सरस सलिल विशेष

फगुआ में देशज बबुआ सब्सिडी की गलीसड़ी भंग के अधकचरे नशे में इधर से उधर, उधर से इधर बिन पेंदे के नेता सा चुनावी दिनों के धक्के खा रहा था. टिकट न मिलने पर कभी इस दल को तो कभी उस दल को कोसे जा रहा था. पता ही न चल रहा था कि यह नशा भंग का है या कमबख्त वसंत का. बबुआ सरकार का आदमी होने के बाद भी सरकार की भंग के अधकचरे नशे में गा रहा था, ‘सरकार ने कहा कि बबुआ नोटबंदी के दौर में नोटबंदी के बाद भी हंस के दिखाओ, फिर यह जमाना तुम्हारा है. नोटबंदी में सरकार के सुरताल के साथ फटे गले से सुर मिलाओ, फिर यह आशियाना तुम्हारा है. …तो लो सरकार, हम नोटबंदी में जनता के गिरने के बाद भी खड़े हो गए और मिला ली है सरकार की ताल के साथ ताल, मिला ली है सरकार के चकाचक गाल के साथ अपनी फटी गाल…कि पग घुंघुरू बांध बबुआ नोटबंदी में नाचे रे…नाचे रे…नाचे रे…’ उधर जनता की खाली, बदहाली जेबें देख वसंत परेशान. खाली जेबों के ये, खाक रंग खेलेंगे? अब की बार होली के नाम पर देवर अपनी भाभियों को कैसे ठिठेलेंगे?

देशज बबुआ जब से सरकार से जुड़ा है, उसे पता है कि सरकार का काम ही है सोएजागे, हर पल हवाई दावे करना. जो दावे न करे, भला वह सरकार ही काहे की. और वफादार जनता का काम है सरकार के दावों की रक्षा के लिए चौकचौराहों पर दिनदहाड़े एकदूसरे को धक्के देते मरना. दावे सरकार के तो छलावे जनता की जिंदगी के अभिन्न अंग हैं.

सो, सरकार ने फगुआ में रंग जमाने के बहाने, होली के नशे में जनता को धुत्त बनाने के साथ भंग के चकाचक रंग में दावा किया, ‘उस की नोटबंदी रंग ला रही है. ब्लैकमनिए की ब्लैकमनी नंगेपांव दौड़ जनता से गले लगने के लिए जनता के जनधन खातों की ओर बढ़ रही है. अब आम जनता सावधान हो जाए. उस की जेब भरने वाली है’. पर जनता ने भूख के नशे में भी जो बिना बैटरी की टौर्च लिए गौर से देखा तो पाया, रे बबुआ, ब्लैकमनिए नहीं, अबके भी मुई जनता ही लूटी जा रही है. यह जनता है ही ऐसी. इस की जिंदगी में कभी इस के तो कभी उस के हाथ लुटना ही लिखा है. आदमी के जो तीसरा हाथ होता तो तीसरे के हाथों भी लुटने को सहर्ष तैयार रहता. या उसे तीसरा हाथ भी लुटने को राजी कर लेता. सरकार कोई भी हो, वह दिल्ली के तख्त पर चढ़ बस दावे करती रहती है और बेचारे बबुआढबुआ कश्मीर से कन्याकुमारी तक तालियां बजाते भूखों मरते रहते हैं, अपनी खुशी से.

अबके सरकार ने चुनाव को वसंत में मिलाते मस्ती की कौकटेल तैयार की तो चुनावी घोषणापत्र को हर तरह के रंग में हर वोटर की मांग के अनुरूप लिपाया, ढोल मंजीरा ले आ डटी फगुआ के मंच पर. जनता को बरगलाबरगला गले का वैसे ही बुरा हाल था. पर भैया, तीजत्योहार है, गाना तो पड़ेगा ही. जनता को वोटों के लिए लुभाना तो पड़ेगा ही. यही राजनीति का धर्म है. इसीलिए होली में इस बार देवर से कहीं अधिक राजनीति बेशर्म है.

सरकार को फगुआ के मंच पर जमे देख जनता छाछ की जली जीभ को मुंह में इधरउधर घुमाते बड़बड़ाने लगी. सरकार के दम में दम मिलाते ढोल की जगह अपना पिचका पेट बजाने लगी. उसे चुनाव के दिनों में भी ये सब करते देख सरकार ने उसे डांटा, ‘हद है री जनता, चुनाव के दिनों में भी पेट बजा रहे हो? क्या गम है जिस को दिखा रहे हो? अपना ये पिचका पेट दिखा तुम क्या बके जा रहे हो?

‘इधर हम एक आदमी के चारचार पेट भरने का इंतजाम कर रहे हैं, उधर वोटर भूखे मर रहे हैं. जरूर देश पर किसी भूतप्रेत का साया है. देखो तो, हम ने अपने घोषणापत्र में तुम्हारे लिए क्याक्या पकने को कड़ाही में सजाया है. बस, हमें वोट दो. इस बार सतयुग शर्तिया समझो आया है.’

जनता ने यह सुन चुनाव का तंबूरा बजाती सरकार के आगेपीछे हाथ जोड़े, ‘हुजूर, माना आप 5 साल हम से ठिठोली ही करते हो. ठिठोली करना आप का राजधर्म है. ठिठोली करना आप का जीवन का मर्म है. पर चुनाव के दिनों में तो कम से कम ठिठोली न कीजिए. होली है इस का मतलब यह बिलकुल नहीं कि होली के नाम पर जो मन करे, बके जाओ. देखो तो, हम नोटबंदी की मार से अभी भी नहीं उबरे हैं. हमें नोटबंदी से उबारो.

‘हे दीनानाथ, सुना है आप अबके भगवान को भी तारने जा रहे हो? हम तो नए नोटों के लिए अभी भी बंद पड़े एटीएम के आगे हाथ जोड़े लाइन में हाथ बांधे एकदूसरे को पीछे धकियाते, वहीं के वहीं खड़े हैं. कोई एकदूसरे से आगे न निकल जाए, इसलिए दिनरात जैसे भी हो, एकदूसरे के आगे विपक्षियों की तरह अड़े हैं. अड़ना हमारा जन्मसिद्घ अधिकार है. देखो तो, काले नोटों वाला लाला अब भी लंबी तान के सो रहा है. अब तो जागो सरकार, उस के कारनामे देख, उस के घर का पहरेदार कुत्ता तक रो रहा है.’

सरकार बोली, ‘लगता है साइकिल ने तुम्हारा दिमाग घुमाया है. रोटी हमारे आटे की खा रहे हो और हमारे ही विपरीत कमर मटका रहे हो. धत्त तेरे की जनता.’

‘माफ करना, वादेदाता. सच तो सच है. मुंह में कीड़े पड़ें जो अब हम झूठ बोलें. झूठ बोलना इन का नहीं, लोकतंत्र के राजा का काम है,’ सरकार के खासमखास ने ढोल पर थाप देते सरकार के ऊंचा सुनने वाले कान में शब्द सरकाया कि अचानक नोटबंदी के चलते सरकार को कान्हा मान राधा ने उस पर रंग गिराया. सरकार होली के रंग में भीग गई सारी.

‘ये फजीहत का रंग हम पर, फिर से किस ने डाला? गोरी सरकार को ये किस रंग से नहला रहे हो? ये किस तरह का फगुआ मना रहे हो?’ सरकार दिल्ली गलिन में राधा को झाड़ती, अपने वसन संभालती राधा को लताड़ती चीखी तो राधा बौराई, ‘सरकार, माफ करना. नोटबंदी के दौर में दूसरे रंग न खरीद पाई. होली का त्योहार बचा रहे, इसलिए पानी में तवे की कालिख ले मिलाई. अब आप सामने आ गए तो??? मैं तो अपने श्याम को और श्याम करने के लिए… सोचा, श्याम कारे ही तो हैं. होली भी हो जाएगी और…पर सरकार, लगता है अब जनता के तीजत्योहार ऐसे ही मनेंगे. हे पौपुलर सरकार, हो सके तो दिल्ली से बाहर निकलो, मोहन प्यारे. हो सके तो बयानों से बाहर निकलो, सोहन प्यारे. ऊंचे लोगों की तिजोरियां नहीं, हम गरीबों के पेट भरो जनता के सहारे.’

मोहन सुन परेशान. राधा की आंखें धुएं से फूटने से बचाने के लिए उसे गैस भी दी, तो भी अपनी न हुई. चुनाव सिर पर. जनता को कैसे फुसलाएं? नोटबंदी का अब क्या तोड़ लाएं? लेओ भैया, जे तो उन के पैरों पर कुल्हाड़ी मारतेमारते अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी पड़ गई. होली में सारा चकाचक घोषणापत्र गुड़गोबर हो गया. एजेंडे का वोटर एजेंडे में ही खो गया.

होली के हुल्लड़ में सरकार परेशान है. चुनाव से प्रैशरियाए सिर पर टोकरा भरा आसमान है. किस ओर जाएं. बिन कनैक्टिविटी के किसे डिजिटाई टोपी पहनाएं. डिजिटलिया हो छत पर खड़े कोई सिग्नल तलाश रहा है तो कोई सिग्नल के लिए हनुमानचालीसा बांच रहा है.

ऐसे में फगुआ के अवसर पर वोट बटोरने का कोई खालिस रास्ता तो दिखाओ, हे लोकतंत्र. होली में होली से अधिक वोटों को झटकने की मारधाड़ है. अब के लट्ठमार होली नहीं, वोटमार होली चली है. सभी अपनेअपने सिर पर अपनेअपने घोषणापत्रों का हैलमेट रख वोटों के लिए जनता द्वारा धकियाए जाने के बाद भी अड़े हुए हैं.