Hindi Story: औफिस के नए मैनेजर मिस्टर आलोक बहुत ज्यादा हैंडसम थे, पर उन की पत्नी रीता एकदम साधरण सी औरत. लोगों को लगा कि मिस्टर आलोक ने दहेज के चक्कर में रीता मैडम से शादी की है, पर मामला एकदम उलट था. क्या था इस बेमेल शादी का राज?
कं पनी के नए मैनेजर के आने की खबर सुन कर सभी मुलाजिम अपनेअपने काम में जुट गए थे. असिस्टैंट मैनेजर नितिन की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. उन के ऊपर दोहरा दबाव था, एक घर का और दूसरा औफिस का. मैनेजर और असिस्टैंट मैनेजर दोनों के सरकारी मकान अगलबगल थे. इसी वजह से पारिवारिक संबंधों को निभाने की जिम्मेदारी भी नितिन पर आ पड़ी थी. पुराने मैनेजर मिस्टर कपिल से नितिन के परिवार जैसे संबंध थे. उन के जाने के बाद से नितिन का पड़ोस एकदम सूना हो गया था. अब महीनेभर बाद कल मिस्टर आलोक यह जिम्मेदारी संभालने वाले थे.
मिस्टर आलोक फिलहाल अकेले आ रहे थे. उन की पत्नी रीता के साथ न आने के चलते नितिन का तनाव थोड़ा कम हो गया था. नितिन ने मिस्टर आलोक के आने से पहले ही घर और औफिस दोनों जगह का इंतजाम ठीक करवा दिया था. औपचारिक मुलाकात के लिए शाम की चाय पर उन्हें घर बुलाने की बात भी अपनी पत्नी रेखा से कह दी थी. मिस्टर आलोक दोपहर में घर पहुंच गए. औफिस वालों ने उन के घर को ठीक तरह से सजासंवार दिया था. मिस्टर आलोक इस समय बहुत कम सामान साथ ले कर आए थे. उन्होंने मातादीन के अलावा वहां पर तैनात दूसरे मुलाजिमों को वापस भेज दिया था.
औफिस से आ कर नितिन को मिस्टर आलोक को घर पर मुलाकात कर उन्हें चाय पर आने का न्योता भी देना था. नितिन ठीक 5 बजे घर पहुंचे. मिस्टर आलोक ने उन्हें आते हुए देख लिया. जरा देर में वे खुद ही नितिन के घर पहुंच गए. उन्होंने डोर बैल बजाई. रेखा ने दरवाजा खोला. उस के कुछ पूछने से पहले ही मिस्टर आलोक ने अपना परिचय भी दे दिया. तभी नितिन की आवाज सुनाई दी, ‘‘कौन है रेखा?’’
रेखा के मुंह से अभी आवाज तक नहीं निकल रही थी. इतनी देर में नितिन वहां आ गए और बोले, ‘‘सर, आप…’’
‘‘शुक्र है, तुम मु?ो देख कर
चौंके नहीं.’’
‘‘मैं आप से मिलने आने वाला ही
था सर.’’
‘‘उस से पहले मैं ही चला आया. कायदे से नए पड़ोसी को पुराने
पड़ोसी के घर जाना चाहिए. तुम औपचारिकता निभाने के लिए ही मेरे घर आने वाले थे.’’
‘‘नहीं सर, यह बात नहीं है. आप मेरे बौस हैं. मेरा फर्ज बनता है कि मैं पहले घर पर आप से मिलूं और आप को अपने घर आने का न्योता दूं.’’
‘‘मैं औफिस में तुम्हारा बौस हूं.
घर में हम सिर्फ पड़ोसी हैं,’’ मिस्टर आलोक बोले.
रेखा को मिस्टर आलोक का खुलापन बड़ा भला लग रहा था. लंबेचौड़े, स्मार्ट
और सुडौल देह के स्वामी मिस्टर आलोक बहुत दिख रहे थे. उन का गोरा रंग उन के कालेसफेद खिचड़ी बालों के साथ बहुत मेल खा रहा था.
‘‘बैठिए सर,’’ नितिन ने कहा.
तभी रेखा ने शांताबाई के हाथ पानी भिजवा दिया और खुद भी आ कर औपचारिकतावश हाथ जोड़ दिए.
‘‘यह मेरी पत्नी रेखा है और ये हमारे कंपनी के नए मैनेजर मिस्टर आलोक हैं,’’ नितिन ने उन दोनों का परिचय भी कराया.
फिर वे दोनों आपस में बातें करने लगे. रेखा किचन की तरह बढ़ गई.
‘‘आप के साथ परिवार के बाकी सदस्य आते तो बहुत अच्छा लगता सर.’’
‘‘मेरी पत्नी रीता, बेटी रोशनी और बेटा राहुल भी जल्दी आ जाएंगे. अभी जरा वे काम में बिजी थे. वैसे, आप के बच्चे दिखाई नहीं दे रहे…’’ मिस्टर आलोक ने पूछा.
‘‘खेलने गए हैं. वे अभी छोटे हैं सर,’’ नितिन बोले.
कुछ ही देर में शांताबाई चायनाश्ते के साथ हाजिर हो गई.
‘‘इस सब की क्या जरूरत थी? सिर्फ चाय ही काफी थी,’’ मिस्टर आलोक बोले.
तीनों साथ बैठ कर चाय पीने लगे. कुछ देर बाद मिस्टर आलोक ने उन से विदा ली.
‘‘सर स्वभाव से बहुत सरल हैं. उन में बौस जैसी अकड़ नहीं है,’’ मिस्टर आलोक के जाने के बाद नितिन बोले.
अगले दिन मिस्टर आलोक ने औफिस जौइन किया था. उन के स्वभाव से सभी खुश थे. वे बहुत जल्दी सब के साथ घुलमिल गए. अकसर वे शाम को नितिन के पास आ जाते और खेल से ले कर राजनीति तक की चर्चा करते.
‘‘आप का परिवार कब आ रहा है?’’ एक दिन नितिन ने पूछा.
‘‘हफ्तेभर के अंदर आ जाएंगे वे लोग,’’ मिस्टर आलोक बोले.
‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है.’’
तकरीबन एक महीने बाद रीता मैडम के बच्चों के साथ आने की तारीख तय हो गई थी और मिस्टर आलोक ने इस की खबर नितिन को दे दी थी. उन के निर्देश पर मैडम के वैलकम की तैयारी होने लगी. रेखा भी उन के मकान का इंतजाम देख रही थी.
आखिर वह दिन आ गया और रीता मैम अपने जवान बच्चों के साथ आ गईं. औफिस के सब लोग सपरिवार मैडम के स्वागत के लिए आए हुए थे.
उम्मीद के उलट रीता मैम को देख कर औफिस के सभी लोग हैरान रह गए और उन की कल्पना एक ?ाटके में बिखर गई.
कंप्यूटर औपरेटर मिनी बोली, ‘‘कहां सर और कहां रीता मैडम… दोनों में जमीनआसमान का अंतर है.’’
‘‘ऐसी जोड़ी की तो मैं सपने में
भी कल्पना नहीं कर सकती थी,’’ रिया ने कहा.
रीता मैडम को देख कर सब खुसुरफुसुर कर रहे थे, लेकिन ऊपर से चेहरे पर मुसकान ओढ़े हुए थे.
रेखा ने रीता मैडम को बुके थमा कर कहा, ‘‘वैलकम मैडम.’’
रीता ने एक गहरी नजर रेखा पर डाली लेकिन बोली कुछ नहीं. वह चारों तरफ नजर घुमा कर सब को देख रही थी. उसे पूरा विश्वास था कि इस समय सब उसे देख कर क्या महसूस कर रहे हैं, लेकिन उसे इस बात की कोई चिंता नहीं थी. वजह, वह ऐसी ही प्रतिक्रिया पहले भी कई वैलकम पार्टी में देख चुकी थी. उसे अपने बारे में कोई गलतफहमी
नहीं थी.
रीता मोटी, नाटी और सांवली थी. कहीं से भी उन दोनों का कोई मेल नहीं था. न उसे बात करने का सलीका था और न ही उठनेबैठने और खानेपीने का. वह एक साधारण औरत की तरह सब
से पेश आ रही थी, जो मिस्टर आलोक के ओहदे से कहीं भी मेल नहीं खा रहा था. उस से मिल कर सभी को निराशा हुई थी.
जब रीता किसी समारोह में जाती, तो बातें पहले धीमी होतीं, फिर उस के कानों तक पहुंच ही जातीं.
‘‘देखो, वही है…’’
‘‘हां, वही सर की पत्नी…
‘‘सम?ा नहीं आता, सर ने इस में क्या देखा…’’
एक बार किसी औरत ने सीधे पूछ ही लिया, ‘‘रीताजी, आप पहले क्या करती थीं?’’
रीता ने बिना किसी ?ि?ाक के कहा, ‘‘जीना…’’
पूछने वाली औरत थोड़ी असहज हो गई, ‘‘मतलब कोई काम?’’
‘‘काम तो अब भी करती हूं.’’
‘‘कौन सा?’’
‘‘अपने बच्चों का भविष्य संवारने का…’’ रीता ने जवाब दिया.
लोग अकसर रीता मैडम को तौलते थे. तराजू में रखते थे एक पल में.
‘‘न पढ़ीलिखी, न सलीकेदार, न ही खूबसूरत…’’
रीता को यह अजीब नहीं लगता था. वह जानती थी कि समाज कीमत दिखने वाली चीजों से लगाता है. जिस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि लोग उस की मौजूदगी से असहज हैं, उसी दिन उस ने तय कर लिया था कि वह खुद को हलका साबित नहीं करेगी.
एक सामाजिक कार्यक्रम में किसी सज्जन ने आलोक से हंसते हुए कहा, ‘‘आप की पत्नी बड़ी अलग हैं.’’
आलोक कुछ कहने ही वाले थे,
तभी रीता ने खुद जवाब दे दिया, ‘‘हां, क्योंकि मैं सही समय पर जीना सीख
गई थी.’’
वहां सन्नाटा छा गया. समाज को यही खलता था कि रीता शर्मिंदा नहीं थी. अगर वह सिर ?ाका लेती तो शायद ‘बेचारी’ कहलाती. अगर रोती तो ‘दया’ मिल जाती. पर वह न रोती थी, न ?ाकती थी. वह जानती थी कि समाज के लिए उस की कीमत सिर्फ इतनी थी कि वह किस की पत्नी है, उस से ज्यादा नहीं और कम भी नहीं. उसे यह भी पता था अगर वह खूबसूरत होती तो यही समाज उसे ‘भाग्यशाली’ से ज्यादा कुछ न कहता.
रीता ने कभी सफाई नहीं दी, क्योंकि सफाई वही देता है जो अपराधी हो. रीता ने सिर्फ एक बात पकड़े रखी,
उस की जगह. आज भी जब लोग उसे देखते हैं, तो सोचते हैं कि यह यहां तक कैसे पहुंची?
समाज की नजर में रीता की कीमत कभी ऊंची नहीं रही, पर उसे अब यह फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि जिस औरत ने अपनी कीमत खुद चुकाई हो, उसे समाज के लेबल की जरूरत नहीं होती.
रेखा सोच रही थी कि एक मैनेजर की पत्नी में जिन गुणों की उम्मीद की जाती है उन में से एक भी रीता में नहीं था. इस से पहले भी 2 मैनेजर उन के बगल के बंगले में रह कर जा चुके थे. उन की पत्नियां बड़ी सुघड़ और सलीकेदार थीं. वह सोचने पर मजबूर हो गई कि हो न हो मिस्टर आलोक ने रुपयों की खातिर लालच में पड़ कर रीता मैम जैसी औरत से शादी की हामी भरी होगी.
आज दिनभर चर्चा का विषय रीता मैडम ही थीं.
‘‘मैडम तुम्हें बड़ी तिरछी नजर से देख रही थीं. तुम ने उन की तारीफ नहीं की रेखा.’’
‘‘किस बात की तारीफ करूं नितिन? न उन में रूप है और न ही कोई खास गुण दिखाई दे रहा था.’’
‘‘बारीकी से देखोगी तो तुम्हें उन में भी कोई खास गुण दिखाई दे जाएगा,’’ नितिन बोले, तो रेखा हंस दी.
मिनी और रिया तो अकसर आलोक सर को देखते ही मैडम की बातें ले कर बैठ जातीं. उन दोनों को बात करने के लिए एक अच्छाखासा टौपिक मिल
गया था.
‘‘तुम्हारा क्या खयाल है कि सर की लव मैरिज है या अरेंज?’’
‘‘जरूर दहेज के लिए घर वालों की मरजी से शादी की होगी, वरना…’’
‘‘यह भी हो सकता है रिया कि उन में कोई ऐसा गुण हो जिस पर सर मोहित हो गए हों. कहते हैं प्यार अंधा होता है.’’
‘‘मु?ो तो उस की उम्मीद नहीं है,’’ इतना कह कर दिया फाइल ले कर सर के केबिन में चली गई.
रीता से मुलाकात करने के बाद औफिस में अभी उसे ले कर बातों का बाजार गरम था. उसे अपने बारे में
किसी भी तरह का कोई शिकवा नहीं होता था. वह जैसी थी उस से कोई शिकायत नहीं थी और अपनी उपलब्धि पर खुश भी थी.
रीता को लोगों पर हंसी आती जो हरेक का बाहरी रूप देख कर बिना जाने जज करना शुरू कर देते थे. वह जानती थी कि मर्दों को खूबसूरती लुभाती है लेकिन वक्त पड़ने पर इस से उन का कोई लेनादेना नहीं होता. वे तो बस औरत की देह के मोह जाल में फंस
जाते हैं.
मिस्टर आलोक की पसंद हर मामले में अच्छी मानी जाती थी. कारोबार हो या रिश्ते लोग उन की सम?ा की मिसाल देते थे, लेकिन रीता को ले कर उन से चूक हो गई थी. सब उसे भाग्यशाली कहते, पर रीता भाग्यवादी नहीं थी. उस का मानना था कि भाग्य अपनेआप नहीं बनता, उसे बनाना पड़ता है और उसे बनाने में बहुतकुछ दांव पर भी लगाना पड़ता है.
अपने भविष्य के लिए रीता ने भी बड़ा दांव खेला था और वह दांव उस के हिसाब से सीधा पड़ा था.
लोगों ने रीता को देख कर अपनीअपनी राय बना ली थी. किसी को यकीन था कि वह किसी बड़े बिजनैसमैन परिवार से होगी, तो कोई कहता कि मिस्टर आलोक ने दहेज के लालच में शादी की है.
कोई नहीं जानता था कि यह शादी अरेंज नहीं थी. यह माना जाता है कि प्यार तन से ज्यादा मन की खूबसूरती देखता है. यह आम सोच थी, पर रीता की सोच इस से मेल नहीं खाती थी
उस का अनुभव कुछ और कहता था. वह खुद से कहती, ‘‘एक मर्द पहले तन देखता है, मन और उस की खूबसूरती के बारे में बाद में सोचता है.’’
शायद यही वजह थी कि जब एक साधारण सी औरत ने तन के बल पर सबकुछ हासिल कर लिया, तो उस के मन में यह विश्वास बैठ गया कि
एक खूबसूरत औरत के लिए इस
दुनिया में कुछ भी पाना नामुमकिन
नहीं है.
?ांपड़े में रहते हुए रीता ने बहुतकुछ देखा था. मर्दों की निगाह, उन की कमजोरी, उन का डर. उसे जल्दी सम?ा आ गया था कि गरीबी और देह दोनों का सौदा चलता है, फर्क सिर्फ कीमत का होता है. उस ने आलोक को चुना था… इसलिए नहीं कि वह सब से अच्छा आदमी था, बल्कि इसलिए कि वह
सब से असुरक्षित अमीर आदमी था.
रीता एक बहुत गरीब परिवार से थी. उस के पिताजी एक फैक्टरी में मजदूरी करते थे. अब वे नहीं रहे. आलोक खानदानी रईस थे और पढ़ाई करने के लिए परिवार से दूर दिल्ली आए थे. उन्होंने अपने लिए अलग घर ले रखा था. उस के ठीक सामने रीता का ?ांपड़ा था. उस की मां बरसों पहले गुजर गई थी.
4 भाईबहनों में रीता सब से बड़ी थी, जिन की परवरिश की खातिर उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. सब दिन में स्कूल चले जाते और रीता घर पर अकेली रहती. अब उन सब की शादी हो गई और उन के घर बस गए. सब अपने परिवार में खुश थे.
आलोक अकसर अपने घर से रीता के ?ांपड़े की ओर ?ांकते रहते. एक दिन वे रीता को देख कर मुसकराए. बदले में वह भी हंस दी. इशारा मिलते ही अगले दिन आलोक दोपहर में उस के घर आ गए और मुसकरा कर बोले, ‘‘मेरे घर पर काम करोगी?’’
रीता ने तुरंत हां कह दी. अब तो रोज आनेजाने और मिलने का सिलसिला शुरू हो गया.
एक दिन आलोक ने जैसे ही रीता का हाथ पकड़ा, तो वह सारी लाजशर्म छोड़ कर उन से लिपट गई. उस ने आलोक को कस कर पकड़ लिया.
आलोक आखिर मर्द ही तो थे. जरा सी देर में पिघल गए और उन के बीच की सारी दीवारें टूट गईं.
रीता जानती थी कि वह जो कर रही है उस में बहुत ज्यादा रिस्क है, लेकिन उस के सामने कोई दूसरा उपाय नहीं था. वह गरीबी से परेशान थी और आलोक एक अमीर परिवार के बेटे थे. अगर उस का दांव सीधा पड़ गया, तो जिंदगीभर का आराम था, पर वह गलत भी पड़ता तो उन जैसों पर उस का ज्यादा असर न पड़ता.
आलोक पर रीता का नशा चढ़ चुका था. रोज ही वह काम के बहाने आलोक के घर आती और उन के सामने समर्पित हो जाती. 6 महीने तक सबकुछ ठीक चला और फिर एक दिन रीता ने तब जबरदस्त धमाका कर दिया, जब उस ने आलोक को बताया कि वह पेट से है, तो उन के पैरों की नीचे से जमीन खिसक गई.
आलोक एकदम से बोले, ‘‘यह क्या कह रही हो?’’
‘‘मैं सच कह रही हूं. जितनी जल्दी हो सके मु?ा से शादी कर लो.’’
‘‘शादी और तुम से…’’
‘‘क्या कमी है मु?ा में?’’
‘‘यह पूछो कि क्या है तुम में?’’
‘‘तो फिर क्यों रोज मेरे सामने गिड़गिड़ाते थे,’’ रीता चीखी तो आलोक नरम पड़ गए.
‘‘इस बच्चे से छुटकारा पा लो. जो मांगोगी मैं तुम्हें देने के लिए तैयार हूं.’’
‘‘यह नहीं हो सकता. बच्चा तो मेरे साथ ही मरेगा यह जान लो और मैं तुम सब को फंसा कर मरूंगी,’’ रीता ने कहा.
मजबूर हो कर आलोक को यह बात अपने घर वालों को बतानी पड़ी. वह किसी के दबाव के आगे नहीं ?ाकी. आलोक लाचार हो गए थे. घर वालों ने फैसला आलोक पर छोड़ दिया. इन्हें अपनाने के लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार थी, पर लाखों रुपयों के लालच में करोड़ का भविष्य छोड़ने को राजी न थी.
मजबूर हो कर आलोक को रीता से शादी करनी पड़ी. घर वालों का दबाव अभी भी बना हुआ था. वे अभी भी हर कीमत पर रीता से छुटकारा पाना चाहते थे, पर वह कानून की दुहाई दे कर इन पर अपना दबाव बनाए हुए थी.
तनाव भरे माहौल में पहली बेटी रोशनी का जन्म हुआ. घर वाले अभी भी यही कह रहे थे कि इसे छोड़ दो, लेकिन आलोक जानते थे कि यह इतना आसान नहीं था.
शादी और बेटी के हो जाने पर भी वे नहीं पिघले. रीता भी हार मानने वालों में न थी. परिवार और दुनिया दोनों ही जगह उस का जीना मुश्किल हो रहा था और वह सुनहरे भविष्य के खातिर आलोक को छोड़ने को राजी न थी.
उस ने अपनी जिंदगी को ले कर बहुत बड़ा दांव खेला था.
रीता की जिद के चलते परिवार की इज्जत खराब हो रही थी. उसी की खातिर उन्होंने रीता को घर में जगह दे दी थी, पर दिल में नहीं. वह खुश थी कि उस की जद्दोजेहद कामयाब हो रही थी. जवान मर्द आखिर क्या करता?
कोई उपाय न पा कर आलोक ने हार मान ली और उन दोनों के संबंध सामान्य होने लगे. फिर रीता की गोद में राहुल आ गया. बेटे के खातिर आलोक ने रीता को माफ कर दिया और इस तरह उसे मिस्टर आलोक के घर और जिंदगी में जगह मिल गई.
राहुल के जन्म के बाद आलोक बदले. पहली बार उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगता था?’’
‘‘हर दिन लगता था, पर डर के साथ भूख भी थी,’’ रीता ने कहा. आलोक कुछ नहीं बोले. आज लोग उसे देख कर कहते हैं कि न सलीका है, न सम?ा. रीता जानती है कि सलीका उस ने सीखा ही नहीं और सम?ा उस ने जरूरत से ज्यादा पाली है. वह कोई आदर्श औरत नहीं है और न ही कहानी की हीरोइन. वह बस एक औरत है, जिस ने यह तय किया है कि वह हार कर नहीं जिएगी. उस का दांव गलत भी हो सकता था, पर उस ने दांव इसलिए नहीं खेला था कि वह सही साबित हो, उस ने इसलिए खेला था कि पीछे लौटने का रास्ता बंद हो जाए. और जब रास्ता बंद हो जाए तो आदमी चलना सीख ही जाता है.
यह सब किसी फिल्मी कहानी से कम न था. क्याकुछ नहीं ?ोला था रीता ने अपनी जिंदगी में. भले ही घर वालों की नजर में इस का ज्यादा मोल न था, पर रीता की आपबीती बयां कर रही थी कि आज जोकुछ भी उस के पास है, उस का रास्ता उस ने अपने तन से बनाया था. पति आलोक का खुला बरताव देख कर रीता अकसर सोचती, ‘इनसान का शरीर बूढ़ा होता है, पर मन नहीं. उस की खुशी के लिए वह रोजाना नए उपाय ढूंढ़ता रहता है.’ जिंदगी में रीता ने बड़ी जद्दोजेहद देखी थी. इसी ने उसे नए सिरे से सोचने का एक मौका दे दिया. उसे लगता कि दुनिया में बेकार कुछ भी नहीं है. सब की अपनी उपयोगिता है. बस, सही समय पर उस का इस्तेमाल करना आना चाहिए, लेकिन उस के साथ बहुत ज्यादा जोखिम भी जुड़ा होता है. हरेक के बस का यह ?ोलना नहीं होता, जिस ने जिंदगी में कभी भी बड़ा जोखिम नहीं उठाया था. उस के लिए यह रास्ता जायज नहीं ठहराया जा सकता था. Hindi Story
लेखक डा. के. रानी




