सरस सलिल विशेष

‘कौआ चला हंस की चाल, भूल गया अपनी भी चाल’. यह कहावत उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के इम्तिहानों पर पूरी तरह से खरी उतरती है. खुद को सीबीएससी बोर्ड की तरह बदलने के चक्कर में यह बोर्ड अपनी ही जड़ों से कटता जा रहा है. ऐसे में उस का यह दावा भी खोखला लगता है कि वह इम्तिहान कराने वाला सब से बड़ा शिक्षा बोर्ड है.

केवल सीबीएससी बोर्ड से एक महीना पहले इम्तिहान कराने और उन का नतीजा लाने से हालात नहीं बदलने वाले. असल सुधार तो तब होगा जब उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड अपने स्कूलों, इम्तिहानों में पूछे जाने वाले सवालों और पढ़ाने के तौरतरीकों में बदलाव लाएगा. नेताओं के विदेशों में दौरा करने और इम्तिहान दिलाने के अपने सिस्टम का गुणगान करने से हालात नहीं बदलेंगे.

छात्रों का इम्तिहान छोड़ने वाला मुद्दा खुशी की नहीं शर्म की बात है. इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, नहीं तो आने वाले दिनों में इम्तिहान पास करने वाले छात्र भी केवल ‘पकौड़ा कारोबार’ करने के ही लायक ही रहेंगे.

उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड का दावा है कि वह दुनिया में सब से बड़े इम्तिहान का आयोजन करता है. इस वाहवाही की हकीकत यह है कि दुनिया में यह पहला इम्तिहान होगा जहां पर 10 लाख, 62 हजार, 506 छात्रों ने इम्तिहान छोड़ दिया.

उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस को अपनी वाहवाही से जोड़ कर देख रही है. सरकार का कहना है कि इस बार इम्तिहानों में नकल पर रोक लगी तो इस वजह से नकल करने वाले छात्रों ने इम्तिहान छोड़ दिया है. सवाल उठता है कि छात्र नकल करने के लिए मजबूर ही क्यों होते हैं?

उत्तर प्रदेश में सरकारी शिक्षा सिस्टम पूरी तरह से खोखला हो चुका है. प्राइमरी से ले कर 12वीं जमात तक एकजैसा हाल है. बिना पढ़े हुए बच्चों को प्रश्नपत्र का हर सवाल मुश्किल लगता है. ऐसे में वे नकल की तरफ भागने लगते हैं.

हमारे देश में एकजैसा शिक्षा सिस्टम नहीं है. अमीर के लिए बेहतर और गरीब के लिए बदतर शिक्षा सिस्टम है. 12वीं जमात के बाद नौकरी की रेस में दोनों को एकजैसे इम्तिहान और इंटरव्यू से गुजरना पड़ता है, जिस में गरीब शिक्षा सिस्टम में पढ़ने वाला छात्र तरक्की की रेस से बाहर हो जाता है.

देश में कुछ सालों के अंदर ही सीबीएससी यानी सैंट्रल बोर्ड औफ सैकेंडरी ऐजूकेशन और आईसीएसई यानी इंडियन सर्टिफिकेट औफ सैकेंडरी ऐजूकेशन का दबदबा बढ़ा है. केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के अलगअलग राज्यों में वहां के शिक्षा बोर्डों की हालत खराब हो चुकी है. उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड से मंजूरी मिले स्कूल लगातार बंद होते जा रहे हैं. उन में पढ़ने वाले बच्चों की तादाद कम होती जा रही है.

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उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे कमजोर घरों के हैं. वे सरकार से मिल रही मदद के लिए इन स्कूलों में पढ़ने आते हैं. सरकार भी चाहती है कि समान शिक्षा ले कर ये बच्चे अमीर बच्चों से मुकाबला न कर पाएं इसलिए यहां सुधार होता नहीं दिखाया जाता है.

उत्तर प्रदेश के पुराने शिक्षा बोर्ड के मुकाबले सीबीएससी और आईसीएसई लोकप्रिय इसलिए हुए हैं, क्योंकि ये प्रतियोगी इम्तिहानों के लैवल को ध्यान में रख कर अपने कोर्स को तैयार कर इम्तिहान कराते हैं.

उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड में जब ज्यादा से ज्यादा हासिल किए गए अंक 75 फीसदी होते थे तो सीबीएससी में 90 से ज्यादा फीसदी नंबर मिलते थे. पिछले कुछ सालों से उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की लगातार बुराई हो रही है. ऐसे में वहां भी बच्चों को ज्यादा नंबर देने का सिलसिला शुरू हो गया है.

पहले जहां केवल साइंस सब्जैक्ट में ही प्रैक्टिकल होते थे अब हाईस्कूल में हिंदी सब्जैक्ट में 30 नंबर का प्रैक्टिकल होने लगा है. ऐसे में बच्चों को बिना किसी तैयारी के ही ज्यादा नंबर मिलने लगे हैं.

इन सब्जैक्ट के प्रैक्टिकल के लिए बच्चों को केवल सब्जैक्ट से संबंधित फाइल तैयार कर लिखना होता है. पहले से तैयार इस फाइल पर ही हाईस्कूल के बच्चों को 30 में से कम से कम 25 नंबर मिलने लगे हैं. ऐसे में बच्चे अच्छे नंबरों से पास होने लगे हैं. अब उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के छात्र भी 80 फीसदी से ऊपर नंबर पा कर सीबीएससी के बच्चों से मुकाबला करने लगे हैं.

खोखली नींव पर…

सरस सलिल विशेष

उत्तर प्रदेश में हर साल तकरीबन 26 लाख बच्चे हाईस्कूल यानी 10वीं जमात और 14 लाख बच्चे इंटर यानी 12वीं जमात के इम्तिहानों में हिस्सा लेते हैं. इन आंकड़ों को देखें तो साफ है कि 10वीं जमात से 12वीं जमात तक पहुंचने के बीच ही ज्यादातर छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं.

गरीब घरों के ये छात्र 10वीं जमात के बाद मेहनतमजदूरी करने में लग जाते हैं. वे सरकारी मदद के बाद भी अपनी आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाते हैं.

उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड ने अपनी खामियों को छिपाने के लिए ‘नकल कारोबार’ को बढ़ाने का काम किया. नेताओं ने भी इसे वोट बैंक से जोड़ दिया.

यह सिलसिला साल 1980 के बाद से धीरेधीरे पनपने लगा जो समय के साथ एक बड़े कारोबार में बदल गया. कल्याण सिंह जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने नकल करने को संज्ञेय अपराध बना दिया था. नकल करने वाले बच्चों को जेल भेज दिया था. उस समय भी यह नहीं सोचा गया था कि बच्चे नकल करते क्यों हैं?

बाद की सरकारों ने इस कानून को खत्म कर बच्चों को जेल जाने से बचाया पर इस से सिस्टम में सुधार नहीं आया. ‘नकल कारोबार’ संगठित हो कर आगे बढ़ने लगा. नकल वाले इम्तिहान कराने के अलग स्कूल खुलने लगे. वहां नकल कराने के नाम पर महंगी फीस वसूल होने लगी. बच्चे ही नहीं उन के मांबाप, शिक्षा विभाग के अफसर, नेता, समाज के लोग सब इस में शामिल हो गए.

उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षा मित्रों की भरती शुरू की. राजनाथ सिंह उस समय उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे. शिक्षा मित्रों की भरती में मैरिट को बेस बनाया गया. मैरिट में वही बच्चे आगे आए जिन्होंने नकल के सहारे ज्यादा नंबर पाए थे.

सरकारी नौकरी में मैरिट को बेस बनाने के बाद नकल कारोबार बहुत तेजी से आगे बढ़ने लगा. अब बिना पढ़े ही बच्चे 75 से 85 फीसदी नंबर पाने लगे. मैरिट में यही बच्चे आगे आ कर नौकरी के दावेदार हो गए.

सरकारी नौकरी में मैरिट का यह खेल आगे भी जारी रहा, जो गले की हड्डी बन गया. शिक्षा मित्रों के रूप में स्कूलों में पढ़ाने वाले टीईटी यानी शिक्षक पात्रता इम्तिहान पास करने में फेल होने लगे.

दिखावा हैं सुधार के कदम

सरकारी स्कूलों में शिक्षा सिस्टम में सुधार के नाम पर सरकार के दावों और उन की हकीकत में बहुत फर्क है. कई बार ऐसे मसले सामने आए जब छात्रों को पढ़ाने वालों का टैस्ट हुआ तो वे ही पूछे गए सवालों के सही जबाव नहीं दे पाए. ऐसे में प्रदेश में शिक्षा सिस्टम की पोल खुलने लगी. प्रदेश में सामूहिक नकल, प्रश्नपत्र का लीक होना, परीक्षा केंद्रों में गलत प्रश्नपत्र पहुंचना, कौपियां ले कर भाग जाना जैसी घटनाएं होने लगीं.

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने शिक्षा में सुधार के लिए जो कदम उठाए हैं उन में सब से पहले इम्तिहानों को सीबीएससी से पहले कराने की वाहवाही लूटने का काम हुआ. 10वीं और 12वीं जमात के जो इम्तिहान हर साल मार्च महीने में होते थे, इस बार फरवरी महीने में ही करा दिए गए. लिहाजा, इस साल बच्चों को पढ़ने का पूरा समय भी नहीं मिला.

साल 2017-18 के शिक्षा सत्र की शुरुआत अप्रैल, 2017 से हुई थी. गांवों में अप्रैलमई महीने में खेतीकिसानी होती है. ज्यादातर मातापिता इस काम में लगे होते हैं. ऐसे में वे अपने बच्चों को समय से स्कूल में दाखिले के लिए नाम नहीं लिखवा पाते.

जुलाई में जब स्कूल खुलते हैं तो बच्चों का दाखिला फिर से शुरू होता है, जो 15 अगस्त तक चलता है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई 15 अगस्त के बाद ही शुरू होती है.

अगस्त से फरवरी महीने के बीच साल के 6 महीने बच्चों की पढ़ाई के लिए मिले. इस में दशहरा, दीवाली, क्रिसमस और जाड़ों की छुट्टियों समेत शनिवार और रविवार की छुट्टी कोे निकाल दें तो आधा समय ही बचता है.

ऐसे में केवल 90 दिन ही सही तरह से बच्चों को पढ़ाई हो पाई. 11 महीने की पढ़ाई का बोझ 3 महीने में पूरा होगा तो बच्चे नकल के लिए मजबूर हो जाएंगे न?

नाम न छापने की शर्त पर हाईस्कूल के इम्तिहान आयोजित कराने वाले एक प्रिंसिपल ने बताया कि सरकार अपनी वाहवाही के लिए तुगलकी फैसले करती है. 10वीं और 12वीं जमात के बच्चों ने इम्तिहान छोड़ा वह शर्म की बात है. नकल इसलिए होती है क्योंकि शिक्षा में सुधार का फैसला शिक्षाविद नहीं अफसर करते हैं.

कभी यह नहीं सोचा जाता कि उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के अलावा बाकी इम्तिहानों में नकल क्यों नहीं होती है? सीसीटीवी, बायोमीट्रिक्स अटैंडैंस वगैरह सिस्टम में सुधार का हिस्सा हैं, शिक्षा में सुधार का नहीं.

आज इन स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचरों की अलगअलग परेशानियां हैं. सरकार के हर काम में स्कूल टीचर ही आसानी से मुहैया होते हैं. उन के पास पढ़ाने के अलावा भी बहुत सारे काम हैं, जिस की वजह से वे पढ़ाने के काम को छोड़ कर दूसरे काम करते हैं.

जो मांबाप अपने बच्चों की पढ़ाईलिखाई के लिए सचेत हैं वे प्राइवेट स्कूल में जाना चाहते हैं. सरकार को शिक्षा और सिस्टम दोनों में सुधार करना होगा केवल सिस्टम सुधारने से कोई हल नहीं निकलेगा.

नहीं होती बेहतर तैयारी

स्कूली इम्तिहानों में छात्रों से जिस तरह से मुश्किल सवाल पूछे जाते हैं टीचर क्लास में उन की तैयारी नहीं कराते. गांवों में पढ़ने वाले बच्चे इतने अमीर नहीं होते हैं कि वे ट्यूशन ले सकें. ऐसे में नकल के भरोसे इम्तिहान देना उन की मजबूरी हो जाती है.

बच्चों को लगता है कि अगर वे अच्छे नंबरों से इम्तिहान पास कर लेंगे तो उन को रोजगार मिल जाएगा, इसलिए वे ऐसे स्कूलों की तलाश में रहते हैं, जहां नकल की सुविधा होती है.

नकल की सुविधा देने के लिए शिक्षा विभाग से ले कर नेता तक जिम्मेदार होते है. ज्यादातर स्कूल ऐसे ही नेताओं के होते हैं जो पार्टी को चंदा देते हैं, अफसरों को घूस देते हैं. इस पैसे को कमाने के लिए वे बच्चों को नकल करा कर पैसे वसूल करते हैं.

उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के हर अफसर को यह पता है कि कहां पर नकल का कारोबार चलता है. साल 2017-18 के शिक्षा सत्र के इम्तिहान के नतीजे अप्रैल महीने में आएंगे. इस साल पास होने वालों की तादाद और उन को मिलने वाले नंबर पिछले सालों के मुकाबले कम होंगे. ऐसे में एक बार फिर से नकल पर चर्चा शुरू होगी.

दरअसल, जब तक शिक्षा सिस्टम में सुधार की बात नहीं होगी तब तक नकल रोकने की बात करना बेमानी है. कोई बच्चा नकल करना सीख कर नहीं आता, हमारी शिक्षा का सिस्टम और पढ़ाई का ढंग उस को नकल करना सिखाता है.

कैसेकैसे सवाल

– हिंदी

  1. ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना कब हुई?
  2. ‘आन का मान’ नाटक के कथानक पर प्रकाश डालिए.
  3. ‘राजमुकुट’ नाटक की कथा संक्षेप में लिखिए.

उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की 12वीं जमात के इम्तिहान में सामान्य हिंदी के प्रश्नपत्र से ये कुछ सवाल हैं. इन सवालों से इम्तिहान देने वालें को क्या हासिल होगा? सामान्य हिंदी के सलेबस में ऐसे सवाल होने चाहिए जिन से बच्चे को ठीक से हिंदी व्याकरण सिखाई जा सके. उस की हिंदी पढ़ने में दिलचस्पी बढ़ सके.

50 नंबर के प्रश्नपत्र को हल करने के लिए 3 घंटे का समय दिया जाता है. हिंदी के प्रश्नपत्र में पूछे जाने वाले सवाल ही ऐसे होते हैं कि 15 मिनट तो छात्र को समझने में लगते हैं. यह केवल हिंदी के प्रश्नपत्र का हाल नहीं है, हर सब्जैक्ट की यही हाल है. हर सब्जैक्ट में ऐसेऐसे सवाल होते हैं जिन का छात्र के भविष्य से कोई मतलब नहीं होता है.

– राजनीतिशास्त्र

सरस सलिल विशेष
  1. दबाव समूह एवं राजनीतिक दल का एक अंतर लिखिए?
  2. सवैधानिक उपचारों के अधिकारों को समझाएं?
  3. समानता के 2 प्रकार बताएं?

साल 2006 में राजनीतिशास्त्र में पूछे गए इन सवालों से पता चलता है कि इन की क्या उपयोगिता है. प्रश्नपत्रों की बात तो जाने दीजिए ‘दवाब समूह’ क्या है यह आम आदमी भी नहीं बता सकता. हर सब्जैक्ट में ऐसेऐसे सवालों की भरमार होती है. ऐसे सवाल ही बच्चों में नकल को बढ़ावा देने का काम करते हैं.

प्राइमरी स्कूल से ही शुरू हों सुधार

समाजसेवी और ‘मैग्सेसे अवार्ड’ विजेता डाक्टर संदीप पांडेय कहते हैं, ‘‘10वीं और 12वीं जमात के बच्चे नकल इसलिए करते हैं क्योंकि प्राइमरी जमातों से ही उन की पढ़ाई का लैवल बहुत नीचा होता है. सरकारी स्कूलों की हालत खराब है. वहां गरीब घरों के बच्चे पढ़ते हैं इसलिए उन स्कूलों के सुधार में किसी की दिलचस्पी नहीं रह गई है. हालत यह है कि प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाले बहुत से टीचर तक अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते. जब स्कूल टीचर को ही अपने स्कूल पर भरोसा नहीं तो दूसरे लोगों की बात कौन करे.

‘‘कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सरकारी नौकरी करने वालों के लिए जरूरी नियम बनाया जाए कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं. सरकार ने इस आदेश को दरकिनार कर दिया. जब तक असरदार लोगों का ध्यान इन स्कूलों की तरफ नहीं जाएगा यहां सुधार नहीं होगा.

‘‘सरकार ने शिक्षा अधिकार कानून बना कर प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को पढ़ाने का हक दिया पर इस का सही से पालन नहीं हो रहा है. आज जरूरत इस बात की है कि देश में एकसमान शिक्षा व्यवस्था लागू हो, तभी छात्रों का भला होगा.’’

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