है. खत्म कहां से होगा, यह नहीं कहा जा सकता.’’

प्रशांत किशोर की यह जीत न सिर्फ भाजपा के लिए, बल्कि राजद के लिए भी खतरे की घंटी है. विपक्ष की भूमिका में अब प्रशांत किशोर तेजस्वी यादव से कहीं ज्यादा तेजतर्रार साबित होंगे. जीत का सेहरा जनता ने उन के सिर पर इसी उम्मीद के साथ रखा है. अब देखना यही है कि प्रशांत किशोर इसे कितना संभाल पाते हैं. Bihar

Bihar Politics: नीतीश कुमार बरखास्त-मंडल को कमंडल ने कुचला

Bihar Politics: नीतीश कुमार, जो पिछले 2 दशकों से बिहार के मुख्यमंत्री रहे, अब वे राज्यसभा में हैं. यह नीतीश कुमार का डिमोशन है, लेकिन इतना तय है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी के लिए अब रास्ता पूरी तरह साफ है. नीतीश कुमार कभी सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म की राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक थे, लेकिन राजनीतिक मजबूरियां, गठबंधन और उम्र के साथसाथ उन की इमेज बदलती गई. अब बिहार की राजनीति एक नए दौर में जा रही है, जहां नीतीश युग खात्मे की ओर है.

बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश युग के साथसाथ बिहार में सैकुलरिज्म और सामाजिक न्याय की राजनीति का युग भी खत्म हो जाएगा? इस के साथ ही बिहार के पिछड़ों, दलितों, मुसलिमों की चाबी पूजापाठी ऊंची ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ जातियों के हाथों में अंगरेजों के जमाने की तरह आ जाएगी.
नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से राजनीति में आए थे. वे राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और वीपी सिंह जैसे समाजवादी नेताओं की वैचारिक विरासत को आगे ले जाने वाले नेता रहे हैं.

साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं, जिस से ओबीसी को
27 फीसदी रिजर्वेशन का रास्ता साफ हुआ था. नीतीश कुमार सामाजिक न्याय की इस विचारधारा का हिस्सा थे और बिहार में ओबीसी रिजर्वेशन के सब से बड़े समर्थक थे. साल 1994 में नीतीश कुमार ने कुर्मीकोइरी वोट बैंक को ध्यान में रख कर जौर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई. साल 1996 में समता पार्टी ने भाजपा से गठबंधन किया. भाजपा से नीतीश कुमार का यह शुरुआती गठबंधन सिर्फ राजनीतिक हितों के लिए था. नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन के बावजूद विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया था. साल 1998 से साल 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में नीतीश कुमार रेल, भूतल परिवहन और कृषि मंत्री रहे. इस दौर तक सांप्रदायिक ताकतों के साथ राजनीतिक गठबंधन के बावजूद नीतीश कुमार की इमेज सैकुलर और समाजवादी नेता की ही रही.

साल 2005 में भाजपा के साथ गठबंधन में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद महिलाओं के लिए 50 फीसदी पंचायती राज आरक्षण लागू किया. अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए अलग श्रेणी ईबीसी बनाई और इस वर्ग के लिए विशेष योजनाएं शुरू कीं. ईबीसी को सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन दिया. साल 2023 में जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ महागठबंधन की सरकार चला रहे थे, तब उन्होंने बिहार में पहली बार जाति पर आधारित सर्वे कराया. यह जातिगत सर्वे ओबीसी और ईबीसी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ. नीतीश कुमार का यह कदम मंडल राजनीति का विस्तार ही था. कभी सैकुलरिज्म के प्रणेता थे नीतीश कुमार  आज भाजपा की गोद में बैठे हैं, लेकिन एक समय था जब वे सैकुलरिज्म को अपना मूल सिद्धांत मानते थे और अपने इस सिद्धांत के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. साल 2013 का उदाहरण सामने है, जब भाजपा ने गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, तो नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन एक झटके में तोड़ दिया था और इसे सिद्धांतों की लड़ाई बताया था.

भाजपा के साथ गठबंधन टूटने के बाद जद (यू) के राष्ट्रीय परिषद में दिए अपने भाषण में नीतीश कुमार ने साफ कहा था, ‘‘हम सैकुलरिज्म पर समझौता नहीं कर सकते. भारत एक ऐसा देश है जहां कई धर्म, जाति, भाषा और कल्चर के लोग साथ रहते हैं. ऐसे देश का नेतृत्व वही व्यक्ति कर सकता है, जिस के पास सैकुलर क्रेडेंशियल्स हों, समावेशी नजरिया हो और जो समाज के सभी वर्गों को साथ ले कर चल सके.’’
बिहार विधानसभा में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मोदी की राजनीति संविधान के मूल्यों पर हमला है. देश का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति सैकुलर होना चाहिए और उसे समावेशी विकास की दृष्टि रखनी चाहिए. यह देश संविधान के तहत बना है. ‘‘सवाल यह है कि संवैधानिक दृष्टि जीतेगी या हम यह देश विभाजन और धु्रवीकरण की विचारधारा को समर्पण कर देंगे? मैं वादा करता हूं हम विभाजन की राजनीति के हाथों इस देश को बरबाद नहीं करने देंगे.’’

सैकुलरिज्म के प्रति इस ईमानदार वक्तव्य के बाद कांग्रेस के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नीतीश कुमार को ‘सैकुलर लीडर’ करार दिया था, जिस पर नीतीश कुमार ने उन्हें धन्यवाद भी दिया था. यह नीतीश कुमार को सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में स्थापित करने वाला दौर था. भाजपा के साथ 17 साल की रिलेशनशिप से साल 2013 के ब्रेकअप के बाद नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथ ‘महागठबंधन’ बनाया. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन भाजपा के खिलाफ सैकुलर ताकतों का प्रतीक बना. नीतीश कुमार ने तब इस सैकुलर मोरचे को ‘संविधान बचाओ’ की लड़ाई बताया. इस चुनाव में महागठबंधन की भारी जीत हुई और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. इस दौरान उन्होंने भाजपा को ‘बड़ा झूठा पार्टी’ जैसे शब्दों से नवाजा और कहा कि उन का सैकुलरिज्म सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांत के लिए है. नीतीश कुमार की राजनीतिक जड़ें समाजवादी आंदोलन से जुड़ी हैं.

उन्होंने जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की परंपरा को कायम रखा. साल 2017 में जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजद छोड़ कर फिर भाजपा से हाथ मिलाया, तब बिहार विधानसभा में उन्होंने कहा था, ‘‘सैकुलरिज्म एक महान विचार है. यह सिर्फ भ्रष्टाचार छिपाने का शब्द नहीं है.’’ राजनीति में सत्ता की मजबूरी अलग बात है, लेकिन इतिहास के पन्नों में नीतीश कुमार का वह चेहरा हमेशा दर्ज रहेगा, जब वे सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में खड़े थे. आज सत्ता की गोद में बैठे होने के बावजूद नीतीश कुमार के पुराने भाषण और फैसले याद दिलाते हैं कि राजनीति में सिद्धांत कभीकभी सत्ता से पहले आते हैं. बिहार की जनता नीतीश कुमार को आसानी से भुला नहीं पाएगी. नीतीश कुमार के पाला पलटने में पिछड़ी जातियों में धर्मकर्म की बढ़ती पैठ भी है. पिछड़ी जातियों का एक हिस्सा सोचता है कि वह भी पूजा कर के ही ऊंची जातियों जैसी ऐश कर सकता है. ऐसी ही सोच अमेरिका तक में है, जहां ईसाई कट्टर गुलामी को चर्चों के दरवाजों से लाने की कोशिश में हैं.

सिद्धांत बनाम सत्ता की जंग नीतीश कुमार की यात्रा समाजवादी विचारधारा से शुरू हुई और सांप्रदायिक सत्ता की गोद में खत्म होने के कगार पर है. नीतीश कुमार का यह राजनीतिक सफर मंडल से शुरू हो कर कमंडल पर खत्म होता नजर आ रहा है. बिहार में अब भाजपा की दक्षिणपंथी राजनीति हावी हो रही है जहां सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म का नैरेटिव कमजोर पड़ गया है. बिहार की राजनीति में साल 2020 से ही भाजपा का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ. साल 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जद (यू) से ज्यादा सीटें जीतीं. जद (यू) 43 सीटों पर जीती थी, तो भाजपा ने 74 सीटें जीती थीं. इस के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया. नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखना भाजपा की मजबूरी थी. बिहार में भाजपा के पास अपना कोई नेता नहीं था. उस ने धीरेधीरे नीतीश कुमार के कोर वोट बैंक पर कब्जा करना शुरू किया और साल 2026 आतेआते भाजपा ने नीतीश को पूरी तरह साइडलाइन कर दिया.

2025 के विधानसभा चुनाव में राजग जीता और भाजपा सब से बड़ी पार्टी बन गई, फिर भी नीतीश को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया, लेकिन यह सिर्फ ट्रांजिशन पीरियड था. असली खेल तो अब शुरू होने वाला था. नीतीश कुमार ने 5 मार्च, 2026 को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया. यह फैसला अचानक आया और जद (यू) के कई कार्यकर्ताओं ने इस का विरोध भी किया. इस से बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया. समाजवादी पार्टी ने पोस्टर जारी किया, जिस में लिखा था कि ‘पहले इस्तेमाल करो, फिर बरबाद करो’. राजद के तेजस्वी यादव ने कहा कि भाजपा नीतीश और जद (यू) को खत्म करने की साजिश रच रही है. भाजपा ने नीतीश कुमार की उम्र और सेहत की दुबली कंडीशन का फायदा उठाया. भाजपा हिंदुत्व कार्ड खेल कर ईबीसी और दलित वोट बैंक को काफी हद तक हड़पने में कामयाब रही. भाजपा ने नीतीश कुमार को धीरेधीरे कमजोर किया. वैसे यह भाजपा की पुरानी रणनीति का हिस्सा है. सहयोगी को जरूरत तक इस्तेमाल करो और खुद को मजबूत बनाओ.

अब बिहार में भाजपा की राजनीति शुरू हो चुकी है और जद (यू) का भविष्य संकट में है. बिहार में अब स्कूलकालेजों की जगह मंदिरों की मरम्मत की जा रही है. नीतीश कुमार खुद सीतामढ़ी में जानकी मंदिर बनवा रहे हैं. सामाजिक न्याय की लड़ाई क्यों जरूरी सदियों पुरानी जाति पर आधारित गैरबराबरी को चुनौती देने के लिए ही सामाजिक न्याय की लड़ाई शुरू हुई थी. यह ओबीसी की जातियों को मुख्यधारा से जोड़ने का मिशन था. सामाजिक न्याय का मतलब केवल आरक्षण या वोट बैंक की राजनीति नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, बराबरी, आजादी और भाईचारे को साकार करने की कोशिश है. ओबीसी वह वर्ग है जो वर्णव्यस्था में शूद्र माना गया और सदियों तक सामाजिक तौर पर अनदेखा और मजदूर बना रहा. यही वजह है कि ओबीसी की आबादी सब से ज्यादा होने के बावजूद संसाधनों में भागीदारी सब से कम रही. इसी भागीदारी को बढ़ाने के लिए ओबीसी के कई नेता उभरे. इन्हीं नेताओं की बदौलत बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई की शुरुआत हुई.

कर्पूरी ठाकुर और बाबू जगदेव प्रसाद जैसे नेताओं ने बिहार में सामाजिक न्याय की सोच को जमीन पर उतारा और नीतीश कुमार ने इस मिशन को आगे बढ़ाया. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में गैरबराबरी को खत्म कर दिया था. संविधान का आर्टिकल 15 और 16 कहता है कि राज्य नागरिकों के बीच जाति, धर्म या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा, लेकिन संविधान लागू होने के दशकों बाद तक सामाजिक लैवल पर यह बराबरी कायम नहीं हो पाई. शिक्षा, नौकरी और राजनीति में आज भी ऊंची जातियों का दबदबा बरकरार है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी हाशिए पर है. यही वजह है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई जरूरी हो जाती है. ओबीसी जातियों की पहचान और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए साल 1979 में बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग बना था. मंडल आयोग ने साल 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट में ओबीसी को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर 27 फीसदी रिजर्वेशन की सिफारिश की गई थी. साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल की शिफारिश को लागू किया जिस से देशव्यापी आंदोलन हुए.

ऊंची जाति को ओबीसी के लिए 27 फीसदी रिजर्वेशन मंजूर नहीं था. पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुए, लेकिन ऊंची जातियों के विरोध के बावजूद ओबीसी रिजर्वेशन लागू हुआ और यहीं से भारत की राजनीति पूरी तरह बदल गई. मंडल से भी पहले 70 के दशक में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में 26 फीसदी ओबीसी रिजर्वेशन लागू किया था. 1990 के बाद लालू प्रसाद यादव ने ‘माय’ यानी मुसलिमयादव गठबंधन से सामाजिक न्याय को सत्ता में उतारा. नीतीश कुमार ने ईबीसी और महादलितों को जोड़कर सामाजिक न्याय की राजनीति को विस्तार दिया. साल 2023 के बिहार जाति सर्वे ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को नया डाटा दिया. इस सर्वे मे ईबीसी 36 फीसदी, ओबीसी 27 फीसदी, एससी 19 फीसदी, एसटी एक फीसदी और सामान्य वर्ग तकरीबन 15 फीसदी थे. इस ऐतिहासिक सर्वे में सब से खास बात यह निकल कर आई कि तकरीबन 63 फीसदी आबादी पिछड़ी जातियों की है. इस से सामाजिक न्याय की अहमियत पता चलती है. सामाजिक न्याय सिर्फ राजनीति नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक जरूरत भी है.

भारत की सामाजिक सच्चाई यही है कि मंडल लागू होने के 33 साल बाद भी सामाजिक और आर्थिक समानता पूरी तरह हासिल नहीं हुई है. रिजर्वेशन की बदौलत पिछड़ा समाज मुख्यधारा की ओर बढ़ा, लेकिन इस बीच सरकारी नौकरियां सिमटती चली गईं. निजी क्षेत्र में रिजर्वेशन नहीं होने का खमियाजा पिछड़े ही भुगत रहे हैं. सामाजिक न्याय के बिना आर्थिक विकास अधूरा रह जाता है. बिहार जैसे राज्य में जहां गरीबी और बेरोजगारी सब से ज्यादा है, पिछड़ों का मजबूत होना ही प्रगति का आधार है, इसलिए सामाजिक न्याय की लड़ाई बिहार की उन्नति के लिए जरूरी है. पिछड़ा वर्ग तरक्की करेगा तब ही बिहार में सदियों से फैली गरीबी दूर होगी. क्या सामाजिक न्याय हिंदुत्व की भेंट चढ़ा साल 2025 के विधानसभा चुनावों के नतीजे राजद और महागठबंधन की राजनीति का जैसे अंत साबित हुए हैं. सामाजिक न्याय और दलित चेतना की राजनीति हिंदुत्ववादी राजनीति की भेंट चढ़ गई. यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे राजनीतिक गठबंधनों, प्रोपेगेंडा और नए राजनीतिक समीकरणों का नतीजा है.

90 के दशक में लालू प्रसाद यादव के राजद ने मंडल कमीशन के जरीए ओबीसी को सत्ता में ला कर ‘सामाजिक न्याय’ की लहर चलाई, जिस से पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और राजनीति में जगह मिली. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के काल को ‘जंगलराज’ की श्रेणी में रखा गया. उच्च जातीय मीडिया का नैरेटिव कामयाब हुआ और साल 2005 में नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन बना कर मुख्यमंत्री बन गए. भाजपा के समर्थन वाली इस सरकार को सुशासन का नाम दिया गया, हालांकि नीतीश कुमार ने ईसीबी, महादलित और महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक न्याय को ही मजबूती दी और साल 2023 में जाति जनगणना कर आरक्षण का दायरा बढ़ाया. यह हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ था, फिर भी उन्होंने ऐसा जोखिम भरा कदम उठाया और इसीलिए नीतीश कुमार को साइडलाइन किया जाना भाजपा के लिए बेहद जरूरी हो गया. साल 2025 चुनाव में राजद का ‘सामाजिक न्याय बनाम हिंदुत्व’ का नारा फेल हो गया और राजग ने जीत हासिल की. चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के नाम पर हर महिला को 10,000 रुपए दिए गए, जिस से पूरा खेल पलट गया. इस चुनाव में महिलाओं का टर्नआउट पुरुषों से ज्यादा रहा और महिला वोटों की इस बढ़ोतरी का पूरा फायदा सीधे राजग के पक्ष में गया.

चुनाव आयोग ने भी भाजपा के एजेंट की भूमिका बड़ी ईमानदारी और कर्मठता से निभाई. एसआईआर के नाम पर तकरीबन 30 लाख वोटों का सत्यानाश हुआ, जिस का फायदा भाजपा को मिला. लालच और साजिश ने सामाजिक न्याय के नारे को पीछे धकेल दिया. जद (यू) ने कुर्मी और कोइरी यानी ईबीसी को थामे रखा तो भाजपा ने ऊपरी जातियों और गैरयादव ओबीसी के साथ शहरी वोटों पर पकड़ बनाए रखी. हालांकि बिहार में भाजपा हिंदुत्व का कार्ड खेलने से परहेज करती रही. राम मंदिर के बजाय डबल इंजन के नैरेटिव पर फोकस रखा. बूथ लैवल मैनेजमैंट को मजबूत रखा और भाजपा के संगठन ने जमीनी लैवल पर काम किया. जिस पिछड़ी जाति के लोगों ने दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, चेन्नई, पंजाब में ही नहीं, बल्कि खाड़ी के देशों में भी चकाचौंध चमक लाने में हड्डी गलाई, वह अपनी जमीन बिहार में लालू और नीतीश की वजह से फिर औंधे मुंह गिर रही है. तेजस्वी यादव का ‘माय’ यानी मुसलिमयादव बेस तो मजबूत रहा, लेकिन वे ईबीसी, महिलाओं और नई पीढ़ी को नहीं जोड़ पाए.

परिवारवाद, पुराना रिकौर्ड और ‘केवल विरोध’ की राजनीति की वजह से भी तेजस्वी यादव बुरी तरह हारे. साल 2020 में राजद सब से बड़ी पार्टी थी, लेकिन साल 2025 में तीसरे नंबर पर सिमट गई.
बिहार में जाति हिंदुत्व पर भारी है, लेकिन अब सामाजिक न्याय की मांग ओबीसी के दिमाग से छिटक कर दूर चली गई है. भाजपा का पूजापाठी नैरेटिव सोशल मीडिया के जरीए नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है. गोदी मीडिया के शोर में प्रोपेगेंडा हावी है. नीतीश फैक्टर और मजबूत मंडल राजनीति के चलते ही बिहार में भाजपा का हिंदुत्व उस के जीते गए दूसरे राज्यों जितना कामयाब नहीं है. राजग की जीत में हिंदुत्व से ज्यादा दूसरे फैक्टर कारगर साबित हुए, लेकिन लंबे समय में भाजपा का दबदबा बढ़ने से सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर हुई है. हिंदुत्व ने जाति को धार्मिक एकता से ओवरराइड कर दिया है. गठबंधन के पीछे
भाजपा का असली खेल साल 2014 से भाजपा ने बिहार में संघ के जरीए गांवदेहात के लैवल पर ऊंची जातियों और ओबीसी के खातेपीते घरों के कार्यकर्ताओं को मजबूत किया, जबकि जद (यू) नीतीश की व्यक्तिगत इमेज पर निर्भर रही.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में राजग की जीत के बाद भाजपा ने जद (यू) के विधायकों पर दबाव बढ़ाया. भाजपा ने जद (यू) के कई नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया, जिस से जद (यू) का वोट बैंक सिकुड़ गया. साल 2010 में भाजपा को सिर्फ 10 फीसदी वोट शेयर मिला था, वहीं साल 2025 में 20 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल किया. भाजपा की रणनीति हर राज्य में अलगअलग है, लेकिन हर जगह सिद्धांत एक ही है, सहयोगियों को कमजोर करना. साल 2019 में भाजपा ने ‘आपरेशन कमल’ के जरीए जेडीएस के 17 विधायकों को तोड़ लिया. साल 2018 में मध्य प्रदेश में भाजपा ने 28 विधायकों को तोड़ा. सहयोगियों को निगलने की साजिश ही भाजपा की कामयाबी का राज है. इस साजिश में भाजपा हर बार कामयाब रहती है. भाजपा की इस साजिश के पीछे संघ बड़ी भूमिका अदा करता है.

इस मामले में संघ के कार्यकर्ता ईमानदारी से काम करते हैं. महाराष्ट्र में शिव सेना और राकांपा को तोड़ कर तबाह कर दिया. भाजपा की यह रणनीति भारतीय लोकतंत्र को खाई की ओर ले जा रही है. वैसे भी भाजपा का फोकस सत्ता पर कब्जा करना है न कि साझेदारी निभाने पर. विपक्ष को मजबूत गठबंधन बनाने होंगे वरना भाजपा रूपी इस अजगर का लोकतंत्र को निगलना जारी रहेगा. भाजपा के चलते बिहार की उपजाऊ जमीन पर गरीबी की कीकर उगती रहेगी  और नालंदा वाला बिहार देश का सब से गरीब राज्य बना रहेगा. नीतीश कुमार की वजह से बिहारी शब्द गाली बन जाएगा, ऐसे जने के लिए जो पलटूराम हो और जिसे राज्य और जनता की फिक्र न हो. सामाजिक न्याय की लड़ाई अंबेडकर से मंडल तक की कवायद थी.

नीतीश कुमार ने इस लड़ाई को मूर्त रूप देने की कोशिश जरूर की, लेकिन आखिरकार वे संघ के चंगुल में फंस कर फेल हो गए. अपने राजनीतिक सपनों के चलते नीतीश कुमार ने बिहार को ऐसे मझधार में ला कर छोड़ दिया है, जहां एक ओर सामाजिक न्याय पिचका हुआ है, तो दूसरी ओर हिंदुत्व की तिलकधारी सोच है जो बराबरी के मिशन को पूरा निगल चुकी है. बिहार में भाजपा की लगातार बढ़ती हुई ताकत बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जरूर है, लेकिन यह अंत नहीं है. असली चुनौती अब सामाजिक न्याय की जरूरत की पहचान की है. यह भी सच है कि जब तक धर्म और जाति पर आधारित गैरबराबरी रहेगी, तब तक सामाजिक न्याय की यह लड़ाई जारी रहेगी, क्योंकि लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सब से कमजोर को भी बराबरी का हक न मिले.            

शकील प्रेम

Bihar Elections 2025: दलितमुसलिम बनाम पुराणवादी व्यवस्था का चुनाव

Bihar Elections 2025: साल 2014 में जब बिहार की राजनीति भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रही थी, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक अहम फैसला लेते हुए भाजपा के सहयोग से महादलित मुसहर समुदाय से आने वाले नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था.

यह कोई उदारता नहीं थी, बल्कि नीतीश कुमार की मजबूरी हो गई थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 40 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी.

अपने खिलाफ पनप रहे चौतरफा असंतोष और विरोध को काबू करने के लिए उन का यह टोटका तात्कालिक तौर पर कामयाब रहा था, लेकिन दिक्कत उस वक्त खड़ी हो गई, जब जीतनराम मां झी अपने वादे से मुकर गए और यह तक कहने लगे थे कि मैं कोई रबर स्टांप सीएम नहीं हूं.

जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बन जाने से हुआ क्या, दलितों के लिहाज से इस के कोई खास माने नहीं, क्योंकि उन्होंने भी दलितों के भले के लिए कुछ नहीं किया. 9 महीने के अपने कार्यकाल में जीतनराम मां झी ने जो बड़ी गलतियां की थीं, उन में से एक थी मंदिर जाना.

यों किसी भी मुख्यमंत्री का मंदिर जाना कोई हैरत की बात नहीं होती, लेकिन उन का जाना जरूर हैरत की बात थी, क्योंकि वे वक्तवक्त पर खुद को न केवल नास्तिक कहते रहे हैं, बल्कि मनुवाद सहित हिंदू धर्मग्रंथों की भी आलोचना करते रहे हैं.

मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम मांझी ने साल 2015 में कहा था, ‘‘मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि अगर भगवान होते तो दलितों पर इतना अत्याचार क्यों होता? मंदिरों में अब भी दलितों को भेदभाव झेलना पड़ता है, इसलिए मु झे मंदिरों में कोई आस्था नहीं.’’

21 सितंबर को जीतनराम मांझी ने रामायण की कहानी को काल्पनिक बताया और 2 महीने बाद ही 19 दिसंबर को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘मैं राम में विश्वास नहीं करता. राम कोई व्यक्ति नहीं था.’’

अंबेडकर जयंती के मौके पर बोलते हुए जीतनराम मांझी ने दलितों को धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने का मशवरा भी दिया था. 17 मार्च, 2023 को उन का एक बयान था, ‘‘रामायण एक काल्पनिक कृति है. रावण राम से अधिक मेहनती और कर्मकांड में निपुण था.’’

इस पर जब हिंदूवादी संगठनों ने उन्हें घेरा तो उन का बयान था कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले धर्म के ठेकेदारों को भी आलोचना का सामना करना चाहिए.

जीतनराम मांझी अगर अपनी बातों और बयानों पर टिके रहते तो तय है कि बड़े राष्ट्रीय नेता होते, लेकिन नीतीश कुमार और भाजपा ने उन की इतनी दुर्गति कर दी है कि मौजूदा चुनाव में वे अपने मनमुताबिक सौदेबाजी भी नहीं कर पाए. उन का और उन की हम पार्टी का क्या हुआ, यह तो नतीजे बताएंगे, पर अकसर भाजपा को दलितों की बदहाली का जिम्मेदार ठहराते रहने वाले जीतनराम मां झी और उन के जैसे दलित नेता भी इस गुनाह के कम जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपनी खुदगर्जी के लिए जब चाहे रामनामी चादर ओढ़ लेते हैं. इन्हीं तथाकथित ‘नास्तिक’ जीतनराम मां झी की मुख्यमंत्री रहते ही एक मंदिर में जो बेइज्जती हुई थी, तो वे तिलमिला उठे थे.

बेआबरू होते दलित नेता

मामला अगस्त, 2014 का है जब जीतनराम मां झी औररंगाबाद के देव मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए चले गए थे. यह सूर्य मंदिर है जहां छठ के दिन बेतहाशा भीड़ उमड़ती है. पूजन और दर्शन की उन की मंशा पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि मंदिर के पुजारियों और स्थानीय ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें यह कहते हुए मंदिर में दाखिल होने से रोक दिया था कि भले ही वे मुख्यमंत्री हों लेकिन चूंकि दलित हैं, इसलिए सीधे मंदिर में जा कर पूजा नहीं कर सकते.

बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले की तर्ज पर मंदिर से दलित होने का ‘प्रसाद’ आम दलितों की तरह ले कर जीतनराम मां झी भुनभुना और तिलमिला कर यह कहते रह गए कि जो लोग बाहर मेरे पांव पड़ते हैं वही आज मु झे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं, लेकिन इस अपमान का बदला वे नहीं ले पाए, न ही ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों और पुराणवादियों को कोई सबक या नसीहत दे पाए, उलटे मंदिर के बाहर से ही उन्होंने पूजापाठ किया था और तरस खाने वाली एक बात यह भी थी कि उन के जाने के बाद इस मंदिर को धो कर पवित्र किया गया था.

आज उसी ब्राह्मण और बनियावादी भगवा खेमे के साथ मिल कर जीतनराम मां झी चुनाव लड़ रहे हैं, जो सदियों से दलितों को प्रताडि़त करता रहा है, भेदभाव करता रहा है और आज भी उन का शोषण बदस्तूर कर रहा है.

अब भला कौन जीतनराम मां झी और उन जैसे दोहरे चरित्र वाले दलितों से पूछे और किस को वे बताएं कि इस देश में दलित होने के माने क्या होते हैं और क्यों दलित मंदिर जा कर पूजाअर्चना करने की ख्वाहिश और जिद पर अड़े रहते हैं, जबकि शोषण, भेदभाव और जातिगत भेदभाव के उद्गम स्थल यही मंदिर हैं, जहां राज कानून संविधान या उस के आर्टिकल 17 का नहीं, बल्कि पुराणवादियों का चलता है. इस से वे कोई सम झौता किसी भी शर्त पर नहीं करते. हां, तगड़ी दक्षिणा मिले तो दलितों को भी सवर्णों की तरह पूजापाठ करने की इजाजत दे देते हैं, वह भी अहसान की शक्ल में.

प्रसंगवश यह जान लेना जरूरी है कि यही जिद कभी राष्ट्रपति रहते रामनाथ कोविंद ने भी की थी. लेकिन इन पुराणवादियों ने बख्शा उन्हें भी नहीं था.

मामला 18 अक्तूबर, 2018 का है, जब वे अपनी पत्नी सविता कोविंद सहित पुरी के जगन्नाथ मंदिर गए थे. चूंकि मामला राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद का था, लेकिन उस पर बैठा व्यक्ति कोरी यानी दलित समुदाय का था, इसलिए हल्ला कम मचा, क्योंकि मामले पर लीपापोती कर दी गई थी, पर उन्हें भी प्रवेश से रोकने की कोशिश की गई थी, उन के साथ लगभग धक्कामुक्की की गई थी. सच जो भी हो लेकिन मंदिर के अंदर जाने की इजाजत उन्हें मिल गई थी.

ठीक उसी दिन यह खबर भी सुर्खियों में रही थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को एक लाख रुपए का दान दिया. मुमकिन है कि यह सौदा रहा हो.

ऐसी सौदेबाजियां समाज में अब बेहद आम हैं, जिन के तहत पंडेपुजारी पैसे वाले दलितों के घर मनमुताबिक दक्षिणा मिल जाने पर पूजापाठ करने के लिए चले जाते हैं, क्योंकि उन का सब से बड़ा भगवान यही पैसा होता है जिस के लिए सारे धार्मिक छलप्रपंच रचे गए हैं. ये वे शिक्षित और संपन्न हो गए दलित हैं जो अपना मसीहा तो भीमराव अंबेडकर को मानते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने कई बार बहुत साफतौर पर नसीहत दलितों को दे रखी थी कि पुराणवादियों के अत्याचारों से छुटकारा चाहिए तो स्कूलकालेजों को मंदिर सम झो और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानो.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मंत्र यही दिया था कि मंदिर और धर्मग्रंथ छोड़ो और सीधेसीधे मनुवादियों से राजनातिक स्तर पर भिड़ो, तो जीत भी सकते हो.

ऐसा होता दिखने भी लगा था लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने कैसे भाजपा के सामने हथियार डालते हुए घुटने भी टेक दिए, यह हर किसी ने देखा. यह ठीक है कि मायावती कभी मंदिर नहीं गईं लेकिन इस से उन के गुनाह पर परदा नहीं डल जाता.

बिहार में यही काम जीतनराम मांझी के बाद चिराग पासवान कर रहे हैं जिन के लिए उन के पिता रामविलास पासवान विरासत में अच्छीखासी सियासी पूंजी छोड़ गए हैं.

फिल्मों और क्रिकेट में नाकाम रहे चिराग पासवान ने अपने पिता के उसूलों को तोड़तेमरोड़ते भाजपा का हाथ थामने के लिए खुद को धार्मिक और कर्मकांडी साबित करते हुए पिता की तेरहवीं धूमधाम से की थी, अपना सिर मुंडाया था, गंगा पूजन किया, मृत्युभोज दिया और ब्राह्मण पूजन भी किया था, जबकि रामविलास पासवान का मानना था कि दलितों के पिछड़ेपन और शोषण की बड़ी वजह यही ढोंग और पाखंड हैं, इसलिए वे कभी इन चक्करों में नहीं पड़े और अपनी शर्तों पर भाजपा से सम झौता करते रहे.

लेकिन अब उलटा हो रहा है. चिराग पासवान इतने बेबस हो गए हैं कि भाजपा के इशारे पर नाचते रहने के सिवा उन के पास कोई रास्ता नहीं बचा.

बिहार के ये दोनों ही नेता भाजपा की गोद में बैठ कर मायावती की तरह वोट शिफ्टिंग वाला खेल खेलते हैं. एक तरह से देखा जाए तो सीधेसीधे पुराणवादियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

90 के दशक के लालू राज में दलितपिछड़े साथसाथ थे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना रोल मौडल मानते थे. लालू प्रसाद यादव जानतेसम झते थे कि न केवल दलित पिछड़ों, बल्कि मुसलिमों की भी सब से बड़ी दुश्मन पार्टी भाजपा ही है. लिहाजा, उन्होंने खुलेआम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उन के मनुवाद के चिथड़े उड़ाते हुए इन दोनों समुदायों को साध लिया था.

मुसलिम भी कम परेशान नहीं

19 फीसदी मुसलिम आबादी वाले बिहार में मुसलिमों की हालत भी दलितों सरीखी ही है. वे भी मुख्यधारा से दूर हैं और पुराणवादियों के धार्मिक तिरस्कार, प्रताड़ना और अनदेखी के शिकार हैं.

इन का भी दलितों की तरह कोई सियासी बड़ा नेता नहीं है. आजादी के बाद यह वर्ग कांग्रेस को अपना हितैषी सम झ कर उसे वोट करता रहा, लेकिन लालू युग की शुरुआत से ही राजद का हो लिया.

लालू प्रसाद यादव की तो राजनीति ही यादवों के साथसाथ मुसलिमों के कंधों पर टिकी थी जिसे पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘एमवाय’ का नारा दिया था.

साल 2024 में बिहार में 7 बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिन में कोई दर्जनभर मुसलिम मारे गए थे. हिंदू तीजत्योहारों पर तो मुसलिमों की शामत सी आ जाती है. मुसलिम बहुल इलाकों से जब हिंदुओं के जुलूस वगैरह निकलते हैं, तो मुसलिम दुआ मांगने लगते हैं कि सब कुछ ठीकठाक निबट जाए, नहीं तो खैर नहीं.

नीतीश राज से उन्हें कोई एतराज या परेशानी नहीं होती, लेकिन जब भी नीतीश राम भक्तों की पार्टी के पहलू में जा बैठते हैं तो मुसलिम खुद को पहले से ज्यादा असुरक्षित और असहज महसूस करने लगते हैं.

मोदी राज में बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर बिहार में मुसलिमों को निशाने पर अकसर लिया जाता रहा है. पूर्वी सीमांचल के जिलों कटिहार और किशनगंज में तो यह आएदिन की बात हो गई है जहां के मुसलिम खुद को पराया सम झने लगे हैं.

90 फीसदी मुसलिम रोज कमानेखाने वाले हैं, जो छोटेमोटे काम कर के जैसेतैसे गुजारा करते हैं. एसआईआर में दलितों के साथ मुसलिमों के नाम सब से ज्यादा कटे हैं, जिस पर कांग्रेस और राजद ने जम कर बबाल काटा था.

चुनाव आतेआते यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, लेकिन मुसलिम तबका मन बना चुका है कि अब भाजपा से चार हाथ दूर ही रहना है और जनता दल (यू) से भी परहेज करना है.

न केवल धर्म बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी मुसलिम और दलित एकदूसरे को नजदीक महसूस करते रहे हैं. 90 के दशक में दोनों ने दिल से लालू प्रसाद यादव को वोट किया था. इस के बाद नीतीश कुमार पर भी उन्होंने भरोसा जताया और पिछले चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी के साथ यह सोचते हो गए थे कि शायद वे हमे सुरक्षा दे पाएं. पर जल्द ही साफ हो गया कि ओवैसी बिहार में मुसलिम वोटों की फसल काटने आए थे, जिन की कोई जमीनी पकड़ या संगठन नहीं है. सभी से मोह भंग होने के बाद इस बार फिर यह तबका महागठबंधन की तरफ झुक रहा है, क्योंकि ज्यादातर दलित भी अब जद (यू) पर भरोसा नहीं कर रहे.

साथ होंगे दलितमुसलिम

मंडल कमीशन के बाद कमंडल की राजनीति बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों की तरह परवान नहीं चढ़ पाई थी, तो लालू प्रसाद यादव इस की एक बड़ी वजह थे. उन की हरमुमकिन कोशिश भाजपा को रोकने की रही, क्योंकि इस के खतरे और नुकसान उन्हें सम झ आ रहे थे कि अगर कभी धोखे से भी भाजपा अपने दम पर बिहार की सत्ता पर काबिज हो पाई तो बिहार में भी पूरी तरह ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा.

साल 2020 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि न केवल दलित बल्कि मुसलिम वोट भी बंटे थे. इस चुनाव में राजग को 125 सीटें मिली थीं जिन में से भाजपा को 74 और 43 जनता दल (यू) के खातें में गई थीं. हम और वीआईपी के खाते में 4-4 सीट आई थीं.

महागठबंधन में राजद को 75 और कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं, तो वामपंथी दल 16 सीटें ले जाने में कामयाब रहे थे. लोजपा को गिरते पड़ते एक सीट जमुई की मिल पाई थी, लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम को उम्मीद से ज्यादा 5 सीटें मिली थीं. हालांकि, बाद में उस के 4 विधायक राजद में चले गए थे. हैरत की बात महागठबंधन का वोट शेयर 37.5 फीसदी राजग के 37.3 फीसदी से 0.2 फीसदी ज्यादा होना रहा था.

इस चुनाव में चिराग पासवान की मंशा राजद के वोट काटने की ज्यादा थी, जिस में वे कामयाब भी रहे थे. कोई 15 सीटों पर लोजपा ने राजद के वोट काटे थे, जिन में दलितमुसलिम वोट ज्यादा थे. हालांकि, राजद से कहीं ज्यादा नुकसान जद (यू) को उठाना पड़ा था, लेकिन उस की भरपाई भाजपा ने कर दी थी.

महागठबंधन को दूसरा बड़ा नुकसान एआईएमआईएम ने पहुंचाया था, क्योंकि मुसलिम बहुल सीटें जो राजद और कांग्रेस को मिलनी तय मानी जा रही थीं, उन्हें ओवैसी की पार्टी झटक ले गई थी.

इस जीत ने साफ कर दिया था कि एआईएमआईएम को मुसलिमों के साथ साथ दलित वोट भी मिले हैं. हालांकि, 4 विधायकों के पाला बदल लेने से एआईएमआईएम की साख पर बट्टा ही लगा था. मुसलिमों को सम झ आ गया था कि इस पार्टी से उन के भले की उम्मीद करना बेकार की बात है.

बिहार में मुसलिम वोट तकरीबन 18 फीसदी और दलित वोट 19 फीसदी हैं, जो निर्णायक है और महागठबंधन के पाले में जाना तय हैं, जिस की दावेदारी 14 फीसदी यादव वोटरों की भी है. इस तरह 51 फीसदी वोट अगर महागठबंधन को मिलते हैं, तो उसकी राह में कोई रोड़ा है नहीं.

लेकिन यही अंदाजा पिछले चुनाव में भी सियासी पंडितों का था जो पूरी तरह गलत नहीं निकला था, क्योंकि मामूली ही सही पर महागठबंधन का वोट फीसदी राजग से ज्यादा था. एआईएमआईएम ने 1.25 फीसदी मुसलिम वोटों और 5 सीटों को हथियाया था तो हम और लोजपा ने कोई 7 फीसदी दलित वोटों को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

इस बार इन वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी कर रही है. लेकिन दलितमुसलिम दोनों ही दूध के जले हैं, लिहाजा छाछ होंठों तक ले जाने की हिम्मत जुटा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा.

शुरू में ऐसा लग रहा था कि भूमिहार होने के चलते पीके केवल 15 फीसदी सवर्ण वोटों में सेंध लगाएंगे, लेकिन चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही उन का दखल दलितमुसलिम बहुल बस्तियों और सीटों में बढ़ा तो साफ हो गया कि उन की असल मंशा क्या है.

वैसे भी बिहार में अनिश्चितता का माहौल है खासतौर से दलितमुसलिम ज्यादा सहमे हुए हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर लुभाने की कोशिश कर तो रहे हैं, लेकिन उन के पास कोई ठोस आधार नहीं है सिवा बातों, वादों और आश्वासनों के. ऐसे में वे खुद को बिहार का अरविंद केजरीवाल साबित कर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि उन के पीछे न कोई अन्ना हजारे है और न ही बड़ा कोई आंदोलन है, जो लोगों का मन बदल सके.

बिहार में बहुतकुछ साफ भी है कि पुराणवादियों का दबदबा खत्म होना चाहिए और इस के लिए दलितमुसलिम एकजुट हो गए तो राजग को झटका भी लग सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार अब सिर्फ 3 फीसदी कुर्मियों के नेता रह गए हैं और सेहत भी उन का साथ नही दे रही. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने संविधान का हवाला और वास्ता दे कर आगाज तो अच्छा कर दिया है. Bihar Elections 2025

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