सरस सलिल विशेष

रीमा कैंसर की पहले स्टेज से जूझ रही थीं. डाक्टरों का कहना था कि अगर वे समय से पूरा इलाज करा लेंगी तो ठीक हो सकती हैं. लेकिन रीमा के परिवार वालों का डाक्टर के इलाज से ज्यादा झाड़फूंक पर यकीन था. वे उन्हें एक बाबा के पास ले कर पहुंचे.

उस बाबा ने अपने तंत्रमंत्र से रीमा को ठीक करने का दावा किया जिस पर परिवार वालों ने आंख मूंद कर यकीन कर लिया.

उस बाबा ने इस के एवज में न केवल ढेर सारे रुपयों की मांग की, बल्कि रीमा को डाक्टर के पास ले जाने से मना भी कर दिया.

परिवार के लोग रीमा को अकसर उस बाबा के पास झाड़फूंक के लिए ले जाने लगे. रीमा की बीमारी बढ़ती जा रही थी लेकिन उन के घर वालों को उस बाबा पर इस कदर यकीन था कि रीमा की पीड़ा को भी वे महसूस नहीं कर पा रहे थे.

एक दिन रीमा की हालत ज्यादा खराब होने लगी. उन के परिवार वालों को लगा कि उन्हें एक बार फिर से डाक्टर को दिखाना चाहिए.

डाक्टर ने बताया कि झाड़फूंक के चलते रीमा की बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है और उन का बचना मुश्किल है. आखिरकार एक दिन रीमा की मौत हो गई.

इस देश में आज भी लोग बीमारियों का इलाज माहिर डाक्टरों से न करा कर बाबाओं, पीरफकीरों की शरण में खोजते हैं. ऐसे में हर रोज हजारों लोगों को पाखंड और पोंगापंथ के चक्कर में अपनी जान गंवानी पड़ती है.

डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि उन के पास हर रोज ऐसे मरीज आते हैं जो झाड़फूंक के चक्कर में पड़ कर अपनी बीमारी को गंभीर बना लेते हैं या मौत के मुंह में चले जाते हैं. कई बार मरीजों को झाड़फूंक न कराने की सलाह देने पर उन्हें भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है.

पढ़ेलिखे भी शिकार

एक मनोविज्ञानी राधेश्याम चौधरी का कहना है कि पढ़ेलिखे लोगों की इलाज के लिए बाबाओं के आगे लाइन लगाने की खास वजह यह होती है कि उन के मन में बचपन से ही भूतप्रेतों और बाबाओं को ले कर डर बैठा दिया जाता है जिसे वे बड़ा होने पर भी अपने मन से निकाल नहीं पाते हैं.

अगर ऐसे लोग कभी बीमार पड़ते भी हैं या परेशानियों का शिकार होते हैं तो उन्हें इस का इलाज बाबाओं के पास ज्यादा दिखाई देता है. उन को इस बात की समझ तब आती है जब वे बाबाओं के झांसे में पड़ कर अपना नुकसान कर बैठते हैं. हमें बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा करनी चाहिए जिस से उन के मन में भूतप्रेतों का डर न रहने पाए.

ऐसे मरीज हैं ज्यादा

पीरफकीरों के यहां झाड़फूंक कराने आए ज्यादातर लोग दिमागी बीमारियों से जूझ रहे होते हैं. ऐसे मरीजों के परिवार वाले मरीज की ऊलजुलूल हरकतों को भूतप्रेत का साया मान लेते हैं जिस के चलते वे बाबाओं की शरण में पहुंच जाते हैं.

झाड़फूंक की दुकान चलाने वाला बाबा सब से पहले उन्हें डाक्टरों के पास ले जाने से मना करता है, क्योंकि उसे पता होता है कि अगर मरीज डाक्टर के पास चला गया तो न केवल आसानी से ठीक हो जाएगा बल्कि उसे अपनी झाड़फूंक की दुकान भी बंद करनी पड़ जाएगी. इस से लंबे समय तक जेब ढीली करने वालों की तादाद में कमी आ जाएगी और उस की पोल खुलने का भी डर बना रहेगा.

मानसिक रोग विशेषज्ञ डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि दिमागी बीमारी के ज्यादातर मरीज तो उन के पास तब आते हैं जब उन की हालत बहुत ज्यादा बिगड़ चुकी होती है.

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परिवार से पूछने पर पता चलता है कि मरीज की अजीबोगरीब हरकतों को भूतप्रेतों का साया मान कर वे उस की झाड़फूंक करा रहे थे.

अजीब हरकतें करना दिमागी बीमारी की निशानी है. इस में कई तरह के लक्षण एकसाथ दिखाई पड़ सकते हैं. इन में स्किजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऔर्डर या कैटाटोनिक अवसाद जैसी कई बीमारियां शामिल हैं.

इन बीमारियों में मरीज के विचारों और बरताव में बदलाव आ जाता है. इस के चलते वह कुछ समय के लिए अपनी देखभाल करने में नाकाम हो जाता है.

इसी तरह के लक्षण दूसरी दिमागी बीमारियों में भी पाए जाते हैं. कुछ बीमारियों में मरीज अपनेआप को किसी दूसरे के किरदार के साथ जीने लगता है. लोग समझते हैं कि उस पर कोई ऊपरी साया है, जबकि भूतप्रेत या ऊपरी साया सब बकवास है जो पोंगापंथियों के दिमाग की उपज होती है.

ऐसी बीमारियों में डाक्टरी इलाज का सहारा लेना चाहिए, न कि बेसिरपैर की बातों में फंस कर अपनी जेब ढीली कर दी जाए.

डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि सामान्य या गंभीर बीमारियों की दशा में हमें डाक्टर से इलाज कराना चाहिए जिस से समय रहते बीमारी से न केवल नजात मिलेगी बल्कि बच्चा न पैदा होने जैसी समस्याओं से जूझ रही औरतों का बाबाओं द्वारा यौन शोषण भी नहीं हो पाएगा.

अगर कोई भी इलाज के लिए पीरफकीरों और बाबाओं की शरण में जाने को कहता है तो उसे अंधविश्वास फैलाने के जुर्म में जेल भिजवाने का डर दिखाएं.

याद रखिए, कोई भी आप को झाड़फूंक कराने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. अगर कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उस के ऊपर सख्त कानूनी कार्यवाही की जा सकती है.