सरस सलिल विशेष

शहरों में अखबारों में शादी के इश्तिहार देने, मैरिज ब्यूरो, मैट्रिमोनियल साइट और गैरबिरादरी में शादीब्याह कराने के बहुत से रास्ते हैं. इन के जरीए शादी के लिए दूल्हादुलहन की तलाश की जा सकती है, पर गांवों में अभी भी केवल परिचितों का ही सहारा है.

शहरीकरण का असर बढ़ने से गांव से शहर की तरफ तो लोग जा रहे हैं. गांव के लोगों की गांव में ही शादियां न के बराबर होती हैं. इस वजह से अब गांव में शादी के रिश्ते खोजना मुश्किल होने लगा है.

रामपुर कलां गांव के रहने वाले 70 साल के बुजुर्ग प्रेमपाल कहते हैं, ‘‘समय के साथसाथ गांव की सोच बदली नहीं है, जबकि हालात बदल गए हैं.

‘‘पहले दूरदूर तक नातेरिश्तेदार शादी लायक लड़का या लड़की पर नजर रखते थे. शादी लड़के की पढ़ाईलिखाई से ज्यादा उस के घरपरिवार की हैसियत पर निर्भर करती थी. जिस की खेती अच्छी होती थी उस को ज्यादा अमीर माना जाता था. पर अब नौकरी वाले लड़कों को अहमियत मिलने लगी है.

‘‘शादी के बाद अगर किसी तरह का विवाद होता भी था तो उसे आपस में सुलझा लिया जाता था. अब ऐसे विवाद कोर्ट और पुलिस तक पहुंचने के बाद ही सुलझते हैं. ऐसे में शादी कराने वाले बिचौलिए के रिश्ते खराब होने लगे हैं. वह फालतू के विवाद में नहीं पड़ना चाहता.’’

बिचौलिया वह होता है जो यह बताता है कि शादी के लायक लड़का या लड़की किस घर में है. इस काम को करने वाले लोग हर गांवदेहात में होते थे. नातेरिश्तेदार होने के साथसाथ शादी कराने वाले पंडित तक इस में शामिल होते थे.

शादी कराने के एवज में पंडित को  दक्षिणा मिलने के साथ ही चढ़ावा भी मिलता था. बिचौलिए को किसी तरह का कोई माली फायदा नहीं होता था. शादी में मिलने वाले शगुन और सम्मान में बिचौलिए को खास अहमियत दी जाती थी. यही उस का इनाम होता था.

इन की बढ़ी जिम्मेदारी

अब शादी के लिए रिश्तों की तलाश करने का काम घरपरिवार के लोगों के ही जिम्मे बचा है. अपनी लड़की के लिए दामाद की तलाश कर रहे देव कुमार बताते हैं, ‘‘हम गांव के लोग आपसी जानपहचान के बल पर ही रिश्तों को तलाशने का काम करते हैं. एक शादी करने के लिए कईकई रिश्तों को देखनासमझना पड़ता है. हम अच्छा पढ़ालिखा नौकरी वाला दामाद खोजने की कोशिश करते हैं.

‘‘पहले जहां गांव की खेती, घर और जमीन ही अच्छे रिश्ते का पैमाना होती थी वहीं अब लड़के की नौकरी पहली प्राथमिकता हो गई है. केवल सवर्णों की ही बात नहीं है, बल्कि दलितों और पिछड़ों में भी ऐसे लड़कों को अहमियत दी जाती है जो कामधंधा करते हों.’’

समाजसेवी दिनेश लाल मानते हैं कि आज के समय में गांवों में शादी के लिए रिश्तों को खोजना मुश्किल काम हो गया है. वजह यह है कि रिश्ता खोजने के जितने तरीके शहरों में हैं उतने गांव में नहीं हैं. इस के लिए गांव के लोगों की सोच में बदलाव लाना पड़ेगा. जातिवाद और ऊंचनीच का भेदभाव खत्म करना होगा.

गांव को ले कर लड़कियों की एक यह भी सोच होती है कि गांव में रहने वाले लड़के गालीगलौज, मारपीट और नशा करते हैं, इस वजह से इन से दूर रहो. गांव में कमाई का अहम जरीया खेतीबारी थी, पर अब वह मुनाफे की नहीं रही. गांव के लोग जमीनें बेच कर शहर या कसबों में बसने लगे हैं. ऐसे में गांवदेहात में अच्छे रिश्ते मिलने के मौके कम होते जा रहे हैं.

तरक्की में रुकावट

बहुत से गांव अभी भी ऐसे हैं जहां सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं की पूरी तरह से कमी है. इन गांवों के लोग साफतौर पर कहते हैं कि इन वजहों से गांव में शादी करने वाले लोगों की तादाद लगातार घटती जा रही है. शादी अगर हो भी जाती है तो बाद में विवाद होते हैं.

शादी के बाद होने वाले झगड़ों की वजह से शादी का रिश्ता बताने वाले कम होते जा रहे हैं. लोग शादी के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहते हैं. गांव में तरक्की अगर होती भी है तो सड़क तक दिखती है. सड़क से नीचे उतरते ही उस की पोल खुल जाती है.

सरस सलिल विशेष

जरूरत इस बात की है कि गांव में उद्योगधंधे लगें, जिस से वहां पैसे का आना बढ़ सके, सुविधाएं आ सकें तभी वहां की सोच और हालात बदल सकते हैं. तमाम कोशिशों के बाद भी अभी गांव में शौचालय नहीं बन सके हैं. जहां ये बने भी हैं, वहां उन का इस्तेमाल नहीं होता है.

गांवदेहात के आसपास अभी भी अच्छे डाक्टर नहीं हैं. ऐेसे में झोलाछाप डाक्टर ही वहां इलाज करते हैं. बच्चों की पढ़ाई के लिए अच्छे स्कूलों की भी कमी है. बाजारों में शहरों जैसी चकाचौंध नहीं है. ऐसे में यहां खरीदारी करना भी अच्छा नहीं लगता. इन सब के बीच एक खास वजह यह भी है कि औरतों का सम्मान भी यहां नहीं है. पहले आपसी रिश्तों में औरतों का सम्मान बहुत होता था, पर अब इस में कमी आती जा रही है.

जातिगोत्र की परेशानी

गांव के परिवार अभी भी जातिगोत्र की ऊंचनीच में फंसे हैं. गैरबिरादरी में शादी तो बड़ी दूर की बात है.

अपनी ही जाति में काबिल लड़कों की तादाद सब से कम मिलती है. अगर मिलती भी है तो वहां दहेज ज्यादा देना पड़ता है. अब दहेज की मांग इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि काबिल लड़कों की तादाद बहुत कम है. उन के लिए शादी के औफर ज्यादा हैं.

जब बात अपनी जाति की आती है तो यह परेशानी और भी बढ़ जाती है. अपनी ही जाति में मनपसंद लड़के बहुत कम मिलते हैं. काबिलीयत के पैमाने के बाद पर्सनैलिटी के हिसाब से देखें तो भी गांव के लड़के लड़कियों से कमतर दिखते हैं.

गांव के लोगों में गैरबिरादरी में शादी करने का रिवाज नहीं है पर अगर इस चक्कर में शादी की उम्र निकलने लगती है तो बहुत से लोग दूरदराज से शादी कर के लड़की ले आते हैं, जिन की जाति के बारे में किसी को कुछ पता नहीं होता है. धीरेधीरे उन लड़कियों को सामाजिक मंजूरी भी मिल जाती है.

हरियाणा और पंजाब में ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं, जहां बिहार, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और नेपाल की रहने वाली लड़कियां आ जाती हैं. कई लोग तो खरीद कर ऐसी लड़कियों को लाते हैं. इन प्रदेशों में गरीबी ज्यादा है. परिवार में लड़कियों की तादाद ज्यादा होती है. बहुत सारे दलाल शादियां कराने का ठेका लेते हैं.

Tags: