Hindi News Story: एक तरफ अयोध्या के राम मंदिर में ध्वजारोहण हो रहा था, दूसरी तरफ दिल्ली और एनसीआर मास्क लगा कर जहरीली हवा से जूझ रहा था. दिसंबर का महीना आने वाला था और यह साल भी अपना वजूद खोने जा रहा था.
इस बीच अनामिका ने एक दिन विजय को फोन किया, ‘‘यार, कल सुबह तुम मेरे साथ बैंक चलना. एक छोटा सा काम है, फिर हम दोनों ट्रेड फेयर देखने चलेंगे. ज्यादा दिन नहीं बचे हैं.’’
‘‘बैंक तो मैं चल लूंगा, पर ट्रेड फेयर जाने के नाम पर मेरी टांगें कांपने लगती हैं. बहुत भीड़ होती है और खर्च होता है, सो अलग,’’ विजय बोला.
‘‘तुम न बड़े बोरिंग इनसान हो. अभी बोल दूं कि किसी होटल में एक रात बिताते हैं, तो तुम्हारी बांछें खिल जाएंगी. पर अगर मुझे कहीं घूमने जाना हो, तो तुम बहाने बनाने लगते हो. यह गलत बात है,’’ अनामिका ने रूठते हुए कहा.
‘‘अच्छा ठीक है, पहले बैंक का काम निबटाएंगे, फिर देखते हैं कि ट्रेड फेयर जाने का समय बचता भी है या नहीं,’’ विजय बोला.
अगले दिन विजय और अनामिका सुबह 10 बजे ही बैंक चले गए थे. बैंक सरकारी था. अनामिका को अपना केवाईसी अपडेट कराना था. चूंकि बैंक की वैबसाइट में दिक्कत थी, तो उन्हें थोड़ा समय लग रहा था.
वैसे, केवाईसी अपडेट के लिए आप को पहचान और पते के प्रमाण के लिए जिन दस्तावेज की जरूरत होती है, उन में पैनकार्ड और आधारकार्ड सब से खास हैं, साथ ही पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड, या ड्राइविंग लाइसैंस जैसे दस्तावेज की जरूरत हो सकती है.
इस के अलावा, आप को एक हालिया पासपोर्ट साइज की तसवीर और हाल का उपयोगिता बिल (जैसे बिजली या गैस बिल) या बैंक स्टेटमैंट जैसे पते के प्रमाण की भी जरूरत हो सकती है.
बैंक में एक चपरासी और गार्ड के बीच किसी बात को ले कर बहस हो रही थी. वे दोनों कौन्ट्रैक्ट पर वहां लगे थे. चपरासी ऊंची जाति का था, जबकि गार्ड एससी तबके से था.
गार्ड ने चपरासी को कोई काम करने को कहा था, जबकि चपरासी उसे भाव नहीं दे रहा था. मुद्दा बस इतना था कि चपरासी को एक कागज पर मैनेजर के दस्तखत और मुहर लगवानी थी. चूंकि बैंक में भीड़ ज्यादा थी तो गार्ड अपनी सीट नहीं छोड़ सकता था.
इसी बात पर चौकीदार चिढ़ गया था. वह बोला, ‘‘अब इन्हें भी सीट पर ही काम चाहिए. रिजर्वेशन से सब हड़प रहे हैं और अब काम भी हम से ही कराना चाहते हैं. जिस दिन रिजर्वेशन हट गया न, तब देखना.
मुफ्त की मलाई नहीं मिलेगी, तो आटेदाल का भाव पता चल जाएगा.’’
‘‘तो इस में क्या गलत है. तुम लोगों ने सदियों से हमें दबाया है. हमें हमारा हक मिलना चाहिए,’’ गार्ड ने भी ऊंची आवाज में कहा.
‘‘चिंता मत करो. नई सरकार क्रीमी लेयर वाले मामले पर कुछ धमाका करने वाली है. बहुत फायदा उठा लिया तुम लोगों ने रिजर्वेशन का. थोड़े दिनों के बाद सब बराबर हो जाएंगे,’’ चपरासी ने भड़ास निकालते हुए कहा.
‘‘क्यों अफवाह फैला रहे हो. बात का बतंगड़ बनाना तो कोई तुम से सीखे. मैं लंच टाइम में अपना काम करा लूंगा,’’ इतना कह कर वह गार्ड मेन गेट के बाहर जा कर अपनी सीट पर बैठ गया.
तब तक अनामिका का काम हो चुका था. अभी 12 बज रहे थे. वह और विजय ट्रेड फेयर की तरफ चल दिए.
चूंकि 1-2 दिन में मेला खत्म होने वाला था, तो भीड़ ज्यादा थी. वे दोनों अंदर जा कर सब से पहले एक रैस्टोरैंट में गए. उन्हें चाय पीने की तलब थी.
इसी बीच अनामिका बोली, ‘‘उस चपरासी ने कितनी आसानी से कह दिया कि अब देश से रिजर्वेशन खत्म हो जाएगा. उसे क्या पता कि क्रीमी लेयर क्या होता है.’’
‘‘अच्छा, यह बताओ कि क्रीमी लेयर बला क्या है?’’ विजय ने अनामिका को कुरेदते हुए पूछा.
यह सुन कर अनामिका बोली, ‘‘मैं ने बीबीसी के एक लेख में पढ़ा था और वहां इसे अच्छे से समझाया गया था कि ‘क्रीमी लेयर’ की सोच इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पेश की गई थी, जिसे मंडल आयोग मामले के रूप में भी जाना जाता है.
‘‘अदालत ने फैसला सुनाया कि ओबीसी में उन्नत वर्गों को आरक्षण के लाभ का दावा नहीं करना चाहिए, लेकिन इस वर्ग के वास्तव में जरूरतमंद लोगों को यह लाभ मिलना चाहिए.
‘‘इस के मुताबिक, 8 लाख से ज्यादा सालाना आमदनी वाले परिवारों को क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. यह आमदनी सीमा सरकार की ओर से समयसमय पर बदली जाती है. इस के अलावा, ग्रुप ए और ग्रुप बी सेवाओं में ऊंचे पद के अफसरों के बच्चे भी क्रीमी लेयर में शामिल हैं.
‘‘डाक्टर, इंजीनियर और वकील जैसे अमीर पेशेवरों के बच्चों को भी क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. इस के अलावा बड़े पैमाने पर खेतीबारी की जमीन के मालिक परिवारों को भी क्रीमी लेयर में शामिल किया गया है.
‘‘क्रीमी लेयर के सदस्य सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों समेत ओबीसी के लिए आरक्षित लाभों के लिए पात्र नहीं हैं.
‘‘वर्तमान में क्रीमी लेयर की सोच एससी और एसटी पर लागू नहीं होती है. एससी और एसटी के तकरीबन सभी लोगों को आरक्षण का लाभ मिलता है. लेकिन अब कोर्ट की इस ऐतिहासिक सिफारिश के बाद इस में बदलाव की संभावना है.’’
‘‘तो फिर अब इसे क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘मैं तुम्हें हाल की एक खबर बताती हूं. रिटायरमैंट से ठीक पहले चीफ जस्टिस बीआर गवई ने क्रीमी लेयर नौकरियों के कोटे को ले कर बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि यह चिंताजनक है कि एससीएसटी समुदायों में सामाजिक और मालीतौर पर अमीर लोग जाति को हथियार बना कर नौकरियों में आरक्षण का बड़ा हिस्सा हथिया रहे हैं.
‘‘एक बड़े अखबार से बातचीत में चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि केंद्र और राज्यों को एससीएसटी समुदायों को उपवर्गीकृत करने का समय आ गया है, ताकि इन समुदायों में वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े बने हुए हैं, सरकारी नौकरियों में कोटे के लाभ उठा सकें.
‘‘चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बैंच ने राज्यों को एससी समुदायों के भीतर जातियों को सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन व सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व के आधार पर उपवर्गीकृत करने की इजाजत दी, यह पक्का करते हुए कि कोटे का बड़ा हिस्सा सब से पिछड़े लोगों को जाए.
‘‘इस बारे में चीफ जस्टिस ने कहा कि अपने ही समुदाय से आलोचना के बावजूद, वे दृढ़ता से महसूस करते हैं कि एससीएसटी समुदायों में क्रीमी लेयर को इन समुदायों में वंचितों के लिए जगह देनी चाहिए.’’
‘‘इस में गलत क्या है? जब क्रीमी लेयर वालों ने पहले ही आरक्षण का फायदा ले लिया है, तो उन की अगली पीढ़ी को खुद ही इस सब का फायदा नहीं लेना चाहिए, तभी तो गरीब एससीएसटी को आरक्षण का असली हक मिल पाएगा,’’ विजय ने कहा.
‘‘विजय, तुम मामले की गहराई नहीं समझ रहे हो. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त, 2024 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण बारे में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकार इन समुदायों के आरक्षण सीमा के भीतर अलग से वर्गीकरण कर सकती है.
‘‘तब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की 7 जजों की बैंच के 6 जस्टिस ने एससीएसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण के पक्ष में फैसला सुनाया, जबकि एक जस्टिस ने इस का विरोध किया.
‘‘फैसला सुनाते समय यह सिफारिश भी की गई कि एससी और एसटी के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान होना चाहिए और यह ओबीसी वर्ग पर लागू क्रीमी लेयर के प्रावधान से अलग होना चाहिए.
‘‘इस फैसले को ले कर कई पहलुओं की तरफ लोगों का ध्यान गया है कि क्या एससी और एसटी के आरक्षण में क्रीमी लेयर देने की जरूरत है?’’
‘‘पर मैं इस फैसले को ऐतिहासिक मानता हूं. तुम इस तरह से यह बात समझो. अगर एक छात्र दिल्ली के किसी बड़े और नामचीन या किसी और बड़े शहर के बढि़या कालेज में पढ़ रहा है और एक छात्र गांवदेहात के किसी साधारण स्कूल या कालेज में पढ़ रहा है, तो इन दोनों छात्रों को एकसमान नहीं माना जा सकता है. अगर एक पीढ़ी आरक्षण का लाभ ले कर आगे बढ़ी है, तो अगली पीढ़ी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए,’’ विजय ने अपना पक्ष रखा.
‘‘ओह, तो यह बात है. पर तुम इस मुद्दे को बड़ा हलके में ले रहे हो. ‘वंचित बहुजन अघाड़ी’ के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने इस फैसले का विरोध किया है. उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला एससी के तहत पिछड़ेपन को मापने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानदंडों पर चुप है.
‘‘प्रकाश अंबेडकर ने आगे कहा कि आरक्षण से न केवल एससी, एसटी और ओबीसी को लाभ होता है, बल्कि सामान्य श्रेणियों को भी लाभ होता है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.
‘‘और तो और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सुनाए फैसले के बारे में बौम्बे हाईकोर्ट के वकील संघराज रूपवते ने कहा कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों ने एक बार फिर अदालत की आड़ में वही किया है, जो वे चाहते थे. यह एक ऐसा फैसला है जो हमें जातिविहीन समाज से दूर ले जाता है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उपवर्गीकरण की अनुमति देना 6 जस्टिस की एक बड़ी गलती है.
‘‘वैसे भी एससी और ओबीसी के क्रीमी लेयर अलग होते हैं. इस बारे में ‘नैशनल कौन्फेडरेशन औफ दलित और्गनाइजेशन’ के अध्यक्ष अशोक कुमार भारती इस बारे में कहते हैं कि एससीएसटी सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं, इन्हें समाज से बाहर रहने के लिए मजबूर किया गया था. इन के खिलाफ अन्याय का भाव अब भी समाज में बरकरार है, जबकि ओबीसी के बारे में ऐसा नहीं है. उन के पास भूमि है, साधन हैं. हालांकि, शिक्षा के मामले में वे भी वंचित हैं.’’
‘‘तो तुम यह मानती हो कि यह सरकार की साजिश है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘एक तरह से कह सकते हैं. जनरल कैटेगरी में जज का बच्चा जज बन सकता है, डाक्टर का बच्चा डाक्टर बन सकता है, इंजीनियर का बच्चा इंजीनियर बन सकता है, पर वंचितों में क्रीमी लेयर की फांस लगा कर उन्हें ऐसा करने से रोक दो कि आप की एक पीढ़ी ने आरक्षण का फायदा ले लिया है, अब अगली पीढ़ी को अपने दम पर यह मुकाम हासिल करना होगा.
‘‘यहां पर एक सामाजिक पहलू भी है. जिस एससीएसटी और ओबीसी के बच्चे अपने मांबाप की बड़ी सरकारी नौकरी की वजह से अब पढ़ाईलिखाई में बेहतर रिजल्ट दे रहे हैं, यह उन्हें मानसिक रूप से दबाने की भी कोशिश है.
‘‘लेकिन टीना डाबी जैसे होनहार जनरल कैटेगरी को टक्कर दे रहे हैं. वे आईएएस टौपर तो थीं ही, उन्हें कथिततौर पर 12वीं जमात के बोर्ड इम्तिहान में 93 फीसदी अंक मिले थे, जिस में राजनीति विज्ञान और इतिहास दोनों में 100 अंक शामिल हैं. सोशल मीडिया पर उन की मार्कशीट वायरल हुई थी,’’ अनामिका बोली.
‘‘मान ली तुम्हारी बात, पर सोशल मीडिया पर कही बात जरूरी नहीं कि सही हो,’’ विजय ने शक जाहिर किया.
‘‘उत्तर प्रदेश में सर्वोदय विद्यालय, मिर्जापुर की 25 छात्राओं में से 12 ने इस साल देश की सब से मुश्किल मैडिकल प्रवेश परीक्षा यानी नीट पास की थी. ये सभी छात्राएं एससी, एसटी और ओबीसी परिवारों से आती हैं.
‘‘तो हम यह नहीं कह सकते हैं कि इन तबकों के बच्चे होनहार नहीं हैं. वे अब पढ़ाईलिखाई की कीमत समझ रहे हैं. अगर उन्हें सही सीख मिले तो वे खुद को साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं,’’ अनामिका बोले जा रही थी.
‘‘ठीक है, ठीक है, पहले तुम पानी पी लो. मान ली तुम्हारी बात. सरकार को एकदम से कोई कड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी बात रखी है और उस पर बहस की जा सकती है.
‘‘देश में अभी जाति के नाम की समानता बनाने में समय लगेगा. यह कोई ऐसा फैसला नहीं है कि आज लागू हुआ और कल से देश में बदलाव की बयार बहने लगेगी. यहां बात किसी वंचित समुदाय के मालीतौर पर मजबूत होने की नहीं है, बल्कि उन्हें साथ खड़ा रहने की हिम्मत भी देनी होगी.
‘‘जिन बच्चों के मांबाप ने आरक्षण से खुद को ऊंचा उठाया है, उन बच्चों में थोड़ा आत्मविश्वास आया है, पर अभी दूर तक जाना है और सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले हर पहलू पर गौर करना होगा,’’
विजय ने अनामिका की बात को बैलेंस देते हुए कहा.
‘‘यही आज की जरूरत है. राजनीति और जातिवाद दोनों अलगअलग बातें हैं. अगर कोई सरकार ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा देने की पहल करती है, तो उसे वाकई सब को साथ ले कर चलना होगा, तभी देश में तरक्की दिखाई देगी,’’ अनामिका ने अपनी बात खत्म की.
इस के बाद विजय ने लंच का बिल दिया और वे दोनों उस रैस्टोरैंट से बाहर निकल गए. अभी मेला देखना जो बाकी था. Hindi News Story




